05 सितंबर 2026
अफगान विदेश मंत्री से अभी एक इंटरव्यू बीबीसी पर आ रहा था जिसमें उनसे सवाल किया गया कि वहां लड़कियों को पढऩे नहीं दिया जा रहा है, तो मंत्री का जवाब था कि स्कूली लड़कियों को धार्मिक शिक्षा वाले मदरसे में कुछ साल पढऩे की छूट है। जब उनसे पूछा गया कि आगे की किसी क्लास में, कॉलेज या यूनिवर्सिटी में लड़कियों को पढऩे की छूट नहीं है, जिसका मतलब यह है कि अफगानिस्तान में कभी महिला डॉक्टर नहीं हो पाएंगी, तो उसका जवाब था कि हाँ यह समस्या तो है, और इस पर विचार किया जा रहा है। तालिबान को इस बार अफगानिस्तान की सत्ता में आए पांच साल तीन हफ्ते हुए हैं, जिस 15 अगस्त को भारत स्वतंत्रता दिवस मनाता है, उसी 15 अगस्त 2021 को अफगान तालिबान दुबारा काबिज हुए थे। और इन पांच बरसों में अफगान शासक यही तय नहीं कर पाए कि लड़कियों की पढ़ाई खत्म कर देने से उनके देश में आगे आने वाली समस्या का क्या होगा? पुरूष चिकित्सक तो महिला की चिकित्सा कर नहीं पाएंगे। बीते दिनों अफगानिस्तान में भूकम्प से बहुत से मकान गिर गए, बचावकर्मी पुरूष थे, और मलबे में दबी हुई तो महिलाएं भी थीं। लेकिन महिलाओं को छूने की इजाजत नहीं है इसलिए बचावकर्मी मलबे में से महिलाओं को नहीं निकाल रहे थे।
आज की एक रिपोर्ट है कि तालिबान शासकों की नजरों से बचकर अलग-अलग छुपकर, कहीं किसी घर में, तो कहीं जगह को घेरकर कुछ शिक्षिकाएं जान पर खेलकर लड़कियों को पढ़ा रही हैं। लड़कियां वहां अलग-अलग पहुंचती हैं ताकि तालिबानों की नजरों में न आएं, और बंदूकधारी तालिबान वहां जांच करने पहुंच जाते हैं, तो वे भागकर इधर-उधर छुपती हैं। लोगों को याद होगा कि पाकिस्तान में एक स्कूली लडक़ी, मलाला स्वात घाटी के इलाके में पढ़ रही थी कि वहां पर तालिबानों का असर बढ़ा, और उन्होंने लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगानी शुरू कर दी। 11-12 बरस की उम्र में मलाला ने इसका विरोध किया तो 2012 में स्कूल से वापिसी के समय उसकी बस रोककर तालिबान ने उसे गोली मार दी, और बहुत बुरी तरह जख्मी हालत में उसे पहले पाकिस्तान में, और फिर ब्रिटेन में भर्ती कराया गया, और लंबे इलाज के बाद किसी तरह उसकी जिंदगी बची। सत्रह बरस की उम्र में उसे नोबल शांति पुरस्कार मिला।
इस विषय पर लिखने की बात आज इसलिए सूझी कि आज एक वीडियो देखने मिला है कि किस तरह एक बांध पर बहते पानी पर चलते हुए स्कूली लड़कियां जान पर खेलकर आ-जा रही हैं। यह देश भर के कई प्रदेशों का हाल है। लेकिन बारिश के महीनों की इस दिक्कत से परे भी बाकी सालभर कई प्रदेशों में सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं है, और देश की आधी आबादी की एक सबसे बुनियादी जरूरत को पूरा करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को लाठी लेकर सरकारों के पीछे पडऩा पड़ता है। लड़कियों की अपनी खास जरूरत रहती है, माहवारी के दिनों में उन्हें पानी वाले शौचालय भी लगते हैं, कचरे के डिब्बे भी लगते हैं, और इसके लिए सरकारों के पीछे पडऩे को एक सुप्रीम कोर्ट भी लगता है! यह गजब का हाल इस देश में आम बात है। इस मुद्दे पर लिखने के लिए हमने अभी भारत में स्कूल छोडऩे वाले बच्चों के आंकड़ों को देखने की कोशिश की, तो पता लगा कि प्राथमिक शालाओं में लडक़ों का स्कूल छोडऩा लड़कियों के मुकाबले कुछ अधिक है। यही हाल मिडिल स्कूल में जारी रहता है, और हाईस्कूल या हायर सेकेंडरी में भी। कुछ लोग इसका सामाजिक कारण यह मानते हैं कि मिडिल स्कूल पार करने के बाद कुछ लडक़ों को पारिवारिक काम में लगना पड़ता है, लेकिन दूसरी तरफ सामाजिक कारण ऐसे भी हैं जो लड़कियों के स्कूल छोडऩे की अधिक वजहें पैदा करते हैं। इनमें से एक तो शौचालयों की कमी है, और माहवारी की दिक्कत के वक्त, उस वजह से कई लड़कियां पढ़ाई छोडऩे को मजबूर हो जाती हैं। इसके अलावा लड़कियों पर घर में माँ के काम में हाथ बंटाना अधिक आता है, छोटे भाई-बहनों या घर की देखरेख उन्हें करनी पड़ती है, और ऐसे में भी उनकी पढ़ाई छूटती है। बाल विवाह से भी कई स्कूली लड़कियों की पढ़ाई छूटती है, उनके ससुराल जाने के बाद आगे की स्कूली पढ़ाई तकरीबन नामुमकिन रहती है। फिर यह भी है कि स्कूल में शिक्षकों, या राह में आते-जाते किसी और की छेडख़ानी की वजह से थककर, और डरकर भी लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। किसी एक लडक़ी के साथ बलात्कार जैसी घटना होने पर बहुत सारी और लड़कियों से माँ-बाप पढ़ाई छुड़वा देते हैं। इन सारे तथ्यों के बाद भी अगर भारत में प्रायमरी से लेकर 12वीं क्लास तक लड़कियों का स्कूल छोडऩा लडक़ों के मुकाबले फिर भी कम है, तो इसमें लड़कियों की पढऩे की अपार इच्छा है। इस एक मामले में हिन्दुस्तान की लड़कियां, पाकिस्तान की मलाला, और अफगानिस्तान की लड़कियां सब एक सरीखी हैं। इन सबको मालूम है कि वे पढ़-लिख लेने के बाद ही समाज में इंसान का दर्जा पा सकती हैं, आगे बढ़ सकती हैं, एक बेहतर जिंदगी पा सकती हैं, और अपने होने वाले बच्चों को वे बेहतर जिंदगी तभी दे पाएंगी जब वे पढ़ी-लिखी रहेंगी। यह पूरा सिलसिला सामाजिक प्रथाओं, और अन्याय के खिलाफ लगातार संघर्ष का एक दस्तावेज है, जो हिन्दी या हिन्दुस्तानी भाषाओं में लिखा जाए, उर्दू में लिखा जाए, या अफगानी जुबान में लिखा जाए, उनमें दर्द की दास्तान एक सरीखी है।
आज जिस तरह देश भर में जगह-जगह स्कूली बच्चे नदी-नालों को पार करके पढऩे के लिए आते-जाते हैं, उनमें भीगे हुए स्कूल पहुंचने पर लड़कियों के लिए अधिक शर्मिंदगी की नौबत रहती है। साथ के लडक़ों, और कई मामलों में शिक्षकों की बुरी नजरों से बचकर रहने की चुनौती भी उन्हीं पर अधिक रहती है। स्कूली बरसों में माहवारी शुरू होने के बाद करीब दस फीसदी दिन उनके तकलीफ में गुजरते हैं, उनकी पढ़ाई पर भी असर होता है, लेकिन देश भर के इम्तिहानों को देखें तो लड़कियां ही हर लिस्ट में लडक़ों से आगे रहती हैं। हम पूरी तरह वैज्ञानिक बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन डॉक्टरों की बताई हुई बात यह है कि गर्भपात कराए जाने की नौबत में जब महिला की कोख में कन्या भ्रूण रहती है, तो वह अपनी जिंदगी को बचाने के लिए अधिक संघर्ष करती है। कुछ वैज्ञानिक तथ्य यह बताते हैं कि भ्रूण स्तर पर भी कन्या भ्रूण की प्रतिरोधक क्षमता अधिक रहती है। और यह सिलसिला बुढ़ापे तक जारी रहता है, भारत में महिलाओं की औसत उम्र आदमियों की औसत उम्र से कई बरस अधिक रहती है, जबकि उनका खानपान मर्दों के मुकाबले कमजोर रहता है, वे गर्भावस्था से लेकर प्रसूति तक की तकलीफों को झेलती हैं, माहवारी से लेकर गर्भाशय निकलवाने तक की तमाम तकलीफें सिर्फ महिलाओं की रहती हैं, फिर भी वे मर्दों से कई बरस अधिक जिंदा रहती हैं! यही जुझारूपन लड़कियों को स्कूल में अधिक वक्त तक बनाए रखता है, वह हिन्दुस्तान हो, पाकिस्तान हो, या बंदूकों से बच-बचकर, छुप-छुपकर लड़कियों के पढऩे वाला अफगानिस्तान हो।




