तालिबानी बंदूकों से छुपकर पढ़ती अफगान लड़कियों से शुरू बात हिन्दुस्तान तक...

 05 सितंबर 2026  

 

अफगान विदेश मंत्री से अभी एक इंटरव्यू बीबीसी पर आ रहा था जिसमें उनसे सवाल किया गया कि वहां लड़कियों को पढऩे नहीं दिया जा रहा है, तो मंत्री का जवाब था कि स्कूली लड़कियों को धार्मिक शिक्षा वाले मदरसे में कुछ साल पढऩे की छूट है। जब उनसे पूछा गया कि आगे की किसी क्लास में, कॉलेज या यूनिवर्सिटी में लड़कियों को पढऩे की छूट नहीं है, जिसका मतलब यह है कि अफगानिस्तान में कभी महिला डॉक्टर नहीं हो पाएंगी, तो उसका जवाब था कि हाँ यह समस्या तो है, और इस पर विचार किया जा रहा है। तालिबान को इस बार अफगानिस्तान की सत्ता में आए पांच साल तीन हफ्ते हुए हैं, जिस 15 अगस्त को भारत स्वतंत्रता दिवस मनाता है, उसी 15 अगस्त 2021 को अफगान तालिबान दुबारा काबिज हुए थे। और इन पांच बरसों में अफगान शासक यही तय नहीं कर पाए कि लड़कियों की पढ़ाई खत्म कर देने से उनके देश में आगे आने वाली समस्या का क्या होगा? पुरूष चिकित्सक तो महिला की चिकित्सा कर नहीं पाएंगे। बीते दिनों अफगानिस्तान में भूकम्प से बहुत से मकान गिर गए, बचावकर्मी पुरूष थे, और मलबे में दबी हुई तो महिलाएं भी थीं। लेकिन महिलाओं को छूने की इजाजत नहीं है इसलिए बचावकर्मी मलबे में से महिलाओं को नहीं निकाल रहे थे। 

आज की एक रिपोर्ट है कि तालिबान शासकों की नजरों से बचकर अलग-अलग छुपकर, कहीं किसी घर में, तो कहीं जगह को घेरकर कुछ शिक्षिकाएं जान पर खेलकर लड़कियों को पढ़ा रही हैं। लड़कियां वहां अलग-अलग पहुंचती हैं ताकि तालिबानों की नजरों में न आएं, और बंदूकधारी तालिबान वहां जांच करने पहुंच जाते हैं, तो वे भागकर इधर-उधर छुपती हैं। लोगों को याद होगा कि पाकिस्तान में एक स्कूली लडक़ी, मलाला स्वात घाटी के इलाके में पढ़ रही थी कि वहां पर तालिबानों का असर बढ़ा, और उन्होंने लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगानी शुरू कर दी। 11-12 बरस की उम्र में मलाला ने इसका विरोध किया तो 2012 में स्कूल से वापिसी के समय उसकी बस रोककर तालिबान ने उसे गोली मार दी, और बहुत बुरी तरह जख्मी हालत में उसे पहले पाकिस्तान में, और फिर ब्रिटेन में भर्ती कराया गया, और लंबे इलाज के बाद किसी तरह उसकी जिंदगी बची। सत्रह बरस की उम्र में उसे नोबल शांति पुरस्कार मिला। 

इस विषय पर लिखने की बात आज इसलिए सूझी कि आज एक वीडियो देखने मिला है कि किस तरह एक बांध पर बहते पानी पर चलते हुए स्कूली लड़कियां जान पर खेलकर आ-जा रही हैं। यह देश भर के कई प्रदेशों का हाल है। लेकिन बारिश के महीनों की इस दिक्कत से परे भी बाकी सालभर कई प्रदेशों में सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय नहीं है, और देश की आधी आबादी की एक सबसे बुनियादी जरूरत को पूरा करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को लाठी लेकर सरकारों के पीछे पडऩा पड़ता है। लड़कियों की अपनी खास जरूरत रहती है, माहवारी के दिनों में उन्हें पानी वाले शौचालय भी लगते हैं, कचरे के डिब्बे भी लगते हैं, और इसके लिए सरकारों के पीछे पडऩे को एक सुप्रीम कोर्ट भी लगता है! यह गजब का हाल इस देश में आम बात है। इस मुद्दे पर लिखने के लिए हमने अभी भारत में स्कूल छोडऩे वाले बच्चों के आंकड़ों को देखने की कोशिश की, तो पता लगा कि प्राथमिक शालाओं में लडक़ों का स्कूल छोडऩा लड़कियों के मुकाबले कुछ अधिक है। यही हाल मिडिल स्कूल में जारी रहता है, और हाईस्कूल या हायर सेकेंडरी में भी। कुछ लोग इसका सामाजिक कारण यह मानते हैं कि मिडिल स्कूल पार करने के बाद कुछ लडक़ों को पारिवारिक काम में लगना पड़ता है, लेकिन दूसरी तरफ सामाजिक कारण ऐसे भी हैं जो लड़कियों के स्कूल छोडऩे की अधिक वजहें पैदा करते हैं। इनमें से एक तो शौचालयों की कमी है, और माहवारी की दिक्कत के वक्त, उस वजह से कई लड़कियां पढ़ाई छोडऩे को मजबूर हो जाती हैं। इसके अलावा लड़कियों पर घर में माँ के काम में हाथ बंटाना अधिक आता है, छोटे भाई-बहनों या घर की देखरेख उन्हें करनी पड़ती है, और ऐसे में भी उनकी पढ़ाई छूटती है। बाल विवाह से भी कई स्कूली लड़कियों की पढ़ाई छूटती है, उनके ससुराल जाने के बाद आगे की स्कूली पढ़ाई तकरीबन नामुमकिन रहती है। फिर यह भी है कि स्कूल में शिक्षकों, या राह में आते-जाते किसी और की छेडख़ानी की वजह से थककर, और डरकर भी लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं। किसी एक लडक़ी के साथ बलात्कार जैसी घटना होने पर बहुत सारी और लड़कियों से माँ-बाप पढ़ाई छुड़वा देते हैं। इन सारे तथ्यों के बाद भी अगर भारत में प्रायमरी से लेकर 12वीं क्लास तक लड़कियों का स्कूल छोडऩा लडक़ों के मुकाबले फिर भी कम है, तो इसमें लड़कियों की पढऩे की अपार इच्छा है। इस एक मामले में हिन्दुस्तान की लड़कियां, पाकिस्तान की मलाला, और अफगानिस्तान की लड़कियां सब एक सरीखी हैं। इन सबको मालूम है कि वे पढ़-लिख लेने के बाद ही समाज में इंसान का दर्जा पा सकती हैं, आगे बढ़ सकती हैं, एक बेहतर जिंदगी पा सकती हैं, और अपने होने वाले बच्चों को वे बेहतर जिंदगी तभी दे पाएंगी जब वे पढ़ी-लिखी रहेंगी। यह पूरा सिलसिला सामाजिक प्रथाओं, और अन्याय के खिलाफ लगातार संघर्ष का एक दस्तावेज है, जो हिन्दी या हिन्दुस्तानी भाषाओं में लिखा जाए, उर्दू में लिखा जाए, या अफगानी जुबान में लिखा जाए, उनमें दर्द की दास्तान एक सरीखी है। 

आज जिस तरह देश भर में जगह-जगह स्कूली बच्चे नदी-नालों को पार करके पढऩे के लिए आते-जाते हैं, उनमें भीगे हुए स्कूल पहुंचने पर लड़कियों के लिए अधिक शर्मिंदगी की नौबत रहती है। साथ के लडक़ों, और कई मामलों में शिक्षकों की बुरी नजरों से बचकर रहने की चुनौती भी उन्हीं पर अधिक रहती है। स्कूली बरसों में माहवारी शुरू होने के बाद करीब दस फीसदी दिन उनके तकलीफ में गुजरते हैं, उनकी पढ़ाई पर भी असर होता है, लेकिन देश भर के इम्तिहानों को देखें तो लड़कियां ही हर लिस्ट में लडक़ों से आगे रहती हैं। हम पूरी तरह वैज्ञानिक बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन डॉक्टरों की बताई हुई बात यह है कि गर्भपात कराए जाने की नौबत में जब महिला की कोख में कन्या भ्रूण रहती है, तो वह अपनी जिंदगी को बचाने के लिए अधिक संघर्ष करती है। कुछ वैज्ञानिक तथ्य यह बताते हैं कि भ्रूण स्तर पर भी कन्या भ्रूण की प्रतिरोधक क्षमता अधिक रहती है। और यह सिलसिला बुढ़ापे तक जारी रहता है, भारत में महिलाओं की औसत उम्र आदमियों की औसत उम्र से कई बरस अधिक रहती है, जबकि उनका खानपान मर्दों के मुकाबले कमजोर रहता है, वे गर्भावस्था से लेकर प्रसूति तक की तकलीफों को झेलती हैं, माहवारी से लेकर गर्भाशय निकलवाने तक की तमाम तकलीफें सिर्फ महिलाओं की रहती हैं, फिर भी वे मर्दों से कई बरस अधिक जिंदा रहती हैं! यही जुझारूपन लड़कियों को स्कूल में अधिक वक्त तक बनाए रखता है, वह हिन्दुस्तान हो, पाकिस्तान हो, या बंदूकों से बच-बचकर, छुप-छुपकर लड़कियों के पढऩे वाला अफगानिस्तान हो।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 4 सितंबर 2026



 

चिट्ठी को तार समझना, वरना बीमार पार समझना

04 सितंबर 2026  

 

अमरीका के कैलिफोर्निया के सानफ्रांसिस्को में अभी एक चर्चित अमरत्ववादी ब्रायन जॉनसन ने सौ-डेढ़ सौ लोगों के बीच एक कार्यक्रम किया जिसमें उन्होंने लंबी जिंदगी जीने के बारे में अपने तजुर्बे बांटे। तीन हजार से अधिक लोगों ने इस कार्यक्रम में मौजूद रहने के लिए आवेदन किया था, जिसमें अमरीका की बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों के मुखिया भी थे। कार्यक्रम जब चल रहा था, तो बाहर दर्जनों लोग भीतर जाने के लिए गिड़गिड़ा रहे थे, लेकिन यह सीमित लोगों के लिए ही था। ब्रायन जॉनसन 50 बरस से कम के एक अमरीकी कारोबारी हैं, और उन्होंने ब्रेन ट्री नाम की अपनी कंपनी को पे पाल नाम की कंपनी को 80 करोड़ डॉलर में बेचा था। इसके बाद से वे अपनी खुद की जिंदगी को अधिक से अधिक सेहतमंद, और अधिक से अधिक लंबी बनाने की मुहिम में जुटे हुए हैं। वे अपने तन-मन को एक प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, और एक किस्म से वे बुढ़ापे को अधिक से अधिक धीमा, और अधिक से अधिक स्वस्थ बनाने में लगे हुए हैं। कुछ महीने पहले की बात है कि वे भारत आए थे, और एक पांच-सात सितारा होटल के कमरे में एक इंटरव्यू देने वाले थे, कि उन्हें वहां की हवा प्रदूषित लगी और वे छोडक़र तुरंत निकल गए। वे अपनी जिंदगी का फलसफा बस दो शब्दों में सबके सामने रखते हैं, डोंट डाई (मरो मत)। कई लोग इस खरबपति को एक सनकी मान सकते हैं, और जब दुनिया का एक सबसे मशहूर गायक, माइकल जैक्सन अपने वक्त में दर्जनों प्लास्टिक सर्जरी कराकर अपने चेहरे को अधिक से अधिक आकर्षक बनाने में लगे रह सकता था, तो यह नया खरबपति तो सिर्फ सेहतमंद तरीकों की बात कर रहा है। 

अब इस व्यक्ति से अलग हटकर कुछ बात करें, तो जिंदगी जीने के कई तरीके समझ पड़ते हैं। कई लोग जापानियों की तरह अधिक से अधिक लंबी जिंदगी जीना चाहेंगे, और उस देश में शायद दुनिया के सबसे अधिक शतायु लोग रहते हैं। हिन्दुस्तान में भी किसी को दुआ देना हो, तो कहा जाता है कि शतायु होओ। लेकिन क्या सौ बरस की उम्र सबके लिए अच्छी हो सकती है? आज तो साठ-पैंसठ बरस की उम्र में भी कई लोगों के हाथ-पांव चलना धीमा हो जाता है, बहुत से लोग इससे भी कम उम्र से तरह-तरह की दवाइयों पर आ जाते हैं। 70-75 के बाद तो शायद ही कोई ऐसे होंगे जो बिना मदद और सहारे के रह सकें। हिन्दुस्तान की अधिकतर आबादी ऐसी है जो कि इस उम्र की कमजोरी और बीमारी के खर्चें नहीं उठा सकती। परिवार भी बहुत लंबे जीने वाले बुजुर्गों से आमतौर पर थक जाते हैं, अगर वे परिवार को बहुत बड़ी विरासत दे नहीं चुके हैं, या फिर उनके बाद विरासत मिलने वाली न हो। एक सीमा के बाद किसी भी परिवार में बुजुर्ग धीरे-धीरे पारदर्शी सरीखे होने लगते हैं, उनकी आवाज अनसुनी होने लगती है, लोग उनके सामने से निकल जाते हैं, और बस यही मनाते रहते हैं कि वे आवाज न दे दें। कुछ लोगों को यह बात नाजायज लग सकती है, लेकिन जिन लोगों को जापानियों की तरह सौ बरस पार करने तक जिंदा रहना है, उन्हें ऐसी वजहों के बारे में सोच लेना चाहिए कि जिनसे उनके परिवार उन्हें पूछते रहें, पूजते रहें। आज शहरीकरण के साथ-साथ परिवार बुजुर्गों को बोझ चाहे न मानें, वे जिम्मेदारी तो बहुत बड़ी रहते ही हैं। अभी ही पिछले दस-बीस दिनों में कई ऐसे अदालती मामले सामने आए हैं जिनमें बूढ़े माँ-बाप का साथ न छोडऩे वाले बेटे को छोडक़र जाने वाली बहू से अदालत ने तलाक मंजूर कर लिया। इसलिए अमर होना तो एक सोच तक सीमित है, उससे परे भी लंबा बुढ़ापा कितना तकलीफदेह हो सकता है इसे देखना हो तो उन खबरों को देखें जिनमें अभी भारत में ही तीन बेटियों के गुजरे एक पिता के अंतिम संस्कार के लिए उन्होंने पैसे ही भेज दिए, और भारत में रहते हुए वीडियो कॉल पर पिता का अंतिम संस्कार देख लिया। मध्यप्रदेश में अभी पिछले ही साल पति-पत्नी, और बच्चे, बूढ़ी और बीमार माँ को घर में ताले में बंद करके महाकाल के दर्शन के लिए उज्जैन चले गए थे, और उधर कई दिन बंद रहने के बाद माँ गुजर गई, लाश की बदबू से पड़ोसियों ने पुलिस को खबर की। कई मामलों में दूसरे देशों में बसी हुई आल-औलाद हिन्दुस्तान आती हैं, तो बंद घर में माँ-बाप मरे पड़े मिलते हैं, जाने कब से। अभी चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ में एक बुजुर्ग महिला ने अपनी सौतेली बहू की प्रताडऩा से थककर दीवार पर आत्महत्या का नोट लिखकर वीडियो बनाकर खुदकुशी कर ली। इसलिए बुढ़ापा हर मायने में बहुत अच्छा नहीं होता है। लोगों को वृंदावन जाकर देखना चाहिए कि बूढ़ी महिलाओं को घर से रवाना करने के लिए कृष्णभक्ति के नाम पर किस तरह विधवाश्रम भेज दिया जाता है। 

फिर भी हम अपनी सेहत का ख्याल रखने को बड़ा ही जरूरी काम मानते हैं, अगर आपके घर के लोग आपके प्रति बहुत अच्छे हों, तो भी। लोगों की पहली जिम्मेदारी अपनी सेहत ठीक रखने की होती है क्योंकि यह शरीर आस्थावानों के ईश्वर ने, और आस्थाहीन लोगों के माँ-बाप या प्रकृति ने दिया हुआ है। जब तक खुद फिट न रहें, किसी दूसरे की मदद तो की भी नहीं जा सकती, दूसरों पर बोझ ही बना जा सकता है। इसलिए हम अमरत्व की किसी सोच से परे हर दिन बेहतर जीने के हिसाब से ही यह सोचते हैं कि लोगों को अपने तन, मन, और अपने धन की भी फिक्र करनी चाहिए। बुढ़ापे में जाकर बहुत से काम सिर्फ पैसों से हो सकते हैं। लगातार महंगे इलाज महानगरों से उपमहानगरों तक होते हुए अब मामूली शहरों तक भी पहुंचने लगे हैं, लेकिन हर किसी की आल-औलाद के पास माँ-बाप के अंतहीन इलाज की सहूलियत नहीं होती। लंबे इलाज में अच्छे-खासे लोग भी चुक जाते हैं। इसलिए हर किसी की जिम्मेदारी है कि अपने बच्चों पर एक सीमा से अधिक बोझ न डालें, अपने तन-मन को स्वस्थ रखें, और अपने बुढ़ापे के लिए धन का भी इंतजाम करके रखें। 

हमको मालूम है कि जिस देश में लोगों को खाने-पीने के भी लाले पड़े रहते हैं, सरकारी राशन से जिनके चूल्हे जलते हैं, उन्हें बचत की नसीहत एक बकवास के अलावा कुछ नहीं है, लेकिन जिंदगी के आखिरी बरसों में एकदम बेसहारा हो जाने से तो बेहतर यही होगा कि पूरी जिंदगी थोड़ा-थोड़ा इंतजाम करते चलें, अगर ताकत हो तो इलाज का बीमा भी करवा लें, सरकारी इलाज-बीमा भी इस्तेमाल करें, और यह मानकर चलें कि वे पूरी जिंदगी अपना जितना ख्याल रखेंगे, उतना ही वे आसपास के लोगों पर बोझ बनने से भी बचेंगे। अमरीकी खरबपति के अमरत्व की सोच कुछ और लोगों के काम की हो सकती है, लेकिन पूरी दुनिया के बहुत ही आम लोग भी अपने आपको तम्बाकू से, दारू और दूसरे नशे से बचाकर तो रख ही सकते हैं। ऐसी ही दो-चार चीजों को अगर जिंदगी से अलग रखा जाए, तो शायद दुनिया की एक चौथाई आबादी का बुढ़ापा बेहतर हो सकता है। यह बात सुनने में कुछ हैरान कर सकती है, लेकिन सच तो यह है कि रोज दारू या तम्बाकू पर लोग जितना खर्च करते हैं, उसे बचाकर ही अगर परिवार के इलाज का बीमा खरीदा जाए, तो शायद हर बरस 25-50 लाख तक के अस्पताल बिल का इंतजाम हो सकता है। ये आंकड़े काल्पनिक नहीं हैं, दारू और तम्बाकू इन दो चीजों से होने वाली बचत से ऐसी बीमा पॉलिसी ली जा सकती है। इलाज की नौबत से परे भी इन चीजों के बिना सेहत बहुत अच्छी रह सकती है। फिर हमने मन को सेहतमंद रखने की बात भी कही है, मन को नफरत से दूर रखकर देखें, कई किस्म की मानसिक बीमारियों, और बेचैनी या ब्लडप्रेशर जैसी शारीरिक बीमारियों से भी बच सकेंगे। हमारी इस चिट्ठी को तार समझना, वरना बीमार को पार समझना। (जिन्हें तार का मतलब नहीं मालूम है, एक वक्त चलने वाले टेलीग्राम को तार कहा जाता था, और तार पहुंचता था, तो लोग रोना पहले शुरू करते थे, उसे पढऩे को खोलते बाद में थे)। 

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 3 सितंबर 2026



 

क्या गैरराजनीतिक आधार पर तय होते हैं अमरीकी चुनाव?

03 सितंबर 2026  

 

अमरीका के 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में महिला वोटरों की सोच को लेकर अभी एक अध्ययन किया गया जिससे बड़े दिलचस्प नतीजे सामने आए हैं। दो तिहाई महिला वोटरों ने डॉनल्ड ट्रम्प के लिए वोट दिया था। इनमें से 68 फीसदी खुद को ईसाई मानती हैं। ईसाईयों के एक तबके, गोरे इवेंजेलिकल तबके की महिलाओं में से 80 फीसदी से अधिक ने ट्रम्प को वोट दिया था। दूसरी तरफ जो किसी धर्म से अपने को नहीं जोड़ती हैं ऐसी महिलाओं में से 80 फीसदी ने कमला हैरिस को वोट दिया था। अभी इस विश्लेषण में यह भी बताया गया है कि रिपब्लिकन पार्टी महिलाओं को राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि संस्कृति और जीवनशैली के माध्यम से जोड़ती है। अमरीकी संकीर्णतावादी, यानी दक्षिणपंथी रणनीति यह है कि महिलाओं से सीधे राजनीति की बात करने की जरूरत नहीं होती, बल्कि उन्हें सांस्कृतिक रूप से रूढि़वादी, परिवार समर्थक, राष्ट्रवादी, और पश्चिमी (स्थानीय) सभ्यता का समर्थक बनाया जाए। इन तमाम सांस्कृतिक मूल्यों के प्रतीकों, जैसे बाइबिल, इसी सोच के कुछ लोकप्रिय उपन्यास, इसी संस्कृति से जुड़े हुए कुछ ब्राँड, महिलाओं को यह सिखाते हैं कि उन्हें क्या मानना चाहिए, घर में कैसे सामान रखने चाहिए, इंटरनेट पर क्या देखना चाहिए, और कैसे मतदान करना चाहिए। लोगों को याद होगा कि ट्रम्प, और उनकी रिपब्लिकन पार्टी लगातार गर्भपात के अधिकार के खिलाफ रहते आई है, चर्च गर्भपात के ही खिलाफ रहता है, और इस तरह धर्म, पुराने सामाजिक मूल्य, और अब ट्रम्प के चुनिंदा जजों के बहुमत वाली सुप्रीम कोर्ट, इन सबने गर्भपात पर पूरे देश में जिस तरह प्रतिबंध लगा दिया है, उससे भी धर्मालु महिलाएं बहुत प्रभावित हुई हैं। यह रिपोर्ट एक दिलचस्प तथ्य सामने रखती है कि राजनीति में कोई दिलचस्पी न रखने वाली महिलाएं किसी तरह अमरीकी राजनीति के इस सबसे बड़े चुनाव को प्रभावित करती हैं। एक किस्म से अतिसरलीकरण किया जाए तो यह समझ आता है कि धर्म को मानने वाले लोगों का बहुतायत ट्रम्प के साथ रहा, और नास्तिकों का बहुमत उसकी विरोधी प्रत्याशी कमला हैरिस के साथ। 

अब किसी लोकतंत्र में होने वाले चुनाव को देखने के बहुत से अलग-अलग पहलू हो सकते हैं। एक पहलू राजनीतिक सोच के आधार पर चुनाव हो सकता है, लेकिन दूसरा पहलू बिना किसी राजनीतिक सोच के सिर्फ धर्म और संस्कृति के आधार पर तय होने वाली चुनावी प्राथमिकता, यानी वोट रहता है। जिस चुनाव को पूरी तरह से राजनीतिक चुनाव, राजनीतिक रणभूमि, राजनीतिक अखाड़ा कहा जाता है, उसमें मुकाबले का फैसला अगर पूरी तरह से गैरराजनीतिक होता है, तो यह अपने-आपमें बहुत दिलचस्प बात नहीं है! अमरीका, जो कि आज दुनिया का एक सबसे आधुनिक, सबसे विकसित, और संपन्न देश है, जहां औसत पढ़ाई-लिखाई खासी अधिक है, जहां सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता के सभी तरह के औजार, समाचार-विचार माध्यम खूब विकसित हैं, वहां पर चुनावी फैसले अगर गैरराजनीतिक आधार पर हो रहे हैं, तो फिर पार्टियों की राजनीतिक सोच का कम से कम ऐसे और इस देश में चुनाव जीतने के लिए बड़ा सीमित इस्तेमाल है। धर्म और संस्कृति, सामाजिक मूल्य और मेक अमेरिका ग्रेट अगेन जैसे राष्ट्रवादी नारे चुनाव के लिए काफी हैं! अमरीका का यह मॉडल ऐसा भी नहीं कि कोई विस्फोटक रहस्य सामने ला रहा है। दुनिया भर में जगह-जगह यह बात देखने मिल रही है कि राजनीतिक दलों, या अमरीका जैसी राष्ट्रपतीय प्रणाली में लोकतंत्र, राजनीति, अंतरराष्ट्रीय सोच से परे के मूल्य चुनाव में काम आ रहे हैं! 

न सिर्फ अमरीका, बल्कि पूरी लोकतांत्रिक दुनिया को अपनी-अपनी सरहदों के भीतर चलने वाली राजनीति, और होने वाले चुनावों को लेकर यह फिक्र करनी चाहिए कि परंपरागत रूप से सैकड़ों बरस से जिस राजनीतिक विचारधारा और दर्शन को सब कुछ मान लिया जाता था, वह बहुत कुछ नहीं है। बहुत कुछ तो वोटरों की वह सोच है जो कि पार्टी के राजनीतिक घोषणापत्र के आधार पर तय नहीं होती है, बल्कि किसी पार्टी के लोगों की धार्मिक, सांस्कृतिक, और राष्ट्रवादी सोच से तय होती है। क्या अमरीकी चुनाव में महिला वोटरों के रूझान के विश्लेषण के मॉडल को भारत पर भी लागू किया जा सकता है? अमरीका और भारत इन दोनों के चुनाव सौ अलग-अलग पैमानों पर एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हो सकते हैं, लेकिन यह भी हो सकता है कि दर्जनभर पैमानों पर ये दोनों चुनाव एक-दूसरे से कुछ या अधिक हद तक मिलते-जुलते भी लगें। भारत में जिस तरह ऐतिहासिक कामयाबी पाने वाली भारतीय जनता पार्टी ठोस राजनीतिक सोच से परे के कई धार्मिक, सामाजिक, और राष्ट्रवादी मूल्यों पर जनता का असाधारण समर्थन पाते आई है, और भारत में तो महिला वोटरों का अलग से कोई ऐसा विश्लेषण होता नहीं है, फिर भी ऐसा दिखता है कि महिला वोटरों का एक बड़ा बहुमत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा के साथ रहता है। तो क्या प्रधानमंत्री के राजनीतिक भाषणों से जुड़े बिना भी, उनकी व्याख्या किए बिना भी महिला वोटरों का एक बड़ा बहुमत धर्म, राष्ट्रीयता, और इस तरह के दूसरे मुद्दों पर तय होता है? सीधे-सीधे ऐसे कोई तुलना अतिसरलीकरण होगी, लेकिन इन दो मॉडलों में एक साम्य देखने की कोशिश एक दिलचस्प राजनीतिक अध्ययन का मुद्दा तो है ही। 

हमारा मानना है कि दुनिया के सारे लोकतंत्रों को, शासन व्यवस्थाओं को एक-दूसरे के तजुर्बों से बहुत कुछ सीखने मिलता है। कई राजनीतिक दल तो ऐसे रहते हैं जो अपने राष्ट्रीय सम्मेलनों में दुनिया के बहुत से दूसरे देशों के प्रतिनिधियों को भी पर्यवेक्षकों की तरह आमंत्रित करते हैं। राष्ट्रीय सम्मेलनों के मंच पर कोई गोपनीय चर्चाएं तो होती नहीं हैं, इसलिए विपक्षियों, और राजनीतिक विरोधियों को भी वहां आमंत्रित करने में कोई नुकसान नहीं रहता, किसी-किसी देश में कोई-कोई पार्टी ऐसी उदारता दिखाती भी है। हम ऐसे ही राजनीतिक विश्लेषण के लिए अमरीकी महिला मतदाताओं पर किए गए इस अध्ययन के मॉडल पर भारत को भी रखकर देखना चाहते हैं, हो सकता है कि यहां के कुछ राजनीति शास्त्र के जानकार, विशेषज्ञ, या विश्लेषक ऐसा कर सकें। और दुनिया के कुछ दूसरे अलग-अलग लोकतांत्रिक देशों को लेकर भी यह चर्चा हो सकती है कि वहां पर चुनाव क्या पूरी तरह राजनीतिक मुद्दों पर होते हैं, या उन पर कोई और गैरराजनीतिक असर भी होता है? 

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 2 सितंबर 2026



 

पीएनबी की नगदी-तिजोरी 17 करोड़ के नकली नोटों से लबालब, कई सस्पेंड..

02 सितंबर 2026  

 

उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में पंजाब नेशनल बैंक के करेंसी चेस्ट में असली नोटों की जगह नकली नोट रख देने के आरोप में बैंक के ही कई वरिष्ठ अफसरों को निलंबित किया गया है, और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है। यह मामला इतना बड़ा है कि इसकी जांच के लिए पुलिस के बड़े अफसरों की एक टीम बनाई गई है। अब तक जो बात निर्विवाद रूप से सामने आई है उसके मुताबिक सहारनपुर में इस राष्ट्रीयकृत बैंक के करेंसी चेस्ट (तिजोरी) से जयपुर रिजर्व बैंक में भेजे गए नोट कम निकले, तो आंतरिक जांच शुरू हुई। 9 अगस्त को पूरी जांच-पड़ताल में यह पता लगा कि इस तिजोरी में 7 करोड़ 40 लाख रूपए के नकली नोट थे। इन नोटों को गड्डियों में ऊपर-नीचे एक-एक असली नोट लगाकर रख दिया गया था। इसकी जगह के असली नोट गायब हो गए। जांच के दौरान ही यह पता लगा कि असली की जगह नकली नोटों की यह जालसाजी करीब 17 करोड़ रूपए की है। अब जांच इस बात की भी हो रही है कि पांच-पांच सौ रूपए के इतने नकली नोट लाए कहां से गए, और उन्हें किस तरह इतनी बड़ी मात्रा में तिजोरी तक लाया ले जाया गया? इसे लेकर हरियाणा, उत्तराखंड, और यूपी के जिलों में छापे पड़ रहे हैं कि असली नगदी कहां खपाई गई। 

एक राष्ट्रीयकृत बैंक में इतनी बड़ी संगठित जालसाजी हैरान करती है। पंजाब नेशनल बैंक देश के सबसे बड़े सरकारी बैंकों में से एक है, यह अलग बात है कि यह बैंक बीते बरसों में लगातार तरह-तरह की जालसाजी और धोखाधड़ी की खबरों से घिरा रहा है। फिर भी इस पैमाने पर, इतने संगठित रूप से, बैंक की तिजोरी में नकली नोटों का इतना कारोबार सुनना भरोसेमंद नहीं लगता है। लेकिन अब जब सब कुछ जब्त हो चुका है, पुलिस की जांच अब आगे तक पहुंच गई है, तो इस पर भरोसा करने के अलावा और कोई जरिया नहीं है। हम अपने बहुत आसपास छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं तो कोई ऐसा हफ्ता नहीं गुजरता जब नामी-गिरामी बैंक किसी न किसी जुर्म में फंसे हुए सामने नहीं आते हैं। जाने कितने ही बैंकों के अफसर गिरफ्तार हो चुके हैं, जिन्होंने सरकारी खातों का पैसा खा लिया था, लोगों का पैसा खा लिया था, लोगों के नकली खाते खोलकर उन्हें मुजरिमों को किराए पर दे दिया था, यहां तक कि कुछ ऐसी शिकायतें भी हैं कि बैंकों के लॉकरों से गहने गायब कर दिए। कुछ बरस पहले छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अफसर के भाई के कारखाने की कंपनी में एक गांव के लोगों का पूंजीनिवेश दिखा दिया गया था, इसके लिए उन सबके नकली आधार कार्ड बनवा लिए गए थे, एक ही ब्रांच ने पूरे गांव के लोगों के बैंक खाते खोल दिए थे, हर खाते में लाखों रूपए नगद डाल दिया गया था, और हर खाते से पैसा उस कंपनी में ट्रांसफर कर दिया गया था। एक छोटी सी बैंक ब्रांच ने करोड़ों या दसियों करोड़ रूपए के कालेधन को सफेद कर दिया था। 

बैंकों और बाजार के जानकार लोगों के बीच नोटबंदी के दौर में यह चर्चा थी कि किसी भी बैंक में आने वाली नगदी में बैंक के कर्मचारी नकली नोट मिला-मिलाकर उसे जमा करते जा रहे थे, क्योंकि उन्हें यह मालूम था कि इन बंडलों की दुबारा जांच नहीं होनी है। इस तरह से बाजार में जितने नकली नोट चलन में थे, वे भी असली बनकर किसी न किसी खाते में जमा हो गए थे। इसमें बैंक कर्मचारियों, और कारोबारियों ने मिलकर काम किया था। आज भी बैंकों के जितने बड़े कर्ज डूबते हैं, उनके फोरेंसिक ऑडिट हो जाएं, तो यह बात साफ हो जाएगी कि कोई भी धोखाधड़ी या जालसाजी बैंक अफसरों की भागीदारी के बिना नहीं हो सकती। और बाद में एक-एक बड़ा बैंक किस तरह दसियों हजार करोड़ रूपए के कर्ज माफ करता है, इसकी जानकारी भी बैंक कर्मचारी एसोसिएशन सामने रखते आए हैं। 

लेकिन बैंकों तक पहुंचने वाले साधारण, और गरीब, कम पढ़े-लिखे, या बूढ़े लोगों को बैंक जिस हद तक धोखा दे रहे हैं, क्या उस पर अधिक बड़ी सजा का इंतजाम नहीं करना चाहिए? ये लोग अगर चीन में रहते तो साल भर की सुनवाई में ही उन्हें फांसी हो जाती। हम मौत की सजा की वकालत तो नहीं करते, हम उसके खिलाफ हैं, लेकिन इनकी हरकतें उसी के लायक है। पूरी की पूरी बैंकिंग व्यवस्था एक भरोसे पर चलती है, लोग अपनी पूरी जमा पूंजी ले जाकर बैंकों को देकर कागज पर सील-ठप्पा लगा हुआ एक टुकड़ा पाकर भरोसे में रहते हैं कि उनका पैसा सुरक्षित है। अब चारों तरफ बैंकों के बाहर के मुजरिम बैंक कर्मचारियों, और अधिकारियों को रिश्वत देकर वहां पर थोक में खाते खुलवाते हैं, उनमें जुर्म का पैसा जमा करते हैं, और निकालते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले एक बड़े अखबार ने एक खोजी रिपोर्ट के लिए स्टिंग ऑपरेशन किया था जिसमें अलग-अलग बैंकों के कर्मचारियों ने रिश्वत के एवज में सट्टेबाजी के पैसे के लिए फर्जी खाते खोलने का पूरा सौदा किया था, और यह भी बता दिया था कि अगर बहुत अधिक रकम की आवाजाही होने से ऊपर से जांच होगी तो भी वे पहले बता देंगे ताकि सट्टेबाज रकम निकाल सकें। जितने भरोसे के साथ एक-एक करके कई नामी-गिरामी बैंकों के कर्मचारी-अधिकारी ने ये सौदे किए थे, वह सुनना भी भयानक था। जब बाड़ ही खेत खाने लगे, तो उसमें खड़ा किया गया बिजूका फसल को क्या बचा लेगा? 

हम तो जालसाजी के इन मामलों के बिना भी हैरान होते रहते हैं, और अपने इस कॉलम में कई बार लिखते रहते हैं कि जब किसी बैंक खाते में पैसे जमा होने की सुनामी आती है, और हर दिन हजारों बार जमा होकर हर दिन शाम-रात को पूरी रकम निकाल ली जाती है, तो क्या बैंक के कंप्यूटर इस असामान्य आवाजाही को नहीं पकड़ सकते हैं? जो शरीफ और ईमानदार लोग हैं, उनसे तो बैंक एक-एक कागज इतनी बारीकी से लेता है कि जिसकी कोई हद नहीं, और जालसाजों का इतना संगठित कारोबार चलते रहता है कि जिसकी हद नहीं। यह सब बैंक अफसरों की मिलीभगत (या मौलाना-पादरी जो भी कहना हो) के बिना थोड़े ही हो जाता है। 

बैंक चूंकि सरकार और जनता दोनों के पैसों के रखवाले रहते हैं, कारोबार उन्हीं के मार्फत चलाने के सरकारी नियम भी हैं, इसलिए बैंकों का कोई विकल्प नहीं है। आज हालत यह है कि साइबर ठगी, जालसाजी, और ब्लैकमेलिंग करने वालों को भी बैंकों की जरूरत पड़ती ही है। ऐसे में सरकार को बैंक कर्मचारियों के किए हुए जुर्म के लिए अलग से सजा का इंतजाम करना चाहिए, क्योंकि चौकीदार ही अगर चोर हो जाए, तो उसकी निगरानी में रखी गई चीजों को कोई नहीं बचा सकते। बैंक अगर जनता का भरोसा खोते जा रहे हैं, तो लोग बैंकों में अपनी रकम रखने के बजाय उसे शेयर मार्केट में लगाना पसंद करेंगे, या उससे सोना या जमीन खरीदना चाहेंगे। अगर जमाकर्ताओं का भरोसा खोने से बैंक कारोबार खोने लगेंगे, तो ऐसे बैंकों में नौकरियां भी खत्म होने लगेंगी। खुद बैंक कर्मचारियों, और अधिकारियों के संगठनों को इस बारे में इसलिए गौर करना पड़ेगा कि दो-चार फीसदी मुजरिम कर्मचारी-अधिकारी बाकी सारे लोगों की इज्जत खत्म करते हैं, और बैंकों का ढांचा भी कमजोर करते हैं। जिन लोगों की अपनी पूरी जिंदगी बैंकों की तनख्वाह पर चलती है, उन्हें भी कुछ अतिरिक्त फिक्र करनी चाहिए कि बैंकिंग में जुर्म इस हद तक न बढ़ जाए कि बैंक जुर्म के पैसों के लिए एक रेडिमेड प्लेटफॉर्म की तरह काम करने लगे, और खुद भी हर किस्म के जुर्म करने लगे। पंजाब नेशनल बैंक का नकली नोटों का यह ताजा मामला दिल दहलाने वाला है, 17 करोड़ रूपए के ये नकली नोट अगर चलन में आ जाते, तो शायद लाखों लोग नकली नोट चलाते रहते, और शायद सैकड़ों या हजारों बेकसूर घेरे में आ जाते।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 1 सितंबर 2026



 

नशे पर सवार दौलत का अहंकार, इस हिंसा पर अतिरिक्त सजा जरूरी..

01 सितंबर 2026  

 

अभी दिल्ली से लगे हुए यूपी के नोएडा के एक महंगे रिहायशी कॉम्पलेक्स का एक वीडियो सामने आया जिसमें देर रात दो बजे नशे में धुत्त वहां रहने वाली एक महिला ने इमारत के एक-एक गार्ड को माँ-बहन की गालियां बकते हुए उन्हें अखिलेश यादव का कुत्ता कहा, भंगी कहा, पुलिस बुलाने पर पुलिस अफसर से चप्पलें खिलवाने की धमकी दी। ऐसा कम से कम चार-पांच मिनट का यह वीडियो अपने को ताकतवर, रूतबे वाली करार देती हुई इस महिला का लोगों के बीच सुनने लायक भी नहीं है क्योंकि उसने माँ-बहन की गालियों की विविधता भी पेश की है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह थी कि वह हर चौथे वाक्य में गार्डों को गरीब कह-कहकर गाली दे रही थी। उसके हिसाब से गरीब होना एक बड़ी गाली के लायक जुर्म था। बाद में पुलिस को बुलाने पर उसने इस महिला का चालान किया, और बॉंड भरवाकर छोड़ दिया। 

दिल्ली के आसपास के संपन्न इलाकों से हर कुछ हफ्तों में पैसे वाले तबके की किसी न किसी महिला का ऐसा वीडियो सामने आता है जो नशे में धुत्त रहती है, और कॉलोनी के सुरक्षा गार्डों को धमकाती रहती हैं, मारती रहती हैं, और ऐसी अश्लील गालियां देती रहती हैं, जिन्हें आमतौर पर सडक़ के लोगों का सडक़छाप विशेषाधिकार माना जाता है। इनमें से हर किसी को पता रहता है कि उनकी रिकॉर्डिंग कैमरों पर हो रही है, सीसीटीवी कैमरों पर भी, और सामने से मोबाइल कैमरों पर भी। इसके बावजूद उन्हें ऐसी हरकतों से परहेज नहीं रहता। इनकी बातचीत में अपनी हस्ती, और सामने वाले की औकात की बातें तरह-तरह की गालियों के साथ गूंजती रहती हैं। सबसे बड़ा गुमान उन्हें अपने पैसों का रहता है। तैश का अंदाज यह रहता है कि गरीब गार्ड, टैक्सी ड्राइवर, किसी रेस्त्रां के वेटर को गालियां देते बार-बार यह कहते हैं कि वे जानते नहीं कि वे कौन हैं? ऐसा ही सडक़ों पर गाडिय़ों के भिड़ जाने पर, किसी के सामने आ जाने पर भी किया जाता है। मतलब यह कि संपन्नता नशे के सिर पर सवार होकर एक अलग सुपरनागरिकता दिला देती है। 

यह देश अपने गौरवशाली इतिहास पर चाहे कितना ही दंभ भरे, आज का सच तो यह है कि पैसों की ताकत, सत्ता या किसी और किस्म के ओहदे की ताकत जिस तरह यहां सिर चढक़र बोलती है, उससे लगता है कि देश के एक हिस्से को ऐसे संपन्न लोगों की नागरिकता के लिए अलग से रिजर्व कर देना चाहिए, ताकि वे बाकी गरीब लोगों की छाया से भी दूर रह सकें। एक वक्त था जब नीची कही जाने वाली कुछ जातियों के लोगों को गले में हंडी टांगकर चलना पड़ता था, ताकि उनकी शिनाख्त अलग से हो सके, और उन्हें थूकना हो तो हंडी में ही थूकें, जमीन पर नहीं। आज भी गरीब से हिकारत आम बात है। शहरी भीड़ में जाति तो उतनी आसानी से नहीं पहचानी जाती, लेकिन गरीबी तो हुलिए से दिख जाती है। ऐसे गरीबों से हिकारत उसी तरह की रहती है जिस तरह कुछ तबकों को अछूत मानते हुए उनसे सदियों से हिकारत चली आ रही है। 

अगले दिन जब एक बड़े अखबार ने नोएडा की इस महिला से बात की, तो उसे अपने किए हुए पर जरा भी मलाल नहीं था। उसने खुद होकर कहा कि उस रात उसने पी रखी थी, और उसने बाहर से खाना मंगाया था, लेकर आए हुए लडक़े को गार्डों ने गेट पर रोक दिया था क्योंकि रात के दो बजे थे। इस महिला को फोन लगाया गया, लेकिन जवाब न मिलने पर डिलिवरी ब्वॉय को भीतर नहीं जाने दिया गया। इस बात को लेकर उसने नशे की हालत में नीचे आकर गार्डों को पीटने की भी कोशिश की, उन्हें सबसे गंदी गालियां दीं, जाति की गालियां दीं, धमकियां दीं, और जाने क्या नहीं किया। भारत कहने के लिए अपने को बड़ी महान संस्कृति वाला देश कहता है, लेकिन यहां आज ऊंची समझी जाने वाली जातियों का अहंकार, नीची समझी जाने वाली जातियों से भेदभाव, बहुसंख्यक, और अल्पसंख्यक धर्म के लोगों के अधिकारों के बीच भेदभाव, अफसरों और जनता के बीच भेदभाव, अमीर और गरीब के बीच भेदभाव सिर चढक़र बोलता है। इस सिलसिले का कोई अंत नहीं है। लोग जितनी बड़ी और जितनी महंगी गाडिय़ों पर चलते हैं, उनका अहंकार भी उतना ही बड़ा हो जाता है, वे सडक़ों पर भी एक अलग, खास दर्जे के बनकर चलते हैं, मानो उन्हें सडक़ पर अपनी बड़ी गाड़ी की वजह से, अपनी अहंकारी औकात की वजह से एक अलग दर्जा मिलना चाहिए। भारत में गैरबराबरी इस हद तक सिर चढक़र बोलती है, और यह गैरबराबरी का प्रदर्शन इतना बढ़ते चल रहा है कि देश की सभ्यता मानो रिवर्स गियर में चल रही है, पीछे की तरफ जा रही है। 

दुनिया के सभ्य देशों में कोई आम और खास नहीं होते, सबके सार्वजनिक अधिकार बराबर होते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान में वीआईपी, और वीवीआईपी दर्जे ऐसे खड़े कर दिए गए हैं कि अंग्रेज चले गए, अपनी काली औलादें छोड़ गए। इन तबकों के लोग उसी हवा में साँस कैसे ले पाते हैं जिस हवा में आम लोग भी साँस लेते हैं, यह समझना मुश्किल रहता है। क्यों ये लोग अपने लिए एक अलग से बुलबुले की शक्ल का, कांच के डोम वाला शहर नहीं बना लेते, जहां आम लोगों की छोड़ी हुई साँस भी हवा में न मिल सके? क्यों ये लोग अपने लिए सीधे गंगोत्री से पाईप लाईन नहीं बिछवाते ताकि नीची कही जाने वाली जातियों, गरीबों, और गैरवीआईपी लोगों की छुई हुई नदी का पानी इन्हें न लेना पड़े? क्यों ये लोग गरीबों के साथ एक मेट्रो में, एक प्लेन में, या एक ट्रेन में चाहे अलग डिब्बे में ही क्यों न सही सफर करते हैं? ऐसी कई बातें आज भी परेशान करती हैं कि ताकतवर तबके क्यों इतने कमजोर तबकों के लोगों के साथ एक ही धरती पर जीते हैं, क्यों इन लोगों को छोडक़र वे ऊपर स्वर्ग नहीं चले जाते?  

हम बीते कुछ दशकों से यह बात लिख रहे हैं कि जब संपन्न या ताकतवर तबके किसी विपन्न या कमजोर तबके के खिलाफ कोई जुर्म करते हैं, तो उसके लिए अलग से सजा का इंतजाम होना चाहिए। हो सकता है कि दो साधारण, या आम लोगों के बीच जुर्म पर जितनी सजा हो, दौलतमंद के गरीब के खिलाफ जुर्म पर उसी सजा को दुगुना कर दिया जाए, या बड़े नेता या अफसर के किसी छोटे कर्मचारी, या कमजोर जनता पर किए गए जुल्म पर आम जुर्म के मुकाबले दोगुनी सजा कर दी जाए? इस देश में न्याय व्यवस्था में ऐसे फेरबदल की जरूरत है ताकि गरीबों पर होने वाले जुल्म को रोकने के लिए अधिक और अतिरिक्त सजा का इंतजाम किया जाए, उसके बिना नशे में धुत्त पैसे वाले गरीबों को इसी तरह माँ-बहन की गालियां देते रहेंगे। 

(Daily Chhattisgarh)