रेलभाड़ा बिल्कुल न बढ़ाना बहुत समझदारी नहीं...

25 फरवरी 2015
संपादकीय
कुछ पुरानी खबरों से परे एक नई खबर यह है कि रेल भाड़ा तीन फीसदी बढ़ सकता है। पिछले कई बरसों से लोगों को कोई बढ़ोतरी न होने की आदत पड़ी हुई है, जबकि सरकार और निजी क्षेत्र हर तरफ खर्च बढ़ते गए हैं। ऐसे में रेल टिकट को न बढ़ाने के कई नतीजे भी हो सकते हैं। एक तो यह कि विस्तार की योजनाएं, आधुनिकीकरण की योजनाएं और हिफाजत बढ़ाने की तकनीक, इन सब पर उतना काम नहीं हो पाएगा, जितना कि होना चाहिए। और भारतीय रेल इतनी बड़ी है, और उसमें किसी भी फैसले पर जमीनी अमल में इतने बरस लगते हैं कि आने वाले वक्त की जरूरतों का जिसे अंदाज न हो, वे यह नहीं समझ सकते कि विस्तार कितना और क्यों जरूरी है।
एक वक्त था जब भारत में स्कूटर को स्टार्ट करने के लिए एक तरफ झुकाकर किक मारनी पड़ती थी। वह वक्त ऐसा भी था जब रायपुर से भोपाल की एक टेलीफोन कॉल के लिए पूरे-पूरे दिन लोगों को इंतजार करना पड़ता था, और फिर टेलीफोन ऑपरेटर को रिश्वत देने से ही काम हो पाता था। वह वक्त ऐसा भी था जब एक टेलीफोन कनेक्शन के लिए लोगों को पांच-दस बरस इंतजार करना पड़ता था। ऐसी नौबत को बदलने के लिए देश के सामने यही एक रास्ता बचता था कि सरकार अपने बूते पर, या कि निजी क्षेत्र को जोड़कर उद्योगों का, और टेलीफोन जैसी सेवाओं का विस्तार करे। आज तस्वीर ऐसी बदली हुई है कि ठेला धकेलने वाले मजदूर भी जेब में मोबाइल फोन लेकर चलते हैं। 
ऐसे में भारतीय रेल को बेहतर न बनाना, देश की रेल-जरूरतों को पूरा न करना, और आने वाले दस-बीस बरस की संभावनाओं और जरूरतों को न आंकना, समझदारी नहीं होगी। ऐसे में हम एक मामूली बढ़ोतरी को सालाना बनाने के हिमायती हैं, और यह एक अलग बात है कि सरकारी की ऐसी कमाई का बहुत सावधानी और ईमानदारी से इस्तेमाल होना चाहिए। लोगों की जीवनशैली में जब हर चीज पर अधिक खर्च हो रहा है, तो रेल जैसी एक बड़ी और अपने किस्म की अकेली सुविधा पर भी खर्च बुरी बात नहीं है।
भारतीय रेल दुनिया की शायद सबसे बड़ी रेल है, और इसकी कमियों और दिक्कतों को सब लोग हर सफर में झेलते हैं। आज के रेलमंत्री सुरेश प्रभु एक बेहतर मंत्री माने जाते हैं, और मोदी सरकार एक किस्म से उनको भाजपा में आयात करके लेकर आई, और रेलवे जैसा महत्वपूर्ण विभाग दिया। उनसे देश यह भी उम्मीद करता है कि वे रेलवे की मौजूदा कमाई, और देश भर में बिखरी हुई उसकी जमीनों का एक कल्पनाशील उपयोग करके देश में रेल की तस्वीर बदलकर रख देंगे। आने वाले बजट के बाद भी भारत में इसकी जरूरत रहेगी कि लगातार रेल-ढांचे पर इतना काम हो कि लोग एक तरफ तो विश्व स्तर की सुविधा पा सकें, और दूसरी तरफ गरीबों को भी एक साफ-सुथरा सफर करने मिले। 

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