पहली बार बिना नाटकीयता वाला रेल बजट, सुधार पर जोर

संपादकीय
26 फरवरी 2015

केन्द्रीय रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने अपने पहले बजट में बिना किसी नाटकीयता के छोटी-छोटी बातें कही हैं, जो कि परंपरागत रेल बजट-घोषणाओं के मुकाबले एक बेहतर बात है। भारत के इतिहास में यह शायद पहला मौका है जब किसी रेलमंत्री ने अपने गृह राज्य के लिए अनुपातहीन अधिक रेलगाडिय़ों की घोषणा नहीं की है। कई रेलमंत्री ऐसे भी रहे जिन्होंने रेल्वे के हजारों करोड़ के संस्थान अपने राज्यों में शुरू करने की घोषणा की थी। इनके मुकाबले आज का यह बजट बिना किसी चटखारे वाला, और एक गंभीर कामकाज वाला बजट दिख रहा है जिसे पेश करते हुए सुरेश प्रभु ने यह साफ किया कि अधिक समीक्षा के बाद नई गाडिय़ों का फैसला किया जाएगा। 
न सिर्फ रेल के मामले में, बल्कि कई मंत्रालयों के काम में, राज्यों के विभागों में, जिलों के छोटे-छोटे से दफ्तरों में मुखिया के ओहदों पर बैठे हुए लोग इस अंदाज में अपनी प्राथमिकताओं की औपचारिक घोषणा करते हैं कि मानो वे एक स्वायत्तशासी आजाद टापू के जमींदार हों। बहुत से नेता और अफसर इस बात की कोशिश करते हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान उनके नाम के साथ कोई ऐसी बड़ी बात जुड़ जाए, जो कि इतिहास में लंबे समय तक याद रखी जाए। ऐसी नाटकीयता के फेर में लोगों की अपनी जिम्मेदारियों और कामकाज की बुनियादी बातें किनारे धरी रह जाती हैं, और नारों की जुबान मेें जो बात और काम सामने रखे जा सकते हैं, उन्हीं पर ध्यान अधिक जाता है। 
आज के सुरेश प्रभु के भाषण की एक बड़ी छोटी सी बात है कि साधारण दर्जे की टिकट लोगों को पांच मिनट के भीतर मिल जाए, ऐसा इंतजाम किया जाएगा। आज हालत यह है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी अगर कोई ईमानदार और जिम्मेदार इंसान प्लेटफॉर्म टिकट लेकर प्लेटफॉर्म पर जाना चाहते हैं, तो उनका आधा-पौन घंटा टिकट की कतार में लगता है। जिस देश में इंसानों की जिंदगी का वक्त इतना फिजूल मान लिया जाता है कि उन्हें रोज घंटों कतार में खड़ा किया जाए, वहां पर यह छोटी सी सोच एक बड़ी बात है। एक दूसरी बात यह है कि बहुत सी रेलगाडिय़ों में साधारण दर्जे के डिब्बों को बढ़ाने की बात कही गई है, और ये वही डिब्बे हैं जिनमें देश की सबसे गरीब जनता चलती है। हमारा तो यह मानना है कि बुलेट ट्रेन जैसी शाही खर्च वाली योजनाओं के बजाए देश की तकरीबन पूरी ही गरीब-आबादी को सीट पर बैठकर सफर करने की सहूलियत देना एक अधिक बड़ी बात है। 
रेल का काम इतना फैला हुआ और इतना बड़ा है, कि उसमें छोटे-छोटे सुधार की बड़ी-बड़ी गुंजाइश हमेशा ही रहती है। सफाई से लेकर हिफाजत तक, और सहूलियत से लेकर आराम तक, ऐसी कई बातें हैं जिन्हें बिना किसी घोषणा के सुधारा जाना चाहिए, और हो सकता है कि सुरेश प्रभु की नीयत ऐसी ही हो। कल ही हमने इसी जगह पर लिखा था कि किराए में मामूली बढ़ोत्तरी में कोई बुराई नहीं है, लेकिन हाल के चुनावों में भाजपा की बदहाली देखने के बाद हो सकता है कि मोदी सरकार और भाजपा फिलहाल किसी कड़े फैसले के पक्ष में न हो, लेकिन यह भी हो सकता है कि रेल विभाग के अपने संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से आज सरकार को रेल भाड़ा बढ़ाने की जरूरत न हो। चूंकि इस बजट में नाटकीय कुछ नहीं है, इसलिए उस पर लिखने को भी अधिक बातें नहीं हैं, और सुरेश प्रभु को चाहिए कि वे उत्कृष्टता के पैमाने पर सुधार लाएं, और अधिक से अधिक जनता की सुविधा, सुरक्षा, और सहूलियत बढ़ाएं। यही रेल मंत्री की पहली जिम्मेदारी होनी चाहिए कि सबसे गरीब, के सबसे करीब।

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