नए ताजमहल बनने के मौकों पर लोगों को याद आती हैं कमियां..

संपादकीय
1 अक्टूबर 2017


मुंबई में एक लोकल रेलवे स्टेशन पर पटरी पार करने के संकरे पुल पर हुई भगदड़ में दो दर्जन मौतों के बाद अब मोदी सरकार के आलोचकों को यह मुद्दा मिला है कि वे रेल मुसाफिरों की सहूलियतों और हिफाजत को याद दिलाते हुए यह कहें कि इस देश की प्राथमिकता एक लाख करोड़ रूपए खर्च करने वाली बुलेट ट्रेन नहीं है, बल्कि देश भर में जगह-जगह रेल स्टेशनों को बेहतर बनाने, रेलगाडिय़ों को सुधारने, दुर्घटनाओं से बचाने, और सहूलियतें बढ़ाने को प्राथमिकता देना चाहिए। मुंबई शहर तक सीमित राजनीति करने वाले दोनों ठाकरे बंधुओं ने अलग-अलग मोदी सरकार पर निशाना लगाया है। इनमें से एक ने कहा है कि जब तक मुंबई में लोकल ट्रेन स्टेशनों में सुधार नहीं होता वे बुलेट ट्रेन योजना की एक ईंट भी मुंबई में नहीं रखने देंगे।
बुलेट ट्रेन को लेकर चल रही आलोचना पर हम भी पहले लिख चुके हैं कि यह बहुत ही खर्चीली लग रही है, और इसके बेहतर और सस्ते विकल्प आज अस्तित्व में हैं। दूसरी तरफ देश में जिस तरह इंसान और जानवर रेलवे पटरियों को जगह-जगह पार करते हैं, उसके किनारे जगह-जगह बसते हैं, उसे देखते हुए बहुत तेज रफ्तार की गाडिय़ों से दुर्घटनाओं के खतरे बढ़ेंगे। और अगर ये गाडिय़ां जमीन के नीचे या आसमान में पुलों पर दौड़ेंगी, तो जाहिर है कि उनकी लागत बहुत अधिक आएगी। आज दिक्कत यह है कि रेलगाडिय़ों मेें चलने वाले गरीब और मध्यम वर्ग के लोग साफ-सुथरे डिब्बे तक नहीं पा सकते, ट्रेन या स्टेशनों में उनके लिए साफ-सुथरे शौचालय तक नहीं है। इसके अलावा लोगों को अपनी जरूरत के समय पर ट्रेनों में आरक्षण नहीं मिल पाता, और लोग रिश्वत देकर टिकटें पाते हैं, इस दिक्कत को रेल विभाग सम्हालने वाले कई प्रभु अपने कार्यकाल में नहीं सुधार पाए।
यह समझने की जरूरत है कि नए-नए ताजमहल खड़े करने के बजाय आगरा की नालियों को साफ करना, वहां की सड़कों के गड्ढों को सुधारना, वहां रौशनी और साफ पानी का इंतजाम करना अधिक जरूरी है। लेकिन सत्ता पर बैठे हुए लोगों को अपने कार्यकाल में ताजमहल बनाना सुहाता है क्योंकि उससे ही उनका नाम अमर हो सकता है। इसलिए कोई साढ़े तीन हजार करोड़ खर्च करके सरदार पटेल की प्रतिमा बनाते हैं, तो कोई तीन हजार करोड़ से शिवाजी की प्रतिमा बनाते हैं, और अपने कार्यकाल में मायावती जैसे लोग अपने जिंदा रहते हुए सैकड़ों करोड़ की लागत से अपनी प्रतिमाएं भी बनवा लेते हैं। इसी तरह लोग सरकारी योजनाओं को ऐसा बनाते हैं कि इतिहास में उनका नाम इनके साथ दर्ज हो जाए। यह सिलसिला आत्मसंतुष्टि तो देता है, शायद लोगों के बीच गौरव भी देता है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करके रख देता है। जो महाराष्ट्र कुपोषण का शिकार है, जहां आदिवासी इलाकों में बच्चे बड़ी संख्या में मरते हैं, जहां पर किसान आत्महत्या कर रहे हैं, वहां पर हजारों करोड़ रूपए एक प्रतिमा पर खर्च करना एक गरीब देश की अय्याशी के अलावा और कुछ नहीं है। लोकतंत्र के पहले जब राजा-महाराजा होते थे, तो वे भूख से मरती जनता को अपने हाल पर छोड़कर महल और ताजमहल बनवाते थे, आज भी लोकतंत्र आने के बाद सत्ता पर बैठे लोगों का वैसा ही रूख जारी है। और ऐसे मौके पर लोगों को वे तमाम कमियां और खामियां अधिक याद पड़ती हैं जिनको अनदेखा करते हुए नए ताजमहल शुरू किए जाते हैं। देश में बुलेट ट्रेन का फैसला कुछ इसी किस्म का है, और यह देश को खासा महंगा पड़ेगा ऐसा लग रहा है। 

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