प्रणब-मनमोहन की दरियादिली, और देश की जहरीली हवा...

संपादकीय
14 अक्टूबर 2017


देश की आम हवा से परे कल दिल्ली में दरियादिली और बड़प्पन का एक ऐसा नजारा देखने मिला जिससे लगा कि हिन्दुस्तान अभी बाकी है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब, द कोलिशन इयर्स, का विमोचन होना था, और इसमें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मौजूद थे, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तो थे ही। इस कार्यक्रम के पहले एक इंटरव्यू में प्रणब से पूछा गया कि जब सोनिया ने उनकी जगह मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाया, तो उन्हें कैसा लगा? उन्होंने कहा कि वे जरा भी निराश नहीं हुए, क्योंकि उनकी अयोग्यता की सबसे बड़ी वजह यह भी थी कि वे अधिकतर वक्त राज्यसभा के सदस्य थे, महज 2004 में लोकसभा जीती थी। वे हिन्दी नहीं जानते थे, और ऐसे में बिना हिन्दी जाने किसी को भारत का प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहिए। इसके बाद कार्यक्रम में जब मनमोहन सिंह के भाषण का वक्त आया तो उन्होंने कहा- 'प्रधानमंत्री पद के लिए प्रणब दा एक बेहतर विकल्प थे जो कि अपनी मर्जी से राजनेता बने थे, लेकिन मेरा राजनेता बनना एक इत्तफाक था।Ó
एक ही पार्टी में देश की सबसे ताकतवर एक ही कुर्सी के लिए सबसे दिग्गज दो नामों के बीच ही जब घोषित या अघोषित, चाहा या अनचाहा, ऐसा मुकाबला हो, और उसके बाद भी दो लोग तंज और रंज के बिना एक-दूसरे के प्रति न सिर्फ मंच और माईक से, बल्कि बाकी वक्त भी इस तरह दरियादिली दिखा सकें, तो उससे भारतीय राजनीति की गंदी साफ होती है। हम किसी एक पार्टी के भीतर वैचारिक असहमति को गलत नहीं मानते, लेकिन आज बहुत सी पार्टियों में, पार्टियों के बीच भी, सरकारों के बीच, नेताओं के बीच, विचारधाराओं के बीच जिस बुरी हद तक कड़वाहट घुल चुकी है, बातचीत के रिश्ते खत्म हो चुके हैं, वह लोकतंत्र के लिए एक डरावनी नौबत है। लोकतंत्र असहमतियों का सम्मान करने, उन्हें समझने, महत्व देने, और उनसे सीखने का नाम होता है। आज भारत का लोकतंत्र पार्टियों की खेमेबंदी में, विचारधाराओं के ध्रुवीकरण में, और साम्प्रदायिक आधार पर इस तरह खंडित-विखंडित हो गया है कि लोकतंत्र में महज चुनावी जीत ही मानो सबकुछ रह गई है। यह देश और यह लोकतंत्र अब पूरी तरह से, और बुरी तरह से चुनाव केन्द्रित कर दिया गया है, और वह चुनाव भी धार्मिक ध्रुवीकरण के बहुमत पर।
आज यह अंदाज लगाना मुश्किल है कि देश की जनता लोकतंत्र की परिभाषा को समझ पा रही है, या कि वह महज चुनावी बहुमत को लोकतंत्र मान रही है? विविधताओं से भरे हुए इस देश में एक-दूसरे के लिए, एक-दूसरे तबके के लिए, एक-दूसरे की विचारधारा के लिए जो परस्पर सम्मान होना चाहिए, उसकी एक मिसाल प्रणब-मनमोहन में देखने मिली, और उसी वजह से देश का बाकी माहौल कुछ अधिक खटकने भी लगा, और उस पर लिखने की जरूरत महसूस हो रही है। असहमति का असम्मान करके, अप्रिय लगती आवाजों को अनसुना करके अगर ध्रुवीकरण से चुनावी जीत हासिल की जाती है, तो वह लोकतंत्र की जीत नहीं हो सकती। जिस पार्टी के पास लोकतंत्र का सम्मान करते हुए भी बहुमत हासिल करने की संभावना हो उसका तंगदिल हो जाना खुद उसकी शिकस्त है। दुनिया के इतिहास में लोगों का मूल्यांकन चुनाव आयोग के नतीजों के अंकगणितीय विश्लेषण तक सीमित नहीं रहता है। ये आंकड़े ताक पर धरे रह जाते हैं, चुनावी नतीजे महज थोड़ी सी जगह पाते हैं, और लोकतंत्र की कसौटी पर जीत या हार को इतिहास विस्तार से दर्ज करता है। अगर प्रणब मुखर्जी ने मनमोहन-मंत्रिमंडल के मंत्री रहते हुए अपना वक्त सत्ता पलटने की साजिश में लगाया होता, तो आज इतिहास में उनका सम्मान नहीं होता। दूसरी तरफ अगर मनमोहन सिंह ने तीन चौथाई से अधिक मंत्री-समूहों का मुखिया प्रणब को न बनाया होता, तो मनमोहन भी तंगदिली की तोहमत झेलते। यह उदारता लोकतंत्र में पार्टियों के बीच भी कायम रहना चाहिए। एक-दूसरे का ओछा और अंधा विरोध लोकतांत्रिक नहीं होता। भारत की राजनीतिक हवा में इतना जहर घुल गया है, और वह लगातार बढ़ाया भी जा रहा है, इस हद तक कि वह दिल्ली के पटाखों के प्रदूषण को मात कर रहा है। दिक्कत यह है कि इस पर रोक कोई सुप्रीम कोर्ट नहीं लगा सकता, महज जनता लगा सकती है। और जनता के बीच चुनाव और लोकतंत्र में फर्क की जागरूकता लानी होगी। वरना यह बात तो दुनिया में समझदार लोग बहुत पहले से कह गए हैं कि लोकतंत्र में लोगों को वैसी ही सरकार नसीब होती है, जैसी सरकार पाने के हकदार वे होते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें