इस देश में साफ-सुथरे अखबार और टीवी चैनलों की बड़ी जरूरत

संपादकीय
29 अक्टूबर 2017


हिन्दुस्तान के आम मीडिया पर राजनीतिक साजिश, भड़काऊ साम्प्रदायिक बातें, बलात्कार, भ्रष्टाचार, और दूसरे किस्म के जुर्म इस कदर हावी हो गए हैं कि घर में बच्चों के सामने टीवी पर खबरों के चैनल चालू करना मुश्किल हो गया है, और जब अखबार घर पहुंचते हैं, तो यह सोचने की जरूरत लगती है कि कौन से पन्ने किससे छिपाए जाएं। ऐसा लगता है कि जिंदगी में सब कुछ बुरा ही बुरा हो रहा है, हर कोई बलात्कारी या यौन शोषक हो गया है, और राजनीति चोरों की जगह हो गई है, बड़ी-बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग साम्प्रदायिक दंगा करवाने, नफरत फैलाने की तनख्वाह पा रहे हैं। लोकतंत्र की एक अंधकारभरी तस्वीर दिखती है, और यह समझ नहीं पड़ता है कि आगे उम्मीद किस बात को लेकर की जाए? मीडिया अपनी सनसनी के जाल में खुद ही उलझते जा रहा है, और अधिक से अधिक पाठक जुटाने के दावे में अखबार गलाकाट मुकाबला कर रहे हैं, और एक-दूसरे को पीछे छोडऩे के लिए सबसे अधिक सनसनीखेज बातों को सबसे पहले सामने रखने का दावा करने में टीवी समाचार चैनलों से सीख ले रहे हैं।
क्या जिंदगी में महज ये ही नकारात्मक बातें रह गई हैं, या कि इसमें कहीं कला, संगीत, साहित्य, और अच्छी बातों की भी जगह है? आज बाजार में एक ऐसे अखबार की संभावना दिखती है जो हर बच्चे और हर महिला के पढऩे लायक हो, जिंदगी के प्रति उम्मीद बंधाता हो, और हो सकता है कि महिला-बच्चों के अलावा आदमी भी ऐसे अखबार को पढऩा चाहें। ऐसे समाचार चैनल भी हो सकते हैं जो कि भयानक दरिंदगी वाले हिंसक जुर्म के लहू टीवी के बाहर कमरों तक न फैलाएं, और दुनिया में हो रही अच्छी बातों को भी लोगों को दें। हमारा यह मानना है कि इंटरनेट पर सब कुछ उपलब्ध होने के बाद भी प्रिंट, टीवी-रेडियो, डिजिटल-नेट, और मोबाइल पर आधारित पत्रकारिता की एक गुंजाइश बाकी है। अगर लोगों को ऐसे भरोसेमंद संपादक मिलें जो कि जनता की हित के, और जनता की रूचि के, दोनों शर्तों को पूरा करने वाले समाचार उन्हें दे सकें, तो लोग उन्हें लेना चाहेंगे। आज हालत यह है कि जनहित के समाचार अखबार की बिक्री या टीवी चैनलों का टीआरपी नहीं बढ़ाते, और जनरूचि को बाजारू मीडिया तेजी से अधिक से अधिक विकृत करते चलना चाहता है ताकि  उसे अपनी गंदगी परोसना या बेचना आसान हो जाए।
मीडिया के कारोबार में जो लोग हैं, उन्हें हिन्दुस्तान के थके हुए लोगों को देखकर यह सोचना चाहिए कि ऐसा कौन सा अखबार बनाकर घरों में भेजा जा सकता है जिससे लहू न टपकता हो? यह कारोबारी नजरिए से भी एक अच्छा कामयाब नुस्खा हो सकता है, क्योंकि बहुत से लोग अपने परिवार को आज भी मीडिया की हिंसा से बचाना चाहते हैं, और उन्हें दुनिया से जोड़े भी रखना चाहते हैं। दुनिया में जो हो रहा है उससे अछूता नहीं रहा जा सकता, लेकिन आज का हिन्दुस्तानी मीडिया इस हो रहे के एक बहुत छोटे हिस्से को ही मानो सब कुछ दिखाता हुआ अपने खुद के पापी पेट को भरने में लगा हुआ है। इस बारे में पाठकों और दर्शकों को भी आवाज उठानी चाहिए, ताकि कोई न कोई समझदार कारोबारी लोगों की इस जरूरत को पूरा कर सके। जिस तरह मनोरंजन के टीवी चैनलों पर सास-बहू के झगड़े दिखाने वाले मानसिक हिंसा के अंतहीन सीरियलों के बीच कुछ साफ-सुथरे कार्यक्रम भी कभी-कभी देखने मिलते हैं, उसी तरह कोई ऐसा अखबार हर शहर या प्रदेश में बिक सकता है जो कि इस दावे के साथ घर पहुंचे कि उसमें कुछ भी नकारात्मक नहीं है, और जिनको नकारात्मक खबरों को पढ़े बिना डकार नहीं आती, वे कोई दूसरा अखबार और खरीद लें, कोई दूसरा चैनल ढूंढ लें जो कि हिंसा और सेक्स को टीवी से बहाकर पूरे घर को गीला न कर देता हो। (Daily Chhattisgarh)
- सुनील कुमार

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