संपादकीय
21 अक्टूबर 2017

सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेश के बाद दिल्ली राजधानी क्षेत्र में पटाखों की बिक्री प्रतिबंधित रही, लेकिन अदालत का आदेश बाहर से पटाखे लाकर जलाने पर रोक का नहीं था, इसलिए पटाखे तो जले, लेकिन पिछले बरस से कम रहे, और दिल्ली में पिछली तीन दीवालियों के मुकाबले यह दीवाली सबसे कम जहरीली हवा वाली रही। लेकिन छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट का ऐसा कोई आदेश नहीं था, और यहां पर राज्य सरकार ने जिस तरह की कड़ाई बरती थी, उसके चलते पिछली दीवाली के मुकाबले इस बार राजधानी रायपुर में वायु प्रदूषण करीब एक चौथाई कम हुआ। राज्य सरकार के पर्यावरण विभाग और पर्यावरण संरक्षक मंडल ने सभी जिलों में कड़ाई बरतने के आदेश दिए थे, और उसका असर कमोबेश सभी जगह देखने मिला। रायपुर के आंकड़े यह हौसला बढ़ाते हैं कि बिगड़ा हुआ मिजाज भी सुधारा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने जब दिल्ली राजधानी क्षेत्र में पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई तो सुप्रीम कोर्ट का पटाखा समर्थकों की तरफ से भारी विरोध किया गया, और सुप्रीम कोर्ट का मखौल उड़ाया गया। इसे धार्मिक मामलों में अदालती दखल करार देते हुए पर्यावरण बचाने की इस पहल का घोर साम्प्रदायिककरण किया गया। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हमने कुछ दिन पहले इसी जगह लिखे संपादकीय में देश में भयानक स्तर तक पहुंच चुके धार्मिक प्रदूषण का जिक्र किया था, और यह भी लिखा था कि सभी धर्मों के लाउडस्पीकर पूरी तरह बंद होने चाहिए, नदियों और तालाबों में धार्मिक विसर्जन को कड़े नियमों से काबू करना चाहिए, और सड़कों पर धार्मिक उत्पात खत्म किया जाना चाहिए।
एक तरफ तो केन्द्र सरकार गंगा को साफ करने को अपना एक बड़ा अभियान बनाकर चल रही है और इसके लिए एक पूरा मंत्रालय ही समर्पित है। दूसरी तरफ देश की राजधानी में भी अगर हवा में भयानक जहरीले रसायन घुलने से रोकने के लिए अदालत पटाखों पर रोक लगा रही है, तो उसका जमकर विरोध किया जा रहा है, और इस आदेश के मुकाबले दूसरे धर्मों के रीति-रिवाज गिनाए जा रहे हैं। एक की देखादेखी दूसरे धर्म के कट्टर और धर्मांध लोग अगर अपने धर्म का प्रदूषण बढ़ाते चलेंगे, तो इससे यह देश और यह धरती एक दिन खत्म ही हो जाएंगे। पटाखे जलाने वालों को यह याद रखना चाहिए कि इससे जहरीली होने वाली हवा सबसे पहले उनके परिवार को, फिर उनके पड़ोस को, और फिर मुहल्ले के फेंफड़े छलनी करती है। ऐसा भी क्या धार्मिक रिवाज जो कि अपने बच्चों को अस्थमा का मरीज बना जाए। और जो धर्मांध लोग पटाखे जलाने पर आमादा हैं, उनको यह भी याद रखना चाहिए कि भारत में मुगलों के आने के पहले पटाखे शायद थे भी नहीं, और आज जब वे मुस्लिम संस्कृति को खत्म करना चाहते हैं, तो पटाखों को खत्म करना तो उनकी जिम्मेदारी बनती ही है।
भारत में अदालतें, और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल सभी तरह के प्रदूषण के खिलाफ खासी कड़ाई बरत रही हैं। ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकारों को भी जनकल्याण की अपनी कड़वी जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए। एक संपन्न तबका ऐसा है जिसके पास हवा में अधिक जहर घोलने की ताकत है, और इसी तबके के कुछ धर्मांध लोग ऐसे हैं जो कि उस पर आमादा हैं। यह सिलसिला खत्म करने के लिए सरकारों को अपनी अप्रिय जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में कुछ हफ्ते पहले प्लास्टिक और पॉलीथीन के सामानों पर जो रोक लगी है, उसका असर दिखना शुरू भी नहीं हुआ है। उसके हिसाब से तो विज्ञापन होर्डिंग्स के फ्लैक्स पर पूरी तरह से रोक लगी है, लेकिन अभी यह सिलसिला धड़ल्ले से चल रहा है, और सरकार ने कोई भी कार्रवाई नहीं की है। इस किस्म का प्रदूषण पटाखों की तरह धमाके और रौशनी से सामने नहीं आता है, लेकिन वह धरती पर दसियों हजार बरस का बोझ रहेगा। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार को अपने इस आदेश पर कड़ाई से टिके रहना चाहिए, और राजनीतिक या कारोबारी विरोध को अनदेखा करते हुए इंसान और धरती के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में प्लास्टिक और पॉलीथीन, गाडिय़ों के धुएं, और औद्योगिक धुएं, पटाखे जैसे निहायत गैरजरूरी रसायन, इन सब पर कड़ाई से काबू करना चाहिए।
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