इंसान और हैवान का डीएनए एक

2 अक्टूबर  2017

मुंबई में अभी एक रेलवे स्टेशन के पुल पर भगदड़ में दो दर्जन लोग मरे, तो उसका मीडिया कवरेज जाहिर है कि कुछ अधिक हुआ, क्योंकि वह मुंबई है, और यह वह मुंबई है जहां के सुरेश प्रभु अभी कल तक रेलमंत्री थे, और यह देश की कारोबारी राजधानी भी है, और सबसे बड़ा महानगर भी है। यहां पर हर दिन पौन करोड़ लोग लोकल ट्रेन में सफर करते हैं, इसलिए ऐसी लोकल ट्रेन के एक स्टेशन पर हुए ऐसे हादसे की खबर-अहमियत कुछ अधिक होना जायज भी है। नतीजा यह है कि यह हादसा खबर से हट नहीं पा रहा है क्योंकि यह रेलवे की भटकी हुई प्राथमिकताओं की एक बड़ी मिसाल है।
लेकिन आज यहां इस पर लिखने का एक दूसरा मकसद है। दो दिन पहले खबर आई थी कि पुलिस को क्लोज्ड सर्किट कैमरों की ऐसी रिकॉर्डिंग मिली है जिनमें भगदड़ में मारे गए, या कि दम तोड़ते हुए मुसाफिरों के गहने उतारते दूसरे मुसाफिर दिख रहे हैं, या कि वे महिला मुसाफिरों की लाशों से उनके पर्स छीनकर भाग रहे हैं। आज एक जिम्मेदार अंग्रेजी अखबार की खबर है कि दम तोड़ती हुई एक लड़की की आखिरी सांसों के दौरान कुछ लोग उसके बदन से खेलते हुए, उसका देह शोषण करते हुए भी कैमरों में कैद हुए हैं। यह याद रखने की जरूरत है कि यह सब दिन की रौशनी में, हजारों दूसरे मुसाफिरों के बीच की गई हरकतें हैं। और लोग कहेंगे कि इनकी इंसानियत कहां गई।
दरअसल इंसानियत शब्द को हैवान के मुकाबले इंसान के सिलसिले में गढ़ा गया है कि हैवान तो सभी किस्म की हिंसक हरकतें करते हैं, और इंसान अच्छे काम करते हैं। हैवान को न तो किसी ने देखा है, और न ही उसका कोई सुबूत मिला है। जब लाखों बरस पुराने डायनासॉर के कंकाल चट्टानों के नीचे दबे निकलते हैं, तब भी कोई ऐसा कंकाल नहीं निकला जिसे कि हैवान का बताया जा सके। हकीकत यह है कि जब इंसान अपनी हरकतों पर शर्मिंदा होते हैं, या कि दूसरे लोग उन हरकतों को पकड़कर उन्हें शर्मिंदा करते हैं, तो इंसान अपने ऐसे मिजाज को अपना मानने से इंकार कर देते हैं, और उसे किसी हैवान की हैवानियत बता देते हैं। यह कुछ उसी तरह का मामला है जिस तरह कि किसी पार्टी का नेता या कार्यकर्ता जब बलात्कार करते पकड़ा जाता है, तो वह पार्टी उससे किनारा कर लेती है, और ऐसे सुबूत गढऩे लगती है कि उसे तो पहले ही पार्टी से अलग कर दिया गया था।
दरअसल अपनी खामियों को अपनी मानने से इंकार करने की सोच कोई नया सिर ढूंढती है जिस पर कि तोहमत मढ़ी जा सके। जिस तरह किसी घर में एक बच्चे को ऐसा शरारती मान लिया जाता है, और करार दिया जाता है कि वहां की तमाम गड़बडिय़ां वही बच्चा करता है, उसी तरह इंसानों ने हैवान नाम की एक ऐसी प्रतिमा गढ़ ली है जिसे कि अपनी हर अप्रिय गलती के लिए, गलत काम और जुर्म के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके। इसी के तहत हैवानियत नाम का एक शब्द गढ़ा गया है, जो कि इंसानियत के भीतर का उसका अपना हिस्सा है, उसका अलग न किया जा सकने वाला हिस्सा है, जिसे महज दबाकर रखा जा सकता है, जब तक कि मौका न मिले, या कि जब तक कि उसे मौका देने की कोई वजह न आए। लोगों को याद रखना चाहिए कि अभी आए दिन पूरे हिन्दुस्तान से हर कुछ मिनटों में एक बलात्कार की शिकायत पुलिस तक पहुंच रही है। हमारा मानना है कि ऐसी हर शिकायत के पीछे, पुलिस तक न पहुंचने वाले सौ बलात्कार और होते होंगे, और ऐसे हर बलात्कार के पीछे हजारों बच्चों के तरह-तरह के यौन शोषण भी होते होंगे जो कि कभी सामने नहीं आते।
हैवानियत शब्द को गढ़कर इंसान अपनी इज्जत बचाने के फेर में एक चूक कर रहे हैं कि वे अपनी ही एक अपरिहार्य और अविभाज्य, अलग न की जा सकने वाली खामी को मानने से इंकार कर रहे हैं। किसी भी समस्या का समाधान निकालने की पहली जरूरत होती है उस समस्या के अस्तित्व को मानना। जब इंसान यही मानने से इंकार कर रहे हैं कि यह इंसान के भीतर की अपनी खामी है, तो वे किसी समाधान की तरफ बढ़ भी नहीं सकते। लोगों को यह मानना पड़ेगा कि उनके भीतर की हकीकत क्या है, वे अपने आपको कैसा चाहते हैं, यह हसरत हकीकत नहीं हो सकती। हसरत को हकीकत मान लेना एक बड़ी चूक की शुरूआत होती है। यह सिलसिला कुछ वैसा ही है कि जब घर का कोई बच्चा बाहर से शरारत करके लौटता है, तो घरवाले दूसरों सहित अपने मन को भी यह सफाई देते हैं कि वह गलत बच्चों की सोहबत में उठने-बैठने लगा है। यही सफाई उस बच्चों के तमाम साथियों के मां-बाप भी एक-दूसरे को देते हैं, और यह सवाल खड़ा होता है कि वे गलत बच्चे हैं कौन? इसी तरह यह समझ लेना चाहिए कि वह हैवानियत और कुछ नहीं है, वह अपने भीतर की इंसानियत का ही एक हिस्सा है, इंसानियत के साथ हैवानियत कुछ वैसी ही जुड़ी हुई है जिस तरह कि फूलों की पंखुडिय़ों के नीचे डंडी होती है, या कांटे होते हैं, या जिस तरह सीताफल (शरीफे) के भीतर बीज होते हैं, या अनानास के ऊपर कांटे होते हैं। इनमें से किसी को भी नकारने से कुछ साबित नहीं होता, और ये बीज या कांटे तो अलग किए भी जा सकते हैं, लेकिन इंसान को हैवानियत से अलग नहीं किया जा सकता, वह उसकी रग-रग में बसी हुई है।
अब सवाल यह उठता है कि हर इंसान हत्यारे क्यों नहीं हो जाते, हर इंसान बलात्कारी क्यों नहीं हो जाते, अगर इन सबके भीतर हैवान शामिल हैं? ऐसा इसलिए होता है कि समाज और सभ्यता, संस्कृति और पारिवारिक दबाव, कानून का खतरा, और प्रतिष्ठा का मोह, ये तमाम चीजें मिलकर इंसान के भीतर के हैवान को कैद करके रखती हैं, और इसमें कुछ लोग गांधी की तरह अधिक कामयाब हो जाते हैं, कुछ लोग गोडसे की तरह हत्यारे हो जाते हैं, और कुछ लोग निठारी के ऐसे हत्यारे और बलात्कारी हो जाते हैं जो कि छोटे-छोटे बच्चों को बलात्कार के बाद मार डालते हैं, और फिर उनकी लाश को पकाकर खा भी लेते हैं, और इसी समाज के भीतर तब तक जीते रहते हैं जब तक कि वे पकड़ा नहीं जाते। उन्हें देखकर कोई नहीं बता पाते कि उनके भीतर का हैवान उन पर काबू पा चुका है, और वही फैसले कर रहा है, और वही काम कर रहा है।
इंसानों को अपनी अनचाही बातों के लिए हैवानों को जिम्मेदार ठहराना बंद करना चाहिए। ऐसा किए बिना इंसानों से सावधानी बरतना शुरू ही नहीं हो पाएगा। आज पूरी दुनिया में यह जरूरत महसूस हो रही है कि बच्चों को या समझाया और सिखाया जाए कि बड़ों का कौन सा स्पर्श अच्छा होता है, और कौन सा बुरा। इसलिए बच्चों से लेकर बड़ों तक हर किसी को यह एहसास कराना जरूरी है कि आसपास के इंसान ही हैवान भी हैं, और हैवान के सिर पर सींग नहीं होते, उसके नाखून बढ़े हुए नहीं होते, उसके दांत बाहर निकले हुए नहीं होते, हैवान इंसान की शक्ल में ही, इंसान के बदन में ही रहते हैं। इंसानों ने अपनी इज्जत बनाए और बचाए रखने के लिए हैवान नाम का एक शब्द गढ़ लिया, डिक्शनरी में हैवानियत जोड़ दिया, और हैवानियत को एक कुल कलंक मानते हुए उससे परिवार का नाता तोडऩे का हलफनामा दे दिया। लेकिन आधुनिक विज्ञान की तकनीक साबित करती है कि इंसान और हैवान के डीएनए में कोई फर्क नहीं है, दोनों का डीएनए एक ही है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें