संपादकीय
15 अक्टूबर 2017

मध्यप्रदेश में एक जैन मुनि को एक भक्त परिवार की युवती के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। पैंतालीस बरस के जैन मुनि पर 19 बरस की युवती ने बलात्कार का आरोप लगाया था और उसके बाद मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि होने के बाद यह गिरफ्तारी हुई। अभी पिछले कुछ बरसों से देश लगातार आध्यात्मिक और धार्मिक नेताओं, संत-स्वामियों के बलात्कार के मामलों को देख रहा है। ऐसे में कुछ बुनियादी सवाल भी उठते हैं कि ऐसी नौबत क्यों आती है?
एक बात तो यह है कि बहुत से धर्मों में संत, मुनि, साध्वी, पोप, मौलवी जैसे ओहदों पर बैठे लोगों या उपाधियों से सजे हुए लोगों के साथ यह शर्त रहती है कि वे ब्रम्हचारी रहें। इंसान की देह का इतिहास धर्मों के इतिहास से लाखों, या शायद दसियों लाख साल पुराना है। इसलिए देह की जरूरतें धर्म से ऊपर रहती हैं। अब जो लोग धर्म या आध्यात्म के अनुशासन में जाते हैं, वे शुरुआत से ही अपने तन और मन के साथ एक संघर्ष करते हैं, और यह संघर्ष जिंदगी के आखिरी दिन तक चलता है। यह बात महज धर्म और आध्यात्म के लोगों के साथ नहीं है, महात्मा गांधी जैसे लोग भी ब्रम्हचर्य के प्रयोग करते रहे, और कई किस्म के अनैतिक तरीकों को इस्तेमाल करके भी उन्होंने अपने बदन पर काबू का इम्तिहान लेने का एक लंबा सिलसिला चलाया, और बाद में उस बारे में खुद ही लिखा भी। इसलिए चाहे किसी भी तरह के धार्मिक अनुशासन की वजह से लोगों को ब्रम्हचर्य के तहत रहना पड़ता है, उनके बारे में यह बात समझ लेना चाहिए कि वे आखिरी सांस तक के एक अंतहीन संघर्ष में पड़ते हैं, और यह संघर्ष कम कठिन नहीं होता। पौराणिक कहानियां पढऩे वालों को याद होगा कि किस तरह ऋषि विश्वामित्र की साधना को एक सुंदरी मेनका ने भंग कर दिया था। पूरी दुनिया में ऐसे मामले हैं, और ईसाई चर्च के तो सैकड़ों-हजारों मामले बच्चों के साथ सेक्स के भी सामने आए हैं जिन्हें लेकर अदालती मुकदमे तक चले हैं। आज जब हम यह लिख रहे हैं उस वक्त भी इंटरनेट पर एक खबर तैर रही है कि इंडोनेशिया में एक ईसाई बिशप को एक महिला से अनैतिक रिश्ता रखने की वजह से इस्तीफा देना पड़ा।
ऐसी नौबत में हमारा यह मानना है कि जब आसाराम पर एक नाबालिग लड़की से बलात्कार का मामला चल ही रहा है, राम-रहीम कई नाबालिगों के साथ बलात्कार के मामले में सजा काट ही रहा है, तो बाकी धर्मों और सम्प्रदायों के भक्तों-अनुयायियों को चाहिए कि वे अपने परिवार सम्हाल कर रखें, और बलात्कार की ऐसी नौबत, ऐसे खतरे से उनको दूर रखें। दूसरी तरफ धर्म और सम्प्रदाय के जिम्मेदार लोगों को भी चाहिए कि वे अपने ब्रम्हचारी लोगों के लिए अनुशासन का कुछ ऐसा इंतजाम रखें कि वे ऐसी किसी नौबत में न फंसें। लोगों को वह पुरानी कहावत याद रखनी चाहिए कि आग और घी को साथ-साथ नहीं रखना चाहिए। आज के वक्त में कहा जा सकता है कि पेट्रोल के कनस्तर को आग के करीब रखना आगे-पीछे खतरे का सामान बनता ही है। इसलिए जिस किसी धर्म और सम्प्रदाय को ऐसी बदनामी से बचना है, उन्हें समय रहते अपने मुखिया या उनके नीचे के सेवकों को लेकर नियम-कायदे की एक परंपरा कायम करनी चाहिए। इसके बिना बड़ी संख्या में बलात्कार होते रहेंगे, और उनमें से कोई एक-दो भी पुलिस तक पहुंचकर पर्याप्त बदनामी दे देंगे।
हम यह नहीं मानते कि लोग धर्म और आध्यात्म को छोड़ ही देंगे। लोगों को अपने मन की कमजोरी की वजह से हमेशा ही ऐसे सहारे की जरूरत पड़ते रहेगी। लेकिन उनके ऐसे सहारे जेल में न रहें, इसके लिए उनको खुद को चौकन्ना रहना होगा। यह बात याद रखनी होगी कि एक किसी बलात्कारी बाबा या स्वामी, साधु या मुनि के चलते जब ऐसा कोई भांडाफोड़ होता है, तो उसके हजारों-लाखों अनुयायी और भक्त भी तरह-तरह का सामाजिक अपमान झेलते हैं, और उनके परिवार भी तरह-तरह से ताने झेलते हैं। इसलिए अपनी आस्था के उतने ही करीब जाना चाहिए जितने करीब जाने से तन और मन पर काबू टूटने न लगे। आज पूरे देश में आस्था के खिलाफ अनास्था का एक माहौल चल रहा है। इससे एक फायदा भी हो रहा है कि और लोग ऐसे खतरों में फंसने से बचेंगे, और बच रहे हैं। लेकिन यह जागरूकता बढऩी चाहिए, उसके बिना धर्म और आध्यात्म का साम्राज्य डांवाडोल है।
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