राजस्थान का अध्यादेश कूड़े की टोकरी के लायक, सुप्रीम कोर्ट वहीं फेंकेगा

संपादकीय
22 अक्टूबर 2017


गुजरात सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर अदालतों पर यह रोक लगा दी है कि वे भ्रष्टाचार के मामलों में फंसे अफसरों, और जजों, भूतपूर्व जजों, मंत्रियों के खिलाफ लोगों की शिकायतों पर कोई मामला दर्ज नहीं कर सकेंगे। इसके साथ ही मीडिया और जनता पर भी यह रोक लगाई गई है कि जब तक सरकार इन पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ जांच की मंजूरी नहीं देगी तब तक वे उनका नाम उजागर नहीं कर सकते। यह अध्यादेश नाम उजागर करने पर दो बरस तक की कैद और जुर्माने वाला प्रावधान वाला है। जैसा कि इस अध्यादेश की नीयत से साफ है, यह सरकार और अदालत इन दोनों में बैठे हुए भ्रष्ट लोगों को अधिकतम सीमा तक बचाने की नीयत से लाया गया है, लोगों का यह भी कहना है कि राज्य सरकार को कानून में इस तरह के फेरबदल का कोई अधिकार नहीं है।
हमें ऐसी उम्मीद है कि यह सुप्रीम कोर्ट में जाकर खारिज हो जाएगा। यह पूरा अध्यादेश जनता और मीडिया के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को कुचलता है। अगर किसी को भ्रष्ट कहा जाता है, तो संबंधित अधिकारी, जज, मंत्री, या और कोई नेता, इसके खिलाफ अदालत जाकर सजा की मांग कर सकते हैं। लेकिन लोगों के बोलने, लिखने, या छापने के अधिकार पर इस तरह की रोक संविधान के खिलाफ है, और हमारा यह मानना है कि राजस्थान की वसुंधरा राजे की भाजपा सरकार अपने भ्रष्ट लोगों को बचा तो नहीं पाएगी, उल्टे वह औंधेमुंह जरूर गिरेगी, इसमें सुप्रीम कोर्ट का दखल आने में अधिक समय नहीं लगेगा, किसी को वहां जाने भर की जरूरत है। हमारा यह भी ख्याल है कि भारतीय प्रेस परिषद को भी खुद होकर इस अध्यादेश का संज्ञान लेना चाहिए, और इस पर कार्रवाई करनी चाहिए। प्रेस कौंसिल ऐसे अध्यादेश को खुद होकर खारिज तो नहीं कर सकती, लेकिन ऐसी कोई रोक नहीं दिखती कि वह इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट न जा सके।
भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों के स्तर पर अपने-अपने भ्रष्ट लोगों को बचाने का मुकाबला चलते रहता है। हम छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं कि सरकार कई-कई बरस तक भ्रष्ट लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं करती है, बल्कि जब ऐसे अफसरों पर कार्रवाई की मंजूरी भी केन्द्र सरकार से या यूपीएससी से आ जाती है तो भी कार्रवाई की इजाजत नहीं दी जाती, और बार-बार ऐसे मामले वापिस केन्द्र सरकार या यूपीएससी के पाले में इसलिए डाले जाते हैं कि उन पर कभी कार्रवाई ही न हो सके। मजे की बात यह है कि पिछली जोगी सरकार के समय भ्रष्टाचार करने वाले जो अफसर हैं, उनको भी आज की सरकार में भारी कमाई की कुर्सियां मिली रहती हैं, और इससे भी आगे बढ़कर मजे की बात यह है कि रिटायर होने पर ऐसे लोग और अधिक कमाई की कुर्सियों की उम्मीद भी रखते हैं। यह हाल कमोबेश पूरे देश का है, सिवाय वामपंथी पार्टियों की सरकारों के। अब राजस्थान सरकार इसमें और एक कदम आगे बढ़कर अपने भ्रष्ट लोगों को बचाने का ऐसा काम करने जा रही है और भ्रष्ट को भ्रष्ट कहने पर दो बरस की कैद घोषित कर चुकी है। अब देखना यह है कि जो पार्टी अपने आपको लंबे समय से शुचिता की चौकीदार बताते आई है, जो भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात कहती है, वह अपनी सरकार के इस अध्यादेश पर क्या कहती है?
आज देश में जरूरत इस बात की है कि केन्द्र से लेकर राज्य तक जब सरकार से किसी मंत्री, अफसर, या जज के खिलाफ जांच की इजाजत न मिले, तो जांच एजेंसियों को तीस दिन के भीतर जांच शुरू कर देने का हक रहना चाहिए। इसके बाद सरकार या अदालतों के किसी भी ओहदे पर बैठे हुए लोगों के खिलाफ अदालत में मामला ले जाने के लिए जांच एजेंसी को किसी भी इजाजत की जरूरत नहीं रहनी चाहिए। इसके बाद जरूरत इस बात की रहनी चाहिए कि सरकार में जो लोग जितने बड़े ओहदे पर बैठे हुए हैं, उनके अपराधों पर उन्हें उतनी ही बड़ी सजा का प्रावधान करना चाहिए। देश में ओहदों और दौलत के आधार पर हर किसी का एक दर्जा तय हो जाना चाहिए, और जितने ऊंचे दर्जे वाले ने जुर्म किया हो, उतनी ही बड़ी सजा भी होनी चाहिए। डबलरोटी चुराने पर एक गरीब को जितनी सजा होती है, किसी अरबपति को उतनी ही चोरी पर उससे दस गुना सजा तो होनी ही चाहिए। इसी तरह अफसर, मंत्री, जज, ये सब अपने बड़े ओहदे के अनुपात में ही सजा के हकदार होने चाहिए। राजस्थान सरकार का यह अध्यादेश महज कूड़े की टोकरी के लायक है, और सुप्रीम कोर्ट उसे वहीं पर फेंकेगा।  Visit Website

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