संपादकीय
16 अक्टूबर 2017

एक गैरजरूरी और नाजायज बहस जो कि कुतर्कों पर आधारित हो, कभी-कभी बकवासियों को भारी भी पड़ सकती है। कुछ ऐसा ही हुआ है उत्तरप्रदेश के घोर साम्प्रदायिक और बड़बोले, हिंसक और आक्रामक भाजपा विधायक संगीत सोम के साथ। उत्तरप्रदेश इन दिनों शाब्दिक अर्थों में भी एक भगवाकरण से गुजर रहा है, और वहां की सरकारी बसों और इमारतों को भगवा रंगना तेजी से चल रहा है, प्रदेश के इतिहास का हिन्दू धर्मांतरण किया जा रहा है, और ताजमहल को इतिहास से मिटा दिया जा रहा है। ताजमहल को मौजूदा वक्त से मिटा पाना कानूनी रूप से योगी आदित्यनाथ की सरकार के हाथ में नहीं है, वरना बाबरी मस्जिद के गुंबदों की तरह उसे भी गिरा दिया जाता। ऐसे में जब उत्तरप्रदेश की पर्यटन पुस्तिकाओं से ताजमहल को हटाकर सीएम योगी के खुद के गोरखनाथ मंदिर को जोड़ा जा चुका है, साम्प्रदायिक दंगों के आरोप में जेल जा चुके भाजपा विधायक संगीत सोम ने कहा है कि देश का इतिहास अब तक बिगड़ा हुआ था उसे सुधारने का काम भाजपा कर रही है। ताजमहल कैसा इतिहास है, किस काम का इतिहास है, जिसमें अपने पिता को ही कैद कर डाला था, इन लोगों ने हिन्दुस्तान में हिन्दुओं का सर्वनाश किया था, अब भाजपा सरकार देश के इतिहास से बाबर, अकबर, और औरंगजेब की कलंक कथा को निकालने का काम कर रही है।
इस पर देश की सबसे बड़ी मुस्लिम पार्टी के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने जवाब दिया है कि लाल किले को भी गद्दारों ने बनवाया था, क्या पीएम मोदी लाल किले से तिरंगा फहराना बंद कर देंगे? क्या मोदी-योगी देशी-विदेशी सैलानियों को ताजमहल जाने से मना करेंगे? क्या गद्दारों के द्वारा ही बनाए गए हैदराबाद हाउस में पीएम मोदी विदेशी मेहमानों की मेहमाननवाजी बंद कर देंगे?
यह बहस इतिहास को मिटाने के अज्ञान भरे अहंकार से शुरू हो रही है, और इसका जैसा जवाब ओवैसी ने दिया है, उससे इस बकवासी विधायक की बोलती बंद हो जानी चाहिए। हिन्दुस्तान का इतिहास आज संगीत सोम और योगी की हसरत का मोहताज नहीं है, वह हिन्दुस्तान के बाहर हिन्दुस्तान से ज्यादा अच्छी तरह दर्ज हैं, और खुद हिन्दुस्तानियों द्वारा दर्ज किए गए इतिहास को भी योगी जैसे लोग मिटा नहीं सकते, वह इस पार्टी की सरकार के बाद भी कायम रहेगा, और आज पूरी दुनिया में ऐसे दकियानूसी और धर्मांध लोग जिस अंदाज में ताजमहल को मिटाने पर आमादा हैं, यह उन तालिबानों की सोच की ही शुरुआत है जिन्होंने अफगानिस्तान के बामियान में बुद्ध की पर्वताकार प्रतिमाओं को खत्म किया था। धर्मांधता से इतिहास को खत्म करने की कोशिशें तो तानाशाहों की भी कामयाब नहीं होतीं, यह तो पांच बरस के लिए निर्वाचित सरकार है। और जिन मुस्लिम शासकों को गद्दार कहते हुए जिनके बनाए ताजमहल को पर्यटन की पुस्तिकाओं पर से मिटाया जा रहा है, उन गद्दारों के बनाए लाल किले से प्रधानमंत्री आजादी की सालगिरह पर देश और दुनिया के नाम पैगाम देते हैं। फिर मुस्लिम गद्दारों के बाद अंग्रेज गद्दारों की बारी आएगी, जिनके राज में लोग ईसाई भी बने, और अंग्रेज राज ने हिन्दुस्तानियों का शोषण भी किया था। तो क्या संगीत सोम और योगी मिलकर पूरे देश से रेल की पटरियां उखाड़ फेंकेंगे? रेलवे स्टेशनों को गिरा देंगे? देश भर में ईसाई संस्थाओं द्वारा बनाई गई अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों को गिरा देंगे? संसद भवन और राष्ट्रपति भवन को गिरा देंगे? और क्या वह पूरे देश को अफगानिस्तान और सीरिया की तरह खंडहर बनाकर छोड़ेंगे?
दिक्कत यह है कि भाजपा की तरफ से ऐसे धर्मांध बयानों पर कोई रोक भी नहीं लगाई जाती है। ऐसे लोग समय-समय पर रामजादा-हरामजादा जैसे फतवे जारी करते हैं, कभी मुस्लिमों के हाथ काटकर फेंक देने के फतवे जारी करते हैं, और जाहिर है कि इसकी प्रतिक्रिया में देश की हवा और अधिक जहरीली होती है। हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को दीवाली गुजर जाने के बाद, पटाखों का मुद्दा निपट जाने के बाद, अब इस तरफ भी ध्यान देना चाहिए कि देश की एकता के खिलाफ, देश की सद्भावना के खिलाफ नफरत फैलाने वाले लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कब तक मिले? एक धर्म के मुकाबले दूसरा धर्म अगर यही करता चलेगा, तो एक की आंख फोडऩे के मुकाबले दूसरों की आंख फोड़ते-फोड़ते यह देश ही अंधा हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट को अपनी जिम्मेदारी इसलिए समझनी चाहिए क्योंकि सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रही हैं। आज सोशल मीडिया में लोग अपने असली नाम और असली चेहरे वाले अकाउंट से भी दूसरों को बलात्कार और हत्या की धमकियां दे रहे हैं, और सरकारें अपना जिम्मा पूरा नहीं कर रही हैं। यह सिलसिला जारी रहने देना लोकतंत्र के खिलाफ है। और लोकतंत्र अकेली सरकार का मोहताज नहीं रहता। जब कार्यपालिका अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करती है, जब विधायिका बाहुबल का शिकार रहती है, और वह बिना दांत और नाखून वाले जानवर सरीखी बेअसर हो जाती है, तब जनता न्यायपालिका की तरफ देखती है। न्यायपालिका को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से मुंह नहीं चुराना चाहिए, देश में नफरत और हिंसा को फैलाते हुए जब-जब कानून तोड़ा जाता है उसे तब-तब खुद होकर कार्रवाई करनी चाहिए, और अदालतों में इतनी ताकत संविधानप्रदत्त है। फिलहाल संगीत सोम को नहले पर दहला मिल गया है, और जहां तक तर्क की बात है, संगीत सोम के कुतर्क की बोलती बंद हो चुकी है। बकवास कोई कभी तक भी जारी रख सकते हैं।
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