संपादकीय
7 अक्टूबर 2017

छत्तीसगढ़ सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है और कई तरह के प्लास्टिक और पॉलीथीन के सामानों पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। यह रोक प्रदेश में ऐसे सामानों के निर्माण, इनको प्रदेश के बाहर से लाने, और राज्य में इनके इस्तेमाल, इन सभी पर लागू हो रही है। इसमें निजी इस्तेमाल के पॉली बैग के अलावा प्लास्टिक के कप, ग्लास, प्लेट, कटोरी, और चम्मच जैसे सामानों पर भी लागू है, और इसके अलावा विज्ञापन-होर्डिंग्स पर लगने वाले सिंथेटिक फ्लैक्स, और पीवीसी जैसे पदार्थ से बने हुए बैनर पर भी रोक लगाई गई है। यह फैसला प्रदेश में सैकड़ों करोड़ के कारोबार और हजारों लोगों के रोजगार को तो प्रभावित करेगा, लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि इससे इस धरती के बर्बाद होने की रफ्तार कम भी हो सकती है।
आज तो बाकी हिन्दुस्तान की तरह छत्तीसगढ़ में भी हालत यह है कि एक-दो दिनों तक टंगने वाले जन्मदिन, या स्वागत के बैनर, बोर्ड, और होर्डिंग उसके बाद घूरों से होते हुए कचरे में बाकी पूरी जिंदगी के लिए हमेशा के लिए बोझ बन जाते हैं। इसी तरह आज छोटे-बड़े किसी भी कार्यक्रम के बाहर हजारों कप-प्लेट, गिलास का प्लास्टिक का कचरा इक_ा हो जाता है, और जो कि कभी सड़ता नहीं, हजारों, शायद दसियों हजार बरस के लिए वह धरती की छाती पर बोझ बना हुआ पड़े रहता है। लेकिन किसी भी सरकार के लिए यह एक अलोकप्रिय और साहसी फैसला है कि प्रदूषण पर एक साथ इतनी बड़ी और कड़ी कार्रवाई की जा रही है। अगर बाकी देश में इसी तरह कार्रवाई की जाती है तो धरती पर स्थायी प्रदूषण बहुत हद तक घट सकता है।
आज मशीनों से बनने वाले प्लास्टिक के सामान और मशीनों से होने वाली फ्लैक्स की छपाई का नतीजा यह हो गया है कि लोग इनका अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे हैं। जो कार्यक्रम कुछ घंटों के रहते हैं, उनका मंच भी फ्लैक्स से सजा दिया जाता है जिसका कोई उपयोग उसके बाद नहीं रहता है। एक समय ऐसा था जब कपड़े पर कलाकार हाथ से ऐसी ही लिखावट और सजावट करते थे, जिससे रोजगार भी मिलता था, और उस कपड़े का दुबारा इस्तेमाल भी हो जाता था। लेकिन मशीनों ने यह पूरा सिलसिला खत्म कर दिया था, और अब मिनटों के भीतर फ्लैक्स पर छपाई होकर पोस्टर और होर्डिंग बना दिए जाते हैं। इसी तरह अब गिलासों को धोकर इस्तेमाल करना, प्लेट को धोकर इस्तेमाल करना, यह सब खत्म हो गया, और अब अमीरों से लेकर धार्मिक कार्यक्रमों तक सब जगह यूज एंड थ्रो सामानों ने जगह बना ली है। ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार की यह पहल एक बहुत ही बड़ा फैसला है, और अगर इसमें कोई अदालती दखल न आए, सरकार किसी दबाव में अपना फैसला न बदले, तो यह पर्यावरण के हित में एक ऐतिहासिक फैसला रहेगा।
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