सबको मालूम है लक्ष्मी की हकीकत लेकिन, दिल...

संपादकीय
17 अक्टूबर 2017


एक बार फिर दीवाली सामने खड़ी है, और हिंदुस्तान का लगभग पूरा हिस्सा थोड़ा सा अधिक रौशन है। कुछ लोगों के मन में यह मलाल है कि पटाखों पर कहीं कुछ रोक लगी है, वहीं दूसरे बहुत से लोग हैं जिनके सामने यह फिक्र है कि इस त्यौहार को कैसे मनाएं, कैसे अपने बच्चों को बिना खर्च त्यौहार मनाने के लिए मनाएं। हर त्यौहार एक आर्थिक-सामाजिक खाई लेकर आता है और जितनी खुशियां लेकर आता है, उससे बहुत अधिक मलाल भी लेकर आता है। दीवाली की पूजा से जिस लक्ष्मी के खुश होने की धारणा है, वह लक्ष्मी अगर है, और वह किसी पर खुश होती है, तो वह चुनिंदा लोगों पर ही होती है, और ये वे लोग हैं जिनके पास पहले से वह लक्ष्मी मौजूद है। आंकड़े बताते हैं कि हिंदुस्तान में हाल के बरसों में दौलत का जो इजाफा हुआ है, वह पूरे का पूरा कुछ चुनिंदा लोगों के पास ही हुआ है, और बाकी लोगों का हाल इसी दौर में और बदहाल हुआ है। गरीब और गरीब होते चले गया है, कुपोषण का शिकार, भूख का शिकार, पड़ोस के बांग्लादेश और नेपाल से भी अधिक कुपोषित और भूखा रह गया है।
आज जब बाजार धनतेरस की शानदार, चकाचौंध भरी खरीददारी के लिए तैयार हो रहा है, हो चुका है, तब सुबह-सुबह यह खबर थी कि आधार कार्ड नाम का पहचान पत्र न होने से एक परिवार का नाम राशन कार्ड से कट गया, और राशन न मिलने से, स्कूल की छुट्टी होने से दोपहर का भोजन भी न मिलने से झारखंड में एक गरीब बच्ची भूख से मर गई। ऐसे में एक बच्ची की मौत सरकारों की धनतेरस, और उसकी मनतेरस पर सवाल खड़े करती है। इस देश में हर दीवाली पर यही लगता है कि यह किसकी दीवाली है, एक छोटे से तबके की दीवाली, या देश की दीवाली। कहने को गरीब से गरीब घर में दीवाली पर दो दिए जल जाते हैं, क्योंकि सामाजिक व्यवस्था को ढोना है, और गरीब इस उम्मीद में भी रहते हैं कि दीवाली की लक्ष्मी पूजा से प्रसन्न लक्ष्मी उस पर मेहरबान होंगी, और उसकी गरीबी दूर होगी। लेकिन जैसा कि धर्म का मकसद था, उसे बनाने वालों का मकसद था, धर्म लोगों को ऐसे ही झांसे में रखता है, और गरीबों में बगावत को रोकने के लिए, अमीरों की हिफाजत करने के लिए यह एक हथियार बनाया गया था जो कि आज भी उतना ही कारगर है।
खर्च वाले हर त्यौहार के मौके पर यह बात और अधिक तल्खी से चुभती है कि भारत जैसे देश की उदार अर्थव्यवस्था किस तरह लक्ष्मी को समेटकर कुछ गिनेचुने लोगों तक ले जा रही है, और बाकी तमाम लोगों से उसे दूर कर रही है। फिर लक्ष्मी को भी इससे कोई परहेज नहीं है, वह भी इस इंतजाम में खुश है कि उसे बड़े-बड़े महलों, बड़ी-बड़ी तिजोरियों में रहने मिले, और कच्चे मकानों, झोपडिय़ों और बदबू से दूर रहने का मौका मिले। लक्ष्मी को कोई चुनाव तो लडऩा नहीं है कि वह किसी दलित के घर, किसी गरीब के घर जाकर रहे और खाना खाए, चाहे उस घर का, चाहे किसी रेस्त्रां से आया हुआ। लक्ष्मी की पूजा का यह त्यौहार धर्म की उसी गैरबराबरी वाली सोच पर बना और ढला हुआ है, इसे जो बना रहे हैं, उनकी हकीकत, और उनकी हसरत, सबके लिए हमारी बधाई। 

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