17 सितंबर 2026
अभी रेलवे पटरी पर बैठकर मोबाइल फोन देखते, या उस पर खेल खेलते दो किशोर वहां से गुजरती मालगाड़ी के शिकार हो गए। एक की तुरंत मौत हो गई, दूसरा बुरी तरह जख्मी अस्पताल में है। छत्तीसगढ़ के एक गांव के ये दोनों लडक़े मोबाइल फोन लिए हुए रात 8 बजे पटरियों पर बैठे थे। पटरियों से दूर-दूर बसे हुए लोगों को भी यह मालूम रहता है कि वहां से रेलगाडिय़ां गुजरती हैं। दिन के वक्त भी समझदार लोग अपने बच्चों को सिखाते हैं कि पटरियां पार करने के पहले दोनों तरफ देख लेना चाहिए कि किसी तरफ से ट्रेन आते तो नहीं दिख रही है। ऐसे में अगर 14 बरस के लडक़े पटरियों पर ही बैठकर मोबाइल खेल खेल रहे हैं, तो उन्हें कौन बचा सकते हैं? रेलगाडिय़ों के पास इतनी दूर तक देखने की क्षमता नहीं रहती, अगर दिख भी जाएं, तो अचानक ट्रेन को रोकने से एक-दो जिंदगियां चाहे बच जाएं, बहुत सी और जिंदगियां खत्म हो सकती हैं, इसलिए ट्रेन के इमरजेंसी ब्रेक की एक सीमा रहती है। ऐसे में पटरियों के आसपास बसने वाले, वहां से गुजरने वाले लोगों की ही यह जिम्मेदारी रहती है कि वे राष्ट्रीय महत्व की इस जनसुविधा का सम्मान करें। लेकिन जिस देश में छांट-छांटकर तेज रफ्तार की रंग-बिरंगी रेलगाडिय़ों पर पत्थर चलाना नौजवान पीढ़ी का शगल है, वहां पर लोग अपनी खुद की जिंदगी के प्रति भी लापरवाह हो जाते हैं।
ऐसे ढेर सारे मामले आजकल आ रहे हैं जिसमें कोई सेल्फी-रील बनाने के लिए, कोई बिजली वाली रेलगाड़ी की छत पर चढक़र अपनी जान खतरे में डाल देते हैं, तो कोई ऐसे रहते हैं जो पटरियों पर रेलगाड़ी के दो-चार फीट करीब तक आ जाने पर छलांग लगाकर किसी तरह अपनी जान बचाते हैं, और फिर ऐसी रील के लिए अधिक से अधिक दर्शक पाते हैं। बहुत से लोग चलती रेलगाड़ी के दरवाजों से बाहर लटककर वीडियोग्राफी करते हैं। एक मोबाइल फोन ने, खासकर उसके कैमरे ने, और कैमरे की वीडियो रिकॉर्डिंग ने लोगों से उनकी समझ को बिल्कुल ही छीन लिया है। लेकिन बात सिर्फ वीडियो तक सीमित नहीं हैं।
बहुत से लोग आज सडक़ों पर ऐसे दिखते हैं जो दुपहियों पर सवार हैं, एक हाथ से हैंडल संभाले हुए हैं, और दूसरे हाथ में मोबाइल थामकर कान से लगाए हुए हैं, या दूसरे हाथ से स्क्रीन को आगे-पीछे करते हुए उस पर कुछ देख रहे हैं, कुछ लोग तो इसी तरह एक हाथ से मोबाइल थामकर चलते दुपहिए पर वीडियोकॉल पर बात करते भी दिख जाते हैं। जब दुपहिया व्यस्त सडक़ पर चल रहा हो, जब दाएं-बाएं मुडऩे के लिए इंडिकेटर देना हो, या हाथ दिखाना हो, तो ऐसे सारे मौकों पर लोग मोबाइल पर अपनी इतनी एकाग्रता रखते हैं कि मानो योग-ध्यान कर रहे हों, फर्क सिर्फ यही रहता है कि वे ट्रैफिक के बीच रहते हैं, और लोगों की जिंदगी अपनी टक्कर से खत्म कर सकते हैं, या अपनी जिंदगी गंवा भी सकते हैं। इन दिनों जगह-जगह लगे हुए पुलिस के कैमरे पता नहीं ऐसे मोबाइल चालकों का चालान करते हैं या नहीं। एक वक्त बड़ी गाडिय़ों के पीछे लिखा रहता था कि वाहन चालन और सौंदर्यपान एक साथ नहीं, जान जा सकती है, आज तो वाहन चालन और मोबाइल चालन दोनों धड़ल्ले से साथ-साथ चलता है, और राह चलती किसी सुंदरी को एक नजर देख लेने के मुकाबले हजार गुना अधिक ध्यान मोबाइल फोन पर लगे रहता है।
इससे परे सार्वजनिक आम जनजीवन में मोबाइल ने लोगों से तमीज छीनकर नाली में फेंक दी है। लोग दूसरों के बीच, स्टेशन या एयरपोर्ट पर, अस्पताल की भीड़ में, या बगीचों में योग-ध्यान करते लोगों के बीच में अपने फोन पर चीख-चीखकर बात करने के आदी हो गए हैं, और उन्हें यह लगता है कि उनके पास एक मोबाइल फोन से आसपास के कई एकड़ की दुनिया के वे मालिक हो गए हैं। लोगों के पास एक मोबाइल फोन होने से वे अपने आपको बाकी तमाम लोगों की जिंदगी बर्बाद करने का हकदार मानने लगे हैं। मोहल्लों के भीतर भी कई लोग अपने घर के सामने की सडक़ पर चीख-चीखकर बात करते हुए घूमते रहते हैं, और अड़ोस-पड़ोस के लोग उनकी बकवास को सुनने पर मजबूर रहते हैं। हालत यह हो गई है कि लोगों को अगर परले दर्जे का झूठ कहना है, तो भी वे उसे दर्जनों या सैकड़ों लोगों के बीच बोलने से नहीं कतराते। वे रहते किसी एक शहर में हैं, और वहां सैकड़ों लोगों तक आवाज जाते हुए वे मोबाइल पर झूठ बोलते रहते हैं कि वे उस वक्त किसी और शहर में हैं। इस तरह एक फोन लोगों से झूठा कहलाने की शर्म भी छीन ली है, और वे खुलकर चीख-चीखकर झूठ बोलते हैं। लोगों को यह भी फर्क नहीं पड़ता कि वे अपनी कौन सी निजी बातें भीड़ के बीच बोल रहे हैं, आसपास के लोगों को कितनी परेशानी हो रही है, इससे उन लोगों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता जो कि अपने एक निजी औजार, मोबाइल फोन को एक सार्वजनिक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।
अभी चौथाई सदी पहले तक जिस मोबाइल का कोई चलन नहीं था, उसने आज जिंदगी पर ऐसा कब्जा जमा रखा है कि लोगों को बदतमीज बना दिया है, बेशर्म और लापरवाह बना दिया है, आत्मघाती हद तक खतरनाक बना दिया है। इंसानों ने एक तकनीक के सामने अपनी इंसानियत को, मामूली समझबूझ या समझदारी को जिस तरह उतारकर किनारे रख दिया है, उस लापरवाही से तो नदी या समंदर में खुदकुशी के लिए उतरने वाले लोग भी अपने कपड़े उतारकर नहीं रखते। चूंकि हिन्दुस्तान जैसे देश में सार्वजनिक जीवन की सभ्यता अब खत्म हो चुकी है, इसलिए जिंदगी की इन महीन बातों की तरफ लोगों का ध्यान खींचना फिजूल है। फिर भी जब हमसे बर्दाश्त नहीं होता है, तो ऐसी गैरजरूरी बकवास करके अपना गुबार निकाल लेते हैं। आपके आसपास के बच्चे मोबाइल फोन को लेकर इस तरह की बदतमीजी न सीखें, ऐसे आत्मघाती न हों, इसकी कोशिश कर सकें तो बेवक्त उन्हें श्रद्धांजलि देने से बच सकते हैं।
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