देश आजाद होने का मतलब यह नहीं कि वे राजा नहीं, और आप प्रजा नहीं!

02 अगस्त 2026  

 

ठोस घटनाओं पर लिखना कुछ आसान होता है, लोगों की जानकारी में भी उसके तथ्य रहते हैं, खुद भी तुरंत पढ़ा हुआ रहता है, और संदर्भ अधिक बखान करने की जरूरत नहीं रहती। लेकिन कई बार हमारी कोशिश रहती है कि कुछ ऐसे अमूर्त मुद्दों को उठाया जाए जो कि आमतौर पर आंखों से ओझल रहते हैं, लेकिन जिंदगी के लिए मायने बहुत रखते हैं। ऐसा ही एक मुद्दा भारत में राजा और प्रजा का है। कहने के लिए तो लोकतंत्र के आने के साथ ही ये दोनों शब्द खत्म हो जाने चाहिए थे, लेकिन आज सरकारों में बैठे हुए लोग, न सिर्फ बड़े लोग, बल्कि छोटे से छोटे लोग भी अपने को राजा समझते हैं, और वहां पहुंचने वाली, टैक्स देने वाली जनता को प्रजा समझते हैं। नतीजा यह होता है कि असल हिन्दुस्तान के सरकारी दफ्तर एक टीवी सीरियल ‘ऑफिस-ऑफिस’ की तरह हो जाते हैं, और जनता मुसद्दीलाल बनी फिरती रहती है। लेकिन हम बात सिर्फ सरकारी भ्रष्टाचार तक सीमित रखना नहीं चाहते, सरकार इससे परे भी कई और किस्म से जनता का शोषण करती है, आज उन्हीं पहलुओं पर थोड़ी सी चर्चा हो जाए। 

भारत में लोग अस्पताल जाएं, किसी सरकारी दफ्तर, या जेल में किसी कैदी से मिलने के लिए, जमीन की रजिस्ट्री कराने जाएं, राशन लेने जाएं, या प्रॉपर्टी टैक्स पटाने, सरकार का रूख जनता के लिए ऐसा रहता है कि जनता की जिंदगी का सरकार मनचाहा इस्तेमाल कर सकती है। वह कभी राशन की कतार में लगा सकती है, कभी रेलवे टिकट की कतार में, कभी गैस सिलेंडर की बहुत लंबी कतार में, कभी टैक्स पटाने के लिए बैंक के चालान काउंटर की कतार में। ऐसा लगता है कि कतार में रहने वाले लोगों का देश के पास  और किसी तरह का इस्तेमाल ही नहीं है, उनकी कोई उत्पादकता ही नहीं है, और बाकी की पूरी जिंदगी भी वे अगर कतार में रहेंगे, तो भी इस देश पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अपनी ही जनता के वक्त की ऐसी बर्बादी से बेफिक्र सरकार दरअसल गैरजिम्मेदार सरकार भी होती है, जो कि अपने नागरिकों की क्षमताओं, और संभावनाओं को बर्बाद करने से परहेज नहीं करती।


सरकार में दरअसल लंबी कतार लगवाने के पीछे एक बड़ी जाहिर किस्म की बदनीयत भी रहती है। कई लोग अपनी निजी मजबूरियों के चलते कतारों में वक्त बर्बाद नहीं कर पाते, और वे फिर ऐसे रास्ते ढूंढते हैं कि काम जल्दी निपट जाए। यहीं पर सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोग बेचेहरा दलालों का इस्तेमाल करके काम को जल्दी करने के लिए वसूली-उगाही करते हैं, और जनता अपने समय को बचाने के लिए यह रिश्वत देने को मजबूर हो जाती है। कई जगहों पर तो यह कारोबार इतना व्यवस्थित हो जाता है जितना व्यवस्थित तो सरकारी काम भी नहीं होता। सरकार की कोई जवाबदेही नहीं होती, वह संसद, विधानसभा, या अदालत में बहुत बुरी नौबत आने पर भी अधिक से अधिक छुपाते हुए कम से कम जानकारी देकर बचने के हुनर में माहिर हो चुकी रहती है, और नियमित कामकाज के लिए वसूली-उगाही को साबित करना तब तक मुमकिन नहीं हो पाता, जब तक किसी को रंगे हाथों न पकड़ लिया जाए, या कोई स्टिंग ऑपरेशन न किया जाए। 

हमेशा से ही कुछ अखबार, टीवी चैनल, या कुछ समाचार वेबसाइटें वसूली-उगाही के स्टिंग ऑपरेशन करते आए हैं, और जिनके खिलाफ सुबूत दर्जे की बातें दर्ज हो पाती हैं, उनमें से कुछ पर ढीली-ढाली कार्रवाई अगर हुई, तो होती है, अमूमन कुछ नहीं होता। ऐसे में सरकारी दफ्तरों में हर काम के लिए कतार लगवाना मुनाफे का कारोबार होता है, और सीमित दिन, सीमित घंटे, सीमित काउंटर, और उन पर भी असीमित लंच-अवर से लोगों की मजबूरी बढ़ती चलती है। फिर जब देश की संस्कृति में लोगों से कतार लगवाकर उगाही करने की बात घर कर जाती है, तो फिर जहां उगाही नहीं होना है, वहां भी कतार लगवाने की संस्कृति विकसित हो जाती है। सरकारें यह परवाह नहीं करतीं कि उसे बिजली का बिल जमा करवाना है, या लाखों रूपए फीस मिलने वाली रजिस्ट्री करनी है, हर जगह काम को धीमा किया जाता है, सर्वर ठप्प हो जाने का बहाना बनाया जाता है, और अधिक से अधिक देर की जाती है। किसी अस्पताल में पर्ची बनवाने के लिए पांच-पांच रूपए फीस लेकर कतार में लगे हुए लोगों को जब वक्त बहुत अधिक लगने लगता है, तो ऊपर से दस-बीस रूपए लेकर पर्ची बनवा देने वालों का कारोबार पनपता है। अदालत में मामले की अगली पेशी जल्दी देने, या देर से देने, किसी दिन सुनवाई न करने, या किसी एक वकील के मौजूद न होने की बात कहकर तारीख बढ़ा देने का सिलसिला चलते ही रहता है। वहां पर मुकदमा करने वाले लोग, या शिकायतकर्ता सुनवाई की कतार में लगे ही रहते हैं, और यहीं से फिल्मों को, तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख, का डायलॉग मिलता है। 

सरकारी दफ्तरों में साहबों से लेकर छोटे कर्मचारियों तक किनके कब दौरे रहेंगे, कब उनकी बैठकें रहेंगी, इसका कोई ठिकाना नहीं रहता। जिनको इनसे काम रहता है, वे एक-एक मुलाकात के लिए दर्जन-दर्जन बार चक्कर लगाते हैं, और थक-हारकर फिर दलालों की शरण में जाते हैं। दलालों की ताकत रहती है कि वे साहब या बाबू से पहले से तय किए हुए वक्त पर, दफ्तर के समय के घंटों पहले, या घंटों बाद जाकर काम करवा लेते हैं, और कुल मिलाकर वह सस्ता पड़ता है। अभी एक किस्सा प्रचलित था जिसमें एक अदालत मुकदमे की सुनवाई के बाद एक पक्ष के हक में फैसला देती है। फैसला जीतने वाला बुजुर्ग जज को दुआ देता है कि आगे चलकर दारोगा जरूर बनना। जज कहता है कि दारोगा तो उससे छोटा होता है, ऐसी दुआ क्यों देते हो? तो इस पर बुजुर्ग कहता है कि नहीं, दारोगा बहुत बड़ा होता है, वह इस मामले में शुरू में ही कह रहा था कि पांच हजार रूपए दो, तो हफ्ते भर में इस मामले को निपटा दूंगा, लेकिन अदालत आने से पांच बरस में 25 हजार रूपए वकील के लग गए, तब फैसला हुआ, बड़ा तो दारोगा ही हुआ। 

इस देश में लोग रोड टैक्स देकर गाड़ी खरीदते हैं, टोल टैक्स देकर सडक़-पुल पर चलते हैं, और बदहाल इंतजाम पर तकलीफ पाते रहते हैं। ट्रेनों में टिकट लेकर चढ़ते हैं, और किसी तरह, किस्मत रही तो, खिडक़ी के रास्ते कोई कुली भीतर धकेल देते हैं, या छत पर खतरा उठाकर चढ़ते हैं, अभी तो कुछ ऐसे लोगों के वीडियो देखने आए जिन्होंने डिब्बों के बंद दरवाजों के बाहर लटककर अपने आपको गमछे के सहारे बांध लिया था, और लंबे सफर पर रवाना हो गए थे। एयरपोर्ट पर लोगों को घंटों पहले बुला लिया जाता है, सरकारी अस्पतालों में हफ्तों बाद जांच की तारीख मिलती है, और महीनों बाद ऑपरेशन की। पटवारी से एक-एक मामूली कागज हासिल करने के लिए कई भार धक्के खाने पड़ते हैं, और थक-हारकर उसे हजारों रूपए रिश्वत देनी होती है। किसी सरकार दफ्तर से रकम वापिसी मिलनी हो, तो वहां के अफसर-कर्मचारी उस रकम में भागीदारी चाहते हैं। सरकारी दफ्तर अपने ही कर्मचारी के मेडिकल बिल, या उसकी पेंशन के कागज निपटाने के लिए उससे रकम में हिस्सेदारी चाहते हैं। 

एक वक्त जिसे सेवा शुल्क कहते थे, एक दूसरी जुबान में जिसे नजराना, शुकराना, या जबराना कहते थे, वह अब रेस्त्रां के बिल में गैरकानूनी सर्विस टैक्स की तरह जुड़ गया है। जीएसटी अलग, और सर्विस टैक्स अलग। ऐसा ही सरकारी दफ्तरों में पैसा जमा भी करना हो, तो उसके लिए रिश्वत, निकालना हो, तो उसके लिए रिश्वत। एक वक्त सीमित घंटों वाले काम के दिनों में असीमित घंटों के लंच के लिए बदनाम एसबीआई की संस्कृति कोरोना की तरह फैलकर पूरे देश को गिरफ्त में ले चुकी है, और जिन टेबिलों पर काम लेट होने से जनता का नुकसान होता है, जनता तकलीफ पाती है, वहां पर टेबिलों से गायब रहने से कुर्सीधारियों का नफा जुड़ जाता है। अब भला ऐसे में कौन वक्त पर कुर्सी पर बैठेगा?

हिन्दुस्तानी जनता को अपनी भड़ास निकालने के लिए जापान जैसे देशों की कहानियां पढ़ लेना चाहिए कि किस तरह वहां हर कोई जिम्मेदारी से अपना काम करने को देश की गौरवशाली संस्कृति मानते हैं। जापान की ऐसी कहानियां पढऩे के लिए लोगों के पास अपार समय भी रहता है क्योंकि वे अगर बेरोजगार हैं, तो खाली ही खाली हैं, और अगर कामकाजी हैं, तो भी घंटों किसी न किसी कतार में लगे रहते हैं, इसलिए दुनिया से निराश होने की जरूरत नहीं है, जापान जैसे देश को देखिए, और यह सोचकर खुश हो लीजिए कि मेरे सीने में नहीं तो, तेरे सीने में सही, हो कहीं भी ठंडक लेकिन, ठंडक रहनी चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 2 अगस्त 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

ऑनलाईन फाइलों तक जनता को पहुंच देना सरकार की जिम्मेदारी

02 अगस्त 2026

भारत में इन दिनों डिजिटल तकनीक की मेहरबानी से कई तरह के काम ऑनलाईन होते चले गए हैं। सरकार के भी, संसद या विधानसभाओं के भी, और अदालतों के भी। लोग अब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कई किस्म की कार्रवाई ऑनलाईन देख सकते हैं, वादी-प्रतिवादी यह भी देख सकते हैं कि उससे फीस लेने वाले वकील ने अदालत में कितनी मेहनत से बहस की, या नहीं की। जनता संसद और विधानसभा की कार्रवाई का कुछ हिस्सा देखकर यह जान सकती है कि उसके निर्वाचित नेता वहां पर कितनी मेहनत कर रहे हैं, या सदन में बैठते ही नहीं हैं। लेकिन सरकार में छोटी-छोटी सी जानकारी को हासिल करने के लिए लोगों को सूचना के अधिकार के तहत महीनों तक धक्के खाने पड़ते हैं क्योंकि सरकारी अमला अपने कब्जे की कोई भी जानकारी बाहर निकलने नहीं देना चाहता, क्योंकि जानकारी बाहर निकली, तो कई तरह के राज बाहर निकल जाएंगे, और राज-काज के धंधे में किसी को राजदार बनाना घाटे का सौदा होता है। 

हिन्दुस्तान में यूपीए सरकार के समय से सूचना का अधिकार लागू हुआ है, इसके लिए कई सामाजिक आंदोलनकारियों ने बड़ी मेहनत की थी, जिनमें यूपीए मुखिया सोनिया गांधी के आसपास के लोग भी शामिल थे, और उसी वक्त सूचना के अधिकार को लेकर एक कड़ा कानून बना था, जो कि संसद से इसलिए आसानी से और तेजी से पास हो गया था कि लोगों को उसका खतरा समझ नहीं आया था। अब जब सूचना का अधिकार सरकारी ढांचे में सूचना का हथियार माना जाने लगा है, तो सरकारी लोगों का रूख जनता के इस बड़े औजार के लिए एकदम बदल गया है। आरटीआई कानून बेजा इस्तेमाल होता है, यह कह-कहकर सरकार के लोगों ने इसे बदनाम करने की बड़ी कोशिशें कीं, लेकिन इसी आरटीआई से निकली जानकारी से देश-प्रदेश के कई सबसे बड़े भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ भी हुआ। 

हमने पिछले बरसों में लगातार इस बात को लिखा कि आरटीआई को राईट टू इंफर्मेशन के बजाय रिस्पॉसिबिलिटी टू इंफॉर्म किया जाना जरूरी है, ताकि जनता इसके लिए अर्जी लगाकर, एक रकम जमा कर अपने हक की जानकारी मांगने धक्के न खाती रहे। अब जब भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों में शासन-प्रशासन का बहुत सारा काम ऑनलाईन हो रहा है, एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के बीच, या एक ही दफ्तर के भीतर भी, फाइलें ऑनलाईन आती-जाती हैं, तो क्या जनता को इन फाइलों तक पहुंच देना ठीक होगा? कम्प्यूटरों की व्यवस्था में यह इंतजाम बड़ा आसान रहता है कि किसी को लिखने की छूट देना, किसी को सिर्फ पढऩे की छूट देना, और किसी को डाउनलोड करके प्रिंट करने की भी। क्या सरकार का जो-जो कामकाज सूचना के अधिकार के तहत जनता की पहुंच के भीतर का रखा गया है, क्या  सरकार खुद होकर भी उस तक ऑनलाईन पहुंच की छूट जनता को दे सकती है? उस फाइल तक, उस कागज तक जाना, उसकी प्रतिलिपि पाना जब जनता का हक है, और जब वह कागज सरकार के अपने भीतरी, घरेलू कामकाज के लिए ऑनलाईन है, तब उसे जनता की पहुंच में ला देने में कौन सी गोपनीयता खत्म हो जाएगी? 

इस बारे में दुनिया के कुछ दूसरे देशों की मिसाल ढूंढी गई, तो पता लगा कि लोकतांत्रिक देशों में पिछली आधी सदी में जगह-जगह यह सोच बढ़ी है कि सरकार नागरिकों से जानकारी छिपाने के बजाय अधिकतर जानकारी खुद सार्वजनिक करे। आज विश्व बैंक और कई लोकतांत्रिक देशों के प्रशासन-विशेषज्ञ इसे आधुनिक शासन की एक जरूरी बुनियाद मानते हैं। इस बारे में मामूली रिसर्च से पता लगा कि दुनिया में सरकारी पारदर्शिता की सबसे पुरानी परंपरा स्वीडन की है जहां 1766 में ही सरकारी दस्तावेजों तक नागरिकों की पहुंच का सिद्धांत मंजूर किया गया था, और बाद में इसे संविधान में जोड़ा गया। इसका मूल सिद्धांत यह है कि जब तक सरकार कोई कानून बनाकर किसी विशेष कारण से किसी किस्म के दस्तावेज को गोपनीय रखना जरूरी साबित न करे, तब तक हर सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक रहना चाहिए। इसके बगल के फिनलैंड में पारदर्शिता का एक नया मॉडल बनाया गया, जहां लोगों को आवेदन देने की नौबत ही न आए, इसलिए सरकार के अधिकतर दफ्तर अपने अधिकतर दस्तावेज खुद ही ऑनलाईन डाल देते हैं, जिसे देखना हो देख लें। इस बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि यह सूचना के अधिकार से भी आगे की व्यवस्था है, क्योंकि इससे सरकार पर व्यक्तिगत आवेदनों का बोझ घट जाता है। पूर्वी योरप के एक और देश एस्टोनिया में जनता अधिकतर सरकारी कामकाज ऑनलाईन देख पाती है, और इससे सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही भी बढ़ती है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) की सिफारिशों में बार-बार यह कहा गया है कि सरकार जानकारी मांगने का इंतजार न करे, जो जानकारी सार्वजनिक हो सकती है, उसे खुद प्रकाशित करे। 

हमारा यह भी मानना है कि अब प्रकाशन का मतलब कागज पर कुछ छापने जैसा खर्चीला नहीं रहता, अब तकरीबन बिना किसी लागत और खर्च के सरकार अपनी सारी जानकारी ऑनलाईन कर सकती है। अब केन्द्र सरकार के एक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करके अधिक से अधिक राज्य ई-फाइलिंग प्रणाली पर काम कर रहे हैं। किसी जिले का कलेक्टर किसी फाइल को ऑनलाईन राजधानी में सचिव को भेज सकते हैं, सचिव उस पर अपने विभाग से ऑनलाईन जानकारी और राय ले सकते हैं, वे फाइल को वापिस नीचे या ऊपर भेज सकते हैं, और उसे मंत्री या मुख्यमंत्री तक की मंजूरी कुछ मिनटों में मिल सकती है। ऐसी तकनीकी सहूलियत के लिए पूरी की पूरी फाइल, उसके हर पन्ने को ऑनलाईन भेजा जाता है। अब जब यह पूरी जानकारी ऑनलाईन है, और जनता के सूचना के अधिकार के तहत उसे यह जानकारी कागज पर हासिल करने का हक है, तो इस हक को सीधे-सीधे फाइल पढऩे, और उसके पन्नों को डाउनलोड करके प्रिंट करने का हक क्यों नहीं दे दिया जाता? 

सरकारी गोपनीयता के हिमायती लोगों का कहना है कि जिस तरह अभी भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग के चुनिंदा टुकड़े पोस्ट करने या फैलाने पर रोक लगाई है, वैसी नौबत सरकारी फाइलों के साथ भी आ सकती है कि लोग उसके चुनिंदा पन्ने को फैलाकर सरकार, किसी अफसर, या किसी कंपनी को बदनाम करें। यह तर्क फिजूल का इसलिए लगता है कि यही काम कोई भी नागरिक सूचना के अधिकार के तहत इन्हीं सारे कागजों को हासिल करके प्रतिलिपियों के गट्ठे में से चुनिंदा पन्ने निकालकर भी कर सकते हैं। हजार पेज के जवाब में से वे पसंद के दो पैरा निकालकर एक नजरिया गढ़ सकते हैं। फिर ऑनलाईन तेजी से ऐसी पहुंच हो जाने से क्या फर्क हो जाएगा? 

फाइलों को ऑनलाईन करने के विरोधियों का यह तर्क है कि हर पल, हर फाइल तक लोगों की पहुंच रहने से उन फाइलों पर टिप्पणियां करने वाले, फैसले लेने वाले अफसरों पर एक मानसिक दबाव रहेगा, और वे खुलकर अपनी राय फाइलों पर नहीं लिख सकेंगे। इस पर, बहस के लिए, हमारा तर्क यह है कि जब ऐसी टिप्पणियों वाले पन्ने, और ऐसे फैसले सूचना के अधिकार में जनता हासिल कर ही सकती है, तो इसे ऑनलाईन मुहैया कराने का हक कौन सा अतिरिक्त खतरा खड़ा करेगा? बस यही तो है कि लोग महीनों तक धक्के खाने से बचेंगे, आरटीआई की अपीलों के सालों तक चलने वाले दौर से बचेंगे, और संविधान की भावना के अनुरूप जानकारी जल्दी पा जाएंगे, इससे अगर कोई भांडाफोड़ होना है, तो वह जल्दी हो जाएगा, कोई नया भांडा तो नहीं फूटेगा।

लोकतंत्र जानकारी मांगने का अधिकार नहीं होना चाहिए, लोकतंत्र जानकारी देने की जिम्मेदारी होना चाहिए। अभी तक यह तो हो सकता था कि सरकारी ढांचे के हर पन्ने को ऑनलाईन डालने जितनी क्षमता सरकारी अमले की नहीं है। लेकिन अब ई-फाइलिंग अनिवार्य होते चलने से चूंकि सारी फाइल ऑनलाईन है ही, इसलिए उसमें से जो फाइलें आरटीआई के तहत जनता की पहुंच के भीतर की हैं, उन्हें खोल दिया जाए। क्यों आज लोगों को सरकारी दफ्तर पहुंचकर पोस्टल ऑर्डर के साथ अर्जी लगाने पर मजबूर किया जाए, फिर महीनों तक घुमाने के बाद उन्हें अपील करने कहा जाए, और फिर अपील खारिज होने पर और ऊपर तक अपील करने कहा जाए, और फिर राज्य सूचना आयोग से अपील खारिज होने पर राष्ट्रीय सूचना आयोग भेजा जाए। देश में आरटीआई की परिभाषा में तकरीबन तमाम चीजें एकदम साफ हैं कि उन्हें जनता की पहुंच में रखा गया है, या किसी गोपनीयता या राष्ट्रीय सुरक्षा की वजह से जनता से परे रखा गया है। हम तो महज जनता की पहुंच की बातों को बिना आरटीआई प्रक्रिया के जनता की ऑनलाईन पहुंच में कर देने की बात कह रहे हैं। हिन्दुस्तान को डिजिटल करने की सोच भी सैद्धांतिक रूप से तो यही सुझाती है कि सूचना का अधिकार इस तकनीक के साथ जोड़ दिया जाए, और राजा और प्रजा, दोनों ही गैरजरूरी मशक्कत से बचाया जाए। क्या पारदर्शिता सचमुच ही इतनी डरावनी होती है कि जनता किसी फाइल को देखती रहे, तो अफसर या मंत्री उस पर सही टिप्पणी करने से डरें? इस संदर्भ में प्रेमचंद की लिखी एक विख्यात लाईन याद आती है- बिगाड़ के डर से क्या ईमान की बात न करोगे? 

ईमान की बात को पारदर्शिता करके फिर इस वाक्य को पढक़र देखें।

(Daily Chhattisgarh)  

दीवारों पर लिक्खा है, 31 जुलाई 2026


(Daily Chhattisgarh)

 

परिवार और कारोबार, दोनों मिलकर बदन से निकाल रहे हैं दुश्मनी

 31 जुलाई 2026  

 

महाराष्ट्र सरकार ने यह तय किया है कि स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में जंकफूड नहीं बिकने दिया जाएगा। इसका मकसद बच्चों को ऐसे खानपान से दूर रखना है जिसमें शक्कर अधिक हो, नमक और फैट अधिक हो, और जिनसे शरीर को कोई पोषण तत्व बहुत कम हों। समाचार बताता है कि इस लिस्ट में समोसा, वड़ापाव, चिप्स, कोल्डड्रिंक, मीठे पेय पदार्थ, चॉकलेट, कैंडी, पैकेट वाले स्नैक्स, और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ शामिल हैं। महाराष्ट्र सरकार का यह मानना है कि बच्चों में मोटापा, डायबिटीज, दिल के रोग, और जीवनशैली संबंधी दूसरी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। लेकिन महाराष्ट्र से परे दूसरे राज्यों में ऐसी कोई पहल सुनाई नहीं पड़ रही है। 

भारत का राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) बताता है कि बच्चों और किशोरों में मोटापा लगातार बढ़ रहा है, वयस्कों में भी अधिक वजन पिछले दशक में तेजी से बढ़ा है। भारत में दस करोड़ से अधिक लोग डायबिटीज से पीडि़त हैं, और बड़ी संख्या में लोग प्री-डायबिटीक हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बचपन में मोटापा रोका नहीं गया, तो अगली पीढ़ी में टाईप-2 डायबिटीज पहले के मुकाबले कम उम्र में ही दिखने लगेगा। अब भारत में सिर्फ संपन्न बच्चों के अधिक प्रोसेस्ड खानपान बढऩे से अगर ऐसा हुआ रहता, तो भी बात समझ में आती। इस देश में गरीबों के बीच भी डायबिटीज बढ़ रहा है, और गरीबों के बच्चे भी फैक्ट्रियों के बने पैकेटबंद अधिक नमक-शक्कर-फैट वाले खानपान के आश्रित हो गए हैं। गरीब मजदूर मां-बाप भी पकाने का वक्त न होने पर आसपास की किसी दुकान से ऐसे सामान खरीदकर बच्चों को बहला लेते हैं। 

एक दूसरी दिक्कत यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बनाया हुआ जो खानपान भारत में उपलब्ध है, उनमें सेहत के लिए नुकसानदेह नमक-शक्कर-फैट, और दूसरे किस्म के रसायनों की भरमार है, जबकि यही कंपनियां अमरीका और योरप जैसे अधिक जागरूक देशों में इन्हीं ब्रांड के इन्हीं सामानों में इन नुकसानदेह तत्वों की मात्रा बहुत कम रखते हैं। चॉकलेट से लेकर कोल्डड्रिंक तक, और दूसरे तमाम पैकेटबंद खानपान तक ये कंपनियां हिन्दुस्तानी कानून कमजोर होने, और उस पर अमल बहुत ढीला होने की वजह से ग्राहकों के लिए भारी नुकसानदेह सीमा में जाकर भी उनकी जुबान को अपने स्वाद का आदी बनाने का हमलावर बाजारू काम करती हैं। दुनिया के जिम्मेदार देश सामानों की पैकिंग पर, उनके इश्तहारों में, नुकसानदेह बातों को प्रमुखता से दिखाने पर जोर डालते हैं। भारत में कानून जनता की सेहत के हिसाब से नहीं बनाए गए हैं, और कारोबारियों की मर्जी से नियम-कानून बनते हैं, और उन पर अमल तो कैसा होता है, यह भारत के किसी भी आम सरकारी कामकाज को देखकर अंदाज लगाया जा सकता है। महाराष्ट्र का स्कूलों के आसपास ऐसा जंकफूड न बिकने देने का फैसला जमीन पर जितना असर डालेगा, उससे कहीं अधिक असर लोगों की सोच पर डालेगा, और इससे पैदा होने वाली हलचल से लोगों को यह समझ आएगा कि यह खानपान कितना नुकसानदेह है, और देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा किस खतरे की तरफ बढ़ रहा है। 

भारत कई तरह की दिक्कतों से गुजर रहा है। इस देश से भुखमरी खत्म हो गई है क्योंकि सरकार की कई तरह की राशन योजनाओं से सबसे गरीब लोगों को बिना दाम, या लगभग बिना दाम अनाज मिल जाता है। फिर गरीबी रेखा के ऊपर के लोग भी रियायती अनाज पाते हैं, और उनकी मजदूरी इतनी हो गई है कि वो परिवार का पेट भरने जितना अनाज ले सकते हैं। दिक्कत एक दूसरी है कि यह खानपान पूरी तरह से अन्न-आधारित है, इसमें दूसरे पोषक तत्व जरा भी नहीं हैं। गेहूं, चावल, मक्का, जैसे अनाजों से जिंदा रहने की ताकत तो मिल जाती है, लेकिन सबसे गरीब आबादी के अधिकतर हिस्से के पास फल, सब्जी, दूध, अंडा जैसे दूसरे पोषक तत्वों के लिए कोई इंतजाम नहीं है। इससे भी लोगों का खानपान उन्हें एक स्वस्थ बदन नहीं दे पाता। देश में धार्मिक आधार पर दूसरों के खानपान तय करने की जिद ने भी करोड़ों लोगों को बदन के लिए जरूरी प्रोटीन से दूर कर दिया है। पश्चिम बंगाल का उदाहरण एकदम ताजा है, जहां पर भाजपा सरकार आते ही कोलकाता की स्कूलों में दोपहर के भोजन का काम एक हिन्दू धार्मिक संगठन इस्कॉन को दे दिया गया, और उसने मिड-डे-मील से अंडा बंद कर दिया। कई हफ्तों से इसे लेकर वहां आबादी के एक बड़े हिस्से के बीच विरोध चल रहा था, और अभी कल-परसों ही सरकार की घोषणा आई है कि वहां इस्कॉन के परोसे जाने वाले दोपहर के भोजन से अलग अंडा भी दिया जाएगा। इस तरह भारत में खानपान को लेकर एक अलग किस्म की दिक्कत चल रही है, और इस देश की अधिकतर आबादी के खानपान में प्रोटीन की कमी है। शाकाहारियों के भोजन में प्रोटीन की कमी रहती है, और दूसरे लोगों के खानपान में भी मांसाहार पर लगी तरह-तरह की रोक-टोक से प्रोटीन का संकट आ खड़ा हुआ है। 

लोगों के बीच खानपान को लेकर जागरूकता की बड़ी कमी है। आमतौर पर बदन की शक्कर की जरूरत का एक बहुत छोटा हिस्सा ही प्रोसेस की हुई मीठी चीजों से मिलना चाहिए, और बाकी की मिठास खानपान की दूसरी प्राकृतिक चीजों से मिलनी चाहिए। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि चीजों में मिलाई गई शक्कर किसी व्यक्ति के दिन भर की कैलोरी के दस प्रतिशत से कम होना चाहिए, और बाकी का ग्लूकोज गेहूं-चावल, ज्वार-बाजरा, दाल-फल, दूध-सब्जी जैसी चीजों से मिलना चाहिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन यह भी कहता है कि अधिक अच्छा यह होगा कि बदन की ग्लूकोज-जरूरत का पांच फीसदी से कम हिस्सा ही मिलाई गई चीनी से आए। लेकिन जब बच्चों के खानपान में कोल्डड्रिंक, बिस्किट, केक-मिठाई, जूस, चॉकलेट, आइस्क्रीम, ब्रेकफास्ट सीरियल इन चीजों को देखें, तो संपन्न परिवारों के बच्चों को 90 फीसदी ग्लूकोज मिलाई हुई शक्कर से मिलता है, और यही वजह भारत में आबादी के कम उम्र में ही डायबिटीज हो जाने के खतरे के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। देश में इस जागरूकता की जरूरत है कि बच्चों-बड़ों, किसी को भी कारखाने में बनी चीनी, या चीनी मिले हुए सामानों की कोई भी जरूरत नहीं रहती है। लेकिन आज हालत यह है कि 250 एमएल सॉफ्टड्रिंक की एक बोतल ही किसी को डब्ल्यूएचओ की सुझाई गई सीमा से अधिक शक्कर दे देती है। 

संपन्न बच्चे अपने आसपास होने वाली दूसरे बच्चों की दावतों में आए दिन इसी तरह का खाते हैं, घरों में फ्रिज रहते हैं, उनमें से ऐसी ही चीजें निकालकर खाते हैं, और अब तो मोबाइल पर भेजे गए एक संदेश पर ही घर बैठे आइस्क्रीम या चॉकलेट पहुंच जाते हैं, जो कि एक दिन में ही एक बच्चे को हफ्ते भर से अधिक की शक्कर दे देते हैं। यह सिलसिला इतना खतरनाक हो चुका है कि डायबिटीज की दवा बनाने वाली कंपनियां चैन की नींद सो रही होंगी कि भारत में उनका बाजार बिना किसी मेहनत के लगातार बढ़ते ही चले जाना है। यह बाजार इसलिए भी बढ़ते चले जाना है कि भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोजाना मेहनत के कोई काम नहीं करता। लोगों की जीवनशैली में साइकिल, पैदल, खेलकूद, योग जैसी चीजें जगह नहीं बना पा रही हैं। नतीजा यह हो रहा है कि बाजार के बाजारू हमले से खानपान खतरनाक होते चल रहा है, जिसके खिलाफ कोई जागरूकता नहीं है, और सेहतमंद जीवनशैली की कोई सोच नहीं है। महाराष्ट्र सरकार के स्कूलों से जुड़े इस फैसले की वजह से हमें एक बार इस मुद्दे पर लिखने का मौका फिर से मिला है, जरूरी यह है कि अधिक से अधिक परिवारों को मिसाल देकर यह समझाया जाए कि उनके खानपान की कौन-कौन सी चीजें उन्हें खतरे में डाल रही हैं। इससे अधिक सरकार अपने नियमों में फेरबदल करके कर सकती है, यह बहुत हक्का-बक्का करने वाली बात है कि जो कंपनियां विकसित देशों में जिम्मेदार हैं, वे हिन्दुस्तान में कारोबारी जुर्म करने का ऐसा दुस्साहस रखती है।

(Daily Chhattisgarh)   

टेक्नॉलॉजी लोकतांत्रिक अधिकारों को दे रही है एक अभूतपूर्व ताकत...

30 जुलाई 2026  

 

इन दिनों मोबाइल फोन के वीडियो-कैमरों, और सीसीटीवी कैमरों की मेहरबानी से, फिर मोबाइल फोन की कॉल रिकॉर्डिंग से, नेताओं और अफसरों की तरह-तरह की बददिमागी सामने आती है। फिर दूसरी मेहरबानी सोशल मीडिया की है जिसकी वजह से बिना किसी खर्च से ऐसी सनसनीखेज बातें चारों तरफ फैल जाती हैं। इनमें से अधिकतर बातों को देखकर यह लगता है कि अगर यह वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग न होती, तो कोई इन बातों पर भरोसा भी नहीं करते, और सरकार या अदालत को कोई कार्रवाई भी नहीं करनी पड़ती। अब तो मजबूरी में कभी-कभी लोग ऐसी रिकॉर्डिंग में फंस जाते हैं। यह देखकर लगता है कि निजी जिंदगी के मुद्दों को छोडक़र बाकी हर तरह की सार्वजनिक, या सरकारी बातों की रिकॉर्डिंग क्यों नहीं हो जानी चाहिए? 

विकसित और लोकतांत्रिक देशों में पुलिस के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे अपनी यूनिफॉर्म के सामने एक कैमरा टांगकर रखें, जो कि उनकी कार्रवाई की रिकॉर्डिंग करता चले। कई जगहों पर ऐसी रिकॉर्डिंग पुलिस कंट्रोलरूम तक लगातार जाती भी रहती है, और अगर पुलिस कोई ज्यादती करती है, तो वह भी तुरंत ही कंट्रोलरूम में दर्ज होती जाती है। भारत के कुछ प्रदेशों में पुलिस के लिए ऐसे कैमरे लिए गए, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करने से पुलिस बचती रही, और कई प्रदेशों में ये कैमरे एक बार भी इस्तेमाल हुए बिना खत्म हो गए। लेकिन हम महज जंतर-मंतर के प्रदर्शन और उस पर पुलिस कार्रवाई की बात नहीं कर रहे, जहां कहीं भी पुलिस कार्रवाई होती है, या सरकारी दफ्तर में अफसरों और बाबुओं का जो बर्ताव होता है, वह रिकॉर्ड करने में क्या हर्ज है? सरकारी दफ्तरों, अदालतों, या म्युनिसिपलों और पंचायतों में भी लोगों से बड़ी बदसलूकी होती है, ऐसे में अगर लोगों को यह हक रहे कि वे अपनी बातचीत की रिकॉर्डिंग कर सकें, तो सरकारी व्यवहार सुधर जाएगा। आज बहुत कम लोग ऐसे हैं जो होशियारी से इस तरह की रिकॉर्डिंग कर लेते हैं, अधिकतर लोग तो इतना हौसला नहीं जुटा पाते, क्योंकि सरकारी अधिकारी-कर्मचारी हों, या निर्वाचित नेता हों, वे रिकॉर्डिंग देखते ही हमला करने लगते हैं, बहुत से लोगों के मोबाइल फोन तोड़ दिए जाते हैं, रिकॉर्डिंग मिटा दी जाती है। 

हमारा यह मानना है कि निजी जिंदगी की बातों को छोडक़र सरकार से औपचारिक बातचीत के सिलसिले की रिकॉर्डिंग की एक कानूनी छूट रहनी चाहिए। और यह छूट सिर्फ राजा और प्रजा के बीच नहीं रहनी चाहिए, राज्य के अपने ढांचे के भीतर भी अगर कोई सत्तारूढ़ नेता, या अफसर किसी मातहत को कोई निर्देश देते हैं, तो दोनों ही पक्षों को उसकी रिकॉर्डिंग की औपचारिक अनुमति रहनी चाहिए। यह होने से गलत काम के लिए कहना भी बंद हो जाएगा, और किसी जांच की नौबत आने पर ऐसी रिकॉर्डिंग सुबूत के तौर पर काम भी आएगी। आज हालत यह रहती है कि सरकार के ढांचे में ऊपर बैठे लोग अपने मातहत लोगों से जुबानी निर्देश देकर ही अधिकतर काम करवा लेते हैं, और फाइलों पर वैसे आदेश करने से बचते हैं। यह सिलसिला बदलना चाहिए। आज जब टेक्नॉलॉजी ने पारदर्शिता और लोकतंत्र के कुछ नए पैमाने तय करने की सहूलियत दी है, तो फिर उसका इस्तेमाल करना चाहिए। आज इस लोकतंत्र की बड़ी-बड़ी अदालतों की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग होती है, संसद या विधानसभाओं की कार्रवाई की पूरी रिकॉर्डिंग होती है, फिर चाहे इन सबमें से कुछ चुनिंदा का प्रसारण होता हो, और बाकी रिकॉर्ड में रहती हो। ऐसा ही पुलिस की कार्रवाई में भी होना चाहिए, और अगर पुलिस कोई ज्यादती नहीं करती है, तो यह उसके अपने बचाव में एक सुबूत की तरह काम आएगी। 

सुप्रीम कोर्ट ने देश के हर थाने में सीसीटीवी कैमरे लगवाने का आदेश दिया था, और कमोबेश हर राज्य उस पर अमल भी कर रहे हैं। अब ऐसे कैमरों की क्षमता और पहुंच को बढ़ाने के लिए भी कहा गया है, और उसके लिए केन्द्र सरकार भी राज्यों की आर्थिक मदद कर रही है। कुल मिलाकर टेक्नॉलॉजी 21वीं सदी की सबसे बड़ी, और सबसे भरोसेमंद गवाह बन रही है, सुबूत बन रही है। सार्वजनिक जगहों पर लगे कैमरों के अलावा थानों के भीतर भी कैमरे लग रहे हैं, और अस्पतालों, या दूसरी सार्वजनिक आवाजाही की जगहों पर भी। इन सबका फायदा समाज को मिल रहा है। अभी मुम्बई में सत्तारूढ़ पार्टी का एक पार्षद एक सरकारी अस्पताल में घुसकर डॉक्टर और महिला कर्मचारियों को पीटता हुआ रिकॉर्ड हुआ, तो उसकी गिरफ्तारी भी हुई, और हाईकोर्ट ने उसे जमानत देने से भी इंकार कर दिया। 

टेक्नॉलॉजी अगर निजी जिंदगी की निजता में दखल नहीं दे रही है, तो फिर सार्वजनिक जीवन में एक सुबूत के तौर पर वह एक बड़ा पुख्ता औजार है, और किसी जुर्म के खिलाफ तो वह एक कानूनी हथियार भी है। आज भी लोगों के बीच हो रही हिंसा, कोई सडक़ हादसा, किसी और तरह का जुर्म, इन सबको रिकॉर्ड करने के लिए कैमरों जैसे उपकरण बड़े मददगार हो रहे हैं, और वे अगर नहीं रहते, तो पुलिस न कई तरह के जुर्म सुलझा पाती, और न ही अदालत में किसी को मुजरिम साबित कर पाती। देश के कानून में तो ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल जायज है, लेकिन सरकार के भीतर, सरकारे के ढांचे के लोगों के बीच भी इसकी एक औपचारिक इजाजत होनी चाहिए, जिसके बिना इसे अभी भी चोरी-छिपी रिकॉर्डिंग, या स्टिंग ऑपरेशन माना जाएगा, और उसे शासकीय सेवक के आचरण के खिलाफ दर्ज किया जाएगा। इसे पूरी तरह औपचारिक और कानूनी बना देने की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 30 जुलाई 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

सुप्रीम कोर्ट के एक शब्द से बिल से निकले तिलचट्टे, और आज का अदालती रूख

 29 जुलाई 2026  

 

जंतर-मंतर को लेकर पहले तो पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट तुरंत कुछ सुनना नहीं चाहती थी, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की एक जुबानी टिप्पणी चारों तरफ घूमती रही कि उनके पास इस जुबानी जिक्र को सुनने को समय नहीं है, बाद में उन्होंने मीडिया की रिपोर्टिंग को गलत करार दिया, और कहा कि उनके सामने कोई याचिका नहीं आई थी, एक वकील ने सिर्फ जिक्र किया था जिस पर वे सुनवाई नहीं कर सकते थे। इस तरह वे भारत के ऐसे पहले मुख्य न्यायाधीश हो गए हैं जिन्हें दस हफ्तों के भीतर अपनी जुबानी टिप्पणियों के लिए दो बार मीडिया पर गलतबयानी की तोहमत लगानी पड़ी। अब जब जंतर-मंतर पर, और संसद की राह पर दिल्ली पुलिस ने निहत्थे और लोकतांत्रिक आंदोलनकारियों पर जो हमले किए, जिस तरह से लाठियों से उनके सिर और पैर तोड़े, जिस तरह पैलेट गन के छर्रे लोगों के बदन में घुसे मिल रहे हैं, और जिस तरह बिहार में एके-47 नाम की असॉल्ट रायफल से पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर गोलियां चलाई हैं, उन सब पर जब बहुत से लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, तब सुप्रीम कोर्ट ने उसे सुनना तय किया, दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा, लेकिन राहत महज इतनी दी कि जिन बेदाग लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उन्हें छोड़ा जाए। 

अब किसी आंदोलन में शामिल लोगों में बेदाग किसे करार दिया जाए? किसी की अपने पड़ोसी से कोई झड़प हुई हो, और पुलिस में एक मामला दर्ज हो, किसी का सडक़ पर किसी से झगड़ा हुआ हो, और उसका मामला दर्ज हो, तो वह भी पुलिस की जुबान में बेदाग नहीं कहलाएगा। देश की राजधानी में कई विश्वविद्यालय हैं, और लाखों छात्र पढ़ते हैं, ऐसे में छात्र आंदोलन चलते ही रहते हैं, किसी और आंदोलन में जिन लोगों के खिलाफ पुलिस ने जुर्म दर्ज कर लिया होगा, उन लोगों को भी पुलिस अब बेदाग मानने से इंकार कर देगी। सुप्रीम कोर्ट का एक शब्द सैकड़ों-हजारों नौजवानों पर भारी पड़ सकता है, और जो दिल्ली पुलिस छात्रों पर पैलेट गन चला रही है, छात्राओं  के बदन में लाठी घुसा रही है, महिला को थप्पड़ मार रही है, वह पुलिस हर किसी को दागदार साबित करने पर जुट जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि पहले किसी के खिलाफ कोई मामला दर्ज रहा होगा, लेकिन वे अगर जंतर-मंतर पर शांत हैं, तो उन्हें बेदाग होने की शर्त से क्यों लादा जा रहा है? यह तो सुप्रीम कोर्ट इनकी बातों को सुनता भी नहीं, लेकिन जब बड़े-बड़े वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के अहाते में ही कैमरों के सामने खड़े होकर छात्रों के मुद्दों का समर्थन किया, आंदोलन के लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकार को गिनाया था, और यह सब करने के बाद राष्ट्रगान भी गाया था, तो वकीलों का यह रूख देखकर चीफ जस्टिस का एक-दो दिन पहले का रूख पिघला, और इस बार छात्रों पर जुल्म करने वाली दिल्ली पुलिस पर सुनवाई हुई। यह तो अदालत के बाहर भी अभी साबित हो चुका है कि राजधानी के एक बड़े पुलिस अफसर के आदेश पर आंदोलनकारियों पर पैलेट गन चलाई गई थी, जो कि शायद सरकार के ही नियमों के खिलाफ थी। यह तो अगर आंदोलनकारियों के बदन को छलनी की तरह छेदने वाले छर्रों के फोटो और वीडियो मौजूद नहीं रहते, खोजी पत्रकारों ने अगर पुलिस का यह आदेश ढूंढ नहीं निकाला होता, तो पुलिस तो पैलेट गन की बात मानने को तैयार ही नहीं थी। 

सुप्रीम कोर्ट का रूख बहुत ही निराश करता है। जजों के अपने राजनीतिक पूर्वाग्रह हो सकते हैं, चीफ जस्टिस को इस बात का मलाल हो सकता है कि उनके कहे हुए एक शब्द, कॉकरोच को लेकर इस देश के इतिहास का एक खासा बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया, और इस आंदोलन के चलते हर दिन देश और दुनिया इस बात का जिक्र भी कर रहे हैं कि यह तिलचट्टा किस बिल से निकला है। आमतौर पर आंदोलनों को सरकारें कुचलने की कोशिश करती हैं, और अदालतें उनमें आंदोलनकारियों के अधिकार बचाने की। इस बार उल्टा हुआ है, आंदोलनकारियों को पहली राहत सरकार से मिली है, उसकी चाहे जो भी वजह रही हो, और सुप्रीम कोर्ट उसी शहर में बैठे हुए भी शांतिपूर्ण, निहत्थे, लोकतांत्रिक आंदोलनकारी नौजवानों को कोई भी राहत देने में पिछड़ गया। अब जब खींचतान कर सुप्रीम कोर्ट इस आंदोलन में गिरफ्तार लोगों के बारे में सुनवाई कर भी रहा है, एक राहत सी दिखती हुई कोई चीज दे भी रहा है, तो भी वह बेदाग लोगों को ही छोडऩे की एक ऐसी शर्त जोड़ रहा है जिसका बेजा इस्तेमाल करने का भरपूर मौका और अधिकार दिल्ली पुलिस को मिल जाएगा। इतने जुल्म ढाने वाली दिल्ली पुलिस के हाथ में इस तरह का एक हथियार देना सुप्रीम कोर्ट की एक गलत उदारता है, और आंदोलनकारी कॉकरोच जनता पार्टी ने यह आपत्ति ठीक ही की है कि ऐसी शर्त जोडक़र सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का साथ दिया है। यह बड़ी अजीब सी नौबत है कि एक तरफ सरकार आंदोलनकारियों से बातचीत का लोकतांत्रिक तरीका दिखाकर अपने मंत्री का इस्तीफा ले रही है, और दूसरी तरफ अदालत इन्हीं आंदोलनकारियों में से बहुत से लोगों के खिलाफ कड़ाई बरतने का हथियार पुलिस को दे रही है।

हिन्दुस्तान की अदालतों को कॉकरोच या तिलचट्टा शब्द से एक जाहिर परहेज हो सकता है, लेकिन ऐसा परहेज अगर अदालती रूख में झलकेगा, तो इससे अदालत का कोई लोकतांत्रिक सम्मान नहीं बढऩे जा रहा। हम अदालत को संविधान से परे सिर्फ जनभावनाओं पर काम करने जैसी कोई बात नहीं सुझा रहे, लेकिन जब सत्ता की पूरी ताकत किसी भी निहत्थे और शांत आंदोलनकारियों पर टूट पड़ती है, तो लोकतंत्र तो अदालत की तरफ ही देखता है कि वह अपनी जिम्मेदारी पूरी करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बड़ा निराश किया है। बहुत देर से इस मामले को सुना है, और बहुत कम राहत दी है। टू लेट, एंड टू लिटिल। लोकतंत्र में संसद, अदालत, और सरकार के बीच शक्तियों का संतुलन इसीलिए बनाया गया था कि जब कभी इनमें से कोई एक बददिमाग हो जाए, तो बाकी दो के पास उसे काबू में करने की ताकत रहे। इस मामले में भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था कम से कम कागजों पर तो अमरीका के आज के बददिमागी के शिकार लोकतंत्र के मुकाबले बहुत अच्छी है, दूसरी तरफ वह ब्रिटेन के शाही घराने से ग्रस्त लोकतंत्र से भी बहुत अच्छी है। लेकिन यह तभी अच्छी है, जब लोकतंत्र के ये तीनों स्तंभ अपनी-अपनी जगह पर रीढ़ की हड्डी ठीक से सीधी रखकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करें। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो फिर इस लोकतंत्र में संतुलन तीनों में से किसी एक स्तंभ की तरफ झुक जाने का खतरा रहता है, अमूमन सरकार की तरफ। भारत की न्यायपालिका को देश की जनता को इतना निराश नहीं करना चाहिए कि वह लोकतंत्र की रक्षा करने में अपनी जिम्मेदारी भी नहीं निभा पा रही है। 

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 29 जुलाई 2026


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दीवारों पर लिक्खा है, 28 जुलाई 2026


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जंतर-मंतर की लड़कियों से गैंगरेप सुझाने वाला विचारक!

28 जुलाई 2026  

 

ठीक जिस समय आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत समलैंगिकों के प्रति सहनशीलता रखने की बात कर रहे थे, और यह मान रहे थे कि एलजीबीटीक्यू लोगों में से कुछ को प्रकृति ने ही वैसे बनाए हैं, ठीक उसी समय केरल के आरएसएस के एक बड़े पुराने, बुजुर्ग, और प्रमुख विचारक टी.जी.मोहनदास कह रहे थे कि उनके काबू में होता, तो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं पर गोलियां चला देते, और वे जब मर जाते, तो उन्हें अस्पताल पहुंचा देते। यही नहीं उन्होंने इस आंदोलन में शामिल लड़कियों और महिलाओं के लिए कहा कि इस प्रदर्शन में आने वाली महिलाओं को गैंगरेप से भी फर्क नहीं पड़ता क्योंकि ये लोग बलात्कार पसंद करती हैं। उन्होंने अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो पोस्ट करके ये बातें कहीं, और कहा कि वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतंत्र पर भरोसा रखने वाली ये आंदोलनकारी महिलाएं बलात्कार पसंद करती हैं। इस बयान से आरएसएस ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा कि वह ऐसे बयानों की कड़ी निंदा करता है। संघ ने यह भी कहा कि मोहनदास अभी संघ में किसी जिम्मेदारी के पद पर नहीं है। लेकिन इसके पहले का मोहनदास का परिचय बताता है कि वे आरएसएस के कई संगठनों में अलग-अलग पदों पर रह चुके हैं, और भाजपा के भी बौद्धिक प्रकोष्ठ के केरल राज्य संयोजक थे। वे इसके पहले भी हिन्दुत्व के मुद्दों को लेकर अदालती लड़ाई भी लड़ते रहे हैं। वे लगातार लिखते हैं, और उनके लेख संघ परिवार के प्रकाशनों में छपते रहते हैं। 

ये बुजुर्ग विचारक तो इन बातों को कैमरे के सामने यूट्यूब पर बोलकर उजागर हो गए हैं, लेकिन लोग तरह-तरह से आंदोलनकारियों के खिलाफ हिंसक बातें कर रहे हैं। एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने पहले वीडियो में आंदोलनकारियों को शांत कर रहे हैं, दूसरे वीडियो में उनका आभार मान रहे हैं, सरकार के बड़े-बड़े मंत्री आंदोलनकारियों से बातें कर रहे हैं, उनका अनशन खत्म करवा रहे हैं, उनकी मांग पूरी करते हुए अपने मंत्री का इस्तीफा ले रहे हैं, दूसरी तरफ सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी, या उसके हमखयाल लोगों की प्रतिक्रिया अब तक बहुत ही अश्लील और हिंसक तरीके से जारी है। एक तरफ तो इतने बड़े आंदोलन के सामने सरकार को, कम से कम सार्वजनिक रूप से तो झुकना पड़ा, और परदे के पीछे की कोई नूरा कुश्ती रही होगी, तो हम अभी परदा हटाकर देख नहीं सकते, दूसरी तरफ सरकार के साथी या हिमायती माने जाने वाले लोग आंदोलनकारियों के बारे में जिस जुबान में बातें कर रहे हैं, उनसे सरकार का ही बड़ा नुकसान हो रहा है। अगर ये लोग गोलियों से मार डालने लायक थे, अगर इस आंदोलन की लड़कियां और महिलाएं सामूहिक बलात्कार के लायक थीं, अगर ये लोग देशद्रोही हैं, गद्दार हैं, पाकिस्तानी एजेंट हैं, तो फिर सरकार ने इनसे बात क्यों की थी? एक तरफ तो सरकार ने वक्त रहते इस आंदोलन को सुलझाने की, लचीलापन दिखाने की वाहवाही पाई है। दूसरी तरफ इस आंदोलन की आग अभी पूरी तरह बुझी नहीं है कि लुके-छिपे अंदाज में ये खबरें आ रही हैं कि दिल्ली और बिहार में आंदोलनकारियों पर कितने किस्म के जुर्म दर्ज किए जा रहे हैं। सरकारी एजेंडे पर सार्वजनिक रूप से बोलने वाले अश्लील और हिंसक बातें कर रहे हैं। इससे सरकार ही कमजोर साबित हो रही है कि अगर आंदोलनकारी इतने ही बुरे और घटिया थे, तो सरकार उनसे बात करके उनकी मांगों पर झुकी क्यों? और मंत्रियों से इस्तीफा न लेने की अपनी परंपरा को छोड़ा क्यों? अभी तो रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का वह वीडियो चारों तरफ तैर ही रहा है जिसमें वे कहते दिख रहे हैं कि यह यूपीए सरकार नहीं है, इसमें मंत्रियों के इस्तीफे नहीं होते। 

अब सरकार की फजीहत, और आंदोलनकारियों को अपमानित करके उकसाने से परे की बात अगर हम करें, तो केरल के इस हिन्दुत्व-आंदोलनकारी बुजुर्ग के बारे में भी सोचने की जरूरत है। यह लगातार संघ के संगठनों के ओहदों पर रहा, संघ के प्रकाशनों में लिखता रहा, और उम्र के इस पड़ाव पर आकर अगर वह ऐसी हिंसक और अश्लील बातें कर रहा है, तो इस विचारधारा के लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि सारी उम्र इसमें गुजार देने के बाद भी इस आदमी की सोच ऐसी है, तो दिक्कत कहां पर है? किसी भी संस्था, संगठन, या विचारधारा के लिए यह परले दर्जे की शर्मिंदगी की बात रहती है कि उसे अपने एक सबसे ही सक्रिय बुजुर्ग को धिक्कारना पड़े, उसकी कड़ी निंदा करनी पड़े। ऐसा संगठन के या विचारधारा के कोई नए लोग करें, तो भी समझ पड़ता है। जब संगठन के अपने इलाके के भीष्म पितामह ऐसा करने लगें, तो सारे कुल का अपमान होता है। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत हर कुछ हफ्तों-महीनों में उदारता की कोई एक बात कहकर खबरों में रहते हैं, लेकिन इस दर्जे की अलोकतांत्रिक और हिंसक बात कहने वाले उनके अपने पुराने स्तंभों की सोच पर संगठन को कुछ और विचार भी करना चाहिए। जिस भारत में देश की प्रतीक ही भारतमाता कही जाती है, जहां पर देवियों की प्रतिमाओं की पूजा की परंपरा देश भर में है, वहां पर जीती-जागती छात्राओं को सामूहिक बलात्कार का मजा लेने वाली कहना सिर्फ निंदा और धिक्कार से दब जाने वाली बात नहीं है। इस बारे में केरल के किसी पदाधिकारी से ऊपर भी संघ के किसी को कुछ, कुछ अधिक कहना चाहिए। 

देश में जिस पार्टी, संगठन, या विचारधारा के समर्थक या अनुयायी लोकतंत्र के खिलाफ, देश के संविधान के खिलाफ, मानवता के खिलाफ बातें करते हैं, उनके खिलाफ धिक्कार उनके घर से निकलना चाहिए। ऐसे लोगों की निंदा बाकी समाज को करनी पड़े, और ये लोग खुद चुप बैठे रहें, तो इस चुप्पी से इनका सम्मान नहीं बढ़ता। अभी जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारी नौजवानों में से कुछ के पोस्टर लोगों को बहुत बुरे लगे कि उनमें प्रधानमंत्री या दूसरे नेताओं के लिए अलग-अलग किस्म की गालियां इस्तेमाल की गई थीं। हजारों लोगों ने गालियों की इस जुबान को जमकर कोसा, और उसके जवाब में उससे भी गंदी गालियां भी दे डालीं। लेकिन इसी मौके पर कई लोगों ने यह भी याद दिलाया कि लोकसभा के भीतर भाजपा का एक सांसद जब एक दूसरे मुस्लिम सांसद को देशद्रोही और आतंकी कह रहा था, उसके धर्म का नाम लेकर गंदी, अश्लील, और हिंसक गालियां बक रहा था, तब हर्षवर्धन, और रविशंकर प्रसाद नाम के दो भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री उसके अगल-बगल बैठे मजा ले रहे थे, जोर-जोर से हँस रहे थे। अब जंतर-मंतर के नौजवानों ने इतनी गालियां कहां से सीखीं, तो इसके जवाब में लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि लोकसभा में भाजपा के सांसद रमेश विधुड़ी की दी हुई गालियां सुनकर नौजवानों ने भी अपनी गालियों को संसदीय माना। 

गंदी मिसालें किसी संगठन, संस्था, विचारधारा का सम्मान नहीं बढ़ातीं, बल्कि विरोधियों के लिए एक मिसाल छोड़ जाती हैं, और देश की जनता में जो सभ्य हिस्सा है, उसके बीच सम्मान खत्म करवा देती हैं। जो विचारधारा अपने आपको महान बताए, उसे तो अपने लोगों पर बेहतर काबू रखना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र में गंदगी का सिलसिला खत्म करना चाहिए। अगर किसी को यह लगता है कि ताजा आंदोलनकारी पीढ़ी, जेन-जी किसी की दी हुई गंदी गालियों को सुनकर चुप रह जाएगी, तो उन्हें इस खुशफहमी से बाहर आ जाना चाहिए। यह पीढ़ी इस मोहनदास की बुढ़ापे की इज्जत को ठिकाने लगाने की ताकत अपनी चुटकियों पर रखती है। इस आदमी को लड़कियों के गैंगरेप की बात करने के पहले इतना तो सोचना था कि इसके माँ-बाप ने इसका नाम मोहनदास करमचंद गांधी की तरह मोहनदास रखा था, किसी और बात की, अपने संगठन की इज्जत न भी रखनी होती, तो भी कम से कम गांधी के नाम की इज्जत तो रखनी थी। हालांकि सब कुछ जानते हुए हमें यह उम्मीद करनी नहीं चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 27 जुलाई 2026


(Daily Chhattisgarh)




 

अपने दिल-दिमाग के स्पंज को निचोडक़र जगह बनाएं

27 जुलाई 2026  

 

जंतर-मंतर के छात्र और नौजवान आंदोलन की वजह से एक बार फिर इस देश में गालियों, अश्लील टिप्पणियों, या उनके जवाब में हिंसक धमकियों, अश्लील बातों का सैलाब आया हुआ है। हमें तो अखबार के धंधे की वजह से खबरों को लगातार पढऩा पड़ता है, बहुत से वीडियो भी देखने पड़ते हैं, खासकर ऐसे जो कि टीवी की मिलावट से परे के, सोशल मीडिया के खालिस वीडियो रहते हैं। इन सबको देखते महीना हो रहा है, और अब दिमाग कुछ भारी होने लगा है, मन उचटने लगा है। ऐसा लगने लगा है कि चाहे कितना ही जमीनी मुद्दों का आंदोलन क्यों न हो, उसे लेकर नकारात्मकता कितनी झेली जा सकती है? यह तो आंदोलन में कई सकारात्मक बातें थीं, इसलिए उसे लगातार देखते चलने की दिलचस्पी भी थी, लेकिन आंदोलन पर हमला करने वाले लोग इसे साम्प्रदायिकता की हद तक ले जा रहे थे, वह नकारात्मकता बहुत भारी पड़ रही थी। इसलिए आज किसी भी एक आंदोलन से परे, किसी भी आंदोलन से परे, बात असल जिंदगी में सकारात्मकता, और नकारात्मकता की। 

आज लोग अगर जरा सी भी ऑनलाइन जिंदगी जीते हैं, तो वे सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने, या कम से कम उसे देखते चलने के लिए मजबूर रहते हैं। जो लोग सोशल मीडिया पर मौजूद नहीं रहते, वे एक किस्म से अपने दायरे और तबके के लिए असामाजिक प्राणी हो जाते हैं। ऐसे में लोगों के दायरे में जो लोग रहते हैं, उन्हीं का लिखा हुआ, पोस्ट किया हुआ, या मैसेंजरों पर फारवर्ड किया हुआ अधिक पढऩे और देखने में आता है। नतीजा यह है कि असल जिंदगी में जो स्थितियां आती हैं, उनमें सकारात्मक और नकारात्मक का जो अनुपात रहता है, उससे बिल्कुल अलग अनुपात लोगों की ऑनलाइन जिंदगी में हो सकता है, होता है। असल जिंदगी में अधिकतर लोगों की अब तक की पूरी जिंदगी में जिन लोगों से नफरत करने की कोई वजह नहीं रहती, ऑनलाइन यह लगने लगता है कि ये लोग तो नफरत के लायक हैं! और ऑनलाइन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जब मैसेंजर सर्विसों के साथ मिलकर एक मिला-जुला औजार बनकर लोगों के हाथ लग जाते हैं, तो फिर लोग उसका मनमर्जी इस्तेमाल करने लगते हैं। दुनिया में स्विस आर्मी चाकू बड़ा मशहूर है। एक ही चाकू में दर्जन-दो दर्जन किस्म के अलग-अलग जरूरी औजार रहते हैं, जो कि एक किस्म की मिनी टूल किट रहते हैं। सोशल मीडिया और मैसेंजर मिलकर लोगों के हाथ कुछ इसी तरह का स्विस आर्मी नाइफ बन जाते हैं, एक ही साथ कई किस्म के औजार, और कई किस्म के हथियार भी।

ऐसे में हमें लगता है कि लोगों को अपनी असल जिंदगी की असल घटनाओं के अनुपात के साथ-साथ ऑनलाइन जिंदगी, या संदेशों पर भी सकारात्मक और नकारात्मक का एक अनुपात बनाए रखना चाहिए। इन दिनों बड़े तो बड़े, छोटे-छोटे बच्चे भी सडक़ों पर जिस तरह की हिंसक और नफरती बातें करते दिखते हैं, वह उन पर सोशल मीडिया, और मैसेंजरों से प्रभावित बड़े लोगों का असर भी दिखता है, और अब तक भारत में नाबालिगों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कोई रोक तो लगी नहीं है, इसलिए बच्चे खुद भी सोशल मीडिया और मैसेंजरों की नकारात्मकता से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। हम सिर्फ हिंसक, अश्लील, या साम्प्रदायिक बातों की बात नहीं कर रहे, इनसे कम प्रभावित होने पर भी लोगों के दिल-दिमाग पर एक निरंतर-नकारात्मकता का जो असर होता है, उसके खतरे भी समझना जरूरी है। हमने दुनिया के कुछ मनोवैज्ञानिकों की इस बारे में कही और लिखी गई बातों से समझने की कोशिश की। उनका कहना है कि भावनाएं भी संक्रामक होती हैं, जैसे हँसी फैलती है, वैसी ही गुस्सा, भय, नफरत, और निराशा भी फैलती हैं। लगातार क्रोध, अपमान, और षडय़ंत्र की भाषा सुनने-पढऩे वाले लोग भी धीरे-धीरे उसी भावनात्मक वातावरण में जीने लगते हैं। दूसरी बात मानव मनोविज्ञान के साथ यह है कि लोगों के मन में एक नकारात्मकता-पूर्वाग्रह रहता है, यानी इंसानी दिमाग बुरी खबरों पर अच्छी खबरों के मुकाबले अधिक तेजी से प्रतिक्रिया देता है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर गुस्से, अपमान, डर, और नफरत वाली पोस्ट अधिक ध्यान खींचती है, दिमाग उन्हें अधिक देर तक याद रखता है। फिर एक और मनोवैज्ञानिक तथ्य यह है कि इंसानी दिमाग एक प्रतिध्वनि-कक्ष भी रहता है। यदि कोई व्यक्ति सिर्फ अपनी तरह सोचने वाले लोगों को पढ़ते, और सुनते हैं, तो धीरे-धीरे उन्हें लगने लगता है कि पूरी दुनिया उन्हीं की तरह सोचती है, और इससे उनकी असहमति सहने की क्षमता कम होती जाती है। सामाजिक मनोविज्ञान का एक और बहुत मजबूत सिद्धांत समूह-ध्रुवीकरण है। जब समान विचार वाले लोग बार-बार एक-दूसरे से बातचीत करते हैं, तो वे अपनी धारणाओं और मान्यताओं के लिए पहले से अधिक कट्टर हो जाते हैं, मानो करेला नीमचढ़ा भी हो गया। मनोविज्ञान कहता है कि ऐसे दस लोग हल्की नाराजगी लेकर भी बैठे हों, तो लगातार एक-दूसरे की बात सुनते-सुनते वे गुस्से की पराकाष्ठा तक पहुंच सकते हैं। मनोविज्ञान का एक और सिद्धांत कहता है कि यदि कोई व्यक्ति पूरे वक्त सिर्फ जुर्म, हिंसा, धर्म, साजिश, और नफरत की पोस्ट पढ़ते हैं, तो उन्हें लगता है कि पूरी दुनिया सिर्फ इन्हीं चीजों से भरी हुई है। वास्तविकता नहीं बदलती, लेकिन लोगों की मानसिक सोच उसके बारे में बदल जाती है। फिर इसके बाद एक खतरनाक चीज और बाकी है। आज सोशल मीडिया के भीतर जो एल्गोरिद्म काम करता है, वह लोगों की दिलचस्पी देखकर उसी किस्म के कंटेंट और दिखाता है। अगर किसी ने दस नफरती वीडियो देखे, तो प्लेटफॉर्म आपको ग्यारहवां भी वैसा ही दिखाएगा, और इस तरह कोई व्यक्ति एक मानसिक सुरंग में पहुंच सकते हैं, जिसमें चारों तरफ और कुछ नहीं दिखता, सुरंग के अलावा। 

ये मनोवैज्ञानिक सिद्धांत ढूंढते-ढूंढते अंत में एआई, चैटजीपीटी ही हमें सुझा रहा है कि आपके संपादकीय के लिए, या साप्ताहिक कॉलम के लिए यह लाईन अच्छी रहेगी- ‘मनुष्य केवल अपने खानपान से नहीं बनते, वे अपने पढऩे, सुनने, और साथ रहने वालों से भी बनते हैं। यदि कोई रोज नफरत खाते हैं, तो एक दिन उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि वे कभी इंसानियत भी खाया करते थे। शरीर का डीएनए माता-पिता से मिलता है, लेकिन दिमाग का डीएनए बहुत हद तक उन लोगों से बनता है जिन्हें हम हर दिन पढ़ते हैं, सुनते हैं, और अपना मानते हैं।’ एआई ने एक दिन पहले के हमारे अखबार की सामग्री को देखकर भी ये बातें सुझाई हैं, क्योंकि उसे मालूम है कि इस अखबार की सोच क्या है। जब कृत्रिमबुद्धि पर भी हमारी लगातार बातचीत का ऐसा असर होता है, तो मानवबुद्धि पर भी ऐसा ही असर होता होगा। हममें से हर किसी को बड़ा सावधान रहना होगा कि अपनी मानसिक सेहत को किस तरह ठीक रखें, किस तरह नकारात्मकता से दूर रहें। आज सोशल मीडिया, मैसेंजर, और एआई के जमाने में यह पहले के मुकाबले अधिक मुश्किल भी है कि नकारात्मकता से दूर रहा जाए। इसके लिए लगातार कोशिश करनी होगी, और सिर्फ सकारात्मक चीजों को देखते चलने से आपका सोशल मीडिया अकाउंट आपको धीरे-धीरे अधिक सकारात्मक चीजें दिखाने भी लगेगा। हम कभी-कभी लोगों के दिल-दिमाग की तुलना एक स्पंज से करते हैं, जो कि कहीं बिखरे हुए पानी को सोखने के लिए भी इस्तेमाल होता है। इंसानी दिल-दिमाग भी एक स्पंज जैसा है, वह अगर अपनी पूरी क्षमता का सोख चुका रहता है, तो फिर वह और कुछ नहीं समा सकता। इसलिए अगर हमारे दिल-दिमाग नकारात्मकता से लबालब हो जाएंगे, तो फिर सकारात्मकता के लिए उसमें जगह भी नहीं बचेगी। ऐसे में इस स्पंज को दबाकर पूरी तरह निचोड़ देना जरूरी है, ताकि नकारात्मकता निकल जाए, और सकारात्मकता के लिए कुछ जगह खड़ी हो। एक वक्त कहा जाता था कि लोगों को बुरी संगत से बचना चाहिए, आज टेक्नॉलॉजी के इस जमाने में असल जिंदगी की संगत तो सबकी घट गई है, लेकिन आभासी दुनिया में सोशल मीडिया, और ऑनलाइन की संगत बढ़ गई है, उसे भी देख-समझकर सावधानी से छांटने की जरूरत है, ठीक उसी तरह जैसे कि किसी पेड़ के ठीक विकास के लिए उसकी गैरजरूरी डालियों को काटा जाता है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 26 जुलाई 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

न्यायपालिका को नसीहत, इस बार घर के भीतर से

26 जुलाई 2026  

 

किसी भी देश में वहां का सुप्रीम कोर्ट इस बात का एक सुबूत, संकेत, और नमूना रहता है कि देश में आजादी और इंसानियत का क्या हाल है। अमरीका में तो आम जनता की आजादी एक अलग ऊंचे दर्जे की है, और वहां पर किस राष्ट्रपति ने किस जज को मनोनीत किया है, किस जज ने पहले क्या-क्या फैसले दिए हैं, उन सब पर खुली चर्चा होती है। लोग खुलकर जजों के नाम के साथ यह लिखते हैं कि वे प्रगतिशील हैं, उदारवादी हैं, या संकीर्णतावादी, दकियानूसी हैं। किसी बड़ी बेंच के जजों को लेकर यह गिनती भी लगा ली जाती है कि उसमें दकियानूसियों का अल्पमत है, या बहुमत है। इसे वहां कोई बुरा नहीं मानते। लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसा मुमकिन नहीं है। हर जज अपने आपको ईमानदार, निष्पक्ष, तटस्थ बताना चाहते हैं, और उनके इन पहलुओं पर सवाल उठाने का, इन पर चर्चा करने का यहां रिवाज भी नहीं है। ऐसे में जब बहुत से जज मानो आजादी की सालगिरह की परेड में सत्ता के साथ कदमताल करते दिखते हैं, तो भी आम जनता के लिए कुछ कहने का कुछ नहीं रह जाता, कुछ करने का तो बिल्कुल रहता ही नहीं है। ऐसे में कभी-कभी जब कोई जज अदालत में अपनी जुबानी बात से, या अदालत के बाहर किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में, या इंटरव्यू में कोई उदारवादी बात कहते हैं, तो एकदम से लगता है कि अरे, आजादी अभी इतनी बाकी है। 

सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज, उज्जल भुइयां ने अभी एक कार्यक्रम में बोलते हुए इस बात पर बड़ी फिक्र जताई है कि न्यायपालिका आज जमानत देते हुए किसी छात्र-कार्यकर्ता, या प्रदर्शनकारी, आंदोलनकारी को जमानत इस शर्त पर देती है कि वे सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट नहीं करेंगे, सार्वजनिक बैठकों में हिस्सा नहीं लेंगे, या बैठकों में कुछ बोलेंगे नहीं। उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा असर डालती हैं। उन्होंने कहा कि लोगों का यह पूछना पूरी तरह जायज होगा कि क्या अदालतें ऐसी शर्तें लगाकर यह संदेश दे रही हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बहस, असहमति, और विरोध उसकी आत्मा हैं, लेकिन हाल के बरसों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जहां सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों को भी आपराधिक मामलों में बदल दिया गया। 

हम अपने अखबार के इस संपादकीय कॉलम को अमूमन अपने ही विचारों के लिए रखते हैं, लेकिन कभी-कभी किसी और की कही हुई बातें हमारे अपने विचारों से तालमेल रखती हुई रहती हैं, तो हम उन्हें यहां ज्यों का त्यों लिखते हैं, और कभी-कभी वे हमारे विचारों से भी बेहतर होती हैं, तो हम उन्हें पूरे खुलासे से यहां लिखते हैं, जो कि उनसे हमारी पूरी सहमति का एक सुबूत रहता है। 

जस्टिस भुइयां ने कहा कि आजकल विश्वविद्यालयों में अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले छात्रों को गिरफ्तार किया जाता है, कई बार उन्हें 30-40 दिन तक जमानत भी नहीं मिलती, विश्वविद्यालय उन्हें निलंबित कर देते हैं, और फिर उन्हें अदालतों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि ऐसा माहौल लोकतंत्र के लिए फिक्र का सामान है। उन्होंने ऐसे मामलों का जिक्र किया जिनमें किसी व्यक्ति ने किसी मंत्री की टिप्पणी पर फेसबुक पोस्ट लिखनी, तो उसके खिलाफ एफआईआर हो गई, और जब अदालत से अग्रिम जमानत मिली, तो शर्त रखी गई कि वे फेसबुक पर कुछ पोस्ट नहीं करेंगे। जस्टिस भुइयां ने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति के भाग जाने की आशंका नहीं है, तो उसका पासपोर्ट जमा कराने जैसी शर्तें, या सोशल मीडिया पर पूर्ण रोक लगाने जैसी शर्तें कितनी न्यायसंगत है? उन्होंने कहा कि ऐसी शर्तें लोगों की मौलिक स्वतंत्रता को गंभीर रूप से सीमित कर देती हैं। 

उन्होंने एक ऐसे मामले का भी जिक्र किया जिसमें यूपी में कुछ नौजवानों को गंगा में नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित करने, और चिकन-बिरयानी खाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने कहा- ‘मुझे पूरा विश्वास है कि चिकन-बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं हैं, यदि कोई काम अपराध ही नहीं है, तो लोगों को महीनों तक जेल में कैसे रखा जा सकता है?’

उन्होंने बाम्बे हाईकोर्ट का भी जिक्र किया जहां फिलीस्तीन के समर्थन में प्रस्तावित प्रदर्शन को इजाजत नहीं दी गई थी। उन्होंने कहा कि अदालतों को लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों के अधिकार के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए। इस बार के भाषण के पहले भी जस्टिस भुइयां कुछ दूसरे मौकों पर सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि लोकतंत्र में असहमति को अपराध नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने पहले भी कहा है कि न्यायपालिका को अपने आपको राजा के प्रति, राजा से भी अधिक वफादार बनने से बचना चाहिए। 

यहां हम जिक्र करना चाहेंगे कि राजा वाली यह बात फ्रांस के 1789 की क्रांति के बाद  बड़े जोर-शोर से उठी थी। जब इसके बाद राजशाही दुबारा कायम हुई, तो राजा ने यह महसूस किया कि वक्त बदल गया है, और कई किस्म के सुधारों की जरूरत है, तो भी राजा के चाटुकारों ने उसे यह समझाने की कोशिश की कि पुरानी राजशाही की सारी सामंती बातें लागू होनी चाहिए, और इसी वक्त से यह बात लिखी जाने लगी कि कुछ लोग राजा के प्रति राजा से भी अधिक वफादार होकर दिखना चाहते हैं, दिखाना चाहते हैं। जस्टिस भुइयां की यह बात सीधे-सीधे न्यायपालिका के संदर्भ में ही कही गई थी, और सरकार की कार्रवाईयों वाले मामलों को लेकर कही गई थी, इसलिए इसमें कोई गलतफहमी नहीं है कि उन्होंने हिन्दुस्तान के जजों को यहां की सरकारों के प्रति, सरकारों से अधिक वफादार बनकर दिखाने से बचने की सलाह दी है। 

हमारा यह मानना है कि लोकतंत्र किसी पत्थर की तरह गतिहीन, गतिशून्य व्यवस्था नहीं रहता। वह तो उतरती हुई एक पहाड़ी नदी की तरह लगातार रास्ते तय करते चलता है। वह रास्ते में कहीं चट्टानों को आकार देता है, तो कहीं चट्टानें उसका रूख मोड़ती हैं। लोकतंत्र हमेशा परिवर्तनशील रहता है, वह किसी टंकी में जमा पानी की तरह काई का शिकार नहीं होता, वह बहता पानी रहता है। इसलिए समय-समय पर जब कभी किसी भी व्यक्ति की कही लोकतांत्रिक बातें पढऩे-सुनने मिलें, तो उन पर सोच-विचार भी करना चाहिए, उन्हें आगे भी बढ़ावा चाहिए। कई लोग गुडमॉर्निंग के पोस्टरों को हजारों लोगों को भेजकर दिन शुरू करते हैं, और फिर बाकी दिन में अपनी पसंद के धर्म या आध्यात्म की और कुछ घिसी-पिटी बातों को बढ़ाते रहते हैं। जब लोगों के हाथ में हजारों लोगों तक मुफ्त में कुछ भेजने का औजार है, उन्हें ऐसी बातें आगे बढ़ानी चाहिए जो उनके संपर्क के लोगों में भी लोकतांत्रिक-इंसानियत को बढ़ा सके, इंसाफ की बात कर सके। हम तो जस्टिस भुइयां की कही बातों जैसी बातों को आगे बढ़ाने के लिए अपने इस संपादकीय कॉलम का भी इस्तेमाल करते हैं, लोगों को पाखंड और कट्टरता को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए, जिंदगी के असल मुद्दों, और उदारता से भी अपने परिचितों का परिचय कराना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

हर नाजुक मौका इस देश में उजागर कर देता है बड़े-बड़े दांत-नाखून...

26 जुलाई 2026

बाकी दुनिया में बीते बरसों में क्या फर्क पड़ा है, उसका तो ठीक-ठीक अंदाज नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तान में पिछले 10-15 बरस में जब भी कोई बड़ी बात होती है, बहुत से लोगों के कई किस्म के मेडिकल टेस्ट अपने आप हो जाते हैं, और उसकी रिपोर्ट सोशल मीडिया पर आने लगती है। यह दिखने लगता है कि किन लोगों की सोच क्या है, वह किस हद तक हिंसक और आतंकी हो सकती है, किस हद तक अश्लील हो सकती है, और इन लोगों का किसी भी तर्क या इंसाफ से नाता कितना टूट चुका है, दूरी कितनी बढ़ चुकी है। हम इसे मेडिकल रिपोर्ट इसलिए कह रहे हैं कि ये अपनी मानसिक हालत, और मुजरिम सोच के सुबूत खुद ही सोशल मीडिया पर बिखेरते चलते हैं, और किसी भी जिम्मेदार, लोकतांत्रिक सरकार के लिए यह बात आसान हो सकती है कि वह अपने ऐसे नागरिकों का दिमागी, और कानूनी इलाज कर सके। अब ऐसी डॉक्टरी शायद लोकप्रिय नहीं होती, इसलिए सरकार इससे बचती है। और इस वजह से यह मानसिक रोग, और मुजरिम मानसिकता दोनों बढ़ते चलते हैं। 

फिलहाल इस पर लिखने की इसलिए सूझी कि जंतर-मंतर पर अभी-अभी निपटे तिलचट्टों, और उनके साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का जो आंदोलन निपटा है, उसने भी लाखों हिन्दुस्तानियों के छुपे हुए बड़े दांतों, और बड़े-कड़े नाखूनों को उजागर कर दिया है। एक तरफ सरकार अपने पूरे अस्तित्व की एक सबसे बड़ी चुनौती झेलते हुए उससे निपटने के लिए आधी रात में भी दीये का तेल जला रही थी, दूसरी तरफ आंदोलनकारियों से नफरत करने वाले लोग नागरिक की ओढ़ी हुई खाल से बाहर आकर अपनी नफरत और अपनी हिंसा दिखा रहे थे। 

जंतर-मंतर पर आज की जुबान में चर्चित बिल्कुल ताजा पीढ़ी, जेन-जी के लोग तो राजनीतिक कटाक्ष से लेकर गंदी गालियों तक के पोस्टर लिए खड़े थे। ये उनमें से कुछ की आम जुबान में थे, और कुछ के मन की भड़ास से निकला हुआ यह कटाक्ष था। वयस्क मनोरंजन और अश्लील भाषा के हिसाब से देखें तो इस आंदोलन में इस पीढ़ी की रचनात्मक कल्पनाशीलता भी खुलकर दिख रही थी, जो कि असंसदीय तो थी, लेकिन वह आहत संवेदनाओं से उपजी हुई भी थी। जब सत्ता के करीबी इन आंदोलनकारियों को गद्दार, और टुकड़े-टुकड़े गैंग करार दे रहे थे, तो यह पीढ़ी भी अपनी जुबान में उसका जवाब दे रही थी, और दो अलग-अलग किस्म की गंदगियों या गालियों के बीच फर्क करना हमारे बस का है नहीं। 

इस आंदोलन के नारों और पोस्टरों से इस पीढ़ी की बेफिक्र और अराजक आजाद जुबान शायद पहली ही बार इस देश के लोगों के सामने इस हद तक आई है, लेकिन इनके जवाब में जो प्रतिक्रियाएं आई हैं, वे इनसे अधिक खतरनाक हैं। इस आंदोलन में शरीक होने पहुंचे 18-20 बरस के दो लडक़ों को रोककर, एक कार में पीछे की सीट पर ताकतवर-मालिकाना अंदाज में पसरा हुआ, एक धर्म की पूरी खाल ओढ़ा हुआ, उस धर्म का सारा श्रृंगार किया हुआ, एक आदमी इन लडक़ों को रोककर उनसे सबसे गंदी मुमकिन जुबान में जितनी गालियां दे रहा है, उन्हें बार-बार टटोल रहा है कि वे किसी दूसरे धर्म के तो नहीं हैं, और उन्हें मार-मारकर कैमरे पर यह कहलवा रहा है कि वे जंतर-मंतर के इन देशद्रोहियों के आंदोलन में दुबारा नहीं आएंगे। यह हिंसक हमलावर बेधडक़ अपना चेहरा उजागर करता है, और अपने धर्म की पूरी साज-सज्जा के साथ बेकसूर लडक़ों को माँ-बहन की गालियां भी बकता है। वह खुद ही इसका वीडियो बनवाता है, और इन लडक़ों को मजबूर करता है कि वे झुककर कार की खिडक़ी से अपना चेहरा दिखाएं, और कहें कि वे यहां दुबारा नहीं आएंगे। एक पूरी तरह गैरधार्मिक, लोकतांत्रिक, और शांतिपूर्ण आंदोलन के खिलाफ दिल्ली में एक धर्म का नाम लेकर बड़े-बड़े आव्हान करने वाला एक पूरी तरह साम्प्रदायिक नेता लाख लोगों का जुलूस लेकर जंतर-मंतर पहुंचने की मुनादी करता है, और इस आंदोलन को अपने धर्म के खिलाफ करार देता है। इसके पहले कि जुलूस पहुंच पाए, मजबूर सरकार को आंदोलनकारियों की सारी मांगें माननी पड़ीं, और यह धार्मिक खाल वाला नेता दूसरी घोषणा करता है कि उनके पहुंचने की घोषणा से ही तिलचट्टे डरकर भाग गए। 

जंतर-मंतर तो एक नमूना है। हर आंदोलन या हर धार्मिक-भावनात्मक मुद्दा इस देश में पैथोलॉजी लैब का काम करता है, और लोगों के दिल-दिमाग में भरी हुई नफरत, हिंसा, और अश्लीलता को उजागर करता है। सोशल मीडिया पर लोग खुद होकर अपनी ऐसी दिमागी-बीमारी की रिपोर्ट खुद दस्तखत करके पोस्ट करते हैं, वह इस बार भी हुआ, बड़े उत्साह के साथ हुआ, बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोगों ने अपने दिमागी मर्ज की रिपोर्ट पोस्ट की, क्योंकि उन्हें अंदाज नहीं था कि सरकार इतनी जल्दी झुक जाएगी, और आंदोलनकारियों की हर बात मान ली जाएगी। 

इस आंदोलन के दौर ने यह भी साबित किया कि हिन्दुस्तान को किसी नेता से अधिक जरूरत मनोचिकित्सक की है। यहां के लोग होमोफोबिक, ट्रांसफोबिक, इस्लामोफोबिक, आजादीफोबिक, नौजवानफोबिक, वयस्कफोबिक किस्म के हैं। अब आंदोलन खत्म होने के बाद भी लोगों का यह लिख-लिखकर भेजना जारी है कि इस आंदोलन में ट्रांस और समलैंगिक लोग शामिल थे, पोस्टरों पर गालियां लिख रहे थे, लडक़े साड़ी पहनकर नाच रहे थे, क्या भारत के लोग इससे सहमत हो सकते हैं? इस किस्म की शायद लाखों पोस्ट सोशल मीडिया पर आ चुकी है, कुछ दर्जन ऐसे बड़े लंबे-लंबे संदेश हमें भी वॉट्सऐप पर मिले हैं, लेकिन धर्म की खाल ओढ़े हुए इंसानों की हिंसक और अश्लील बातें, उनकी हिंसा, उनकी धमकियां इनमें से किसी को परेशान नहीं करतीं। किसी की धार्मिक भावनाएं इस बात से आहत नहीं होतीं कि उन्हीं के ईश्वर की कोई तस्वीर लगाकर, जय-जयकार करने वाले लोग उस तस्वीर के ठीक नीचे दूसरों का नाम लिखकर उन्हें माँ-बहन की गालियां देते हैं, उनकी बहन-बेटियों को बलात्कार की धमकियां देते हैं। 

मैं तो सोशल मीडिया पर हर दिन 8-10 घंटे रहता ही हूं, अपने धर्म के झंडे-डंडे सहित सोशल मीडिया पर मौजूद लोगों की हिंसा-अश्लीलता से उस धर्म के लोगों को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन उन्हें जंतर-मंतर पर नौजवान आंदोलनकारियों के वयस्क भाषा के कटाक्ष से बड़ी दिक्कत है जो कि हिंसक नहीं है, जो कि धमकी नहीं है, जो कि किसी ईश्वर का नाम लेकर नहीं है, जो कि किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। पूरी तरह से अधार्मिक रहा यह आंदोलन, धर्म और जाति के किसी भी नारे से मुक्त भी रहा, और इसके बावजूद उसे एक धर्म का विरोधी करार देते हुए लाख लोगों को वहां ले जाकर तिलचट्टों को मार डालने की खुली धमकी से किसी कोई परेशानी नहीं होती! 

भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों से, जायज या नाजायज सरकारी या राजनीतिक फैसलों से इतना तो हो रहा है कि लोग अपने गले में अपने ऐसे डीएनए का माला पहनकर भी खड़े हो जाते हैं जो बताता है कि वे पाषाण युग के हैं, और उसके बाद की सभ्यता के किसी भी विकास से वे पूरी तरह अछूते, और पूरी तरह कुंवारे हैं, उनका चरित्र एकदम शुद्ध है, और उनकी सोच अभी चक्के के आविष्कार के युग में भी नहीं पहुंची है। मैं तो एकदम खालिस नास्तिक हूं, फिर भी इस देश में धर्म के चोले, प्रतीक, और उसकी साज-सज्जा से लैस नफरती जब दूसरे धर्म के लोगों का साथ देने का आरोप लगाते हुए अपने ही धर्म के लोगों को भी माँ-बहन की गालियां बकते हैं, उन्हें पीटते हैं, तो मैं हैरान होता हूं कि कण-कण में व्याप्त उनका ईश्वर यह देखकर क्या सोच रहा होगा? आप भी सोचकर देखिए कि क्या इससे आपकी धार्मिक, या नास्तिक, किसी भी किस्म की भावना आहत होती है, या आपकी मानवीय भावनाएं अब पत्थरों के बीच दबकर जीवाश्म (फॉसिल) हो चुकी हैं?

(Daily Chhattisgarh)  

जंतर-मंतर का एक सबक, अखबार मीडिया नाम की छतरी से बाहर निकलें

25 जुलाई 2026  

 

जंतर-मंतर के आंदोलन के बीच कुछ टीवी समाचार चैनलों के जाने-माने चेहरों के साथ कुछ बदसलूकी की खबरें भी हैं। अखबारी या दूसरे किस्म के रिपोर्टरों से अलग, टीवी चैनलों के रिपोर्टर चैनल के लोगो लगे माइक लेकर चलते हैं, और चेहरों के साथ-साथ चैनल का नाम भी उजागर होते चलता है, जो कि टीवी चैनलों का कारोबारी तौर-तरीका भी है। यह पहला मौका नहीं है कि कुछ चुनिंदा चैनलों, और चुनिंदा रिपोर्टरों को भीड़ की नाराजगी झेलनी पड़ी हो। देश में अलग-अलग कई आंदोलनों के दौरान जब कोई टीवी चैनल अपने आक्रामक रूख से उस आंदोलन का विरोधी रहता है, रात-दिन उसके खिलाफ एक एजेंडा आगे बढ़ाते रहता है, तो उसके मैदानी लोगों को यह नाराजगी झेलनी पड़ती है। ऐसा किसान आंदोलन के समय भी हुआ, और बहुत सारे दूसरे आंदोलनों में भी साख इन लोगों के काम करने के आड़े आई। देश के मीडिया का ही एक हिस्सा ऐसे सत्ता समर्थक टीवी चैनलों को गोदी मीडिया कहता है, और हम अपने लिखने में इस शब्द से परहेज करते हुए भी यह बात तो लिखने को बेबस हैं कि कई टीवी चैनलों का रोजाना का एजेंडा किसी भी हद तक जाकर, परले दर्जे के झूठ बोलकर किसी के प्रति अंधभक्ति दिखाना, या किसी के प्रति नफरत फैलाना रहता है। अक्सर ही यह एजेंडा एक ही रहता है, और एक एजेंडे से ही ये दोनों काम साथ-साथ पूरे किए जाते हैं। इसके लिए अलग-अलग तबकों के प्रतिनिधि बताकर ऐसे नफरती और जहरीले लोगों को बहस के पैनल में बिठाया जाता है कि देश की हवा में नफरत और अधिक घुल जाए। फिर मानो यह भी काफी न हो, तो पाकिस्तान से ऐसे पैनलिस्ट जोड़े जाते हैं जो भारत के कुछ लोगों को तरह-तरह से गालियां दें, और उन गालियों को भी ये चैनल अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने में इस्तेमाल करते हैं। परले दर्जे के झूठ, और नफरत को लगातार बढ़ावा देने वाले कुछ ऐसे बहुत ही जाने-माने शोहरती एंकर-एंकरानियां हैं जो इंच-इंच हवा में नफरत घोल देने के अकेले मकसद से काम करते दिखते हैं। 

ऐसे लोगों के साथ जब किसी आंदोलन के दौरान बदसलूकी होती है, तो उसे मीडिया के साथ बदसलूकी करार दिया जाए, या न दिया जाए? यह सवाल इसलिए मायने रखता है कि इस देश में आजादी की लड़ाई के वक्त से अखबार जिस तरह से जिम्मेदारी निभाते आ रहे थे, और अब भी अधिक या कम हद तक निभाते हैं, उस जिम्मेदारी से बिल्कुल ही मुक्त, टेक्नॉलॉजी के एक नए विस्फोट से जो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आया, और छाया है, उसके तौर-तरीके इतने अलग हैं कि पत्रकारिता के तौर-तरीके, उसके कोई नीति-सिद्धांत, और उसके कोई मूल्य इस पर लागू नहीं होते। फिर गलती कभी किसी टेक्नॉलॉजी की तो रहती नहीं है, उसे इस्तेमाल करने वाले अगर इसे एक नफरती, साम्प्रदायिक, धर्मान्ध एजेंडा लागू करने के लिए रात-दिन इस्तेमाल करते हैं, तो क्या उसे उसी मीडिया में गिना जाए जिसमें अखबार भी गिनाते हैं? हमने अभी जंतर-मंतर के इस आंदोलन के पहले भी कई बार यह लिखा है कि अब मामला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से भी आगे बढक़र इंटरनेट आधारित वेबमीडिया तक पहुंच गया है, न्यूज पोर्टल, या समाचार वेबसाइटें हावी हो गई हैं, टीवी चैनल भी कुछ हद तक किनारे हो गए हैं, और इन सबसे पहले यूट्यूब और दूसरे प्लेटफॉर्म इन सबके ऊपर आ गए हैं। ऐसे में क्या इन सबको मीडिया कहा जाए? 

केरल की बोट रेस जिन लोगों ने देखी है वे जानते हैं कि किस तरह एक बहुत संकरी, और बहुत लंबी बोट पर दो-दो लोग अगल-बगल, एक बड़ी लंबी कतार में बैठते हैं, और एक साथ चप्पू चलाते हैं। बंदूक से निकली गोली की तरह ये बोट इन सबकी सामूहिक ताकत से आगे बढ़ती हैं। इनको एक बोट, या नाविक कहा जाना समझ में आता है। लेकिन पल भर के लिए यह मान लें कि यह बोट मीडिया है, और इसमें चप्पू चलाने वाले खरगोश, शेर, वनभैंसे, हाथी, जिराफ, साही, भालू, लोमड़ी दर्जनों किस्म के लोग हैं, तो क्या इससे मीडिया नाम की यह बोट आगे बढ़ सकेगी? हमें न तो मीडिया नाम के एक विशाल छाते से कोई लेना-देना है, और न ही केरल की किसी नाव से, हम सिर्फ अखबारों की फिक्र करते हैं कि इसे आज प्रचलित दूसरे कई किस्म के तथाकथित मीडिया के साथ एक नाव पर सवार नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह मुमकिन नहीं है। अखबार की तकनीक अलग है, उसकी सीमाएं अलग हैं, और उसकी पहुंच और क्षमता भी अलग हैं। ऐसे में उसे किसी दूसरी तकनीक पर आधारित, किसी दूसरे किस्म के समाचार-विचार के माध्यम के साथ एक नाव पर नाविक नहीं बनाना चाहिए। खासकर ऐसी नाव पर जिस पर दूसरे नाविकों की प्राथमिकताएं पानी में चप्पू चलाने के बजाय उसी चप्पू से दूसरों का सिर तोडऩे की हो, उसी चप्पू को रंग में डुबाकर दीवार पर गालियां लिखने की हो, ऐसे चप्पूबाजों के साथ किसी गंभीर नाविक को एक नाव चलाने का काम नहीं करना चाहिए। इसीलिए हम पहले भी कई बार ऐसे ही बदसलूकी की शिकायतों के मौकों पर कह चुके हैं, लिख चुके हैं कि प्रेस को, यानी अखबारों को मीडिया नाम के विशाल छतरी के साए से बाहर आकर प्रेस नाम की अपनी पुरानी छतरीतले काम करने चाहिए। आज भी देश के जिन आंदोलनों में आंदोलनकारियों की हिकारत और नफरत जिन तथाकथित मीडियाकर्मियों पर उतरती है, उनमें कोई भी अखबार वाले नहीं रहते। मतलब यही है कि अखबार जो कि अपना छपा हुआ सुबूत छोड़ जाते हैं, वे नफरत के शिकार नहीं होते। और जो टीवी समाचार चैनल नफरत के शिकार होते हैं, उनमें से अधिकतर, या तकरीबन सभी को अंदोलनकारियों से परे भी आम जनता जहरीला मानने लगी है। यही वजह है कि आज यूट्यूब, और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर ऑडियो-विजुअल माध्यम लेकर नए-नए अकेले लोग काम कर रहे हैं, शोहरत भी पा रहे हैं, वाहवाही भी पा रहे हैं, और उनमें से कई लोग ठीक-ठाक कमाई भी कर रहे हैं। इसी से साबित होता है कि कैमरा और माइक्रोफोन कोई खराब औजार नहीं है, उन्हीं से अच्छा काम भी हो रहा है, भरोसेमंद काम भी हो रहा है, देश में नफरत को घटाने की कोशिश भी हो रही है, ये एक अलग बात है कि भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने से लीक होती मिक गैस की तरह चौबीसों घंटे में हवा में जहर घोलने वाले बहुत से टीवी चैनलों की फैलाई नफरत का पूरा मुकाबला यूट्यूबर नहीं कर पाते। अब जब अरबों के कारोबार अपनी पूरी ताकत से नफरत की दुकान चला रहे हों, तब छोटे-छोटे फेरीवाले, और खोमचेवाले उनका पूरा मुकाबला नहीं कर सकते, लेकिन इस देश में ऐसे छोटे, और कम खर्चीले नए-नए माध्यम एक बहुत विश्वसनीय, और सकारात्मक माध्यम बनकर सामने आए हैं। 

लोकतंत्र की सेहत के लिए यह एक अच्छी बात है कि कोई न कोई लोकतांत्रिक, और सकारात्मक माध्यम समाज को उपलब्ध है, और जहरीले चेहरे, गले, दिमाग, और आवाज की शिनाख्त अब लगातार बढ़ती चल रही है, और गली-गली में उन्हें धक्के खाने की नौबत भी आ रही है। जिन लोगों को इन धक्कों को मीडिया पर हमला करार देना हो, वे जरूर देते रहें, हम अब मीडिया की जुबान में अपने आपको शामिल नहीं करते, और हम पुरानी फैशन के, पुरानी विचारधारा के प्रेस में ही अपने को गिनते हैं, इसलिए धक्के खाने वाले लोगों के बारे में हम यह नहीं कहते कि प्रेस धक्का खा रही है। हकीकत भी यही है कि इस लोकतंत्र में प्रेस धक्के नहीं खा रही है। बल्कि प्रेस को धक्के खाने लायक काम करने वाले लोगों के साथ एक छतरीतले रहना भी नहीं चाहिए। उनका काम अलग है, अखबारों को अपनी आज भी खासी बची हुई विश्वसनीयता और साख के साथ अपना काम जारी रखना चाहिए, यह कम आकर्षक हो सकता है, लेकिन इतिहास में यह अच्छा दर्ज होगा।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 25 जुलाई 2026


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