मेटा जैसी कंपनी पर जरा सा दबाव काफी नहीं, भारत विकसित देशों से सीखे

16 सितंबर 2026  

 

दुनिया के दूसरे कई देशों की सख्ती के बाद अब भारत में भी सरकार ने दुनिया के सबसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कारोबारी मेटा पर दबाव डाला है ताकि उससे भारत के लोगों के सामने परोसे जा रहे बच्चों के सेक्स कंटेंट की अधिक जानकारी मिल सके। दुनिया के कई विकसित देशों ने बीते एक बरस में फेसबुक, इंस्टाग्राम, और वॉट्सऐप चलाने वाली कंपनी मेटा से मोटा जुर्माना वसूला है, कई देशों में, जिनमें मेटा का खुद का देश अमरीका भी शामिल है, बच्चों के माँ-बाप ने इस कंपनी के खिलाफ मुकदमे कर रखे हैं। ऑस्ट्रेलिया जैसे देश ने एक उम्रसीमा के नीचे के बच्चों को सोशल मीडिया पर मेंबरशिप देने के खिलाफ बहुत मोटा जुर्माना लगा रखा है। यूरोपियन यूनियन ने भी सोशल मीडिया कंपनियों पर कई तरह की सख्ती लगाई है। भारत में अभी बीते कुछ महीनों से ही जरा सी सुगबुगाहट चालू हुई है, वह भी शायद बीबीसी की इस खोजी रिपोर्ट के बाद हुई है कि मेटा के इंस्टाग्राम पर भारत के बच्चों की यौन सामग्री बेची जा रही है, और ऐसे कारोबारी इंस्टाग्राम पर इश्तहार दे रहे हैं। एक के बाद एक बीबीसी की ऐसी दो बड़ी, और पुख्ता खोजी रिपोर्ट के बाद भारत में भी लोग हक्का-बक्का हैं कि किस तरह यहां की सरकार यह सब बर्दाश्त कर रही है। यहां कानून में विदेशी कंपनियों को यह छूट दी गई है कि उनके उपभोक्ता अगर उनके प्लेटफॉर्म पर किसी तरह का जुर्म करते हैं, तो उसके लिए ये प्लेटफॉर्म जिम्मेदार नहीं माने जाएंगे। इसका फायदा उठाकर तमाम बहुराष्ट्रीय सोशल मीडिया कंपनियां मनमानी कर रही हैं। जब कई विकसित देश मेटा पर इस बात के लिए मुकदमा चला रहे हैं, कि वह बच्चों को अपने प्लेटफॉर्म की आदत डालने की तरकीबें अपने कम्प्यूटरों के एल्गोरिद्म पर इस्तेमाल कर रहे हैं, और ऐसे में खुदकुशी करने वाले कई बच्चों के माँ-बाप ने अदालत में भी मुकदमे किए हैं, भारत मोटे तौर पर ऐसी तमाम फिक्र से अब तक आजाद है।

हम इस मुद्दे पर पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि भारतीय बच्चों को ऐसी सोशल मीडिया कंपनियों की कारोबारी साजिशों से बचाना जरूरी है। इसके साथ-साथ भारतीय बच्चों को स्क्रीन की लत से बचाना भी जरूरी है। आज बहुत से माँ-बाप लापरवाह हैं जो कि बच्चों को टीवी का रिमोट देकर, उनके हाथ में मोबाइल फोन देकर उन्हें व्यस्त रखते हैं, और खुद भी अपने उपकरणों पर व्यस्त हो जाते हैं। बहुत से माँ-बाप ऐसे हैं जो मजबूरी में काम करने में लगे रहते हैं, और बच्चों को व्यस्त रखने के लिए उनके पास स्क्रीन ही अकेला तरीका है। नतीजा यह हो रहा है कि छोटे-छोटे बच्चे भी हर दिन आठ-दस घंटे तक फोन, कम्प्यूटर, या टीवी स्क्रीन पर लगे रहते हैं। हमने भारत सरकार को कई बार यह सुझाया है कि उसे फोन और टीवी जैसे उपकरण बनाने वाली कंपनियों से बात करके उस पर इस तरह के फीचर जुड़वाने चाहिए कि बच्चों की सामग्री किसी दिन में एक सीमित तक ही उस पर चल पाए। आज तो एआई की मेहरबानी से यह बहुत आसान हो गया है कि बच्चों की पसंद के चैनल, उस पर के कार्यक्रम, उनके चहेते वीडियो गेम की सीमा तय  की जा सकती है कि एक दिन में वे कुल मिलाकर 30 मिनट, या 60 मिनट से अधिक न चलें। भारत में सरकार को अभी इस बात का महत्व समझ नहीं आ रहा है कि बच्चों को स्क्रीन में डूबते चले जाने से कैसे बचाया जाए। आज ही सुबह किसी एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर यह रिपोर्ट थी कि छोटे बच्चे जो कि किताबें पढ़ते हैं, वे किस तरह मानसिक रूप से अधिक विकसित होते हैं, और आगे जाकर उनको मानसिक और बुढ़ापे की दूसरे किस्म की बीमारियां होने का खतरा घट जाता है। इस नई शोध के पहले से भी मनोवैज्ञानिक इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि बच्चों की कल्पनाओं में जब वे खुद रंग भरते हैं, तो उनके दिमाग का विकास होता है। लेकिन जब कल्पनाओं की जगह पर आकार, रंग, और विविध हलचल वाले वीडियो कब्जा कर लेते हैं, तो बच्चों की कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता धरी रह जाती है, और उनका मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता। भारत में सरकार को तमाम किस्म के स्क्रीन वाले उपकरण बनाने वाली कंपनियों पर ऐसे चाइल्ड-लॉक लगाने के लिए कहना चाहिए जो कि माँ-बाप के हाथ में उन उपकरणों का नियंत्रण दे सकें। भारत सरकार को चाहिए कि उपकरणों में ऐसा इंतजाम न करने पर उन पर एक पेनाल्टी लगाई जाए, और किसी भी कारोबारी के लिए पेट पर लात पडऩा ही सबसे अधिक मायने रखता है। 

बीबीसी की रिपोर्ट सचमुच भयानक है कि मेटा के प्लेटफॉर्म जानते-बूझते, समय पर खबर मिल जाने पर भी ऐसे लोगों के इश्तहार चला रहे हैं, जो कि भारत के बच्चों के नग्न और अश्लील फोटो-वीडियो ऑनलाईन बेच रहे हैं। हमारा तो ख्याल यह है कि जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे जुर्म से कमाई पा रहे हैं, तो उन पर अरबों का जुर्माना भी लगाना चाहिए। उनके पास अपने प्लेटफॉर्म पर इश्तहार पर नजर रखने की हर तकनीक मौजूद है। फेसबुक खासकर सबसे अधिक बदनाम है कि उस पर आने वाले विज्ञापनों में से बड़ी संख्या धोखा देने वालों की रहती है, और धोखा खाने के बाद लोग जब ऐसे पेज पर जाकर कमेंट बॉक्स में यह लिखते भी हैं कि यह विज्ञापन फ्रॉड है, तब भी मेटा उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं करता। महीनों तक धोखाधड़ी के ऐसे विज्ञापन चलते रहते हैं। सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में सरकार का वार तभी झेलना पड़ता है, जब सरकार को नापसंद कोई राजनीतिक बात पोस्ट की जाती है। इसके अलावा किसी और बात के लिए सरकार आक्रामक नहीं रहती, चौकन्ना भी नहीं रहती। 

देश में एक-दो प्रदेशों की सरकारों ने जरूर यह कोशिश की है कि सोशल मीडिया पर पहुंचने वाले बच्चों की एक न्यूनतम उम्रसीमा तय करवाई जाए। लेकिन भारत की संघीय व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर रोक-टोक लगाने का मुख्य अधिकार तो केन्द्र सरकार के पास ही है, राज्य सरकार भी हो सकता है अपने स्तर पर कुछ कर पाए। लेकिन केन्द्र को राज्यों के साथ बात करके सोशल मीडिया सुधार की पहल करनी चाहिए, आज इन्हीं प्लेटफॉम्र्स पर बच्चों को लत डाली जा रही है, वहां उन्हें कई गलत चीजों का आदी बनाया जा रहा है, और जो कंपनियां अपने खुद के देश में अरबों-खरबों का जुर्माना दे रही हैं, वे भी भारत में यहां के बच्चों के सेक्स वीडियो बेचने के बाद मजा कर रही है, यह नौबत बिल्कुल भी नहीं चलने देना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 16 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 15 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

मर्दों की शुभचिंता को महिलाएं जिम्मेदारी नहीं हक मानने लगती हैं!

15 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ और उत्तर भारत में आज हरतालिका तीज मनाई जा रही है। महिलाएं अपने मायके जाती हैं, माँ या भाई-भाभी की तरफ से साड़ी मिलती है, कुछ उपवास होता है, कुछ पकवान होता है। हिन्दू धर्म के और बहुत से त्यौहारों और रिवाजों की तरह तीज या तीजा पर भी महिला का उपवास रहता है। सावन के महीने में लड़कियां सोलह सोमवार या ऐसे कोई व्रत रखती हैं ताकि अच्छा पति मिले। करवा चौथ पर महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। कमरछठ पर महिलाएँ उपवास करती हैं कि उनके बच्चों को लंबी उम्र मिले। और तमाम त्यौहारों और रिवाजों से परे हर दिन वे ऐसा काम भी करती हैं कि परिवार में सबकी उम्र लंबी हो, परिवार में कई पीढिय़ों की देखभाल, और सेवा के काम में हिन्दुस्तानी महिला लगी ही रहती हैं। उसके त्याग, बलिदान, उसकी मेहनत, और उसकी सहनशक्ति को लेकर उसका इतना गौरवगान होता है कि महिलाओं की अगली पीढ़ी अपने को ऐसा ही गौरवशाली बनाने में अपनी पूरी जिंदगी खपा देती हैं। संयुक्त परिवार हो, तो जिम्मेदारियां और कई गुना हो जाती हैं। 

अभी दूसरे धर्मों और दूसरे देशों की बात अलग रखें, क्योंकि वहां के धार्मिक रीति-रिवाजों की उतनी जानकारी है नहीं जितनी कि भारत के हिन्दू और हिन्दीभाषी समाज की है। परिवार को स्वस्थ रखना, और उसे लंबी उम्र दिलवाना, इन दोनों की जिम्मेदारी का एकाधिकार महिलाओं को ही दे दिया गया है। इसके एवज में महिलाओं को भाई को राखी बांधकर यह आत्मविश्वास और भरोसा रखने मिलता है कि वे बहन की रक्षा करेंगे। ऐसी रक्षा कितनी हो पाती है, वह एक अलग बात है, आजकल तो अधिक मामले ऐसे ही सुनाई पड़ते हैं कि बहन को मायके से दूर रखने की कोशिश होती है, ताकि वह माँ-बाप की छोड़ी विरासत में कोई हिस्सा न मांग ले। इसके साथ-साथ जब बाप-भाई को यह लगता है कि घर की लडक़ी अपनी पसंद से, और परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी कर रही है, तो कम से कम उस लडक़ी, और कई मामलों में उसकी पसंद, दोनों को मारने की कोशिश भी होती है, और इसे ऑनरकिलिंग कहा जाता है, मान लो इस कत्ल से खानदान की इज्जत बच रही हो, और बढ़ भी रही हो। 

हिन्दू धर्म की कहानियों को अगर देखेंगे, तो कहीं पति को बचाने के लिए सावित्री की कहानी सुनाई देगी, तो कहीं पति के साथ सती होने का गौरवगान होगा, हिन्दू धर्म की आरतियों को अगर सुनेंगे, तो इन दिनों गणेशोत्सव में सबसे अधिक प्रचलित एक आरती में बांझन को पुत्र देय, कोढिऩ को काया, सुनाई देता है। किसी महिला की संतान न होने पर उसके लिए वही अकेली बांझ कही जाती है, और उसे संतान हो, तो उसे पुत्र ही हो, ऐसी कामना गणपति से की जाती है। कल ही इस अखबार के यूट्यूब चैनल ‘इंडिया-आजकल’ पर तीज के उपवास की परंपरा को लेकर एक बातचीत हुई, और उसमें कई अनछुए पहलू भी सामने आए। लेकिन एक भी बात निकलकर ऐसी नहीं आ पाई कि हिन्दू और हिन्दुस्तान में पुरूष पर भी महिला के लिए कोई धार्मिक रीति-रिवाज, या कोई सामाजिक संस्कार लागू होता हो। हर किस्म की जिम्मेदारी सिर्फ महिला पर ही आती है। 

अब अगर औरत-मर्द के अधिकारों की बराबरी की बात करें, तो कई लोगों को लग सकता है कि यह हिन्दू धर्म के खिलाफ बात हो रही है। लेकिन जब तीन तलाक, या बाल विवाह के खिलाफ, या बहुपत्नी प्रथा के खिलाफ, या शाहबानो सरीखे गुजारा-भत्ते पर बातचीत होगी, तब हिन्दुओं पर नहीं होगी, तब सिर्फ मुस्लिमों पर होगी। इसलिए आज जब हिन्दू उपवास की बात हो रही है, तो वह तो हिन्दुओं तक ही सीमित रहेगी। किसी मुद्दे को किसी एक धर्म का विरोधी होने की तोहमत से बचाने के लिए उस धर्म की बारीकियों पर की जा रही चर्चा में हर धर्म को तो शामिल किया नहीं जा सकता। भारत के हिन्दुओं के भीतर अगर समाज सुधार की बात होनी है, तो वह तो हिन्दू-रीति-रिवाजों को लेकर ही होगी। आज 21वीं सदी के दूसरे चौथाई हिस्से में पहुंचकर भी यह चर्चा क्या नाजायज होगी कि हर किस्म के त्याग की उम्मीद सिर्फ महिलाओं से ही क्यों की जाती है, और पुरूषों की नैतिकता का भी कोई तकाजा रहना चाहिए या नहीं? 

जब कभी इस तरह की कोई चर्चा हो, तो महिलाओं का एक बड़ा तबका उसी पर पुरूष प्रधान व्यवस्था द्वारा थोपी गई जिम्मेदारी की वकालत करने पर आमादा हो जाता है। उन्हें ऐसे सारे उपवास अपने हक के लगते हैं, उन्हें जिम्मेदारी के बोझ का अहसास नहीं होता, उन्हें यह अहसास भी नहीं होता कि एक लडक़ी या महिला को भी बराबरी के हक का हक होता है। यह बात सिर्फ हिन्दू महिला के साथ नहीं होती, मुस्लिम महिलाओं के साथ यह कुछ और अधिक हद तक होती है जिन्हें बुर्का और हिजाब अपना हक लगने लगता है, उन्हें यह लगता ही नहीं कि मुस्लिम मर्दों ने उन पर यह थोप दिया है। हमने पहले भी इस बात की चर्चा की है कि कई समाजों में महिलाओं की सोच मनोविज्ञान की भाषा में, ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ कहलाती है। दरअसल दशकों पहले एक अरबपति की बेटी का अपहरण हुआ था, और उसके छूटने में खासा वक्त लग गया था। अपहरणकर्ताओं के साथ जीते हुए वह उन्हीं को भला मानने लगी थी, और उसे लगने लगा था कि वे उसके शुभचिंतक हैं। इस तरह जब कोई शोषित अपने शोषक को ही अपना शुभचिंतक मानने लगे, ऐसी ही नौबत धर्म और सामाजिक रीति-रिवाजों को लेकर महिलाओं की हो जाती है, और वे परिवार के पुरूषों के लिए, बच्चों के लिए उपवास करने को अपनी जिम्मेदारी न मानकर हक मानने लगती हैं। ऐसे स्टॉकहोम सिंड्रोम के बीच औरत-मर्द की बराबरी की बात भी नहीं हो सकती। लेकिन धर्म और समाज के भीतर ऐसी बराबरी की संभावनाओं को हमेशा ही ढूंढना चाहिए, हमेशा ही उसकी कोशिश करनी चाहिए। हो सकता है कि हजार-दो हजार साल बाद पहली महिला शंकराचार्य बने, पहली महिला पोप बने! अमूमन हर धर्म में महिलाओं की स्थिति बहुत ही कमजोर करके रखी जाती है, और धार्मिक परंपराओं को इसके लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। यह सिलसिला खत्म करने की कोशिश होनी चाहिए। अगले करवाचौथ पर, कमरछठ पर, और तीजा पर मर्दों को भी उपवास कराकर देखा जाए कि समाज में एक नई जागरूकता आती है या नहीं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 14 सितंबर 2026


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शोर, पंडाल, गेट, और गाय, धर्म के नाम पर अराजकता..

14 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शहर के पुराने सराफा बाजार से निकलती हुई एक गणेश झांकी के साथ के अंधाधुंध आवाज वाले डीजे के आसपास ही एक पुरानी कमजोर इमारत ढह गई। अब यह शोरगुल कुछ दूर था, या उसी वक्त इस इमारत के सामने था, इसे लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन कई वीडियो में यह देखने मिल रहा है कि पुलिस उसी जगह पर हाथ में थामे लाउडस्पीकर पर डीजे तेज न बजाने की अपील कर रही है। इधर आज की खबर है कि इसी प्रदेश में कोई बड़ी गाड़ी एक दर्जन से अधिक मवेशियों को सडक़ पर कुचलकर चली गई, और चारों तरफ बिखरी लाशों की तस्वीरें देखते नहीं बनती हैं। दो दिन पहले ही एक दूसरे शहर में सडक़ पर इसी तरह कुचली पड़ी गायों को खा रहे कुत्तों की तस्वीरें छापने में भी दिक्कत लग रही थी। फिर हर शहर के हर गली-मोहल्ले में सडक़ों पर पंडाल तन रहे हैं, स्वागत द्वार लग रहे हैं, और त्यौहार के इस मौसम में सडक़ों पर बढऩे वाली भीड़ के वक्त सडक़ों को और संकरा कर दिया गया है। राजधानी रायपुर की कुछ बहुत व्यस्त सडक़ों पर तो लोहे के बड़े-बड़े ढांचे गणेशोत्सव के लिए ऐसे खड़े कर दिए गए हैं कि उनसे चार-छह फीट दूरी पर ही बिजली के नंगे तार जा रहे हैं। अगर किसी गाड़ी की एक ठोकर से यह ढांचा तारों पर गिरा, तो क्या होगा? लोहे के ढांचे में चारों तरफ करंट दौड़ जाएगा, और आसपास की भीड़ में क्या नौबत आएगी, इसकी कल्पना मुश्किल नहीं है। दूसरी तरफ यह सुनाई पड़ता है कि हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सडक़ों पर पंडाल और स्वागत द्वार को रोकने वाले म्युनिसिपल अधिकारियों को फटकार पड़ रही है। 

इन सारी बातों को अगर देखें, तो इनमें एक ही बात एक सरीखी है कि ये सब धर्म के नाम पर हो रहा है। धर्म के नाम पर अभी गणेशोत्सव में दस दिन, और फिर नवरात्रि में नौ दिन बेतहाशा शोरगुल रहेगा, इसी प्रदेश में बीते बरसों में लाउडस्पीकरों की वजह से मौत भी हो चुकी हैं, लेकिन कोई सुधार हो नहीं रहा। एक धर्म के देखादेखी दूसरे धर्म के लोग भी ऐसा ही शोर कर रहे हैं। फिर सडक़ों को घेर लेना, चोरी की बिजली से त्यौहार मनाना, खतरनाक अंदाज में लोहे के ढांचे खड़े कर देना, यह सब कुछ भी धार्मिक त्यौहारों के नाम पर चल रहा है। धर्म के ही नाम पर सडक़ों के किनारे भंडारे लगाए जाते हैं, और वहां खा-पीकर लोग आसपास चारों तरफ पत्तल-गिलास फेंक जाते हैं। जो आयोजक हैं उनकी दिलचस्पी खिलाने तक रहती है, धर्म के नाम पर खिलाने के लिए चंदा भी जुट जाता है, लेकिन धर्म का सफाई करवाने का कोई आव्हान नहीं रहता। सडक़ों पर से आवारा मवेशियों को न हटाने का काम भी धार्मिक भावना से जुड़ा हुआ है। अभी आवारा पशुओं को गाड़ी में भरकर ले जाया जा रहा था, तो उन्हें पकडऩे के लिए लाठियां चलाते लोगों का वीडियो पोस्ट करके कांग्रेस के एक बड़े नेता ने इसे गौमाता पर जुल्म कहा। अब अगर गौमाता को हाईवे से भी हटाना होगा, तो भी लाठियों से ही तो हटाना होगा, उसे माँ मानकर अनुरोध करके तो गाड़ी में चढ़ाया नहीं जा सकता। फिर भारत की पशु और कृषि अर्थव्यवस्था को गोवंश की सुरक्षा के नाम पर डांवाडोल कर दिया गया है, नतीजा यह है कि गांव-शहर के  आबादी इलाकों, खेतों, और हाईवे पर भी आवारा मवेशी बढ़ते चले जा रहे हैं, और अब एक-एक बड़ी गाड़ी से कुचलने पर दर्जन-दर्जन भर गोवंशीय जानवर मारे जा रहे हैं। किसी मवेशी को माँ मानना आसान है, उसे मवेशी कहने वाले को धर्म का झंडा लिए हुए लोग पीट भी सकते हैं, लेकिन उस मवेशी का आखिर क्या हो, इसका कोई जवाब अभी सरकार के पास नहीं है। हम इस पर कुछ हफ्ते पहले भी लिख चुके हैं कि दुधारू न रह जाने पर गाय इस समाज पर जिस तरह का बोझ रहती है, उस बोझ को उठाना क्या सरकार के लिए भी पूरी जिंदगी मुमकिन है? 

धर्म से जुड़े हुए अलग-अलग किस्म की अराजकता के कई सवाल खड़े हैं, ये लोगों की जिंदगी पर खतरा भी बने हुए हैं, और अराजकता घटती नहीं है, वह एक जगह की देखादेखी दूसरी जगह भी पनपती जाती है, फिर बढ़ती जाती है। अभी ऊपर जितने मुद्दों पर हमने लिखा है, इनमें से हर मुद्दे पर छत्तीसगढ़ का हाईकोर्ट राज्य सरकार को जाने कितनी बार फटकार लगा चुका है, कितनी बार बड़े अफसरों से हलफनामे ले चुका है, लेकिन अदालत के सारे निर्देशों को किनारे रखकर लोगों को अराजकता बढ़ाने-फैलाने की खुली छूट दी जाती है। ऐसे में अंधाधुंध तेज बजते हुए लाउडस्पीकर से पुरानी इमारतें भी गिर सकती है, और पुराने लोग भी इसकी वजह से दिल का दौरा पडऩे, या दिमाग की नस फटने से मर सकते हैं। ऐसा लगता है कि धर्म ने शांति से जीने के अधिकार को नागरिकों से छीन लिया है, यह सिलसिला और किस हद तक हिंसक और जानलेवा होगा, यह बताना कुछ मुश्किल है। लेकिन एक बात हर किसी को समझनी चाहिए कि बढ़ती हुई धर्मान्धता, और घटती हुई वैज्ञानिक चेतना सभ्य समाज की मोमबत्ती को दोनों सिरों से जला रही हैं। जब सरकारी अमला भी धर्म के नाम पर नियमों के खिलाफ हो रहे कामों को अनदेखा करने, उनका साथ देने, उनका स्वागत करने पर मजबूर किया जाता है, और फिर उसी में मगन होकर जुट जाता है, तो फिर जनता से तो किसी जिम्मेदारी के बर्ताव की उम्मीद नहीं की जा सकती। बढ़ती हुई धर्मान्धता को कानून पर कड़े अमल से ही काबू में किया जा सकता है, जब कानून पर अमल ही ढीला-ढाला और लाचार रहे, तो फिर गुंडों का बोलबाला हो जाता है। हम गाय को बचाने के नाम पर, धार्मिक त्यौहार के नाम पर, कानून की कई तरह की हेठी देख रहे हैं, और कानून को अपने हाथ में लेना भारत में एक नवसामान्य बात हो गई है।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 13 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

भतीजा बाहर, भतीजी की बारी, माया की बसपा, या कुनबे के भीतर लूडो का खेल?

13 सितंबर 2026

 

एक वक्त देश की एक बड़ी दलित पार्टी रही बसपा की मुखिया मायावती भारतीय राजनीति में अपनी पार्टी की सुप्रीमो कहलाती हैं। लोकतंत्र में जहां पर निर्वाचित अध्यक्ष होने चाहिए, वहां पर एक कुनबे की यह पार्टी मायावती से ही शुरू हुई और मायावती की अगली पीढ़ी पर ही यह दम तोड़ दे रही है। कहने के लिए मायावती के राजनीतिक गुरु रहे कांशीराम ने इस पार्टी को शुरू किया था, लेकिन जल्द ही उनकी राजनीति में उनकी चहेती मायावती आगे बढ़ते-बढ़ते इस पार्टी पर काबिज हो गईं। बीते कुछ दशक लोगों ने मायावती को कभी भाजपा, तो कभी समाजवादियों के साथ समझौते करके सत्ता पर बने रहते देखा, लेकिन बीते एक दशक, या कुछ अधिक से मायावती साल में जारी होने वाले दो-चार बयानों से परे घरघुस्सू नेता हो गई हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें चौखट से बाहर निकलते ही दरवाजे की एक तरफ ईडी और दरवाजे की दूसरी तरफ सीबीआई के भूत हवा दिखाते हैं। उनकी दहशत इस हद तक बढ़ी हुई है कि हाल के कई चुनावों में उन्होंने बसपा को खुद होकर हाशिए पर ले जाते-ले जाते फुटपाथ के किनारे की नाली में डाल दिया है। उनकी पूरी राजनीति अब केंद्र सरकार की मेहरबानी पर चल रही सांसों तक सीमित हो गई है। यह एक अलग बात है कि लंबे समय से दलित राजनीति की उत्तर भारत में अगुवा बनी हुई मायावती और उनकी बसपा कागजों पर भी जिंदा हैं और किसी दूसरी दलित पार्टी के लिए मैदान खाली नहीं कर रहे हैं। न खुद दलितों के लिए कुछ करना, न और किसी को दलित अगुवाई करने देना।

अब मायावती के एक दूसरे पहलू पर चर्चा जरूरी है। वैसे तो हमें खुद ही याद नहीं पड़ता कि मायावती पर इसके पहले कितने बरस पहले लिखने की नौबत आई थी, या एक दशक ही हो गया है। फिलहाल पिछले कुछ दिनों में उन्होंने अपने कुनबे को चर्चा में लाने की हरकतें इतनी तेज कर दी हैं कि अब उन पर लिखे बिना रहना कुछ मुश्किल हो रहा है। निहायत गैरजरूरी और अप्रासंगिक पारिवारिक हरकतों को वे देश की राजनीति की मुख्यधारा में एक बड़े घटनाक्रम की तरह पेश कर रही हैं और इसीलिए इस परले दर्जे की कुनबापरस्ती पर चर्चा जरूरी है। बीते बरसों में मायावती के भाई आनंद कुमार का नाम खबरों में तब-तब आया है और तभी आया है जब मायावती ने उसके बेटे आकाश आनंद को कभी संगठन में अपना वारिस बनाया और कभी इस विरासत से बेदखल करने की मुनादी की। अपने भतीजे को लेकर मायावती के विरासत के फैसले इतनी बार भीतर-बाहर हो चुके हैं कि उन्होंने रेल के भाप इंजन के पिस्टन को भी मात कर दिया है। अब उन्होंने ताजा मुनादी की है कि वे अपने दोनों भतीजों को राजनीतिक पदों से बाहर रखने का अंतिम फैसला ले चुकी हैं। इसके साथ ही मायावती ने इसी भाई की बेटी दीपिका आनंद के लिए पार्टी में भूमिका की गुंजाइश छोड़ी है। उन्होंने कहा कि दोनों भतीजों को कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी, जबकि जरूरत पडऩे पर भतीजी दीपिका अपने पिता आनंद कुमार की मदद कर सकती है। इसके कुछ दिन पहले ही अपने भतीजे के अलावा मायावती ने भतीजे के ससुर को भी पार्टी से भीतर-बाहर करने का एक सिलसिला चला रखा था और अब मायावती की सार्वजनिक चेतावनी के बाद भतीजा-ससुर ने अपने को बसपा की राजनीति से परे रखने की घोषणा की है।

दिलचस्प बात यह है कि मायावती खुद पूरी जिंदगी से मुलायम सिंह की कुनबापरस्ती, कांग्रेस की कुनबापरस्ती के ऊपर खुले हमले करती आई हैं और दूसरी तरफ अपने भाई आनंद कुमार को उन्होंने बसपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना रखा है, और भतीजे को वे विरासत पर लाती और वहां से हटाती रही हैं। अब उनका एक दावा यह भी हैरतअंगेज है कि उन्होंने बसपा को कुनबापरस्त नहीं बनने दिया और अपने भाई-बहन, रिश्तेदारों को सांसद-विधायक या मंत्री जैसे पदों से दूर रखा। भतीजे और उसके ससुर को लेकर सत्ता देने और छीनने की जिस तरह की सार्वजनिक घोषणाएं मायावती राष्ट्रीय सुरक्षा के फैसलों की तरह घोषित करती आई हैं, उससे वे मनोवैज्ञानिकों के लिए शोध का एक दिलचस्प विषय बनती हैं। लेकिन कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त...! आकाश आनंद का एक छोटा भाई ईशान आनंद, मायावती का सगा भतीजा ही है। उसे संगठन में 2 को छोड़ सभी राज्यों का अगुवा बना दिया गया और इस घोषणा में मायावती ने यह भी कहा कि वह अपनी रिपोर्ट अपने पिता आनंद कुमार को देगा। 7 सितंबर की इस घोषणा को पलटकर मायावती ने 12 सितंबर को यह नया संविधान रचा कि आनंद कुमार के दोनों बेटों को बसपा में कोई राजनीतिक पद नहीं मिलेगा। दोनों भतीजों को लात मारकर बाहर करने के बाद उनकी बहन दीपिका को जिम्मेदारी देने की घोषणा भी की। जिस मायावती को देश में दलित-विरोधी ताकतों से लडऩा था, वह मायावती अपनी घरेलू पार्टी के भीतर अपने ही मानसिक विरोधाभासों से लड़ते जिंदगी गुजार रही हैं।

भारत में पहले भी कहा जाता है कि बैठा बनिया (दुकानदार) क्या करे, इधर का डिब्बा-उधर करे। जैसे कोई किराना व्यापारी ग्राहकी न रहने पर दुकान के ही सामानों को इधर-उधर करता है, वैसा ही मायावती कोई चुनाव लडऩे, कोई राजनीति करने के बजाय कुनबे के भीतर उठा-पटक में लगी हैं। किसी सुबह बड़े भतीजे ने चाय खराब बनाई, तो पार्टी छोटे भतीजे को दे दी, और छोटे भतीजे ने नींबू-शहद में शहद ज्यादा मिला दिया तो पार्टी भतीजी को दे दी। फिर इस उठा-पटक में इन भतीजे-भतीजी का पिता, मायावती का भाई भी है, और एक समधी, भतीजा-ससुर भी है। उत्तर भारत की जुबान में अगर कहें तो यह गजबै पार्टी है। मायावती की पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी को देखें, तो उसके चार पैर, एक सूंड और एक पूंछ-ये सब आपस में ही एक-दूसरे से लड़ रहे हैं। माया का हाथी कभी किसी पैर पर खड़ा हो रहा है, कभी किसी दूसरे पैर पर, कभी सूंड पर, तो अब दुम पर खड़ा करने की घोषणा की गई है। जिस भारत में दलित आबादी 16 फीसदी से अधिक है, उसकी उत्तर भारत की सबसे बड़ी पार्टी बसपा का यह बुरा हाल है। एक वक्त साइकिल पर घूम-घूमकर बसपा को खड़ा करने वाले कांशीराम ने अपनी चहेती को इस पार्टी का वारिस इसलिए तो नहीं बनाया था कि वह जांच एजेंसियों की दहशत में आकर पार्टी को घर के भीतर खेले जा रहे लूडो जैसा बना दे। घरेलू लूडो में भी खेल के नियम तो लागू होते हैं, लेकिन इस मायावी दुनिया में तो देश में दलितोद्धार के योद्धा इस आधार पर बनाए और मिटाए जाते हैं कि उस सुबह मायावती का मिजाज कैसा है।

हमारा यह मानना है कि जिस देश में तमिलनाडु जैसी परिपक्व दलित राजनीति होती आई है, जिस देश में बाबा साहेब अंबेडकर ने दलितों में नवजागरण का महाभियान कामयाब किया, उस देश में दलित राजनीति को एक कुनबे के भीतर खाने की मेज पर सीमित कर देना और एक सनकी की सनक के रहम-ओ-करम पर छोड़ देना, यह दलितों का बहुत बड़ा अपमान है। आज देश के कानून में दलितों के अपमान करने के खिलाफ जो कानून बने हैं, वे बड़े कमजोर हैं, वरना हमारा यह मानना है कि मजबूत दलित संरक्षण कानून के तहत मायावती के इन फैसलों को दलित समुदाय का अपमान मानते हुए मायावती पर कार्रवाई का प्रावधान रहना चाहिए था। एक महिला जिसने उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में एक से अधिक बार मुख्यमंत्री रहते हुए अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की फसल ही खड़ी कर दी थी, जिस महिला ने अपने जीते-जी अफगानिस्तान की बुद्ध प्रतिमाओं जैसी विशालकाय पाषाण प्रतिमाएं बनवा ली थीं, उस महिला ने आज दलितों की राजनीतिक चेतना को कुचलकर रख दिया है। हमारा मानना है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों से घिरी हुई मायावती दलित-चेतना की सबसे बड़ी दुश्मन बन गई हैं। और उत्तर भारत में, हिंदी प्रदेशों में इसका कोई विकल्प बनना जरूरी है। शायद भाजपा इस नौबत में छुपी संभावनाओं को समझ रही है, इसीलिए वह दलित-संत रयदास के गांव की मिट्टी कलश में लेकर सिर पर चढ़ाकर पूरे देश में गांव-गांव जा रही है।

(Daily Chhattisgarh)  

लड़कियों के धड़ल्ले से, और बरसों से शोषण का एक साधारण समाधान...

13 सितंबर 2026  

 

छत्तीसगढ़ के नक्सल हिंसा मुक्त पूरी तरह आदिवासी जिले बीजापुर की एक भयानक खबर है। वहां एक सरकारी आवासीय स्कूल में एक कम्प्यूटर शिक्षक आधा दर्जन से अधिक छात्राओं से दो साल से अश्लील हरकत करते आ रहा था, और विरोध करने पर परीक्षा में फेल करने और बदनाम करने की धमकी देता था। अब ऐसी सात छात्राओं ने परिवार के साथ जाकर कलेक्टर से इसकी शिकायत की है, और मामले की जांच शुरू हुई है। इससे भी गंभीर बात यह है कि छात्राओं का कहना है कि उन्होंने प्राचार्य से जब भी इसकी शिकायत की, प्राचार्य ने धमकाकर उन्हें चुप रहने कहा। एक तरफ तो छत्तीसगढ़ की पहचान एक आदिवासी प्रदेश की है, दूसरी तरफ एक पूरी तरह आदिवासी इलाके में पढऩे का उत्साह रखने वाली बच्चियों के साथ ऐसी हरकत न सिर्फ शिक्षक कर रहा है, बल्कि प्राचार्य इन बच्चियों को ही धमका रहा है। ऐसे मामले प्रदेश में दूसरी जगह भी आए हैं, और लड़कियां जगह-जगह देह-शोषण का शिकार होती ही रहती हैं। और तो और राजधानी रायपुर में राज्य सरकार के एक सबसे प्रमुख, नामी-गिरामी स्कूल में वहां का शिक्षक लगातार लड़कियों को अश्लील संदेश भेजता था, और इसकी शिकायत करने के बाद भी इस पर कार्रवाई करवाने के लिए उनके पालकों को प्रदर्शन करना पड़ा था। राज्य बनने के पहले से ही आदिवासी इलाके इस तरह की मनमानी के अधिक शिकार रहते हैं क्योंकि यह मान लिया जाता है कि गरीब, या अनपढ़ आदिवासियों की कोई आवाज तो रहती नहीं है, वे शिकायत लेकर कहीं जाकर सुनवाई की उम्मीद भी नहीं कर सकते। चौथाई सदी पहले यह राज्य बन गया, लेकिन आज भी जगह-जगह से छात्राओं के शोषण की बात उसी तरह सामने आती है, जिस तरह देश के दूसरे कई प्रदेशों से आती है। ऐसा लगता है कि भारत में छात्राओं के शोषण की एक मजबूत संस्कृति बन चुकी है, और पांच-दस बरस की कैद का डर भी किसी बलात्कारी के हौसले पस्त नहीं करता। 

अब अगर कोई ऐसे लोगों को सजा मिल जाने को काफी मान लें, तो वह देश की लड़कियों के साथ बड़ी ज्यादती होगी। एक बार यौन शोषण हो जाए, उसके बाद जाकर मुजरिम को सजा मिले, तो उससे ऐसे जुल्म की शिकार लडक़ी का व्यक्तित्व, और उसका आत्मविश्वास तो पहले सरीखे हो नहीं सकते। एक बार हिन्दुस्तानी समाज में किसी लडक़ी या महिला के दिल-दिमाग में जख्म आ जाएं, तो वे जाते नहीं हैं। इसलिए सरकारों को लड़कियों पर मंडराते ऐसे खतरे सिरे से ही दूर करने चाहिए। मामूली फेरबदल से कुछ बदलते दिख नहीं रहा है, इसलिए कुछ बुनियादी परिवर्तन जरूरी हैं। शोषण आमतौर पर लड़कियों का ही होता है, और आमतौर पर पुरूष अध्यापक, या प्राचार्य, खेल प्रशिक्षक, या स्कूल-हॉस्टल के कर्मचारी ही करते हैं। इसलिए क्या लड़कियों की स्कूल शिक्षा में महिला कर्मचारियों के अनुपात को बढ़ाना कोई समाधान हो सकता है? क्या नियुक्ति के समय ही शिक्षिकाओं का आरक्षण बढ़ाकर इतना कर दिया जाए कि पुरूष शिक्षक अनुपात में हर जगह कम रहें, महिला शिक्षकों तक शोषण की शिकार लड़कियां अधिक आसानी से जा सकें? इस संभावना पर जरूर ही विचार करना चाहिए, क्योंकि इससे यौन शोषण का खतरा तो कम होगा ही होगा। दूसरी बात यह कि लड़कियों की स्कूल-कॉलेज में शोषण की शिकायत करने की व्यवस्था पुख्ता की जानी चाहिए। इसके लिए दूसरी स्कूल की शिक्षिकाओं को भेजकर छात्राओं से बंद कमरे में एक-एक कर यह जानकारी लेनी चाहिए कि क्या उन्हें किसी शोषण का शिकार होना पड़ रहा है? और फिर इसकी रिपोर्ट पर सरकार को गौर करना चाहिए। अपनी ही स्कूल में एक साथ काम करने वाले पुरूष और महिला शिक्षक एक-दूसरे के लिए हमदर्दी रख सकते हैं, और कुछ बातों को छुपा सकते हैं। इसलिए दूसरे स्कूल की महिलाओं को, या किसी दूसरे विभाग की महिलाओं को भेजकर ऐसी पूछताछ करनी चाहिए। यह भी होना चाहिए कि बच्चों और महिलाओं के लिए सरकार की जो हेल्पलाइन है, उस पर फोन करने के लिए स्कूल-कॉलेज की लड़कियों का प्रशिक्षण होना चाहिए, उनका हौसला बढ़ाना चाहिए, और उन्हें इस बात की एडवांस गारंटी देनी चाहिए कि उनका नाम, या उनका नंबर उजागर नहीं होगा। छोटी कक्षाओं की लड़कियों को जहां-जहां गुड टच, और बैड टच का फर्क समझाया जाता है, वहां से लड़कियों की शिकायतें आने लगती हैं। लड़कियों को उनके तन-मन के बारे में बेहतर समझ देने का काम भी करना चाहिए, और उन्हें शिकायत करने के अपने अधिकार, और अपनी जिम्मेदारी, दोनों की समझ देनी चाहिए। एक जागरूक लडक़ी अपने या किसी सहपाठिनी के हो रहे शोषण की सूचना देने का हौसला जुटा सकेगी। स्कूल-कॉलेज, खेल के मैदान, या ऐसे दूसरे प्रशिक्षण संस्थानों के साथ एक दिक्कत यह भी रहती है कि अगर यौन शोषक के खिलाफ जल्द ही शिकायत न हो, तो वे एक सीरियल मुजरिम की तरह आगे बढ़ते ही चले जाते हैं, और शोषण का सिलसिला कई दूसरी लड़कियों तक भी पहुंच जाता है। 

हम एक दूसरा तर्क भी देना चाहते हैं जो कि हम बरसों से इस कॉलम में लिखते आ रहे हैं। समाज में ताकतवर तबके जब कमजोर तबकों पर जुर्म करने पर उतर आते हैं, तो बलात्कार जैसे जुर्म में बलात्कारी की सम्पत्ति का एक हिस्सा बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला को देने का कानून बनाना चाहिए। अब हमें यह लग रहा है कि बलात्कारी शिक्षक-प्रशिक्षक, या हेडमास्टर-प्राचार्य के सरकार के पास जमा किसी भी तरह के धन का एक हिस्सा भी बलात्कार या यौन शोषण की शिकार लडक़ी को मिलना चाहिए। ऐसा इसलिए कि शिक्षक-शिष्या के संबंध में शिक्षक ताकतवर होते हैं, और शिष्या कमजोर होती है। फिर शिक्षक किसी शिष्या की हिफाजत के लिए पूरी तरह जिम्मेदार होते हैं, और जब चौकीदार ही चोर हो जाएं, इलाज करते डॉक्टर ही कातिल हो जाएं, थानेदार ही डकैत हो जाए, तो उन्हें अतिरिक्त सजा, और अतिरिक्त जुर्माने का इंतजाम होना चाहिए। 

फिलहाल हम अपने पहले समाधान पर लौटते हैं, सरकार को इस पर गौर करना चाहिए कि जहां कहीं छात्राएं पढ़ती या रहती हैं, जहां वे खेलती हैं, या कोई प्रशिक्षण पाती हैं, वहां पर महिला कर्मचारियों का अनुपात बढ़ाया जाए। किसी भी प्रदेश में स्कूल शिक्षा विभाग के कर्मचारी सबसे अधिक संख्या में रहते हैं। ऐसे में दसियों हजार महिला कर्मचारियों के लिए काम के अवसर भी पैदा होंगे। नियुक्ति के समय महिलाओं को अधिक आरक्षण देने से छात्राओं के शोषण की यह समस्या धीरे-धीरे खत्म होने लगेगी। यह कोई आदर्श समाधान नहीं है, लेकिन देश की स्थितियां भी आदर्श नहीं हैं, और असाधारण स्थितियां असाधारण समाधान की हकदार होती हैं। भारत में लड़कियों को आगे बढ़ाने बिना अगली चौथाई सदी बिना पूरी संभावनाओं तक पहुंचे गुजर जाएगी। इसलिए लड़कियों की पूरी पीढ़ी को आत्मविश्वास से भरने, और उनका बेहतर व्यक्तित्व विकास करने की जरूरत है, उसी से यह देश आगे बढ़ सकेगा, उसी से आधी आबादी को उसके जायज हक मिल पाएंगे, और उसी से यह देश एक बेहतर संस्कृति पा सकेगा, जो कि आज बहुत शर्मनाक है।

(Daily Chhattisgarh)   

पहले वाले पर खरोंच भी नहीं आई, बाजार ने पेश कर दिया नया मोबाइल...

12 सितंबर 2026  

 

अभी सैमसंग को मोबाइल फोन दो-ढाई लाख रुपए तक के आए, तो हैरानी होने लगी कि अभी दो दशक पहले तक तो इतने में छोटी कार आ जाती थी, लेकिन महीना गुजरा न गुजरा, अब एप्पल ने अपने नए मोबाइल फोन दो से चार लाख रुपए तक दाम के उतार दिए हैं। कुछ 30 बरस पहले तक मोबाइल फोन का ठिकाना नहीं था, शुरू भी हुए, तो वे सिर्फ टेलिफोन कॉल और संदेशों के लिए रहते थे, दाम भी सीमित रहते थे। अब ये इस्तेमाल से अधिक शान-शौकत, और सामाजिक दिखावे के सामान बन गए हैं। यह बात समाज के एक छोटे तबके को हैरान-परेशान करती है कि अभी डेढ़ लाख का फोन लिए हुए एक साल नहीं गुजरा है, और वह फोन गरीब लगने लगा, उसे लेकर चलना शर्मिंदगी लगने लगी क्योंकि दो-ढाई लाख के दूसरे फोन बाजार में आ गए थे। फिर अब एक कंपनी ने 3-4 लाख रुपए तक के फोन उतार दिए हैं। जिंदगी में जरा से वक्त पहले तक जिस टेक्नॉलॉजी की ही जरूरत नहीं थी, वह आज ऐसी महत्वपूर्ण हो गई है कि उसके बिना काम नहीं चलता, और इसके साथ-साथ कई लोगों का काम एक झूठी शान-शौकत के दिखावे के बिना भी नहीं चलता। इस्तेमाल कम और दिखावा ज्यादा, ऐसे सामान एक नंबर के पैसों से कम, दो नंबर के पैसों से ज्यादा खरीदे जाते हैं। स्मार्टफोन बाजार में आईफोन का नया महंगा मॉडल दो फीसदी से अधिक नहीं बिकेगा, लेकिन उसे लेकर हंगामा इतना हो चुका है कि लोग अब चर्चा करने लगे हैं कि एक किडनी बेचकर दो नए फोन आ जाएंगे, और समाज में इज्जत बच जाएगी। एक किसी ने सोशल मीडिया पर यह भी पोस्ट किया है कि उसके पास तीन-चार लाख रूपए तो जुटने वाले हैं नहीं, ऐसे में समाज उसे स्वीकार कर सकेगा, या नहीं? 

लोगों की जरूरत तो बीस हजार रूपए के स्मार्टफोन से भी पूरी हो सकती है, रात-दिन लोगों के घरों में सामान डिलीवर करने वाले लोग मोबाइल फोन का सबसे अधिक इस्तेमाल करते हैं, उस पर नक्शा देख-देखकर पहुंचते हैं, लेकिन उनके फोन भी दस-बीस हजार रूपए के भीतर के रहते हैं। इसलिए काम तो मामूली फोन से चल जाता है, लेकिन इज्जत के अहंकार का पेट उससे नहीं भरता। नतीजा यह होता है कि कुछ ब्रांड का हल्ला इतना हो जाता है कि गरीब घरों के बच्चे उसके चक्कर में कहीं जुर्म का पैसा कमाने लगते हैं, कहीं-कहीं अपने परिवार के भीतर से चोरी या लूट करने लगते हैं, अभी कुछ ही हफ्ते पहले केरल में एक स्कूली छात्रा ने अपने सहपाठियों को सुपारी देकर अपने ही दादा का कत्ल करवा दिया था ताकि वह अपने लिए महंगा मोबाइल फोन, और अपने दोस्त के लिए महंगी मोटरसाइकिल खरीद सके। कुछ ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिनमें महंगे ब्रांड के फोन के लिए मजदूरों के बच्चों ने खुदकुशी कर ली। 

यह बहुत ही हमलावर और हिंसक बाजार व्यवस्था है जो कि लोगों के भीतर एक स्थाई बेचैनी बनाकर चलती है। लोगों को जो हासिल है उससे हिकारत, और जो हसरतें हैं, उन्हें हमेशा ही लोगों के काबू के कुछ बाहर रखना ताकि वे दूसरे लोगों की देखादेखी उन हसरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष करते रहें, फिजूलखर्ची करते रहें। यह बाजारवाद ऐसा है जिसमें हजार रूपए के सामान पर किसी सबसे बड़े ब्रांड का ठप्पा लग जाए तो वह दस-बीस हजार रूपए में बिकने लगता है। कुछ लोगों को नकली सामानों की तलाश रहती है ताकि वे अपनी मामूली सी रकम से अपने असाधारण सपनों को पूरा कर सकें। चीन जैसे देश दुनिया के करोड़ों लोगों के ऐसे सपनों को पूरा करते हैं, और दस-बीस लाख रूपए की घड़ी वहां दो-तीन हजार रूपए में नकली बनाकर पेश कर दी जाती है। 

लेकिन एप्पल ने दुनिया में कई अलग किस्म की मिसालें पेश की हैं। उसने अपने कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन की क्वालिटी को लेकर दुनिया के सामने एक नया ही ऊंचा पैमाना पेश कर दिया है। इसके अलावा उसने अमरीकी सरकार जैसी हमलावर संस्था के सामने भी अपने ग्राहकों की गोपनीयता बनाए रखने की मिसाल पेश की है। फिर अपने प्रोडक्ट अनोखे बनाना, उसे हमेशा ही दूसरे मुकाबले से बहुत ऊपर रखना, ऐसी तमाम बातों से भी इस कंपनी ने एक ऐसी साख बनाई कि वह बहुत से लोगों का सपना बन गई। लेकिन भारत में लोगों को याद रखना चाहिए कि आज वे जितने का कोई फोन खरीदते हैं, उसके बाद उसे सस्ते फोन को रखना उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ हो जाता है, और फोन तो हर बरस नए आ जाते हैं। फोन के एक मॉडल का ठीक से इस्तेमाल किए बिना, उसके सारे फीचर्स को समझे बिना भी लोग अगले मॉडल पर जाने के एक दबाव में रहते हैं, क्योंकि उनके आसपास के लोग उनके पास पुराना मॉडल देखकर हैरान होते हैं, यह समझ लेते हैं कि उनके दिन ठीक नहीं चल रहे हैं। 

समझदारी इसी में है कि टेक्नॉलॉजी अपनी जरूरत के लायक, और अपनी क्षमता के भीतर की ही छांटी जाए। दुनिया में बहुत से ऐसे अरबपति भी हैं जो बरस-दर-बरस अपने पुराने ही मोबाइल फोन ही इस्तेमाल किए जाते हैं क्योंकि उससे उनकी जरूरत पूरी हो जाती है। आज समाज में दिखावे के लिए ऐसे महंगे सामान सबसे पहले, और सबसे अधिक उन्हीं लोगों के पास आते हैं जो इन्हें तोहफे या रिश्वत में पाते हैं, इसके अलावा जिनके पास बहुत सारा काला धन है, वे लोग भी ऐसी हर चीज को सबसे पहले लेते हैं। लोगों को अपने बच्चों के सामने भी अपनी क्षमता की एक सीमा साफ-साफ रख देनी चाहिए। वे कौन सी चीजें खरीद सकते हैं, और कौन सी नहीं, इसे भी बता देना चाहिए, और इसके साथ-साथ यह भी बता देना चाहिए कि परिवार में किसे किस चीज की जरूरत है, और किसे सिर्फ लेने का शौक है। 

दो लाख से चार लाख तक के मोबाइल लोगों के बीच दिल जलाने का काम तो करेंगे, लेकिन असली दिलवाले वे हैं जिनका दिल ऐसे गैजेट्स देखकर नहीं जलेगा।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 12 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

दीवारों पर लिक्खा है, 11 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

ट्रम्प के अमरीका को देखें, तो कुछ जाना-पहचाना नहीं लगता?

11 सितंबर 2026  

 

डॉनल्ड ट्रम्प ने कल अमरीका में मध्यावधि चुनाव के पहले अपनी पार्टी के एक बड़े कार्यक्रम में यह घोषणा की है कि ये मध्यावधि चुनाव अमरीका के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण चुनाव होंगे, और इनसे देश के अगले ढाई सौ बरस का भविष्य तय होगा। वहां पर मध्यावधि चुनाव से सरकारें नहीं बदलतीं, फिर भी ट्रम्प इस चुनाव को लेकर इस अंदाज में भाषण दे रहा है कि मानो यह राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा हो। लेकिन इससे भी बड़ी दिलचस्प बात यह रही कि उसने कहा कि अगर चुनावी नतीजों में अमरीकी संसद के दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत मिलेगा, तो हर वयस्क अमरीकी नागरिक को पांच हजार डॉलर दिए जाएंगे। यह रकम कुल मिलाकर खरबों में जाने वाली है, और अमरीकी विश्लेषक दो बातों पर गौर कर रहे हैं, कि यह पैसा आएगा कहां से? और दूसरा यह कि क्या वोट पाने के लिए ऐसी कोई घोषणा कानूनी भी है? 

यह आखिरी वाली बात अमरीका और भारत के बीच एक तुलना करने पर मजबूर कर रही है। भारत में अब धीरे-धीरे करके अधिकतर पार्टियां चुनावों में महिला मतदाताओं को डायरेक्ट कैश ट्रांसफर का लालच देने लगी हैं। अलग-अलग प्रदेशों में ऐसी योजना के नाम अलग-अलग रहते हैं। लेकिन इससे भी कुछ और पहले जाएं तो तीन हफ्ते पहले ट्रम्प ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नाम लेकर भारत की चुनाव व्यवस्था और वोटर आईडी की तारीफ की थी। उन्होंने मतदाता परिचय पत्र की तरह, अमरीका के सेव अमेरिका एक्ट के तहत नागरिकता सुबूत, और फोटो परिचय पत्र पर जोर दिया था। अब दिलचस्प बात यह है कि इसी वक्त भारत में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण, एसआईआर चल रहा है। और ट्रम्प ने अभी ताजा घोषणा की है कि अमरीकी जनगणना से एच-1बी वीजा धारकों को बाहर रखा जाए, और भारतवंशी छात्र भी ऐसी अमरीकी जनगणना से बाहर रहेंगे। भारत और अमरीका दोनों जगह आबादी के अलग-अलग हिस्सों को नागरिकता से बाहर करने की ये कोशिशें हैं तो अलग-अलग पैमानों की, लेकिन ये एक राजनीतिक समानांतर काम चल रहा है कि सत्ता का नापसंद लोगों को अलग कैसे किया जाए। अमरीका में एच-1बी वीजाधारकों में सबसे अधिक भारत के लोग हैं, और वे अमरीकी जनगणना में बाहर होने जा रहे हैं। कल के दिन लोगों को हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अगर ट्रम्प के कुछ अघोषित रहस्यमय सलाहकार भारत आकर ज्ञानेश कुमार से ट्रेनिंग लेकर जा रहे हों। 

आज ही एक अखबार में यह रिपोर्ट है कि भारत के एक बंगाली परिवार को किस तरह देश से निकालकर बांग्लादेश धकेल दिया गया था, और वहां एक बरस जेल में काटकर जब यह हिन्दुस्तानी बंगाली लौटा है, तो वह यह सवाल कर रहा है कि उसका कुसूर क्या था। जिस वक्त इस भारतीय नागरिक को गर्भवती पत्नी और बाकी परिवार के साथ अवैध करार देकर जून 2025 में बांग्लादेश में धकेल दिया गया था, तो दानिश नाम के इस मुस्लिम को बांग्लादेश ने साल भर जेल में बंद रखा, बाद में जब उसका मामला हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट में गया, तो सुप्रीम कोर्ट की दखल के बाद अब उसे भारत वापिस लाया गया है। लोगों को याद होगा कि ट्रम्प ने भी वहां कानूनी रूप से बसे हुए लोगों को इसी अंदाज से देश के बाहर भेज दिया था, और फिर अमरीकी अदालतों ने उन्हें वापिस लाने का हुक्म दिया था। जिस तरह भारत में एक राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाकर दूसरे देश का होने का आरोप लगाकर इसे चुनावी मुद्दा बनाया गया था, ठीक उसी तरह ट्रम्प अमरीका में प्रवासियों के खिलाफ मुहिम चला रहा है, और उसका सबसे बड़ा और बुरा निशाना हिन्दुस्तानी बन रहे हैं। 

भारत में मेक इन इंडिया नाम का एक बड़ा अभियान चल रहा है, और इस देश में अधिक से अधिक चीजों को खुद बनाने की एक मुहिम चल रही है। लेकिन दूसरी तरफ चीन के साथ सरहदी मुठभेड़ के बाद चीनी सामानों के बहिष्कार का जो अभियान चला था, वह किसी किनारे नहीं पहुंच पाया। 2020 में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर चीनी हमले के बाद से चीन से भारत का आयात लगातार बढ़ते चल रहा है। 2020-21 से 2024-25 के बीच भारत से चीन को निर्यात 33 फीसदी गिर गया, और चीन से भारत में आयात 74 फीसदी बढ़ गया। व्यापार का घाटा 125 फीसदी बढ़ गया, और आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि इन पांच बरसों में भारत के चीन के साथ कारोबार में भारत की करीब 384 बिलियन डॉलर की कमी आई है। दूसरी तरफ अमरीका ट्रम्प के वर्तमान कार्यकाल में जिस तरह दुनिया भर के सामानों पर टैरिफ लगाते जा रहा है, उससे खुद अमरीका में बाहर से आने वाले सामान अंधाधुंध महंगे हो रहे हैं, और ट्रम्प का मेक अमेरिका ग्रेट अगेन नाम का राष्ट्रवादी अभियान किसी किनारे नहीं पहुंच रहा, क्योंकि दूसरे देशों से आने वाला कच्चा माल इतना महंगा हो रहा है कि अमरीका में मैन्युफैक्चरिंग बढऩे के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। 

अब जब दोनों देशों की कई तरह की स्थितियों की तुलना की जा रही है, तो भारत इस मायने में बेहतर है कि इसने अपने आपको किसी भी जंग में उलझाकर नहीं रखा है। दोनों देशों में कई बातें राजनीतिक समानता की जरूर चल रही हैं, लेकिन भारत कुछ मामलों में ट्रम्प के अमरीका के मुकाबले अधिक समझदारी से चलते दिख रहा है। अब हम तो इस चर्चा को शुरू भर कर सकते थे, लोग चाहें तो अपनी-अपनी जानकारी, और समझ के मुताबिक इस तुलना को आगे बढ़ा सकते हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 10 सितंबर 2026





 

अपना घर छोड़ 22 सौ किमी दूर ओडिशा के जंगलों में कहां से पहुंचे ओरांग-गुटान बच्चे!

10 सितंबर 2026  

 

ओडिशा में अभी हैरान करने वाली बात। वहां बालासोर के इलाके में एक जंगल में पेड़ों पर पांच ओरांग-गुटान मिले। ये भारत के निवासी ही नहीं है, और सुमात्रा के जंगलों में पाए जाते हैं। वहां से वे ओडिशा कैसे पहुंचे, यह भी हैरानी की बात है। बंदर और चिम्पांजी जैसी एक नस्ल के ओरांग-गुटान के ये पांच बच्चे छह महीने से एक साल उम्र के हैं, इनमें भी सबसे छोटा बच्चा तो बहुत ही कम उम्र का है। ये दो हजार किलोमीटर से अधिक दूर इंडोनेशिया के सुमात्रा के टापू से पूरा समंदर पार करके ओडिशा के जंगल में कैसे आ गए, यह एक रहस्यमय पहेली है। स्थानीय सूचना बताती है कि इसी जंगल के आसपास रहस्यमय तरीके से एक काली थार गाड़ी देखी गई थी, और अब उसकी तलाश चल रही है। इनके आने की एक संभावना जिंदा वन्य जीवन तस्करी करने वाले लोग हो सकते हैं जो कि इस समंदर के रास्ते इन्हें ओडिशा लाए हों, और फिर जमीन के रास्ते भारत के किसी दूसरे हिस्से में ले जा रहे हों। भारत के अड़ोस-पड़ोस के कोई देश इतने संपन्न नहीं हैं कि जहां इस तरह के दुर्लभ जानवरों का भुगतान करने वाले लोग हों। भारत के जमीनी रास्ते से अगर कोई इन जानवरों को चीन ले जाने की बात सोचे, तो चीन का समुद्री रास्ता इंडोनेशिया, यानी सुमात्रा से करीब है, उसे इतने लंबे रास्ते की जरूरत नहीं है। लेकिन एक दूसरी खबर जो अभी-अभी आई है वह एक और चोरी की घटना बताती है। बांग्लादेश के गाजीपुर सफारी पार्क से मार्च 2025 में तीन रिंग-टेल्ड लेम्यूर चोरी हुए थे। बांग्लादेश की सीआईडी जांच के मुताबिक ये जानवर कई हाथों से गुजरने के बाद भारत लाए गए, और गुजरात के वनतारा वन्य प्राणी केन्द्र से जुड़े एक संस्थान को 48 लाख रूपए में बेचे गए। इस मामले में बांग्लादेश की अदालत में आठ आरोपियों से छह ने जुर्म मानते हुए बयान दिए हैं। बांग्लादेश की यह खबर वहां के सरकारी रिकॉर्ड में अच्छी तरह दर्ज है, और आज जब ओडिशा में इंडोनेशिया के ओरांग-गुटान इस तरह मिल रहे हैं, तो यह खबर याद पड़ती है। 

भारत से वैसे भी बहुत सारे प्राणी दुनिया के दूसरे देशों में भेजे जाते हैं, और वहां से भी दुर्लभ वन्य प्राणी भारत आते हैं। बहुत बड़े-बड़े, कई रंगों वाले तोते सरीखे काकातुआ भारत के संपन्न लोगों के घरों में दिखते हैं, वे तस्करी से ही आए हुए रहते हैं। इसी तरह कई अलग-अलग दुर्लभ नस्लों के छोटे कछुए लोग अपने घरों के मछलीघर में पालते हैं। भारत में प्रतिबंधित कुत्तों की कुछ नस्ल भी जगह-जगह लोगों पर हमला करते दिखती है, और उन्हें पालने वाले लोग बहुत संपन्न बददिमाग रहते हैं जिन्हें दूसरों की जिंदगी की कोई परवाह नहीं रहती। भारत के समुद्रतटों पर, हवाई अड्डों पर, कभी इस देश से बाहर ले जाते, तो कभी दूसरे देश से यहां लाते हुए तरह-तरह के प्राणी पकड़ाते हैं। इनके बारे में यह भी समझने की जरूरत है कि जब कानूनी रूप से इन्हें लाया, या ले जाया जाता है, उनकी तरह-तरह की चिकित्सकीय जांच होती है, जो कि भारत के लिए भी जरूरी होती है, और दूसरे देश के लिए भी। लेकिन गैरकानूनी कारोबार में ऐसी कोई जांच नहीं की जाती, और इन प्राणियों के साथ कई तरह के रोग पहली बार भारत पहुंच सकते हैं, या भारत से उन देशों में जा सकते हैं। लोगों को याद होगा कि दूसरे देश से किसी भी तरह के बीज या पौधे लाने पर भी दुनिया के अधिकांश जिम्मेदार देशों में बड़ी रोक लगी रहती है। ऐसे बीजों, या पौधों के साथ में कई तरह के नए रोग आ सकते हैं, जिसमें देश में पहले से मौजूद वनस्पतियों को खतरा हो सकता है। इसी तरह तस्करी से लाए गए जानवरों से भारत में पहले से मौजूद जानवरों को भी खतरा हो सकता है, और भारत के इंसानों को भी। 

इसके अलावा यह भी समझने की जरूरत है कि भारत में वन्य जीवन की तस्करी पर नजर रखने वाली केन्द्र सरकार की संस्था डीआरआई ने अभी कल ही पिछले दस दिनों की कार्रवाई की जानकारी जारी की है, जिसमें तेंदुए की दो खालें, 180 जिंदा इंडियन स्टार कछुए, एक दुर्लभ किस्म की एक दर्जन बड़ी छिपकलियां (टोके गेको), और पेंगोलिन के करीब 24 किलो छिलके, बाघ की आधा किलो हड्डियां जब्त की गई हैं, और करीब 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इसमें ओडिशा से लेकर मेघालय और असम तक कई जगह यह कार्रवाई हुई है। अभी कुछ हफ्ते पहले ही छत्तीसगढ़ के बस्तर और लगे हुए महाराष्ट्र के जंगलों में भी अवैध शिकार, और उससे हासिल जानवर की खाल जब्त हुई थीं, और इनमें तो वन विभाग के कर्मचारी भी शामिल मिले हैं। 

आज जब भारत जैसे देश में हर किस्म के जुर्म में शामिल मुजरिम बढ़ते चले जा रहे हैं, साइबर क्राइम से लेकर वाइल्ड लाईफ तस्करी तक बढ़ते चल रही है। ऐसे में इन्हें पकडऩे वाली एजेंसियों में भी जब कुछ भ्रष्ट लोग घुस जाते हैं, तो बाहर के मुजरिमों की ताकत कई गुना बढ़ जाती है। भारत कैसे चारों तरफ की सरहद से होने वाली तस्करी को रोक सकता है, यह उसके सामने एक बड़ी चुनौती है। जब तक अंतरराष्ट्रीय बाजार के खरीददार अच्छे दाम लेकर मौजूद रहेंगे, तब तक हिन्दुस्तान में अवैध शिकार, और तस्करी को खत्म कर पाना नामुमकिन है। आज तो हम हर दिन किसी न किसी प्रदेश में ऐसा कत्ल देखते हैं जिसमें जमीन-जायदाद की विरासत पाने के लिए आल-औलाद ही माँ-बाप को कत्ल कर देती है, ऐसे में जंगली जानवरों से भला किसको मोहब्बत हो सकती है? फिर आज तो गांव-गांव तक इंसानों, और फसलों पर जानवरों का जो खतरा मंडराता रहता है, वह भी भयानक है, उससे भी बहुत से इंसानों को एक बहाना मिलता है कि उन्हें अपने आपको बचाने के लिए जंगली जानवरों को मारना ही है, यह उनकी मजबूरी है। फिर भी आसमान से गिरे, और ओडिशा के जंगल के पेड़ों पर टंगे ओरांग-गुटान के बच्चे कई तरह के सवाल खड़े करते हैं। भारत में वन्य प्राणियों को रखने वाले निजी चिडिय़ाघरों, और दूसरे वैसे केन्द्रों को भी जांच-पड़ताल की जरूरत है।

(Daily Chhattisgarh)   

एआई से होने वाली किफायत मौलिकता की कीमत पर है...

09 सितंबर 2026  

 

कुछ मुद्दे ऐसे रहते हैं जिस पर न लिखने का इरादा रहे, तो भी आसपास कुछ न कुछ ऐसा होता है कि लिखना पड़ जाता है। जैसे ट्रम्प, या एआई, या धर्मान्धता। आज लिखने के लिए पेरिस के एफिल टावर पर स्वामिनारायण सम्प्रदाय के संन्यासियों का खड़ा किया गया बवाल एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन इस पर बहुत से दूसरे विश्लेषकों ने लिख दिया है, बहुत से लोगों के बयान आ गए हैं, और उस पर लिखने की जरूरत कुछ कम रह गई है। लेकिन एआई पर लिखने की जरूरत खत्म हो ही नहीं रही है। हर दिन दुनिया में कहीं न कहीं से एआई को लेकर ऐसी खबरें आती हैं कि नए खतरे दिखते हैं, और नई चुनौतियां भी दिखती हैं कि एआई की वजह से लोगों का सोचना कितना कम हो रहा है, दिमाग में कल्पना करने वाला हिस्सा, मौलिक सोचने वाला हिस्सा काम कम पा रहा है, चुनौतियां बिल्कुल नहीं पा रहा है, और धीरे-धीरे लोग अपने बहुत किस्म के काम एआई को ठीक उसी अंदाज में देते चले जा रहे हैं, जिस अंदाज में कोई बड़े नेता अपने भाषण लिखने का जिम्मा भाड़े, या तनख्वाह के लेखकों को देते चले जाते हैं। असल जिंदगी में यह देखने मिलता है कि नेताओं की अपनी सोच की मौलिकता, और कल्पनाशीलता उनके लिए रखे गए भाषण-लेखकों की वजह से घटती चलती है। अब जिन्हें लीडरशिप करनी है, चाहे वह किसी सरकार की हो, संगठन की, या कि किसी कंपनी की, अगर उनका सोचना कम होते चलेगा, तो धीरे-धीरे लीडरशिप की उत्कृष्टता भी घटने लगेगी। एक दूसरा खतरा यह भी रहता है कि मदद करने वाला एआई हो, या भाषण लिखने वाले पेशेवर लेखक हों, उनकी सोच के दायरे में लीडरों की सोच कैद होने लगती है। लेकिन लोगों को इसमें कुछ अटपटा इसलिए नहीं लगता है कि जिनकी रोजी-रोटी ही भाषण लिखने से चलती है, वे शब्दों के खिलवाड़ तो लीडर से बेहतर कर ही सकते हैं, और जब लोगों की वाहवाही  पेशेवर की लिखी लफ्फाजी से हासिल होने लगती है, तो फिर लीडर को मौलिक सोच की जरूरत और भी कम लगती है। एआई के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।

यह एक ऐसा मददगार औजार साबित हो रहा है जिससे लोगों का काम हल्का होते चल रहा है, गैस के गुब्बारे जैसा। एआई ऐसी आदत बिगाडऩे वाला रहता है कि अगर हम अपने अखबार के लिए उससे इसी जगह छपने वाला संपादकीय लिखवाना चालू करें, तो वह शायद हमसे ज्यादा सधी हुई भाषा में लिख देगा। जब किसी विषय पर रिसर्च करते हुए एआई से तथ्य तलाशने को कहा जाता है, तो वह बार-बार उकसाता भी है कि अगर आप चाहें तो मैं इस पर संपादकीय लिख दूं। फिर उसे बड़ी मुश्किल से रोकना पड़ता है कि लिखने के लिए विचार हमारे पास जरूरत से अधिक हैं, सिर्फ पुराने तथ्यों को ढूंढने के लिए एआई की जरूरत है, इसलिए हमारी रोजी-रोटी पर डकैती न डालें, और सिर्फ तथ्य ढूंढकर बताएं। इससे परे बहुत से ऐसे काम एआई अपनी तरफ से नए सुझाने लगता है जो कि मानवीय सीमाओं से परे के रहते हैं। कल ही कोई एक तथ्य ढूंढते हुए एआई से लंबी बातचीत हुई, तो उसने उन आंकड़ों को पिछले सवा सौ साल के रिकॉर्ड देखकर, उनका विश्लेषण करके सामने रखने का प्रस्ताव रखा। फिर उसके साथ विचार-विमर्श करते-करते कई तरह के पैमाने तय किए गए, कुछ अपवादों पर विचार किया गया, और फिर उससे विश्लेषण करवाया गया। किसी मानवीय क्षमता में इतना विश्लेषण आता नहीं है। नतीजा यह होता है कि असाधारण और तकरीबन नामुमकिन किस्म के काम जब एआई से होने लगते हैं, तो दिमाग उसी तरफ अधिक चलने लगता है कि ऐसा असाधारण विश्लेषण करना कितना अनोखा होगा। दिमाग की मौलिक सोच कम होने लगती है, और हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद एआई के इस्तेमाल से हमारी मेहनत पर भी असर पडऩे लगा है। यह तो कुछ मौलिक काम खुद करने की आदत अभी बनी हुई है, वरना एआई ने दिमाग पर पूरी तरह चर्बी चढ़ाने का प्रस्ताव रखना जारी रखा था। 

कई बरस पहले देश के संपादकों के एक सरकारी जमावड़े में, उत्तर-पूर्व के एक राज्य में कमजोर इंटरनेट के बीच संपादकीय लिखकर भेजना बड़ी चुनौती का काम था। वहां पर कुछ कल्पनाशील संपादकों ने यह तरीका निकाला था कि इंटरनेट पर कई ऐसी वेबसाइटें थीं जो हर दिन कई विषयों पर संपादकीय टिप्पणी लिखकर डालती थीं। बहुत से संपादक अपने दफ्तरों में इन्हीं में से किसी वेबसाइट से टिप्पणी लेकर संपादकीय छापने का जिम्मा किसी को दे आए थे। मतलब यह कि आज एआई जिस तरह लोगों को अलाल बनाने पर आमादा है, उस तरह का काम तो एआई के आने के दो दशक पहले से इंटरनेट पर मौजूद सामग्री ने करना शुरू कर दिया था। नामी-गिरामी संपादकों को भी यह अपमानजनक नहीं लगता था कि उनके अखबार के संपादकीय कॉलम में इंटरनेट से उठाकर सामग्री छाप दी जाए। अब एआई ने तो यह सहूलियत दे रखी है कि एक विषय पर किसी एक एआई से एक लाख अलग-अलग लोग अपनी थोड़ी सी सोच बताकर, उसे एक रूख या रूझान सुझाकर, भाषा शैली बताकर एक लाख किस्म के संपादकीय लिखवा सकते हैं। 

हमारी बातचीत अपने खुद के पेशे तक सीमित हुई चली जा रही है, जबकि लिखना तो एआई का एक बड़ा छोटा सा हिस्सा है, शायद उसकी क्षमता का सबसे आसान वाला एक-लाखवां हिस्सा। एआई का असली काम तो वैज्ञानिक, और कारोबारी विश्लेषण, और जरूरत पडऩे पर, मांगने पर निष्कर्ष सुझाने जैसा काम है। अब अगर दुनिया की कई कंपनियों में मैनेजमेंट ही लोगों पर यह बंदिश लगा रहा है कि वे अपने काम में एआई का भरपूर इस्तेमाल करें, एआई का इस्तेमाल न करने पर लोगों को नोटिस जारी हो रहे हैं, या उनकी नौकरियां ली जा रही हैं, तो फिर ऐसे में किसी भी क्षेत्र के मुखिया या लीडर अपने आपको एआई की आदत से कैसे बचा सकते हैं? एक तरफ तो उससे कई सहायकों की जरूरत खत्म हो रही है, काम जल्दी हो रहा है, पहले जो काम अकल्पनीय थे, अब कुछ पलों में हो जा रहे हैं, और फिर कंपनियां हैं कि एआई के अधिक से अधिक इस्तेमाल पर जोर दे रही हैं। तो ऐसे में किसी भी संगठन या कारोबार के नेता, या मीडिया में समाचार-विचार लिखने वाले लोग अपनी मौलिकता कब तक कायम रख सकते हैं? फिर आज आधी सदी से जो केलकुलेटर इस्तेमाल हो रहे हैं, जिनकी वजह से लोगों के दिमाग से पहाड़ा निकल ही चुका है, उसी तरह अब जिस रफ्तार से एआई का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लोगों की कल्पनाशीलता, और रचनात्मकता दोनों की छुट्टी होने का खतरा आ गया है। अभी न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी ने वहां की स्कूलों में आठवीं क्लास तक के बच्चों के लिए जनरेटिव एआई औजार इस्तेमाल करने पर एक साल के लिए रोक लगा दी है। आज कंपनियां खर्च में कटौती करने के लिए जिस तरह एआई को बढ़ावा दे रही हैं, उससे उन कंपनियों में काम आसान, और सस्ता तो हो रहा है, लेकिन कल्पनाशीलता, और मौलिकता का विसर्जन भी हो रहा है। इसके खतरे दिखते-दिखते दिखेंगे।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 9 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)


 

माफिया-धमकियों के बाद छोटे जज का हौसला, और बड़े जजों में वह गायब क्यों?

08 सितंबर 2026  

 

उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर के एक जिला जज ने पिछले पांच महीनों में दस चर्चित मामलों में 23 मुजरिमों को फांसी की सजा सुनाई है। उनका कहना है कि ऐसे फैसलों के बाद पश्चिम यूपी के माफिया-गैंगस्टरों ने उनसे संपर्क कर यह संदेश भिजवाया है कि वे उनके पीछे पड़े, तो वे कोर्ट बदलवा देंगे, या जिले के बाहर तबादला करवा देंगे। जज रविकुमार दिवाकर ने ऐसे एक मामले में जिंदा जलाई गई एक मुस्लिम महिला के पति को फांसी सुनाते हुए अपने ऊपर उठ रहे सवालों के जवाब भी लिखे हैं। उन्होंने लिखा- मेरे माता-पिता ने भगवान के सिवाय किसी अन्य से नहीं डरने की सीख दी है। अगर जज बाहुबलियों, माफिया, या मुजरिमों के दबाव में काम करने लगें, तो जनता का अदालत पर से भरोसा कमजोर हो जाएगा। यदि मैं ऐसी ताकतों से डर जाऊंगा, तो मेरे लिए अदालत से इस्तीफा देना ही बेहतर होगा। फैसले में उन्होंने लिखा है कि उन्हें यह संदेश भिजवाया गया है कि अभी उनके पास से सिर्फ फाइलें हटवाई गई हैं, और यदि वे उनके पीछे पड़े, या टिप्पणी की, तो वे अपनी ताकत का इस्तेमाल करके उनका कोर्ट बदलवा देंगे, या जिले के बाहर ट्रांसफर करा देंगे। 

अभी कुछ ही दिन हुए हैं कि उत्तर भारत में एक सिविल जज, शबीना खान ने अपने जिले की एक चर्चित आईएएस, दुर्गा शक्ति नागपाल पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने उनकी अदालत में चल रहे एक मुकदमे को लेकर उन्हें फोन करके उन पर दबाव डाला। जज का कहना है कि नागपाल ने अपने पद का हवाला देते हुए अपनी वरिष्ठता गिनाई, और अदालत में चल रहे एक मामले की चर्चा की, हाईकोर्ट में उनकी शिकायत करने, और केस ट्रांसफर करने की बात कही, और उनके संस्कार या आचरण पर टिप्पणी की। इस पर इस महिला जज ने खुली अदालत में इसकी चर्चा करके इसे अनुचित दबाव, और डराने की कोशिश बताया, और मुकदमा दूसरी अदालत में भेजने की मांग की। जिला जज ने केस को इसके बाद दूसरी अदालत में ट्रांसफर कर दिया। इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी नाराजगी जताई है, और इसे पहली नजर में अदालत की आजादी पर हमला करार देते हुए इसे आपराधिक अवमानना वाली पीठ के पास भेज दिया है। दिलचस्प बात यह है कि अवमानना की सुनवाई वाली अदालत के जज, जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव ने बिना कोई कारण बताए अपने को इस मामले से अलग कर लिया। अब यह किसी और अदालत में चलेगा। 

जो लोग जिला स्तर की अदालतों के कामकाज से वाकिफ रहते हैं, उन्हें इस तरह के कई अनैतिक दबावों की कहानियां याद रहती हैं। कुछ मामलों में जज भी खुद होकर कई अलग-अलग, कानून से परे की वजहों से मामलों को प्रभावित करते हैं, कई मामलों में जजों के गलत या खराब आचरण की भी चर्चा रहती है, और कई मामलों में उन पर राजनीतिक या अदालती दबाव भी आता है क्योंकि उनकी आगे की तैनाती सरकार और हाईकोर्ट दोनों पर निर्भर करती है। फिर यह भी है कि लोकतंत्र में हर तरह की बड़ी-बड़ी ताकतों से जुड़े मामले निचली अदालतों में आते-जाते रहते हैं, और वहां से किसी फैसले के बाद ही हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की बारी आती है। इसलिए छोटी अदालतों के जजों पर तरह-तरह के अनैतिक दबाव आते रहते हैं, इनमें अभी उत्तरप्रदेश का ताजा मामला सबसे ही भयानक दिख रहा है जिसमें माफिया-गैंगस्टर अपने लोगों को फांसी की सजा देने पर जज को तबादला करवा देने की धमकी दे रहे हैं। इससे न सिर्फ उनकी धमकी देने की ताकत दिखती है, बल्कि जैसा कि इस जज ने लिखा है, उनसे कुछ फाइलें या केस ले भी लिए गए, उससे ऐसा लगता है कि माफिया के हाथ ऊपर तक पहुंचे हुए हैं, या तो सरकार में ऊपर तक, या फिर न्यायिक प्रशासन में जिला जज के ऊपर कहीं तक। 

भारतीय लोकतंत्र में अब ऐसा भी नहीं रह गया है कि लोगों का भरोसा आखिर में आकर अकेली न्यायपालिका पर टिक गया है। बहुत से मामलों में देश की बड़ी-बड़ी अदालतों के फैसलों को लेकर भी जनता में बेचैनी और अविश्वास की नौबत आती है, और लोगों को लगता है कि जिनके साथ बड़ी बेइंसाफी हो रही है, बड़ा जुल्म हो रहा है, उन्हें सुप्रीम कोर्ट से भी इंसाफ नहीं मिल रहा है। इसलिए लोकतंत्र में जिस तरह बाकी स्तंभों पर से लोगों का भरोसा कम हुआ है, उसी तरह अदालतों पर से भी भरोसा घटा है। बीते कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट अपने मुख्य न्यायाधीश के स्तर पर ही जिस तरह की अविश्वास की फजीहत से घिरा हुआ है, वह देखने लायक है। वह सब कुछ तो एक पूरी तरह से अवांछित जुबानी टिप्पणी की वजह से शुरू हुआ मामला है, लेकिन हमारे जैसे लोग जो बारीकी से सुप्रीम कोर्ट, और देश के हालात देखते हैं, उन्हें यह दिखता है कि देश की सबसे खतरनाक नौबतों को भी सुप्रीम कोर्ट अनदेखा कर रहा है। 

यह नौबत बहुत निराशाजनक है। हिन्दुस्तान का अदालती इतिहास लोकतांत्रिक मूल्यों पर अड़े रहने वाले बहुत से जजों से भरा हुआ है। कई जजों ने समाज या सरकार की प्रचलित सोच के खिलाफ जाकर भी फैसले दिए थे। बहुत से जज ऐसे हुए जिन्होंने खुद होकर ऐसे मामलों की सुनवाई शुरू की, जिन्हें लेकर ताकतवर तबके बहुत खफा भी हुए। लेकिन आज तो हम यह देखकर हक्का-बक्का हैं कि अभी साल-दो साल के भीतर ही सुप्रीम कोर्ट ने नफरती-बयानों को लेकर हेट-स्पीच नाम से चर्चित जो आदेश दिया था, उसे देश भर में पांवोंतले कुचला जा रहा है, और सुप्रीम कोर्ट इसकी अनदेखी करने को ही सहूलियत की बात पा रहा है। अब ऐसे में किसी जिले के किसी जज को मिल रही धमकी के बाद भी अगर वह जिम्मेदारी और ईमानदारी से अपना काम करे, तो वह तारीफ की ही बात रहेगी, क्योंकि जिन सुप्रीम जजों के पास खोने को कुछ नहीं है, वे भी हौसले के काम नहीं कर पा रहे हैं।

(Daily Chhattisgarh)   

दीवारों पर लिक्खा है, 8 सितंबर 2026


(Daily Chhattisgarh)