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इस जन्नत में सिर्फ सैलानी बनना नामुमकिन

सुनील कुमार
पहली किश्त
कुछ लोग उसे धरती का स्वर्ग कहते हैं और कुछ लोग हिन्दुस्तान का। कुछ लोग उसे पाकिस्तान की तरफ धकेल देना चाहते हैं और कुछ लोग उसे आजादी दिलाना चाहते हैं, हिन्दुस्तान से। कुछ लोग यह मानकर चलते हैं कि कश्मीर की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हिन्दुस्तान के साथ नहीं है, और शायद पाकिस्तान के साथ वफादार है। यह हर कोई मानकर चलता है कि वह हिन्दुस्तान का सबसे खूबसूरत सूबा है और वहां के लोग भी सबसे खूबसूरत हैं। यह भी अधिकतर लोग मानकर चलते हैं कि कश्मीर महफूज नहीं है और वहां न सिर्फ आतंकी हमले होते रहते हैं बल्कि वहां की नौजवान पीढ़ी भी हाथों में पत्थर लिए राज्य और केंद्र सरकार के सुरक्षा बलों पर हमले करने के लिए रोजी पाती है। इसलिए जब करीब हफ्ते भर कश्मीर जाना हुआ, और पहली दफे जाना हुआ, तो जाहिर है कि कैमरा वहां पहुंचे बिना भी बहुत सी तस्वीरों दिमाग में बैठी हुई थी जिनसे आजाद होना नामुमकिन सा था।
लेकिन कश्मीर में एक हफ्ता गुजारने के बाद जो बात बहुत तल्खी से मुझे लगती है वह है सैलानियों के इस स्वर्ग की हकीकत जो कि स्वर्ग से बिल्कुल अलग है। जब वहां से फोन पर एक दोस्त से बात हुई और वहां देखे हाल की चर्चा उससे की, तो उसकी सलाह थी कि मैं एक सैलानी की तरह ही वहां घूमूं, न कि एक अखबारनवीस की तरह वहां आराम के अपने वक्त को काम में झोंक दूं। लेकिन यह सलाह मेरे लिए कुछ वैसी ही थी जैसी कि किसी आंख वाले को कहा जाए कि वह अनदेखा कर दे और कान वाले को कहा जाए कि वह अनसुना कर दे। ऐसा हो नहीं पाता है। जब दिल और दिमाग की हार्डडिस्क कश्मीर पर पांव धरने के पहले ही पढ़े और सुने से लबालब हो तब वहां महज सैलानी बनना नामुमकिन है। जिंदगी का तमाम मजा उठा लेने के बाद जिस तरह कोई दुबारा कुंवारा नहीं हो सकता, उसी तरह दूर बैठे कश्मीर को गौर से देखने और हमदर्दी से समझने के बाद कोई वहां महज सैलानी नहीं बन सकता।
फिर बात सिर्फ कश्मीर में आतंकवाद या वहां के अलगाववाद की नहीं है। बहुत सी दूसरी बातें कश्मीर के बाहर के, बाकी हिन्दुस्तान के लोगों के नजरिए की भी है जो कि कश्मीर को उतने ही शक के साथ देखते हैं जितने कि कश्मीर के लोग बाकी हिन्दुस्तान को। इस राज्य का इतिहास, पाकिस्तान से लगी इसकी सरहद, सरहद के पहले से चली आ रही रिश्तेदारियां, दहशतगर्दी, मजहब, मुस्लिम संस्कृति और इस राज्य पर राज करते आए नेताओं की बेइंतहा बेईमानी, ये तमाम बातें इस राज्य को एक अलग खूबी वाला इलाका बना देती हैं। यहां का इतिहास बाकी भारत के साथ बहुत सी खास शर्तों के साथ जुडऩे का रहा है और यहां के लोगों को यह पूरी तरह लगता है कि भारत की सरकार ने उन तमाम शर्तों को सोच-समझकर भुला दिया है और उसकी नीयत ही उन शर्तों को मानने की नहीं है। लेकिन ऐसी सोच के बाद भी यहां पहुंचने वाले सैलानियों से कश्मीरियों की कोई शिकायत नहीं है क्योंकि एक बड़े गरीब तबके और बाजार के एक तबके की रोजी-रोटी सैलानियों से ही जुड़ी हुई है। दूसरी तरफ यहां पहुंचने वाले लोगों का यहां से नजारों से परे कोई लगाव कम ही रहता है और उनमें से बहुत से इस सोच के साथ यहां आते हैं कि कश्मीर से छुटकारा क्यों न पा लिया जाए। इनमें से कुछ पाकिस्तान से अपनी नाराजगी के चलते ऐसा सोचते हैं तो कुछ लोग किसी और धार्मिक कारण से। लेकिन बहुत से लोग इस राज्य के भीतर एक अलगाववादी आंदोलन के चलते भी इसे बाकी हिन्दुस्तान पर एक बोझ मानते हैं।

इनमें से तमाम बातें एक सैलानी की तरह मुझे सड़कों के किनारे तो नहीं दिखीं लेकिन वहां के कुछ अखबारनवीसों, कुछ कारोबारियों और बहुत से साधारण गरीब लोगों से बात करते हुए यह एक तस्वीर उभरी।
कश्मीर में जो बात सड़क पर बिना किसी कोशिश दिखती है, वह है कदम-कदम पर बंदूकों की कतारें। कोई शहर, कोई सड़क, कोई चौराहा ऐसा नहीं है जो कि पुलिस से परे वाले केंद्रीय सुरक्षा बलों के हवाले न हो। राज्य की पुलिस अपने हुलिए से एक बहुत कमजोर सी दिखती है और उसके जिम्मे मोटे तौर पर सड़कों का ट्रैफिक दिखता है। इससे परे के तमाम अधिक नाजुक काम सीआरपीएफ जैसे केंद्रीय सुरक्षा बल देखते हैं जो कि बिना किसी हिचक राह चलते लोगों को धमकाने को भी अपना हक मान लेते हैं।
मुझसे मिलने मेरा एक दोस्त श्रीनगर से 50 किलोमीटर से अधिक दूरी से आया था। यह नौजवान कुछ महीनों पहले मुझे कश्मीर की चर्चा होने पर और वहां आने की हसरत बताने पर मुझे कह चुका था कि अगर ईमानदारी से लिखना हो तो ही आना वरना कश्मीर के बाहर के लोग आकर वहां के बारे में बेईमानी से ही लिखते हैं। उसने बताया कि पिछले कोई 20 बरसों से उसके घर पर सीआरपीएफ का कब्जा है क्योंकि  उसका शहर आतंक की कई घटनाओं वाला है। उसके परिवार को मकान से बाहर निकालकर बंदूकधारियों ने उस पर कब्जा कर लिया और तब से अब तक वे वहीं पर हैं। जब मैंने पूछा कि इसके खिलाफ क्या वे सरकार के पास या अदालत नहीं गए, तो उसका कहना था कि कश्मीर में सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार मिले हुए हैं उसके तहत वे ऐसा कोई भी काम कर सकते हैं, करते हैं, और उसके खिलाफ कोई सुनवाई नहीं है। उसने कहा कि एक एकड़ जमीन के बीच बने उनके पक्के और बड़े मकान का दो हजार रुपया भाड़ा देने की बात सीआरपीएफ ने की। इस मकान के चारों तरफ लगे सेब के बगीचे को काटकर उन्होंने फेंक दिया।
लेकिन ऐसी ही बेदखली की कुछ दूसरी कहानियां भी हैं। श्रीनगर में ऐसे अनगिनत खाली मकान खंडहर होते पड़े हैं जो कि एक वक्त कश्मीरी पंडितों के थे। आज से कोई 20 बरस पहले जब वहां से आतंकियों और अलगाववादियों ने इन हिंदू कश्मीरी पंडितों को भगाया तो उनकी जायदाद पर कुछ ने कब्जा कर लिया, कुछ के मकान जला दिए गए और उनमें से अधिकांश लोग अपने ही देश में शरणार्थी की तरह दिल्ली के रिफ्यूजी कैंपों में आकर रहने को मजबूर हुए। ऐसे मकान श्रीनगर की कई बस्तियों में हजारों दिखते हैं जिनकी खिड़कियों पर शीशों की जगह लकडिय़ां ठुकी हुई हैं और सरकार ने उनकी खरीद-बिक्री पर रोक भी लगा रखी है ताकि मुसीबत का माल औने-पौने में न बेचना पड़े। कश्मीरी पंडितों के बारे में दो दिन पहले भी श्रीनगर में अलगाववादी नेताओं के ये बयान छपे कि उन्हें घर लौट आना चाहिए और कश्मीर का समाज उनके बिना पूरा नहीं होगा और यह कि वे कश्मीरी समाज का एक अलग न होने वाला हिस्सा हैं। लेकिन कश्मीरी पंडितों का यह कहना है कि उनकी बेटियों के साथ बलात्कार की जैसी मुनादियों के बाद उन्हें कश्मीर छोडऩा पड़ा था, उन हालातों में तो कोई फर्क अब तक नहीं हुआ है और इस राज्य के हालात सरकार के काबू से परे हैं, तो वे वहां जाएं तो कैसे जाएं?
उनमें से जो कुछ लोग मुझे पहले से जानते हैं उनका मेरे कश्मीर पहुंचने से पहले और लौट आने के बाद भी यही कहना है कि जिस तरह इजराइल के हमलों से जख्मी फिलीस्तीनियों के साथ हमदर्दी जाहिर करने हम लोग कुछ महीने पहले एक कारवां में गाजा तक गए थे, उसी तरह का कारवां कश्मीर पंडितों के साथ हमदर्दी जाहिर करने हम कश्मीर तक क्यों नहीं निकालते? कश्मीरी पंडितों के ऐसे सवालों के जवाब पाने की कुछ उम्मीद मुझे खीरभवानी मंदिर में अष्टमी के दिन लगे कश्मीरी पंडितों के एक मेले से थी, लेकिन रात जब वहां हम पहुंचे तो वहां मौजूद हजारों लोग कीर्तन में लगे हुए थे और किसी सामाजिक-राजनीतिक चर्चा की गुंजाइश नहीं थी। साल के इस दिन वहां पर सबसे बड़ा मेला भरता है और वहां की बदइंतजामी देखकर यह लग रहा था कि छत्तीसगढ़ में ऐसे धार्मिक मेलों का इंतजाम बहुत अच्छा रहता है।
कश्मीरी पंडितों का मुद्दा भारत में राजनीतिक तबकों में इसलिए आसानी से भुला दिया क्योंकि इस मुद्दे पर जनसंघ और भाजपा ने एकाधिकार सा कर लिया था। लेकिन क्या इसी वजह से कोई देश के बहुसंख्यक समाज के इस ऐतिहासिक विस्थापन को अनदेखा कर सकता है? जो लाखों लोग अपने ही देश के भीतर अपने घर-कारोबार छोड़कर शरणार्थी बना दिए गए क्या उनके मुद्दे को लेकर ऐसा राजनीतिक परहेज किया जा सकता है? और हकीकत तो यह है कि यह किया जा रहा है और इतिहास में अच्छी तरह दर्ज इस आतंकी-विस्थापन के बारे में यहां पर और अधिक लिखने की गुंजाइश कम है।
हमारे टैक्सी ड्राइवर मकबूल भाई का कहना इस बारे में कुछ अलग था। उनका मानना था कि जब जगमोहन इस राज्य में गवर्नर था तब उसने ही कश्मीरी पंडितों को बाहर जाने के लिए उकसाया और कहा कि उसके बाद इस राज्य में कड़ी कार्रवाई करके आतंकियों और अलगाववादियों को निपटाया जाएगा। ऐसी बातों की मेरी जानकारी कुछ कम थी इसलिए मैं अधिक बहस की हालत में नहीं था। लेकिन मकबूल भाई ही मुझे श्रीनगर में कई बस्तियों में कश्मीरी पंडितों के बंद मकान भी दिखाते रहे और वे मकान भी दिखाते रहे जिन्हें कि दिल्ली में रह रहे कश्मीरी पंडितों ने किराए पर दे रखा है। इनमें मकान भी थे और बाजार की ईमारतें भी थीं।
पहले ही दिन मैंने मकबूल भाई का नाम सुनकर उन्हें कहा था कि उनके नाम का एक बड़ा पेंटर है जिसका काम करोड़ों में बिकता है। और मैंने उन्हें मकबूल फिदा हुसैन के साथ कुछ महीने पहले की अपनी मुलाकात के बारे में भी बताया। एक या दो दिन बाद ही हुसैन के गुजर जाने की खबर आई।
इस बीच जगह-जगह एक खास किस्म का कश्मीरी कहवा भी मिलते रहा जो बहुत हल्की चायपत्ती के पानी के साथ केसर, बादाम और दालचीनी जैसे कुछ मसालों को मिलाकर बिना किसी दूध के बनाया जाता है और जो इस तरह के किसी भी किस्म के पीने वाली चीजों के मुकाबले बहुत अधिक बेहतर लगता है। (बाकी कल से)