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एक झील जिसका कोई अंत नहीं दिखता, न झील का न उस पर छाए खतरों का

17 जून 2011
सुनील कुमार

श्रीनगर में लगे हुए एक बोर्ड से यह अहसास होता है कि सैलानियोंं पर कुछ या काफी हद तक चलने वाले कश्मीर के कारोबार के बावजूद वहां के पर्यटन विभाग का क्या हाल है। डल झील के किनारे पर्यटन विभाग के लगे एक बोर्ड में कहा गया है-''तीर्थों और बगीचों के शहर में आपका स्वागत हैÓÓ। जिस कश्मीर की एक सबसे बड़ी पहचान डल झील है और जो कि जाहिर तौर पर श्रीनगर की सबसे बड़ी पहचान है उसका कोई जिक्र भी पर्यटन विभाग के खुद के गढ़े नारे में नहीं है। लेकिन सरकार का कुल मिलाकर नजरिया इस हैरान कर देने वाली खूबसूरत झील के लिए ऐसा ही है। कुछ लोग इसे 22 वर्गकिलोमीटर के इलाके की झील बताते हैं और कुछ 24. लेकिन जब इसके चारों तरफ एक गाड़ी से चक्कर लगाया जाए तो साफ दिखता है कि इस सड़क के बाहर भी कई तरफ इस झील के हिस्से कटे हुए हैं जो कि अभी तक झील की शक्ल में ही हैं।
पुराने गं्रथ इस झील को 12वीं सदी में 75 वर्गकिलोमीटर जितना बताते हैं और 1983 में जब इसे नापा गया तो यहां पर झील कुल साढ़े 10 वर्गकिलोमीटर रह गई थी।
पिछली आधी सदी में डल झील पर चारों तरफ से इंसानों के हमले होते रहे और वहां पर काफी बड़े हिस्से में बस्तियां बस गईं, लोगों का कारोबार शुरू हो गया और अगर हमारे शिकारे वाले आशिक भाई की जानकारी सही है तो डल झील के भीतर की बस्ती कश्मीर की सबसे बड़ी विधानसभा सीट भी है। इस झील पर लाखों लोग बस गए हैं, उनके कच्चे और पक्के मकान इस पर हैं, उनके हाउस बोट इसी पर तैरते हैं, जिसमें आकर पर्यटक होटलों की तरह ठहरते भी हैं। उनके बाजार इसी पर हैं, तैरते हुए खेत इसी पर हैं, और सैलानियों से परे की डल झील की जिंदगी पूरे वक्त वहां पर चलते छोटे-छोटे निजी, गैर-सैलानी शिकारों से भी दिखती है जिन्हें अधिकतर औरत-बच्चे चलाकर घर के काम से आते-जाते दिखते हैं।
कहने को इस झील को कश्मीर का नगीना कहा जाता है लेकिन इस नगीने को इंसानों ने चारों तरफ से नोंच रखा है। झील के किनारे का बहुत सा हिस्सा तो ऐसा है जहां झील पर बस गई पक्की बस्ती के भीतर घुसने पर भी एक-आध किलोमीटर की गहराई तक चलते चले जाने पर भी झील की मौजूदगी पता नहीं लगती है। इन बस्तियों में पक्की सड़कें बन गई हैं, बिजली के ट्रांसफार्मर लगे हुए हैं और वहां मस्जिद भी बनी हुई है।
इंटरनेट पर डल झील के बारे में जो जानकारी मौजूद है उसे संस्कृत की किताबों में महासरित कहा गया है जिसके किनारे मां दुर्गा का निवास बताया गया है। मुगलों के वक्त श्रीनगर को मुगल शासकों ने गर्मी की रिहायश बनाकर रखा था इसीलिए कि शहर में इतना बड़ा मुगल गार्डन है कि आधे घंटे तक भीतर चलते जाने के बाद बीच में ही उसे छोड़कर हम वापिस निकल आए क्योंकि गर्मी बहुत तेज थी और इस बगीचे का कोई आखिरी सिरा दिख नहीं रहा था।
डल झील के पानी में पूरे ही इलाके में पानी के भीतर लगने वाली एक घास या झाड़ी सी फैली हुई है जिसे निकालने के लिए सरकार की मोटरबोटनुमा मशीन कुछ हिस्सों में चलते रहती है लेकिन बहुत से शिकारों पर लोग खुद भी इस पानी की घास को निकालते रहते हैं जिससे खाद बनने की जानकारी मिली।
इस झील को बीच से चीरते हुए शिकारे पर आरपार जाना और दिन की रौशनी से लेकर रात के अंधेरे तक इसकी रिहायशी बस्तियों और इसके सैलानी-बाजारों, इसकी हाउस बोटों की बस्तियों को देखकर जो एक बात समझ आती है वह यह है कि हिन्दुस्तान के शायद इस सबसे बड़ी झील का अस्तित्व घटते चल रहा है और सरकारें कुछ तो गरीबों को जीने की जगह देने के लिए और कुछ वोट पाने के लिए यहां अवैध बस्तियां बनाए हुए हंै। इसमें शहर की गंदगी ठीक उसी तरह आकर मिल रही है जिस तरह किसी भी दूसरे शहर में नाले जाकर नदियों में मिलते हंै। केंद्र सरकार और राज्य सरकार इसके लिए सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च कर चुकी हैं लेकिन श्रीनगर के लोगों का यह अंदाज बहुत गलत नहीं लगता कि लोग वह पैसा खा चुके हैं वरना इतना बुरा हाल कायम नहीं रहता। डल लेक को तबाही से बचाने के लिए दस बरस के भी पहले से सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगी हुई है, लेकिन अदालती निगरानी के बाद भी इसकी बर्बादी का कोई अंत नहीं है।
कश्मीर के कुछ दस्तावेज बताते हैं कि 18वीं और 19वीं सदी से ही इंसान का इस झील में दखल शुरू हो गया है और अब यहां पर दसियों हजार मकान बने हुए हैं जिनमें लाखों लोग रह रहे हैं और इन सबकी निस्तारी की गंदगी सीधे डल झील में उसी तरह जाती है जिस तरह सैलानियों की हाउस बोट से।
डल झील के तैरते हुए खेतों से आने वाली सब्जी कुछ अलग दाम से बिकती है। यह अपने-आपमें इटली के वेनिस की तरह का एक शहर है जिसमें सड़कें पानी की हैं। यहां के कच्चे-पक्के हर घर के सामने शिकारा बंधे दिखता है और छोटे-छोटे बच्चे भी मैदान में खेलने की तरह अपने शिकारे लेकर सैलानियों के करीब से गुजरते दिखते हैं। औरतें बहुत छोटे बच्चों को गोद में रखे शिकारे के एक सिरे तक बैठकर जिस खूबी के साथ चप्पू चलाती हैं, उसे देखकर नए सैलानियों का दिल कुछ अधिक तेजी से धड़कने लगता है। लेकिन आशिक भाई के मुताबिक इसकी गहराई बहुत अधिक नहीं है। पानी बहुत से हिस्सों में बहुत साफ है लेकिन यहां के रहने वालों और सैलानियों की मिली-जुली लापरवाही से बस्तियों के बीच का झील का हिस्सा प्लास्टिक की गंदगी वाला दिखने लगा है। एक पल को यह लगा कि हमारी तरह सैलानी भी अगर प्लास्टिक का कोई चिमटा लिए हुए, यूरोपियन लोगों की तरह आम जगहों से कचरा उठाने का जिम्मेदारी का काम करने लगे तो रोज उठते हुए यह कचरा कम भी हो जाएगा।
एक सैलानी के नजरिए से देखें तो तैरते हुए खेत अपने-आपमें एक हैरानी की बात हैं जिन्हें कि लकडिय़ों के छोटे-छोटे खंबे गड़ाकर बांधकर रखा जाता है वरना हो सकता है कि कोई उन्हें खींचकर-धकेलकर ले जाए। लेकिन आशिक भाई का कहना है कि यहां कोई चोरी नहीं होती और मानो इसे साबित करने के लिए उन्होंने मेरे लैपटॉप का बैग अपने सुनसान शिकारे में छोड़कर हमको एक हस्तशिल्प की बड़ी दूकान में ले जाना तय किया था। महंगा कैमरा, महंगा लैपटॉप, बैग, इन सबको शिकारे में छोड़कर इधर-उधर चले जाना और लौटकर उसे घुप्प अंधेरे में भी खुले पानी में ज्यों का त्यों पाना कुछ हैरानी की बात थी। लेकिन यही हाल हमारी गाड़ी के ड्राइवर मकबूल भाई का था जो कि किसी भी जगह ताला लगाने को गैरजरूरी समझते थे, सिवाय गुलमर्ग के। कश्मीर का यही एक ऐसा पर्यटन केंद्र मिला जहां पर लोग सैलानियों को लूटने, ठगने पर आमादा थे और इसके लिए तैयार न होने वाले सैलानियों से बदतमीजी करने में कोई कसर नहीं रखते थे। ऐसा ही हादसा और भी बहुत से लोगों का वहां से लौटने के बाद सुनने में आया और वहां जाने के पहले भी लोगों ने उसी एक जगह के लिए सावधान किया था। भले लोगों के कश्मीर में इस एक जगह की बदमाशी के बारे में लोगों का कहना है कि वहां के लोगों ने दुनिया कम देखी है और इसलिए एक बार हाथ आए सैलानियों से सोने का अंडा निकाल लेना चाहते हैं।
डल झील जितनी सैलानियों के लिए है उससे कहीं बहुत अधिक वहां के लोगों के लिए है। और हिन्दुस्तान की शायद इस सबसे बड़ी झील, सबसे खूबसूरत झील के एक बहुत बड़े हिस्से का बेजा इस्तेमाल वहां के लोगों की बस्ती की शक्ल में हो रहा है। इस झील पर सर्दियों से परे शिकारे चलते हैं जिनसे चलाने वालों के 300 रुपए घंटे मिल जाते हैं। लेकिन अधिकतर आम सैलानी को इस पर बस गई गंदी बस्तियों को घूमने शिकारे से जाएंगे नहीं, और इनके बढ़ते जाने से उन्हीं में बसे हुए शिकारे वालों के पेट पर भी लात पड़ेगी।
डल झील पर सिर्फ इंसानों का हमला नहीं हुआ, आतंक का हमला भी हुआ है। पाकिस्तान से आए जितने आतंकी हमले कश्मीर और श्रीनगर पर हुए उनसे वहां सैलानियों का जाना एकदम घट गया और बिना सैलानियों के डल झील की रोजी-रोटी खत्म सी हो चुकी थी। अभी भी जब सर्दियों में यह झील बर्फ का एक मैदान बन जाती है तो शिकारे बेरोजगार हो जाते हैं।
सैलानियों के शिकारे तैरते हुए इसी झील में तैरती हुई दुकानों तक पहुंचते हैं जहां पर पूरे हफ्ते के सबसे जायकेदार पकौड़े गरमागरम बनकर मिले और जहां शानदार कश्मीरी कहवा भी मिला। लेकिन इन सबके दाम देश के कुछ दूसरे सैलानी शहरों जितने नहीं थे, और न ही श्रीनगर के सबसे व्यस्त सैलानी इलाकों में रेस्त्रां महंगे थे। कश्मीर दूर से जितना महंगा होने का खौफ पैदा करता है, उतना महंगा वह है नहीं।
इसी झील के एक सिरे पर हजरत बल दरगाह है जिसके बारे में पाठकों को याद होगा कि वहां कई बरस पहले पाकिस्तान से आए आतंकियों ने कब्जा कर लिया था और वहां पर रखे हुए मोहम्मद पैगंबर के एक बाल की वजह से मुस्लिम समुदाय बहुत बुरी तरह विचलित हो गया था। ऐसी मान्यता है कि यह बाल उनके एक वंशज 1635 में हिन्दुस्तान लाए थे और बीजापुर में बस गए थे। बाद में जब मुगल बादशाह औरंगजेब को इसके बारे में पता लगा तो उसने यह बाल जब्त करके अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर भेज दिया। बाद में इसके कश्मीर तक पहुंचने की एक अलग लंबी कहानी है लेकिन यह सब सन् 1700 के पहले हो चुका था।
यह दरगाह डल झील के किनारे बहुत बड़ी है और हैरानी की हद तक साफ-सुथरी भी है। इसे याद करने के इसी सफर के दौरान खीर भवानी मंदिर याद पड़ता है जहां पर कि नंगे पैर चलना भी दहशत से भर दे रहा था, और जहां से जूते-चप्पल मिनटों में चोरी होते दिख रहे थे। हजरत बल दरगाह की डल झील से जुड़ी सीढिय़ों पर कश्मीर के इस पूरे हफ्ते का अकेला ऐसा नौजवान जोड़ा बैठे दिखा जो एक आम जगह पर कंधे और सिर सटाए बात कर रहा था। इस दरगाह में तैनात एक कश्मीरी महिला पुलिस की सेब से लाल गाल देखकर मैं यह तरकीब ढूंढ रहा था कि किस तरह उसकी तस्वीर लूं। लेकिन फिर हमारे साथ चल रहे एक समझदार दिमाग से यह चेतावनी निकली कि अगर मैंने उसकी तस्वीर ली तो मेरे भी गाल उसी तरह से लाल हो जाएंगे। (बाकी कल)