18 जून 2011
सुनील कुमार
कश्मीर में श्रीनगर की दीवारों पर कई जगह कुछ नारे मिटाए हुए दिखते हैं। मेरे कश्मीरी दोस्त बताते हैं कि वहां हिन्दुस्तानियों को वापिस जाने के लिए लिखा हुआ था। आगे चलकर वैसे नारे कहीं दीवारों पर दिख जाते हैं, तो कहीं बिजली के खंभों पर। हजरत बल दरगाह के ठीक बगल की दीवार पर भी हिंदुस्तानी कुत्तों को लौट जाने को कहा गया था।
एक तबके की सरकारों से नफरत का कोई अंत नहीं है। राज्य की सरकार पर भरोसा नहीं है और केंद्र की सरकार को कश्मीर के बहुत से लोगों ने कभी ऐसा पाया नहीं कि उससे हमदर्दी की उम्मीद हो।
दरअसल कश्मीर के बाहर के हिन्दुस्तानी भी कश्मीरियों को बाकी देश से बाहर का गिनने में पीछे नहीं रहते। कुछ महीने पहले के पांच हफ्ते से अधिक के मरे गाजा कारवां में कश्मीरी नौजवानों से बात करते हुए ऐसे गैरकश्मीरी भी उलझ जाते थे जो कि वैसे धर्मनिरपेक्ष थे, साम्प्रदायिकता विरोधी थे, ट्रेड यूनियनों के थे।
लेकिन जिन गुजराती पर्यटकों से कश्मीर लबालब था और जिनकी गुजराती जुबान कश्मीरी बोली के बाद हवा में तैरती दूसरी सबसे बड़ी बोली थी, उनके ट्रैवल एजेंट की समझ भी शून्य थी। गुजरात से सैलानियों का थोक में यहां लाने वाले एक ट्रैवल एजेंट के बड़े-बड़े बैनर सभी सैलानी-मुकामों पर लगे हुए थे- ''डरो नहीं, यहां भी इंसान बसते हैंÓÓ।
ये बैनर बता रहे थे कि बाहर के लोग कश्मीर को हैवानों की बस्ती मानते हैं और यह ट्रैवल एजेंट गुजरात के लोगों को बड़ी हिम्मत बंधाकर यहां लाया है। खैर कश्मीर में किसी ने शायद हिन्दी में बने इन बैनरों को शायद पढ़ा-समझा नहीं इसलिए वे जगह-जगह सजे थे।
लेकिन कश्मीरी लोगों की बात करें तो गुलमर्ग के एक दिन के बुरे अनुभव को छोड़कर हमें कहीं शिकायत नहीं हुई। सरकार से शिकायत रही लेकिन बाकी तमाम जगहों के लोगों से शिकायत नहीं रही। लगभग तमाम लोगों को अपने भले मिजाज के साथ-साथ यह समझ भी है कि सैलानी हैं तो बहुतों की रोजी-रोटी है। लेकिन उनकी समझ से परे बाकी लोगों की उनके बारे में समझ गड़बड़ है। जब बाकी हिन्दुस्तान के लोगों में से एक तबका कश्मीर को एक गूमड़ मानकर सोचता है कि इसे नश्तर से अलग कर देने में क्या बुराई है, तो यह कश्मीरियों को दूर धकेलने वाली सोच है।
श्रीनगर पहुंचकर हम होटल में कुछ घंटे पसरे ही थे कि टीवी पर खबर आने लगी कि होटल से जरा ही दूरी पर लाल चौक पर गोली बारी हो गई और एक आम आदमी मारा गया। लेकिन सउ़क पर की जिंदगी पर इसकी न कोई झलक थी, न कोई चर्चा गोली से मौत की थी। श्रीनगर की डल झील के सैलानी-किनारे पर लोग कचरा फैलाते मस्ती में घूम रहे थे।
शाम के साथ-साथ डल की इस सैलानी पट्टी के दो-तीन किलोमीटर में गाडिय़ां फंसने लगीं और डीजल के धुएं से हवा यूं भारी होने लगी कि हम किसी बड़े शहर के ट्रैफिक जाम के बीच हैं। एक तरफ डल झील के पानी पर रौशनी खेल रही थी, तो दूसरी ओर सड़कें शोर और धुएं से लबालब थी। नाक और आंख जलने से यह भरोसा ही नहीं हो रहा था कि इसी को धरती का स्वर्ग कहते हैं।
जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में वर्दियों की भरमार है लेकिन सरकार असरकार नहीं है। जो डल झील कश्मीर की शान है, उसका रखरखाव भी सरकार नहीं कर रही है। सड़कों पर भीड़ को काबू करने का कोई असरदार इंतजाम नहीं है। भारत के दूसरे बहुत से प्रदेशों की तरह यहां भी बिजली जाती रहती है और श्रीनगर से चारों तरफ आते-जाते अंधेरे कस्बे, शहर दिखते रहते हैं।
डल झील के सामने ही एक पहाड़ी पर शंकराचार्य का मंदिर है उसके रास्ते पर गाडिय़ां फंसी रहती हैं और मकबूल भाई ने बताया कि ऐसी ही भीड़ में कुछ गाडिय़ां पहाड़ी से लुढ़क भी चुकी हैं। हम किसी तरह उस मंदिर तक पहुंच ही रहे थे कि फोन पर खबर मिली कि पाकिस्तान से आए हुए कबीर शाह का पता लग गया है। फिर मंदिर छोड़ हम सब नीचे उतरे और मैं करीब 75 किमी दूर के गांव के लिए रवाना हो गया, उस इंसान से मिलने जो 68 बरस बाद घर लौटा था।
श्रीनगर शहर के पुराने इलाके को, पुराने रिहायशी इलाके को अमरीकी अंदाज में डाऊन टाऊन कहा जाता है। यह इलाका जल्द भड़क जाता है, पत्थर उठा लेता है, यहीं आतंकी छुप जाते हैं तो मुठभेड़ में यहां के मकान भी जल जाते हैं। यह पुराना इलाका तकरीबन पूरा ही, फटेहाल-खस्ता इमारतों वाला है, तकरीबन पूरा इलाका मुस्लिम भी है। यहां सैलानियों को कोई नहीं लाता लेकिन हम लोग कुछ घंटे यहां घूमे। उस वक्त वहां कोई तनाव नहीं था लेकिन श्रीनगर के बाशिंदों का कहना था कि तनाव यहीं से शुरू होता है।
श्रीनगर में अखबारों के तमाम दफ्तर एक साथ हैं। मुझे लगता था कि यहां चौकसी कुछ अधिक होगी। लेकिन पूरे इलाके में भी एक भी पुलिस नहीं दिखी। कभी-कभी यह सुनाई पड़ता था कि आतंकी अखबारों को धमकाते हैं, लेकिन अभी न तो मिलिटेंट्स की अधिक हलचल है, न उनकी दहशत। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में माओवादी होने का दावा करने वाले नक्सली जितनी हत्याएं कर रहे हैं, कश्मीर में उससे तो काफी कम ही मौतें सुनाई पड़ती हैं। हम जिस एक हफ्ते वहां रहे उसमें श्रीनगर के लाल चौक पर हुई एक आम नागरिक की मौत और जम्मू इलाके के डोडा जिले में दो आतंकियों के मारे जाने की ही खबर थी।
सैलानी भी वहां मारे गए, दो या तीन, लेकिन आतंकी हमले में नहीं, बादल फट जाने से गिरे पानी में बहकर। लोगों के घूमने में कोई कमी नहीं है। पूरे कश्मीर में सैलानियों को देखते हुए आधे से अधिक ही रेस्तरां शाकाहारी हैं। इनमें से बहुत से अपने नाम के साथ वैष्णव शब्द जोड़ लेते हैं ताकि शाकाहारी होने की गंभीरता बढ़ जाए। जैन थाली, गुजराती थाली, मराठी थाली, पंजाबी थाली के बोर्ड जगह-जगह दिखतेहैं। लेकिन पूरे श्रीनगर की अकेली पानी की दूकान पर बंगाली पान दूकान का बोर्ड लगा है, वैसे उसे एक कश्मीरी परिवार ही साठ बरस से डल गेट पर चला रहा है। (बाकी सोमवार से आगे)
सुनील कुमार
कश्मीर में श्रीनगर की दीवारों पर कई जगह कुछ नारे मिटाए हुए दिखते हैं। मेरे कश्मीरी दोस्त बताते हैं कि वहां हिन्दुस्तानियों को वापिस जाने के लिए लिखा हुआ था। आगे चलकर वैसे नारे कहीं दीवारों पर दिख जाते हैं, तो कहीं बिजली के खंभों पर। हजरत बल दरगाह के ठीक बगल की दीवार पर भी हिंदुस्तानी कुत्तों को लौट जाने को कहा गया था।
एक तबके की सरकारों से नफरत का कोई अंत नहीं है। राज्य की सरकार पर भरोसा नहीं है और केंद्र की सरकार को कश्मीर के बहुत से लोगों ने कभी ऐसा पाया नहीं कि उससे हमदर्दी की उम्मीद हो।
दरअसल कश्मीर के बाहर के हिन्दुस्तानी भी कश्मीरियों को बाकी देश से बाहर का गिनने में पीछे नहीं रहते। कुछ महीने पहले के पांच हफ्ते से अधिक के मरे गाजा कारवां में कश्मीरी नौजवानों से बात करते हुए ऐसे गैरकश्मीरी भी उलझ जाते थे जो कि वैसे धर्मनिरपेक्ष थे, साम्प्रदायिकता विरोधी थे, ट्रेड यूनियनों के थे।
लेकिन जिन गुजराती पर्यटकों से कश्मीर लबालब था और जिनकी गुजराती जुबान कश्मीरी बोली के बाद हवा में तैरती दूसरी सबसे बड़ी बोली थी, उनके ट्रैवल एजेंट की समझ भी शून्य थी। गुजरात से सैलानियों का थोक में यहां लाने वाले एक ट्रैवल एजेंट के बड़े-बड़े बैनर सभी सैलानी-मुकामों पर लगे हुए थे- ''डरो नहीं, यहां भी इंसान बसते हैंÓÓ।
ये बैनर बता रहे थे कि बाहर के लोग कश्मीर को हैवानों की बस्ती मानते हैं और यह ट्रैवल एजेंट गुजरात के लोगों को बड़ी हिम्मत बंधाकर यहां लाया है। खैर कश्मीर में किसी ने शायद हिन्दी में बने इन बैनरों को शायद पढ़ा-समझा नहीं इसलिए वे जगह-जगह सजे थे।
लेकिन कश्मीरी लोगों की बात करें तो गुलमर्ग के एक दिन के बुरे अनुभव को छोड़कर हमें कहीं शिकायत नहीं हुई। सरकार से शिकायत रही लेकिन बाकी तमाम जगहों के लोगों से शिकायत नहीं रही। लगभग तमाम लोगों को अपने भले मिजाज के साथ-साथ यह समझ भी है कि सैलानी हैं तो बहुतों की रोजी-रोटी है। लेकिन उनकी समझ से परे बाकी लोगों की उनके बारे में समझ गड़बड़ है। जब बाकी हिन्दुस्तान के लोगों में से एक तबका कश्मीर को एक गूमड़ मानकर सोचता है कि इसे नश्तर से अलग कर देने में क्या बुराई है, तो यह कश्मीरियों को दूर धकेलने वाली सोच है।
श्रीनगर पहुंचकर हम होटल में कुछ घंटे पसरे ही थे कि टीवी पर खबर आने लगी कि होटल से जरा ही दूरी पर लाल चौक पर गोली बारी हो गई और एक आम आदमी मारा गया। लेकिन सउ़क पर की जिंदगी पर इसकी न कोई झलक थी, न कोई चर्चा गोली से मौत की थी। श्रीनगर की डल झील के सैलानी-किनारे पर लोग कचरा फैलाते मस्ती में घूम रहे थे।
शाम के साथ-साथ डल की इस सैलानी पट्टी के दो-तीन किलोमीटर में गाडिय़ां फंसने लगीं और डीजल के धुएं से हवा यूं भारी होने लगी कि हम किसी बड़े शहर के ट्रैफिक जाम के बीच हैं। एक तरफ डल झील के पानी पर रौशनी खेल रही थी, तो दूसरी ओर सड़कें शोर और धुएं से लबालब थी। नाक और आंख जलने से यह भरोसा ही नहीं हो रहा था कि इसी को धरती का स्वर्ग कहते हैं।
जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में वर्दियों की भरमार है लेकिन सरकार असरकार नहीं है। जो डल झील कश्मीर की शान है, उसका रखरखाव भी सरकार नहीं कर रही है। सड़कों पर भीड़ को काबू करने का कोई असरदार इंतजाम नहीं है। भारत के दूसरे बहुत से प्रदेशों की तरह यहां भी बिजली जाती रहती है और श्रीनगर से चारों तरफ आते-जाते अंधेरे कस्बे, शहर दिखते रहते हैं।
डल झील के सामने ही एक पहाड़ी पर शंकराचार्य का मंदिर है उसके रास्ते पर गाडिय़ां फंसी रहती हैं और मकबूल भाई ने बताया कि ऐसी ही भीड़ में कुछ गाडिय़ां पहाड़ी से लुढ़क भी चुकी हैं। हम किसी तरह उस मंदिर तक पहुंच ही रहे थे कि फोन पर खबर मिली कि पाकिस्तान से आए हुए कबीर शाह का पता लग गया है। फिर मंदिर छोड़ हम सब नीचे उतरे और मैं करीब 75 किमी दूर के गांव के लिए रवाना हो गया, उस इंसान से मिलने जो 68 बरस बाद घर लौटा था।
श्रीनगर शहर के पुराने इलाके को, पुराने रिहायशी इलाके को अमरीकी अंदाज में डाऊन टाऊन कहा जाता है। यह इलाका जल्द भड़क जाता है, पत्थर उठा लेता है, यहीं आतंकी छुप जाते हैं तो मुठभेड़ में यहां के मकान भी जल जाते हैं। यह पुराना इलाका तकरीबन पूरा ही, फटेहाल-खस्ता इमारतों वाला है, तकरीबन पूरा इलाका मुस्लिम भी है। यहां सैलानियों को कोई नहीं लाता लेकिन हम लोग कुछ घंटे यहां घूमे। उस वक्त वहां कोई तनाव नहीं था लेकिन श्रीनगर के बाशिंदों का कहना था कि तनाव यहीं से शुरू होता है।
श्रीनगर में अखबारों के तमाम दफ्तर एक साथ हैं। मुझे लगता था कि यहां चौकसी कुछ अधिक होगी। लेकिन पूरे इलाके में भी एक भी पुलिस नहीं दिखी। कभी-कभी यह सुनाई पड़ता था कि आतंकी अखबारों को धमकाते हैं, लेकिन अभी न तो मिलिटेंट्स की अधिक हलचल है, न उनकी दहशत। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में माओवादी होने का दावा करने वाले नक्सली जितनी हत्याएं कर रहे हैं, कश्मीर में उससे तो काफी कम ही मौतें सुनाई पड़ती हैं। हम जिस एक हफ्ते वहां रहे उसमें श्रीनगर के लाल चौक पर हुई एक आम नागरिक की मौत और जम्मू इलाके के डोडा जिले में दो आतंकियों के मारे जाने की ही खबर थी।
सैलानी भी वहां मारे गए, दो या तीन, लेकिन आतंकी हमले में नहीं, बादल फट जाने से गिरे पानी में बहकर। लोगों के घूमने में कोई कमी नहीं है। पूरे कश्मीर में सैलानियों को देखते हुए आधे से अधिक ही रेस्तरां शाकाहारी हैं। इनमें से बहुत से अपने नाम के साथ वैष्णव शब्द जोड़ लेते हैं ताकि शाकाहारी होने की गंभीरता बढ़ जाए। जैन थाली, गुजराती थाली, मराठी थाली, पंजाबी थाली के बोर्ड जगह-जगह दिखतेहैं। लेकिन पूरे श्रीनगर की अकेली पानी की दूकान पर बंगाली पान दूकान का बोर्ड लगा है, वैसे उसे एक कश्मीरी परिवार ही साठ बरस से डल गेट पर चला रहा है। (बाकी सोमवार से आगे)