कितने बरस का फासला बचा है

15 जून 08
कुछ महीने पहले मिजोरम जाकर आने का एक फायदा यह रहा कि वहां से बहुत से लोग बीच-बीच में संपर्क करने लगे। वहां काम कर रहे एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक पत्रकार की अभी कुछ और लोगों के साथ एक दूसरे उत्तर-पूर्वी राज्य के सांसद से मुलाकात हुई। इस बातचीत के बारे में काफी खुलासे से मुझे यहां बैठे पता लगा।
उत्तर-पूर्व के एक सांसद का कांगे्रस का अनुभव सुनने लायक है। काफी समय पहले उन्होंने जब लोकसभा चुनाव लडऩा तय किया तो कांगे्रस पार्टी छांटी। इस पार्टी की टिकट मांगी तो इसे तय करने के लिए जो पर्यवेक्षक आए उन्होंने लगातार दो चुनाव में टिकट के लिए 25-25 लाख रुपए मांगे। ऐसा न होने पर उन्हें टिकट नहीं मिली। तीसरे चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लोगों ने उनसे संपर्क किया और अपनी पार्टी से चुनाव लडऩे के लिए कहा। चुनाव के लिए पर्याप्त खर्च भी पार्टी ने दिया और उन्हें सांसद बनवाया। पहली बार में वे भाजपा की टिकट पर नहीं जीत पाए तो चुनाव नतीजे आने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें फोन करके दिलासा दिलाया और सक्रिय रहने को कहा। नतीजा यह रहा कि अगली बार वे चुनाव फिर लड़े और भाजपा की टिकट पर सांसद बने।
कांगे्रस पार्टी की टिकट के लिए भुगतान लेने का यह नया मामला नहीं है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में विधानसभा चुनाव की टिकटें जिस तरह से दी जाती हैं उनको लेकर पार्टी के भीतर यह खुलकर चर्चा रहती है कि किसने किसको कितना भुगतान किया है। पार्टी या नेता जो भी टिकट के लिए वसूली करता हो, यह बात हर कोई जानता है कि मेडिकल और इंजीनियरिंग की पेमेंट सीट की तरह कुछ संपन्न इलाकों की कांगे्रस की टिकटें बिकती हैं।
लेकिन कांगे्रस को हम कुछ अधिक करीब से देख रहे हैं और उसमें यह खरीद-बिक्री कुछ अधिक है इसलिए राज्यसभा के चुनाव के समय भी किसी बड़े कारोबारी को टिकट मिलने के साथ ही यह चर्चा भी हो जाती है कि उसने पार्टी को या पदाधिकारियों को कितना भुगतान किया है। लेकिन दूसरी पार्टियों में भी जगह-जगह धनपशुओं से इस तरह की उगाही आम बात है। पिछले दिनों कर्नाटक के चुनाव में एक विधानसभा सीट पर दो लोहा खदान मालिकों ने 100-100 करोड़ रुपए खर्च किए ऐसी खबरें लगातार टीवी और अखबारों में रहीं। इसके अलावा दोनों-तीनों पार्टियों को लोहा खदान मालिकों से मिली लंबी-चौड़ी रकम से कर्नाटक का चुनाव लड़ा गया। जाहिर है कि जनता के हक का यह लोहा जब मिट्टïी के दाम से भी कम पर, लगभग मुफ्त उद्योगपतियों को दिया जाता है तो उसके एवज में पार्टियां भी अरबपति होती हैं। ऐसा भी होता है कि सत्ता या संगठन में बैठे हुए फैसले लेने वाले लोग खुद भी अरबपति हो जाते हैं।
आठ बरस पहले जब छत्तीसगढ़ नया राज्य बनने को था तो यह आशंका थी कि शराब व्यापारी सरकार बनवाएंगे या बनने से रोकेंगे। ऐसी जनधारणा थी कि दूर के ग्रामीण इलाकों से आने वाले आदिवासी विधायकों के साथ  कोई न कोई शराब-प्रतिनिधि चिपक गया है और विधायकों को प्रभावित करने का पूरा इंतजाम हो गया है। लेकिन इन आठ बरसों में ही हमने छत्तीसगढ़ में शराब के धंधे की ताकत को तीसरे, चौथे या पाँचवें नंबर पर जाते हुए देख लिया। अब यहां खदान उद्योग की ताकत इतनी बढ़ गई है कि एक-एक लोहा, कोयला या सीमेंट, बॉक्साइट खदान से लोगों का सैकड़ों से हजारों करोड़ तक का सीधा नफा दिख रहा है। जिन सत्तासीन लोगों से उद्योगपति और व्यापारी, दलाल और नेता इस कदर के फायदे पाते हैं, जाहिर है कि उसी हद तक वे अगली सरकार में दिलचस्पी रखेंगे। ऐसे में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा होता है।
दिल्ली में पिछले दिनों मेरे एक मित्र और सांसद संदीप दीक्षित से बात हो रही थी। वे राजनीति में अपनी मां शीला दीक्षित की तरह साफ-सुथरे माने जाते हैं और जनधारणा है कि उन्होंने अभी तक भ्रष्टïाचार शुरू नहीं किया है। उनसे बातचीत में जब सांसदों को मिलने वाली सहूलियतों की लंबी फेहरिस्त को लेकर मैं उनकी खिंचाई कर रहा था और कह रहा था कि कहीं से मुझे भी टिकट दिला दो तो लोकसभा का चुनाव लड़कर ये सारे ऐश-आराम पा लूं। उन्होंने अपना दुखड़ा बताया कि चुनाव इस कदर महंगा हो गया है कि किसी ईमानदार के लिए बिना कालेधन के इसे लडऩा लगभग असंभव हो गया है और यही वजह है कि  कुछ लोग जो चुनाव जीत भी सकते हैं वे भी लोकसभा के बजाय राज्यसभा में जाना पसंद करते हैं।
यह बात सुनकर मुझे एक दूसरी घटना याद आई जिसमें एक आपसी बातचीत में एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पिछला लोकसभा चुनाव उन्हें 16 करोड़ का पड़ा था और अगला चुनाव वे लड़ भी पाएंगे या नहीं उन्हें नहीं पता। इसी के साथ वह खबर याद पड़ी जिसमें कुछ हफ्ते पहले भाजपा की परेशानी का जिक्र था कि उसके तमाम दिग्गज और सितारा नेता एक-एक करके राज्यसभा में पहुंच गए हैं और अगले लोकसभा चुनाव में उसे ऐसे जीतने वाले नेताओं की कमी पडऩे वाली है।
शायद थोड़े से ईमानदार या इंतजाम करने में थोड़े से कमजोर नेता लोकसभा जाने के लिए पहले तो टिकट के लिए करोड़ों, फिर अपने कार्यकर्ताओं के लिए करोड़ों और फिर मतदाताओं के लिए करोड़ों जुटाने के बजाय पार्टी को खुश करके राज्यसभा में जाना पसंद करते होंगे ताकि  एक बार हाईकमान के पैर पकडऩा ठीक है, रोज-रोज कब तक कार्यकर्ताओं, मतदाताओं और धंधेबाजों को खुश करते रहें। कब तक संसद में सवाल पूछने के लिए रुपए लेते रहें और कब तक बड़ी-बड़ी कंपनियों के मामले लेकर सत्ता में दलाली करने के लिए घूमें?
इन्हीं सारी चर्चाओं के बीच भारतीय लोकतंत्र के लिए फिक्रमंद एक दोस्त से बात हो रही थी तो उनका कहना था कि लोकतंत्र केवल उन टुकड़ों में जिंदा है जिनका कोई खरीददार अभी तक नहीं मिला है या जिनको बेचने की गुंजाइश अभी तक लोगों को नहीं मिली है। जिस अंदाज में इस लोकतंत्र की संवैधानिक संस्थाएं, उनकी कुर्सियां, उनके अधिकार और उनकी ताकत बिक और नीलाम हो रही है उसे देखना हो तो सत्ता के गलियारों में दलालों को देखना होगा।
बहुत बरस बाद मैंने अभी एक फिल्म 'सरकार राजÓ देखी। यह फिल्म शायद इसी मुद्दे पर इन्हीं लोगों को लेकर बनी एक पहली फिल्म 'सरकारÓ का दूसरा हिस्सा थी। फिल्म में जाहिर तौर पर महाराष्टï्र के एक वक्त के बेताज बादशाह बाल ठाकरे के चरित्र और परिवार से मिलती-जुलती कहानी है। और बाल ठाकरे के निजी दोस्त अमिताभ बच्चन और उनके परिवार ने इस फिल्म में काम किया है। इसमें सत्ता को चलाने वाले लोग किस किस्म के माफिया होते हैं इस बात को बहुत ही खौफनाक तरीके से पेश किया गया है। और किसी प्रदेश को प्रभावित करने वाले बड़े-बड़े, दसियों हजार करोड़ के फैसले किस तरह हत्याओं के साथ पूरे होते हैं या करवाए जाते हैं इसकी एक भयानक तस्वीर इस फिल्म में है।
इसे देखने के बाद से मैं लगातार सोच रहा हूं कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से सत्ता को कुछ अधिक करीब से देखने का जो मौका मिला, या जो नौबत आई उसमें और 'सरकार राजÓ में अभी कितने बरस का फासला बचा है।
-सुनील कुमार

असहमत

8 जून 08

खबर कुछ भयानक है। सुप्रीम कोर्ट ने जब इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक वकील की तस्वीर देखी जो कोर्ट के आदेश पर हथकडिय़ों से बांधकर रखा गया था तो कोर्ट हक्का-बक्का रह गया। अदालत की अवमानना के मामले में वहां के दो जजों ने इस वकील को गिरफ्तार करने के आदेश दिए थे और ऐसा कहा जा रहा है कि अदालत ने ही उसे हथकडिय़ों से बांधकर रखने को कहा था और उसी तरह उसे अदालत में पेश करने को कहा था। हालांकि उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए सरकारी वकील ने कहा कि जजों ने हथकड़ी लगाने का आदेश नहीं दिया था। उसने यह भी कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जजों की भूमिका की जांच के लिए एक न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं।
मृत वकील के मामले को यहां उठाने वाले एक दूसरे वकील अलतमस रेन ने कहा कि एडव्होकेट श्रीकांत अवस्थी इस अपमान से सदमे में थे कि उन्हें हर रोज अदालत में हथकडिय़ों में पेश किया जा रहा था। इसके बाद वे बीमार हो गए और वे कुछ भी खाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि जब जेल और पुलिस अधिकारियों ने जजों को बताया कि वकील ने खाना बंद कर दिया है तो इन जजों में से एक ने बहुत ही अहंकारी ढंग से कहा - 'क्या आप लोगों को मालूम नहीं है कि ऐसे व्यक्ति को कैसे खिलाया जाता है?Ó
अलतमस रेन ने सुप्रीम कोर्ट को आगे बताया कि जब अधिकारियों ने हाई कोर्ट जजों को दुबारा बताया कि वकील अब भी कुछ भी नहीं खा रहा है तो एक जज, जस्टिस चौहान, ने कहा- 'उसे मर जाने दोÓ।
इसके बाद श्रीकांत अवस्थी को इलाहाबाद के एक अस्पताल में भर्ती किया गया जहां पलंग से बेडिय़ों से बांधकर रखा गया।
अलतमस रेन ने सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाया कि 1988 में तीस हजार कोर्ट के एक वकील के प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश और नियम तैयार करवाए थे कि जब तक कोई व्यक्ति खूंखार अपराधी न हो या उसका व्यवहार हिंसक न हो या वह कानून तोड़ न रहा हो, उसे हथकड़ी न लगाई जाए।
यह पूरा मामला हाई कोर्ट के जजों के उस अहंकार और तानाशाही का है जो धीरे-धीरे देश की बहुत सी अदालतों के बहुत से जजों में आमतौर पर देखने मिलते हैं। भारत की न्याय व्यवस्था में यह एक बहुत अलोकतांत्रिक बात है कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में एक बार जज बन जाने के बाद उस व्यक्ति को हटाने के लिए महाभियोग के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता। इससे जजों की मनमानी भी चलते रहती है और उस पर कोई कार्रवाई भी आमतौर पर बड़ी अदालत नहीं कर पाती।
हमारा यह स्पष्टï मानना है कि किसी भी अदालत में जज द्वारा कहे जाने वाले एक-एक शब्द को दर्ज करना चाहिए। अदालतों में पहुंचने वाले लोगों का यह अनुभव है कि आमतौर पर जज वहां मौजूद लोगों के लिए बहुत ही अहंकारी और अपमानजनक व्यवहार रखते हैं। वे ऐसी बहुत सी बातें कहते हैं जिन्हें आदेश में नहीं लिखा जाता और अगर कोई व्यक्ति किसी जज के व्यवहार के खिलाफ ऊपर जाना भी चाहे तो चूंकि जुबानी बातों का कोई रिकॉर्ड अदालत नहीं रखती इसलिए ऊपरी अदालत में जाकर इंसाफ पाना नामुमकिन होता है। जब संसद और विधानसभा में कहे गए एक-एक शब्द को दर्ज किया जाता है तब अदालतों को अपनी कही बातों की रिकॉर्डिंग में कोई दिक्कत क्यों होनी चाहिए? अधिक अच्छा तो यह होगा कि जिस तरह संसद की कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग होती है और उसका प्रसारण होता है उसी तरह बड़ी अदालतों की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग तो होनी ही चाहिए और उसकी कॉपी हासिल करना आसान बनाना चाहिए। ऐसे में अदालती कार्रवाई के दौरान जजों की मनमानी, उनकी पसंद-नापसंद और उनका पूर्वाग्रह दर्ज हो सकेगा।
यह मामला तो चूंकि एक हाई कोर्ट वकील का था और जिस कू्रर अंदाज में अपमान करके उसे मारा गया, उसकी तस्वीरें मौजूद हैं इसलिए सुप्रीम कोर्ट के हक्का-बक्का रहने और सदमे में आने की नौबत आई। लेकिन ऐसे कितने लोग हैं जिनकी ताकत या जिनकी पहुंच हाई कोर्ट के एक वकील जितनी हो? देश में आबादी का एक फीसदी हिस्सा भी इतनी ताकत नहीं रखता। जब अदालत के पेशे से जुड़े एक व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है और उसकी ऐसी मौत हो सकती है तो बाकी लोग क्या उम्मीद कर सकते हैं?
देश में न्यायिक सुधार और अदालतों की पारदर्शिता को लेकर जो आंदोलन चल रहा है वह लगातार अवमानना के कानून को खत्म करने की बात करता है। इस आंदोलन के परे भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो अवमानना के कानून को अलोकतांत्रिक मानते हैं। अदालतों ने अपने-आपको अवमानना के एक निहायत ही गैरजरूरी घेरे में छुपा रखा है। लोकतंत्र में इस तरह के विशेषाधिकार ठीक नहीं है। लेकिन खराब स्थिति यह है कि  सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा मुख्यन्यायाधीश भी इस अलोकतांत्रिक सुरक्षा कवच के पक्ष में हैं। यह मामला एक बार फिर हमें एक बहस के लिए पर्याप्त लगता है जो जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट जजों के खिलाफ दायर की गई है उस पर फैसले से देश की न्यायापालिका का व्यवहार तय होगा। अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के जजों को बचाते दिखेगा तो इस बात को जनता समझ भी लेगी। अदालतों की मनमानी को खत्म करके एक पारदर्शी व्यवस्था लागू करनी चाहिए।

इनको अपील का क्या हक? और जरूरत भी क्या...

1 जून 08
लिफाफे पर लिखावट से लगा था कि यह नक्सलियों का भेजा बयान होगा और वही निकला। हालांकि छत्तीसगढ़ के बस्तर में सक्रिय नक्सलियों को सरकार और पत्रकार ही नक्सली कहते हैं, वे खुद अपने-आपको माओवादी लिखते हैं। आज न जो माओ रह गया और न जिस माओ की जमीन पर इस किस्म का माओवाद रह गया, उन नामों को लेकर यहां पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) चल रही है। इसके बहुचर्चित प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने इस ताजा बयान में चेरपाल में हुई दो हत्याओं का जिक्र करते हुए छत्तीसगढ़ के मजदूर किसानों, पत्रकारों, कवि-लेखकों और तमाम जनवादी बुद्घिजीवियों से अपील की है कि वे इस हत्याकांड की घोर निंदा करें और सरकार से मांग करें कि ऐसे हत्याकांड बंद करें, सलवा जुडूम बंद करें और तथाकथित राहत शिविरों में बंद तमाम आदिवासियों को वापस गांव भेजें।
पाठकों को याद होगा कि 22 मई की रात सीआरपीएफ के जवानों ने बस्तर के बीजापुर जिले के चेरपाल में राहत शिविर में सो रहे लोगों को उठाकर, बाहर निकालकर उन पर बेवजह गोलियां चलाईं और इससे 25 साल की आदिवासी महिला श्यामबाई और ढाई साल के बच्चे की वहीं पर मौत हो गई। दो दूसरे लोग इसमें घायल हुए जिसमें से एक बच्चा भी है।
इस घटना का समाचार खुलासे से छपा है और सीआरपीएफ जवान पर बिना किसी उकसावे के, बिना वजह हत्या कर देने का जुर्म भी कायम किया गया है।
नक्सलियों के प्रवक्ता ने मेरी तरह के बहुत से लोगों से, जिनमें छत्तीसगढ़ की लगभग पूरी आबादी आ जाती है, उनसे अपील की है कि हम सब इस हत्याकांड की निंदा करें और सरकार से मांग करें कि ऐसे हत्याकांड बंद करें। दूसरी तरफ इसी बयान में उसेंडी ने लिखा है कि छत्तीसगढ़ सरकार को सर्वोच्च अदालत की फटकार की कोई फिक्र नहीं है। और रमन सरकार लाशों पर विकास यात्रा का आयोजन कर रही है।
नक्सलियों ने लोगों से एक अपील करने की अपील की है इसलिए उनसे यह पूछने को दिल करता है कि उनकी पूरी सशस्त्र लड़ाई में अपील की जगह कहां है? उनको तो जिन मुद्दों को लेकर सरकार से अपील करनी थी या जिन मुद्दों को लेकर जनप्रतिनिधि बनने के लिए जनता से वोटों की अपील करनी थी उन मुद्दों पर तो उन्होंने थोक में हत्याएं करने का तरीका अपनाया हुआ है। उनको किसी से अपील करने का, और आगे अपील बढ़ाने की अपील का क्या हक है? जिनका भरोसा जंगलों में अलोकतांत्रिक अदालतें लगाकर लोगों को कुसूरवार ठहराकर काट डालने का है। उनकी शब्दावली में अपील शब्द कहां से आ गया? लड़ाई तो एक ही किस्म के हथियार से हो सकती है या तो जमीनों के नीचे बारूदी सुरंगें लगाकर एक-एक धमाके में दर्जनों लोगों को एक मुश्त मारा जा सकता है या फिर लोकतांत्रिक अपील की जा सकती है। अब अगर अपील भी नक्सली ही करेंगे तो लोकतांत्रिक जनता क्या करेगी?
हमने ऊपर जिस लड़ाई का जिक्र किया है वह लड़ाई भी लड़ाई न होकर लोकतंत्र पर एक हमला है। लड़ाई तो किसी दुश्मन से हो सकती है या किसी बुराई से। आज इस देश में शासन के लिए जो लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद सबसे बेहतर है उस व्यवस्था पर लगातार हमला कोई लड़ाई नहीं है, वह शांत जनता के हक पर हमला है। आज नक्सली बस्तर की जिस शोषित और पीडि़त जनता के हक को लेकर लडऩे की बात कहते हैं क्या उसे उसके हक इस लड़ाई के सौ बरस तक जारी रहने पर भी मिल पाएंगे? क्या सिर्फ खूनखराबे में लगे नक्सलियों के लाए कोई ऐसी जागरूकता इन आदिवासियों में आ सकती है जिससे वे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने हक बेहतर तरीके से पा सकें। छत्तीसगढ़ बनने के बाद से इस लड़ाई को अधिक करीब से देखने का मौका मिला, इसलिए भी कि ये हमले तेज हुए और इसलिए भी कि सरकार रायपुर में रहकर इनसे निबटने के लिए तैयारी करते दिखी। भोपाल में बैठी सरकार की प्राथमिकता में तो नक्सली हिंसा को खत्म करना था भी नहीं।
नक्सलियों की बातों को लगातार सुनकर विस्तार से पढ़कर और उसे पाठकों के सामने रखकर जो विचार-विमर्श हमने पिछले एक बरस में छेड़ा उसके अंत में खुद हमें जो एहसास हुआ है वह यह है कि नक्सली दोनों हाथों में लड्डïू चाहते हैं। एक तरफ वे लोकतंत्र की पूरी इमारत को गिराना उसी तरह चाहते हैं जिस तरह तालिबानों ने अफगानिस्तान में बुद्घ की प्रतिमाएं गिराईं। दूसरी तरफ वे लोकतंत्र के तमाम औजारों का इस्तेमाल अपने बचाव और वैचारिक युद्घ में करना चाहते हैं। मुझे इस बात पर हैरानी होती है कि गुड्सा उसेंडी छत्तीसगढ़ सरकार को यह उलाहना देते हैं कि उसे सर्वोच्च अदालत की फटकार की कोई फिक्र नहीं है और केंद्रीय जांच दल के आने और जाने से भी उसके जुल्मी अभियान पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। इन्हीं तमाम संस्थाओं के खिलाफ तो नक्सली पूरे हमले कर रहे हैं। जिनका पूरा काम थोक में हत्याओं के बिना न चलता हो उन्हें अदालत के जिक्र का क्या हक है? उनके पास तो बंदूकों के बल पर जंगल में अपनी खुद की अदालतें हैं, जहां वे ही जांच अधिकारी भी हैं, वे ही गवाह और जज भी हैं और वे ही जल्लाद भी हैं।
सलवा जुडूम जैसे आंदोलन से किस तरह बस्तर के बेकसूर आदिवासियों पर अमानवीय जुल्म हो रहा है इस मुद्दे को उठाने का हक देश के लोकतांत्रिक लोगों को तो है लेकिन नक्सलियों को इस बात की परवाह क्यों होनी चाहिए कि किसी के साथ अलोकतांत्रिक और अमानवीय जुल्म हो रहा है। वे खुद भी तो केवल यही काम कर रहे हैं। सलवा जुडूम के आंदोलनकारियों या बस्तर के चर्चित एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) जो हिंसा करते हैं उसकी तो एक-एक घटना पर दर्जनों बयान गैर हथियारबंद लोगों से आ जाते हैं लेकिन इन बयानों में नक्सलियों के बयान की कोई जगह कैसे हो सकती है? एक हत्यारा किसी दूसरे हत्यारे पर ऊंगली किस तरह उठा सकता है? और इस देश में चाहे किसी भी किस्म की विचारधारा हो, चाहे किसी भी किस्म का लक्ष्य हो, उसका झंडा उठाए लोगों को क्या हक है कि वे हत्या करें?
नक्सलियों ने बस्तर में अपनी हलचल की शुरूआत में आदिवासियों के शोषण और उन पर अत्याचार के मुद्दे सामने रखें और सरकार-जनता का ध्यान खींचा लेकिन जब इन मुद्दों पर पर्याप्त स्याही मिल चुकी थी तब वहां की हिंसा ने वहां पर शोषण और अत्याचार को सिर्फ बढ़ाने का काम किया है। बस्तर के शोषण को सामने रखने में नक्सलियों की भूमिका हत्याएं शुरू होने के पहले ही खत्म हो चुकी थी। लोकतंत्र में ऐसा कोई मुद्दा नहीं हो सकता जिसे लेकर लड़ाई लड़ते हुए लोकतंत्र को ही खत्म करने पर कोई उतारू हो जाए। इस बात को अगर हम एक तस्वीर के रूप में सझमने की कोशिश करें तो यह उसी किस्म की होगी जैसे किसी गर्भ में पलता हुआ बच्चा उस मां को ही पूरा खा जाए। जिन नक्सलियों को यह लोकतंत्र बर्दाश्त कर रहा है, जिन पर देश की पूरी बंदूकें कहर बनकर टूट नहीं रही हैं वे नक्सली एक-एक बार में दर्जनों हत्याएं करते हुए लोकतंत्र से सवाल भी पूछ रहे हैं!
इस विसंगति को ठीक से समझना होगा। बस्तर में नक्सली हिंसा को देख-देखकर मैंने अपने लिखे में इसके लिए किसी भी तरह के 'वादÓ का इस्तेमाल बंद कर दिया है। जहां एक इंसान दूसरे इंसान को अपने विवेक से मार डालता है वहां वाद जैसे किसी हल्के शब्द के इस्तेमाल की जरूरत भी क्या है? मैंने नक्सलियों को अपने तर्क और अपनी बातें सामने रखने का पर्याप्त मौका दिया। उनकी बातों को आगे भी बढ़ाया और दूसरे कई पक्षों को उस बहस से जोड़ा भी। लेकिन एक तरफ जहां नेपाल में वहां के माओवादी चुनाव की मूलधारा में आकर आज देश के शासन तक पहुंचे हैं और अब वे इस स्थिति में हैं कि जनकल्याण की अपनी सोच को लागू कर सकें। वहीं दूसरी तरफ बस्तर के जिन नक्सलियों को मैं करीब से देख रहा हूं वे इस लोकतंत्र को ही ढहा देने में लगे हैं। और इस राह को वे बेकसूर लोगों की लाशों से गड्ढïे पाट-पाटकर बना रहे हैं। मेरे मन का सवाल आज यही है कि ऐसे लोगों को लोकतांत्रिक समाज से किसी भी तरह की अपील करने का क्या हक है? उन्होंने अपने-आपको यह हक तो दे ही रखा है कि वे खुद जब चाहें जिसके लहू से चाहें जैसे चाहें वैसे नारे लिख सकें। उन्हें अपील की जरूरत भी क्यों हो रही है?

-सुनील कुमार

अच्छे इंसान के बुरे पहलू और बुरे इंसान के अच्छे

25 मई 08
इन दिनों छत्तीसगढ़ को लेकर दुनिया में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों को जो पढऩे मिलता है उसमें नब्बे फीसदी हिस्सा डॉ. बिनायक सेन के बारे में है। पीयूसीएल नामक मानवाधिकार संगठन के एक पुराने और वरिष्ठï पदाधिकारी डॉ. सेन को नक्सलियों का साथ देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और राजद्रोह के कानून के तहत उन पर मुकदमा चल रहा है। इसे लेकर पूरी दुनिया में बिखरे मानवाधिकार कार्यकर्ता आवाज उठा रहे हैं और भारत में भी मीडिया का एक हिस्सा उनकी रिहाई के लिए बहुत मुखर है। देश के जिस विख्यात, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेलोर से बिनायक ने डॉक्टरी की थी, गोल्ड मैडल पाया था, वहां के उनके साथी भी उनकी रिहाई के लिए अभियान चला रहे हैं, और शंकर गुहा नियोगी की हत्या के बाद यह पहला मौका है कि छत्तीसगढ़ के किसी मुद्दे पर देश के सामाजिक कार्यकर्ताओं का इतना बड़ा तबका बार-बार बैनर लिए सड़कों पर आता है। छत्तीसगढ़ में इसी संगठन के एक और सक्रिय कार्यकर्ता और फिल्मकार अजय टी.जी. को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है, नक्सलियों से किसी लेन-देन की एक चि_ïी को लेकर। यूं तो कुछ और गिरफ्तारियां भी हुई हैं जिनमें से एक प्रफुल्ल झा का नाम है जिसे पुलिस ने नक्सलियों के साथ तनख्वाह पर काम करने के आरोप में पकड़ा है, उनके खिलाफ मामला ऐसा गंभीर है कि पीयूसीएल ने भी उनके मामले में दखल नहीं दिया, न बयान दिया, न वकील लगाया।
इन तीनों लोगों से मेरा कम या अधिक परिचय रहा है चूंकि मेरी पूरी जिंदगी यहीं गुजरी है और आधी से अधिक अखबारनवीसी करते हुए।
धंधे के सिलसिले में सभी किस्म के लोगों से बात-मुलाकात होती है। इनकी गिरफ्तारियों के बाद बाहर से आने वाले पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत भी हुई और बहस भी। छत्तीसगढ़ में बसे लोग भी इन मामलों की असलियत पर कभी-कभी मुझसे चर्चा करते हैं और कोई जानना चाहता है, कोई बताना चाहता है।
इन तमाम बातों को मैं आज की आगे की चर्चा के लिए सिर्फ एक प्रसंग की तरह इस्तेमाल कर रहा हूँ। आगे की बात का इन लोगों से व्यक्तियों के रूप में कोई लेना-देना नहीं है।
किसी इंसान का कुल काम-काज उसके अच्छे या बुरे काम में कितना आड़े आता है? मेरे एक परिचित डॉक्टर है जिनका रोज का कुछ वक्त जमीन-जायदाद के धंधों में लगता है। हो सकता है कि बाकी वक्त वे डॉक्टरी की अपनी जरूरत की पढ़ाई भी करते हों, हो सकता है कि उनकी डॉक्टरी की काबिलीयत पर आंच न आती हो, लेकिन मैं जब उनके बारे में सोचता हूँ, मुझे वे डॉक्टर कम, जमीनों के सौदागर अधिक लगते हैं।
शहर में एक वकील हैं, बहुत सज्जन हैं, खासा वक्त वे समाजसेवा के काम में लगाते हैं, अपनी खरी कमाई से वे तरह-तरह की मदद करते हैं। लोग उन्हें बहुत अच्छा वकील कहते हैं। लेकिन मैं कई बार यह सोचता हूं कि क्या सज्जनता किसी को उसके पेशे में अधिक हुनरमंद बना सकती है? या फिर इन दोनों बातों का आपस में कोई रिश्ता नहीं होता? क्या चाल-चलन को तौलकर हुनर से काम लिया जाए, या दुर्जन से भी काम लेना ठीक है?
जहां तक जनता का नजरिया होता है, वह बहुत महीन नश्तर से चीरकर चीजों को अलग नहीं करती। इतनी बारीकी का वक्त ही कहां रहता है जिंदगी की रोजमर्रा की लड़ाई में? लोग हुनर और चाल-चलन को मिला देते हैं। लोग बुजुर्ग पत्रकार और वरिष्ठï पत्रकार को एक ही मान लेते हैं। हर बुजुर्ग पत्रकार को वरिष्ठï पत्रकार कहकर पेश किया जाता है, फिर चाहे उसकी पत्रकारिता में परिपक्वता की, हुनर की, वरिष्ठïता जरा भी न हो। लोग अच्छी भाषा को अच्छी पत्रकारिता मान लेते हैं, अच्छे पत्रकार को अच्छा साहित्यकार मान लेते हैं, जबकि इन सबमें खासा फर्क होता है।
मैंने जिंदगी की महीन परतों को खुर्दबीनी निगाह से देखने की बुरी आदत डाल ली है। मैं एक भ्रष्टï को अच्छा लेखक होने पर या अच्छा संगीतकार होने पर गैर भ्रष्टï नहीं मान पाता। उसकी कला मेरे लिए अलग होती है और उसका बुरा काम अलग होता है। ऐसी आदत के चलते मैं जब किसी बुजुर्ग साहित्यकार को बेहतर साहित्यकार मानने से इंकार कर देता हूं तो बुरा बनता हंू। इसी तरह साहित्य या कला की बहुत लंबी सेवा को जब मैं महत्वपूर्ण सेवा नहीं मानता या उत्कृष्टïता नहीं मानता तो भी लोगों को वह मेरी खामी लगती है। मेरा मानना है कि खूबियों और खामियों को बारीकी से अलग-अलग करके देखना चाहिए।
यहां पर मैं एक बार फिर उस उदाहरण पर लौटना चाहता हूं जहां से मैंने बात शुरू की है। लेकिन मैं उसे केवल बात को समझाने के लिए इस्तेमाल कर रहा हूं न कि उस मामले पर टिप्पणी करने के लिए। डॉ. बिनायक सेन एक प्रतिभाशाली मेडिकल छात्र, एक समर्पित चिकित्सक और एक जुझारू मानवाधिकार आंदोलनकारी हो सकते हैं, लेकिन इन खूबियों के चलते मैं ऐसी किसी संभावना या आशंका से इंकार नहीं कर सकता कि अपने संपर्क में आने वाले नक्सलियों की उन्होंने सैद्घांतिक सहमति या किसी गलतफहमी में कभी कोई मदद की हो। मैं उनकी तमाम खूबियों को मिलाकर भी उनकी खामियों या किसी एक खामी की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं करता।
अपनी इसी महीनमिजाजी के कारण मैं अपने बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता मित्रों की नाराजगी भी झेलता हूं कि एक इतने अच्छे व्यक्ति के बारे में मैं बिना आशंका क्यों नहीं रहता। बाहर से आने वाले बहुत से पत्रकार भी जब मुझसे बातचीत के दौरान एक किस्म का अनौपचारिक प्रमाणपत्र सा चाहते हैं कि बिनायक बेकसूर हैं तो मैं ऐसी कामना करते हुए भी ऐसा जुबानी सर्टिफिकेट देने से इंकार कर देता हूं और उन्हें निराश करने का खतरा उठाता हूं। आज इन मामलों से परे दर्जनों ऐसे मामले रोज खबरों में रहते हैं जिनमें किसी व्यक्ति के पक्ष में या उसके खिलाफ एक पूर्वाग्रह बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है। कुछ लोग इसे बद अच्छा बदनाम बुरा जैसी कहावत से जोड़ते हैं तो कुछ लोग इसे जन नजरिया कहते हैं। किसी की छवि बनना और बिगडऩा जैसी बात भी ऐसे ही संदर्भ में होती है। लेकिन मुझे लगता है कि न्यायप्रिय होने के लिए हमें इतना तर्कप्रिय तो होना चाहिए कि किसी व्यक्ति के जीवन और व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को हम जरूरत पडऩे पर अलग-अलग भी देख सकें। बहुत अच्छे मानवीय मूल्यों वाले किसी वकील का वकालत का हुनर भी उतना ही अच्छा हो ऐसा जरूरी तो नहीं।
-सुनील कुमार

बिना खाल ओढ़ा भेडिय़ा बेहतर

18 मई 08
एक पाठक ने चि_ïी भेजी है कि संपादक अपने पाठकों को जो पढ़ाना चाहता है और पाठक जो पढऩा चाहता है उसके बीच संतुलन कैसे स्थापित होता है। यह सवाल एक नजरिए से बड़ा आसान है और दूसरे नजरिए से बड़ा मुश्किल भी। इस मुद्दे पर कई अलग-अलग तरह से देखा जा सकता है और देखा जाना चाहिए। किसी पत्र या पत्रिका के मालिक और मैनेजर का पाठक की जरूरत और अपनी जिम्मेदारी को तौलने का एक बिलकुल ही अलग पैमाना रहता है। दूसरी तरफ संपादक, अगर वह महज पत्रकार-संपादक है तो उसका सोचने का पैमाना बिलकुल अलग होता है।  मीटर और फुट की इन दो स्केलों के बीच एक तीसरी स्केल उस मालिक की होती है जो संपादक होता है, या उस संपादक की होती है जो मालिक होता है। मतलब यह कि यह तीसरा तबका उन लोगों का है जिनके हित प्रकाशन के व्यापार से जुड़े हुए हैं लेकिन जिनकी दखल संपादकीय मामलों में भी होती है।
लेकिन यह बात लिखते-लिखते ही मुझे यह लगता है कि क्या कोई तबका आज के प्रमुख, सफल, व्यापाक प्रचार-प्रसार वाले अखबारों में इस तीसरे तबके से अलग के भी हो सकते हैं? आज तो पूरा मीडिया मैनेजरों द्वारा नियंत्रित व्यापार रह गया है, बिना किसी अधिक सरोकार के और बिना किसी अतिरिक्त सम्मान के हक के। ऐसे में 'संपादकÓ क्या पढ़ाना चाहता है और पाठक क्या पढऩा चाहता है यह मामला थोड़ा मुश्किल है।
पाठकों की नजर से देखें तो उसका पढऩा धीरे-धीरे कम होते चल रहा है। अब वह उसी किस्म की सरसरी निगाह से किसी अखबार को देखता है जैसे वह टेलीविजन के चैनल बदलता है या अपने फोन पर अपने एसएमएस देखता है। लेकिन इसका कोई साफ जवाब अभी मेरे पास नहीं है कि पढऩा कम क्यों हुआ? क्या मीडिया घटिया होते चले गया है कि उसमें पाठक को बांधकर रखने की ताकत नहीं है? या पाठक इतना गैरजिम्मेदार हो गया है कि बिना चाट-मसाले के मीडिया द्वारा परोसे गए विचारोत्तेजक सरोकारों में उसकी दिलचस्पी नहीं रह गई है? या मीडिया की बुनियादी बातें अब धीरे-धीरे हवा हो गई हैं और अब इतने अधकचरे स्तर का काम इतनी बाजारू बदनीयत के साथ परोसा जाने लगा है कि पाठक को वह सरसरी नजर से अधिक के लायक नहीं लगता?
बात के यहां तक पहुंचते हुए मुझे लगता है कि आज भी अच्छे लिखे हुए को पढऩे वालों की कमी नहीं है, यह एक और बात है कि गेहूं के जवारे का रस पीने वाले लोग हमेशा ही कोकाकोला जैसी चीजें पीने वाले लोगों से कम ही रहेंगे। लेकिन सेहत के लिए बेहतर चीज का कम इस्तेमाल और नुकसानदेह सामान का अधिक इस्तेमाल केवल मीडिया और उसके ग्राहकों के बीच की दिक्कत नहीं है। यह तो फल खाने के बजाय गुटखा-पानमसाला खाने, सिगरेट पीने वालों की बहुत अधिक संख्या जैसा मामला है। लेकिन मीडिया के बारे में यह सवाल सिगरेट-शराब जैसे उद्योगों के मुकाबले कुछ अधिक मायने रखता है। मीडिया से लोग कुछ अधिक जिम्मेदारी की उम्मीद करते हैं और मीडिया भी, कम से कम उसका एक तबका, एक बड़ा तबका, सरोकारों की खाल ओढ़े भी रहता है।
मैंने कुछ बरस पहले ब्रिटेन के एक बहुत प्रतिष्ठिïत अखबार समूह 'गार्डियनÓ के सामाजिक ऑडिट के बारे में लिखा था। वह ऑडिट रिपोर्ट मेरे लिए एक अद्भुत दस्तावेज था जो बताता था कि एक प्रकाशन व्यापार अपने-आपको किस तरह पारदर्शी और जन-जवाबदेह बना सकता है। उसमें सालभर इस प्रकाशन समूह के अखबारों में छपी सामग्री, उसके मुद्दे और उसके नफा-नुकसान के बारे में तमाम जानकारियां दी गईं थीं। 'गार्डियनÓ की जैसी साख है उससे उसकी कम प्रसार संख्या की बात महत्वहीन हो जाती है। कम बिकने पर भी उसके लिखे का वजन दूसरी रद्दियों के मुकाबले बहुत अधिक होता है। यह हाल दुनिया के और देशों में भी है कि सबसे अधिक प्रसार और सबसे अधिक असर ये दो पहलू कई बार अलग-अलग भी चलते हैं।
लेकिन मीडिया के साथ मजे की एक बात यह है कि उसके प्रवचन और उसके आचरण में एकरूपता होने की कोई जरूरत नहीं समझी जाती। मन, वचन और कर्म में समानता होने का एक फलसफा पुराने वक्त से चले आ रहा है। मन तो किसी का भांपना लगभग असंभव होता है लेकिन वचन और कर्म तो आसानी से दिख जाते हैं। जिस तरह नेताओं के वचन इन दिनों टेप पर रहते हैं उसी तरह मीडिया के वचन छपे हुए शब्दों में रहते हैं। वचन यानी विचार की बात में मैं गैर छपे मीडिया को फिलहाल शामिल नहीं कर रहा हूं क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपने खुद के वचन तो मुझे कहीं दिखते नहीं और इंटरनेट के मीडिया में भी मुझे संपादक या प्रकाशक की अपनी लिखी बातें उस तरह से नहीं दिखती जिस तरह से छपे मीडिया में परंपरा चली आ रही है। मीडिया के धंधे में कथनी और करनी के बीच खाई सा फासला दिखता है और मजा यह है कि बहुत से दूसरे धंधों पर दिन-रात टिप्पणी करने वाले इस धंधे के अपने आचरण के बारे में कोई बात भी नहीं होती। नतीजा यह है कि वह पाठकों को क्या पढ़ाना चाहता है और पाठक की दिल-दिमाग की सेहत के लिए क्या जरूरी या बेहतर है इसके बारे में कोई सामाजिक ऑडिट नहीं होती। एक धंधे के रूप में शराब की कई किस्में बनाने वाले सिगरेट के कई ब्रांड बनाने वाले या नुकसानदेह खाना परोसने वाले कई ब्रांडों की तरह मीडिया भी कई शक्लों में बाजार में है और किसी भी दूसरे व्यापार की तरह यह उसका हक भी है कि वह अधिक से अधिक गलाकाट मुकाबला करके धंधे में आगे बढ़े। दिक्कत केवल यही है कि जो लोग मीडिया के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने के झांसे में आ जाते हैं और जो इसे एक मिशन समझ बैठते हैं वे इस धंधे से कई तरह की उम्मीदें करने लगते हैं। उन्हीं के मन में कई तरह के सैद्घांतिक सवाल उठते हैं। वरना तेज-चटपटे गुपचुप बेचने वाले के बारे में अगर यह पता लगता है कि वह खटास बढ़ाने के लिए इमली के अलावा एक तेजाब भी मिलाता है तो भी मन में कोई सैद्घांतिक सवाल नहीं उठते।
लेकिन जिस सवाल से बात शुरू हुई थी उस पर आखिरी में लौट चलना ठीक है। एक व्यापारी तय करता है कि उसे नारियल बेचना है, दूसरा तय करता है कि वह साइकिल बेचेगा। इसी तरह मीडिया है, उसे भी यह तय करना चाहिए कि वह विविध भारती जैसा एक फरमाईशी कार्यक्रम बजा रहा है या फिर बीबीसी की तरह अपनी पसंद का कार्यक्रम। आज मीडिया के व्यापारी इन दोनों नावों पर पैर रखने के दिखावे में डूबे रहते हैं और असल में वे इन दोनों में से किसी पर नहीं टिके रहते। अधिकांश मीडिया आज वह पढ़ाने में जान लगा दे रहा है जो विज्ञापनदाता अपने पाठकों को पढ़ाना चाहता है। या वह नहीं पढ़ा रहा है जो सत्ता अपने पाठकों को नहीं  पढऩे देना चाहती। इन दोनों नीयतों के बीच बची जगह पर कहीं सरोकारों के नाम पर एक पाखंड चल रहा है तो कहीं सरोकारों को दिखाकर उगाही चल रही है।
मेरा यह साफ मानना है कि अगर कोई गंभीर पत्रकार ईमानदारी से अखबारनवीसी करना चाहता है तो उसे अपनी मर्जी का लिखना चाहिए, अपने सिद्घांतों को दबा-छुपाकर रखने के बजाए उन्हें खुलकर सामने रखना चाहिए और खाल ओढ़कर भेड़ बनने का काम नहीं करना चाहिए। अपनी खुद की असली खाल के भीतर के भेडि़ए समाज के लिए कम नुकसानदेह होते हैं। अपनी मर्जी का ईमानदार लेखन करना उसी तरह का है जिस तरह कि आलू के ठेले पर कोई गोश्त नहीं बेचता और चिकन कॉर्नर में कोई टमाटर नहीं बेचता। लिखने और छापने के धंधे में भी ऐसी एक ईमानदारी जरूरी है कि जो कहें सो करें और जिन सरोकारों का बैनर लेकर घूमें उन्हें खुद अमल करके भी दिखाएं।

-सुनील कुमार

शाकाहार में छुपा मांसाहार

11 मई 08
पूरी दुनिया में जगह-जगह अनाज के लिए दंगे हो रहे हैं या कम भूखे लोग अभी केवल चोरी करके काम चला रहे हैं। जिनकी ताकत इन दोनों कामों के लिए नहीं है वे भूखे भी मर रहे हैं और यह बात तो जाहिर है कि भूख से होने वाली हर मौत के पीछे हजारों ऐसे भूखे लोग हैं जो अभी मर नहीं पाए हैं। दूसरी तरफ जिस अमरीका को सब लोग पेटभर गालियां देते हैं उससे परे भी पूरी दुनिया में ऐसे तबके बिखरे हुए हैं जिनके सामने अधिक खाने की वजह से तरह-तरह की बीमारियों का खतरा आ खड़ा हो चुका है। अधिक दूर की बात हम क्यों करें, भारत को ही लें तो यहां शादी-ब्याह, आध्यात्मिक और धार्मिक कार्यक्रम जब होते हैं तो सैकड़ों-हजारों लोगों को खाना खिलाया जाता है। यह भीड़ जितनी संपन्न होती है खाना उसके लिए उतना ही अधिक खतरनाक होता है। डॉक्टरी सलाह संपन्न तबके को यह रहती है कि वह कम से कम खाए। आज के वक्त जब कम से कुछ अखबारों के कुछ पन्नों पर भूख की कुछ खबरें दिखाई पड़तीं हैं तब भी जो लोग इस हकीकत से बेखबर खाना और अपनी सेहत, दोनों को बर्बाद करते दिखते हैं तो उसे क्या कहा जाए?
हिंसा  केवल किसी दूसरे इंसान को मारने में या किसी दूसरे प्राणी को मारकर खाने में नहीं होती। जिंदगी में हिंसा की कई शक्लें रहती हैं जिनमें से एक बिलकुल अनजानी है। अभी तक क्या किसी ने ऐसा कहा है कि जिनके बदन पर अतिरिक्त चर्बी है वे हिंसक हैं? क्या किसी ने यह कहा है कि जो लोग कसरत करके अपनी चर्बी को छांटने की तकलीफ उठाते हैं उनकी चर्बी आती ही है एक हिंसा से। आज के वक्त में जब लोगों के पास खाने को नहीं है,  तब अधिक खाने वाले लोग या अधिक खिलाने वाले लोग एक ऐसी हिंसा कर रहे हैं जो हिंसा दिख भी नहीं रही। बहुत से धर्मों या संतों-महात्माओं ने दूसरों के दर्द को समझने के बारे में बहुत सी नसीहतें कही हैं। गांधी तो मर ही गए पराई पीर की बात करते-करते। उन्होंने तो यह साफ कहा था कि वैष्णव वही है जो दूसरों की तकलीफ को समझ सकता है। धर्मों में कम से कम एक जैन धर्म की बहुत सी मान्यताएं हमारे सामने हैं जिनमें कम खाने और कम संचय करने को कहा गया है। लेकिन क्या गांधी के अनुयायी, या जैन धर्म और ऐसी ही किफायत सिखाने वाले किसी और धर्म के अनुयायी इस पैमाने पर अपने-आपको हिंसा से दूर रख पा रहे हैं? क्या वे दूसरों की तकलीफ को समझ पा रहे हैं? क्या दूसरे बहुत से और समाजों की तरह गांधी के हिन्दू समाज या भारत के जैन समाज में भरे पेट लोगों को ही बार-बार खिलाने का काम नहीं हो रहा है? कितने ऐसे लोग हैं जो अपने उपवास के पीछे यह भावना रखते हैं कि उस बचे हुए खाने को वे किसी गरीब भूखे को दें।
मैं यह नहीं समझ पाता हूं कि लोग अपनी क्षमता का इस्तेमाल दूसरे जरूरतमंद लोगों के लिए क्यों नहीं करते हैं। मुंबई में 25-30 बरस पहले एक संस्था दावतों का बचा हुआ खाना गरीबों को बांटने का माध्यम बनी थी। अब इतने लंबे समय बाद रायपुर में सिंधी युवकों का एक संगठन ऐसे ही एक काम में लगा है। इससे बचा हुआ खाना भूख से मरते लोगों तक तो नहीं जा पाता लेकिन कम से कम वह इतने गरीब लोगों तक तो चले ही जाता है जो कि उसे खाने को बुरा नहीं मानते। जाहिर है कि गरीबी के बीच दावतों का ऐसा बचा हुआ खाना एक वक्त का उनका अपना मोटा अनाज बचा देता है। और यह बचत ही इस धरती पर एक बड़ी बचत है।
यहां इस चर्चा से मैं इस संभावना को टटोलता हूं कि क्या और शहरों में ऐसे संगठन नहीं हो सकते? क्या इसी शहर में और ऐसे संगठन नहीं हो सकते? क्या दावतें रखने वाले लोग अधिक सावधान होकर खाने की बर्बादी नहीं रोक सकते? क्या अधिक वजन से परेशान लोग कम खाकर उस अनाज का इस्तेमाल दूसरे लोगों की भूख मिटाने के लिए नहीं कर सकते? क्या ऐसा किए बिना लोग अपने-आपको अहिंसक कह सकते हैं? क्या ऐसी अहिंसा के बिना लोग अपने-आपको शाकाहारी कह सकते हैं? यह आखिरी बात मैं इसलिए लिख रहा हूं कि जब हमारे सामने यह बिलकुल साफ है कि उस खाने की कमी से दुनिया में ठीक उसी वक्त कोई भूखा मर रहा है जिसे हम अपने भरे पेट में डाल रहे हैं, तो क्या हमारा यह अतिरिक्त खाना शाकाहार रह जाता है?
मांसाहार सिर्फ मांस से नहीं बनता। जब किसी भूखे की देह के मांस से उसकी जान निकल जा रही हो और उसकी जान बचाने लायक खाना या अनाज आपके पेट में या आपकी प्लेट में बर्बाद हो रहा है तो ऐसा अनाज मांसाहार ही है।

-सुनील कुमार

बिग (?) बी के ब्लॉग से निकली एक बात

4 मई 08
अमिताभ बच्चन इन दिनों इंटरनेट पर अपना ब्लॉग बनाकर उसमें अपने मन की बातें लिख रहे हैं और लोगों की कही बातों का जवाब भी दे रहे हैं। उनके इस नए काम पर अभी टेलीविजन पर एक बहस चल रही थी कि वे यह करके भड़ास निकाल रहे हैं या बदला निकाल रहे हैं। इसके साथ ही अमिताभ बच्चन पर अब सार्वजनिक हमले कुछ धीमे पड़े दिखते हैं और मुम्बई में आग उगलती राज ठाकरे की तोप की नाल अमिताभ की तरफ नहीं है।
ब्लॉग से जो लोग वाकिफ न हों, उनके लिए यह बता देना मुनासिब होगा कि इंटरनेट पर कोई भी व्यक्ति मुफ्त में अपना ब्लॉग बनाकर उसमें मनचाही बातें लिख सकता है। जब तक इस पर किसी अपराध जैसी कोई बात न हो, यहां पर लोग अश्लील बातें, नग्न तस्वीरें भी डाल सकते हैं। ये ब्लॉग लोगों का अपना अखबार है जिसमें वे जो चाहें लिख सकते हैं और यह उनकी निजी डायरी भी है जिसमें वे मनचाही बातें दर्ज कर सकते हैं। मतलब यह कि अपने पत्र लोगों को पढ़वाने के लिए आपका नेहरू होना जरूरी नहीं और अपनी डायरी लोगों को पढ़वाने के लिए आपका गांधी होना जरूरी नहीं। अब आप अपना ब्लॉग बनाकर लेखक, पत्रकार, संपादक, मुद्रक, प्रकाशक, सब बन सकते हैं, घर बैठे, एक मिनट में और मुफ्त में।
लेकिन ब्लॉग, और हिंदी ब्लॉग, के बारे में कुछ अधिक जानकार लोगों ने पहले भी खुलासे से लिखा है और उस पर लिखना आज का मकसद नहीं है। लोगों के बोलने, लिखने और प्रचारित-प्रसारित होने की आजादी अधिक बड़ा मुद्दा है। अब तक इनमें से किसी भी काम के मायने रखने के लिए यह जरूरी था कि आपका नाम, ओहदा, लिखने का अंदाज, संपादक की मर्जी, सब मेल खाए। इसके बिना लोग नहानी में गाने वाले की तरह थे। अब मानो नहानी में एक रेडियो स्टेशन भी लग गया है, मुफ्त का, जिसकी तरंगें पूरी दुनिया में जा रही हैं। आप अपना ब्लॉग बनाकर उसमें अपनी बातों को बरस-दर-बरस रख भी सकते हैं।
अब लोगों को मुक्तिबोध की तरह छपने के लिए पहले मरना नहीं पड़ेगा, गांधी की तरह पहले महात्मा नहीं होना पड़ेगा। अमिताभ बच्चन तो अपने ब्लॉग पर अपनी पसंद के सवाल या पत्र डाल रहे हैं और मर्जी होने पर उनके जवाब भी लिख रहे हैं, लेकिन उनके ब्लॉग के जवाब में कोई ब्लॉग हो सकता है कि शुरू हो चुका हो। यह ब्लॉग ऐसा भी हो सकता है कि उस पर अमिताभ द्वारा खारिज किए गए पत्रों को जगह मिले।
जैसे कि मैंने ही अमिताभ के ब्लॉग पर जाकर अपने नाम-पते के साथ आधा दर्जन सवाल पूछे, इसलिए भी पूछे कि वे जो भी जवाब लिखें उनको हम छाप सकें। पता नहीं वे कड़वे, असुविधाजनक सवालों के जवाब दें, न दें, इसलिए मैंने पहली किस्त में सोलह की जगह छह सवाल ही लिखे और लिखा कि बाकी सवाल अगली किस्त में। लेकिन हफ्ते-दस दिन के बाद भी उनकी बारी नहीं आई, सवालों को भी ब्लॉग पर जगह नहीं मिली।
लेकिन मुझे कोई शिकायत या मलाल नहीं है। मैंने बड़े नामी-गिरामी अखबारों को भी कुछ मौकों पर असहमति लिखकर भेजी, लेकिन उनमें से किसी को जगह नहीं मिली। ऐसे में ब्लॉग वाले बच्चन की तो अखबार की तरह की कोई परंपरागत जवाबदेही भी नहीं है। ब्लॉग तो अपने घर की बाहरी दीवार है जहां लिखने तक सिर्फ खुद की पहुंच है। यहां तक लोगों की नजरें तो आने दी जा सकती हैं, लेकिन उनको लिखने देना है या नहीं, यह तो घर का मालिक ही तय करता है। वैसे तो अखबारों में भी किसको क्या लिखने का हक रहे यह भी मालिक ही तय करता है।
अमिताभ जैसी बड़े कद की शख्सियत के ब्लॉग के मुकाबिले भी कुछ ब्लॉग खड़े होने चाहिए और ठीक इसी तरह सभी बड़े या चर्चित लोगों, संगठनों, अखबारों के मुकाबले ब्लॉग खुलने चाहिए। आज ताकतवर लोग या ताकतवर मीडिया जहां बेईमानी करते हैं, उनसे सवाल पूछने के लिए भी ब्लॉग बनने चाहिए। काउंटर-अमिताभ ब्लॉग, या काउंटर-कांगे्रस ब्लॉग बन सकते हैं जहां लोग इनसे इनके ब्लॉग, वेबसाईट या प्रकाशनों से असहमत होने पर अपनी बात वहां रख सकें। किसी अखबार में उसकी किसी बात का जवाब ही न छापा जाए तो लोग क्या करें? ऐसे ब्लॉग बनाकर उस पर सारी अप्रकाशित असहमति डाल सकते हैं।
कुछ हफ्ते पहले मैंने एक ताजा घटना लिखी भी थी कि किस तरह छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का सक्रिय सहयोग देते पकड़ाने पर एक भूतपूर्व पत्रकार को लेकर देश के नामी-गिरामी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे मीडिया की आजादी पर हमला कहा। इस पर एक खुलासा मैंने इसी प्रमुख पत्रिका को भेजा जिसने वह बयान छापा था। लेकिन मेरी प्रतिक्रिया को कोई जगह न मिली।
मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में मीडिया की अपनी बेईमानी, नाइंसाफी, लापरवाही को उजागर करने के लिए ऐसे ब्लॉग बनने चाहिए जिन पर किसी भी मीडिया से घायल या असंतुष्टï लोग अपनी शिकायत लिखकर भेज सकें। यह ब्लॉग नियंत्रित करने वाला उस शिकायत पर संबंधित मीडिया से एक सीमित समय में जवाब लेकर ब्लॉग पर डाल दे। मीडिया गर जवाब न देना भी चाहे, तो भी उसके जवाब के बिना सातवें दिन एक तरफा शिकायत दर्ज कर दी जाए, फिर वह पत्र-पत्रिका चाहे तो बाद में जवाब देते रहे।
पे्रस कौंसिल ऑफ इंडिया नाम के सजे-धजे मुर्दे के राज में ऐसे कुछ स्वतंत्र मंचों की जरूरत है ताकि मीडिया की जवाबदेही भी तय हो।
लेकिन बात ब्लॉग से शुरू हुई थी। जिन लोगों की भी पहुंच कम्प्यूटर और इंटरनेट तक हो वे लोग विचारों के इस नए जंगल में चहल-कदमी कर सकते हैं। आज तो हिंदी में भी कम से कम हजारों ब्लॉग हैं ही और वहां के लोग अभी तक कुछ दूसरी भाषाओं के मुकाबिले कम दंभी हैं। हिंदी के लोग चाहते हैं कि इंटरनेट पर उनकी आबादी बढ़े इसलिए वे नए लोगों को बढ़ावा देते चलते हैं, लेकिन अंगे्रजी की एक अंतरराष्टï्रीय पहुंच होने के कारण उसकी वेबसाइटों पर नए लोगों के लिए उदारता अनिवार्य नहीं रह गई है।
अमिताभ के ब्लॉग पर मेरे सवालों की जगह नहीं है, इसलिए मुझे लगता है कि बिग बी के ब्लॉग की जगह एक स्मॉल बी का ब्लॉग भी शुरू होना चाहिए। कोई पता नहीं कैसे अपने-आपको बिग कहलवाकर भी सादगी को ओढ़ सकता है!! कल तक तो अमिताभ बच्चन यह दावा कर सकते थे कि उन्हें मीडिया बिग बी लिखता है और वे खुद इस बारे में क्या कर सकते हैं लेकिन जब वे खुद अपने ब्लॉग पर भी इसका विरोध नहीं करते तो जाहिर है तो वे इसे स्वीकार कर लेते हैं।
भारत के उन ताकतवर लोगों, तबकों, के बारे में ऐसे ब्लॉग का एक खास तरह का सिलसिला शुरू होना चाहिए कि लोग जब किसी की आलोचना जानना चाहें, तो सीधे वहाँ पहुंच जाएं, जो लोग ब्लॉग पर अधिक वक्त लगाते हैं, वे भी ऐसा सोच सकते हैं कि कैसी शैली विकसित की जाए।
जैसे मुझे लगता है कि संसद या विधानसभाओं में जिन सवालों को नहीं पूछा जा सका, उनके लिए इंटरनेट पर कोई वेबसाईट बननी चाहिए या ब्लॉग बनने चाहिए। सवाल कई तरह के रहस्यमय कारणों से रूक जाते हैं, या रोक दिए जाते हैं। यह खुलासा करने के लिए भी ब्लॉग होने चाहिए।
- सुनील कुमार

भली नीयत का बेजा इस्तेमाल

27 अपै्रल 08
अमरीका में पिछले कुछ समय से समाजशात्रियों के बीच एक नई बहस चल रही है। वहां के एंथ्रोपोलाजिस्ट (नृत्यशास्त्री, मानव विज्ञानी) इस नैतिक दुविधा में हैं कि उनके मिलिटरी के साथ काम करना चाहिए या नहीं? इस आत्ममंथन की जरूरत इसलिए पड़ी कि समाजशास्त्रियों में से ही कुछ ने यहबात सामने रखी कि युद्घ के वक्त मिलिटरी किसी तरह का समाजशास्त्रीय अध्ययन नहीं करती है। पिुर मानो अमरीकी सरकार इस अकादमिक सलाह को मानने को उतारू बैठी थी, उसने अपनी फौज के तहत ऐसे शोधकर्ता समाजशास्त्री रखे जिन्होंने अमरीकी हमले के शिकार वियतनाम या कांगो में जाकर अध्ययन किया। फिर इन निष्कर्षों को गैरफौजी मुखिया को सौंपा। लेकिन आखिरकार ऐसे कई देशों में इन अध्ययनों का इस्तेमाल फौजी मकसद में हुआ। अमरीकी राजनीति से असहमत लोगों को चुन-चुनकर चिली में मारा गया क्योंकि वहां अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए एक खास सरकार चाहती थी। मतलब यह कि जाहिर तौर पर हमले या युद्घ के शिकार समाज की मदद के घोषित इरादे से करवाई गई रिसच्र उसी समाज को और कुलचने में इस्तेमाल होने लगी।
एंथ्रोपोलाजिस्ट कुछ नीति-सिद्घांतों के तहत काम करते हैं। जैसे डॉक्टरों की डॉक्टरी सिद्घांतों की शपथ किसी भी सभ्य देश के कानून से कुचली नहीं जाती, वैसे ही मानवशास्त्र के सिद्घांत ये कहते हैं कि किसी भी समाज पर अध्ययन उसकी सहमति से ही होना चाहिए और उसका उपयोग उस समाज के खिलाफ नहीं होना चाहिए। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक मरीज के बारे में जानकारी डॉक्टर किसी को नहीं देता, वरना एचआईवी से संक्रमित मरीज की जानकारी पाकर कोई भी उसे ब्लैकमेल करने लगे। कोई वकील अपने मुवक्किल के राज अगर पर्दाफाश करने लगे तो पूरी न्याय व्यवस्था ठप हो जाए और पेशे का ईमान खत्म ही हो जाए। अगर गरीबों को सरकारी खर्च पर मिलने वाले वकीलों से सरकार उन गरीबों के राज उगलवा ले सरकारी डॉक्टर से सरकार मरीजों की जानकारी निकलवा ले, तो फिर यह सत्ता के हाथ के सबसे घातक हथियार बन जाएंगे।
ऐसे में मानव शास्त्रियों के बीच यह बहस चल रही है कि फौज के साथ, फौज के लिए, या फौजी उपयोग के खतरे वाले शोध कार्य किए जाएं या नहीं? इराक में अमरीकी फौजों के साथ जिस तरह चस्पा होकर पत्रकार गए हैं, वैसे ही समाजशास्त्री भी गए हैं। और उनके शोध के नतीजों का इस्तेमाल फौज, फौज के जासूस, बागी लोगों की शिनाख्त  में कर रहे हैं।
अखबारनवीसों का ऐसा इस्तेमाल नक्सली, पुलिस, खुफिया एजेंसियां अफसर, ठेकेदार, सभी करते हैं। नेताओं के किसी विरोधी नेता की टोह लेना हो तो पत्रकारों के मार्फत पता लगवाते हैं। छत्तीसगढ़ में पुलिस क्या सोच रही है, यह पता लगाने के लिए नक्सली या उनके सहयोगी पत्रकारों से पूछताछ करते हैं। दूसरी तरफ पुलिस भी ऐसी पत्रकारों से बात करती रहती है जिनके नक्सल समर्थक होने का शक हो या जिनसे नक्सलियों के संपर्क हैं।
हर पेशे को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को बारीकी से समझना चाहिए। बिना जिम्मेदारी कोई अधिकार नहीं मिल जाते। फिर पेशे की नैतिकता इन सबसे ऊपर होती है। आज दुनिया में देशों के बीच शीतयुद्घ एक तरह से बंद हो गया है, लेकिन एक दूसरी शक्ल में चल रहा है। किस देश में जंगल बचाने के लिए आंदोलन कर रहे लोग किसी दूसरे देश के जंगल व्यापारियों द्वारा घुमा-फिराकर भेजा गया पेसा पा रहे हैं यह कल्पना करना मुश्किल है। भारत में पेड़ों की कटाई थम गई है कि जंगल घट रहे हैं, दूसरी तरफ अखबारी कागज से लेकर फर्नीचर तक थोक में दूसरे देशों से आ रहे हैं।
जाहिर तौर पर पर्यावरण बचाने के लिए, बांध रोकने के लिए, बाल मजदूरी खत्म करने के लिए, जिन शोध कार्यों के आधार पर अंतरराष्टï्रीय जनमत बनता है, राष्टï्रीय जनहित याचिकाएं बनती हैं, फिर अदालती रोक बनती हैं, उनके पीछे किस देश के किन व्यापारियों की क्या नीयत हे यह पता नहीं लगता। मासूम लगते बहुत से शोध कार्य किसी बड़े औद्योगिक षडयंत्र के हिसाब से नतीजे निकालकर दुनिया के सामने एक भयावह तस्वीर पेश कर सकते हैं। भारत जैसे देश जहां उच्च शिक्षा से उत्कृष्टïता और शोधकार्य से मौलिकता लगभग गायब है, वहां मेहनत से काम करते समर्पित विदेशी शोधकर्ता बड़ी प्रतिष्ठïा पाते हैं। लेकिन कई मामलों में उनको खुद को भी पता नहीं होता कि वे किसके लिए काम कर रहे हैं या उनकी जुटाई जानकारी, उस समाज के खिलाफ ही किस तरह से इस्तेमाल होगी।
सतह पर तैरते मकसदों पर तुरंत भरोसा करना ठीक नहीं है। इन जलकुंभियों की जड़ों के बारे में भी सोचना चाहिए। भारत जैसे देशों में किसी गंभीर अध्ययन की कमी रहती है, ऐसे में किसी संस्था या संगठन द्वारा पेश किए गए शोध-निष्कर्षों से एक दहशत खड़ी की जा सकती है। आंकड़ों के बदनीयत विश्लेषण से एक निहायत झूठी लेकिन खासी विश्वसनीय तस्वीर पेश की जा सकती है और लोगों को बताया जा सकता है कि उनके परंपरागत पेशों को खत्म करना क्यों जरूरी है।
आज दुनिया में क्लोनिंग और कृत्रिम गर्भधारण की सारी बड़ी रिसर्च गोरे देशों में हो रही है। आज जाहिर तौर पर यह इलाज के लिए है लेकिन क्या कल इसका इस्तेमाल गोरी नस्लों को बढ़ाने के लिए किया जाएगा? मेरी बात आज कुछ लोगों को जेनोफोबिया (नस्लीय दहशत) लग सकती है, लेकिन ऐसा तो है नहीं कि दुनिया से नस्लीय सोच खत्म हो गई है। आज भी धरती से किसी एक धर्म का समूल नाश करने के लिए अगर गारंटी के साथ चंदा इक_ïा किया जाएगा, तो लोग अपनी जायदाद का एक हिस्सा देने को भी तैयार हो जाएंगे।
किसी भी विज्ञान, चाहे वह शरीर विज्ञान हो या समाज विज्ञान, को अपनी सीमाएं समझाना चाहिए। वे चाकू बना तो सकते हैं सब्जी काटने के इरादे से लेकिन पेट चीरने के लिए चाकू के इस्तेमाल को रोक नहीं सकते। जो लोग सामाजिक अंदोलनों में काम करते हैं, मीडिया में मानवीय मुद्दों को कवर करते हैं, उनको भी अपने बेजा इस्तेमाल के बारे में चौकन्ना रहना चाहिए।
-सुनील कुमार

धंधे और पापी पेट की बातें

20 अपै्रल 08
एक वक्त बहुत अच्छे पत्रकार रहे एम.जे. अकबर काम के हर दिन की तरह घर से दफ्तर जा रहे थे कि किसी ने उन्हें फोन पर बताया कि उस सुबह के उनके अखबारों 'द एशियन एजÓ और 'द डेक्कन क्रॉनिकलÓ में प्रधान संपादक के रूप में उनका नाम हट गया है और किसी और का नाम छपा है।
'द एशियन एजÓ करीब पन्द्रह बरस पहले अकबर ने शुरू किया था और कम छपने के बाद भी इसकी चर्चा अधिक होती थी। भारत के महानगरों के अलावा लंदन से भी यह अखबार निकलता था और ऐसा यह पहला भारतीय अखबार था। इस अखबार की कंपनी शुरू करने वालों में अकबर मुखिया थे, लेकिन फिर दूसरे लोगों के शेयर उसमें बढ़ते गए और अकबर का मालिकाना काबू खत्म हो गया। आखिर में दक्षिण के अखबार 'द डेक्कन क्रॉनिकलÓ के मालिक के शेयर इसमें बढ़ गए, और एक रात जब अखबारनवीस काम निपटाकर चले गए, मैनेजमेंट ने अकबर का नाम हटा दिया और नए प्रधान संपादक का नाम डाल दिया। अपनी बनाई विशाल इमारत से अकबर का बोरिया बिस्तर मानो आधी रात फुटपाथ पर फेंक दिया गया।
धंधे के तौर- तरीके ऐसे ही बेरहम होते हैं और मालिक धंधों के तौर- तरीकों से परे भी जाकर नौकरों से बर्ताव करते हैं। खेल के कोर्ट में इस ओर से खेलते या उस ओर से खेलते, या फिर दर्शक दीर्घा में बैठे, हम सभी कभी न कभी ऐसे दौर से गुजरते हैं। इसलिए मालिक या नौकर के रिश्तों को लेकर लिखना  आज का मकसद नहीं है। आज का मुद्दा अकबर और उनकी अखबार नवीसी है जो इमरजेंसी के पहले शुरू हुई और आगे एक नई पत्रिका के रूप में घोषित हो चुकी है।
कोलकाता की अंगे्रजी साप्ताहिक पत्रिका 'संडेÓ फिर वहीं से साथ-साथ अंगे्रजी दैनिक 'टेलीग्राफÓ से अकबर ने जो पहचान बनाई, वह उनके राजनीति में जाने के बाद भी चलती रही। वे कांगे्रस के टिकट पर चुनाव लड़े और जाहिर है कि लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए इतना काबिल उम्मीदवार मुस्लिमों में कांगे्रस को और कौन मिल सकता था? फिर वे कांगे्रस के प्रवक्ता बने और राजनीति से पूरी तरह बाहर हुए बिना ही उन्होंने एक कंपनी बनाकर 'द एशियन एजÓ नाम का अखबार शुरू किया। इस दौरान वे अखबारों में कॉलम लिखते रहे, किताबें लिखते रहे और उनको अच्छे दर्जे का पत्रकार माना गया।
लोग किसी राजनीति में गले-गले तक डूबे इंसान को भी पत्रकार मान लेने की गलती करते हैं। अकबर का एक लेखक होने का हक तो नहीं छिनता लेकिन पत्रकार कहलाने का हक वे उसी दिन खो देते हैं। जिस दिन वे राजनीति में जाते हैं। अकबर के अलावा एक-दो ऐसे और भी पत्रकार रहे जो राजनीति में पूरी तरह जाकर भी पत्रकार बने रहने का संघर्ष करते रहे और यह महीन फर्क न कर पाने वाले लोग उन्हें अखबारनवीस मानते भी रहे। कांगे्रस की राजनीति में दलाल की हैसियत से अबरपति बने ऐसे एक पत्रकार बने हुए व्यक्ति का कॉलम छापने के बारे में एक अखबार ने मुझसे सलाह ली थी तो बरसों पहले मेरी राय थी कि इससे बेहतर तो हर्षद मेहता का कॉलम छापना चाहिए। राजनीति में रहते हुए जो लोग अपने अखबारनवीस भी होने की खुशफहमी पाले रखते हैं और पाठकों को गलतफहमी में रखते हैं, उनके हौसले की मैं तारीफ ही करता हूँ। वे सातवें बच्चे को जन्म देते हुए कौमार्य का दावा करने वाली महिला की तरह के होते हैं, क्लोनिंग के पहले के दिनों में। ऐसे लोग भीगे बिना गंगा में डुबकी लगाना चाहते हैं।
कल का भाजपा-विरोधी अकबर आज भाजपा की ओर से राज्यसभा में जाने की तैयारी में है। एकतरफ यह राजनीतिक धर्मांतरण, दूसरे तरफ बड़े मालिकों का कांगे्रस-पे्रम। ऐसे में संपादक की ही कुर्सी जानी थी, मालिक तो मालिक होता है।
अकबर के निकाले जाने पर मैं नहीं लिखता अगर उनके इस वक्त आंसू बहाने वाले खुशवंत सिंह जैसों को लबालब आंखों से उनकी राजनीति दिखना बंद न हो गया होता। अकबर की बर्खास्तगी के मौके पर अपनी बर्खास्तगी की चर्चा करने वाले खुशवंत ने न तो अकबर की सक्रिय राजनीति की चर्चा की, न अपने संजय-मेनका गांधी प्रेम की बात की। मालिक किस तरह संपादक को निकाल फेंकता है इस पर खुशवंत ने अंगे्रजी के वयस्क जुमलों में लिखा।
लेकिन अखबार के धंधे को हर तरफ से देखने के बाद भी मैं वही बात फिर लिखूंगा जो सिर्फ एक नौकरीपेशा की हैसियत से लिखी थी- राजनीति, राज्याश्रय और अखबारनवीसी साथ-साथ नहीं चल सकते। अखबार के धंधे की जरूरतें अलग हैं और राजनीति की अलग। चुनाव तो राजनीति की जरूरतों को हिंसक और भ्रष्टï गहराइयों तक ले जाता है और राज्याश्रय कमर के पीछे, नीचे, एक दुम लगा देता है जिसमें लगा काउंटर अगली मेहरबानी का हक साबित करता है। मैं राजनीति, चुनाव या राज्याश्रय को बुरा नहीं मानता। समाज में सभी किस्म के मिजाज के लोग होते हैं, कुछ को सत्ता का मोह होता है, कुछ को बुलफाइट की तरह चुनाव सुहाता है और कुछ को ठकुर सुहाती के जरिए राज्याश्रय सुहाती है। कुछ को खुरदरी और खरी-खरी अखबारनवीसी सुहाती है। लेकिन मेरा यह मानना है कि जो काम करें, बिना मुखौटे असली करें। घी की मिठाई के नाम पर चर्बी में पकाकर बेचना गलत है लेकिन मांसाहार की तख्ती लगाकर चर्बी में पकाने में कोई बुराई नहीं है।
अखबारनवीसी एक अलग पेशा है। न साध्वियों की वेश्यावृत्ति चल सकती, न वेश्याओं का भगवा चोला चल सकता। राजनीति और अखबारनवीसी बिल्कुल अलग मिजाज के धंधे हैं। अकबर की बर्खास्तगी पर श्रद्घांजलि लेखने करने वाले इस पहलू को अनदेखा न करें। हम अपने आसपास भी बहुत से ऐसे लोग देखते हैं जिनकी अखबारी हैसियत उनको खुद नाकाफी लगती है और जो पूरी जिंदगी राज्यसभा जाने की फिराक में गंवा देते हैं या लगा देते हैं। पत्रकारिता से राजनीति में जाने में कोई बुराई नहीं है लेकिन वहां जाकर भी पत्रकार बने रहने का मोह न छोडऩा गलत है।
जो लोग राजनेता-पत्रकारों के टू इन वन रोल का नुकसान नहीं समझते, वे ऐसी ही अखबारनवीसी को पढऩे के लायक हैं।
एमजे अकबर का निकाला जाना संपादक की बर्खास्तगी नहीं है। कांगे्रस समर्थक मेजॉरिटी शेयर होल्डर ने, भाजपा समर्थक हो गए माइनॉरिटी शेयर होल्डर को कंपनी के एक पद से हटा दिया है। यह कांगे्रस के राज में धंधे की बात है, इसका पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं है, जैसे कि भाजपा के समर्थन के आधार की राज्यसभा में जाने की कोशिश का पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं है।
- सुनील कुमार

चूडिय़ों का केलिडॉस्कोप

13 अपै्रल 08
महिलाओं ने सरकारी टेलीफोन के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए इसके एक बड़े अफसर को चूडिय़ां भेंट की। भारतीय जनता पार्टी की ये महिलाएं शुरू से ही भारतमाता की तस्वीर पूजते आई हैं और हिंदू धर्म की अनगिनत देवियों की पूजा भी। इसके बाद भी एक अफसर को निकम्मा, लानायक साबित करने के लिए उन्होंने चूडिय़ां भेंट कीं जो कि एक महिला को अबला बनाने वाली बात है। महिलाओं की इस सोच के खिलाफ पचीस बरस पहले इंदिरा गाध्ंाी ने नाराजगी जाहिर की थी जिसमें नारीत्व की प्रतीक चूडिय़ों को कमजोरी के निशान की तरह पेश किया जाता है। मैं लगातार इस बात को लिखते आया हूँ कि समाज की पुरुष प्रधान सोच महिलाओं में भी इतने गहरे पैठ गई है कि वह भाषा, व्यवहार, सभी जगह सिर चढ़कर बोलती है। इससे जुड़े मुद्दों पर हम लगातार लिखते हैं और कुछ परिचित-पाठक कई बार पूछते भी हैं कि क्या मैं किसी अंतरराष्टï्रीय महिला संगठन से भुगतान पाता हूँ।
एक औरत जो घर संभालती है, बचपन से छोटे भाई-बहनों को संभालती है, बहुत गरीब है तो दूसरों के बच्चे संभालती है, शादी के बाद पति का घर, अपने बच्चे, ससुराल का काम संभालती है, परिस्थितियां अनुकूल या प्रतिकूल रहीं तो वह बाहर काम भी करती है, वह किस बात से अबला हुई? वह तो सबला ही सबला है। कुदरत ने भी उसे शरीर विज्ञान के हिसाब से आदमी से अधिक ताकतवर बनाया है। खान-पान से लेकर पढ़ाई और इलाज तक लगातार एक सौतेला बर्ताव पाते हुए भी वह हिन्दुस्तान में मर्द के मुकाबले करीब ढाई बरस अधिक जीती है।
अवांछित गर्भ से लेकर अवांछित गर्भपात तक कई तरह के जुल्म, दहेज प्रताडऩा, जिम्मेदारियों के बोझ को जानवरों की तरह ढोते हुए हिन्दुस्तानी औरत मर्द से अधिक जीती है। सामाजिक सोच के मुताबिक मर्द अपने से चार-पांच, या और अधिक बरस छोटी औरत से शादी करता है, इसलिए कि जब वह बूढ़ा होने लगे, तो भी औरत टनाटन बनी रहे और उसके मरने तक सेवा करती रहे। औरत से चार-पांच बरस अधिक उम्र का मर्द और ढाई बरस कम औसत उम्र। मतलब यह कि वृन्दावन में विधवा आश्रम को लबालब भरे रखने का पुख्ता इंतजाम मर्द करते चलता है। अपने लिए वह गारंटी करके, बीमा करके चलता है कि उसके मरने तक मुफ्त की नर्स हासिल रहे और मरने पर लाश बिना चूडिय़ों के बिखरे टुकड़े न दिखे।
वरना साथ जिएंगे, साथ मरेंगे के नारे वाले देश में लड़के को अपने से ढाई बरस बड़ी लड़की से शादी करनी चाहिए।
हिंदुस्तानी, खासकर हिंदू औरत के मर्दों ने रिजर्वेशन की तख्तियों से लादकर रखा है। सिर के  ऊपर खतरे के लाल निशान की तरह सिंदूर चमकता है, माथे पर सामने से बिंदी दिखे, उसके जरा नीचे नाक की लौंग, फिर और नीचे गले से नीचे तक लटकता मंगलसूत्र जो खराब होती नीयत को रोक सके।
मंगलसूत्र जहां खत्म होता हे वहां से एक-डेढ़ फीट नीचे दोनों तरफ चूडिय़ां। और पहरावा खत्म होते ही पायल-बिछिया।
मतलब यह की शादीशुदा हिंदुस्तानी औरत के अंग-अंग पर, व्यस्त रेस्तरां की तरह 'रिजव्र्ड्Ó की तखियां लगी हैं, लेकिन शादीशुदा मर्द अपने को सब्जी बाजार के सांड की तरह खुला रखता है कि जब जहां चाहे मुंह मार ले। लेकिन औरत के लिए कहीं घूंघट है, कहीं बुरका है और कहीं किसी और किस्म का बंधन।
इस सोच की इतनी गहरी छाप औरतों पर पड़ी है कि बराबरी के हक के इक्का-दुक्का नारों को छोड़कर वे बराबरी का सोच भी नहीं पातीं। वे इतना भी नहीं पूछ पातीं कि लड़की के नाम के साथ पहले पिता का नाम जुड़ता है और बाद में पति का। पहले उसे कुमारी लिखकर अपने कौमार्य का प्रदर्शन करना पड़ता है और फिर श्रीमती लिखकर बताना पड़ता है कि वह अब किसी 'श्रीÓ की 'मतीÓ हो गई है। न उसे अपने नाम के साथ अपनी मां का नाम लिखने की सहूलियत है, न ही उसके पति को अपने नाम के साथ पत्नी का नाम लिखना होगा। यह पूरा सिलसिला बदले बिना प्राकृतिक सबला, अबला की तरह अपनी चूडिय़ां भेंट करती है।
गैर बराबरी के रीति-रिवाज, गैर बराबरी की भाषा, सरकारी व्यवस्था सबको बदलना होगा। इसके बिना औरत ही सती होगी, उसी की दहेज प्रताडऩा होगी, वही घर से निकाली जाएगी, भू्रण हत्या कन्या भू्रण की ही होगी, बलात्कार उसी से होगा, विधवा होकर वही सिर मुंडाएगी, वही सफेद कपड़े पहनेगी, वही चूडिय़ां फोड़ेगी। गैर बराबरी खत्म होने तक जिसके आंचल में दूध होगा उसी की आंखों में पानी होगी।
लेकिन भारत में गैरबराबरी की भाषा बदल नहीं रही। अंगे्रजी में जहां पुरुष के लिए  एक्टर और औरत के लिए एक्ट्रेस का इस्तेमाल हमेशा से होते आया था, अब सबके लिए एक्टर शब्द का उपयोग ही होने लगा। महिलाओं के लिए हमेशा से चले आ रहा शब्द खत्म कर दिया गया। इसे मेल एक्टे्रस ओर फीमेल एक्ट्रेस क्यों नहीं किया गया?
सरकार को संविधान संशोधन करने सारी भाषा को बराबरी का करना होगा। हर सरकारी फॉर्म में औरत-मर्द, माँ-बाप का जिक्र बराबरी से करना होगा और सरकारी अनुदान, रियायत, मदद के लिए संयुक्त खाते को अनिवार्य बनाना होगा। महिला आयोग के नाम पर देशभर में सत्ता सुख का जो पाखंडी मनोनयन चले आ रहा है उसे खत्म करना होगा और इन पदों पर राज्य के महिला समूहों, महिला जनप्रतिनिधियों, महिला संगठनों, महिला अधिकारियों के मतदान से नियुक्ति करनी होगी, तब जाकर कारों में मस्त घूमते बेपरवाह महिला आयोग की जगह एक संवेदनशील संस्था खड़ी होगी।
महिलाओं की हालत सुधारने के लिए ट्रेड यूनियनों को भी असंगठित महिला मजदूरों के बीच काम शुरू करना पड़ेगा। इसमें हो सकता है कि मौजूदा, स्थापित यूनियनें काम की न रहें जो दफ्तरों-कारखानों की संगठित व्यवस्था तक अपने को सीमित रखती हैं। इसके लिए नए, आक्रामक तेवरों वाले, महिला मजदूर संगठन खड़े करने की जरूरत है जिनका आज के राजनीतिक पि_ïू श्रम संगठनों से परे रहना बेहतर होगा। तब कहीं जाकर अपनी चूडिय़ां-भेंट करने के बजाय जो हाथ डंडा-झंडा लेकर हक के लिए पुरुष प्रधान व्यवस्था की धड़कन रोक सकें, वही काम के होंगे।
एक मजबूत महिला मजदूर संगठन दस लाख की आबादी में दस हजार घरेलू नौकरानियों को बांध सकता है, और इससे रातों-रात महिला अधिकार और मजदूर अधिकार की तस्वीर बदल सकती है।
पहले मेले-ठेले में हम ऐसा एक केलिडॉस्कोप देखते थे जिसके भीतर चूडिय़ों के टुकड़ों से तरह-तरह की रंगीन आकृतियां बनते दिखती थीं और घुमते ही वे बदल जाती थीं।
चूडिय़ों के टुकड़ों से मैं तस्वीर इसी तरह बदलने की कल्पना करता हूँ।
-सुनील कुमार