15 जून 08
कुछ महीने पहले मिजोरम जाकर आने का एक फायदा यह रहा कि वहां से बहुत से लोग बीच-बीच में संपर्क करने लगे। वहां काम कर रहे एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक पत्रकार की अभी कुछ और लोगों के साथ एक दूसरे उत्तर-पूर्वी राज्य के सांसद से मुलाकात हुई। इस बातचीत के बारे में काफी खुलासे से मुझे यहां बैठे पता लगा।
उत्तर-पूर्व के एक सांसद का कांगे्रस का अनुभव सुनने लायक है। काफी समय पहले उन्होंने जब लोकसभा चुनाव लडऩा तय किया तो कांगे्रस पार्टी छांटी। इस पार्टी की टिकट मांगी तो इसे तय करने के लिए जो पर्यवेक्षक आए उन्होंने लगातार दो चुनाव में टिकट के लिए 25-25 लाख रुपए मांगे। ऐसा न होने पर उन्हें टिकट नहीं मिली। तीसरे चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लोगों ने उनसे संपर्क किया और अपनी पार्टी से चुनाव लडऩे के लिए कहा। चुनाव के लिए पर्याप्त खर्च भी पार्टी ने दिया और उन्हें सांसद बनवाया। पहली बार में वे भाजपा की टिकट पर नहीं जीत पाए तो चुनाव नतीजे आने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें फोन करके दिलासा दिलाया और सक्रिय रहने को कहा। नतीजा यह रहा कि अगली बार वे चुनाव फिर लड़े और भाजपा की टिकट पर सांसद बने।
कांगे्रस पार्टी की टिकट के लिए भुगतान लेने का यह नया मामला नहीं है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में विधानसभा चुनाव की टिकटें जिस तरह से दी जाती हैं उनको लेकर पार्टी के भीतर यह खुलकर चर्चा रहती है कि किसने किसको कितना भुगतान किया है। पार्टी या नेता जो भी टिकट के लिए वसूली करता हो, यह बात हर कोई जानता है कि मेडिकल और इंजीनियरिंग की पेमेंट सीट की तरह कुछ संपन्न इलाकों की कांगे्रस की टिकटें बिकती हैं।
लेकिन कांगे्रस को हम कुछ अधिक करीब से देख रहे हैं और उसमें यह खरीद-बिक्री कुछ अधिक है इसलिए राज्यसभा के चुनाव के समय भी किसी बड़े कारोबारी को टिकट मिलने के साथ ही यह चर्चा भी हो जाती है कि उसने पार्टी को या पदाधिकारियों को कितना भुगतान किया है। लेकिन दूसरी पार्टियों में भी जगह-जगह धनपशुओं से इस तरह की उगाही आम बात है। पिछले दिनों कर्नाटक के चुनाव में एक विधानसभा सीट पर दो लोहा खदान मालिकों ने 100-100 करोड़ रुपए खर्च किए ऐसी खबरें लगातार टीवी और अखबारों में रहीं। इसके अलावा दोनों-तीनों पार्टियों को लोहा खदान मालिकों से मिली लंबी-चौड़ी रकम से कर्नाटक का चुनाव लड़ा गया। जाहिर है कि जनता के हक का यह लोहा जब मिट्टïी के दाम से भी कम पर, लगभग मुफ्त उद्योगपतियों को दिया जाता है तो उसके एवज में पार्टियां भी अरबपति होती हैं। ऐसा भी होता है कि सत्ता या संगठन में बैठे हुए फैसले लेने वाले लोग खुद भी अरबपति हो जाते हैं।
आठ बरस पहले जब छत्तीसगढ़ नया राज्य बनने को था तो यह आशंका थी कि शराब व्यापारी सरकार बनवाएंगे या बनने से रोकेंगे। ऐसी जनधारणा थी कि दूर के ग्रामीण इलाकों से आने वाले आदिवासी विधायकों के साथ कोई न कोई शराब-प्रतिनिधि चिपक गया है और विधायकों को प्रभावित करने का पूरा इंतजाम हो गया है। लेकिन इन आठ बरसों में ही हमने छत्तीसगढ़ में शराब के धंधे की ताकत को तीसरे, चौथे या पाँचवें नंबर पर जाते हुए देख लिया। अब यहां खदान उद्योग की ताकत इतनी बढ़ गई है कि एक-एक लोहा, कोयला या सीमेंट, बॉक्साइट खदान से लोगों का सैकड़ों से हजारों करोड़ तक का सीधा नफा दिख रहा है। जिन सत्तासीन लोगों से उद्योगपति और व्यापारी, दलाल और नेता इस कदर के फायदे पाते हैं, जाहिर है कि उसी हद तक वे अगली सरकार में दिलचस्पी रखेंगे। ऐसे में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा होता है।
दिल्ली में पिछले दिनों मेरे एक मित्र और सांसद संदीप दीक्षित से बात हो रही थी। वे राजनीति में अपनी मां शीला दीक्षित की तरह साफ-सुथरे माने जाते हैं और जनधारणा है कि उन्होंने अभी तक भ्रष्टïाचार शुरू नहीं किया है। उनसे बातचीत में जब सांसदों को मिलने वाली सहूलियतों की लंबी फेहरिस्त को लेकर मैं उनकी खिंचाई कर रहा था और कह रहा था कि कहीं से मुझे भी टिकट दिला दो तो लोकसभा का चुनाव लड़कर ये सारे ऐश-आराम पा लूं। उन्होंने अपना दुखड़ा बताया कि चुनाव इस कदर महंगा हो गया है कि किसी ईमानदार के लिए बिना कालेधन के इसे लडऩा लगभग असंभव हो गया है और यही वजह है कि कुछ लोग जो चुनाव जीत भी सकते हैं वे भी लोकसभा के बजाय राज्यसभा में जाना पसंद करते हैं।
यह बात सुनकर मुझे एक दूसरी घटना याद आई जिसमें एक आपसी बातचीत में एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पिछला लोकसभा चुनाव उन्हें 16 करोड़ का पड़ा था और अगला चुनाव वे लड़ भी पाएंगे या नहीं उन्हें नहीं पता। इसी के साथ वह खबर याद पड़ी जिसमें कुछ हफ्ते पहले भाजपा की परेशानी का जिक्र था कि उसके तमाम दिग्गज और सितारा नेता एक-एक करके राज्यसभा में पहुंच गए हैं और अगले लोकसभा चुनाव में उसे ऐसे जीतने वाले नेताओं की कमी पडऩे वाली है।
शायद थोड़े से ईमानदार या इंतजाम करने में थोड़े से कमजोर नेता लोकसभा जाने के लिए पहले तो टिकट के लिए करोड़ों, फिर अपने कार्यकर्ताओं के लिए करोड़ों और फिर मतदाताओं के लिए करोड़ों जुटाने के बजाय पार्टी को खुश करके राज्यसभा में जाना पसंद करते होंगे ताकि एक बार हाईकमान के पैर पकडऩा ठीक है, रोज-रोज कब तक कार्यकर्ताओं, मतदाताओं और धंधेबाजों को खुश करते रहें। कब तक संसद में सवाल पूछने के लिए रुपए लेते रहें और कब तक बड़ी-बड़ी कंपनियों के मामले लेकर सत्ता में दलाली करने के लिए घूमें?
इन्हीं सारी चर्चाओं के बीच भारतीय लोकतंत्र के लिए फिक्रमंद एक दोस्त से बात हो रही थी तो उनका कहना था कि लोकतंत्र केवल उन टुकड़ों में जिंदा है जिनका कोई खरीददार अभी तक नहीं मिला है या जिनको बेचने की गुंजाइश अभी तक लोगों को नहीं मिली है। जिस अंदाज में इस लोकतंत्र की संवैधानिक संस्थाएं, उनकी कुर्सियां, उनके अधिकार और उनकी ताकत बिक और नीलाम हो रही है उसे देखना हो तो सत्ता के गलियारों में दलालों को देखना होगा।
बहुत बरस बाद मैंने अभी एक फिल्म 'सरकार राजÓ देखी। यह फिल्म शायद इसी मुद्दे पर इन्हीं लोगों को लेकर बनी एक पहली फिल्म 'सरकारÓ का दूसरा हिस्सा थी। फिल्म में जाहिर तौर पर महाराष्टï्र के एक वक्त के बेताज बादशाह बाल ठाकरे के चरित्र और परिवार से मिलती-जुलती कहानी है। और बाल ठाकरे के निजी दोस्त अमिताभ बच्चन और उनके परिवार ने इस फिल्म में काम किया है। इसमें सत्ता को चलाने वाले लोग किस किस्म के माफिया होते हैं इस बात को बहुत ही खौफनाक तरीके से पेश किया गया है। और किसी प्रदेश को प्रभावित करने वाले बड़े-बड़े, दसियों हजार करोड़ के फैसले किस तरह हत्याओं के साथ पूरे होते हैं या करवाए जाते हैं इसकी एक भयानक तस्वीर इस फिल्म में है।
इसे देखने के बाद से मैं लगातार सोच रहा हूं कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से सत्ता को कुछ अधिक करीब से देखने का जो मौका मिला, या जो नौबत आई उसमें और 'सरकार राजÓ में अभी कितने बरस का फासला बचा है।
-सुनील कुमार
कुछ महीने पहले मिजोरम जाकर आने का एक फायदा यह रहा कि वहां से बहुत से लोग बीच-बीच में संपर्क करने लगे। वहां काम कर रहे एक सामाजिक कार्यकर्ता और एक पत्रकार की अभी कुछ और लोगों के साथ एक दूसरे उत्तर-पूर्वी राज्य के सांसद से मुलाकात हुई। इस बातचीत के बारे में काफी खुलासे से मुझे यहां बैठे पता लगा।
उत्तर-पूर्व के एक सांसद का कांगे्रस का अनुभव सुनने लायक है। काफी समय पहले उन्होंने जब लोकसभा चुनाव लडऩा तय किया तो कांगे्रस पार्टी छांटी। इस पार्टी की टिकट मांगी तो इसे तय करने के लिए जो पर्यवेक्षक आए उन्होंने लगातार दो चुनाव में टिकट के लिए 25-25 लाख रुपए मांगे। ऐसा न होने पर उन्हें टिकट नहीं मिली। तीसरे चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लोगों ने उनसे संपर्क किया और अपनी पार्टी से चुनाव लडऩे के लिए कहा। चुनाव के लिए पर्याप्त खर्च भी पार्टी ने दिया और उन्हें सांसद बनवाया। पहली बार में वे भाजपा की टिकट पर नहीं जीत पाए तो चुनाव नतीजे आने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें फोन करके दिलासा दिलाया और सक्रिय रहने को कहा। नतीजा यह रहा कि अगली बार वे चुनाव फिर लड़े और भाजपा की टिकट पर सांसद बने।
कांगे्रस पार्टी की टिकट के लिए भुगतान लेने का यह नया मामला नहीं है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में विधानसभा चुनाव की टिकटें जिस तरह से दी जाती हैं उनको लेकर पार्टी के भीतर यह खुलकर चर्चा रहती है कि किसने किसको कितना भुगतान किया है। पार्टी या नेता जो भी टिकट के लिए वसूली करता हो, यह बात हर कोई जानता है कि मेडिकल और इंजीनियरिंग की पेमेंट सीट की तरह कुछ संपन्न इलाकों की कांगे्रस की टिकटें बिकती हैं।
लेकिन कांगे्रस को हम कुछ अधिक करीब से देख रहे हैं और उसमें यह खरीद-बिक्री कुछ अधिक है इसलिए राज्यसभा के चुनाव के समय भी किसी बड़े कारोबारी को टिकट मिलने के साथ ही यह चर्चा भी हो जाती है कि उसने पार्टी को या पदाधिकारियों को कितना भुगतान किया है। लेकिन दूसरी पार्टियों में भी जगह-जगह धनपशुओं से इस तरह की उगाही आम बात है। पिछले दिनों कर्नाटक के चुनाव में एक विधानसभा सीट पर दो लोहा खदान मालिकों ने 100-100 करोड़ रुपए खर्च किए ऐसी खबरें लगातार टीवी और अखबारों में रहीं। इसके अलावा दोनों-तीनों पार्टियों को लोहा खदान मालिकों से मिली लंबी-चौड़ी रकम से कर्नाटक का चुनाव लड़ा गया। जाहिर है कि जनता के हक का यह लोहा जब मिट्टïी के दाम से भी कम पर, लगभग मुफ्त उद्योगपतियों को दिया जाता है तो उसके एवज में पार्टियां भी अरबपति होती हैं। ऐसा भी होता है कि सत्ता या संगठन में बैठे हुए फैसले लेने वाले लोग खुद भी अरबपति हो जाते हैं।
आठ बरस पहले जब छत्तीसगढ़ नया राज्य बनने को था तो यह आशंका थी कि शराब व्यापारी सरकार बनवाएंगे या बनने से रोकेंगे। ऐसी जनधारणा थी कि दूर के ग्रामीण इलाकों से आने वाले आदिवासी विधायकों के साथ कोई न कोई शराब-प्रतिनिधि चिपक गया है और विधायकों को प्रभावित करने का पूरा इंतजाम हो गया है। लेकिन इन आठ बरसों में ही हमने छत्तीसगढ़ में शराब के धंधे की ताकत को तीसरे, चौथे या पाँचवें नंबर पर जाते हुए देख लिया। अब यहां खदान उद्योग की ताकत इतनी बढ़ गई है कि एक-एक लोहा, कोयला या सीमेंट, बॉक्साइट खदान से लोगों का सैकड़ों से हजारों करोड़ तक का सीधा नफा दिख रहा है। जिन सत्तासीन लोगों से उद्योगपति और व्यापारी, दलाल और नेता इस कदर के फायदे पाते हैं, जाहिर है कि उसी हद तक वे अगली सरकार में दिलचस्पी रखेंगे। ऐसे में एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा होता है।
दिल्ली में पिछले दिनों मेरे एक मित्र और सांसद संदीप दीक्षित से बात हो रही थी। वे राजनीति में अपनी मां शीला दीक्षित की तरह साफ-सुथरे माने जाते हैं और जनधारणा है कि उन्होंने अभी तक भ्रष्टïाचार शुरू नहीं किया है। उनसे बातचीत में जब सांसदों को मिलने वाली सहूलियतों की लंबी फेहरिस्त को लेकर मैं उनकी खिंचाई कर रहा था और कह रहा था कि कहीं से मुझे भी टिकट दिला दो तो लोकसभा का चुनाव लड़कर ये सारे ऐश-आराम पा लूं। उन्होंने अपना दुखड़ा बताया कि चुनाव इस कदर महंगा हो गया है कि किसी ईमानदार के लिए बिना कालेधन के इसे लडऩा लगभग असंभव हो गया है और यही वजह है कि कुछ लोग जो चुनाव जीत भी सकते हैं वे भी लोकसभा के बजाय राज्यसभा में जाना पसंद करते हैं।
यह बात सुनकर मुझे एक दूसरी घटना याद आई जिसमें एक आपसी बातचीत में एक केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पिछला लोकसभा चुनाव उन्हें 16 करोड़ का पड़ा था और अगला चुनाव वे लड़ भी पाएंगे या नहीं उन्हें नहीं पता। इसी के साथ वह खबर याद पड़ी जिसमें कुछ हफ्ते पहले भाजपा की परेशानी का जिक्र था कि उसके तमाम दिग्गज और सितारा नेता एक-एक करके राज्यसभा में पहुंच गए हैं और अगले लोकसभा चुनाव में उसे ऐसे जीतने वाले नेताओं की कमी पडऩे वाली है।
शायद थोड़े से ईमानदार या इंतजाम करने में थोड़े से कमजोर नेता लोकसभा जाने के लिए पहले तो टिकट के लिए करोड़ों, फिर अपने कार्यकर्ताओं के लिए करोड़ों और फिर मतदाताओं के लिए करोड़ों जुटाने के बजाय पार्टी को खुश करके राज्यसभा में जाना पसंद करते होंगे ताकि एक बार हाईकमान के पैर पकडऩा ठीक है, रोज-रोज कब तक कार्यकर्ताओं, मतदाताओं और धंधेबाजों को खुश करते रहें। कब तक संसद में सवाल पूछने के लिए रुपए लेते रहें और कब तक बड़ी-बड़ी कंपनियों के मामले लेकर सत्ता में दलाली करने के लिए घूमें?
इन्हीं सारी चर्चाओं के बीच भारतीय लोकतंत्र के लिए फिक्रमंद एक दोस्त से बात हो रही थी तो उनका कहना था कि लोकतंत्र केवल उन टुकड़ों में जिंदा है जिनका कोई खरीददार अभी तक नहीं मिला है या जिनको बेचने की गुंजाइश अभी तक लोगों को नहीं मिली है। जिस अंदाज में इस लोकतंत्र की संवैधानिक संस्थाएं, उनकी कुर्सियां, उनके अधिकार और उनकी ताकत बिक और नीलाम हो रही है उसे देखना हो तो सत्ता के गलियारों में दलालों को देखना होगा।
बहुत बरस बाद मैंने अभी एक फिल्म 'सरकार राजÓ देखी। यह फिल्म शायद इसी मुद्दे पर इन्हीं लोगों को लेकर बनी एक पहली फिल्म 'सरकारÓ का दूसरा हिस्सा थी। फिल्म में जाहिर तौर पर महाराष्टï्र के एक वक्त के बेताज बादशाह बाल ठाकरे के चरित्र और परिवार से मिलती-जुलती कहानी है। और बाल ठाकरे के निजी दोस्त अमिताभ बच्चन और उनके परिवार ने इस फिल्म में काम किया है। इसमें सत्ता को चलाने वाले लोग किस किस्म के माफिया होते हैं इस बात को बहुत ही खौफनाक तरीके से पेश किया गया है। और किसी प्रदेश को प्रभावित करने वाले बड़े-बड़े, दसियों हजार करोड़ के फैसले किस तरह हत्याओं के साथ पूरे होते हैं या करवाए जाते हैं इसकी एक भयानक तस्वीर इस फिल्म में है।
इसे देखने के बाद से मैं लगातार सोच रहा हूं कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से सत्ता को कुछ अधिक करीब से देखने का जो मौका मिला, या जो नौबत आई उसमें और 'सरकार राजÓ में अभी कितने बरस का फासला बचा है।
-सुनील कुमार