27 अपै्रल 08
अमरीका में पिछले कुछ समय से समाजशात्रियों के बीच एक नई बहस चल रही है। वहां के एंथ्रोपोलाजिस्ट (नृत्यशास्त्री, मानव विज्ञानी) इस नैतिक दुविधा में हैं कि उनके मिलिटरी के साथ काम करना चाहिए या नहीं? इस आत्ममंथन की जरूरत इसलिए पड़ी कि समाजशास्त्रियों में से ही कुछ ने यहबात सामने रखी कि युद्घ के वक्त मिलिटरी किसी तरह का समाजशास्त्रीय अध्ययन नहीं करती है। पिुर मानो अमरीकी सरकार इस अकादमिक सलाह को मानने को उतारू बैठी थी, उसने अपनी फौज के तहत ऐसे शोधकर्ता समाजशास्त्री रखे जिन्होंने अमरीकी हमले के शिकार वियतनाम या कांगो में जाकर अध्ययन किया। फिर इन निष्कर्षों को गैरफौजी मुखिया को सौंपा। लेकिन आखिरकार ऐसे कई देशों में इन अध्ययनों का इस्तेमाल फौजी मकसद में हुआ। अमरीकी राजनीति से असहमत लोगों को चुन-चुनकर चिली में मारा गया क्योंकि वहां अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए एक खास सरकार चाहती थी। मतलब यह कि जाहिर तौर पर हमले या युद्घ के शिकार समाज की मदद के घोषित इरादे से करवाई गई रिसच्र उसी समाज को और कुलचने में इस्तेमाल होने लगी।
एंथ्रोपोलाजिस्ट कुछ नीति-सिद्घांतों के तहत काम करते हैं। जैसे डॉक्टरों की डॉक्टरी सिद्घांतों की शपथ किसी भी सभ्य देश के कानून से कुचली नहीं जाती, वैसे ही मानवशास्त्र के सिद्घांत ये कहते हैं कि किसी भी समाज पर अध्ययन उसकी सहमति से ही होना चाहिए और उसका उपयोग उस समाज के खिलाफ नहीं होना चाहिए। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक मरीज के बारे में जानकारी डॉक्टर किसी को नहीं देता, वरना एचआईवी से संक्रमित मरीज की जानकारी पाकर कोई भी उसे ब्लैकमेल करने लगे। कोई वकील अपने मुवक्किल के राज अगर पर्दाफाश करने लगे तो पूरी न्याय व्यवस्था ठप हो जाए और पेशे का ईमान खत्म ही हो जाए। अगर गरीबों को सरकारी खर्च पर मिलने वाले वकीलों से सरकार उन गरीबों के राज उगलवा ले सरकारी डॉक्टर से सरकार मरीजों की जानकारी निकलवा ले, तो फिर यह सत्ता के हाथ के सबसे घातक हथियार बन जाएंगे।
ऐसे में मानव शास्त्रियों के बीच यह बहस चल रही है कि फौज के साथ, फौज के लिए, या फौजी उपयोग के खतरे वाले शोध कार्य किए जाएं या नहीं? इराक में अमरीकी फौजों के साथ जिस तरह चस्पा होकर पत्रकार गए हैं, वैसे ही समाजशास्त्री भी गए हैं। और उनके शोध के नतीजों का इस्तेमाल फौज, फौज के जासूस, बागी लोगों की शिनाख्त में कर रहे हैं।
अखबारनवीसों का ऐसा इस्तेमाल नक्सली, पुलिस, खुफिया एजेंसियां अफसर, ठेकेदार, सभी करते हैं। नेताओं के किसी विरोधी नेता की टोह लेना हो तो पत्रकारों के मार्फत पता लगवाते हैं। छत्तीसगढ़ में पुलिस क्या सोच रही है, यह पता लगाने के लिए नक्सली या उनके सहयोगी पत्रकारों से पूछताछ करते हैं। दूसरी तरफ पुलिस भी ऐसी पत्रकारों से बात करती रहती है जिनके नक्सल समर्थक होने का शक हो या जिनसे नक्सलियों के संपर्क हैं।
हर पेशे को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को बारीकी से समझना चाहिए। बिना जिम्मेदारी कोई अधिकार नहीं मिल जाते। फिर पेशे की नैतिकता इन सबसे ऊपर होती है। आज दुनिया में देशों के बीच शीतयुद्घ एक तरह से बंद हो गया है, लेकिन एक दूसरी शक्ल में चल रहा है। किस देश में जंगल बचाने के लिए आंदोलन कर रहे लोग किसी दूसरे देश के जंगल व्यापारियों द्वारा घुमा-फिराकर भेजा गया पेसा पा रहे हैं यह कल्पना करना मुश्किल है। भारत में पेड़ों की कटाई थम गई है कि जंगल घट रहे हैं, दूसरी तरफ अखबारी कागज से लेकर फर्नीचर तक थोक में दूसरे देशों से आ रहे हैं।
जाहिर तौर पर पर्यावरण बचाने के लिए, बांध रोकने के लिए, बाल मजदूरी खत्म करने के लिए, जिन शोध कार्यों के आधार पर अंतरराष्टï्रीय जनमत बनता है, राष्टï्रीय जनहित याचिकाएं बनती हैं, फिर अदालती रोक बनती हैं, उनके पीछे किस देश के किन व्यापारियों की क्या नीयत हे यह पता नहीं लगता। मासूम लगते बहुत से शोध कार्य किसी बड़े औद्योगिक षडयंत्र के हिसाब से नतीजे निकालकर दुनिया के सामने एक भयावह तस्वीर पेश कर सकते हैं। भारत जैसे देश जहां उच्च शिक्षा से उत्कृष्टïता और शोधकार्य से मौलिकता लगभग गायब है, वहां मेहनत से काम करते समर्पित विदेशी शोधकर्ता बड़ी प्रतिष्ठïा पाते हैं। लेकिन कई मामलों में उनको खुद को भी पता नहीं होता कि वे किसके लिए काम कर रहे हैं या उनकी जुटाई जानकारी, उस समाज के खिलाफ ही किस तरह से इस्तेमाल होगी।
सतह पर तैरते मकसदों पर तुरंत भरोसा करना ठीक नहीं है। इन जलकुंभियों की जड़ों के बारे में भी सोचना चाहिए। भारत जैसे देशों में किसी गंभीर अध्ययन की कमी रहती है, ऐसे में किसी संस्था या संगठन द्वारा पेश किए गए शोध-निष्कर्षों से एक दहशत खड़ी की जा सकती है। आंकड़ों के बदनीयत विश्लेषण से एक निहायत झूठी लेकिन खासी विश्वसनीय तस्वीर पेश की जा सकती है और लोगों को बताया जा सकता है कि उनके परंपरागत पेशों को खत्म करना क्यों जरूरी है।
आज दुनिया में क्लोनिंग और कृत्रिम गर्भधारण की सारी बड़ी रिसर्च गोरे देशों में हो रही है। आज जाहिर तौर पर यह इलाज के लिए है लेकिन क्या कल इसका इस्तेमाल गोरी नस्लों को बढ़ाने के लिए किया जाएगा? मेरी बात आज कुछ लोगों को जेनोफोबिया (नस्लीय दहशत) लग सकती है, लेकिन ऐसा तो है नहीं कि दुनिया से नस्लीय सोच खत्म हो गई है। आज भी धरती से किसी एक धर्म का समूल नाश करने के लिए अगर गारंटी के साथ चंदा इक_ïा किया जाएगा, तो लोग अपनी जायदाद का एक हिस्सा देने को भी तैयार हो जाएंगे।
किसी भी विज्ञान, चाहे वह शरीर विज्ञान हो या समाज विज्ञान, को अपनी सीमाएं समझाना चाहिए। वे चाकू बना तो सकते हैं सब्जी काटने के इरादे से लेकिन पेट चीरने के लिए चाकू के इस्तेमाल को रोक नहीं सकते। जो लोग सामाजिक अंदोलनों में काम करते हैं, मीडिया में मानवीय मुद्दों को कवर करते हैं, उनको भी अपने बेजा इस्तेमाल के बारे में चौकन्ना रहना चाहिए।
-सुनील कुमार
अमरीका में पिछले कुछ समय से समाजशात्रियों के बीच एक नई बहस चल रही है। वहां के एंथ्रोपोलाजिस्ट (नृत्यशास्त्री, मानव विज्ञानी) इस नैतिक दुविधा में हैं कि उनके मिलिटरी के साथ काम करना चाहिए या नहीं? इस आत्ममंथन की जरूरत इसलिए पड़ी कि समाजशास्त्रियों में से ही कुछ ने यहबात सामने रखी कि युद्घ के वक्त मिलिटरी किसी तरह का समाजशास्त्रीय अध्ययन नहीं करती है। पिुर मानो अमरीकी सरकार इस अकादमिक सलाह को मानने को उतारू बैठी थी, उसने अपनी फौज के तहत ऐसे शोधकर्ता समाजशास्त्री रखे जिन्होंने अमरीकी हमले के शिकार वियतनाम या कांगो में जाकर अध्ययन किया। फिर इन निष्कर्षों को गैरफौजी मुखिया को सौंपा। लेकिन आखिरकार ऐसे कई देशों में इन अध्ययनों का इस्तेमाल फौजी मकसद में हुआ। अमरीकी राजनीति से असहमत लोगों को चुन-चुनकर चिली में मारा गया क्योंकि वहां अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए एक खास सरकार चाहती थी। मतलब यह कि जाहिर तौर पर हमले या युद्घ के शिकार समाज की मदद के घोषित इरादे से करवाई गई रिसच्र उसी समाज को और कुलचने में इस्तेमाल होने लगी।
एंथ्रोपोलाजिस्ट कुछ नीति-सिद्घांतों के तहत काम करते हैं। जैसे डॉक्टरों की डॉक्टरी सिद्घांतों की शपथ किसी भी सभ्य देश के कानून से कुचली नहीं जाती, वैसे ही मानवशास्त्र के सिद्घांत ये कहते हैं कि किसी भी समाज पर अध्ययन उसकी सहमति से ही होना चाहिए और उसका उपयोग उस समाज के खिलाफ नहीं होना चाहिए। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक मरीज के बारे में जानकारी डॉक्टर किसी को नहीं देता, वरना एचआईवी से संक्रमित मरीज की जानकारी पाकर कोई भी उसे ब्लैकमेल करने लगे। कोई वकील अपने मुवक्किल के राज अगर पर्दाफाश करने लगे तो पूरी न्याय व्यवस्था ठप हो जाए और पेशे का ईमान खत्म ही हो जाए। अगर गरीबों को सरकारी खर्च पर मिलने वाले वकीलों से सरकार उन गरीबों के राज उगलवा ले सरकारी डॉक्टर से सरकार मरीजों की जानकारी निकलवा ले, तो फिर यह सत्ता के हाथ के सबसे घातक हथियार बन जाएंगे।
ऐसे में मानव शास्त्रियों के बीच यह बहस चल रही है कि फौज के साथ, फौज के लिए, या फौजी उपयोग के खतरे वाले शोध कार्य किए जाएं या नहीं? इराक में अमरीकी फौजों के साथ जिस तरह चस्पा होकर पत्रकार गए हैं, वैसे ही समाजशास्त्री भी गए हैं। और उनके शोध के नतीजों का इस्तेमाल फौज, फौज के जासूस, बागी लोगों की शिनाख्त में कर रहे हैं।
अखबारनवीसों का ऐसा इस्तेमाल नक्सली, पुलिस, खुफिया एजेंसियां अफसर, ठेकेदार, सभी करते हैं। नेताओं के किसी विरोधी नेता की टोह लेना हो तो पत्रकारों के मार्फत पता लगवाते हैं। छत्तीसगढ़ में पुलिस क्या सोच रही है, यह पता लगाने के लिए नक्सली या उनके सहयोगी पत्रकारों से पूछताछ करते हैं। दूसरी तरफ पुलिस भी ऐसी पत्रकारों से बात करती रहती है जिनके नक्सल समर्थक होने का शक हो या जिनसे नक्सलियों के संपर्क हैं।
हर पेशे को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को बारीकी से समझना चाहिए। बिना जिम्मेदारी कोई अधिकार नहीं मिल जाते। फिर पेशे की नैतिकता इन सबसे ऊपर होती है। आज दुनिया में देशों के बीच शीतयुद्घ एक तरह से बंद हो गया है, लेकिन एक दूसरी शक्ल में चल रहा है। किस देश में जंगल बचाने के लिए आंदोलन कर रहे लोग किसी दूसरे देश के जंगल व्यापारियों द्वारा घुमा-फिराकर भेजा गया पेसा पा रहे हैं यह कल्पना करना मुश्किल है। भारत में पेड़ों की कटाई थम गई है कि जंगल घट रहे हैं, दूसरी तरफ अखबारी कागज से लेकर फर्नीचर तक थोक में दूसरे देशों से आ रहे हैं।
जाहिर तौर पर पर्यावरण बचाने के लिए, बांध रोकने के लिए, बाल मजदूरी खत्म करने के लिए, जिन शोध कार्यों के आधार पर अंतरराष्टï्रीय जनमत बनता है, राष्टï्रीय जनहित याचिकाएं बनती हैं, फिर अदालती रोक बनती हैं, उनके पीछे किस देश के किन व्यापारियों की क्या नीयत हे यह पता नहीं लगता। मासूम लगते बहुत से शोध कार्य किसी बड़े औद्योगिक षडयंत्र के हिसाब से नतीजे निकालकर दुनिया के सामने एक भयावह तस्वीर पेश कर सकते हैं। भारत जैसे देश जहां उच्च शिक्षा से उत्कृष्टïता और शोधकार्य से मौलिकता लगभग गायब है, वहां मेहनत से काम करते समर्पित विदेशी शोधकर्ता बड़ी प्रतिष्ठïा पाते हैं। लेकिन कई मामलों में उनको खुद को भी पता नहीं होता कि वे किसके लिए काम कर रहे हैं या उनकी जुटाई जानकारी, उस समाज के खिलाफ ही किस तरह से इस्तेमाल होगी।
सतह पर तैरते मकसदों पर तुरंत भरोसा करना ठीक नहीं है। इन जलकुंभियों की जड़ों के बारे में भी सोचना चाहिए। भारत जैसे देशों में किसी गंभीर अध्ययन की कमी रहती है, ऐसे में किसी संस्था या संगठन द्वारा पेश किए गए शोध-निष्कर्षों से एक दहशत खड़ी की जा सकती है। आंकड़ों के बदनीयत विश्लेषण से एक निहायत झूठी लेकिन खासी विश्वसनीय तस्वीर पेश की जा सकती है और लोगों को बताया जा सकता है कि उनके परंपरागत पेशों को खत्म करना क्यों जरूरी है।
आज दुनिया में क्लोनिंग और कृत्रिम गर्भधारण की सारी बड़ी रिसर्च गोरे देशों में हो रही है। आज जाहिर तौर पर यह इलाज के लिए है लेकिन क्या कल इसका इस्तेमाल गोरी नस्लों को बढ़ाने के लिए किया जाएगा? मेरी बात आज कुछ लोगों को जेनोफोबिया (नस्लीय दहशत) लग सकती है, लेकिन ऐसा तो है नहीं कि दुनिया से नस्लीय सोच खत्म हो गई है। आज भी धरती से किसी एक धर्म का समूल नाश करने के लिए अगर गारंटी के साथ चंदा इक_ïा किया जाएगा, तो लोग अपनी जायदाद का एक हिस्सा देने को भी तैयार हो जाएंगे।
किसी भी विज्ञान, चाहे वह शरीर विज्ञान हो या समाज विज्ञान, को अपनी सीमाएं समझाना चाहिए। वे चाकू बना तो सकते हैं सब्जी काटने के इरादे से लेकिन पेट चीरने के लिए चाकू के इस्तेमाल को रोक नहीं सकते। जो लोग सामाजिक अंदोलनों में काम करते हैं, मीडिया में मानवीय मुद्दों को कवर करते हैं, उनको भी अपने बेजा इस्तेमाल के बारे में चौकन्ना रहना चाहिए।
-सुनील कुमार
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