बिग (?) बी के ब्लॉग से निकली एक बात

4 मई 08
अमिताभ बच्चन इन दिनों इंटरनेट पर अपना ब्लॉग बनाकर उसमें अपने मन की बातें लिख रहे हैं और लोगों की कही बातों का जवाब भी दे रहे हैं। उनके इस नए काम पर अभी टेलीविजन पर एक बहस चल रही थी कि वे यह करके भड़ास निकाल रहे हैं या बदला निकाल रहे हैं। इसके साथ ही अमिताभ बच्चन पर अब सार्वजनिक हमले कुछ धीमे पड़े दिखते हैं और मुम्बई में आग उगलती राज ठाकरे की तोप की नाल अमिताभ की तरफ नहीं है।
ब्लॉग से जो लोग वाकिफ न हों, उनके लिए यह बता देना मुनासिब होगा कि इंटरनेट पर कोई भी व्यक्ति मुफ्त में अपना ब्लॉग बनाकर उसमें मनचाही बातें लिख सकता है। जब तक इस पर किसी अपराध जैसी कोई बात न हो, यहां पर लोग अश्लील बातें, नग्न तस्वीरें भी डाल सकते हैं। ये ब्लॉग लोगों का अपना अखबार है जिसमें वे जो चाहें लिख सकते हैं और यह उनकी निजी डायरी भी है जिसमें वे मनचाही बातें दर्ज कर सकते हैं। मतलब यह कि अपने पत्र लोगों को पढ़वाने के लिए आपका नेहरू होना जरूरी नहीं और अपनी डायरी लोगों को पढ़वाने के लिए आपका गांधी होना जरूरी नहीं। अब आप अपना ब्लॉग बनाकर लेखक, पत्रकार, संपादक, मुद्रक, प्रकाशक, सब बन सकते हैं, घर बैठे, एक मिनट में और मुफ्त में।
लेकिन ब्लॉग, और हिंदी ब्लॉग, के बारे में कुछ अधिक जानकार लोगों ने पहले भी खुलासे से लिखा है और उस पर लिखना आज का मकसद नहीं है। लोगों के बोलने, लिखने और प्रचारित-प्रसारित होने की आजादी अधिक बड़ा मुद्दा है। अब तक इनमें से किसी भी काम के मायने रखने के लिए यह जरूरी था कि आपका नाम, ओहदा, लिखने का अंदाज, संपादक की मर्जी, सब मेल खाए। इसके बिना लोग नहानी में गाने वाले की तरह थे। अब मानो नहानी में एक रेडियो स्टेशन भी लग गया है, मुफ्त का, जिसकी तरंगें पूरी दुनिया में जा रही हैं। आप अपना ब्लॉग बनाकर उसमें अपनी बातों को बरस-दर-बरस रख भी सकते हैं।
अब लोगों को मुक्तिबोध की तरह छपने के लिए पहले मरना नहीं पड़ेगा, गांधी की तरह पहले महात्मा नहीं होना पड़ेगा। अमिताभ बच्चन तो अपने ब्लॉग पर अपनी पसंद के सवाल या पत्र डाल रहे हैं और मर्जी होने पर उनके जवाब भी लिख रहे हैं, लेकिन उनके ब्लॉग के जवाब में कोई ब्लॉग हो सकता है कि शुरू हो चुका हो। यह ब्लॉग ऐसा भी हो सकता है कि उस पर अमिताभ द्वारा खारिज किए गए पत्रों को जगह मिले।
जैसे कि मैंने ही अमिताभ के ब्लॉग पर जाकर अपने नाम-पते के साथ आधा दर्जन सवाल पूछे, इसलिए भी पूछे कि वे जो भी जवाब लिखें उनको हम छाप सकें। पता नहीं वे कड़वे, असुविधाजनक सवालों के जवाब दें, न दें, इसलिए मैंने पहली किस्त में सोलह की जगह छह सवाल ही लिखे और लिखा कि बाकी सवाल अगली किस्त में। लेकिन हफ्ते-दस दिन के बाद भी उनकी बारी नहीं आई, सवालों को भी ब्लॉग पर जगह नहीं मिली।
लेकिन मुझे कोई शिकायत या मलाल नहीं है। मैंने बड़े नामी-गिरामी अखबारों को भी कुछ मौकों पर असहमति लिखकर भेजी, लेकिन उनमें से किसी को जगह नहीं मिली। ऐसे में ब्लॉग वाले बच्चन की तो अखबार की तरह की कोई परंपरागत जवाबदेही भी नहीं है। ब्लॉग तो अपने घर की बाहरी दीवार है जहां लिखने तक सिर्फ खुद की पहुंच है। यहां तक लोगों की नजरें तो आने दी जा सकती हैं, लेकिन उनको लिखने देना है या नहीं, यह तो घर का मालिक ही तय करता है। वैसे तो अखबारों में भी किसको क्या लिखने का हक रहे यह भी मालिक ही तय करता है।
अमिताभ जैसी बड़े कद की शख्सियत के ब्लॉग के मुकाबिले भी कुछ ब्लॉग खड़े होने चाहिए और ठीक इसी तरह सभी बड़े या चर्चित लोगों, संगठनों, अखबारों के मुकाबले ब्लॉग खुलने चाहिए। आज ताकतवर लोग या ताकतवर मीडिया जहां बेईमानी करते हैं, उनसे सवाल पूछने के लिए भी ब्लॉग बनने चाहिए। काउंटर-अमिताभ ब्लॉग, या काउंटर-कांगे्रस ब्लॉग बन सकते हैं जहां लोग इनसे इनके ब्लॉग, वेबसाईट या प्रकाशनों से असहमत होने पर अपनी बात वहां रख सकें। किसी अखबार में उसकी किसी बात का जवाब ही न छापा जाए तो लोग क्या करें? ऐसे ब्लॉग बनाकर उस पर सारी अप्रकाशित असहमति डाल सकते हैं।
कुछ हफ्ते पहले मैंने एक ताजा घटना लिखी भी थी कि किस तरह छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का सक्रिय सहयोग देते पकड़ाने पर एक भूतपूर्व पत्रकार को लेकर देश के नामी-गिरामी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे मीडिया की आजादी पर हमला कहा। इस पर एक खुलासा मैंने इसी प्रमुख पत्रिका को भेजा जिसने वह बयान छापा था। लेकिन मेरी प्रतिक्रिया को कोई जगह न मिली।
मुझे लगता है कि हिंदुस्तान में मीडिया की अपनी बेईमानी, नाइंसाफी, लापरवाही को उजागर करने के लिए ऐसे ब्लॉग बनने चाहिए जिन पर किसी भी मीडिया से घायल या असंतुष्टï लोग अपनी शिकायत लिखकर भेज सकें। यह ब्लॉग नियंत्रित करने वाला उस शिकायत पर संबंधित मीडिया से एक सीमित समय में जवाब लेकर ब्लॉग पर डाल दे। मीडिया गर जवाब न देना भी चाहे, तो भी उसके जवाब के बिना सातवें दिन एक तरफा शिकायत दर्ज कर दी जाए, फिर वह पत्र-पत्रिका चाहे तो बाद में जवाब देते रहे।
पे्रस कौंसिल ऑफ इंडिया नाम के सजे-धजे मुर्दे के राज में ऐसे कुछ स्वतंत्र मंचों की जरूरत है ताकि मीडिया की जवाबदेही भी तय हो।
लेकिन बात ब्लॉग से शुरू हुई थी। जिन लोगों की भी पहुंच कम्प्यूटर और इंटरनेट तक हो वे लोग विचारों के इस नए जंगल में चहल-कदमी कर सकते हैं। आज तो हिंदी में भी कम से कम हजारों ब्लॉग हैं ही और वहां के लोग अभी तक कुछ दूसरी भाषाओं के मुकाबिले कम दंभी हैं। हिंदी के लोग चाहते हैं कि इंटरनेट पर उनकी आबादी बढ़े इसलिए वे नए लोगों को बढ़ावा देते चलते हैं, लेकिन अंगे्रजी की एक अंतरराष्टï्रीय पहुंच होने के कारण उसकी वेबसाइटों पर नए लोगों के लिए उदारता अनिवार्य नहीं रह गई है।
अमिताभ के ब्लॉग पर मेरे सवालों की जगह नहीं है, इसलिए मुझे लगता है कि बिग बी के ब्लॉग की जगह एक स्मॉल बी का ब्लॉग भी शुरू होना चाहिए। कोई पता नहीं कैसे अपने-आपको बिग कहलवाकर भी सादगी को ओढ़ सकता है!! कल तक तो अमिताभ बच्चन यह दावा कर सकते थे कि उन्हें मीडिया बिग बी लिखता है और वे खुद इस बारे में क्या कर सकते हैं लेकिन जब वे खुद अपने ब्लॉग पर भी इसका विरोध नहीं करते तो जाहिर है तो वे इसे स्वीकार कर लेते हैं।
भारत के उन ताकतवर लोगों, तबकों, के बारे में ऐसे ब्लॉग का एक खास तरह का सिलसिला शुरू होना चाहिए कि लोग जब किसी की आलोचना जानना चाहें, तो सीधे वहाँ पहुंच जाएं, जो लोग ब्लॉग पर अधिक वक्त लगाते हैं, वे भी ऐसा सोच सकते हैं कि कैसी शैली विकसित की जाए।
जैसे मुझे लगता है कि संसद या विधानसभाओं में जिन सवालों को नहीं पूछा जा सका, उनके लिए इंटरनेट पर कोई वेबसाईट बननी चाहिए या ब्लॉग बनने चाहिए। सवाल कई तरह के रहस्यमय कारणों से रूक जाते हैं, या रोक दिए जाते हैं। यह खुलासा करने के लिए भी ब्लॉग होने चाहिए।
- सुनील कुमार

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