1 जून 08
लिफाफे पर लिखावट से लगा था कि यह नक्सलियों का भेजा बयान होगा और वही निकला। हालांकि छत्तीसगढ़ के बस्तर में सक्रिय नक्सलियों को सरकार और पत्रकार ही नक्सली कहते हैं, वे खुद अपने-आपको माओवादी लिखते हैं। आज न जो माओ रह गया और न जिस माओ की जमीन पर इस किस्म का माओवाद रह गया, उन नामों को लेकर यहां पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) चल रही है। इसके बहुचर्चित प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने इस ताजा बयान में चेरपाल में हुई दो हत्याओं का जिक्र करते हुए छत्तीसगढ़ के मजदूर किसानों, पत्रकारों, कवि-लेखकों और तमाम जनवादी बुद्घिजीवियों से अपील की है कि वे इस हत्याकांड की घोर निंदा करें और सरकार से मांग करें कि ऐसे हत्याकांड बंद करें, सलवा जुडूम बंद करें और तथाकथित राहत शिविरों में बंद तमाम आदिवासियों को वापस गांव भेजें।
पाठकों को याद होगा कि 22 मई की रात सीआरपीएफ के जवानों ने बस्तर के बीजापुर जिले के चेरपाल में राहत शिविर में सो रहे लोगों को उठाकर, बाहर निकालकर उन पर बेवजह गोलियां चलाईं और इससे 25 साल की आदिवासी महिला श्यामबाई और ढाई साल के बच्चे की वहीं पर मौत हो गई। दो दूसरे लोग इसमें घायल हुए जिसमें से एक बच्चा भी है।
इस घटना का समाचार खुलासे से छपा है और सीआरपीएफ जवान पर बिना किसी उकसावे के, बिना वजह हत्या कर देने का जुर्म भी कायम किया गया है।
नक्सलियों के प्रवक्ता ने मेरी तरह के बहुत से लोगों से, जिनमें छत्तीसगढ़ की लगभग पूरी आबादी आ जाती है, उनसे अपील की है कि हम सब इस हत्याकांड की निंदा करें और सरकार से मांग करें कि ऐसे हत्याकांड बंद करें। दूसरी तरफ इसी बयान में उसेंडी ने लिखा है कि छत्तीसगढ़ सरकार को सर्वोच्च अदालत की फटकार की कोई फिक्र नहीं है। और रमन सरकार लाशों पर विकास यात्रा का आयोजन कर रही है।
नक्सलियों ने लोगों से एक अपील करने की अपील की है इसलिए उनसे यह पूछने को दिल करता है कि उनकी पूरी सशस्त्र लड़ाई में अपील की जगह कहां है? उनको तो जिन मुद्दों को लेकर सरकार से अपील करनी थी या जिन मुद्दों को लेकर जनप्रतिनिधि बनने के लिए जनता से वोटों की अपील करनी थी उन मुद्दों पर तो उन्होंने थोक में हत्याएं करने का तरीका अपनाया हुआ है। उनको किसी से अपील करने का, और आगे अपील बढ़ाने की अपील का क्या हक है? जिनका भरोसा जंगलों में अलोकतांत्रिक अदालतें लगाकर लोगों को कुसूरवार ठहराकर काट डालने का है। उनकी शब्दावली में अपील शब्द कहां से आ गया? लड़ाई तो एक ही किस्म के हथियार से हो सकती है या तो जमीनों के नीचे बारूदी सुरंगें लगाकर एक-एक धमाके में दर्जनों लोगों को एक मुश्त मारा जा सकता है या फिर लोकतांत्रिक अपील की जा सकती है। अब अगर अपील भी नक्सली ही करेंगे तो लोकतांत्रिक जनता क्या करेगी?
हमने ऊपर जिस लड़ाई का जिक्र किया है वह लड़ाई भी लड़ाई न होकर लोकतंत्र पर एक हमला है। लड़ाई तो किसी दुश्मन से हो सकती है या किसी बुराई से। आज इस देश में शासन के लिए जो लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद सबसे बेहतर है उस व्यवस्था पर लगातार हमला कोई लड़ाई नहीं है, वह शांत जनता के हक पर हमला है। आज नक्सली बस्तर की जिस शोषित और पीडि़त जनता के हक को लेकर लडऩे की बात कहते हैं क्या उसे उसके हक इस लड़ाई के सौ बरस तक जारी रहने पर भी मिल पाएंगे? क्या सिर्फ खूनखराबे में लगे नक्सलियों के लाए कोई ऐसी जागरूकता इन आदिवासियों में आ सकती है जिससे वे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने हक बेहतर तरीके से पा सकें। छत्तीसगढ़ बनने के बाद से इस लड़ाई को अधिक करीब से देखने का मौका मिला, इसलिए भी कि ये हमले तेज हुए और इसलिए भी कि सरकार रायपुर में रहकर इनसे निबटने के लिए तैयारी करते दिखी। भोपाल में बैठी सरकार की प्राथमिकता में तो नक्सली हिंसा को खत्म करना था भी नहीं।
नक्सलियों की बातों को लगातार सुनकर विस्तार से पढ़कर और उसे पाठकों के सामने रखकर जो विचार-विमर्श हमने पिछले एक बरस में छेड़ा उसके अंत में खुद हमें जो एहसास हुआ है वह यह है कि नक्सली दोनों हाथों में लड्डïू चाहते हैं। एक तरफ वे लोकतंत्र की पूरी इमारत को गिराना उसी तरह चाहते हैं जिस तरह तालिबानों ने अफगानिस्तान में बुद्घ की प्रतिमाएं गिराईं। दूसरी तरफ वे लोकतंत्र के तमाम औजारों का इस्तेमाल अपने बचाव और वैचारिक युद्घ में करना चाहते हैं। मुझे इस बात पर हैरानी होती है कि गुड्सा उसेंडी छत्तीसगढ़ सरकार को यह उलाहना देते हैं कि उसे सर्वोच्च अदालत की फटकार की कोई फिक्र नहीं है और केंद्रीय जांच दल के आने और जाने से भी उसके जुल्मी अभियान पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। इन्हीं तमाम संस्थाओं के खिलाफ तो नक्सली पूरे हमले कर रहे हैं। जिनका पूरा काम थोक में हत्याओं के बिना न चलता हो उन्हें अदालत के जिक्र का क्या हक है? उनके पास तो बंदूकों के बल पर जंगल में अपनी खुद की अदालतें हैं, जहां वे ही जांच अधिकारी भी हैं, वे ही गवाह और जज भी हैं और वे ही जल्लाद भी हैं।
सलवा जुडूम जैसे आंदोलन से किस तरह बस्तर के बेकसूर आदिवासियों पर अमानवीय जुल्म हो रहा है इस मुद्दे को उठाने का हक देश के लोकतांत्रिक लोगों को तो है लेकिन नक्सलियों को इस बात की परवाह क्यों होनी चाहिए कि किसी के साथ अलोकतांत्रिक और अमानवीय जुल्म हो रहा है। वे खुद भी तो केवल यही काम कर रहे हैं। सलवा जुडूम के आंदोलनकारियों या बस्तर के चर्चित एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) जो हिंसा करते हैं उसकी तो एक-एक घटना पर दर्जनों बयान गैर हथियारबंद लोगों से आ जाते हैं लेकिन इन बयानों में नक्सलियों के बयान की कोई जगह कैसे हो सकती है? एक हत्यारा किसी दूसरे हत्यारे पर ऊंगली किस तरह उठा सकता है? और इस देश में चाहे किसी भी किस्म की विचारधारा हो, चाहे किसी भी किस्म का लक्ष्य हो, उसका झंडा उठाए लोगों को क्या हक है कि वे हत्या करें?
नक्सलियों ने बस्तर में अपनी हलचल की शुरूआत में आदिवासियों के शोषण और उन पर अत्याचार के मुद्दे सामने रखें और सरकार-जनता का ध्यान खींचा लेकिन जब इन मुद्दों पर पर्याप्त स्याही मिल चुकी थी तब वहां की हिंसा ने वहां पर शोषण और अत्याचार को सिर्फ बढ़ाने का काम किया है। बस्तर के शोषण को सामने रखने में नक्सलियों की भूमिका हत्याएं शुरू होने के पहले ही खत्म हो चुकी थी। लोकतंत्र में ऐसा कोई मुद्दा नहीं हो सकता जिसे लेकर लड़ाई लड़ते हुए लोकतंत्र को ही खत्म करने पर कोई उतारू हो जाए। इस बात को अगर हम एक तस्वीर के रूप में सझमने की कोशिश करें तो यह उसी किस्म की होगी जैसे किसी गर्भ में पलता हुआ बच्चा उस मां को ही पूरा खा जाए। जिन नक्सलियों को यह लोकतंत्र बर्दाश्त कर रहा है, जिन पर देश की पूरी बंदूकें कहर बनकर टूट नहीं रही हैं वे नक्सली एक-एक बार में दर्जनों हत्याएं करते हुए लोकतंत्र से सवाल भी पूछ रहे हैं!
इस विसंगति को ठीक से समझना होगा। बस्तर में नक्सली हिंसा को देख-देखकर मैंने अपने लिखे में इसके लिए किसी भी तरह के 'वादÓ का इस्तेमाल बंद कर दिया है। जहां एक इंसान दूसरे इंसान को अपने विवेक से मार डालता है वहां वाद जैसे किसी हल्के शब्द के इस्तेमाल की जरूरत भी क्या है? मैंने नक्सलियों को अपने तर्क और अपनी बातें सामने रखने का पर्याप्त मौका दिया। उनकी बातों को आगे भी बढ़ाया और दूसरे कई पक्षों को उस बहस से जोड़ा भी। लेकिन एक तरफ जहां नेपाल में वहां के माओवादी चुनाव की मूलधारा में आकर आज देश के शासन तक पहुंचे हैं और अब वे इस स्थिति में हैं कि जनकल्याण की अपनी सोच को लागू कर सकें। वहीं दूसरी तरफ बस्तर के जिन नक्सलियों को मैं करीब से देख रहा हूं वे इस लोकतंत्र को ही ढहा देने में लगे हैं। और इस राह को वे बेकसूर लोगों की लाशों से गड्ढïे पाट-पाटकर बना रहे हैं। मेरे मन का सवाल आज यही है कि ऐसे लोगों को लोकतांत्रिक समाज से किसी भी तरह की अपील करने का क्या हक है? उन्होंने अपने-आपको यह हक तो दे ही रखा है कि वे खुद जब चाहें जिसके लहू से चाहें जैसे चाहें वैसे नारे लिख सकें। उन्हें अपील की जरूरत भी क्यों हो रही है?
-सुनील कुमार
लिफाफे पर लिखावट से लगा था कि यह नक्सलियों का भेजा बयान होगा और वही निकला। हालांकि छत्तीसगढ़ के बस्तर में सक्रिय नक्सलियों को सरकार और पत्रकार ही नक्सली कहते हैं, वे खुद अपने-आपको माओवादी लिखते हैं। आज न जो माओ रह गया और न जिस माओ की जमीन पर इस किस्म का माओवाद रह गया, उन नामों को लेकर यहां पर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) चल रही है। इसके बहुचर्चित प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी ने इस ताजा बयान में चेरपाल में हुई दो हत्याओं का जिक्र करते हुए छत्तीसगढ़ के मजदूर किसानों, पत्रकारों, कवि-लेखकों और तमाम जनवादी बुद्घिजीवियों से अपील की है कि वे इस हत्याकांड की घोर निंदा करें और सरकार से मांग करें कि ऐसे हत्याकांड बंद करें, सलवा जुडूम बंद करें और तथाकथित राहत शिविरों में बंद तमाम आदिवासियों को वापस गांव भेजें।
पाठकों को याद होगा कि 22 मई की रात सीआरपीएफ के जवानों ने बस्तर के बीजापुर जिले के चेरपाल में राहत शिविर में सो रहे लोगों को उठाकर, बाहर निकालकर उन पर बेवजह गोलियां चलाईं और इससे 25 साल की आदिवासी महिला श्यामबाई और ढाई साल के बच्चे की वहीं पर मौत हो गई। दो दूसरे लोग इसमें घायल हुए जिसमें से एक बच्चा भी है।
इस घटना का समाचार खुलासे से छपा है और सीआरपीएफ जवान पर बिना किसी उकसावे के, बिना वजह हत्या कर देने का जुर्म भी कायम किया गया है।
नक्सलियों के प्रवक्ता ने मेरी तरह के बहुत से लोगों से, जिनमें छत्तीसगढ़ की लगभग पूरी आबादी आ जाती है, उनसे अपील की है कि हम सब इस हत्याकांड की निंदा करें और सरकार से मांग करें कि ऐसे हत्याकांड बंद करें। दूसरी तरफ इसी बयान में उसेंडी ने लिखा है कि छत्तीसगढ़ सरकार को सर्वोच्च अदालत की फटकार की कोई फिक्र नहीं है। और रमन सरकार लाशों पर विकास यात्रा का आयोजन कर रही है।
नक्सलियों ने लोगों से एक अपील करने की अपील की है इसलिए उनसे यह पूछने को दिल करता है कि उनकी पूरी सशस्त्र लड़ाई में अपील की जगह कहां है? उनको तो जिन मुद्दों को लेकर सरकार से अपील करनी थी या जिन मुद्दों को लेकर जनप्रतिनिधि बनने के लिए जनता से वोटों की अपील करनी थी उन मुद्दों पर तो उन्होंने थोक में हत्याएं करने का तरीका अपनाया हुआ है। उनको किसी से अपील करने का, और आगे अपील बढ़ाने की अपील का क्या हक है? जिनका भरोसा जंगलों में अलोकतांत्रिक अदालतें लगाकर लोगों को कुसूरवार ठहराकर काट डालने का है। उनकी शब्दावली में अपील शब्द कहां से आ गया? लड़ाई तो एक ही किस्म के हथियार से हो सकती है या तो जमीनों के नीचे बारूदी सुरंगें लगाकर एक-एक धमाके में दर्जनों लोगों को एक मुश्त मारा जा सकता है या फिर लोकतांत्रिक अपील की जा सकती है। अब अगर अपील भी नक्सली ही करेंगे तो लोकतांत्रिक जनता क्या करेगी?
हमने ऊपर जिस लड़ाई का जिक्र किया है वह लड़ाई भी लड़ाई न होकर लोकतंत्र पर एक हमला है। लड़ाई तो किसी दुश्मन से हो सकती है या किसी बुराई से। आज इस देश में शासन के लिए जो लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनी तमाम कमजोरियों के बावजूद सबसे बेहतर है उस व्यवस्था पर लगातार हमला कोई लड़ाई नहीं है, वह शांत जनता के हक पर हमला है। आज नक्सली बस्तर की जिस शोषित और पीडि़त जनता के हक को लेकर लडऩे की बात कहते हैं क्या उसे उसके हक इस लड़ाई के सौ बरस तक जारी रहने पर भी मिल पाएंगे? क्या सिर्फ खूनखराबे में लगे नक्सलियों के लाए कोई ऐसी जागरूकता इन आदिवासियों में आ सकती है जिससे वे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने हक बेहतर तरीके से पा सकें। छत्तीसगढ़ बनने के बाद से इस लड़ाई को अधिक करीब से देखने का मौका मिला, इसलिए भी कि ये हमले तेज हुए और इसलिए भी कि सरकार रायपुर में रहकर इनसे निबटने के लिए तैयारी करते दिखी। भोपाल में बैठी सरकार की प्राथमिकता में तो नक्सली हिंसा को खत्म करना था भी नहीं।
नक्सलियों की बातों को लगातार सुनकर विस्तार से पढ़कर और उसे पाठकों के सामने रखकर जो विचार-विमर्श हमने पिछले एक बरस में छेड़ा उसके अंत में खुद हमें जो एहसास हुआ है वह यह है कि नक्सली दोनों हाथों में लड्डïू चाहते हैं। एक तरफ वे लोकतंत्र की पूरी इमारत को गिराना उसी तरह चाहते हैं जिस तरह तालिबानों ने अफगानिस्तान में बुद्घ की प्रतिमाएं गिराईं। दूसरी तरफ वे लोकतंत्र के तमाम औजारों का इस्तेमाल अपने बचाव और वैचारिक युद्घ में करना चाहते हैं। मुझे इस बात पर हैरानी होती है कि गुड्सा उसेंडी छत्तीसगढ़ सरकार को यह उलाहना देते हैं कि उसे सर्वोच्च अदालत की फटकार की कोई फिक्र नहीं है और केंद्रीय जांच दल के आने और जाने से भी उसके जुल्मी अभियान पर कोई फर्क नहीं पडऩे वाला। इन्हीं तमाम संस्थाओं के खिलाफ तो नक्सली पूरे हमले कर रहे हैं। जिनका पूरा काम थोक में हत्याओं के बिना न चलता हो उन्हें अदालत के जिक्र का क्या हक है? उनके पास तो बंदूकों के बल पर जंगल में अपनी खुद की अदालतें हैं, जहां वे ही जांच अधिकारी भी हैं, वे ही गवाह और जज भी हैं और वे ही जल्लाद भी हैं।
सलवा जुडूम जैसे आंदोलन से किस तरह बस्तर के बेकसूर आदिवासियों पर अमानवीय जुल्म हो रहा है इस मुद्दे को उठाने का हक देश के लोकतांत्रिक लोगों को तो है लेकिन नक्सलियों को इस बात की परवाह क्यों होनी चाहिए कि किसी के साथ अलोकतांत्रिक और अमानवीय जुल्म हो रहा है। वे खुद भी तो केवल यही काम कर रहे हैं। सलवा जुडूम के आंदोलनकारियों या बस्तर के चर्चित एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) जो हिंसा करते हैं उसकी तो एक-एक घटना पर दर्जनों बयान गैर हथियारबंद लोगों से आ जाते हैं लेकिन इन बयानों में नक्सलियों के बयान की कोई जगह कैसे हो सकती है? एक हत्यारा किसी दूसरे हत्यारे पर ऊंगली किस तरह उठा सकता है? और इस देश में चाहे किसी भी किस्म की विचारधारा हो, चाहे किसी भी किस्म का लक्ष्य हो, उसका झंडा उठाए लोगों को क्या हक है कि वे हत्या करें?
नक्सलियों ने बस्तर में अपनी हलचल की शुरूआत में आदिवासियों के शोषण और उन पर अत्याचार के मुद्दे सामने रखें और सरकार-जनता का ध्यान खींचा लेकिन जब इन मुद्दों पर पर्याप्त स्याही मिल चुकी थी तब वहां की हिंसा ने वहां पर शोषण और अत्याचार को सिर्फ बढ़ाने का काम किया है। बस्तर के शोषण को सामने रखने में नक्सलियों की भूमिका हत्याएं शुरू होने के पहले ही खत्म हो चुकी थी। लोकतंत्र में ऐसा कोई मुद्दा नहीं हो सकता जिसे लेकर लड़ाई लड़ते हुए लोकतंत्र को ही खत्म करने पर कोई उतारू हो जाए। इस बात को अगर हम एक तस्वीर के रूप में सझमने की कोशिश करें तो यह उसी किस्म की होगी जैसे किसी गर्भ में पलता हुआ बच्चा उस मां को ही पूरा खा जाए। जिन नक्सलियों को यह लोकतंत्र बर्दाश्त कर रहा है, जिन पर देश की पूरी बंदूकें कहर बनकर टूट नहीं रही हैं वे नक्सली एक-एक बार में दर्जनों हत्याएं करते हुए लोकतंत्र से सवाल भी पूछ रहे हैं!
इस विसंगति को ठीक से समझना होगा। बस्तर में नक्सली हिंसा को देख-देखकर मैंने अपने लिखे में इसके लिए किसी भी तरह के 'वादÓ का इस्तेमाल बंद कर दिया है। जहां एक इंसान दूसरे इंसान को अपने विवेक से मार डालता है वहां वाद जैसे किसी हल्के शब्द के इस्तेमाल की जरूरत भी क्या है? मैंने नक्सलियों को अपने तर्क और अपनी बातें सामने रखने का पर्याप्त मौका दिया। उनकी बातों को आगे भी बढ़ाया और दूसरे कई पक्षों को उस बहस से जोड़ा भी। लेकिन एक तरफ जहां नेपाल में वहां के माओवादी चुनाव की मूलधारा में आकर आज देश के शासन तक पहुंचे हैं और अब वे इस स्थिति में हैं कि जनकल्याण की अपनी सोच को लागू कर सकें। वहीं दूसरी तरफ बस्तर के जिन नक्सलियों को मैं करीब से देख रहा हूं वे इस लोकतंत्र को ही ढहा देने में लगे हैं। और इस राह को वे बेकसूर लोगों की लाशों से गड्ढïे पाट-पाटकर बना रहे हैं। मेरे मन का सवाल आज यही है कि ऐसे लोगों को लोकतांत्रिक समाज से किसी भी तरह की अपील करने का क्या हक है? उन्होंने अपने-आपको यह हक तो दे ही रखा है कि वे खुद जब चाहें जिसके लहू से चाहें जैसे चाहें वैसे नारे लिख सकें। उन्हें अपील की जरूरत भी क्यों हो रही है?
-सुनील कुमार
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