असहमत

8 जून 08

खबर कुछ भयानक है। सुप्रीम कोर्ट ने जब इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक वकील की तस्वीर देखी जो कोर्ट के आदेश पर हथकडिय़ों से बांधकर रखा गया था तो कोर्ट हक्का-बक्का रह गया। अदालत की अवमानना के मामले में वहां के दो जजों ने इस वकील को गिरफ्तार करने के आदेश दिए थे और ऐसा कहा जा रहा है कि अदालत ने ही उसे हथकडिय़ों से बांधकर रखने को कहा था और उसी तरह उसे अदालत में पेश करने को कहा था। हालांकि उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए सरकारी वकील ने कहा कि जजों ने हथकड़ी लगाने का आदेश नहीं दिया था। उसने यह भी कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जजों की भूमिका की जांच के लिए एक न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं।
मृत वकील के मामले को यहां उठाने वाले एक दूसरे वकील अलतमस रेन ने कहा कि एडव्होकेट श्रीकांत अवस्थी इस अपमान से सदमे में थे कि उन्हें हर रोज अदालत में हथकडिय़ों में पेश किया जा रहा था। इसके बाद वे बीमार हो गए और वे कुछ भी खाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि जब जेल और पुलिस अधिकारियों ने जजों को बताया कि वकील ने खाना बंद कर दिया है तो इन जजों में से एक ने बहुत ही अहंकारी ढंग से कहा - 'क्या आप लोगों को मालूम नहीं है कि ऐसे व्यक्ति को कैसे खिलाया जाता है?Ó
अलतमस रेन ने सुप्रीम कोर्ट को आगे बताया कि जब अधिकारियों ने हाई कोर्ट जजों को दुबारा बताया कि वकील अब भी कुछ भी नहीं खा रहा है तो एक जज, जस्टिस चौहान, ने कहा- 'उसे मर जाने दोÓ।
इसके बाद श्रीकांत अवस्थी को इलाहाबाद के एक अस्पताल में भर्ती किया गया जहां पलंग से बेडिय़ों से बांधकर रखा गया।
अलतमस रेन ने सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाया कि 1988 में तीस हजार कोर्ट के एक वकील के प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्देश और नियम तैयार करवाए थे कि जब तक कोई व्यक्ति खूंखार अपराधी न हो या उसका व्यवहार हिंसक न हो या वह कानून तोड़ न रहा हो, उसे हथकड़ी न लगाई जाए।
यह पूरा मामला हाई कोर्ट के जजों के उस अहंकार और तानाशाही का है जो धीरे-धीरे देश की बहुत सी अदालतों के बहुत से जजों में आमतौर पर देखने मिलते हैं। भारत की न्याय व्यवस्था में यह एक बहुत अलोकतांत्रिक बात है कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में एक बार जज बन जाने के बाद उस व्यक्ति को हटाने के लिए महाभियोग के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता। इससे जजों की मनमानी भी चलते रहती है और उस पर कोई कार्रवाई भी आमतौर पर बड़ी अदालत नहीं कर पाती।
हमारा यह स्पष्टï मानना है कि किसी भी अदालत में जज द्वारा कहे जाने वाले एक-एक शब्द को दर्ज करना चाहिए। अदालतों में पहुंचने वाले लोगों का यह अनुभव है कि आमतौर पर जज वहां मौजूद लोगों के लिए बहुत ही अहंकारी और अपमानजनक व्यवहार रखते हैं। वे ऐसी बहुत सी बातें कहते हैं जिन्हें आदेश में नहीं लिखा जाता और अगर कोई व्यक्ति किसी जज के व्यवहार के खिलाफ ऊपर जाना भी चाहे तो चूंकि जुबानी बातों का कोई रिकॉर्ड अदालत नहीं रखती इसलिए ऊपरी अदालत में जाकर इंसाफ पाना नामुमकिन होता है। जब संसद और विधानसभा में कहे गए एक-एक शब्द को दर्ज किया जाता है तब अदालतों को अपनी कही बातों की रिकॉर्डिंग में कोई दिक्कत क्यों होनी चाहिए? अधिक अच्छा तो यह होगा कि जिस तरह संसद की कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग होती है और उसका प्रसारण होता है उसी तरह बड़ी अदालतों की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग तो होनी ही चाहिए और उसकी कॉपी हासिल करना आसान बनाना चाहिए। ऐसे में अदालती कार्रवाई के दौरान जजों की मनमानी, उनकी पसंद-नापसंद और उनका पूर्वाग्रह दर्ज हो सकेगा।
यह मामला तो चूंकि एक हाई कोर्ट वकील का था और जिस कू्रर अंदाज में अपमान करके उसे मारा गया, उसकी तस्वीरें मौजूद हैं इसलिए सुप्रीम कोर्ट के हक्का-बक्का रहने और सदमे में आने की नौबत आई। लेकिन ऐसे कितने लोग हैं जिनकी ताकत या जिनकी पहुंच हाई कोर्ट के एक वकील जितनी हो? देश में आबादी का एक फीसदी हिस्सा भी इतनी ताकत नहीं रखता। जब अदालत के पेशे से जुड़े एक व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है और उसकी ऐसी मौत हो सकती है तो बाकी लोग क्या उम्मीद कर सकते हैं?
देश में न्यायिक सुधार और अदालतों की पारदर्शिता को लेकर जो आंदोलन चल रहा है वह लगातार अवमानना के कानून को खत्म करने की बात करता है। इस आंदोलन के परे भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो अवमानना के कानून को अलोकतांत्रिक मानते हैं। अदालतों ने अपने-आपको अवमानना के एक निहायत ही गैरजरूरी घेरे में छुपा रखा है। लोकतंत्र में इस तरह के विशेषाधिकार ठीक नहीं है। लेकिन खराब स्थिति यह है कि  सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा मुख्यन्यायाधीश भी इस अलोकतांत्रिक सुरक्षा कवच के पक्ष में हैं। यह मामला एक बार फिर हमें एक बहस के लिए पर्याप्त लगता है जो जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट जजों के खिलाफ दायर की गई है उस पर फैसले से देश की न्यायापालिका का व्यवहार तय होगा। अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट के जजों को बचाते दिखेगा तो इस बात को जनता समझ भी लेगी। अदालतों की मनमानी को खत्म करके एक पारदर्शी व्यवस्था लागू करनी चाहिए।

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