धंधे और पापी पेट की बातें

20 अपै्रल 08
एक वक्त बहुत अच्छे पत्रकार रहे एम.जे. अकबर काम के हर दिन की तरह घर से दफ्तर जा रहे थे कि किसी ने उन्हें फोन पर बताया कि उस सुबह के उनके अखबारों 'द एशियन एजÓ और 'द डेक्कन क्रॉनिकलÓ में प्रधान संपादक के रूप में उनका नाम हट गया है और किसी और का नाम छपा है।
'द एशियन एजÓ करीब पन्द्रह बरस पहले अकबर ने शुरू किया था और कम छपने के बाद भी इसकी चर्चा अधिक होती थी। भारत के महानगरों के अलावा लंदन से भी यह अखबार निकलता था और ऐसा यह पहला भारतीय अखबार था। इस अखबार की कंपनी शुरू करने वालों में अकबर मुखिया थे, लेकिन फिर दूसरे लोगों के शेयर उसमें बढ़ते गए और अकबर का मालिकाना काबू खत्म हो गया। आखिर में दक्षिण के अखबार 'द डेक्कन क्रॉनिकलÓ के मालिक के शेयर इसमें बढ़ गए, और एक रात जब अखबारनवीस काम निपटाकर चले गए, मैनेजमेंट ने अकबर का नाम हटा दिया और नए प्रधान संपादक का नाम डाल दिया। अपनी बनाई विशाल इमारत से अकबर का बोरिया बिस्तर मानो आधी रात फुटपाथ पर फेंक दिया गया।
धंधे के तौर- तरीके ऐसे ही बेरहम होते हैं और मालिक धंधों के तौर- तरीकों से परे भी जाकर नौकरों से बर्ताव करते हैं। खेल के कोर्ट में इस ओर से खेलते या उस ओर से खेलते, या फिर दर्शक दीर्घा में बैठे, हम सभी कभी न कभी ऐसे दौर से गुजरते हैं। इसलिए मालिक या नौकर के रिश्तों को लेकर लिखना  आज का मकसद नहीं है। आज का मुद्दा अकबर और उनकी अखबार नवीसी है जो इमरजेंसी के पहले शुरू हुई और आगे एक नई पत्रिका के रूप में घोषित हो चुकी है।
कोलकाता की अंगे्रजी साप्ताहिक पत्रिका 'संडेÓ फिर वहीं से साथ-साथ अंगे्रजी दैनिक 'टेलीग्राफÓ से अकबर ने जो पहचान बनाई, वह उनके राजनीति में जाने के बाद भी चलती रही। वे कांगे्रस के टिकट पर चुनाव लड़े और जाहिर है कि लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए इतना काबिल उम्मीदवार मुस्लिमों में कांगे्रस को और कौन मिल सकता था? फिर वे कांगे्रस के प्रवक्ता बने और राजनीति से पूरी तरह बाहर हुए बिना ही उन्होंने एक कंपनी बनाकर 'द एशियन एजÓ नाम का अखबार शुरू किया। इस दौरान वे अखबारों में कॉलम लिखते रहे, किताबें लिखते रहे और उनको अच्छे दर्जे का पत्रकार माना गया।
लोग किसी राजनीति में गले-गले तक डूबे इंसान को भी पत्रकार मान लेने की गलती करते हैं। अकबर का एक लेखक होने का हक तो नहीं छिनता लेकिन पत्रकार कहलाने का हक वे उसी दिन खो देते हैं। जिस दिन वे राजनीति में जाते हैं। अकबर के अलावा एक-दो ऐसे और भी पत्रकार रहे जो राजनीति में पूरी तरह जाकर भी पत्रकार बने रहने का संघर्ष करते रहे और यह महीन फर्क न कर पाने वाले लोग उन्हें अखबारनवीस मानते भी रहे। कांगे्रस की राजनीति में दलाल की हैसियत से अबरपति बने ऐसे एक पत्रकार बने हुए व्यक्ति का कॉलम छापने के बारे में एक अखबार ने मुझसे सलाह ली थी तो बरसों पहले मेरी राय थी कि इससे बेहतर तो हर्षद मेहता का कॉलम छापना चाहिए। राजनीति में रहते हुए जो लोग अपने अखबारनवीस भी होने की खुशफहमी पाले रखते हैं और पाठकों को गलतफहमी में रखते हैं, उनके हौसले की मैं तारीफ ही करता हूँ। वे सातवें बच्चे को जन्म देते हुए कौमार्य का दावा करने वाली महिला की तरह के होते हैं, क्लोनिंग के पहले के दिनों में। ऐसे लोग भीगे बिना गंगा में डुबकी लगाना चाहते हैं।
कल का भाजपा-विरोधी अकबर आज भाजपा की ओर से राज्यसभा में जाने की तैयारी में है। एकतरफ यह राजनीतिक धर्मांतरण, दूसरे तरफ बड़े मालिकों का कांगे्रस-पे्रम। ऐसे में संपादक की ही कुर्सी जानी थी, मालिक तो मालिक होता है।
अकबर के निकाले जाने पर मैं नहीं लिखता अगर उनके इस वक्त आंसू बहाने वाले खुशवंत सिंह जैसों को लबालब आंखों से उनकी राजनीति दिखना बंद न हो गया होता। अकबर की बर्खास्तगी के मौके पर अपनी बर्खास्तगी की चर्चा करने वाले खुशवंत ने न तो अकबर की सक्रिय राजनीति की चर्चा की, न अपने संजय-मेनका गांधी प्रेम की बात की। मालिक किस तरह संपादक को निकाल फेंकता है इस पर खुशवंत ने अंगे्रजी के वयस्क जुमलों में लिखा।
लेकिन अखबार के धंधे को हर तरफ से देखने के बाद भी मैं वही बात फिर लिखूंगा जो सिर्फ एक नौकरीपेशा की हैसियत से लिखी थी- राजनीति, राज्याश्रय और अखबारनवीसी साथ-साथ नहीं चल सकते। अखबार के धंधे की जरूरतें अलग हैं और राजनीति की अलग। चुनाव तो राजनीति की जरूरतों को हिंसक और भ्रष्टï गहराइयों तक ले जाता है और राज्याश्रय कमर के पीछे, नीचे, एक दुम लगा देता है जिसमें लगा काउंटर अगली मेहरबानी का हक साबित करता है। मैं राजनीति, चुनाव या राज्याश्रय को बुरा नहीं मानता। समाज में सभी किस्म के मिजाज के लोग होते हैं, कुछ को सत्ता का मोह होता है, कुछ को बुलफाइट की तरह चुनाव सुहाता है और कुछ को ठकुर सुहाती के जरिए राज्याश्रय सुहाती है। कुछ को खुरदरी और खरी-खरी अखबारनवीसी सुहाती है। लेकिन मेरा यह मानना है कि जो काम करें, बिना मुखौटे असली करें। घी की मिठाई के नाम पर चर्बी में पकाकर बेचना गलत है लेकिन मांसाहार की तख्ती लगाकर चर्बी में पकाने में कोई बुराई नहीं है।
अखबारनवीसी एक अलग पेशा है। न साध्वियों की वेश्यावृत्ति चल सकती, न वेश्याओं का भगवा चोला चल सकता। राजनीति और अखबारनवीसी बिल्कुल अलग मिजाज के धंधे हैं। अकबर की बर्खास्तगी पर श्रद्घांजलि लेखने करने वाले इस पहलू को अनदेखा न करें। हम अपने आसपास भी बहुत से ऐसे लोग देखते हैं जिनकी अखबारी हैसियत उनको खुद नाकाफी लगती है और जो पूरी जिंदगी राज्यसभा जाने की फिराक में गंवा देते हैं या लगा देते हैं। पत्रकारिता से राजनीति में जाने में कोई बुराई नहीं है लेकिन वहां जाकर भी पत्रकार बने रहने का मोह न छोडऩा गलत है।
जो लोग राजनेता-पत्रकारों के टू इन वन रोल का नुकसान नहीं समझते, वे ऐसी ही अखबारनवीसी को पढऩे के लायक हैं।
एमजे अकबर का निकाला जाना संपादक की बर्खास्तगी नहीं है। कांगे्रस समर्थक मेजॉरिटी शेयर होल्डर ने, भाजपा समर्थक हो गए माइनॉरिटी शेयर होल्डर को कंपनी के एक पद से हटा दिया है। यह कांगे्रस के राज में धंधे की बात है, इसका पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं है, जैसे कि भाजपा के समर्थन के आधार की राज्यसभा में जाने की कोशिश का पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं है।
- सुनील कुमार

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