अच्छे इंसान के बुरे पहलू और बुरे इंसान के अच्छे

25 मई 08
इन दिनों छत्तीसगढ़ को लेकर दुनिया में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों को जो पढऩे मिलता है उसमें नब्बे फीसदी हिस्सा डॉ. बिनायक सेन के बारे में है। पीयूसीएल नामक मानवाधिकार संगठन के एक पुराने और वरिष्ठï पदाधिकारी डॉ. सेन को नक्सलियों का साथ देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और राजद्रोह के कानून के तहत उन पर मुकदमा चल रहा है। इसे लेकर पूरी दुनिया में बिखरे मानवाधिकार कार्यकर्ता आवाज उठा रहे हैं और भारत में भी मीडिया का एक हिस्सा उनकी रिहाई के लिए बहुत मुखर है। देश के जिस विख्यात, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेलोर से बिनायक ने डॉक्टरी की थी, गोल्ड मैडल पाया था, वहां के उनके साथी भी उनकी रिहाई के लिए अभियान चला रहे हैं, और शंकर गुहा नियोगी की हत्या के बाद यह पहला मौका है कि छत्तीसगढ़ के किसी मुद्दे पर देश के सामाजिक कार्यकर्ताओं का इतना बड़ा तबका बार-बार बैनर लिए सड़कों पर आता है। छत्तीसगढ़ में इसी संगठन के एक और सक्रिय कार्यकर्ता और फिल्मकार अजय टी.जी. को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है, नक्सलियों से किसी लेन-देन की एक चि_ïी को लेकर। यूं तो कुछ और गिरफ्तारियां भी हुई हैं जिनमें से एक प्रफुल्ल झा का नाम है जिसे पुलिस ने नक्सलियों के साथ तनख्वाह पर काम करने के आरोप में पकड़ा है, उनके खिलाफ मामला ऐसा गंभीर है कि पीयूसीएल ने भी उनके मामले में दखल नहीं दिया, न बयान दिया, न वकील लगाया।
इन तीनों लोगों से मेरा कम या अधिक परिचय रहा है चूंकि मेरी पूरी जिंदगी यहीं गुजरी है और आधी से अधिक अखबारनवीसी करते हुए।
धंधे के सिलसिले में सभी किस्म के लोगों से बात-मुलाकात होती है। इनकी गिरफ्तारियों के बाद बाहर से आने वाले पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से बातचीत भी हुई और बहस भी। छत्तीसगढ़ में बसे लोग भी इन मामलों की असलियत पर कभी-कभी मुझसे चर्चा करते हैं और कोई जानना चाहता है, कोई बताना चाहता है।
इन तमाम बातों को मैं आज की आगे की चर्चा के लिए सिर्फ एक प्रसंग की तरह इस्तेमाल कर रहा हूँ। आगे की बात का इन लोगों से व्यक्तियों के रूप में कोई लेना-देना नहीं है।
किसी इंसान का कुल काम-काज उसके अच्छे या बुरे काम में कितना आड़े आता है? मेरे एक परिचित डॉक्टर है जिनका रोज का कुछ वक्त जमीन-जायदाद के धंधों में लगता है। हो सकता है कि बाकी वक्त वे डॉक्टरी की अपनी जरूरत की पढ़ाई भी करते हों, हो सकता है कि उनकी डॉक्टरी की काबिलीयत पर आंच न आती हो, लेकिन मैं जब उनके बारे में सोचता हूँ, मुझे वे डॉक्टर कम, जमीनों के सौदागर अधिक लगते हैं।
शहर में एक वकील हैं, बहुत सज्जन हैं, खासा वक्त वे समाजसेवा के काम में लगाते हैं, अपनी खरी कमाई से वे तरह-तरह की मदद करते हैं। लोग उन्हें बहुत अच्छा वकील कहते हैं। लेकिन मैं कई बार यह सोचता हूं कि क्या सज्जनता किसी को उसके पेशे में अधिक हुनरमंद बना सकती है? या फिर इन दोनों बातों का आपस में कोई रिश्ता नहीं होता? क्या चाल-चलन को तौलकर हुनर से काम लिया जाए, या दुर्जन से भी काम लेना ठीक है?
जहां तक जनता का नजरिया होता है, वह बहुत महीन नश्तर से चीरकर चीजों को अलग नहीं करती। इतनी बारीकी का वक्त ही कहां रहता है जिंदगी की रोजमर्रा की लड़ाई में? लोग हुनर और चाल-चलन को मिला देते हैं। लोग बुजुर्ग पत्रकार और वरिष्ठï पत्रकार को एक ही मान लेते हैं। हर बुजुर्ग पत्रकार को वरिष्ठï पत्रकार कहकर पेश किया जाता है, फिर चाहे उसकी पत्रकारिता में परिपक्वता की, हुनर की, वरिष्ठïता जरा भी न हो। लोग अच्छी भाषा को अच्छी पत्रकारिता मान लेते हैं, अच्छे पत्रकार को अच्छा साहित्यकार मान लेते हैं, जबकि इन सबमें खासा फर्क होता है।
मैंने जिंदगी की महीन परतों को खुर्दबीनी निगाह से देखने की बुरी आदत डाल ली है। मैं एक भ्रष्टï को अच्छा लेखक होने पर या अच्छा संगीतकार होने पर गैर भ्रष्टï नहीं मान पाता। उसकी कला मेरे लिए अलग होती है और उसका बुरा काम अलग होता है। ऐसी आदत के चलते मैं जब किसी बुजुर्ग साहित्यकार को बेहतर साहित्यकार मानने से इंकार कर देता हूं तो बुरा बनता हंू। इसी तरह साहित्य या कला की बहुत लंबी सेवा को जब मैं महत्वपूर्ण सेवा नहीं मानता या उत्कृष्टïता नहीं मानता तो भी लोगों को वह मेरी खामी लगती है। मेरा मानना है कि खूबियों और खामियों को बारीकी से अलग-अलग करके देखना चाहिए।
यहां पर मैं एक बार फिर उस उदाहरण पर लौटना चाहता हूं जहां से मैंने बात शुरू की है। लेकिन मैं उसे केवल बात को समझाने के लिए इस्तेमाल कर रहा हूं न कि उस मामले पर टिप्पणी करने के लिए। डॉ. बिनायक सेन एक प्रतिभाशाली मेडिकल छात्र, एक समर्पित चिकित्सक और एक जुझारू मानवाधिकार आंदोलनकारी हो सकते हैं, लेकिन इन खूबियों के चलते मैं ऐसी किसी संभावना या आशंका से इंकार नहीं कर सकता कि अपने संपर्क में आने वाले नक्सलियों की उन्होंने सैद्घांतिक सहमति या किसी गलतफहमी में कभी कोई मदद की हो। मैं उनकी तमाम खूबियों को मिलाकर भी उनकी खामियों या किसी एक खामी की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं करता।
अपनी इसी महीनमिजाजी के कारण मैं अपने बहुत से सामाजिक कार्यकर्ता मित्रों की नाराजगी भी झेलता हूं कि एक इतने अच्छे व्यक्ति के बारे में मैं बिना आशंका क्यों नहीं रहता। बाहर से आने वाले बहुत से पत्रकार भी जब मुझसे बातचीत के दौरान एक किस्म का अनौपचारिक प्रमाणपत्र सा चाहते हैं कि बिनायक बेकसूर हैं तो मैं ऐसी कामना करते हुए भी ऐसा जुबानी सर्टिफिकेट देने से इंकार कर देता हूं और उन्हें निराश करने का खतरा उठाता हूं। आज इन मामलों से परे दर्जनों ऐसे मामले रोज खबरों में रहते हैं जिनमें किसी व्यक्ति के पक्ष में या उसके खिलाफ एक पूर्वाग्रह बहुत बड़ी भूमिका अदा करता है। कुछ लोग इसे बद अच्छा बदनाम बुरा जैसी कहावत से जोड़ते हैं तो कुछ लोग इसे जन नजरिया कहते हैं। किसी की छवि बनना और बिगडऩा जैसी बात भी ऐसे ही संदर्भ में होती है। लेकिन मुझे लगता है कि न्यायप्रिय होने के लिए हमें इतना तर्कप्रिय तो होना चाहिए कि किसी व्यक्ति के जीवन और व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को हम जरूरत पडऩे पर अलग-अलग भी देख सकें। बहुत अच्छे मानवीय मूल्यों वाले किसी वकील का वकालत का हुनर भी उतना ही अच्छा हो ऐसा जरूरी तो नहीं।
-सुनील कुमार

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