बिना खाल ओढ़ा भेडिय़ा बेहतर

18 मई 08
एक पाठक ने चि_ïी भेजी है कि संपादक अपने पाठकों को जो पढ़ाना चाहता है और पाठक जो पढऩा चाहता है उसके बीच संतुलन कैसे स्थापित होता है। यह सवाल एक नजरिए से बड़ा आसान है और दूसरे नजरिए से बड़ा मुश्किल भी। इस मुद्दे पर कई अलग-अलग तरह से देखा जा सकता है और देखा जाना चाहिए। किसी पत्र या पत्रिका के मालिक और मैनेजर का पाठक की जरूरत और अपनी जिम्मेदारी को तौलने का एक बिलकुल ही अलग पैमाना रहता है। दूसरी तरफ संपादक, अगर वह महज पत्रकार-संपादक है तो उसका सोचने का पैमाना बिलकुल अलग होता है।  मीटर और फुट की इन दो स्केलों के बीच एक तीसरी स्केल उस मालिक की होती है जो संपादक होता है, या उस संपादक की होती है जो मालिक होता है। मतलब यह कि यह तीसरा तबका उन लोगों का है जिनके हित प्रकाशन के व्यापार से जुड़े हुए हैं लेकिन जिनकी दखल संपादकीय मामलों में भी होती है।
लेकिन यह बात लिखते-लिखते ही मुझे यह लगता है कि क्या कोई तबका आज के प्रमुख, सफल, व्यापाक प्रचार-प्रसार वाले अखबारों में इस तीसरे तबके से अलग के भी हो सकते हैं? आज तो पूरा मीडिया मैनेजरों द्वारा नियंत्रित व्यापार रह गया है, बिना किसी अधिक सरोकार के और बिना किसी अतिरिक्त सम्मान के हक के। ऐसे में 'संपादकÓ क्या पढ़ाना चाहता है और पाठक क्या पढऩा चाहता है यह मामला थोड़ा मुश्किल है।
पाठकों की नजर से देखें तो उसका पढऩा धीरे-धीरे कम होते चल रहा है। अब वह उसी किस्म की सरसरी निगाह से किसी अखबार को देखता है जैसे वह टेलीविजन के चैनल बदलता है या अपने फोन पर अपने एसएमएस देखता है। लेकिन इसका कोई साफ जवाब अभी मेरे पास नहीं है कि पढऩा कम क्यों हुआ? क्या मीडिया घटिया होते चले गया है कि उसमें पाठक को बांधकर रखने की ताकत नहीं है? या पाठक इतना गैरजिम्मेदार हो गया है कि बिना चाट-मसाले के मीडिया द्वारा परोसे गए विचारोत्तेजक सरोकारों में उसकी दिलचस्पी नहीं रह गई है? या मीडिया की बुनियादी बातें अब धीरे-धीरे हवा हो गई हैं और अब इतने अधकचरे स्तर का काम इतनी बाजारू बदनीयत के साथ परोसा जाने लगा है कि पाठक को वह सरसरी नजर से अधिक के लायक नहीं लगता?
बात के यहां तक पहुंचते हुए मुझे लगता है कि आज भी अच्छे लिखे हुए को पढऩे वालों की कमी नहीं है, यह एक और बात है कि गेहूं के जवारे का रस पीने वाले लोग हमेशा ही कोकाकोला जैसी चीजें पीने वाले लोगों से कम ही रहेंगे। लेकिन सेहत के लिए बेहतर चीज का कम इस्तेमाल और नुकसानदेह सामान का अधिक इस्तेमाल केवल मीडिया और उसके ग्राहकों के बीच की दिक्कत नहीं है। यह तो फल खाने के बजाय गुटखा-पानमसाला खाने, सिगरेट पीने वालों की बहुत अधिक संख्या जैसा मामला है। लेकिन मीडिया के बारे में यह सवाल सिगरेट-शराब जैसे उद्योगों के मुकाबले कुछ अधिक मायने रखता है। मीडिया से लोग कुछ अधिक जिम्मेदारी की उम्मीद करते हैं और मीडिया भी, कम से कम उसका एक तबका, एक बड़ा तबका, सरोकारों की खाल ओढ़े भी रहता है।
मैंने कुछ बरस पहले ब्रिटेन के एक बहुत प्रतिष्ठिïत अखबार समूह 'गार्डियनÓ के सामाजिक ऑडिट के बारे में लिखा था। वह ऑडिट रिपोर्ट मेरे लिए एक अद्भुत दस्तावेज था जो बताता था कि एक प्रकाशन व्यापार अपने-आपको किस तरह पारदर्शी और जन-जवाबदेह बना सकता है। उसमें सालभर इस प्रकाशन समूह के अखबारों में छपी सामग्री, उसके मुद्दे और उसके नफा-नुकसान के बारे में तमाम जानकारियां दी गईं थीं। 'गार्डियनÓ की जैसी साख है उससे उसकी कम प्रसार संख्या की बात महत्वहीन हो जाती है। कम बिकने पर भी उसके लिखे का वजन दूसरी रद्दियों के मुकाबले बहुत अधिक होता है। यह हाल दुनिया के और देशों में भी है कि सबसे अधिक प्रसार और सबसे अधिक असर ये दो पहलू कई बार अलग-अलग भी चलते हैं।
लेकिन मीडिया के साथ मजे की एक बात यह है कि उसके प्रवचन और उसके आचरण में एकरूपता होने की कोई जरूरत नहीं समझी जाती। मन, वचन और कर्म में समानता होने का एक फलसफा पुराने वक्त से चले आ रहा है। मन तो किसी का भांपना लगभग असंभव होता है लेकिन वचन और कर्म तो आसानी से दिख जाते हैं। जिस तरह नेताओं के वचन इन दिनों टेप पर रहते हैं उसी तरह मीडिया के वचन छपे हुए शब्दों में रहते हैं। वचन यानी विचार की बात में मैं गैर छपे मीडिया को फिलहाल शामिल नहीं कर रहा हूं क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपने खुद के वचन तो मुझे कहीं दिखते नहीं और इंटरनेट के मीडिया में भी मुझे संपादक या प्रकाशक की अपनी लिखी बातें उस तरह से नहीं दिखती जिस तरह से छपे मीडिया में परंपरा चली आ रही है। मीडिया के धंधे में कथनी और करनी के बीच खाई सा फासला दिखता है और मजा यह है कि बहुत से दूसरे धंधों पर दिन-रात टिप्पणी करने वाले इस धंधे के अपने आचरण के बारे में कोई बात भी नहीं होती। नतीजा यह है कि वह पाठकों को क्या पढ़ाना चाहता है और पाठक की दिल-दिमाग की सेहत के लिए क्या जरूरी या बेहतर है इसके बारे में कोई सामाजिक ऑडिट नहीं होती। एक धंधे के रूप में शराब की कई किस्में बनाने वाले सिगरेट के कई ब्रांड बनाने वाले या नुकसानदेह खाना परोसने वाले कई ब्रांडों की तरह मीडिया भी कई शक्लों में बाजार में है और किसी भी दूसरे व्यापार की तरह यह उसका हक भी है कि वह अधिक से अधिक गलाकाट मुकाबला करके धंधे में आगे बढ़े। दिक्कत केवल यही है कि जो लोग मीडिया के लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने के झांसे में आ जाते हैं और जो इसे एक मिशन समझ बैठते हैं वे इस धंधे से कई तरह की उम्मीदें करने लगते हैं। उन्हीं के मन में कई तरह के सैद्घांतिक सवाल उठते हैं। वरना तेज-चटपटे गुपचुप बेचने वाले के बारे में अगर यह पता लगता है कि वह खटास बढ़ाने के लिए इमली के अलावा एक तेजाब भी मिलाता है तो भी मन में कोई सैद्घांतिक सवाल नहीं उठते।
लेकिन जिस सवाल से बात शुरू हुई थी उस पर आखिरी में लौट चलना ठीक है। एक व्यापारी तय करता है कि उसे नारियल बेचना है, दूसरा तय करता है कि वह साइकिल बेचेगा। इसी तरह मीडिया है, उसे भी यह तय करना चाहिए कि वह विविध भारती जैसा एक फरमाईशी कार्यक्रम बजा रहा है या फिर बीबीसी की तरह अपनी पसंद का कार्यक्रम। आज मीडिया के व्यापारी इन दोनों नावों पर पैर रखने के दिखावे में डूबे रहते हैं और असल में वे इन दोनों में से किसी पर नहीं टिके रहते। अधिकांश मीडिया आज वह पढ़ाने में जान लगा दे रहा है जो विज्ञापनदाता अपने पाठकों को पढ़ाना चाहता है। या वह नहीं पढ़ा रहा है जो सत्ता अपने पाठकों को नहीं  पढऩे देना चाहती। इन दोनों नीयतों के बीच बची जगह पर कहीं सरोकारों के नाम पर एक पाखंड चल रहा है तो कहीं सरोकारों को दिखाकर उगाही चल रही है।
मेरा यह साफ मानना है कि अगर कोई गंभीर पत्रकार ईमानदारी से अखबारनवीसी करना चाहता है तो उसे अपनी मर्जी का लिखना चाहिए, अपने सिद्घांतों को दबा-छुपाकर रखने के बजाए उन्हें खुलकर सामने रखना चाहिए और खाल ओढ़कर भेड़ बनने का काम नहीं करना चाहिए। अपनी खुद की असली खाल के भीतर के भेडि़ए समाज के लिए कम नुकसानदेह होते हैं। अपनी मर्जी का ईमानदार लेखन करना उसी तरह का है जिस तरह कि आलू के ठेले पर कोई गोश्त नहीं बेचता और चिकन कॉर्नर में कोई टमाटर नहीं बेचता। लिखने और छापने के धंधे में भी ऐसी एक ईमानदारी जरूरी है कि जो कहें सो करें और जिन सरोकारों का बैनर लेकर घूमें उन्हें खुद अमल करके भी दिखाएं।

-सुनील कुमार

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