चूडिय़ों का केलिडॉस्कोप

13 अपै्रल 08
महिलाओं ने सरकारी टेलीफोन के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए इसके एक बड़े अफसर को चूडिय़ां भेंट की। भारतीय जनता पार्टी की ये महिलाएं शुरू से ही भारतमाता की तस्वीर पूजते आई हैं और हिंदू धर्म की अनगिनत देवियों की पूजा भी। इसके बाद भी एक अफसर को निकम्मा, लानायक साबित करने के लिए उन्होंने चूडिय़ां भेंट कीं जो कि एक महिला को अबला बनाने वाली बात है। महिलाओं की इस सोच के खिलाफ पचीस बरस पहले इंदिरा गाध्ंाी ने नाराजगी जाहिर की थी जिसमें नारीत्व की प्रतीक चूडिय़ों को कमजोरी के निशान की तरह पेश किया जाता है। मैं लगातार इस बात को लिखते आया हूँ कि समाज की पुरुष प्रधान सोच महिलाओं में भी इतने गहरे पैठ गई है कि वह भाषा, व्यवहार, सभी जगह सिर चढ़कर बोलती है। इससे जुड़े मुद्दों पर हम लगातार लिखते हैं और कुछ परिचित-पाठक कई बार पूछते भी हैं कि क्या मैं किसी अंतरराष्टï्रीय महिला संगठन से भुगतान पाता हूँ।
एक औरत जो घर संभालती है, बचपन से छोटे भाई-बहनों को संभालती है, बहुत गरीब है तो दूसरों के बच्चे संभालती है, शादी के बाद पति का घर, अपने बच्चे, ससुराल का काम संभालती है, परिस्थितियां अनुकूल या प्रतिकूल रहीं तो वह बाहर काम भी करती है, वह किस बात से अबला हुई? वह तो सबला ही सबला है। कुदरत ने भी उसे शरीर विज्ञान के हिसाब से आदमी से अधिक ताकतवर बनाया है। खान-पान से लेकर पढ़ाई और इलाज तक लगातार एक सौतेला बर्ताव पाते हुए भी वह हिन्दुस्तान में मर्द के मुकाबले करीब ढाई बरस अधिक जीती है।
अवांछित गर्भ से लेकर अवांछित गर्भपात तक कई तरह के जुल्म, दहेज प्रताडऩा, जिम्मेदारियों के बोझ को जानवरों की तरह ढोते हुए हिन्दुस्तानी औरत मर्द से अधिक जीती है। सामाजिक सोच के मुताबिक मर्द अपने से चार-पांच, या और अधिक बरस छोटी औरत से शादी करता है, इसलिए कि जब वह बूढ़ा होने लगे, तो भी औरत टनाटन बनी रहे और उसके मरने तक सेवा करती रहे। औरत से चार-पांच बरस अधिक उम्र का मर्द और ढाई बरस कम औसत उम्र। मतलब यह कि वृन्दावन में विधवा आश्रम को लबालब भरे रखने का पुख्ता इंतजाम मर्द करते चलता है। अपने लिए वह गारंटी करके, बीमा करके चलता है कि उसके मरने तक मुफ्त की नर्स हासिल रहे और मरने पर लाश बिना चूडिय़ों के बिखरे टुकड़े न दिखे।
वरना साथ जिएंगे, साथ मरेंगे के नारे वाले देश में लड़के को अपने से ढाई बरस बड़ी लड़की से शादी करनी चाहिए।
हिंदुस्तानी, खासकर हिंदू औरत के मर्दों ने रिजर्वेशन की तख्तियों से लादकर रखा है। सिर के  ऊपर खतरे के लाल निशान की तरह सिंदूर चमकता है, माथे पर सामने से बिंदी दिखे, उसके जरा नीचे नाक की लौंग, फिर और नीचे गले से नीचे तक लटकता मंगलसूत्र जो खराब होती नीयत को रोक सके।
मंगलसूत्र जहां खत्म होता हे वहां से एक-डेढ़ फीट नीचे दोनों तरफ चूडिय़ां। और पहरावा खत्म होते ही पायल-बिछिया।
मतलब यह की शादीशुदा हिंदुस्तानी औरत के अंग-अंग पर, व्यस्त रेस्तरां की तरह 'रिजव्र्ड्Ó की तखियां लगी हैं, लेकिन शादीशुदा मर्द अपने को सब्जी बाजार के सांड की तरह खुला रखता है कि जब जहां चाहे मुंह मार ले। लेकिन औरत के लिए कहीं घूंघट है, कहीं बुरका है और कहीं किसी और किस्म का बंधन।
इस सोच की इतनी गहरी छाप औरतों पर पड़ी है कि बराबरी के हक के इक्का-दुक्का नारों को छोड़कर वे बराबरी का सोच भी नहीं पातीं। वे इतना भी नहीं पूछ पातीं कि लड़की के नाम के साथ पहले पिता का नाम जुड़ता है और बाद में पति का। पहले उसे कुमारी लिखकर अपने कौमार्य का प्रदर्शन करना पड़ता है और फिर श्रीमती लिखकर बताना पड़ता है कि वह अब किसी 'श्रीÓ की 'मतीÓ हो गई है। न उसे अपने नाम के साथ अपनी मां का नाम लिखने की सहूलियत है, न ही उसके पति को अपने नाम के साथ पत्नी का नाम लिखना होगा। यह पूरा सिलसिला बदले बिना प्राकृतिक सबला, अबला की तरह अपनी चूडिय़ां भेंट करती है।
गैर बराबरी के रीति-रिवाज, गैर बराबरी की भाषा, सरकारी व्यवस्था सबको बदलना होगा। इसके बिना औरत ही सती होगी, उसी की दहेज प्रताडऩा होगी, वही घर से निकाली जाएगी, भू्रण हत्या कन्या भू्रण की ही होगी, बलात्कार उसी से होगा, विधवा होकर वही सिर मुंडाएगी, वही सफेद कपड़े पहनेगी, वही चूडिय़ां फोड़ेगी। गैर बराबरी खत्म होने तक जिसके आंचल में दूध होगा उसी की आंखों में पानी होगी।
लेकिन भारत में गैरबराबरी की भाषा बदल नहीं रही। अंगे्रजी में जहां पुरुष के लिए  एक्टर और औरत के लिए एक्ट्रेस का इस्तेमाल हमेशा से होते आया था, अब सबके लिए एक्टर शब्द का उपयोग ही होने लगा। महिलाओं के लिए हमेशा से चले आ रहा शब्द खत्म कर दिया गया। इसे मेल एक्टे्रस ओर फीमेल एक्ट्रेस क्यों नहीं किया गया?
सरकार को संविधान संशोधन करने सारी भाषा को बराबरी का करना होगा। हर सरकारी फॉर्म में औरत-मर्द, माँ-बाप का जिक्र बराबरी से करना होगा और सरकारी अनुदान, रियायत, मदद के लिए संयुक्त खाते को अनिवार्य बनाना होगा। महिला आयोग के नाम पर देशभर में सत्ता सुख का जो पाखंडी मनोनयन चले आ रहा है उसे खत्म करना होगा और इन पदों पर राज्य के महिला समूहों, महिला जनप्रतिनिधियों, महिला संगठनों, महिला अधिकारियों के मतदान से नियुक्ति करनी होगी, तब जाकर कारों में मस्त घूमते बेपरवाह महिला आयोग की जगह एक संवेदनशील संस्था खड़ी होगी।
महिलाओं की हालत सुधारने के लिए ट्रेड यूनियनों को भी असंगठित महिला मजदूरों के बीच काम शुरू करना पड़ेगा। इसमें हो सकता है कि मौजूदा, स्थापित यूनियनें काम की न रहें जो दफ्तरों-कारखानों की संगठित व्यवस्था तक अपने को सीमित रखती हैं। इसके लिए नए, आक्रामक तेवरों वाले, महिला मजदूर संगठन खड़े करने की जरूरत है जिनका आज के राजनीतिक पि_ïू श्रम संगठनों से परे रहना बेहतर होगा। तब कहीं जाकर अपनी चूडिय़ां-भेंट करने के बजाय जो हाथ डंडा-झंडा लेकर हक के लिए पुरुष प्रधान व्यवस्था की धड़कन रोक सकें, वही काम के होंगे।
एक मजबूत महिला मजदूर संगठन दस लाख की आबादी में दस हजार घरेलू नौकरानियों को बांध सकता है, और इससे रातों-रात महिला अधिकार और मजदूर अधिकार की तस्वीर बदल सकती है।
पहले मेले-ठेले में हम ऐसा एक केलिडॉस्कोप देखते थे जिसके भीतर चूडिय़ों के टुकड़ों से तरह-तरह की रंगीन आकृतियां बनते दिखती थीं और घुमते ही वे बदल जाती थीं।
चूडिय़ों के टुकड़ों से मैं तस्वीर इसी तरह बदलने की कल्पना करता हूँ।
-सुनील कुमार

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