3 जून 2012


3 जून 2012


3 जून 2012


मोतियों वाले सीप से परे जलकुंभी की रिपोर्टिंग


3 जून 2012
संपादकीय
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मेहरबानी से दिल्ली में बाबा-अन्ना के धरने की पल-पल की तस्वीरें उनकी पूरी दहाड़ के साथ देश भर की जनता के सामने है। और अब तक जो लोग इन दोनों टोलियों की हकीकत को समझ नहीं पाएं हैं, वे अब भी उनकी लड़ाई को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई समझ रहे हैं, और इसमें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का खासा हाथ है। दरअसल टेलीविजन की टेक्नालॉजी की अपनी बेबसी है। तर्क और तथ्य के ऊपर जब तक तस्वीर हावी न हो तब तक दर्शक संख्या साबित करने वाली टीआरपी ऊपर नहीं जाती। इसलिए समाचार-दर्शकों को एक मिनट से भी कम के असरदार ऐसे टुकड़े परोसे जाते हैं जो सब मिलकर भी एक सच पेश नहीं कर पाते। किसी तालाब के पानी पर छाई हुई जलकुंभी सावन की तरह सब कुछ हरा-हरा दिखाती है, और न तो इस हरियाली के खतरे एक झलक में दिखते, और न ही जलकुंभी के नीचे की असलियत इस झलक में दिखती। इसी तरह टीवी के स्क्रीन पर छाई हुई तस्वीरों का हकीकत से कुछ लेना-देना नहीं होता और एक वक्त जिस किसी ने यह कहा था कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है, उस बात की आज मरम्मत करने की जरूरत है कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है, और यह जरूरी नहीं कि वे मिलकर दो अक्षर का सच नाम का एक शब्द बना सकें। 
अधिकतर टीवी समाचार-चैनलों, और सिर्फ उन्हें ही क्यों कोसा जाए, बहुत से अखबार भी अन्ना और बाबा के नारों को एक टापू की तरह पेश करते हैं। असल जिंदगी टापू सी नहीं होती, वह छत्तीसगढ़ जैसे राज्य सी होती है जो कि इर्दगिर्द के आधा दर्जन दूसरे राज्यों से जुड़ा हुआ है। अन्ना और बाबा की टोलियों के जितने मुंह हैं, उनसे निकली बातें अद्र्धसत्य के भी एक चौथाई सत्य ही है। यह ठीक है कि यूपीए सरकार गले-गले तक भ्रष्ट है, लेकिन देश में यूपीए के अलावा, प्रदेशों में जगह-जगह दूसरी सरकारें भी भ्रष्ट हैं। और कम भ्रष्ट नहीं हैं। अभी-अभी मायावती के राज-काज के दौरान का दसियों हजार करोड़ का घोटाला सामने आ रहा है, और उनके एक सबसे बड़े भ्रष्ट रहे मंत्री के बारे में कल ही हमने पाठकों को याद दिलाया है कि किस तरह उत्तरप्रदेश चुनाव के दौरान आरोपों से घिरे और माया के बर्खास्त किए इस मंत्री को भाजपा ने अपने सिर पर ताज की तरह सजा लिया था। अन्ना और बाबा के मुंह से अगर किसी ने मायाराज के भ्रष्टाचार के बारे में सुना हो, तो उस दुर्लभ यूरेनियम को हम भी देखना चाहेंगे। इसके अलावा इसी अन्ना-टोली के एक सबसे निर्विवाद और सबसे बड़े ओहदे पर रह चुके, भ्रष्टाचार के ही खिलाफ काम करने की कुर्सी संभाल चुके जस्टिस संतोष हेगड़े ने लोकायुक्त दफ्तर से कर्नाटक की भाजपा सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का जो कई क्विंटल वजनी दस्तावेज तैयार किया था, वह अन्ना-बाबा की आंखों को एक कंकड़ सा भी नहीं दिखता है। यह अनदेखी किसी मासूमियत का सुबूत नहीं है, यह एक धूर्त राजनीति है जिसमें चुनाव के नतीजों पर असर डालने के लिए अन्ना और बाबा की टोली देश के मीडिया का बेजा इस्तेमाल करते हुए चुनावी राजनीति कर रही है, लोकतंत्र पर से आस्था को खत्म कर रही है और लोगों की आंखों में धूल झोंक रही है। इलेक्ट्रॉनिक, और प्रिंट मीडिया में भी, अपनी पहुंच को अधिक साबित करने के गलाकाट मुकाबले के चलते अधिकतर लोग तर्क और तथ्य, न्याय और संतुलन की बात छोड़कर सतह पर तैरती जलकुंभियों को भी पूरी हकीकत की तरह पेश करने में लगे हैं। बाबा के आस्था चैनल के मुकाबले अब देश के चैनल अपने-आपको लोकतंत्र के खिलाफ अनास्था चैनल साबित करने में लग गए हैं। 
यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि इस अविश्वास को समझने वाले लोग चुप हैं। और यह अविश्वास यूपीए सरकार के खिलाफ होना तो ठीक है, जरूरी है, हम खुद भी हर ऐसे मुद्दे पर इस अविश्वास का साथ देते हैं। लेकिन जो ताकतें पूरे के पूरे लोकतंत्र के खिलाफ, पूरी की पूरी संसद के खिलाफ लोगों को बरगला रही हैं, वे खादी की खाल ओढ़कर या भगवा चोला पहनकर अगर लोकतंत्र को ही गैरजरूरी साबित करने का एक खास विचारधारा का अभियान चला रही हैं, चुनावी नतीजों पर असर डालने की साजिश कर रही हैं, तो भ्रष्टाचार-विरोध की पैकिंग में बेचे जा रहे इस दूसरे सामान की शिनाख्त जरूरी है। आज देश में यह सिलसिला उजागर करने के बजाय मीडिया इसकी पीठ पर सवार होकर अपनी मंजिल तय कर रहा है। असलियत और इंसाफ से रिश्ते को इस कदर तोड़ देना उस धंधे के लिए जायज नहीं है जो कि अपने-आपको लोकतंत्र का चौथा पाया कहता है और कई किस्म की छूट पाता है। भारत के मीडिया को सतह की जलकुंभी की रिपोर्टिंग से परे उस तहलटी तक जाने की जहमत भी उठानी चाहिए जहां पर सीप में मोती भी रहते हैं।

2 जून 2012


2 जून 2012


आज मेरी बारी है-भाजपा


2 जून 2012
संपादकीय 
रेडियो पर पहले एक कार्यक्रम आता था, आज मेरी बारी है। आज भारत में भाजपा की हालत कुछ उसी किस्म की है। खबरें भाजपा से लबालब भरी हुई हैं, लेकिन यह एक और बात है कि इसमें से अधिकतर खबरें भाजपा के लिए शर्मिंदगी वाली हैं। एक तरफ उत्तरप्रदेश में मायावती के जिस भ्रष्ट मंत्री कुशवाहा को पिछड़ी जाति के मसीहा की तरह सिर पर बिठाकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी पार्टी में लेकर आए थे, उसके सैकड़ों करोड़ के भ्रष्टाचार पर सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की है और भ्रष्टाचार का तौर तरीका दिल दहलाने वाला है। दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के एक मामले में कर्नाटक के एक भाजपा विधायक को आज कई बरस की कैद की सजा हुई है। कर्नाटक के ही एक दूसरे भाजपा विधायक का चुनाव रद्द हुआ है। गुजरात में मोदी के खिलाफ वहां के बाकी भाजपा नेता एक हो रहे हैं, और दिल्ली इस बहस में डूबी है कि भाजपा के भीतर तानाशाह की तरह सामने आए मोदी के खिलाफ पार्टी को अपने ही अखबार में संपादकीय लिखना पड़ रहा है। एक ही पार्टी के लोगों के खिलाफ इतनी खबरें आज इस पार्टी को प्रेस ब्रीफिंग रद्द करने पर मजबूर करने के लिए काफी होतीं, अगर छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के आर्थिक विकास के आंकड़े भारत सरकार की तरफ से आज ही एक खबर में दिल्ली के अखबारों में सामने न आए होते। एक तरफ जब जगह-जगह भाजपा के नेता पार्टी को परेशानी में डाल रहे हैं, उनका भ्रष्टाचार सिर चढ़कर बोल रहा है उस वक्त कम बोलने वाला छत्तीसगढ़ आर्थिक और सामाजिक-मानव विकास के पैमानों पर भारत सरकार से एक के बाद एक सर्टिफिकेट पा रहा है।
भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवानी ने अपने ब्लॉग पर अपनी पार्टी की जिस हालत को लेकर फिक्र जाहिर की है, वह भी गलत नहीं है। और आज दिल्ली में बहुत से विश्लेषकों का यह मानना है कि जिस दिन चुनाव होंगे उस दिन अगर भाजपा का यही हाल रहा, और अगर भाजपा के सिर पर मोदी जैसे उग्रवादी इसी तरह हावी होने की कोशिश करते दिखे तो न तो देश में और न ही एनडीए के भीतर भाजपा जीत पाएगी। दरअसल आज भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व का वजन इतना कम हो गया है कि इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष की बारी पार्टी के भीतर असरदार नेताओं में शायद पहले आधा दर्जन में भी नहीं आती। सिर्फ पद के चलते अध्यक्ष का वजन बिना चुनाव के दौर में तो एक बार खप जाता है, लेकिन जब आम चुनाव की तरफ देश बढ़ रहा हो, तो उस चुनाव तक के लिए जिसे अध्यक्ष बनाया गया है उसका कम वजन नहीं चलता। गडकरी का जो हाल पिछले महीनों में देखने मिला है वह बहुत दयनीय है।  उत्तरप्रदेश के कुशवाहा कांड से लेकर अभी के मोदी-संजय जोशी कांड तक, और इस बीच में कर्नाटक के येदियुरप्पा कांड और राजस्थान में वसुंधरा के तेवर तक, सब कुछ बताता है कि इस पार्टी की लीडरशिप में आज कुछ भी काबू में नहीं दिख रहा है। ऐसी नौबत में लोगों को आज अगर अंदाज लगाने कहा जा रहा है तो बहुत से लोग यूपीए की संभावनाओं को खारिज करना अब बंद कर रहे हैं और राज्यों के स्थानीय समीकरणों को गिनाते हुए लोग फिर यूपीए की गुंजाइश गिना रहे हैं।
हम अभी चुनाव की अटकलबाजी को कम से कम एक बरस दूर मानते हैं। लेकिन भाजपा के अलग-अलग राज्यों के नेताओं का जो भ्रष्टाचार सिर चढ़कर बोल रहा है उसमें अडवानी जैसे नेता के बार-बार कहे हुए शुचिता जैसे शब्द को अर्थहीन बनाकर रख दिया है। मानो हमारे ऊपर के गिनाए हुए भ्रष्टाचार काफी न हों, कल ही आंध्रप्रदेश के एक सीबीआई कोर्ट के जज को बर्खास्त किया गया है जिससे जमानत लेने के लिए गिरफ्तार कर्नाटक के भाजपाई खरबपति मंत्री रेड्डी ने दस करोड़ की रिश्वत का सौदा किया था और तीन करोड़ एडवांस दे भी दिया था। अब जिस पार्टी के गिरफ्तार मंत्री जमानत के दस-दस करोड़ खर्च करने के लायक हों, उस पार्टी की साख अपने खुद के इलाके में कैसी होगी? आज यूपीए सरकार को जिस किस्म के और जिस दर्जे के भ्रष्टाचार के लिए कोसा जा रहा है, क्या उसी दर्जे का और उसी किस्म का भ्रष्टाचार भाजपा के मंत्री और नेता देश भर में जगह-जगह करते नहीं मिल रहे हैं? और इससे तो साबित यही होता है कि चूंकि केंद्र में भाजपा की सरकार नहीं है इसलिए केंद्र में भाजपा का भ्रष्टाचार नहीं है। अगर कर्नाटक की तरह केंद्र में भी भाजपा का राज होता तो फिर येदियुरप्पा से लेकर रेड्डियों तक जैसा हाल एनडीए के केंद्रीय मंत्रियों का भी हो सकता था।
कुल मिलाकर आज देश भर के भाजपाई भ्रष्टाचार, झगड़े, अपराध, रिश्वत और आपसी कलह में मिलाकर छत्तीसगढ़ जैसे भाजपाई राज की उपलब्धि पर पानी फेर दिया है।

1 जून 2012


1 जून 2012


चर्चा कुछ मध्यप्रदेश की, और कुछ दिग्विजय की


1 जून 2012
संपादकीय
दस बरस तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कांगे्रस के एक बड़े नेता दिग्विजय सिंह ने आज ट्वीट किया है कि उनकी उम्र के नेताओं को राजनीति से बाहर होकर, नई पीढ़ी के लिए जगह खाली करनी चाहिए। हालांकि आज दिग्विजय सिंह ऐसी किसी जगह पर नहीं हैं जहां पर कि किसी और को जाने की हसरत हो। न ही उनके राजनीति में रहते हुए कोई जगह घिर रही है, क्योंकि वे बिना किसी बड़े ओहदे के सोनिया गांधी के निजी सिपाही की तरह काम करते आए हैं, और इसी के तहत उनको उत्तरप्रदेश की राजनीति और चुनाव में राहुल गांधी को काम के साथ प्रशिक्षण देने का जिम्मेदार माना जाता रहा है। दिग्विजय सिंह की एक खूबी यह भी है कि वे इतना अधिक बोलते रहने के बावजूद अब तक किसी स्टिंग ऑपरेशन जैसे विवाद में नहीं फंसे हैं और वे खुलकर बोलने के विवाद ही झेलते रहे हैं। हिंदू साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ एक हिंदी और हिंदू इलाके की राजनीति करते हुए भी वे जितना खुलकर इन ताकतों पर हमला करते हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के हक को लेकर उनके तुष्टिकरण के आरोप झेलने की हद तक जाते हैं, उसे लेकर दिग्विजय सिंह के बारे में आज यहां चर्चा करना मकसद है। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरी बात भी हुई है जिससे इसे जोड़कर आज हम यहां इस पर लिख रहे हैं। 
छत्तीसगढ़ में कांगे्रस में एक बार फिर जान फूंकने की कोशिश में लगे हुए प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल ने कल भोपाल में मीडिया से बात करते हुए छत्तीसगढ़ की हालत पर अफसोस जाहिर किया कि राज्य बनने के वक्त जो सपने देखे गए थे वे पूरे नहीं हुए हैं और ऐसा लगता है कि यह अलग राज्य नहीं बना होता तो ही ज्यादा अच्छा होता। अपने लिए असुविधा खड़ी करने वाले इस बयान को लेकर हो सकता है कि थोड़ा बहुत फेरबदल वे आजकल में करें, लेकिन मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद छत्तीसगढ़ कहां पहुंचा है यह तो कल यूपीए सरकार के योजना आयोग की बैठक में दिख ही गया। बारह बरसों के अपने अस्तित्व में इस राज्य ने जो हासिल किया है वह भोपाल का मातहत बने रहकर शायद चौबीस बरसों में भी नसीब नहीं होता। इस राज्य ने बनने के बाद से लगातार जो तरक्की की है, वह न सिर्फ हर बरस के इसके बजट की छलांग में दिखती है बल्कि गरीबों के भरे हुए पेट में भी दिखती है। और मध्यप्रदेश के उन दिनों को याद करें जब आखिरी के सात बरस तो छत्तीसगढ़ दिग्विजय के राज का हिस्सा था, तो उस वक्त इस इलाके के सौतेले बच्चे से भी अधिक बुरा वह सुलूक मिला जो कि दिग्विजय के पहले से जारी था, और उस वक्त भी जारी था जब सबले बढिय़ा छत्तिसगढिय़ा अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। 
नंद कुमार पटेल को अगर अविभाजित मध्यप्रदेश के दिन आज के इस राज्य की इस हालत से बेहतर लगते हैं, तो इस देश में आज बहुत से ऐसे लोग हैं जिनको अंगे्रजों का राज इस देश के लिए आज के भारतीय राज से बेहतर लगता है। दिग्विजय सिंह के एक मंत्री के रूप में नंद कुमार पटेल छत्तीसगढ़ी भी थे और अविभाजित मध्यप्रदेश के मंत्री भी थे। इसलिए हम यह तो नहीं कहेंगे कि उनको इन दोनों राज-काज का फर्क देखने का मौका नहीं मिला, लेकिन इतना जरूर कहेंगे कि तमाम शिकायतों के बावजूद और खामियों के बावजूद छत्तीसगढ़ ने मध्यप्रदेश की गुलामी से आजादी पाने के बाद पहली बार पेट भर खाना खाया है। भोपाल की नजरों में इस राज्य की उतनी ही अहमियत थी जितनी कि लंदन की नजर में अंगे्रज राज वाले हिन्दुस्तान की थी। इस जगह पर सन् दो हजार के पहले के छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के आंकड़ों की लंबी-चौड़ी तुलना संभव नहीं है, लेकिन ये आंकड़े तो सरकारी बहीखातों में बिखरे पड़े हैं, जनता के सामने खुले हुए हैं कि छत्तीसगढ़ क्या कमाता था, क्या उगाता था और भोपाल राज में क्या खाता था। आज अगर दिग्विजय की पार्टी की अगुवाई वाले योजना आयोग में यह माना जा रहा है कि छत्तिसगढिय़ा बेहतर खाता है, सामाजिक विकास हुआ है, बच्चों की मौत कम हुई है तो यह इस राज के बनने से ही हुई है, भोपाल से कारोबार के चलते हुए तो छत्तीसगढ़ की माटी-संतानें उसी रफ्तार से मरती रहतीं।
दरअसल दिग्विजय सिंह ने आज अपने स्थायी संन्यास को लेकर जिस किस्म की सुगबुगाहट शुरू की है, उससे उनके राज-पाट और उन दिनों के छत्तीसगढ़ की बदहाली के जख्म फिर ताजा हो गए। जिस तरह हिंदुस्तान के लोग आजादी की लड़ाई को नहीं भूल सकते, आपातकाल को नहीं भूल सकते, उसी तरह छत्तीसगढ़ के लोग भोपाल से मिली बेइंसाफी को नहीं भूल सकते। दिग्विजय सिंह अपनी पीढ़ी के लोगों के संन्यास की चर्चा बहुत मासूमियत से छेड़ रहे हों ऐसा भी नहीं लगता। लेकिन वे किस बड़ी कुर्सी पर बैठे किस बूढ़े पर निशाना साधकर किस जवान के लिए जगह बनाना चाह रहे हैं, यह समझना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन दिग्विजय सिंह का इतिहास रहा है कि उन्होंने मध्यप्रदेश को खो देने के वक्त दस बरस तक किसी पद से दूर रहने की जो घोषणा की थी, वे उस पर कायम रहे थे। ऐसे व्यक्ति की आज की कही बात को लेकर कुछ लोग उनसे अपनी बात पर अमल की उम्मीद भी कर सकते हैं।