एक लफ्ज हैवानियत गढ़कर फारिग


6 अगस्त 2012
असम में दो समुदायों के बीच टकराव बढ़ते-बढ़ते अब करीब सौ जिंदगियों को निगल चुका है, और सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि चार लाख लोग घर-बार छोड़कर राहत शिविरों में जी रहे हैं, अगर उसे जीना कहा जा सके तो। लेकिन बाकी देश, असम के बाहर का तमाम देश चैन से जी रहा है। एक सौ तीस करोड़ से अधिक की आबादी के लिए उत्तर-पूर्व में बसे इस राज्य की तीन करोड़ की आबादी मदद के हिसाब से बहुत छोटी भी हो सकती थी, लेकिन वह मदद उठते नहीं दिख रही है। 
भारत में जो बड़े अखबार और जो टीवी समाचार चैनल किसी एक दुखी इंसान की मदद के लिए अभियान छेड़कर दसियों लाख जुटा देते हैं, उनमें से किसी ने भी असम के इन लाखों बेदखल लोगों के लिए ऐसी कोई कोशिश अब तक शुरू की हो, ऐसा दिखा नहीं है। जिस सोशल मीडिया की चर्चा पिछले दो-तीन बरसों में बढ़ गई है और जिसने मध्य-पूर्व के देशों में जनक्रांति लाने में सबसे बड़ी हिस्सेदारी साबित की है, वह सोशल मीडिया भी इन बरसों में भारत में अन्ना हजारे, रामदेव और डॉ. अब्दुल कलाम तक सीमित रहा है। फेसबुक और ट्विटर पर भी असम के बेदखल लोगों के लिए हमदर्दी न के बराबर दिखती है।
इसकी दो वजहें नजर आ रही हैं। पहली तो यह कि असम की इस दिक्कत को लोग बांग्लादेश से आकर बसे हुए विदेशियों से ऊपजी परेशानी समझते हैं, और फिर मजहब का फर्क करने वाले लोग इन विदेशियों को मुस्लिम जानकर इस बात के भी खिलाफ हैं कि उन्हें यहां बसने दिया जाए, और फिर धीरे-धीरे वे मतदाता बन जाएं। दूसरी दिक्कत यह है कि उत्तर-पूर्व को लोग हिंदुस्तान की मूलधारा से परे का राज्य मानते हैं। कुछ ऐसा ही बर्ताव कश्मीर के साथ किया जाता है। नतीजा यह होता है कि वहां के लोग धीरे-धीरे अलग-थलग होने लगते हैं, और उनके सुख और दुख भारत के बाकी राज्यों को छू नहीं पाते। 
कल तक जो बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा था और जिसे भारत में एक फौजी कार्रवाई करके पाकिस्तान से अलग कर दिया था, उस हिस्से की फौजी अहमियत को आम जनता की जुबान में समझाना कुछ मुश्किल बात है। लेकिन भारत के राजनीतिक दलों में हर किसी के नेता इस बात को ठीक से समझते हैं कि बांग्लादेश से काम के लिए आने वाले लोगों के साथ कुछ नरमी दिखाना और उन्हें सरहद के करीब कमाने-खाने देना, बसने देना, उसके अपने फौजी फायदे हैं। राजनीति के लोग और सरकार की तरफ से इस बात को इतनी खुली जुबान में नहीं कहा जा सकता कि इस आबादी की वजह से उस बांग्लादेश की तरफ से भारत के खिलाफ साजिशों का खतरा घटता है जो कि बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल करके अमरीका, चीन या पाकिस्तान जैसी ताकतें कर सकती हैं। लेकिन ऐसी पूरी समझ रहने के बाद भी राजनीति में एक तबका असुविधा के ऐसे सार्वजनिक सवाल खड़े करते रहता है जिनके सार्वजनिक जवाब देना सरकार या देश के लिए मुमकिन नहीं होता। 
लेकिन इस राजनीति को भी छोड़ दें। असम में तो आज सिर्फ बांग्लादेश से आए हुए मुस्लिमों की मौतें नहीं हो रही हैं, वहां के दूसरे आदिवासी समुदाय के लोग भी मारे जा रहे हैं, और बेदखली तो एक बड़ी तकलीफ की बात है। ऐसे में भी अगर देश के बाकी हिस्सों के लोग मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाते हैं, और देश-विदेश के दूसरे गैरजरूरी मुद्दों में ही उलझे रहते हैं तो इससे असम का कुछ साबित नहीं होता, इससे बाकी देश की अपनी जिम्मेदारी और इंसानियत की कमी साबित होती है। (हालांकि यहां पर इंसानियत शब्द का इस्तेमाल इसके प्रचलित अर्थ के लिए ही किया जा रहा है, वैसे हकीकत में इंसानियत के भीतर वह सब कुछ शामिल है जिसे इंसान हैवानियत कहते हैं।)
नए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जब शपथ ले रहे थे तो उन्हें या यूपीए को नापसंद करने वाले कुछ लोगों का यह कहना था कि जब असम में इतनी बड़ी त्रासदी चल रही है तब शपथ ग्रहण का जलसा भी चल रहा है। वह बात तो कुछ लोगों को खटकी हो सकती है, लेकिन क्या उस दिन से बाद से अब तक देश में पहले से तय जलसों में कोई कटौती हो गई है? क्या किसी फिल्म की पहले हफ्ते की कमाई ऐसे राहत शिविरों के लिए दी गई? क्या किसी टीवी के शो में असम के लिए मदद की अपील की गई? और यह बात रकम के हिसाब से मायने की नहीं है। एक कलमाड़ी या एक राजा, या एक मधु कोड़ा अपनी जेब से उतनी रकम दे सकते हैं जितनी कि प्रधानमंत्री असम जाकर दे आए हैं। मायने यह बात रखती है कि देश के लोग देश के किसी एक हिस्से पर आई मुसीबत में हाथ बंटाना सीखें, ऐसा आज अगर वे दूर बसे असम के साथ करेंगे तो कल पास में बसे किसी दूसरे के लिए भी करेंगे। लेकिन अगर आज वे असम को परदेश मानकर, विस्थापितों को विदेशी मानकर नहीं करेंगे तो कल वे अपने राज्य में पड़ोस के राज्य से आकर बसे लोगों को भी विदेशी मानने लगेंगे। बात पैसों की नहीं है, बात है किसी के दुख-दर्द से जुडऩे की। बांग्लादेश से लोग शौक में हिंदुस्तान आकर नहीं बसते। वहां जब रोजी-रोटी नहीं जुटती तो ही वे यहां आते हैं। पेट की इस हकीकत को अनदेखा करते हुए, फौजी जरूरतों को, और सरहद की हिफाजत को अनदेखा करते हुए जो लोग असम के लिए हमदर्दी को गैरजरूरी समझ रहे हैं, वे खुद अपनी जुबान में इंसानियत को भी अनदेखा कर रहे हैं। 
और सच तो यह है कि यह रूख और यह बर्ताव ही असल इंसानियत है, जिसे इंसान मानने के बजाय उसके लिए हैवानियत जैसा एक लफ्ज गढ़कर फारिग हो जाते हैं।

ऐसे में इन महिला आयोगों को बंद कर देने की जरूरत


6 अगस्त 2012
संपादकीय
हरियाणा में कांगे्रस पार्टी के लिए कुछ घंटों के भीतर शर्मिंदगी के दो मामले सामने आए हैं। एक तरफ उसके गृहमंत्री की प्रताडऩा से एक युवती को आत्महत्या करनी पड़ी और उसकी खुदकुशी की चि_ी सामने आने पर इस मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा जो कि मुख्यमंत्री का बहुत करीबी माना जाता था और पहली बार विधायक बनने पर ही उसे मंत्री बनाया गया था। उसने प्रताडऩा और शोषण का जितना लंबा सिलसिला चला रखा था, वह इस बात का सुबूत है कि मोटे तौर पर इस पार्टी में, और शायद पूरी भारतीय राजनीति में महिलाओं पर जुल्म, उनका शोषण आम बात है। कुछ ही दिन हुए हैं जब नारायण दत्त तिवारी एक लंबी अदालती लड़ाई के बाद बाप साबित हुए हैं और उस सिलसिले को ध्यान से देखें तो यह साफ होता है कि एक बड़े सीनियर कांगे्रस नेता के संबंध एक शादीशुदा महत्वाकांक्षी कार्यकर्ता से कितने करीबी हो जाते हैं कि उससे बेटा भी हो जाता है। और नैतिकता का हाल यह है कि उस महिला और उस बेटे को खारिज करने के लिए तिवारीजी पूरी जान लगा देते हैं। और इस फैसले के पहले भी जिस तरह के सेक्स-वीडियो के सामने आने पर उन्हें आंध्र का राजभवन छोडऩा पड़ा था, वह कोई कम शर्मनाक बात नहीं थी। एन डी तिवारी के डीएनए नतीजे की घोषणा के बाद अब कुछ हफ्तों के भीतर कांगे्रस के एक राज्य के गृहमंत्री की वजह से यह आत्महत्या सामने आई, और एक दूसरा हादसा भी सामने आया। करीब पूरी जिंदगी कांगे्रस के ताकतवर नेता रहे हरियाणा के भजनलाल के कांगे्रस विधायक और उप मुख्यमंत्री रहे बेटे ने दूसरी शादी करने के लिए धर्म बदला था, और निकाह के बाद उसकी छोड़ी हुई बीवी की लाश भी आज ही सुबह मिली है।
एक महिला के अध्यक्ष रहते हुए इस पार्टी के नेता जिस तरह से ऐसे मामलों में फंसे हुए सामने आ रहे हैं वह बात और तकलीफदेह है। लेकिन हम यह चर्चा यहां कांगे्रस नेताओं की बदचलनी के लिए नहीं कर रहे। इसका मकसद है केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बनाए जाने वाले एक संवैधानिक महिला आयोग पर बात करना। पिछले महीनों में लगातार राष्ट्रीय महिला आयोग ने जितनी संवेदनशून्यता दिखाते हुए घटिया दर्जे की बातें कहीं हैं, महिलाओं का अपमान किया है, उसे देखते हुए यह बात साफ है कि इतने बड़े संवैधानिक आयोग में अपनी पार्टी की मनोनीत महिलाओं को बिठाकर कोई पार्टी देश या प्रदेश में महिलाओं का भला नहीं कर सकती। सत्ता के मनोनयन से इस सुविधाभोगी जगह पर पहुंचने के बाद ऐसी महिलाएं सत्ता के राज में होने वाली ज्यादतियों पर कितनी आजादी से और कितनी ईमानदारी से कार्रवाई करती होंगी? दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानी तक हमारा अनुभव यह रहा है कि सत्ता के मनोनीत लोग, अपने राजनीतिक आकाओं को असुविधा से बचाने का काम करते हैं और अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी के साथ खुली बेईमानी करते हैं। किसी राज्य में, या देश में यह देखने में नहीं आता कि महिला आयोग की कार्रवाई से सत्ता को जरा भी परेशानी हुई हो। अगर राज्यों में महिला आयोग असरदार होते, तो फिर महिलाओं को अत्याचार के खिलाफ, शोषण के खिलाफ आत्महत्या की हद तक नहीं जाना पड़ता। और जो मामले आत्महत्या तक पहुंचते हैं, जिनके बाद लिखे हुए सुबूत सामने आते हैं, उनकी तो चर्चा भी हो जाती है, लेकिन जो हजारों-लाखों मामले पुलिस या अदालत तक नहीं पहुंचते, वे तो जुल्मतले दबकर खत्म हो जाते हैं, और सत्तारूढ़ दल की चहेती महिलाएं इन आयोगों में बैठे कोई काम नहीं करतीं। 
राष्ट्रीय महिला आयोग जब गुवाहाटी के सार्वजनिक अत्याचार और देह-शोषण की जांच के लिए वहां पहुंचा तो जितनी भयानक तस्वीरें एक अकेली लड़की पर जुल्म करते हुए दर्जन भर बदमाशों की थीं, उतनी ही भयानक तस्वीरें वहां पहुंचने पर आयोग की महिला सदस्यों द्वारा हंस-हंसकर, असम की परंपरागत टोपी पहनकर स्वागत करवाने की थीं। वे वहां पर प्रताडऩा की जांच के लिए पहुंची थीं, या खिलखिलाने के लिए? देश-प्रदेश में महिलाओं पर जुल्म की खबरें दिन में दस छपती हैं। लेकिन अपनी-अपनी अन्नदाता सरकारों को बचाते हुए ऐसी महिलाएं इस संवैधानिक संस्था को चुप रखकर इन ज्यादतियों को बढ़ावा ही देती हैं। हमारा ख्याल है कि महिला आयोग में मनोनयन के लिए राजनीतिक दलों से बाहर की महिलाओं को ही मनोनीत करने की जरूरत है और इस चयन के लिए सत्ता के एकाधिकार से परे, अदालत, संसद, विधानसभा, राज्यपाल, प्रतिपक्ष के नेता जैसे प्रतिनिधित्व वाली एक कमेटी बनाने की जरूरत है, वरना सुविधाओं की इस दूकान को बंद कर देना चाहिए।

कुछ मीठा हो जाए...


5 अगस्त 2012
संपादकीय
लंदन ओलंपिक में कल जब साइना नेहवाल को बैडमिंटन के महिला एकल का कांस्य पदक मिला, तो उनके चेहरे पर जीत का जोश कम था, और मेहनत का पसीना भी कुछ कम था, इसलिए आज की खुशी कुछ सहमी-सहमी सी है। इसलिए इस जीत के मायने को आज समझने की जरूरत है। चीन की खिलाड़ी को चोट लग जाने के बाद मुकाबले से वह बाहर हो गई, और पहले गेम को हार जाने के बाद भी साइना को मैडल मिला। लेकिन इससे साइना बिना हक यह मैडल पाने वाली नहीं हो गई, वह इस खिलाड़ी के ठीक-ठाक रहने पर भी मैडल पा सकती थी क्योंकि अब तक उसके साथ खेले छह मैचों में से दो में साइना जीती भी थी। और बैडमिंटन के खेल में ऐसा भी नहीं होता है कि पहले गेम में हारने के बाद बचे दो गेम जीतकर कोई मैडल तक न पहुंचा हो। 
खेल की बारीकियों से परे यह समझने की जरूरत है कि जीत और हार हमेशा ही सबसे काबिल की नहीं होती। और खेल की ही बात क्यों करें, भारत सुंदरी या विश्व सुंदरी के मुकाबलों में देश या दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की जीतती हो, ऐसा भी नहीं है। यह चुनाव तो मुकाबले में हिस्सा लेने वाली लड़कियों के बीच होता है। और फिर इस मुकाबले के दिन किसी की सेहत खराब हो, कोई सही जवाब न दे सके तो उसकी जीत मुमकिन नहीं होती। दूसरे खेलों में भी कभी बारिश के चलते, तो कभी रौशनी कम होने से कोई एक टीम मुकाबला खो बैठती है, और ऐसी ऊंच-नीच सबके साथ अलग-अलग वक्त पर होती रहती है। साइना को कल यह सहूलियत हासिल भी नहीं थी कि वह अगले दो मैचों में जीतकर पसीने पर तैरकर इस मैडल  तक पहुंचती। इसलिए उसकी जीत को कम आंकना ठीक नहीं है, उसने खुद ने अपनी इस जीत के बारे जो कहा है, उससे अधिक और क्या कहा जा सकता है। यह भी समझने की जरूरत है कि महिलाओं के एकल-बैडमिंटन मुकाबलों में अब तक कुल पांच देश ही काबिज थे, इस लिस्ट में साइना ने भारत को छठवें देश के रूप में जोड़ा है। और यह जीत उसके हाथ में किसी बटेर की तरह आकर नहीं लगी है, वह इस पदक से एक ही कदम पीछे थीं।
यह मौका एक राष्ट्रीय गौरव का मौका भी है जो कि इस देश में इन दिनों कम ही आ रहा है। चारों तरफ जितनी निराशा छाई हुई है उसमें एक कमउम्र लड़की अकेले अपने दम पर यहां तक पहुंची है, तो उससे देश में बहुत से लड़के-लड़कियों का हौसला भी बढ़ता है। एक तरफ जहां सट्टेबाजी और साजिशों से लदे हुए क्रिकेट के खिलाड़ी और पदाधिकारी अरबपति हुए जा रहे हैं, वहीं तमाम गैरक्रिकेट खेल खत्म से हो रहे हैं। ऐसे में बैडमिंटन जैसे साधारण खेल में साइना का इतने आगे बढऩा भारत के पूरे खेल के लिए मायने रखता है। तीरंदाजी और निशानेबाजी की तरह यह खेल वैसा महंगा नहीं है, इसमें ऊंची तकनीक नहीं लगती, और स्कूल-कॉलेजों से लेकर गली-मोहल्लों तक बच्चे बैडमिंटन खेलते हैं। ऐसे खेल में कामयाबी अधिक बच्चों के लिए खुशियों वाली है। देश की शायद आधी आबादी में रूबरू बैडमिंटन कभी न कभी देखा होगा, और मुकाबलों की बंदूक-पिस्तौल या उसके धनुष तो शायद एक फीसदी लोगों ने भी नहीं देखे होंगे।
साइना नेहवाल को जिन लोगों ने ओलंपिक में खेलते हुए देखा है, वे उसकी सादगी, उसकी मेहनत और उसकी विनम्रता पर फिदा हुए बिना नहीं रह सकते। फैशन और चकाचौंध से दूर, विवादों और सनसनीखेज खबरों से दूर रहकर वह खबरों की लहरों पर इतनी ऊंचाई तक पहुंची है कि उससे आज की खिलाड़ी पीढ़ी के तंग नजरिए वाले मां-बाप भी प्रभावित होंगे। और भारत जैसे देश में बच्चों की अपनी काबीलियत के साथ-साथ मां-बाप का सहमत होना भी जरूरी होता है, तभी बच्चों को खेलने का मौका मिलता है। भारत के पूरे ओलंपिक इतिहास में साइना ऐसी दूसरी महिला है जो मैडल लेकर लौट रही है। और इस कामयाबी को कम नहीं आंका जा सकता, क्योंकि इस गरीब देश में भी उसके जैसी खेल-सुविधाएं पाने वाली दसियों लाख लड़कियां रही होंगी, जिनके बीच से वह अकेली ही यहां तक पहुंच सकी।
निराशा के दौर से गुजर रहे इस देश में कामयाबी और खुशी का यह मौका, अपनी अहमियत से भी बहुत अधिक अहमियत का है, और इस मौके पर कुछ मीठा हो जाना चाहिए।

अंगरेज चले गए, तांदुला सौ बरस का हुआ, किसान बेमुआवजा तांदुला की हीरक जयंती की तैयारियां जोरों पर, ये गरीब किस बात की खुशी मनाएंगे?


बरतानियों द्वारा बनाए गए जिस जलाशय की हीरक जयंती मनाने की तैयारियां सरकार जोर-शोर से कर रही है और इसमें से निकलकर नहरों के जरिए लाखों-करोड़ों टन अनाज उत्पन्न करने वाले उपलब्धियों भरे आंकड़े भी अतिथियों के भाषण के लिए शासकीय कार्यालयों में इक_े कर समाहित किए जा रहे होंगे, उनमें शायद इस बात का जिक्र तो अवश्य होगा कि इस तांदुला ने लोगों के खेतों और खलिहानों को तो हरी-भरी बालियों से समृद्ध किया होगा, परंतु यह कटु सच्चाई कहीं भी नहीं झलकेगी  कि डुबान में आए 52 गांवों के उन सैकड़ों किसान परिवारों को एक शताब्दी बाद भी मुआवजा नहीं मिल पाया है। स्वाभाविकत:, जिन्होंने अपनी जमीनें समग्र विकास के लिए दी उनके वारिसान आज तक मुआवजे की राह तक रहे हैं। तख्त बदल गए, ताज बदल गए..., लेकिन अंसतुलित विकास की यह शायद सबसे त्रासद गाथा है कि चौथी पीढ़ी भी आज  तक अधिग्रहण के चिथड़ों में तब्दील हो चुके जमीनीं दस्तावेजों को समेटे हुए अपना हक पाने का सपना संजोए हुए हैं। 
छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 2 अगस्त। तांदुला जलाशय ने अपने सौ साल पूरे कर लिए हैं। इस वर्ष सिंतबर से दिसंबर के बीच ही कभी दो दिवसीय हीरक जयंती मनाई जाएगी। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री, राज्यपाल सहित कई विभागीय अधिकारी शामिल होंगे। 11 हजार एकड़ में बने तांदुला जलाशय की नींव आज से 105 साल पूर्व 1907 में रखी गई थी। इंजीनियरों की टीम की देख-रेख में  हजारों मजदूरों ने 5 साल में इसका निर्माण किया था। वर्ष 1912 में इस विशाल जलाशय का निर्माण पूरा हुआ था।

विस्थापितों को नहीं मिला था मुआवजा
ब्रिटिश शासन काल में बना तांदुला जलाशय लगभग 11 हजार एकड़ में बना। उस समय इस जलाशय के बनने से करीब 52 गांव डुबान में आए थे, लेकिन किसी को मुआवजा नहीं मिला। यह बात 'छत्तीसगढ़Ó से जल संसाधन विभाग दुर्ग के अधिकारियों एवं किसानों से चर्चा के दौरान कही। जिन किसानों के खेत जलाशय बनाते समय डुबान में आए उन्हें न तो कहीं दूसरी जगह बसाया गया और न ही किसी तरह उन्हें मदद मिली। अपने दादा-परदादा से सुनी-सुनाई बात के आधार पर बृजलाल सतनामी, सूरतराम, कमल, खिलेश्वर साहू ने बताया कि उस समय अंग्रेजों का एकछत्र राज था। किसी को उनके सामने मुंह खोलने की हिम्मत नहीं थी। इसके अलावा पढ़े-लिखे लोग गिने-चुने थे, मीडिया का बोलबाला नहीं था। डुबान में आने से कोई किसान कुछ भी नहीं बोल पाए। सभी को अपनी जान प्यारी थी, लिहाजा जिसे जहां जगह मिली वह वहीं स्थापित हो गया।    
फिर भी किसानों के खेत रहते हैं सूखे... 
सिर्फ सिंचाई के उद्देश्य से बना तांदुला जलाशय अपने 100 वर्षों के स्थापना काल में कई उपलब्धियां हासिल की है। जहा जलसंग्रहण क्षमता बढ़ी वहीं सिंचाई का स्तर भी बढ़ा है, लेकिन इसके बावजूद आज भी किसानों के खेत सूखे नजर आए। छत्तीसगढ़ ने जलाशय की हीरक जयंती पर दुर्ग से बालोद क्षेत्रों का दौरा किया, तो पाया कि किसानों के खेत में पानी नहीं है, कई गांव आज भी वर्षा के पानी पर निर्भर है। हालांकि जल संसाधन विभाग 500 गांवों में पानी सप्लाई की बात कर रहा हैं लेकिन इसके विपरीत कई गांव ऐसे हैं जहां जलाशय का एक बूंद पानी किसानों के खेत तक नहीं पहुंचता। गुंडरदेही, रानीतराई, मोरदा, सुयकोना, सेलूद, ओटेबंद, पिरदा, माटिया, बीरगांव, बागडूमर, तर्रा, सोंढ़, पैरी, आनंदगांव, अंडा, खप्परवार, डीकाडीह सहित 15-20 गांवों का दौरा करने पर पाया कि कहीं पर किसानों के चेहरे में खुशी हंै तो कहीं उदासी।
क्या कहते हैं किसान




गांव पैरी की आबादी लगभग 12 सौ से 15 सौ की है। इस गांव के 80 फीसदी लोग किसानी पर निर्भर हैं। सत्तर वर्षीय ओसल राम की तीसरी पीढ़ी किसानी कर रही है। चार एकड़ में दो फसल धान एवं लाखड़ी की बुआई करते हैं। ओसल ने बताया कि किसानों से प्रति एकड़ 100 रुपए के हिसाब से जलकर लिया जाता है, लेकिन जरूरत पर पानी नहीं मिलता। किसानों को जुलाई-अगस्त में पानी की जरूरत होती है, क्योंकि वह समय निंदाई व बियासी का होता है। लेकिन जलाशय से पानी अक्टूबर में छोड़ा जाता है। 
फुलझर गांव के किसान आसाराम के पास 6 एकड़ खेत है। आसाराम ने बताया कि 6 एकड़ में 8-10 क्विंटल धान निकलता है। बांध से सही समय पर पानी मिलता तो धान की पैदावार और बढ़ा जाती। किसान राधेश्याम ने बताया कि पानी की कमी के कारण खेत में एक ही फसल की बुआई होती है।
पारागांव निवासी सुखीराम का कहना है कि नहर बनाते समय उसका एक एकड़ खेत आ गया है। मुआवजा तो कुछ नहीं मिला, सिंचाई के लिए पानी भी नहीं मिलता। 700 की आबादी वाले इस गांव में न स्कूल है और न ही स्वास्थ्य केंद्र। दो-तीन किमी चलकर बच्चे स्कूल एवं बीमार स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचते हैं। इसी गांव के किसान गिरीराज साहू के 13-14 एकड़ खेत है। गिरीराज ने बताया कि कैनाल बनाते समय उसका 3-4 एकड़ खेत आ गया था। गिरीराज के दादा ने बताया कि कैनाल किसानों के हित में बनाया गया, ऐसे में किसी को भी मुआवजा नहीं मिला। गांव की सरपंच शांतिबाई पटेल, पंच रामरतन का कहना है कि 90 फीसदी किसानी करके जीवन का गुजारा कर रहे हैं। खेत में मात्र एक ही फसल होती है, इससे बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि हो रही है। गांव के युवा अब चाहते हैं कि उनके गांव में कोई उद्योग खुले ताकि बेरोजगारी दूर हो सके।
झलमला निवासी राजूलाल ढीमर की दो एकड़ जमीन है। उन्होंने बताया कि नहर का अंतिम छोर होने के कारण इस गांव में किसानों को बांध का एक बूंद पानी नहीं मिलता है। 900 की आबादी वाले इस गांव में किसानों की माने तो खेत को अभी बियासी के लिए पानी की जरूरत है लेकिन उनके खेत सूखे हैं। 
ग्राम पंचायत मटिया की आबादी लगभग 15 सौ होगी। किसानी पर आश्रित इस गांव में सिंचाई के लिए कैनाल तो है लेकिन यह काफी छोटा होने के कारण खेतों तक पानी की आपूर्ति नहीं हो पाती। गांव का युवा किसान अशोक यादव, अजित राम साहू, खोमन देवांगन, आधार सिंह डहरे, कार्तिक राम बघेल, फागूराम टंडन का कहना है कि खेत को पोटरीपानी (बियासी के बाद) के समय पानी की जरूरत होती है, लेकिन नहर की हाइट कम होने के कारण पानी नहीं मिलता है। दरअसल इस गांव में बने नहर की जलग्रहण क्षमता 9-10 इंच हैं लेकिन इसमें पानी सिर्फ ढाई से तीन इंच ही दिखा। इन किसानों की माने तो अगर ऊपर वाले की कृपा न हो तो किसानी करना संभव नहीं। चाराचार बोरगहन जैसे कई गांवों में खेत सूखे दिखे। हालांकि हर गांव की स्थिति ऐसी नहीं है। कुछ गांव में धान की ऊंची-ऊंची बालिया अपनी हरियाली को बखूबी बयां करती दिखीं।
मंत्री-नेता से करते पानी की गुहार
ग्राम पंचायत बोरगहन निवासी बृजेश, रतलाम, धानेश्वर का कहना है कि जरूरत पडऩे पर नेता-मंत्री से गुहार करते हैं। इन किसानों ने बताया कि उनका गांव काफी संपन्न है। अधिकांश खेतों में पंप होने के कारण पानी की किल्लत नहीं होती है, लेकिन जिनके पास पानी की व्यवस्था नहीं है उनके लिए आवश्यकतानुसार गांव के नेता-मंत्री से गुहार करके पानी का जुगाड़ कर लेते हंै। एक फसल सिर्फ धान के लिए सरोना एवं महमाया की बुआई करते हैं, जिसमें अच्छी-खासी आमदनी होती है। 
ब्रिटिश शासन काल में बने तांदुला जलाशय के इंजीनियरों की टीम के प्रमुख अभियंता सर एडम थे। उस समय में इसके निर्माण में 1 करोड़ 6 लाख 26 हजार 8 सौ 88 रुपए (1,06,26,888) की लागत आई थी। बांध से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि आज की तारीख में इस तरह के निर्माण लागत की कल्पना करें तो यह कम से कम 12 सौ करोड़ रुपए पहुंचेगी। तांदुला जलाशय की निर्माण तकनीक आज भी बेजोड़ है। गारे मिट्टी, सुरखी और पक्की लाल ईंटों से बने इस बांध की मजबूती आज भी जस की तस है। तांदुला जलाशय बालोद से लगभग 5 किमी दूरी पर स्थित है। यह प्रदेश की बड़ी योजनाओं में से हैं। 
भयंकर सूखे ने बनाया तांदुला
1907 में ब्रिटिश शासनकाल में भयंकर अकाल एवं सूखा पड़ा था। चारों तरफ भुखमरी थी। ऐसे में मजदूरों के सामने एक-एक दाने के लाले पड़े हुए थे। उस समय ब्रिटिश शासन ने मजदूरों से तांदुला जलाशय का निर्माण करवाया और उसके बदले उन्हें पैसे व अनाज दिया गया। सूखा नाला एवं तांदुला नदी को जोड़कर बने इस बांध के जरिए हजारों मजदूरों के घर न सिर्फ चूल्हा जला बल्कि उनकी गरीबी भी दूर हुई। ब्रिटिश अभियंता सर एडम के नेतृत्व में हजारों मजदूरों एवं सैकड़ों इंजीनियरों की मेहनत से बहुत कम समय में यह जलाशय बनकर तैयार हो गया था। विशाल बांध का जलग्रहण क्षेत्र 818 वर्ग किमी है, जबकि इसकी लंबाई 110 किमी है। अंग्रेजों का शासन काल में कुछ वर्षों तक तांदुला जलाशय की सिंचाई क्षमता 54000 हेक्टर थी जो आज बढ़कर 1 लाख 3 हजार हेक्टर तक पहुंच गई है।
बीएसपी से 42 करोड़ की आय
एशिया महाद्वीप के सबसे बड़े इस्पात संयंत्र भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) को उसके स्थापना काल (1954) से तांदुला बांध से 4 टीएमसी पानी की सप्लाई की जाती है। शासन से किए गए अनुबंध से बीएसपी यदि कम पानी लेता भी है तो उसे 90 फीसदी जलकर चुकाना पड़ता है। पूर्व में 8 रुपए 5 पैसे की दर से प्रति क्यूबिक मीटर पानी सप्लाई की जाती थी, जो इस साल बढ़कर 9 रुपए 26 पैसे हो गया है। वर्ष 2011-12 में बीएसपी ने 42 करोड़ 30 लाख 35 हजार रुपए जलकर चुकाया है। भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए दो जलाशय तांदुला एवं महानदी से पानी सप्लाई होती है। तांदुला का पानी पहले खरखरा जलाशय में संग्रहित करते हैं। इस तरह खरखरा जलाशय से 1600 मिलियन घन फुट (45.30 मिलियन घन मीटर) एवं महानदी परियोजना से 2400 मि.घ.फु (67.95 मि.घ.मी) पानी आबंटित किए जाते है।
किसानों से नही मिलता पूरा जलकर
पूर्णत: सिंचाई के उद्देश्य से बने  इस जलाशय से आज हजारों हैक्टर खेतों की प्यास बुझती है। तांदुला जल संसाधन दुर्ग के कार्यपालन अभियंता पी.के. अग्रवाल ने बताया कि तांदुला जलाशय अपने स्थापना के उद्देश्य को पूरा करते हुए वर्तमान में 1 लाख 3 हजार हैक्टर में सिंचाई कर रहा है। मात्र एक फसल (खरीफ) के लिए किसानों से प्रति एकड़ 91 रुपए जलकर लिया जाता है। इस तरह विभाग को हर साल कृषि से जितना जलकर वसूलने का लक्ष्य होता है वह पूरा नहीं हो पाता है। वर्ष 2011-12 में कृषि से 13 करोड़ 8 लाख 12 हजार रुपए वसूलने का लक्ष्य था, लेकिन मात्र 1 करोड़ 47 लाख 5 हजार रुपए वसूल हो पाए हैं। अधिकारियों का कहना है कि सरकार समय-समय पर किसानों का जलकर माफ करती हैं जिसके कारण हर साल कृषि से मात्र 8-10 फीसदी ही वसूली हो पाती है।
जलसंग्रहण-सिंचाई क्षमता बढ़ी
11 हजार एकड़ में बने तांदुला जलाशय में भी भविष्य में जल संकट हो सकता है, इसके लिए जलाशय का जल संग्रहण क्षमता बढ़ायी गयी। शुरूवाती दौर में बांध की ऊंचाई कम होने के कारण जलसंग्रहण क्षमता मात्र 9712 मि.घ.फीट थी। जल संग्रहण क्षमता बढ़ाने के लिए बांध की ऊंचाई 0.60 मीटर बढ़ाई गई जिससे आज इसकी संग्रहण क्षमता 10,674 मि.घ.फीट (302.21 मि. घ.मी.) हो गई है। जबकि इसमें औसत वर्षा का संग्रहण 50.09 इंच दर्ज है। निर्माण अवधि में जलाशय की सिंचाई क्षमता 54000 हेक्टर (सिर्फ खरीफ फसल) थी, जो बढ़कर 68219 हैक्टयर हो गई। वर्तमान में तांदुला जलाशय व गोंदली जलाशय से प्राप्त पानी नहरों के माध्यम से बालोद, दुर्ग एवं बेमेतरा जिलों के 6 विकासखंडों के 90000 हेक्टर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा दी जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि भविष्य में इसकी क्षमता बढ़कर 103000 हैक्टर करने का लक्ष्य है। 
रखरखाव में 15 करोड़ होते खर्च
तांदुला जलाशय का स्थापना खर्च 15 करोड़ रुपए हैं। वर्ष 2011-12 में जलाशय के रख-रखाव पर लगभग 6 करोड़ रुपए खर्च किए गए है। अधिकारी ने बताया कि जलाशय रख-रखाव पर जो खर्च होता है उसे मनरेगा के तहत किया जाता है। 
ढाई सौ करोड़ का नया प्रोजक्ट
तांदुला वैसे तो विशाल बांध है, लेकिन उसमें पानी का स्तर हमेशा कम रहता है। जल संसाधन विभाग दुर्ग ने दो साल पहले सरकार को ढ़ाई करोड़ का एक प्रोजक्ट दिया है। इस नए प्रजोक्ट का नाम प्रपोज कनेक्टिंग चैनल फार्म रविशंकर रिजरवायर-2 तांदुला रिजरवायर है। इसमें कहा गया है कि तांदुला का जलस्तर बढ़ाने के लिए महानदी बांध का पानी नहरों के माध्यम से तांदुला में लाया जाए। अगर ऐसा हो जाता है तो निश्चित ही तांदुला का जलस्तर बढ़ेगा जिससे सिंचाई भी अधिक होगी। अधिकारियों का कहना है कि विभाग द्वारा सर्वे कार्य पूरा कर लिया गया है। नए नवेले इस प्रोजक्ट में महानदी से तांदुला की लंबाई लगभग 40 किमी रूट को जोड़कर बनाया जाएगा। संभवत: 2013-14 में यह योजना लागू हो जाए।

हिरासत में अपमान करने वाले अफसरों से 5 लाख वसूल प्रताडि़त को दें-सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली, 4 अगस्त ।  सर्वोच्च न्यायालय ने 1992 में एक आयुर्वेदिक डॉक्टर को  हिरासत में प्रताडि़त करने के लिए छत्तीसगढ़ के पुलिस अफसरों की कड़ी आलोचना करते हुए राज्य सरकार को  इस अपमान से हुई मानसिक यातना की भरपाई के लिए डॉक्टर को 5 लाख रुपये देने को कहा है। अदालत ने कहा है कि यह रकम दोषी पुलिस अफसरों से वसूलकर डॉक्टर को दी जाए।
यह आदेश जस्टिस के एस राधाकृष्णन और दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने डॉ. महमूद नय्यर आजम की अपील पर दिया।  सितम्बर 1992 में  इस डॉक्टर पर कई मामले दर्ज किए गए थे। रायपुर पुलिस ने हिरासत में इस डॉक्टर  को एक तख्ती लेकर खड़ा किया जिस पर लिखा था कि वह चोर धोखेबाज और बदमाश है। पुलिस ने इस हाल में उसकी तस्वीर खींचकर उसे बंटवा दिया था। नय्यर आजम खनन माफिया के खिलाफ लोगों को संगठित कर रहे थे, और उच्च न्यायालय ने पुलिस के इस कृत्य को मानव अधिकारों का गम्भीर उल्लंघन माना था।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा- इसमें कोई शक नहीं कि अभियुक्त के साथ हिरासत में अपमान, और मानसिक यातना देने वाला बर्ताव करना मानवीय गरिमा के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
खंडपीठ ने कहा कि आईपीसी और विद्युत अधिनियम 2003 के  तहत पकड़े गए अपीलकर्ता को मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक हिरासत देने पर भी जेल ले जाने की बजाए अगले दिन पुलिस थाने लाया गया, और खुद के लिए अपमानजनक शब्द लिखी हुई  तख्ती पकड़कर खड़ा करके उनकी तस्वीर न केवल खींची गई, बल्कि उसे आम जनता के बीच बंटवा भी दिया गया। यह तस्वीर एक प्रतिवादी ने राजस्व प्रक्रिया में जमा भी करवाई।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा था  कि अपीलकर्ता को प्रताडि़त किया गया।
खंडपीठ के लिए फैसला लिखते समय जस्टिस मिश्रा ने कहा कि, हिरासत में रखे नागरिकों को संविधान की धारा 21 के तहत दिए गए नागरिक अधिकारों से वंचित न किया जाए। यह याद रखना पुलिस अधिकारियों का पुण्य कर्तव्य है। उसके मूलभूत अधिकारो में कटौती को कानून की मंजूरी मिली हुई है, लेकिन उसके बुनियादी अधिकार इतने भी खत्म नहीं कर दिए गए है कि पुलिस अधिकारी उसके साथ अमानवीय तरीके से बर्ताव कर सके।
खंडपीठ ने कहा, खुद को बहुत बड़ा समझने वाले कुछ खब्ती अफसरों की यह विकृत धारणा होती है कि वही कानून है, लेकिन वह भूल जाते हंै कि कानून,  हर बात में सही और न्यायोचित क्या है, यह तय करने, और एक सभ्य समाज की हिफाजत करने वाला विज्ञान है।
उल्लेखनीय है कि आजम के मानव अधिकारों का हिरासत में उल्लंघन होना मानने के बावजूद छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कहा कि मुआवजे की उनकी याचिका खारिज करते हुए उन्हें यह आवेदन राज्य सरकार के सामने करना चाहिए,  और  उसके द्वारा खारिज हो जाने के बाद उन्हें इसके लिए एक दीवानी मुकदमा दायर करना चाहिए। उच्च न्यायालय के इस फैसले पर खंडपीठ ने कहा- यह न केवल एक व्यक्ति को सीजऱ की जगह सीजऱ की पत्नी से अपील करने को कहना हुआ, यह अभिशप्त सिसिफस को पहाड़ की चोटी तक चट्टान ले जाने को कहने जैसा है जो चट्टान वहां से लुढ़कने पर अनगिनत बार यह कवायद करने को मजबूर है।
खंडपीठ ने कहा- इसमें शक नहीं कि  अपीलकर्ता असंवेदनशील पुलिस अधिकारियों के हाथों अपमानित हुआ है।  हो सकता है उसे  गरीबों, और बेसहारा लोगों की खातिर गुस्सा आया हो, लेकिन उसे दिया गया सामाजिक अपमान ऐसे हौसले पस्त करने वाला है।

क्या है सुप्रीम कोर्ट के फैसले में

पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव को दोषी अधिकारियों के खिलाफ उपयुक्त कार्रवाई करने निर्देश जारी करने को कहा। जज ने कहा कि याचिकाकर्ता को तख्ती पकडऩे मजबूर करके न केवल उसकी तस्वीर ली गई बल्कि उसे जनता में बांट भी दिया गया जिससे उसके स्कूल में पढ़ते बच्चों को मानसिक यातना पहुंची।
उच्च न्यायालय के जज ने अभियुक्तों से दुव्र्यवहार करने वाले अधिकारी पर उसके वरिष्ठ अधिकारी द्वारा कार्रवाई से संबंधित छत्तीसगढ़ पुलिस नियमन अधिनियम के नियम 737 का हवाला दिया।
विभिन प्रावधानों का जिक्र करते हुए जज ने राज्य के मुख्य सचिव से इस पर रिपोर्ट मांगी लेकिन 18 नवंबर 2005 को अदालत  को बताया गया कि मुख्य सचिव ने कोई  रिपोर्ट तब तक नहीं भेजी थी। आखिरकार दायर की गई रिपोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ता फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्र जारी करने समेत कई आपराधिक मामलों में शामिल था और 1992 में उसकी तस्वीर खींचने का निर्देश जारी किया गया था जो उसके नाम के आगे चस्पा की गई थी लेकिन 7 सितम्बर 1992 के बाद उसे हटा दिया गया था। मुख्य सचिव ने दोषी अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर करने की बात भी कही।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में बताया है कि आखिरी सुनवाई का वक्त आने पर उक्त जज ने मामला खंडपीठ को सौंप दिया जिसने उक्त जज के दिए गए विभिन्न आदेशों का उल्लेख करते हुए अपीलकर्ता को मुआवजे के लिए मुख्य सचिव को ज्ञापन देने को कहा, जिसे 19 मार्च 2010 को मुख्य सचिव के ओएसडी ने खारिज कर दिया।
इस आदेश में अपील कर्ता से कहा गया कि उसकी गिरफ्तारी और उसके खिलाफ आरोपपत्र कानूनी कार्रवाई थी जबकि पुलिस अधिकारियों द्वारा आपत्तिजनक  शब्दों के साथ  अपीलकर्ता की तस्वीर लेना कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ था जिसके लिए उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है।
मुख्य सचिव ने मुआवजे का आवेदन खारिज करते हुए कहा कि उनके द्वारा पत्नी की मानसिक अस्वस्थता, बच्ची की शादी में दिक्कत आदि कारणों से अवमानना के बदले मुआवजा मांगने की जहां तक बात है तो अवमानना का फैसला  कोई सक्षम अदालत  ही कर सकती है, और अदालत से अवमानना संबंधी कोई फैसला नहीं आया है इसलिए राज्य सरकार के लिए इस बारे में कोई फैसला लेना उपयुक्त नहीं होगा।
सर्वोच्च न्यायालय ने जोगिन्दर कुमार बनाम उ प्र सरकार मामले में फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यातना आत्मा पर लगा ज़ख्म है, जो हमेशा हरा रहता है, कभी नहीं भर पाता।
अदालत  ने सुनीलगुप्ता  व अन्य बनाम म प्र सरकार के फैसले का उल्लेख भी किया जिसमें अभियुक्तों को अदालत लाते ले जाते हथकड़ी पहनाने की वजह अदालत ने पूछी थी ताकि उसे मंजूर या ना मंजूर किया जा सके। अदालत को पता लगने पर  कि अभियुक्तों ने जनहित में धरना प्रदर्शन किया था उसने उन्हें हथकड़ी लगाने को अमानवीय करार दिया था। ऐसे अनेक उदाहरण देते हुए अदालत ने कहा कि यातना  के कई रूप हो सकते हंै, लेकिन हर बार वह अपनी ताकत दिखाने, और शारीरिक और  गहरी मानसिक चोट लगाने यातना पहुंचाने यातना दी जाती है।
अदालत ने कहा कि इसमें शक नहीं कि व्यक्ति की स्वतंत्रता राज्य की सुरक्षा से जुड़ी है लेकिन उसकी स्वतंत्रता  में कटौती  कानून के मुताबिक ही की जा सकती है। अदालत ने कहा कि  इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि धारा 499 में अवमानना के बारे में क्या कहा गया है। हमें यह देखना है  कानून से बंधे देश में संविधान की धारा 21 को सम्मान दिया जाए और एक नागरिक की गरिमा और सामाजिक छवि को चोट पहुंची है।
अदालत ने पूर्व के कई मामलों का जिक्र करते हुए अपीलकर्ता को 6 हफ्तों के भीतर 5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने यह रकम दोषी अफसरों से वसूलने का आदेश भी दिया।

कोल माफिया और अफसरों से लडऩे का इतना लंबा नुकसान हुआ
-डॉ. आजम 

विशेष संवाददाता
रायपुर, 4 अगस्त (छत्तीसगढ़)। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला डॉ. महमूद नय्यर आजम की एक लंबी लड़ाई के बाद आया है। इस बारे में आज जब उनसे इस अखबार ने फोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि वे सरगुजा में ताकतवर कोल माफिया के खिलाफ देश-प्रदेश के अखबारों में लगातार लिखते थे और इससे पुलिस से लेकर कोल इंडिया के बड़े अफसरों तक, और अपराधियों तक में उनके खिलाफ नाराजगी थी।
उन्होंने पूरी घटना याद करते हुए जुबानी एक सांस में बता दिया कि किस तरह 1992 में 22 सितंबर की रात उनको घर से ले जाकर पुलिस ने थाने में बंद कर दिया और उनके हाथ में एक स्लेट पट्टी थमाई जिसमें लिखा था-मैं चोर, बदमाश, ... हूं। और यह तस्वीर खिंचवाकर साजिश
(बाकी पेजï 5 पर)
करने वालों ने किसी मामले में तहसीलदार की अदालत में फाईल में लगवा दी और इस तस्वीर की कॉपियां बसों में बांटी। कोल माफिया और अफसरों से लडऩे का इतना लंबा नुकसान हुआ।
डॉ. आजम ने बताया कि उनके बच्चों का स्कूल आना-जाना भी इस तिरस्कार के कारण मुश्किल हो गया था। जब पुलिस और सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की तो फिर 1998 में पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग गए, और फिर हाईकोर्ट में उन्होंने केस किया। बिलासपुर हाईकोर्ट से 2010 में न्यायमूर्ति कुद्दूसी की दो सदस्यों की बेंच ने उनके पक्ष में आदेश तो दिया, लेकिन सरकार को मुआवजा देने की रकम नहीं बताई। इस फैसले के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट गए और वहां अभी उनके पक्ष में आदेश हुआ और राज्य सरकार को 5 लाख रूपये देने का आदेश हुआ है।
डॉ. आजम ने उनके साथ ज्यादती करने वाले पुलिसवालों के नाम भी बताए जिनमें एक सब इंसपेक्टर पीटर और एक एएसआई अनंत राम साहू थे। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अफसरों से वसूली करके यह मुआवजा देने को कहा है।
उन्होंने बिना कोई नाम बताए यह भी कहा कि इस पूरी साजिश में वहां का एक पत्रकार भी शामिल था, लेकिन वे अभी उस नाम पर चर्चा करना नहीं चाहते। उन्होंने कहा कि कोयले की अवैध खुदाई और अवैध कारोबार के खिलाफ अभियान चलाने का नतीजा उन्हें भुगतना पड़ा था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने चालीस पेज लंबे इस आदेश में उनके साथ इंसाफ किया है।

सत्ता-माफिया से टक्कर के बाद इंसाफ पाने में लगे बीस बरस


संपादकीय
4 अगस्त
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर आज इस अखबार के पहले पन्ने पर एक बड़ी रिपोर्ट छप रही है कि किस तरह छत्तीसगढ़ के सरगुजा में कोयला माफिया के खिलाफ शिकायतें करने वाले, और अखबारों में जानकारी भेजने वाले एक डॉक्टर से पुलिस ने कोयला अफसरों के साथ मिलकर बदसलूकी की और सामाजिक रूप से प्रताडि़त किया। इसके बाद जब इस डॉक्टर ने ऐसा करने वाले अफसरों के खिलाफ मानवाधिकार आयोग और अदालतों में लड़ाई शुरू की, तो उसके खिलाफ तरह-तरह के और मामले भी दर्ज हुए, जिनके बारे में हम सही या गलत होने की कोई बात यहां नहीं लिख सकते। लेकिन सुप्रीम कोर्ट से आए हुए आदेश में हाईकोर्ट और राज्य के अफसरों, दोनों के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की गई है, इसलिए यह मामला आज यहां लिखने के लायक है। 
आज देश भर में यह बात उठ रही है कि शिकायतों को उठाने वाले लोगों पर अगर हमले होते हैं तो उनकी हिफाजत के लिए कैसा कानून होना चाहिए। यह हर कोई जानता है कि छत्तीसगढ़ में कोयले का दो नंबर का कारोबार हजारों करोड़ सालाना का माना जाता है। इसमें कोयला कंपनी से लेकर राज्य शासन के स्थानीय अधिकारियों और कर्मचारियों तक की भागीदारी तय रहती है जिसके बिना इतना संगठित जुर्म नहीं हो सकता। इसी तरह छत्तीसगढ़ में खदानों और कारखानों की मनमानी और गुंडागर्दी के खिलाफ मामले उठाने वाले रायगढ़ के एक सामाजिक कार्यकर्ता रमेश अग्रवाल पर पिछले दिनों गोलियों से हमला हुआ, और हमलावरों का रिश्ता छत्तीसगढ़ की एक सबसे बड़ी कंपनी जिंदल से निकला है। ऐसे में अगर पुलिस भी चोरी-गुंडागर्दी करने वाले माफिया के साथ मिलकर किसी को प्रताडि़त करेगी, तो इस राज्य और देश की संपत्ति की लूटपाट, लोगों के साथ ज्यादती, जमीनों की अफरा-तफरी, इन सबकी आवाज उठाने का हौसला कौन कर सकेगा? 
सरगुजा के जिस मामले की चर्चा हम यहां कर रहे हैं उसमें पुलिस ने इस डॉक्टर के हाथों में एक तख्ती पकड़ाकर उस पर गालियां लिखकर, उसकी तस्वीर खींची और सामाजिक अपमान के लिए उसे बंटवा दिया। हम सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को एकदम सही मानते हैं कि ऐसा करने वाले अफसरों से वसूली करके इस आहत व्यक्ति को पांच लाख रूपए का मुआवजा दिया जाए। लेकिन सवाल यह है कि 1992 की घटना पर आज 20 बरस बाद यह इंसाफ मिल पा रहा है, तो हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक इतनी लंबी लड़ाई लडऩे की ताकत कितने लोगों में रहती है? आज ही इस अखबार के पहले पेज पर यह रिपोर्ट छपी है कि सौ बरस पहले अंग्रेजों के जमाने में बने हुए तांदुला जलाशय में गई जमीनों के लिए आज चार पीढ़ी बाद भी किसानों को मुआवजा नहीं मिल पाया है। यह पूरा मामला एक अलग जांच का मुद्दा है, और इसकी पड़ताल किए बिना सौ बरस का समारोह बेमायने भी रहेगा। 
तो एक तरफ तो सरकारी अमले की ऐसी ज्यादती कि किसी व्यक्ति को इस कदर अपमानित करना, उसके मानवाधिकार खत्म कर देना, दूसरी तरफ हमला करने वाले कारखानेदार शिकायतकर्ताओं को झूठे मामलों में फंसाकर महीनों तक उनकी जमानत न होने देने की ताकत भी रखते हैं, और तीसरी बात यह कि अदालत से इंसाफ मिलने में एक पूरी पीढ़ी गुजर गई तब जाकर मुआवजे का हुक्म हुआ है। देश की ऐसी ही हालत के चलते हुए कहीं जनता का भरोसा नक्सलियों पर होने लगता है, कहीं उसका भरोसा हाजी मस्तान पर हो जाता है, कहीं जनता फूलन के किस्म का इंसाफ पाने चली जाती है, कहीं पर बिहार में मुखिया का माफिया दरबार लगता है। इन सबके साथ-साथ देश में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जैसे अलोकतांत्रिक लोगों का भाव भी इसीलिए बढ़ता है कि लोकतंत्र के संस्थान बुरी तरह से नाकामयाब हो जाते हैं, हो चुके हैं। 
छत्तीसगढ़ सरकार को यह चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट तक जाकर सही साबित हुई इस शिकायत को एक नमूना मानकर वह अपनी खुद की व्यवस्था को एक बार ठोके-बजाए कि उसमें कहां इतनी कमजोरी थी, कहां उसमें इतनी मनमानी आ गई थी कि वह माफिया के साथ मिलकर एक शिकायतकर्ता को इस तरह से प्रताडि़त करने का हौसला रखती थी। सरगुजा से लेकर रायगढ़ तक, सत्ता और ताकतवर तबके की मनमानी को उठाने वाले लोगों को अगर कुचला जाएगा, तो फिर कुचले हुए लोगों का भरोसा लोकतंत्र से परे की ताकतों पर क्यों नहीं होगा? राज्य सरकार को न सिर्फ आज के नक्सल प्रभावित इलाकों पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि बाकी इलाकों को भी नक्सलियों का मुंह ताकने की नौबत से बचाना चाहिए।

जंतर-मंतर का तिलस्म निपटा


3 अगस्त 2012
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
कल शाम दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक जंतर-मंतर खत्म हुआ। एक तिलस्म की तरह तथाकथित जनआंदोलन को लोकतंत्र के विकल्प के रूप में पेश किया जा रहा था, पिछले कुछ बरसों में अनगिनत बार शुरू और खत्म हुए आमरण या बेमुद्दत अनशन को भी आज शाम खुद होकर खत्म करने का ऐलान अन्ना हजारे ने कर दिया है। इसके साथ ही जिस हकीकत को कल पहली बार माना गया, वह है अन्ना के, और उनके साथियों के राजनीतिक इरादे। अगले चुनाव में राजनीति करने या चुनाव लडऩे के बारे में कहा गया है, और हो सकता है कि शब्दों को कुछ आगे-पीछे करके ये बयान आए दिन के फेरबदल की तरह बदले जाएं, लेकिन कुल मिलाकर सार्वजनिक रूप से इतना तो मान ही लिया गया है कि अगले चुनाव में अन्ना हजारे और उनका आंदोलन शामिल रहेंगे, चाहे किसी भी हैसियत में। 
हर बार इस आंदोलन को भ्रष्टाचार के खिलाफ, अपने ही गढ़े हुए जनलोकपाल के समर्थन में, चुनिंदा राजनीतिक दलों और चुनिंदा नेताओं के खिलाफ एक साजिश सरीखे एक तरफा बेईमान अभियान की तरह शुरू किया गया और देश की सरकार को  बंधक बनाने की कोशिश की गई। कभी गांधीवादी होने का दिखावा करने वाले एक बुजुर्ग की धड़कन की नोंक पर, तो कभी देश के लिए कुर्बानी देने का दावा करने वाले नौजवान की गिरती सेहत की नोंक पर, इस देश की सरकार को, संसद को, पूरे लोकतंत्र को, इस टोली की अलोकतांत्रिक तानाशाही और मनमानी के साथ ब्लैकमेल किया गया। और इसे ही सबसे बड़ा लोकतंत्र बताया गया। इस आंदोलन को संसद का विकल्प बताया गया, लोकतंत्र की सारी संसदीय व्यवस्था को धराशाही करके एक अराजकता को बढ़ावा दिया गया और उसे ही जनता का हक बताया गया। सत्ता पर काबिज मौजूदा भ्रष्ट लोगों के विकल्प के रूप में संसद को टुकड़े-टुकड़े करके उसके मलबे को एक नई व्यवस्था बताया गया। और जनता का वह हिस्सा जिसकी राजनीतिक समझ किसी गंभीर और जटिल विश्लेषण में नहीं उलझ पाती, उसने अन्ना-टोली के इस आंदोलन को एक विकल्प मान भी लिया और इसके नारों से कुछ समय के लिए प्रभावित भी हो गई। यहां यह याद करना जरूरी है कि पड़ोस के पाकिस्तान के वोटर एक चुनाव में बेनजीर भुट्टो की पार्टी के लगाए गए इन बैनरों से भी प्रभावित हो गए थे कि-'न मां शरीफ, न बाप शरीफ, नवाज शरीफ-नवाज शरीफÓ। ऐसे किसी नारे से किसी के मां और बाप की शराफत जिस हद तक साबित हो सकती है, उसी हद तक अन्ना-टोली का आंदोलन संसदीय-लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प साबित हो रहा था। अब यह नौबत बेहतर है कि यह टोली अगले चुनाव में मैदान में रहेगी, अपने पसंदीदा उम्मीदवारों के साथ, और संसदीय लोकतंत्र के विकल्प को पेश करने का वह एक लोकतांत्रिक जंतर-मंतर होगा। 
जिस अन्ना-टोली को गांधीवादी और देश का आदर्श साबित करने की कोशिशें इस आंदोलन के हिमायतियों ने की, उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि पिछले कुछ चुनावों में, यूपीए, खासकर कांगे्रस पार्टी को नुकसान पहुंचाने की नीयत से उसने जिस तरह का चुनाव प्रचार किया, उस किस्म की दिलचस्पी उसने भाजपा के राज वाले कर्नाटक में रोज फट रहे बेईमानी के बमों के धमाकों को सुनते हुए भी क्यों नहीं दिखाई। उस तरह की तो छोड़ दें, अन्ना हजारे और उनकी बड़बोली टोली के रोजाना के घंटों के बयानों में भी कर्नाटक का क शायद ही सुनाई दिया जबकि इसी टोली के सबसे गंभीर सदस्य, जस्टिस संतोष हेगड़े ने कर्नाटक की लोकायुक्त की हैसियत से यहां की भाजपा सरकार के बेइंतहा और ऐतिहासिक भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच रिपोर्ट देश के सामने रखी थी। इस जांच रिपोर्ट पर मुंह खोलने की जहमत भी अन्ना की टोली के चेहरों ने नहीं की, जबकि इस टोली के चेहरे तकरीबन पूरे समय माईक के साथ ही देश को दिखते रहे। इस पूरे दौर में यह टोली उन तमाम लोगों को भ्रष्ट करार देती रही, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ होने का दावा करने वाले इस पक्षपाती आंदोलन के साथ खड़े नहीं थे। इसने भ्रष्टाचार के खिलाफ लडऩे के अपने तरीके, और अपने आंदोलन को अकेला मुमकिन तरीका मान लिया था, और जो साथ नहीं है वह भ्रष्ट है ऐसा भी मान लिया था। लोकतंत्र में ऐसे किसी एकाधिकार की कोई गुंजाइश नहीं है। इस देश की आजादी की लड़ाई में गांधी के अहिंसक आंदोलन की जगह भी थी, पूरी तरह वामपंथी विचारधारा वाले गैरअहिंसक भगत सिंह की भी जगह थी, इन दोनों से परे, हिटलर से परहेज न रखने वाले सुभाषचंद्र बोस की भी जगह थी, और इनमें से किसी ने भी एक-दूसरे को गद्दार नहीं कहा था। इसलिए अन्ना-टोली के तौर-तरीके पूरी तरह तानाशाह थे, तानाशाह हैं। एक लोकतांत्रिक भ्रष्ट भी एक ईमानदार तानाशाह से बेहतर ही होता है क्योंकि लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के खत्म होने की गुंजाइश रहती है, तानाशाही में लोकतंत्र की कोई जगह नहीं होती।
अन्ना हजारे के बारे में हम पहले भी कई बार इन बातों को लिख चुके हैं, कि किस तरह उन्होंने कैमरों के सामने ही शरद पवार पर हमला करने वाले, उन्हें थप्पड़ मारने वाले शर्मनाक मामले पर अपनी फूली न समाई जाने वाली खुशी जाहिर करते हुए कहा था-बस एक ही थप्पड़! इसके अलावा भी कभी वे गुजरात के लहू सने मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रशंसक बनते रहे, कभी वे सोनिया गांधी के खिलाफ ओछी बातें करते रहे, कभी वे राहुल गांधी को कोसते रहे, और पूरे ही दौर में उनकी जुबान तर्कहीन, अन्यायपूर्ण और ओछी रही। इस पूरी टोली ने विशेषणों को तथ्यों का विकल्प मान लिया और आरोपों को सुबूत का विकल्प। यह टीम आंदोलन के इस पूरे दौर में तानाशाही से गढ़े गए नारेनुमा विकल्पों को संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की तरह पेश करती रही। और जिस तरह एक मदारी के बेचे जा रहे तेल को भी फुटपाथ पर लोग उसकी जुबान के असर में आकर खरीद लेते हैं, कमोबेश उतने ही लोग, उसी तरह के झांसे में आकर अन्ना हजारे के आंदोलन के नारों को भारत के भविष्य के लिए एक विकल्प मान बैठे। लेकिन कोई मदारी किसी एक फुटपाथ पर लंबे समय तक मजमा नहीं जमा सकता, इसीलिए इस बार जंतर-मंतर पर सैकड़ों की भीड़ को हजारों में तब्दील करने के लिए भगवा रामदेव को लाया गया, उसके बाद नजारा कुछ बदला, और तब तक की नाकामयाबी के लिए मीडिया को एक बिके हुए षडयंत्रकारी की तरह कोसा गया, उस पर हमले किए गए।
भेडिय़ा हो या कोई और जानवर, जब वह अपनी ही असल खाल में होता है, तो वह बेहतर होता है। भेड़ की खाल पहनकर घात लगाने वाला भेडिय़ा अधिक खतरनाक होता है। अन्ना हजारे की टोली ने कल गैरराजनीतिक होने की खाल उतार दी। अब अगले चुनाव में उसके पास जीतकर आने, और मौजूदा प्रस्तावित लोकपाल विधेयक को, जनलोकपाल कानून बनाने, विदेशों से पैसा वापिस लाने, भ्रष्टाचारियों को चौराहे पर फांसी देने का कानून बनाने का पूरा हक रहेगा। यूपीए सरकार के मंत्रियों के साथ-साथ कहीं गलती से कर्नाटक के मंत्रियों को फांसी न लग जाए, इसके लिए कानून में खास रियायत करने का हक भी एक बड़ा बहुमत पाकर अन्ना हजारे की टोली गढ़ सकेगी। सवा अरब से अधिक आबादी में से उसे हजार से भी कम ईमानदार और भले लोग ढूंढकर चुनाव में खड़े करने और उन्हें जिताने का भी पूरा मौका उन्हें रहेगा। संसद के पहले होने वाले विधानसभाओं के चुनावों में भी वे एक-एक विधानसभा सीट के लाखों वोटरों में से एक-एक तो भले इंसान ढूंढ ही पाएंगे। और आज जैसा कि इस टोली का कहना है, इसके साथ पूरा देश खड़ा है, तो पूरे देश के एक-एक नोट और एक-एक वोट से ही पूरे देश में, सारे प्रदेशों में अन्ना की सरकार बन जाएगी। यह एक अधिक ईमानदार अभियान होगा, और इसकी ऐसी कामयाबी के बाद हम इसे पांच-पांच बरस सरकारें चलाने की शुभकामना भी देंगे।
पिछले कुछ बरसों में चौबीसों घंटे चलने वाले टीवी समाचार चैनलों की अपने माध्यम की अपनी सीमाएं हैं, और सीमाहीन गलाकाट मुकाबला उनके बीच पल-पल चलता है। इसलिए हवा में गूंजते नारे जमीनी हकीकत की तरह पेश किए जाते हैं, और विशेषणों को तथ्यों की तरह पेश किया जाता है। ऐसे मीडिया को बाबा, अन्ना या निर्मल बाबा जैसी नाटकीयता अपनी रोजी-रोटी के लिए माकूल बैठती है। इसलिए देश में नारों की फसल में मीडिया का यह हिस्सा खाद-पानी डालते रहता है। निर्मल बाबा इसके लिए लंबा-चौड़ा भुगतान करते थे, और अन्ना-बाबा को यह मीडिया अपने कारोबार के लिए मुफ्त में ही वैसा कवरेज देता था। इस कवरेज को पूरे देश का साथ मानने वाली अन्ना-टोली से देश के किसी भी तबके ने खुलकर यह सवाल नहीं किया कि कुछ राज्यों के कुछ हिस्सों से परे, कुछ तबकों से परे उनका साथ कहां और कितना रहा। चूंकि देश का मीडिया इन दिनों महानगरों में भी महज दिल्ली तक केंद्रित है इसलिए यह जंतर-मंतर परमाणु विज्ञान की तरह पेश किया जाता रहा। आने वाले दिनों में यह टोली चुनाव की एक भागीदार की तरह सामने रहेगी और उस वक्त अशोक पर्व मनाने वाला, पेडन्यूज के लिए बदनाम मीडिया किस तरह पेश आएगा, यह अन्ना भी देखेंगे और बाकी लोग भी। दूसरी बात यह भी कि यूपीए के खिलाफ खड़े, लेकिन अपने-आपको भाजपा से अलग बताते हुए अन्ना-टोली के उम्मीदवार जब राष्ट्रवादी मुद्दों को लेकर, शुचिता के नारों को लेकर चुनावी मैदान में रहेंगे तो राष्ट्रवादी-शुचिता के नारों पर चलने वाली भाजपा के अपने उम्मीदवारों का उसका क्या असर होगा? या तो भाजपा को नुकसान होगा, या फिर अन्ना की टोली की एक और खाल उतरेगी।
इस पूरे दौर में हमको सबसे अधिक निराशा उन वामपंथियों से हुई जिनकी विचारधारा तो अन्ना-बाबा जैसे करिश्मों के ठीक खिलाफ है, लेकिन जिन्होंने इन अलोकतांत्रिक और असंसदीय तौर-तरीकों का विरोध नहीं किया। भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर पूरी व्यवस्था को ढहा देने की कोशिशों को इसलिए चुप रहकर देखना कि उनसे एक भ्रष्ट यूपीए सरकार उजागर हो रही है, देश की जनता को एक गलत राजनीतिक शिक्षण पाने देने जैसा रहा। और वामपंथी चुप रहकर ऐसा होने देते रहे। हद तो तब हो गई जब सीपीआई के ए.बी. वर्धन अन्ना हजारे के मंच पर गए और आंदोलन के एक पहलू का उन्होंने समर्थन किया। इतिहास इस पार्टी की इस गलती को दर्ज कर चुका है, ठीक उसी तरह जिस तरह की सीपीआई ने आपातकाल का समर्थन किया था। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे अन्ना हजारे की राजनीतिक सरगर्मी बढ़ेगी इस मुद्दे पर हम बात आगे बढ़ाते रहेंगे।

हिंदुस्तान का बेअक्ल कानून


2 अगस्त 2012
संपादकीय 
शाहरूख खान को एक स्टेडियम में मैच के दौरान सिगरेट पीते कैमरे पर कैद किया गया, तो एक मुकदमे के बाद अब उन्हें सौ रुपए जुर्माना लगाकर छोड़ दिया गया। इस मामले में कोई कैद तो होनी भी नहीं थी, लेकिन इस मामले को चलाने में सरकार या अदालत का जितना वक्त लगा और शाहरूख खान जैसे अरबपति की पैसों की जो ताकत है उसके चलते यह इंसाफ बेअक्ल लगता है। कहने को लोग कानून के ऐसे अमल पर अंधा कानून कहते हैं, लेकिन हम इस भाषा से बचना चाह रहे हैं क्योंकि जो लोग कुदरत की मार से या किसी बीमारी या हादसे से आंखें खो चुके हैं, उन्हें गालियों की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 
भारत के कानून में किसी की दौलत के मुताबिक उस पर अधिक जुर्माना लगाने का अलग से कोई इंतजाम नहीं है। किसी कानून को तोडऩे पर एक गरीब को जितना जुर्माना लगता है, उतना ही जुर्माना एक अमीर को भी लगता है। पचीस हजार की एक मोपेड पर जो जुर्माना लगता है शायद वही जुर्माना लाख रुपए की मोटर साइकिल पर भी लगता है। हमारे हिसाब से यह होना चाहिए कि जुर्माना लोगों की कमाई और उनकी संपन्नता के अनुपात में तय हो। अगर सौ रुपए रोजी पर काम करने वाले इंसान पर सार्वजनिक जगह पर बीड़ी पीने पर सौ रुपए का जुर्माना होता है, तो शाहरूख खान या किसी भी दूसरे अरबपति पर जुर्माना उनकी एक दिन की कमाई जितना होना चाहिए, इसके बिना इंसाफ का यह इंतजाम एक मखौल से अधिक कुछ नहीं कहा जा सकेगा। 
लगे हाथों इस मुद्दे पर हम कुछ और बातें कहना चाहेंगे, कि ताकतवर तबकों के खिलाफ जब कमजोर तबकों के साथ ज्यादती करने के मामले चलते हैं तो इन दोनों की ताकतों के बीच फर्क जितना अधिक होता है, उतना ही अधिक जुर्माना होना चाहिए, उतनी ही अधिक सजा होनी चाहिए। एक सरकारी दफ्तर में बैठे कर्मचारी ने अगर किसी ठेकेदार से रिश्वत ली है और उस पर 5 हजार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है, और 6 महीने सजा का इंतजाम है, तो फिर वृद्धावस्था पेंशन मंजूर करने के लिए रिश्वत लेने पर इससे कई गुना अधिक जुर्माने और कई गुना अधिक सजा का कानून होना चाहिए। जुर्म अगर बराबरी के लोगों के बीच होता है तो वह एक अलग बात होती है, लेकिन जब ताकतवर एक कमजोर के खिलाफ जुर्म करता है तो उसे उसी दर्जे में नहीं रखा जाना चाहिए। इसलिए दौलत की ताकत, ओहदे की ताकत, अधिकारों की ताकत को देखते हुए जुर्माने और सजा में बढ़ोत्तरी होनी चाहिए। एक कार जो 2 लाख रुपए की है, उस पर जो जुर्माना है वही जुर्माना 50 लाख रुपए की कार पर अगर है, तो यह कानून बेअक्ल है। सुप्रीम कोर्ट को अपनी तरफ से ऐसा फैसला देना चाहिए और अगर यह संसद के अधिकार क्षेत्र की ही बात है तो संसद पर ऐसे फेरबदल के लिए जोर डालना चाहिए।
भारत की आज की न्याय व्यवस्था इतनी कमजोर और बेअसर है कि किसी गरीब को इंसाफ मिलने की संभावना कम ही रहती है। इसीलिए नक्सलियों के वैचारिक समर्थक यह मानते हैं कि इस लोकतंत्र में हिंसा के बिना सबसे कमजोर तबके को कभी इंसाफ नहीं मिल सकेगा। इस तस्वीर को बदलना, और नक्सलियों के हमदर्दों को कम करना है, तो इंसाफ को असरदार भी बनाना होगा, और उससे अमीरों और गरीबों के बीच, ताकतवर और कमजोर के बीच की संभावनाओं के फासले को भी खत्म करना होगा। शाहरूख खान तो एक सिगरेट पीने पर सौ रुपए का जुर्माना पूरी जिंदगी लगातार सिगरेट पीते हुए भी दे सकता है, फिर उसे सजा किस तरह की हुई? 
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असल जिंदगी की सुनामी के साथ बहकर आते मोती


1 अगस्त 2012
संपादकीय
ओलंपिक के खेलों को टीवी पर ध्यान से देखें तो उन लोगों को भी बहुत कुछ नसीहतें मिल सकती हैं जो खेलते नहीं हैं, या खेल की बारीकियों को नहीं समझते हैं। जब बरसों की मेहनत से तैयारी करने वाले लोग भी एक सेकंड के दसवें या शायद उससे भी कम हिस्से से पिछड़ जाने की वजह से एक मैडल का मौका खो बैठते हैं, तो उन्हें देखकर लोग यह तो समझ ही सकते हैं कि एक-एक पल कितना कीमती होता है और एक-एक कोशिश लोगों को कहां पहुंचा सकती है। 
अमरीका के जिस तैराक माइकल फेल्प्स ने ओलंपिक के इतिहास में सबसे अधिक गोल्ड मैडल पाने का जो रिकॉर्ड बनाया है उसे देखें और फिर यह देखें कि उसकी जिंदगी की शुरूआत कैसे हुई थी, वह कहां तक पहुंचा तो उससे भी बहुत कुछ सीखने मिल सकता है। बचपन में ही मां-बाप मेें तलाक हो गया और जब माइकल छठवीं क्लास में पहुंचा तो पता लगा कि उसे अटेंशन डेफिसिट हाईपरएक्टिविटी डिसऑर्डर है। वह किसी भी चीज पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता था। इस गंभीर मानसिक तकलीफ से गुजरते हुए भी उसने तैराकी सीखना शुरू किया और पन्द्रह बरस की उम्र में वह अमरीका के सात दशक का सबसे छोटा ओलंपिक तैराक बन गया। उसकी मानसिक तकलीफ और उसके बावजूद उसकी कामयाबी को मिलाकर जब लोग देखते हैं तो वह एक विशाल बनकर सामने आता है। पिछले बीजिंग ओलंपिक में जब उसने आधा दर्जन स्वर्ण पदक जीते थे तब खबरों में आई उसकी मां ने ऐसी तकलीफ (एडीएचडी) के शिकार बच्चों के मां-बाप के लिए कुछ सलाह भी मीडिया के मार्फत दी थी। उन्होंने कहा था कि सात बरस की उम्र में माइकल का हाल ऐसा था वह अपने चेहरे के गीला होने से चिढ़ता था और इसलिए वह तैराकी में मुंह ऊपर किए हुए बैकस्ट्रोक में डाला गया। और यही बात उसकी ताकत बनकर सामने आई। 
इस एक मिसाल पर और अधिक बात करना आज का मकसद नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि लगातार मेहनत, पक्का इरादा, और सही प्रशिक्षण से लोग कहीं के कहीं पहुंच जाते हैं। और यह बात सिर्फ खेल तक नहीं रहती। जिंदगी के हर पहलू में ऐसी कामयाबी पाई जा सकती है और इसके लिए हौसला बढ़ाने वाली बातों को खुद भी सोचना होता है और अपने आसपास के लोगों का हौसला बढ़ाना भी जिंदगी की ग्लास को आप चाहें ता आधा खाली देख सकते हैं, और आप चाहें तो आधा भरा देख सकते हैं। खेलों में ऐसा सोचने का नतीजा आपको स्वर्ण पदक तक ले जा भी सकता है और मुकाबले से बाहर भी कर सकता है। अभी दो दिन पहले जब खबरों का सैलाब था, तब भी हमने पहले पन्ने पर ओलंपिक की एक ऐसी टेबल-टेनिस खिलाड़ी की तस्वीर छापी थी जिसका एक हाथ कोहनी के नीचे नहीं था और वह एक हाथ से खेलते हुए, सर्विस करते हुए ओलंपिक तक पहुंची थी। पहले पन्ने पर उस तस्वीर को इतनी जगह देने का, और उसके लिए कई खबरों को रोकने का मकसद यही था कि उसे देखकर बहुत से लोगों का हौसला बढ़े और लोगों को राह सूझे। लोगों को यह भी याद होगा कि आमिर खान ने एक फिल्म बनाई थी और देश भर के दर्शकों का ध्यान इस बात की तरफ गया था कि कुछ किस्म की मानसिक दिक्कतों को झेलने वाले बच्चों को एक खास किस्म की परवरिश की जरूरत होती है और उनको वैसा साथ मिलने पर वे किसी भी ऊंचाई तक आगे बढ़ सकते हैं। 
तो खास जरूरत वाले लोगों से लेकर साधारण जरूरतों वाले लोगों तक हर किसी में आगे बढऩे की संभावनाएं असीमित रहती हैं, और इन संभावनाओं में सीमा अगर तंग होती है, तो यह अपने भीतर की हिचक से होती है या आसपास के लोगों की तंगदिली से। हर माहौल में लोग आगे बढ़ सकते हैं, माहौल माकूल न भी हो, तो भी वे अपने बूते किसी सीमा तक तो जा ही सकते हैं। आसपास की नकारात्मक बातों को लेकर, गैरबराबरी और बेइंसाफी को लेकर लोग घर बैठे रह सकते हैं, लेकिन दूसरी तरफ उसी माहौल में बहुत से लोग होते हैं जो आगे बढऩे की कोशिश करते हैं और बढ़ते भी हैं। आज यहां इस चर्चा को छेडऩे का एक मकसद यह भी है कि इसे पढऩे वाले लोगों को हम यह सुझा सकें कि अपने आसपास के बच्चों, और बड़ों से भी, ऐसी मिसालों की चर्चा करें। असल जिंदगी में नकारात्मक बातों की सुनामी रोज सुबह-शाम आती ही है। उसके बीच ऐसी लहरों के साथ बहकर आने वाले मोतियों को भी देखने की जरूरत है, और उसी से सबका भला हो सकता है। 

मीठा-मीठा गप्प, कड़वा-कड़वा थू


31 जुलाई 2012
संपादकीय
दिल्ली में अन्ना हजारे के आंदोलन को लेकर उनके कुछ साथियों ने मीडिया के बारे में भला-बुरा कहा है, और शायद कुछ बदसलूकी भी की है। इसे लेकर अन्ना हजारे का माफीनामा भी सामने आया है और उन्होंने यह कहा है कि उनके आंदोलन से मीडिया पर अगर हमले होंगे तो वे इस आंदोलन को ही खत्म कर देंगे। इन सारी बातों की बारीकियों में गए बिना आज ऐसे आंदोलनों और मीडिया पर बात की जा सकती है, क्योंकि लोगों के कहे हुए एक-एक शब्द पर बात करने से मुद्दे की बात धरी रह जाएगी और कुछ आंदोलनकारियों के आक्रामक अहंकार पर बात चली जाएगी, जो कि कम अहमियत वाली बात है। 
जो लोग मीडिया को एक गिरोह या एक टीम मानकर चल रहे हैं, उनको यह मालूम होना चाहिए कि विचारधाराओं और कारोबारी हितों के मामलों में बहुत बुरी तरह से बंटे हुए और आपस के गलाकाट मुकाबले में ओवरटाईम करते हुए मीडिया के बीच किसी तरह का कोई एका नहीं है। हकीकत तो यह है कि अगर मुकाबले की दौड़ वाले मीडिया का बस चले तो एक मीडिया कारोबार दूसरे मीडिया कारोबार के ठीक खिलाफ बोलने या लिखने लगे, जिससे कि वह अलग दिख सके और अधिक टीआरपी बटोर सके या अधिक पाठक जुटा सके। टीम इंडिया की मीडिया की समझ चाहे जो हो, जो लोग मीडिया को जानते हैं वे यह बात भी अच्छी तरह जानते हैं कि इमरजेंसी से लेकर अब तक भारत के मीडिया में वैचारिक विविधता कायम रही है, और आपातकाल के जुल्म के उस दौर में जब मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे तब भी मीडिया पूरी तरह न खत्म हुआ था, न बिक गया था। बहुत से पत्रकार उस दौरान भी मीडिया-एक्टिविस्ट की तरह काम करते रहे, और बाद में भी उन्होंने आपातकाल का इतिहास दर्ज किया। इसलिए संजय गांधी के जूते साफ करने वाले अखबारों से लेकर सेंसरशिप के खिलाफ लिखने वाले अखबारों तक बहुत किस्म की विचारधारा के अखबारनवीस उस दौर में भी थे। और आज तो हाल यह है कि देश में इतने किस्म की पार्टियों की राज्य सरकारें हैं, अखबारों के इतने संस्करण हैं, टीवी चैनलों के इतनी राज्य सरकारों से इश्तहार मिलते हैं, देश के बड़े कारोबारी और बड़े कारखानेदार कांगे्रस और भाजपा की विचारधाराओं और उनके नेताओं से संबंधों को लेकर अलग-अलग गिरोहबंद हैं कि किसी भी एक दिशा में इस देश के मीडिया को कैसे मोड़ा जा सकता है? जो मीडिया किसी एक प्रदेश तक सीमित है, उस पर तो उस प्रदेश के अपने कारोबारी हितों का असर सीधा हो सकता है। लेकिन अन्ना के साथी आज जब पूरे देश के मीडिया, और खासकर दिल्ली में डेरे वाले, राष्ट्रीय कहे जाने वाले मीडिया पर भी हमला कर रहे हैं, तो उनकी इस खीझ का कोई वजन नहीं है। 
दरअसल अन्ना हजारे और उनके साथियों के साथ एक बहुत बड़ी वैचारिक दिक्कत है। उनमें लोकतांत्रिक विविधता न तो है, न उन्हें उसकी समझ है, और न ही ऐसी किसी विविधता में उनकी आस्था है। इसलिए वे लोकपाल मसौदा कमेटी में समाज की तरफ से आने वाले सभी पांच प्रतिनिधि अपनी ही टोली के बनाते हैं, जो उनके साथ नहीं है उसे वे भ्रष्टाचार का साथी मान लेते हैं। यह उसी किस्म का है जैसे कि एक वक्त अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने यह मुनादी की थी कि जो कोई सद्दाम हुसैन पर हमले में अमरीका के साथ नहीं है वह आतंक के साथ है। आज अन्ना हजारे का सारा आंदोलन उन तमाम तबकों को, ताकतों को, लोगों को खुलेआम भ्रष्ट या भ्रष्टचारियों का साथी कह रहा है जो कि आंदोलन के उनके तरीके से सहमत नहीं हैं। यह तरीका न गांधीवादी है और न लोकतांत्रिक है। ऐसे में पिछले कुछ दिनों से मीडिया को कोसते हुए अन्ना हजारे के बड़बोले और अहंकारी साथी जो कुछ कह रहे हैं, वह सिर्फ उनकी भड़ास है, मीडिया की हकीकत नहीं। न सिर्फ देश में, बल्कि प्रदेशों में भी मीडिया की अपनी पसंद और नापसंद है, जो कभी विचारधारा और नीतियों के आधार पर तय होती है तो कभी कारोबारी हितों के आधार पर। आज पूरे देश में ऐसी कोई पार्टी या सरकार नहीं है, ऐसे कोई कारोबारी गिरोह नहीं है जो कि मीडिया के एक बड़े हिस्से को भी खरीद सकें। और फिर अन्ना हजारे के खिलाफ जिस मीडिया के पूर्वाग्रहग्रस्त होने का आरोप अन्ना के साथी लगा रहे हैं, वही मीडिया तो यूपीए सरकार के सारे भ्रष्टाचार का उजागर करते आया है और केंद्र सरकार की सबसे बड़ी फजीहत अन्ना की टीम से परे के लोगों ने की है, या फिर मीडिया ने की है। अपने हाथों में अगर भ्रष्टाचार विरोध का एक बैनर हो, और उसके पीछे चलने से कुछ लोग असहमत हों, तो उन तमाम लोगों को भ्रष्ट कह-कहकर अन्ना हजारे के साथी जनसमर्थन-मीडिया समर्थन खो ही रहे हैं। क्या टीम-अन्ना के पास इस बात का जवाब है कि पवार को थप्पड़ मारने की अन्ना हजारे की तारीफ कैसा गांधीवाद था? क्या उसके पास इस बात का जवाब है कि कर्नाटक की भाजपा सरकार के जिस दानवाकार भ्रष्टाचार को अन्ना-टीम के ही जस्टिस हेगड़े ने पकड़ा, और उसके खिलाफ इस आंदोलन का मुंह क्यों नहीं खुलता? और ऐसी अनगिनत दूसरी मिसालें हैं, लेकिन उन सबके लिए यहां जगह कम है और हम उन्हें दर्जनों बार इसी जगह लिख भी चुके हैं।
हर आंदोलन वे तमाम नुकसान झेलते ही हैं, जिसके लायक हरकतें उसके नेता करते हैं। इसलिए अन्ना हजारे का आज का मीडिया से माफी मांगना गैरजरूरी भी है और नाकाफी भी है। एक जनआंदोलन चलाने वालों को जनमत बनाने या बिगाडऩे की मीडिया की सीमित या असीमित ताकत, और पूरे मीडिया को एकमुश्त खरीदने की संभावना या ऐसा नामुमकिन होने का फर्क अगर नहीं है, तो इससे उनके आंदोलन को ही नुकसान पहुंचता है। मीडिया की विश्वसनीयता या उसकी साख की कमी बहुत से दूसरे मामलों से तय होती है, इसमें बहुत ठोस वजहों से पिछले बरसों में वैसी ही गिरावट आई है जैसी भारतीय समाज के किसी भी दूसरे दायरे में। लेकिन अन्ना हजारे की टीम के आरोपों से इस साख में खरोंच भी नहीं आ पा रही क्योंकि यह खीझ से चलाया गया पंजा है, जिसके नाखूनों में धार नहीं होती। कल तक जब भारतीय मीडिया रात-दिन अन्ना हजारे के आंदोलन को एक बड़ा आंदोलन मान रहा था तब तक वे मीडिया के शुक्रगुजार थे, और आज जब उनकी अपनी हरकतों की वजह से, गैरजिम्मेदार गालीगलौच की वजह से वह विश्वसनीयता खो रहा है, जनसमर्थन खो रहा है तो मीडिया के आज के आईने में दिखती इस कमजोर तस्वीर पर टीम अन्ना थूक  रही है। इस थूक तले हकीकत की तस्वीर दबती नहीं। इसके बजाय इस आंदोलन को अपनी इस नौबत पर आत्मविश्लेषण करना चाहिए और इसके राजनीतिक मकसद को ईमानदार बनाना चाहिए।