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छोटे से गांव का बड़ा सा हौसला


गरियाबंद से लौटकर गंगा सिंह ठाकुर 
सढ़ौली के पौने दो सौ नौजवान सुरक्षा बलों में

तस्वीरें- संतोष तिवारी रायपुर, 17 सितंबर। गरियाबंद जिला मुख्यालय से महज दो किलोमीटर दूर स्थित सढ़ौली गांव के युवकों में देश प्रेम का जज्बा देखते ही बनता है। दो हजार की अबादी वाले इस गांव के पौने दो सौ युवा सीआरपीएफ, एसएफ, कोबरा बटालियन, आईटीबीपी, जिला पुलिस और नगर सेना में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में गांव के तीन जवान शहीद हो गए हैं। उनकी याद में गांव में स्मारक बनवाए गए हैं। गांव के लोगों को युवाओं पर नाज है, पर उन्हें इस बात का डर हमेशा रहता है कि नक्सली लोग पुलिस वालों को अपना दुश्मन मानते हैं। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि बस्तर में चल रहा संघर्ष खत्म होना चाहिए। 


सढ़ौली गांव का इतिहास करीब 70 वर्ष पुराना है। यह गांव आजादी के पहले से बसा हुआ है। ग्राम पंचायत की जनसंख्या लगभग दो हजार है। यहां हल्बा (आदिवासी)जाति के लोग अधिक संख्या में निवास करते हैं। इसके अलावा गोंड, साहू और ब्राम्हण समाज के लोग भी यहां दशकों से हैं। गांव के कई परिवार ऐसे हैं जहां के 3 से 4 बेटे पुलिस में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। हाल ही में गांव के जवान भृगुनंदन चौधरी जो कि कोबरा बटालियन गया (बिहार) में पदस्थ थे। 
नक्सल मुठभेड़ में गया में शहीद हो गए हैं। परिवार के लोग इस दुख से अभी तक नहीं उबर पाए हैं। इस परिवार के मुखिया नरहरराम जिला बल में आरक्षक के पद पर कार्यरत हैं। हरदेव के दो पुत्र चेतक कुमार बीएसएफ में और डायमंड कुमार सीआईएसएफ में है। अपने अविवाहित पुत्र भृगुनंदन की शहादत को पिता भूल नहीं पा रहे हैं। वे अभी भी छुट्टी पर चल रहे हैं। वे कहते हैं कि इस गांव के युवा पुलिस की नौकरी पसंद करते हैं। युवाओं को गांव के लोग भी प्रोत्साहित करते हैं।  
नरहर राम ने बताया कि उनके परिवार का एक और जवान कालेश्वर सिंह बीएसएफ दिल्ली में पदस्थ था। 6 दिसंबर 2000 को ट्रेनिंग के दौरान तबियत खराब हो जाने से उसकी मौत हो गई थी। कालेश्वर को पढ़ाने वाले शिक्षक दौवाराम ने उसकी याद में गांव में प्रतिमा बनाई है। यह प्रतिमा गांव के युवओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। इसके अलावा नारायणपुर में एसएफ में पदस्थ इस गांव के युवक डिगेश्वर शांडिल्य भी शहीद हो चुके हैं। यहां निवासरत लोगों की  आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, पर वे अपनी मेहनत और लगन से बेरोजगारी के कलंक को मिटा रहे हैं। इस माह 7 और युवाओं का नगर सेना में चयन हुआ है। 
गांव के 72 वर्षीय भैयाराम नाग के घर जब यह संवाददाता और छायाकार पहुंचे तो वे कुछ समय के लिए वे सहम गए। वे हमें खुफिया विभाग (दादा) के लोग समझ बैठे थे। परिचय देने के बाद उन्होंने बताया कि उनके चार बेटे पुलिस में है। दो पुत्र प्रेमलाल एवं एकेश्वर कुमार जिला बल में है। तीसरा पुत्र सदानंद असम रायफल में और चौथा पुत्र त्रिलोचन नाग बीएसएफ में तैनात है। श्री नाग ने बताया कि वे पेशे से टेलर रहे हैं। उन्होंने अपने चारों बेटों से कहा था कि उनके पास धन-दौलत नहीं है पढ़ लिख लोगे तो हमाली करने से बच जाओगे। बेटों ने उनका सपना साकार  किया।
गांव के हरदेव प्रसाद दुबे को भी दूसरे लोगों की तरह अपने दो पुत्रों पर गर्व है। उनके दो पुत्र पीताम्बर प्रसाद एसएफ और टेमन लाल जिला बल में है। उन्होंने बताया कि वे इस बात से बहुत खुश हैं कि सुविधाओं के अभाव में भी गांव के युवा इतिहास रच रहे हैं। 
गांव के शिक्षक केजूराम, अवधराम और बिंदुराम ने बताया कि गांव में धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। यहां राधा कृष्ण मंदिर में हर मंगलवार को रामायण पाठ होता है। गांव वालों के सहयोग से तीन मानस भवन बनवाए गए हैं। धार्मिक आयोजनों में युवाओं की भी भागीदारी होती है। इससे उन्हें सद्विचार और अच्छे कार्य करने की शिक्षा मिलती है। गांव में धान रखने के लिए दो हल्बा कोठी है जहां करीब दो सौ गाड़ा धान रखा जा सकता है। गांव के युवा पुलिस की भर्ती निकलने पर एक-दूसरे को बताते हैं। वे इसके लिए आवश्यक तैयारियां भी मिल-जुलकर करते हैं। जब किसी का चयन पुलिस में हो जाता है तो गांव-समाज के लोग उसका सम्माान करते हैं। इस गांव के युवाओं को वर्दी पर घमंड नहीं गर्व है। 
जर्जर भवन में पढ़ते हैं बच्चे
गांव के सरपंच बसंत कुमार शाडिल्य खुद 8वीं तक ही पढ़ सके इसका उन्हें दुख है। उन्होंने बताया कि गांव में हाईस्कूल तक की कक्षाएं चल रही हैं। कक्षा लगाने कमरों की कमी है। हाईस्कूल की पढ़ाई जर्जर भवन में हो रही है। उन्होंने स्कूल में एक योग शिक्षक की भी जरूरत बताई । उनका कहना है कि बच्चे शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ्य रहेंगे तो अच्छे इंसान बनेंगे। 
सांसद-विधायक की घोषणाओं पर अमल नहीं
जिला मुख्यालय गरियाबंद से सढ़ौली दो किलोमीटर और खट्टी गांव 7 किलोमीटर है। खट्टी गांव तक सड़क नहीं बन पाई है। कच्ची सड़क पर इतने गड्ढ़े है कि बारिश में लोगों को सड़क किनारे खेत से होकर चलना पड़ता है। सढ़ौली गांव की सड़क बनाने सांसद चंदूलाल साहू, विधायक डमरूधर पुजारी कई बार घोषणा कर चुके हैं, उनकी घोषणा पर अमल नहीं हुआ है। इस मांग को लेकर गांव के लोग पिछले दिनों कलेक्टर दिलीप वासनिक से मिलने भी पहुंचे थे। उन्होंने बारिश के बाद सड़क निर्माण कार्य शुरू करवाने का आश्वासन दिया है। 

235 एकड़ जंगल फर्जी पट्टे बना 50 करोड़ में बेचा


माइनिंग कंपनी को फायदा पहुंचाने पूर्व कलेक्टर, डीएफओ भी फंसे
राजस्व मंडल में भी हुआ खेल अब निरस्त करवाने रिवीजन
शशांक तिवारी
रायपुर, 21 अगस्त। सरगुजा जिले के रामचंद्रपुर इलाके में करीब 50 करोड़ के जमीन घोटाला मामले की जांच पूरी हो गई है। सरकारी और घने जंगल की जमीन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे बेचने की अनुमति देने के लिए तत्कालीन कलेक्टर जी.एस.धनंजय को जिम्मेदार ठहराया गया है। इस मामले में डीएफओ और एसडीएम के खिलाफ भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। राजस्व बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष टी.राधाकृष्णन ने जमीन को फर्जी पट्टे पर चढ़ाने की अनुमति दी थी। इस मामले में रेवेन्यू बोर्ड में रिवीजन केस दायर किया जा रहा है। 
जमीन घोटाले पर सरकार ने सरगुजा कमिश्नर से जांच रिपोर्ट मांगी थी। कमिश्नर एम.एस.पैकरा ने अपनी रिपोर्ट राज्य शासन को भेज दी है। रामचंद्रपुर  ब्लॉक के इंदरपुर में कोल ब्लॉक के लिए 94 हेक्टेयर (करीब 235 एकड़) सरकारी जमीन निजी कंपनी फतेहपुर माइनिंग लिमिटेड को बेच दी गई। घोटाले का मास्टर माइंड लालजी यादव को बताया गया है। कमिश्नर ने जांच के बाद यादव समेत पटवारी, नायब तहसीलदार, उप पंजीयक सहित अन्य दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के भी निर्देश दे दिए हैं। जमीन बेचने की अनुमति निरस्त करने के आदेश कलेक्टर को दिए गए हैं। 
बताया गया कि इस मामले की जांच के लिए जल संसाधन मंत्री रामविचार नेताम ने भी अनुशंसा की थी। मुख्य सचिव सुनील कुमार ने भी स्थानीय नेताओं की शिकायत पर राजस्व विभाग से रिपोर्ट मांगी है। कमिश्नर श्री पैकरा ने 'छत्तीसगढ़Ó से चर्चा में बताया कि उन्होंने जांच रिपोर्ट राज्य शासन को भेज दी है। सूत्रों के मुताबिक तत्कालीन कलेक्टर धनंजय के अलावा तत्कालीन डीएफओ वी.एस.ध्रुव, एसडीएम राठौर को गलत तरीके से अनुमति देने के  मामले में जांच रिपोर्ट में जिम्मेदार ठहराया गया है। यह बताया गया कि पट्टा 34 लोगों को 1972 में आबंटित किया जाना बताया  गया। जबकि उक्त प्रकरण तहसील कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। 
राजस्व पट्टा को देखने से यह पता चलता है कि पुराने दस्तावेज हासिल कर नाम चढ़ाए गए हैं। जबकि वर्ष 72 में राजस्व पट्टे के दस्तावेज अलग तरीके के थे। जिन लोगों के नाम से पट्टे जारी किए गए उनमें से कई लोग उस वक्त पैदा भी नहीं हुए थे। यह भी पता चला है कि कथित पट्टाधारी लोगों में से कई पड़ोसी राज्य झारखंड के रहवासी हैं। सूत्र बताते हैं कि फर्जी तरीके से खरीद-बिक्री में जिला प्रशासन के ऊपर से नीचे तक तमाम अफसरों की भूमिका रही है। कथित पट्टाधारियों ने नायब तहसीलदार के यहां जमीन बेचने के लिए अनुमति मांगी।
नायब तहसीलदार ने जांच कर प्रतिवेदन कलेक्टर को भेज दिया और कलेक्टर ने जमीन बेचने की अनुमति दे दी। दिलचस्प बात यह है कि पट्टे की जमीन बेचने की अनुमति देने के मामले में कलेक्टर ही अधिकृत होते हैं। नायब तहसीलदार को अपने यहां प्रकरण दर्ज करने का भी अधिकार नहीं होता। लेकिन इस मामले में प्रक्रिया उलट दी गई। तत्कालीन डीएफओ ने अपनी रिपोर्ट में जमीन वृक्षारोपण योग्य बता दिया था। जबकि उसके बड़े हिस्से में अभी भी सघन वन है। इसे बेचने की अनुमति नहीं दी जा सकती। 
यह बात सामने आई है कि जमीन एसकेएस इस्पात को बेचने की कलेक्टर ने अनुमति दी थी। लेकिन फतेहपुर माइनिंग लिमिटेड के नाम से रजिस्ट्री कर दी गई। इस पूरे मामले में उप पंजीयक को भी दोषी ठहराया गया है। पटवारी से लेकर नायब तहसीलदार और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश कमिश्नर द्वारा पहले ही दिए जा चुके हैं। 
फर्जी पट्टे बनाकर जंगल की जमीन को बेचने के इस षडय़ंत्र के खुलासे के बाद हड़कंप मचा हुआ है। 235 एकड़ जमीन को मात्र 50 करोड़ रुपए में बेच दिया गया है जबकि इस जमीन पर करोड़ों के सिर्फ पेड़ ही हैं। यह कोल ब्लाक एसकेएस इस्पात और प्रकाश इण्डस्ट्रीज को आबंटित हुआ है। जमीन की इस अफरा-तफरी के खुलासे से अधिकारी भी भौंचक हैं। इस मामले में प्रारंभिक तौर पर सिर्फ पटवारी और नायब तहसीलदार का ही निलंबन हुआ है। कमिश्नर की जांच रिपोर्ट के बाद जमीन की अनुमति देने वाले अफसरों के अलावा खरीद-बिक्री करने वालों पर भी कार्रवाई होने की संभावना है। शासन जल्द ही इस मामले में कार्रवाई कर सकता है। 

अंगरेज चले गए, तांदुला सौ बरस का हुआ, किसान बेमुआवजा तांदुला की हीरक जयंती की तैयारियां जोरों पर, ये गरीब किस बात की खुशी मनाएंगे?


बरतानियों द्वारा बनाए गए जिस जलाशय की हीरक जयंती मनाने की तैयारियां सरकार जोर-शोर से कर रही है और इसमें से निकलकर नहरों के जरिए लाखों-करोड़ों टन अनाज उत्पन्न करने वाले उपलब्धियों भरे आंकड़े भी अतिथियों के भाषण के लिए शासकीय कार्यालयों में इक_े कर समाहित किए जा रहे होंगे, उनमें शायद इस बात का जिक्र तो अवश्य होगा कि इस तांदुला ने लोगों के खेतों और खलिहानों को तो हरी-भरी बालियों से समृद्ध किया होगा, परंतु यह कटु सच्चाई कहीं भी नहीं झलकेगी  कि डुबान में आए 52 गांवों के उन सैकड़ों किसान परिवारों को एक शताब्दी बाद भी मुआवजा नहीं मिल पाया है। स्वाभाविकत:, जिन्होंने अपनी जमीनें समग्र विकास के लिए दी उनके वारिसान आज तक मुआवजे की राह तक रहे हैं। तख्त बदल गए, ताज बदल गए..., लेकिन अंसतुलित विकास की यह शायद सबसे त्रासद गाथा है कि चौथी पीढ़ी भी आज  तक अधिग्रहण के चिथड़ों में तब्दील हो चुके जमीनीं दस्तावेजों को समेटे हुए अपना हक पाने का सपना संजोए हुए हैं। 
छत्तीसगढ़ संवाददाता
रायपुर, 2 अगस्त। तांदुला जलाशय ने अपने सौ साल पूरे कर लिए हैं। इस वर्ष सिंतबर से दिसंबर के बीच ही कभी दो दिवसीय हीरक जयंती मनाई जाएगी। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री, राज्यपाल सहित कई विभागीय अधिकारी शामिल होंगे। 11 हजार एकड़ में बने तांदुला जलाशय की नींव आज से 105 साल पूर्व 1907 में रखी गई थी। इंजीनियरों की टीम की देख-रेख में  हजारों मजदूरों ने 5 साल में इसका निर्माण किया था। वर्ष 1912 में इस विशाल जलाशय का निर्माण पूरा हुआ था।

विस्थापितों को नहीं मिला था मुआवजा
ब्रिटिश शासन काल में बना तांदुला जलाशय लगभग 11 हजार एकड़ में बना। उस समय इस जलाशय के बनने से करीब 52 गांव डुबान में आए थे, लेकिन किसी को मुआवजा नहीं मिला। यह बात 'छत्तीसगढ़Ó से जल संसाधन विभाग दुर्ग के अधिकारियों एवं किसानों से चर्चा के दौरान कही। जिन किसानों के खेत जलाशय बनाते समय डुबान में आए उन्हें न तो कहीं दूसरी जगह बसाया गया और न ही किसी तरह उन्हें मदद मिली। अपने दादा-परदादा से सुनी-सुनाई बात के आधार पर बृजलाल सतनामी, सूरतराम, कमल, खिलेश्वर साहू ने बताया कि उस समय अंग्रेजों का एकछत्र राज था। किसी को उनके सामने मुंह खोलने की हिम्मत नहीं थी। इसके अलावा पढ़े-लिखे लोग गिने-चुने थे, मीडिया का बोलबाला नहीं था। डुबान में आने से कोई किसान कुछ भी नहीं बोल पाए। सभी को अपनी जान प्यारी थी, लिहाजा जिसे जहां जगह मिली वह वहीं स्थापित हो गया।    
फिर भी किसानों के खेत रहते हैं सूखे... 
सिर्फ सिंचाई के उद्देश्य से बना तांदुला जलाशय अपने 100 वर्षों के स्थापना काल में कई उपलब्धियां हासिल की है। जहा जलसंग्रहण क्षमता बढ़ी वहीं सिंचाई का स्तर भी बढ़ा है, लेकिन इसके बावजूद आज भी किसानों के खेत सूखे नजर आए। छत्तीसगढ़ ने जलाशय की हीरक जयंती पर दुर्ग से बालोद क्षेत्रों का दौरा किया, तो पाया कि किसानों के खेत में पानी नहीं है, कई गांव आज भी वर्षा के पानी पर निर्भर है। हालांकि जल संसाधन विभाग 500 गांवों में पानी सप्लाई की बात कर रहा हैं लेकिन इसके विपरीत कई गांव ऐसे हैं जहां जलाशय का एक बूंद पानी किसानों के खेत तक नहीं पहुंचता। गुंडरदेही, रानीतराई, मोरदा, सुयकोना, सेलूद, ओटेबंद, पिरदा, माटिया, बीरगांव, बागडूमर, तर्रा, सोंढ़, पैरी, आनंदगांव, अंडा, खप्परवार, डीकाडीह सहित 15-20 गांवों का दौरा करने पर पाया कि कहीं पर किसानों के चेहरे में खुशी हंै तो कहीं उदासी।
क्या कहते हैं किसान




गांव पैरी की आबादी लगभग 12 सौ से 15 सौ की है। इस गांव के 80 फीसदी लोग किसानी पर निर्भर हैं। सत्तर वर्षीय ओसल राम की तीसरी पीढ़ी किसानी कर रही है। चार एकड़ में दो फसल धान एवं लाखड़ी की बुआई करते हैं। ओसल ने बताया कि किसानों से प्रति एकड़ 100 रुपए के हिसाब से जलकर लिया जाता है, लेकिन जरूरत पर पानी नहीं मिलता। किसानों को जुलाई-अगस्त में पानी की जरूरत होती है, क्योंकि वह समय निंदाई व बियासी का होता है। लेकिन जलाशय से पानी अक्टूबर में छोड़ा जाता है। 
फुलझर गांव के किसान आसाराम के पास 6 एकड़ खेत है। आसाराम ने बताया कि 6 एकड़ में 8-10 क्विंटल धान निकलता है। बांध से सही समय पर पानी मिलता तो धान की पैदावार और बढ़ा जाती। किसान राधेश्याम ने बताया कि पानी की कमी के कारण खेत में एक ही फसल की बुआई होती है।
पारागांव निवासी सुखीराम का कहना है कि नहर बनाते समय उसका एक एकड़ खेत आ गया है। मुआवजा तो कुछ नहीं मिला, सिंचाई के लिए पानी भी नहीं मिलता। 700 की आबादी वाले इस गांव में न स्कूल है और न ही स्वास्थ्य केंद्र। दो-तीन किमी चलकर बच्चे स्कूल एवं बीमार स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचते हैं। इसी गांव के किसान गिरीराज साहू के 13-14 एकड़ खेत है। गिरीराज ने बताया कि कैनाल बनाते समय उसका 3-4 एकड़ खेत आ गया था। गिरीराज के दादा ने बताया कि कैनाल किसानों के हित में बनाया गया, ऐसे में किसी को भी मुआवजा नहीं मिला। गांव की सरपंच शांतिबाई पटेल, पंच रामरतन का कहना है कि 90 फीसदी किसानी करके जीवन का गुजारा कर रहे हैं। खेत में मात्र एक ही फसल होती है, इससे बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि हो रही है। गांव के युवा अब चाहते हैं कि उनके गांव में कोई उद्योग खुले ताकि बेरोजगारी दूर हो सके।
झलमला निवासी राजूलाल ढीमर की दो एकड़ जमीन है। उन्होंने बताया कि नहर का अंतिम छोर होने के कारण इस गांव में किसानों को बांध का एक बूंद पानी नहीं मिलता है। 900 की आबादी वाले इस गांव में किसानों की माने तो खेत को अभी बियासी के लिए पानी की जरूरत है लेकिन उनके खेत सूखे हैं। 
ग्राम पंचायत मटिया की आबादी लगभग 15 सौ होगी। किसानी पर आश्रित इस गांव में सिंचाई के लिए कैनाल तो है लेकिन यह काफी छोटा होने के कारण खेतों तक पानी की आपूर्ति नहीं हो पाती। गांव का युवा किसान अशोक यादव, अजित राम साहू, खोमन देवांगन, आधार सिंह डहरे, कार्तिक राम बघेल, फागूराम टंडन का कहना है कि खेत को पोटरीपानी (बियासी के बाद) के समय पानी की जरूरत होती है, लेकिन नहर की हाइट कम होने के कारण पानी नहीं मिलता है। दरअसल इस गांव में बने नहर की जलग्रहण क्षमता 9-10 इंच हैं लेकिन इसमें पानी सिर्फ ढाई से तीन इंच ही दिखा। इन किसानों की माने तो अगर ऊपर वाले की कृपा न हो तो किसानी करना संभव नहीं। चाराचार बोरगहन जैसे कई गांवों में खेत सूखे दिखे। हालांकि हर गांव की स्थिति ऐसी नहीं है। कुछ गांव में धान की ऊंची-ऊंची बालिया अपनी हरियाली को बखूबी बयां करती दिखीं।
मंत्री-नेता से करते पानी की गुहार
ग्राम पंचायत बोरगहन निवासी बृजेश, रतलाम, धानेश्वर का कहना है कि जरूरत पडऩे पर नेता-मंत्री से गुहार करते हैं। इन किसानों ने बताया कि उनका गांव काफी संपन्न है। अधिकांश खेतों में पंप होने के कारण पानी की किल्लत नहीं होती है, लेकिन जिनके पास पानी की व्यवस्था नहीं है उनके लिए आवश्यकतानुसार गांव के नेता-मंत्री से गुहार करके पानी का जुगाड़ कर लेते हंै। एक फसल सिर्फ धान के लिए सरोना एवं महमाया की बुआई करते हैं, जिसमें अच्छी-खासी आमदनी होती है। 
ब्रिटिश शासन काल में बने तांदुला जलाशय के इंजीनियरों की टीम के प्रमुख अभियंता सर एडम थे। उस समय में इसके निर्माण में 1 करोड़ 6 लाख 26 हजार 8 सौ 88 रुपए (1,06,26,888) की लागत आई थी। बांध से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि आज की तारीख में इस तरह के निर्माण लागत की कल्पना करें तो यह कम से कम 12 सौ करोड़ रुपए पहुंचेगी। तांदुला जलाशय की निर्माण तकनीक आज भी बेजोड़ है। गारे मिट्टी, सुरखी और पक्की लाल ईंटों से बने इस बांध की मजबूती आज भी जस की तस है। तांदुला जलाशय बालोद से लगभग 5 किमी दूरी पर स्थित है। यह प्रदेश की बड़ी योजनाओं में से हैं। 
भयंकर सूखे ने बनाया तांदुला
1907 में ब्रिटिश शासनकाल में भयंकर अकाल एवं सूखा पड़ा था। चारों तरफ भुखमरी थी। ऐसे में मजदूरों के सामने एक-एक दाने के लाले पड़े हुए थे। उस समय ब्रिटिश शासन ने मजदूरों से तांदुला जलाशय का निर्माण करवाया और उसके बदले उन्हें पैसे व अनाज दिया गया। सूखा नाला एवं तांदुला नदी को जोड़कर बने इस बांध के जरिए हजारों मजदूरों के घर न सिर्फ चूल्हा जला बल्कि उनकी गरीबी भी दूर हुई। ब्रिटिश अभियंता सर एडम के नेतृत्व में हजारों मजदूरों एवं सैकड़ों इंजीनियरों की मेहनत से बहुत कम समय में यह जलाशय बनकर तैयार हो गया था। विशाल बांध का जलग्रहण क्षेत्र 818 वर्ग किमी है, जबकि इसकी लंबाई 110 किमी है। अंग्रेजों का शासन काल में कुछ वर्षों तक तांदुला जलाशय की सिंचाई क्षमता 54000 हेक्टर थी जो आज बढ़कर 1 लाख 3 हजार हेक्टर तक पहुंच गई है।
बीएसपी से 42 करोड़ की आय
एशिया महाद्वीप के सबसे बड़े इस्पात संयंत्र भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) को उसके स्थापना काल (1954) से तांदुला बांध से 4 टीएमसी पानी की सप्लाई की जाती है। शासन से किए गए अनुबंध से बीएसपी यदि कम पानी लेता भी है तो उसे 90 फीसदी जलकर चुकाना पड़ता है। पूर्व में 8 रुपए 5 पैसे की दर से प्रति क्यूबिक मीटर पानी सप्लाई की जाती थी, जो इस साल बढ़कर 9 रुपए 26 पैसे हो गया है। वर्ष 2011-12 में बीएसपी ने 42 करोड़ 30 लाख 35 हजार रुपए जलकर चुकाया है। भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए दो जलाशय तांदुला एवं महानदी से पानी सप्लाई होती है। तांदुला का पानी पहले खरखरा जलाशय में संग्रहित करते हैं। इस तरह खरखरा जलाशय से 1600 मिलियन घन फुट (45.30 मिलियन घन मीटर) एवं महानदी परियोजना से 2400 मि.घ.फु (67.95 मि.घ.मी) पानी आबंटित किए जाते है।
किसानों से नही मिलता पूरा जलकर
पूर्णत: सिंचाई के उद्देश्य से बने  इस जलाशय से आज हजारों हैक्टर खेतों की प्यास बुझती है। तांदुला जल संसाधन दुर्ग के कार्यपालन अभियंता पी.के. अग्रवाल ने बताया कि तांदुला जलाशय अपने स्थापना के उद्देश्य को पूरा करते हुए वर्तमान में 1 लाख 3 हजार हैक्टर में सिंचाई कर रहा है। मात्र एक फसल (खरीफ) के लिए किसानों से प्रति एकड़ 91 रुपए जलकर लिया जाता है। इस तरह विभाग को हर साल कृषि से जितना जलकर वसूलने का लक्ष्य होता है वह पूरा नहीं हो पाता है। वर्ष 2011-12 में कृषि से 13 करोड़ 8 लाख 12 हजार रुपए वसूलने का लक्ष्य था, लेकिन मात्र 1 करोड़ 47 लाख 5 हजार रुपए वसूल हो पाए हैं। अधिकारियों का कहना है कि सरकार समय-समय पर किसानों का जलकर माफ करती हैं जिसके कारण हर साल कृषि से मात्र 8-10 फीसदी ही वसूली हो पाती है।
जलसंग्रहण-सिंचाई क्षमता बढ़ी
11 हजार एकड़ में बने तांदुला जलाशय में भी भविष्य में जल संकट हो सकता है, इसके लिए जलाशय का जल संग्रहण क्षमता बढ़ायी गयी। शुरूवाती दौर में बांध की ऊंचाई कम होने के कारण जलसंग्रहण क्षमता मात्र 9712 मि.घ.फीट थी। जल संग्रहण क्षमता बढ़ाने के लिए बांध की ऊंचाई 0.60 मीटर बढ़ाई गई जिससे आज इसकी संग्रहण क्षमता 10,674 मि.घ.फीट (302.21 मि. घ.मी.) हो गई है। जबकि इसमें औसत वर्षा का संग्रहण 50.09 इंच दर्ज है। निर्माण अवधि में जलाशय की सिंचाई क्षमता 54000 हेक्टर (सिर्फ खरीफ फसल) थी, जो बढ़कर 68219 हैक्टयर हो गई। वर्तमान में तांदुला जलाशय व गोंदली जलाशय से प्राप्त पानी नहरों के माध्यम से बालोद, दुर्ग एवं बेमेतरा जिलों के 6 विकासखंडों के 90000 हेक्टर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा दी जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि भविष्य में इसकी क्षमता बढ़कर 103000 हैक्टर करने का लक्ष्य है। 
रखरखाव में 15 करोड़ होते खर्च
तांदुला जलाशय का स्थापना खर्च 15 करोड़ रुपए हैं। वर्ष 2011-12 में जलाशय के रख-रखाव पर लगभग 6 करोड़ रुपए खर्च किए गए है। अधिकारी ने बताया कि जलाशय रख-रखाव पर जो खर्च होता है उसे मनरेगा के तहत किया जाता है। 
ढाई सौ करोड़ का नया प्रोजक्ट
तांदुला वैसे तो विशाल बांध है, लेकिन उसमें पानी का स्तर हमेशा कम रहता है। जल संसाधन विभाग दुर्ग ने दो साल पहले सरकार को ढ़ाई करोड़ का एक प्रोजक्ट दिया है। इस नए प्रजोक्ट का नाम प्रपोज कनेक्टिंग चैनल फार्म रविशंकर रिजरवायर-2 तांदुला रिजरवायर है। इसमें कहा गया है कि तांदुला का जलस्तर बढ़ाने के लिए महानदी बांध का पानी नहरों के माध्यम से तांदुला में लाया जाए। अगर ऐसा हो जाता है तो निश्चित ही तांदुला का जलस्तर बढ़ेगा जिससे सिंचाई भी अधिक होगी। अधिकारियों का कहना है कि विभाग द्वारा सर्वे कार्य पूरा कर लिया गया है। नए नवेले इस प्रोजक्ट में महानदी से तांदुला की लंबाई लगभग 40 किमी रूट को जोड़कर बनाया जाएगा। संभवत: 2013-14 में यह योजना लागू हो जाए।

सबको मालूम है इस जन्नत की हकीकत, लेकिन...

16 जून 2011
कहवे के साथ कश्मीर-2
सुनील कुमार
कश्मीर से लौटकर

कश्मीर के एक हफ्ते में पहले से लेकर आखिरी दिन तक हाथ पसारे हुए बच्चे, बूढ़े और औरतें देखना अच्छा नहीं लग रहा था। ऐसे लोगों में दो किस्म के लोग थे एक तो वे जो कि सीधे-सीधे भीख मांग रहे थे और दूसरे वे जो हर छोटे-मोटे काम के एवज में बख्शीश मांग रहे थे। इन दोनों ही बातों का वहां के इन दो किस्म के तबकों में चलन बन चुका है। राह चलते भेड़ के रेवड़ लेकर निकलने वाले लोगों की तस्वीरें लेने पर वे उसके लिए सीधे-सीधे बख्शीश की उम्मीद करते थे और कभी-कभी गाड़ी के पीछे दूर तक दौडऩे भी लगते थे।
दरअसल इस देश के स्वर्ग कहे जाने वाले इस इलाके में गरीबी खासी बड़ी है। लोगों के पास सैलानियों से कुछ कमा लेने और कुछ बख्शीश पा लेने से परे के काम कुछ गिने-चुने किस्मों के हैं। वहां खेती जरूर है लेकिन वह महंगी हो गई है। कश्मीर के गिने-चुने किस्म के हस्तशिल्प और हाथकरघा के ग्राहक भी मोटे तौर पर सैलानी ही हैं। इस बारे में सोचें कि हाथकरघा और कपड़ों पर कसीदाकारी का काम, कागज की लुग्दी बनाकर उससे तरह-तरह के खूबसूरत सामान बनाने का काम इतना अधिक क्यों होता है तो एक बात यह समझ आती है कि पिछले हुए मुस्लिम समाज में महिलाओं को घर पर रहकर ही काम करने की सहूलियत ऐसे ही कामों में अधिक रहती है और शायद वहां किसी संगठित कामकाजी जगह पर बहुत सी महिलाओं को काम करने की सामाजिक इजाजत न मिली हुुई हो।
खेतों में औरतें आदमियों से अधिक काम करते दिखीं और अधिक संख्या में भी दिखीं। श्रीनगर की मशहूर डल झील में शिकारे पर घूमते हुए जब मेरे कैमरे को एक ऐसा गैर-सैलानी शिकारा दिखा जिसमें एक परिवार जा रहा था तो उसे देखकर कुछ हैरानी हुई। इसे दो महिलाएं चप्पुओं से चला रही थीं और एक जवान आदमी उस पर बैठा हुआ था। वे जिस अंदाज में बैठे थे, उससे जाहिर था कि वे एक ही परिवार के हैं। वह शिकारा आकर उस तैरते हुए खाने-पीने के शिकारे के पास रूका जहां हम लोग भी रूककर कश्मीर का मशहूर कहवा पी रहे थे। इन दो महिलाओं में से एक अपने मोबाईल फोन पर बात करने लगी और दूसरी मेरे कैमरे से अपने चेहरे को कुछ छुपने, कुछ मुस्कुराने लगी। वह आदमी कोकाकोला की एक बड़ी बोतल खरीदकर उसे मुंह से लगाकर अकेले पीने लगा और फिर दोनों महिलाएं शिकारा को खेते हुए वहां से डल झील की बीच की बस्तियों में से किसी एक तरफ रवाना हो गईं।
खेतों में धान का रोपा लग रहा था और खेती में कम दिनों के इस कमरतोड़ काम की मजदूरी भी 200 रुपए से लेकर 300 रुपए तक थी। इसके साथ-साथ किसान अपने मजदूरों को दो-तीन वक्त की चाय भी देता है। सड़क किनारे के खेतों में जगह-जगह चाय के वक्त पर बैठे मजदूर दिखे और जब ऐसी एक टोली की तस्वीर अपनी गाड़ी से ही बैठे हुए मैं उतारने लगा तो उन्होंने हमारे कश्मीरी ड्राइवर से कहकर हम सबको चाय के लिए बुला लिया। चाय के साथ नानखटाई किस्म का बेकरी का बना एक बन उन्होंने खाने भी दिया और खुशी के साथ-साथ उन्हें यह डर भी सता रहा था कि यह नमकीन चाय हमें पसंद आएगी या नहीं। कुछ देर उनकी खातिरदारी पाने के बाद मैंने जब हिचकते हुए अपने ड्राइवर से धीरे से पूछा कि क्या इस चाय के लिए कुछ भुगतान करना ठीक होगा तो दूर से ही मेरी बात को समझकर उस टोली के एक बुजुर्ग मजदूर ने पूरी ताकत से मनाही कर दी। उनके बड़े दिल से निकली, उनकी मीठी मोहब्बत से भीगी नमकीन चाय के साथ बहुत सी तस्वीरें पाकर वहां से हम आगे बढ़े।
एक फर्लांग दूरी पर ही एक दूसरे खेत में रोपा लगाती हुईं महिलाओं के बीच एक छोटी सी बच्ची भी पूरी मेहनत से रोपा लगा रही थी। रूककर उसकी अनगिनत तस्वीरें खींचने के बाद पूछा तो पता लगा कि वह स्कूल जाती है, प्रायमरी स्कूल में पढ़ती है लेकिन अभी छुट्टियां होने से वह घरवालों के साथ यहां पर काम कर रही है। ये तमाम बातें हिन्दी में करने में भी कुछ दिक्कत होती है क्योंकि वहां गांव के लोग सिर्फ कश्मीरी जुबान में बोलते हैं। लेकिन उर्दू के अधिक लफ्जों के साथ अगर धीरे-धीरे हिन्दुस्तानी बोली जाए तो काफी लोग काफी कुछ समझ भी लेते हैं।
डल झील के किनारे वहीं के पानी से ढेंस (कमल ककड़ी) निकालकर, वहीं उगी कुछ दूसरी सब्जियों के साथ बेचती हुई एक महिला सड़क किनारे फुटपाथ पर थी और मेरे कैमरे से कुछ नाखुश भी थी। लेकिन इतने बरसों में कैमरा यह सीख चुका था कि जब तक कोई विरोध न हो तब तक सार्वजनिक जगह पर कुछ हमलावर अंदाज बहुत सी तस्वीरें पाने का अकेला जरिया रहता है। किसी की जिंदगी का निजी दायरा कितना बड़ा माना जाए और खुली जगहों पर तस्वीरें लेने का हक कितना रहे यह एक मतभेद की बात रहती है और विरोध का थोड़ा सा खतरा उठाते हुए ही बहुत सी तस्वीरें मिल पाती हैं। लकड़ी की जिस पटिया पर यह महिला बैठी सब्जी बेच रही थी उसकी लकड़ी की लकीरों की तरह ही उसके पांवों में भी बिवाईयां पड़ी थीं। कश्मीर का यही हाल है जो कि देश के बहुत से दूसरे गरीब इलाकों का है। यह जन्नत अगर है तो सैलानियों के लिए है, वहां के कारोबारियों के लिए है, उन नेताओं और अफसरों के लिए है जिनके बारे में किसी को भी यह खुशफहमी नहीं है कि वे ईमानदार हैं। और बंदूकों के साथ तैनात उन लोगों के लिए यह जन्नत है जिन लोगों को एक खास कानून के तहत वहां पर ऐसे हक मिले हुए हैं कि वे बहुत सी मौतों के जिम्मेदार होने के बाद भी बचे रहते हैं।
और यह हाल जून के उस तपते हुए महीने में था जब यहां सैलानी साल के बाकी महीनों के मुकाबले सैकड़ों गुना रहते हैं। सर्दियों के जमे हुए महीनों में यहां आकर घूमने वाले सैलानी तकरीबन तस्वीरों में ही दिखते हैं और गिने-चुने ऐसे लोगों से कश्मीर के घरों को गर्म करने के लिए लकडिय़ां भी नहीं निकलतीं। सर्दियों में मजदूर और सैलानियों के काम में लगे लोग दिल्ली से लेकर गोवा तक अलग-अलग इलाकों में निकल जाते हैं और वहां तरह-तरह की मजदूरी करते हैं। यही वह वक्त रहता है जब कश्मीरी कपड़ों के ग_े लिए हुए वहां के लोग बाकी देश भर में उतर आते हैं, और खरीददारों से सालाना के रिश्ते बनाकर लौटते हैं। बहुत से ऐसे लोग मेरी पहचान के हैं जिनकी मामूली खरीददारी के चलते हुए भी कश्मीरी लोग उनके लिए हर बरस वहां से अखरोट या केसर जैसे तोहफे भी लेकर आते हैं।
कश्मीर में सरकारी खजानों पर डकैती करने वाले बड़े लोग तो महलों सी इमारतें बनाते दिखते हैं लेकिन उनके लिए मन में लबालब हिकारत वाले गरीब बहुत बेबस हैं। आतंक के चलते कश्मीर में सरकारों को बेहिसाब हक मिले हुए हैं और जब उनसे किसी किस्म की कानूनी बहस की गुंजाइश नहीं रह जाती तो नौजवान पीढ़ी हाथ में पत्थर उठा लेती है और बूढ़े उन दिनों को याद करने लगते हैं जिन दिनों कश्मीर को भारत में मिलाने के लिए दिल्ली में तमाम किस्म की शर्तें मानी थीं और जिन्हें अब कूड़ेदान में डाल दिया गया है।
न तो कश्मीर में कोई कल-कारखाने हैं और न ही मजदूरी से बने सामानों से परे का कोई कारोबार। कुछ खेती धान की और कुछ अखरोट-बादाम, केसर जैसे महंगे सामानों की। यहां के मजदूर उड़ीसा के कुछ इलाकों के मजदूरों की तरह की भुखमरी को तो नहीं झेलते लेकिन गांव-गांव में उनके बच्चों की हालत बहुत अच्छी नहीं दिखती। इस सूबे के ढांचे में केंद्र सरकार से मिली इफरात मदद के चलते बहुत कुछ काम हुआ दिखता है। लेकिन मजदूरों के हकों का कोई ठिकाना नहीं दिखता।
पहलगाम में कई किलोमीटर लंबे असंभव से दिखने वाले पहाड़ी रास्तों पर सैलानियों को घोड़ों पर बिठाकर जो मजदूर दिन भर में कुछ घंटों वाले कई फेरे लगाते हैं, वे सैलानियों के इन महीनों में भी 16सौ रुपए महीने घोड़ों के मालिक से पाते हैं। जब अमरनाथ की यात्रा चलती है तो यह मजदूरी बढ़कर दो हजार रुपए महीने हो जाती है। हर दिन इस सैर-सपाटे पर हममें से हर किसी पर करीब इतना खर्च रहने-खाने-घूमने पर हो रहा था और यह अंदाज लगाना नामुमकिन था कि जन्नत में बसे फटेहाल ये गरीब लोग दो हजार रुपए महीने में या 16 सौ रुपए महीने में कैसे घर चलाते होंगे। यह भी अंदाज लगाना मुश्किल था कि वे बेहतर जिंदगी जी रहे थे या उनके घोड़े, जिनकी कि जरूरतें गिनी-चुनी रहती हैं। बहरहाल जितने खतरनाक चढ़ाव वाले रास्ते से मुझ जैसे भारी-भरकम इंसान को ढोकर जो घोड़ा ले गया था, लौटकर उसके लिए मैंने इन मजदूरों को अलग से भी एक बख्शीश दी कि उन घोड़ों को गुड़ और चना खिला दें।
श्रीनगर से सोनमर्ग की खस्ता हाल सड़क पर सायरनों की आवाज से हमारी गाड़ी को एकदम किनारे होना पड़ा तो मकबूल भाई ने शीशे में देखकर ही बता दिया कि पीछे से मुख्यमंत्री का काफिला आ रहा है। सड़क किनारे की बंदूकों के बीच के फासले कम होते चले गए थे और कुछ समय पहले से ही हमें लग रहा था कि यहां से कोई बड़ा माना जाने वाला इंसान निकलेगा। नौ गाडिय़ों के काफिले में नौजवान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला निकले तो काले रंग की एक बड़ी विदेशी 'ऑडीÓ कार के करीब आने के पहले ही मकबूल भाई ने बता दिया था कि उमर अब्दुल्ला खुद ही गाड़ी चलाते आएगा। और यही हुआ। तेज रफ्तार से गाड़ी चलाते उमर अब्दुल्ला इसके बाद भी एक और बार तब दिखे जब हम श्रीनगर से वापिस निकलने के लिए एयरपोर्ट पहुंच रहे थे और वे भी एयरपोर्ट में गाड़ी चलाते दाखिल हो रहे थे। (बाकी कल)

68 बरस चौड़ी सरहद

14 जून 2011
कोशिश से खुदा मिल जाता है, फिर इंसान क्या चीज है....
सुनील कुमार
श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर), 14 जून (छत्तीसगढ़)। पर्यटकों के स्वर्ग कहे जाने वाले इस इलाके में पहुंचकर अचानक जब यह पता लगा कि इस प्रदेश के एक गांव का एक इंसान लंबे अरसे बाद पाकिस्तान से यहां आ पाया है तो इन बरसों की गिनती सुनकर एक पल को कलेजा कांप गया। चौदह-पंद्रह बरस की उम्र का एक लड़का आजादी के दो बरस पहले मटरगश्ती करते हुए घूमते-फिरते लाहौर चले गया था और अब वह इसी महीने लौटकर 68 बरस बाद अपने घर आ पाया है, महज एक महीने के लिए।
पहलगाम जिले के वुलुरहामा नाम के गांव की यह कहानी अचानक ही पता लगी और फिर 'द हिन्दूÓ अखबार के श्रीनगर के ब्यूरो के फोटोग्राफर निसार अहमद से इस गांव के पास के एक शहर अनंतनाग के एक अखबारनवीस खालिद गुल का पता लगा जिन्होंने वहां के एक अखबार में इसकी रिपोर्ट बनाई थी। श्रीनगर में अखबार पाना खासा मुश्किल था क्योंकि होटलों में इसका रिवाज नहीं है और सड़क किनारे अखबारों की दुकानें दिखती नहीं हैं। इसलिए सिर्फ टेलीफोन पर खालिद गुल से बात करके करीब 75 किलोमीटर दूर इस गांव को ढूंढते-ढूंढते जब यह संवाददाता वुलुरहामा पहुंचा तो कबीर शाह नाम के इस बुजुर्ग से बात करते हुए रौंगटे खड़े हो गए।
इस दुमंजिला मकान तक पहुंचते हुए इतने गांव और इतने पुल पार करने पड़े थे और किसी गांव में वहां के पते का एक बोर्ड भी नहीं लगा था, गांवों के नाम भी सिर्फ पूछने पर पता लगते थे। ऐसे में कबीर शाह के घर पहुंचने पर बाहर सड़क पर मिले एक पड़ोसी बुजुर्गवार ने जब कहा कि कबीर शाह तो रिश्तेदारी में दो दिन से दूसरे गांव गए हुए हैं तो दिल बैठ सा गया। लेकिन मकान के भीतर जाने पर पता लगा कि कुछ ही देर पहले वे दूसरे गांव से दावत खाकर लौटे थे और आंगन में बैठे एक स्थानीय टीवी चैनल को इंटरव्यू दे रहे थे।
इस संवाददाता के वहां पहुंचने, छत्तीसगढ़ के अखबार का होने को लेकर उनके मन में शक का एक ग_ा था। उन्हें यह भी लग रहा था कि इस इंटरव्यू के बाद उनके बारे में क्या छपेगा और उस पर सरकार क्या सोचेगी। उनका शक बेबुनियाद इसलिए नहीं था कि एक पूरी जिंदगी बाहर गुजारकर पिछले 20-22 बरसों से लगातार लगातार कोशिश करने के बाद उन्हें जब अपने घर के देश आने की इजाजत मिली तो वे इस मौके को बर्बाद कैसे होने दें? इसलिए वे संभल-संभलकर बोल रहे थे, बहुत कम बोलना चाह रहे थे और उनकी हसरत थी कि उनकी बातों से किसी तरह का बखेड़ा खड़ा न हो।
कबीर शाह की कहानी को शुरू से देखें तो 14-15 की उम्र में वे 1943 में लाहौर चले गए थे और वहीं पर कुछ काम करने लग गए। यह पैदल सफर का वक्त था और लाहौर में कुछ अरसा मजदूरी करने के बाद वे कराची गए और वहां मजदूरी करने लगे। वहीं पर कुछ लोगों से यारी-दोस्ती हुई और उनमें से एक ने एक कश्मीरी लड़की से उनकी शादी करवा दी। कबीर शाह ने भारी दिक्कतों के साथ जिंदगी चलाई जो आगे उन्हीं के लफ्जों में बयां है। लेकिन
0 आप कब चले गए थे उस तरफ मुझे बताएंगे?
00 1943 में
0 कैसे चले गए थे?
00 भाग गया घर से।
0 कितनी उम्र रही होगी?
00 करीब 14-15 साल की रही होगी, भाग गया था घर से
0 वहां किस शहर पहुंचे आप?
00 लाहौर में
0 उस उम्र के बाद में अभी लौटे हैं आप?
00 जी हां, 68 साल बाद
0 वहां क्या करते रहे इतने समय तक? गुजारा कैसे चला?
00 मजदूरी भी की, सारे काम किए, बड़ी परेशानियां उठाई हैं। आदमी के सामने यदि परेशानी आ जाती है तो देख समझकर उसका मुकाबला करना पड़ता है। कोई भी जगह हो। ऊपर वाले का शुक्र है, सबके साथ मुकाबला किया। अल्लाह का लाख-लाख शुक्र है। अभी ठीक-ठाक है, शादियां की बच्चों की..अपनी शादियां की..
0 अभी आप वहां क्या काम करते हैं?
00  अभी मैं ट्रांसपोर्ट का काम करता हूं।
0 तो..इतने बरसों तक यहां के लोगों से आपका कोई वास्ता रहा कि नहीं रहा?       (बाकी पेजï 3 पर)
00 नहीं रहा, कोशिश बहुत की
0 आपने किस-किस तरह से कोशिश की?
00 पासपोर्ट बनवाया दो दफा, लेकिन वीजा ही नहीं मिला।
0 वीसा ही नहीं मिला?
00 हां, दो बार कोशिश की।
0 पहली बार वीसा के लिए कब एप्लाई किया?
00 पहले किया था...बताया न मैंने..
0 कितने बरस से वीजा की कोशिश कर रहे थे?
00 फिर मैंने कोशिश ही छोड़ दी..बाद में ये..कश्मीर का (बखेड़ा) आ गया न बीच में..तब इसमें सब फार्मेलटी पूरी किए, फिर भी ढाई-तीन साल बाद मिला मुझे।
0 आपको अपने गांव की याद भी, अपने ठिकाने की याद थी..
00 खुदा का शुक्र है, बच्चे (घर पर बचे भाईयों के) आ गए तो हो गई पहचान, अगर मैं अकेला आता तो नहीं हो पाती पहचान, अभी भी मैं पहचानता नहंीं..
0 यहां घर में कौन लोग मिले आपको आपके वक्त के?
00 मेरे भतीजे मिले..भाई मिले, मेरे दो भाई जिंदा हैं। एक मेरा बड़ा भाई है, एक छोटा भाई है ब्योर में है।
0 आप कैसे आए यहां तक, जब आपको परमिट या वीजा मिला?
00 (अपने भतीजे की ओर इशारा कर) आते ही हमने इनको टेलीफोन किया
0 इनसे संपर्क कितने साल से हो चुका था?
00 पहले.. मेरा ख्याल है साल दो साल से कांटेक्ट था। करीब ढाई साल से।
0 तो उस ढाई साल के पहले कोई बातचीत इतने बरसों से नहीं हो पाई थी..
00 नहीं हुआ था
0 नंबर आपको कैसे मिला ढाई साल पहले?
00 मैंने कोशिश बहुत की..भगवान मिल जाता है, खुदा मिल जाता है कोशिश से। इंसान क्या चीज है। कोशिश से.. मैंने कोशिश इतनी की जिसकी इंतहा कोई नहीं
0 जाहिर है..
00 आप आए हैं, हमसे मिलने के लिए..कोशिश से ही आए हैं।
0 बिल्कुल
00 इसी तरह ये भी है..
0 हम तो मामूली कोशिश से आए, लेकिन आपकी तो बरसों की कोशिश रही, जिसमें सरकारें बीच में थीं, सरहद बीच में थी, हमको तो कोई सरहद नहीं थी, राह बताने वाले लोग मिलते चले गए।
00 सही बात है.. आप कहां रहते हैं?
0 मैं छत्तीसगढ़ में रहता हूं। मध्यप्रदेश, भोपाल के और आगे है..मैं परिवार के साथ आया था श्रीनगर, कश्मीर घूमने के लिए, दो दिन पहले ही हम पहलगाम से लौटे, कल मुझे किसी ने बताया कि एक शख्स इतने इरस बाद यहां लौटकर आए हैं।
00 तो आपके दिल में जज्बा पैदा हा गया..
0 जी, मैं आया तो छुट्टी मनाने था, लेकिन रोज-रोज तो ऐसे कोई मिल नहीं सकते!
00 कल, हम गए वेरानाल। वहां एक आदमी आया गुजरात का। बड़ा खुश हुआ, मिला-जुला, वो भी हिंदू था।
0 अभी किस राह से आए हैं यहां तक?
00 मुजफ्फराबाद की तरफ से, बस सर्विस से आया हूं।
0 तो आपकी फैमिली के और लोगों ने वीजा के लिए एप्लाई किया था, आपके साथ यहां आने के लिए?
00 किया है, कइयों को मिल गया, कइयों को नहीं मिला।
0 वहां पर..
00 हां
0 उनमें से आपके कुछ लोग पहले भी यहां आए थे क्या?
00 हां आए थे।
0 कौन आया था आपकी फैमिली का कोई था?
00 हमारे फैमिली के नहीं..यार-दोस्त थे, हमारी फैमिली का कोई नहीं आया।
0 उनकी दिलचस्पी है यहां आने के लिए?
00 है न पूरी दिलचस्पी, क्यों नहीं होगी
0 तो उन लोगों ने एप्लाई किया है वीजा के लिए?
00 हां, कइयों ने किया है, कुछ को मिले कुछ को नहीं मिले। मिल जाएंगे। कोशिश कर रहे हैं। हमने भी बड़ी कोशिश की थी। अगर कामयाबी हासिल नहीं होती, मैं कैसे आता?
0 यहां पर किस जगह आपको रिसीव किया लोगों ने?
00 श्रीनगर से।
0 बस से आप श्रीनगर पहुंचे तो घर से लोग यहां से श्रीनगर जाकर आपको लेकर आए..
00 हां, सरकार ने लाया वहां तक, वहां इन लोगों ने रिसीव किया। भाइयों ने मुझे पहचान लिया।
0 ये लोग तो बाद में हुए होंगे..
00 ये तो खून की कशिश होती है। हालांकि हमने इनको नहीं देखा था। पहले बच्चा आया तो उसने बोला तो उसने पूछा आप पाकिस्तान से आए कबीर शाह हैं? मैंने बोला हां। तो..खून की कशिश होती है।
0 आपके वक्त के कुछ दोस्त मिले यहां आपको?
00 कोई भी नहीं..सब मर गए, अब कोई नहीं है।
0 आपके भाई लोग रहे, जिन्होंने आपको देखा था।
00 हां।
0 गांव में कोई नहीं रहा, जिन्होंने पहले आपको देखा हो?
00 नहीं नहीं, आदमी ही नहीं रहे तबके, मर-खप गए। यहां जिसमें पढ़ता था, अब वो भी निजाम बदली हो गया। सल्हर में एक स्कूल में पढ़ता रहा। लेकिन उधर भी हालात मुख्तलिफ हो गए। अब वो हालात ही नहीं। खुदा का शुक्र है कि यह मुल्क तरक्की कर गया। बड़ी तरक्की। स्कूलें, सड़कें, बागीचे ये हमारे समय नहीं थीं। मकान हमारे कच्चे थे। अब तो बड़े पक्के मकान बने हैं, फस्र्टक्लास, वेरी-वेरी बेस्ट।
0 करांची में जहां आप रहते हैं, वहां और लोग इस इलाके के हैं?
00 नहीं हैं।
0 आपके आस-पास के कस्बों के लोग पाकिस्तान में नहीं मिले?
00 नहीं.. पाकिस्तान में कोई हैं बनारस के, हमारे पड़ोसी बनारसी हैं वहां पर। कोई काम करते हैं..बनारस के हैं। हमारा ऐसा रिश्ता उनके साथ है, जैसे हमारे भाई-बहन हैं। ऐसा माहौल है। यानी एक सुई भी दरवाजे में हो तो गायब नहीं होगी। आपस में मोहब्बत है, भाईचारा है।  जब मैं इस मुल्क आया तो तकरीबन 100 आदमी मेरे को रेल में चढ़ाने  वास्ते आए।
0 वहां पर?
00 हां, 100 आदमी आए। रिश्तेदार, अपने, गैर, पराए, मिलने-जुलने वाले सब आ गए थे...ये दिल की मोहब्बत होती है। जिस आदमी को अपने वतन से मोहब्बत नहीं वो भी इंसान नहीं।
0 बिल्कुल...बिल्कुल
00 क्या बात है
0 बहुत खूब कहा आपने...
इतनी वीडियो रिकॉर्डिंग के बाद छोटे से कैमरे की बैटरी खत्म हो गई और आगे की बातचीत एक-एक शब्द नहीं लिखी जा रही।
कबीर शाह ने बताया कि उनका जो दोस्त यहां आकर पता लेकर पाकिस्तान लौटा तो उससे मिले फोन नंबर पर बातचीत शुरू हुई और अभी दो-ढाई बरस पहले पहली बार वे अपने भाई और बहन से बात कर पाए, भतीजों के बारे में उन्हें पता लगा। लेकिन उनके भतीजे के बेटे अरशिद हुसैन शाह को इस बात का मलाल था कि वे हिन्दुस्तान से पाकिस्तान फोन नहीं कर पाते और जिस दिन कबीर शाह की एक बहन की मौत हुई, उस दिन भी वे यहां से खबर नहीं कर पाए और शाम अचानक पाकिस्तान से उनका फोन आया तो उन्हें यह खबर बतानी पड़ी कि उनकी बहन गुजर गई हैं और उनका कफन-दफन हो चुका है। वहां मौजूद तमाम लोगों ने इस संवाददाता से इस बात को लेकर एक अफसोस जाहिर किया कि कश्मीरियों की पाकिस्तान में इतनी रिश्तेदारियों के बाद भी यहां से वहां फोन नहीं लगाया जा सकता जबकि पाकिस्तान से कश्मीर फोन लगाने की छूट है।
अरशिद ने बताया कि वे जब 15 बरस के थे तब उनके दादा ने बताया था कि उनके एक भाई बचपन में ही पाकिस्तान चले गए थे। दो-ढाई बरस पहले उनके दोस्त आए तो उनका खत लेकर आए थे और यहां का नंबर लेकर दोस्त लौटे तब कबीर शाह का यहां फोन आया। अब 2 जून को वे यहां पहुंचे तो दो भाई ही बचे हुए हैं, बहन 3 महीने पहले जा चुकी।
कबीर शाह की आंखें यह पूरा सिलसिला बताते हुए और अपने परिवार के एक नौजवान के मुंह से बताना सुनते हुए भीग जाती हैं। वे भरी हुई आवाज में बताते हैं कि किस तरह पाकिस्तान से बस से रवाना होकर जब वे भारत की जमीन पर पहुंचे तो इस तरफ के कश्मीर के एक बाशिंदे ने उनकी कहानी सुनकर उन्हें अपना भारतीय मोबाईल फोन दिया कि वे घरवालों से बात कर लें। बस के सफर के बीच वे कुछ-कुछ देर में घरवालों को बताते चलते थे कि वे कहां तक पहुंच चुके हैं और श्रीनगर से कितनी दूर हैं। गांव का उनका परिवार ईमेल और इंटरनेट से दूर है लेकिन शायद कश्मीर से पाकिस्तान का संपर्क इतना भी नहीं है। इसलिए जब इस संवाददाता ने अरशिद से वायदा किया कि यह रिपोर्ट छपने पर इस अखबार का पन्ना उन्हें ईमेल से भेज देंगे तो उन्होंने अपने स्कूल का पता दिया कि वहां डाक से पेपर भेज दिया जाए वे ईमेल इस्तेमाल नहीं करते।
कबीर शाह की कहानी में दहशतगर्दी और हिंसा तो नहीं है लेकिन उनकी कहानी दहशत भी पैदा करती है और यह भी बताती है कि सरकारों के इंतजाम कितने हिंसक हैं, उनके मामले में खासकर भारत सरकार के इंतजाम। आधी सदी से अधिक की कोशिश के बाद वे किसी तरह उस घर लौट पाए जहां वे पैदा हुए थे और खेले-बड़े हुए थे। सरहद को कोई शायद लंबाई और चौड़ाई में नाप सकता हो, लेकिन कबीर शाह इस सरहद को सिर्फ बरसों में नाप सकते हैं, 68 बरस चौड़ी सरहद!