संसद के खिलाफ खड़ी की जाती हिकारत सही लगने लगती है...

22 अगस्त 2012
संपादकीय
कोयला घोटाले को लेकर संसद के दोनों सदन थम गए हैं। एक तरफ भाजपा है जो कि प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांग रहे हैं और दूसरी तरफ कांगे्रस पार्टी है जिसके मंत्री जाकर राज्यसभा के ताजा-ताजा बने उपसभापति से सदन की कार्रवाई को दिन भर के लिए स्थगित कर देने को कह रही है, और कार्रवाई स्थगित कर भी दी गई। देश की सबसे बड़ी पंचायत, देश के सबसे बड़े भ्रष्टाचार पर बात करने के बजाय थमी पड़ी है, और उसका यह वक्त लौटने वाला भी नहीं है। पिछले कुछ बरसों में संसद के बहुत से कामों को सड़क पर करने की जिद अन्ना से लेकर बाबा तक, इस किस्म के बहुत से लोगों ने की है, और देश के अनगिनत जंगलों में नक्सलियों ने पूरी की पूरी संसद को ही खारिज कर दिया है। तो अब देश के सामने बातचीत की जगह कौन सी बची है? राज्यों में विधानसभाएं इसी तरह का बर्ताव देख रही हैं, कि लोग, निर्वाचित लोग किसी जरूरी मुद्दे पर तैयारी के साथ, तर्क के साथ बहस करने के बजाय अपने मतदाता वर्ग को सहलाने के लिए हंगामों में लगे रहते हैं और सदन छोड़कर बाहर जाते रहते हैं। यही हाल संसद देख रही है। प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग करना एक बात है, यह मांग हम अपने इसी कॉलम में पिछले करीब दो बरसों से कर रहे हैं जब से यह बात साफ हो गई कि मनमोहन सिंह ने अपने मातहत चल रहे भ्रष्टाचार को कोशिश करके अनदेखा किया और अपने हाथों पर दस्ताने पहनकर यह साबित करने की कोशिश की कि उनकी उंगलियों के निशान तो किसी भी मौका-ए-वारदात पर नहीं है। इस मांग को आज बहुत देर से उठाकर भाजपा सोनिया गांधी पर निशाना लगाने की संभावना के इंतजार को अब खत्म कर रही है। वरना कोई भी जिम्मेदार विपक्ष मनमोहन सिंह से जमाने पहले से इस्तीफा मांग चुका होता। भाजपा की आज की यह मांग, अब जाकर सिर्फ टू लिटिल, टू लेट ही कही जा सकती है। 
और सुबह से सोच-समझकर भूली हुई यह पार्टी अब शाम को घर लौट रही है तो लौटते ही हंगामा कर रही है। मनमोहन सिंह से इस्तीफे की मांग करते हुए संसद में बहस के वक्त को खत्म कर देना देश के साथ बहुत बड़ी ज्यादती है। संसद हो या राज्यों की विधानसभाएं हों, जवाबदेही से बचने के लिए सत्ता तो यह चाहती ही है कि सदन न चले, सदन की कार्रवाई के दिन कम से कम हों। लेकिन विपक्ष के लिए यही सदन एक ऐसा मौका होता है, एक ऐसा ठिकाना होता है, जहां पर सरकार उसे कोई भी जानकारी देने से मना नहीं कर सकती। यह जानकारी सदन की चर्चा में न भी आए, तो भी सरकारी फाईलों से निकलकर बाहर तक आ जाती है जिसका सदन के बाहर भी इस्तेमाल विपक्ष कर सकता है। हमारा तो यह साफ मानना है कि एक जिम्मेदार विपक्ष को किसी भी लोकतंत्र में सदन के पल-पल का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि सरकार अपने कुकर्मों को लेकर घिर जाए, घिरी रहे, और जनता के सामने उसके कुकर्म उजागर हों। कल जिस तरह राज्यसभा में सरकार के संसदीय कार्य राज्यमंत्री राजीव शुक्ला जाकर नवनिर्वाचित उपसभापति से दिन भर सदन स्थगित कर देने को कहते हुए पकड़ाए, और उसके बाद उनकी फरमाईश पर सदन स्थगित हो गया, इसे हम एक बहुत ही अलोकतांत्रिक, असंसदीय और अनैतिक नौबत मानते हैं। इससे देश की संसद के इस उच्च सदन का सम्मान घटा है। इसे लेकर न सिर्फ इस मंत्री वाली सरकार को अपने संसदीय बर्ताव के बारे में सोचना चाहिए बल्कि सत्तारूढ़ कांगे्रस पार्टी से आए हुए नए उपसभापति को भी सोचना चाहिए कि इस घटना से उनके और सदन के सम्मान पर आंच आई है, या नहीं? इस घटना से नक्सल कब्जे के जंगलों से लेकर, जंतर-मंतर और रामलीला मैदान तक संसद के खिलाफ खड़ी की जा रही हिकारत सही लगने लगती है। इसे मंत्री की सलाह, और उसे मानने, न मानने के उपसभापति के अधिकार जैसे तकनीकी बचाव की ढाल से बचाने की कोशिश बेकार है क्योंकि देश की सबसे बड़ी पंचायत के उच्च सदन में अगर अदालती जिरह में मुजरिम के बचाव जैसे कानूनी दांवपेंच इस्तेमाल किए जाएंगे तो उससे इसकी इज्जत नहीं बढ़ेगी। 
और जब सरकार की कोशिश यह है कि सदन न चले, तो उसी समय भाजपा भी सरकार-विरोधी रूख दिखाते हुए, प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगते हुए, इसी कोशिश में मदद कर रही है, तो यह पूरी तरह से गलत फैसला है, और भाजपा को चाहिए कि वह सदन में ओवरटाईम करे, कार्रवाई का समय बढ़ाने की जिद करे, दिन बढ़ाने की जिद करे, और सदन के पल-पल का बखूबी इस्तेमाल करे। संसद के ये अलग-अलग हिस्से लोगों को बुरी तरह निराश कर रहे हैं, और ऐसे में जब लोग अलोकतांत्रिक और तानाशाह अन्ना-बाबा या नक्सलियों के साथ हमदर्दी और अधिक करने लगेंगे तो नुकसान पूरे देश का होगा। 

235 एकड़ जंगल फर्जी पट्टे बना 50 करोड़ में बेचा


माइनिंग कंपनी को फायदा पहुंचाने पूर्व कलेक्टर, डीएफओ भी फंसे
राजस्व मंडल में भी हुआ खेल अब निरस्त करवाने रिवीजन
शशांक तिवारी
रायपुर, 21 अगस्त। सरगुजा जिले के रामचंद्रपुर इलाके में करीब 50 करोड़ के जमीन घोटाला मामले की जांच पूरी हो गई है। सरकारी और घने जंगल की जमीन को फर्जी दस्तावेजों के सहारे बेचने की अनुमति देने के लिए तत्कालीन कलेक्टर जी.एस.धनंजय को जिम्मेदार ठहराया गया है। इस मामले में डीएफओ और एसडीएम के खिलाफ भी कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। राजस्व बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष टी.राधाकृष्णन ने जमीन को फर्जी पट्टे पर चढ़ाने की अनुमति दी थी। इस मामले में रेवेन्यू बोर्ड में रिवीजन केस दायर किया जा रहा है। 
जमीन घोटाले पर सरकार ने सरगुजा कमिश्नर से जांच रिपोर्ट मांगी थी। कमिश्नर एम.एस.पैकरा ने अपनी रिपोर्ट राज्य शासन को भेज दी है। रामचंद्रपुर  ब्लॉक के इंदरपुर में कोल ब्लॉक के लिए 94 हेक्टेयर (करीब 235 एकड़) सरकारी जमीन निजी कंपनी फतेहपुर माइनिंग लिमिटेड को बेच दी गई। घोटाले का मास्टर माइंड लालजी यादव को बताया गया है। कमिश्नर ने जांच के बाद यादव समेत पटवारी, नायब तहसीलदार, उप पंजीयक सहित अन्य दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के भी निर्देश दे दिए हैं। जमीन बेचने की अनुमति निरस्त करने के आदेश कलेक्टर को दिए गए हैं। 
बताया गया कि इस मामले की जांच के लिए जल संसाधन मंत्री रामविचार नेताम ने भी अनुशंसा की थी। मुख्य सचिव सुनील कुमार ने भी स्थानीय नेताओं की शिकायत पर राजस्व विभाग से रिपोर्ट मांगी है। कमिश्नर श्री पैकरा ने 'छत्तीसगढ़Ó से चर्चा में बताया कि उन्होंने जांच रिपोर्ट राज्य शासन को भेज दी है। सूत्रों के मुताबिक तत्कालीन कलेक्टर धनंजय के अलावा तत्कालीन डीएफओ वी.एस.ध्रुव, एसडीएम राठौर को गलत तरीके से अनुमति देने के  मामले में जांच रिपोर्ट में जिम्मेदार ठहराया गया है। यह बताया गया कि पट्टा 34 लोगों को 1972 में आबंटित किया जाना बताया  गया। जबकि उक्त प्रकरण तहसील कार्यालय में उपलब्ध नहीं है। 
राजस्व पट्टा को देखने से यह पता चलता है कि पुराने दस्तावेज हासिल कर नाम चढ़ाए गए हैं। जबकि वर्ष 72 में राजस्व पट्टे के दस्तावेज अलग तरीके के थे। जिन लोगों के नाम से पट्टे जारी किए गए उनमें से कई लोग उस वक्त पैदा भी नहीं हुए थे। यह भी पता चला है कि कथित पट्टाधारी लोगों में से कई पड़ोसी राज्य झारखंड के रहवासी हैं। सूत्र बताते हैं कि फर्जी तरीके से खरीद-बिक्री में जिला प्रशासन के ऊपर से नीचे तक तमाम अफसरों की भूमिका रही है। कथित पट्टाधारियों ने नायब तहसीलदार के यहां जमीन बेचने के लिए अनुमति मांगी।
नायब तहसीलदार ने जांच कर प्रतिवेदन कलेक्टर को भेज दिया और कलेक्टर ने जमीन बेचने की अनुमति दे दी। दिलचस्प बात यह है कि पट्टे की जमीन बेचने की अनुमति देने के मामले में कलेक्टर ही अधिकृत होते हैं। नायब तहसीलदार को अपने यहां प्रकरण दर्ज करने का भी अधिकार नहीं होता। लेकिन इस मामले में प्रक्रिया उलट दी गई। तत्कालीन डीएफओ ने अपनी रिपोर्ट में जमीन वृक्षारोपण योग्य बता दिया था। जबकि उसके बड़े हिस्से में अभी भी सघन वन है। इसे बेचने की अनुमति नहीं दी जा सकती। 
यह बात सामने आई है कि जमीन एसकेएस इस्पात को बेचने की कलेक्टर ने अनुमति दी थी। लेकिन फतेहपुर माइनिंग लिमिटेड के नाम से रजिस्ट्री कर दी गई। इस पूरे मामले में उप पंजीयक को भी दोषी ठहराया गया है। पटवारी से लेकर नायब तहसीलदार और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश कमिश्नर द्वारा पहले ही दिए जा चुके हैं। 
फर्जी पट्टे बनाकर जंगल की जमीन को बेचने के इस षडय़ंत्र के खुलासे के बाद हड़कंप मचा हुआ है। 235 एकड़ जमीन को मात्र 50 करोड़ रुपए में बेच दिया गया है जबकि इस जमीन पर करोड़ों के सिर्फ पेड़ ही हैं। यह कोल ब्लाक एसकेएस इस्पात और प्रकाश इण्डस्ट्रीज को आबंटित हुआ है। जमीन की इस अफरा-तफरी के खुलासे से अधिकारी भी भौंचक हैं। इस मामले में प्रारंभिक तौर पर सिर्फ पटवारी और नायब तहसीलदार का ही निलंबन हुआ है। कमिश्नर की जांच रिपोर्ट के बाद जमीन की अनुमति देने वाले अफसरों के अलावा खरीद-बिक्री करने वालों पर भी कार्रवाई होने की संभावना है। शासन जल्द ही इस मामले में कार्रवाई कर सकता है। 

यह वक्त महज हक के इस्तेमाल का नहीं, जिम्मेदारी का भी


संपादकीय
21 अगस्त
मुंबई में इस वक्त महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अकेले नेता राज ठाकरे एक रैली करने जा रहे हैं। सरकार की इजाजत न मिलने पर भी उन्होंने अपना यह फैसला कायम रखा, और उनके मुद्दे पिछले दिनों मुंबई में मुस्लिम समाज द्वारा की गई तोडफ़ोड़ और हिंसा के हैं। असम और म्यांमार में मुस्लिमों पर हिंसा का विरोध करते हुए मुंबई के मुस्लिम समाज के दसियों हजार लोग जुटे थे और  वह भीड़ बेकाबू और हिंसक होकर शहीदों के स्मारकों पर भी पिल पड़ी थी। वहां पर तोडफ़ोड़ की तस्वीरों में पूरे देश के लोगों को विचलित कर दिया था, कर दिया है, और लोगों ने इसे देश के खिलाफ किया गया काम माना। 
यह बात सही है कि तस्वीरें झूठ नहीं बोलतीं, और कम से कम इस एक मामले में शहीदों के स्मारक पर लात मारते हुए लोग इसी विरोध प्रदर्शन वाले थे, और मीडिया में तैरती उनकी तस्वीरों के पीछे कोई विदेशी हाथ नहीं है। लेकिन यह भी सही है कि किसी भी समाज या शहर में जब एक बड़ी भीड़ नाराजगी के साथ जुटती है तो उसमें से कुछ या अधिक लोग कानून के खिलाफ कई मौकों पर हिंसा करने लगते हैं। इस बात को लेकर सारे प्रदर्शनकारियों को, या उनके विरादरी को देश के खिलाफ मान लेना भी गलता होगा, और शहीद स्मारक का अपमान करने वाले लोगों की शिनाख्त के साथ-साथ उन पर कार्रवाई भी शुरू हो चुकी है। इस मामले में आज लिखने की जरूरत इसलिए हो रही है कि असम की आग अभी ठंडी नहीं पड़ी है। वहां पर तो लाखों लोग आज बेघर हैं ही, देश भर से शायद लाख या लाखों लोग अपने कमाने-खाने की जगह छोड़कर उत्तर-पूर्वी राज्यों में लौट गए हैं, दहशत के बीच, जान बचा कर। ऐसे में आज जरूरत देश और प्रदेशों की सरकारों को हालात सम्हालने देने की है, चाहे वे किसी भी पार्टी की सरकारें हों, चाहे वे किसी भी राज्य में हों या देश में हो। ऐसी नौबत के बीच राज ठाकरे का मुंबई में यह प्रदर्शन, या फिर किसी और पार्टी या नेता का कहीं और प्रदर्शन हो, वह निहायत गलत है। किसी धर्म या जाति के लोग बिना किसी संगठित राजनीतिक दल के भी कहीं-कहीं भीड़ की शक्ल में इक_ा हो रहे हैं, और वे हिंसा भी कर रहे हैं। उत्तरप्रदेश में एक महावीर प्रतिमा पर मुस्लिम समाज के लोगों का प्रदर्शन हुआ और इसका कोई तर्क भी नहीं था। लेकिन तनाव के दौर में बहुत किस्म के गलत काम होते हैं, और यही वक्त होता है जब संगठित और सुलझे हुए लोगों को अपने निजी और अपने संगठन के तात्कालिक फायदे को छोड़कर, भूलकर एक दरियादिली दिखानी चाहिए। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उनके बाकी परिवार वाली शिवसेना, ये दोनों ही संगठन अपनी शुरुआत से ही मुस्लिम-विरोधी या गैरमराठी-विरोधी जाने-पहचाने जाते हैं। ऐसे में इनके किसी प्रदर्शन के जायज होने पर भी आज का वक्त ऐसे काम का नहीं है। ऐसा करके राज ठाकरे उन लोगों के बीच कुछ राजनीतिक फायदा तो पा सकते हैं जो लोग पिछले दिनों मुंबई में हुई हिंसा को लेकर नाराज हैं, या शहीदों के अपमान को लेकर पूरे देश में विचलित हैं। लेकिन उनके जख्मों पर मरहम लगाने के लिए भी, हिंसा के जिम्मेदार लोगों को सजा दिलाने के लिए भी, आज के माहौल में ऐसे प्रदर्शन की न तो जरूरत है, और न ही राष्ट्रीय एकता और शांति के हिसाब से इसकी कोई गुंजाईश है।
हम इस बारे में आज मुंबई से दूर रहते हुए भी इसलिए लिख रहे हैं कि कल के दिन देश के तनाव के माहौल में हमारे इर्द-गिर्द भी अगर कोई किसी मुद्दे पर ऐसे प्रदर्शन की बात सोचे, तो उसके खतरों के बारे में हम अभी भी अपने आसपास के लोगों को आगाह कर दें। हर किसी को नाजुक मौकों पर प्रदर्शन के अपने अधिकार के इस्तेमाल की जिद के साथ-साथ यह भी सोचना चाहिए कि जिस लोकतंत्र ने प्रदर्शन का यह अधिकार दिया है, उसी लोकतंत्र ने किस तरह की जिम्मेदारियां भी दी हैं। लोकतंत्र एक ही सिक्के के दो पहलुओं, अधिकार और जिम्मेदारी, की तरह है, और किसी सिक्के का सिर्फ एक पहलू कोई कीमत नहीं रखता। इसलिए देश भर में जहां भी लोग राज ठाकरे की तरह की बात सोच रहे हैं, उन्हें अपनी उत्तेजना, अपने फायदे, अपने  प्रदर्शन पर फिलहाल काबू रखना चाहिए। 

महान खूबियों से कोसों दूर, और खामियों से लदे हुए नेताओं का यह नतीजा


20 अगस्त 2012
संपादकीय
भारत में अभी-अभी हुई ताजा हिंसा के लिए एक बार फिर पाकिस्तान का हाथ खबरों में आया है। भारत ने पाक सरकार से विरोध दर्ज किया है कि उसकी जमीन से गढ़ी हुई तस्वीरें अफवाहें फैलाने और हिंसा के लिए इस्तेमाल की गई हैं, और पाकिस्तान ने इस बात के सुबूत हिंदुस्तान से मांगे हैं। मुंबई हमलों के ढेर से सुबूतों के आ जाने के बाद न तो भारतीय कानून के तहत, और न ही पाकिस्तानी कानून या सरकार के तहत अब तक किसी को सजा हो पाई है। इसलिए यह सोचना मुनासिब नहीं होगा कि भारत में अफवाहों को हवा देने के लिए जिम्मेदार कहे जाने वाले पाकिस्तानी लोगों पर कोई कार्रवाई जल्द होगी। 
सवाल यह उठता है कि आरोपों की नाल पाकिस्तान की तरफ घूम जाने से, या कि घुमा देने से कितने वक्त तक काम चलेगा? क्या इससे आज के हिंसक हालात को लेकर भारत की जिम्मेदारी कुछ कम हो सकती है? क्या केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, और राजनीति से परे के सामाजिक नेता इस बात से बरी हो सकते हैं कि यह देश इतने नाजुक हाल में कैसे रखा गया है, या आ गया है कि सरहद पार से आए किसी कंकड़ से भी यह चूर-चूर हो जाए? दरअसल जब आसानी से कोई दुश्मन मिल जाता है तो लोग अपनी जिम्मेदारी से बरी होने की एक चूक करने लगते हैं। जैसे किसी घर के भीतर जब एक बच्चे की शिनाख्त शरारत के लिए खूब अच्छे से हो जाती है, तो हर गड़बड़ के लिए लोगों के पास उसका एक नाम तैयार रहता है कि उसने ही यह किया होगा। इसी तरह मुहल्ले के एक बदमाश का नाम बहुत से लोगों की गलतियों के लिए याद रखकर, भले लोग अपनी जिम्मेदारियों से बरी हो जाते हैं। यह सिलसिला तबाही से बचाव की अपनी जिम्मेदारी और अपनी तैयारियों को कमजोर करने का काम भी करता है। 
आज इक्कीसवीं सदी के इस साइबर-जमाने में क्या कोई देश किसी दूसरे देश से ऐसी उम्मीद भी कर सकता है कि वहां से बर्बादी की कोशिशें नहीं होंगी? किसी देश में बड़े-बड़े आंदोलनों को परदे के पीछे से सहारा और बढ़ावा देकर उस देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिशें बाजारू मुकाबले वाला कोई दूसरा देश नहीं करेगा? अंतरराष्ट्रीय संबंध और किसी देश की राजनीति या सरकार, इनमें से कुछ भी महज नैतिकता के आधार पर नहीं चलते। कूटनीति का नाम बदलकर राजनय कर दिया गया था क्योंकि कूटनीति शब्द अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन हकीकत तो यही है कि बाजार से लेकर फौज तक, और अंतरराष्ट्रीय असर तक के मुकाबले में अपने-आपको जिंदा रखने के लिए बहुत से देशों को घोषित और अघोषित रूप से अनैतिक काम करने पड़ते हैं, या सोच-समझकर अनैतिक काम किए जाते हैं। ऐसे में अगर कोई देश इतना नाजुक बना हुआ है कि सरहद पार के कुछ दर्जन कम्प्यूटरों से आई अफवाहों से यह देश झुलस जाए, तो यह झुलसने वाले देश की शराफत की मासूमियत नहीं है, यह उसकी कमजोरी है और हिफाजत की कमी है। 
हिंदुस्तान में आज की इस हिंसा और आज के इस क्षेत्रीय-आपसी तनाव से परे पिछले ही पखवाड़े आधे देश में अंधेरा देखा है। जानकार लोगों का अंदाज यह है कि यह अंधेरा भारत की अपनी बिजली-व्यवस्था की कमजोरी और गड़बड़ी के चलते हुआ। इसमें तो कोई दुश्मन भी नहीं था। लेकिन कल्पना करें कि किसी दुश्मन देश में बैठे कम्प्यूटर घुसपैठिए अगर भारत के बिजली कम्प्यूटरों, या रेल और टेलीफोन कम्प्यूटरों में घुसकर इंतजाम को तबाह कर दें, तो क्या होगा? बैंकों के कम्प्यूटरों को तबाह कर दिया जाए, तो क्या होगा? खातेदार क्या बैंकों में आग लगाने की नौबत में नहीं आ जाएंगे? तो ऐसा एक साइबर हमला इस देश को गृहयुद्ध में भी धकेल सकता है, और यहां कि अर्थव्यवस्था को भी चौपट कर सकता है। सरहद पार से आए फर्जी वीडियो या तस्वीरों की बात कुछ ऐसी ही लगती है कि भारत ने अपनी इमारत सिर्फ शीशों से बना रखी है, और पत्थरों से बचाव की उसकी कोई समझ नहीं है। 
हम आज की इन अफवाहों के लिए एक आसान कुसूरवार मिल जाने को तसल्ली का सामान मानने से इंकार करते हैं। हिंदुस्तान को अपने इंतजाम को सुधारना होगा, अपनी चौकसी तेज रखनी होगी, अपने लोगों को बर्दाश्त सिखाना होगा, देश के भीतर तनाव की वजहें घटानी होंगी, और इनमें से किसी भी कमी की तोहमत किसी दुश्मन देश पर लगाना नाजायज होगा। यह देश इतनी नाजुक दीवारों के साथ न तो दूसरे देशों के बीच सुरक्षित है, और न ही इतनी कमजोर कागजी दीवारों के साथ यह किसी किस्म के तनाव देश के भीतर ही झेल सकता। और यह सारी तैयारी पांच बरसों तक ही देश पाने वाली सरकारों के बस की नहीं है, ऐसी सरकारें बनाने वाली राजनीतिक पार्टियों के बस की भी नहीं है। यह तैयारी दूरदर्शी, बड़े और ताकतवर नेताओं के बस की बात है, जिन्हें महान नेता कहा जा सके। ऐसी महान खूबियों से कोसों दूर, और खामियों से लदे हुए नेताओं का यह नतीजा है कि आज यह देश एक कंकड़ फेंककर झुलसाया जा सकता है।  

नीयत का तेल-घी न हो तो कढ़ाही का आकार बढ़ाने से हलुवा नहीं बन जाता


संपादकीय
19 अगस्त
भारत ने पाकिस्तान से इस बात की शिकायत की है कि एक समुदाय की हिंसा या एक समुदाय पर हिंसा के झूठे नजारे दिखाने वाले गढ़े हुए वीडियो वहां से हिन्दुस्तान पहुंचे थे और उनकी वजह से यहां हिंसा भड़की। पाकिस्तान का नाम आने के पहले भी संसद में इस बात को लेकर नाराजगी थी और इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर रोक  की बात भी हो रही थी और यह बात भी हो रही थी कि कैसे थोक के एसएमएस पर रोक लगाई जाए। लेकिन लोगों की समझ और इस टेक्नालॉजी के बेकाबू मिजाज को देखें तो रोक की यह बात कुछ उसी किस्म की लगती है जैसे चाकू से गले कटने पर सब्जी काटने के चाकुओं पर रोक लगा दी जाए। यह मामला औजारों का नहीं है, यह औजारों को हथियार बनाकर इस्तेमाल करने वाले इंसानी मिजाज का मामला है। 
पाकिस्तान की बात क्यों करें, हिन्दुस्तान के भीतर जितने लोग जितने तरह की बातें फेसबुक पर, ट्विटर पर, एसएमएस और एमएमएस पर डाल रहे हैं, उनके लिए हो सकता है कि पाकिस्तान से हथियार बनाकर उनके हाथों में थमाया गया होगा, लेकिन इस साइबर हथियार से गोलियां तो हिन्दुस्तानी ही दाग रहे हैं। टेक्नालॉजी का जो इस्तेमाल आज दुनिया के हर दायरे में हो रहा है उसके चलते इस पर किसी तरह की रोक मुमकिन नहीं है। हथौड़े से कोई कत्ल हो जाए, तो पूरी दुनिया के हथौड़ों पर रोक लगा दी जाए तो उससे हथौड़े वाले कातिल को तो दूसरा औजार ढूंढना पड़ेगा, लेकिन दुनिया के कल कारखाने उससे थम जाएंगे। इसलिए तकनीक को कोसने और उस पर रोक लगाने की मांग भावनात्मक अधिक है, उसका व्यवहारिक पहलू कुछ नहीं है। दूसरी तरफ सरकार के पास आईटी कानून इतना सख्त है कि उसके तहत कार्रवाई की जा सकती है, और इंटरनेट या टेलीफोन, कम्प्यूटर या सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटें ऐसी टेक्नालॉजी से लैस हैं कि उन पर किया गया कोई भी काम अदालत तक अमूमन साबित किया जा सकता है। यहां पर फिर हम यह याद दिलाना चाहेंगे कि एक औजार को हथियार बनाकर नफरत फैलाने या हिंसा के लिए उकसाने का काम जो लोग कर रहे हैं, उन्होंने अपने आसपास किसी को भी ऐसी कम्प्यूटर-हरकत के लिए जेल जाते नहीं देखा होगा। अगर सरकार की जांच एजेंसियां असरदार होतीं, सरकारों में नफरतजीवी लोगों पर, ऐसे संगठनों पर कड़ी कार्रवाई का राजनीतिक हौसला होता, तो लोग इस लापरवाही से, या इस दुस्साहस से आग को बढ़ाते नहीं चलते। यह तो आज की संसद से लेकर सड़क तक की फिक्र श्मशान वैराग्य से अधिक कुछ नहीं है, क्योंकि लोग समकालीन इतिहास में अपनी फिक्र दर्ज कराना चाहते हैं। जब जो बातें खबरों में होती हैं, लोग उनके बारे में चर्चा में हिस्सा इसी तरह लेते हैं, जिस तरह राह से गुजरते जनाजे में लोग कंधा लगाते दस कदम चल लेते हैं। यह दौर निकल जाएगा और इसके बाद न संसद में इसकी चर्चा होगी, और न सड़क पर। 
हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि देश का साइबर कानून तो बहुत कड़ा बना दिया गया है, लेकिन इस पर अमल और इसके इस्तेमाल का जिम्मा उन्हीं लोगों पर है जो लोग दूध में मिलावट पर अठारह बरस बाद फैसला करवा पाते हैं। ऐसे लोग जब तक अपने रजिस्टर में कार्बन लगा सकेंगे, तब तक नफरतजीवी लोग, आतंक और तबाही फैलाने वाले लोग हजारों मील शहरी जंगल और जला चुके होंगे। आज भारत में किसी भी कानून के तहत होती जो कार्रवाई दिखती है, वह मोटे तौर पर राजधानियों की हिफाजत के लिए होती है, और जहां मीडिया का फोकस है, वहां होती है। जिस हिन्दुस्तान में गरीब, ग्रामीण और बेजुबान लोग बसते हैं, वहां शायद इस कार्रवाई का दो-चार फीसदी भी नसीब नहीं होता। लेकिन इस फर्क को देखने की जहमत भी न मीडिया उठाता, और न ही संसद के लंबे-लंबे आंसू सने भाषणों की बाद में कोई याद रह जाती। रातों रात कोई हिफाजत नहीं बढ़ सकती। केन्द्र से लेकर राज्य सरकारों तक को सत्तारूढ़ पार्टी की राजनीतिक प्राथमिकताओं को छोड़कर हौसले से और ईमानदारी से आतंकियों और बदमाशों पर कार्रवाई करनी पड़ेगी, तेजी से करनी पड़ेगी, और अदालती इंतजाम ऐसा करना पड़ेगा कि वहां भी तेजी से बदमाशों को सजा मिल सके, इसके बिना आज की तरह के खतरे बने रहेंगे, और लोग संसद में श्मशान की तरह की बात करते रहेंगे कि गुजरने वाला कितना भला था। 
भारत के लोगों को इंसाफ और सामाजिक जवाबदेही सिखा और समझा पाना आसान बात नहीं है। देश की राजनीतिक ताकतों की इसमें दिलचस्पी भी नहीं है। इसलिए लोग तो एक-दूसरे को ऐसे भड़काऊ संदेश और तस्वीरें भेजते ही रहेंगे। जब तक हर शहर, हर दायरे, हर बिरादरी के ऐसे मुजरिमों में से कुछ-कुछ जेल नहीं जाएंगे तब तक बाकी लोगों को अपनी कानूनी जिम्मेदारी समझ भी नहीं आएगी। देश के कानून में और अधिक कड़ाई की जरूरत बिल्कुल नहीं है, मौजूदा कानूनों को कड़ाई से लागू करने की जरूरत है। सरकारों में नीयत का तेल-घी न हो, और कढ़ाही का आकार बढ़ाते चले जाएं, तो उससे हलुवा नहीं बन जाता। 

देश की ऐसी नौबत बहुत फिक्र की है


संपादकीय
18 अगस्त
कल संसद में पेश सीएजी की रिपोर्ट कोई नया सदमा लेकर नहीं आई है क्योंकि इस तरह के आंकड़े देखने का आदी अब यह देश हो चुका है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके दायें हाथ मोटेंक सिंह अहलूवालिया को 26 रूपए रोज खर्च करने वाला गरीब नहीं दिखता है, लेकिन अंबानियों को दसियों हजार करोड़ का फायदा, जीएमआर को हजारों करोड़ का फायदा, कोयला खदान पाने वाले कारखानेदारों को लाखों करोड़ का फायदा देकर इस सरकार ने टेलीफोन कंपनियों को दिए हजारों-लाखों करोड़ के फायदे का सिलसिला जारी रखा है। यूपीए सरकार की साख का हाल आज यह है कि उस पर बेईमानी और भ्रष्टाचार का कोई भी आरोप लग जाए, जनता आंख मूंदकर उसे सही मानेगी। कांग्रेस पार्टी के वकील प्रवक्ता जिस तरह से सीएजी के खिलाफ बोलते हुए अपनी सरकार के भ्रष्टाचार को बचाने की कोशिश कर रहे हैं वह बात अदालत में सबसे बुरे मुजरिमों को बचाने की वकील की कोशिश से अधिक कुछ नहीं लग रही है। और इस हालात के बीच प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह बात पूरी तरह से बेतुकी लगती है कि वे व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हैं और उनके खिलाफ कोई भी बात साबित होगी तो वे राजनीतिक जीवन से सन्यास ले लेंगे। वैसे भी कांग्रेस पार्टी के भीतर आने वाले चुनाव के बाद मनमोहन सिंह के लिए सन्यास की बात जोरों से चल ही रही है, और हमारा आज का ऐसा अंदाज है कि इन तमाम बातों से मनमोहन सिंह बेदाग शायद निकल भी नहीं पाएंगे। इसलिए राहुल गांधी की जगह बनाने को, या फिर दागदार साबित होने पर, किसी न किसी वजह से उनका सन्यास तय दिखता है। हालांकि एक वक्त हम भी उनको शरीफ मानते थे और पिछले बरसों में हमने बार-बार उनके नाम यह नसीहत लिखी थी कि इस गंदगी को छोड़कर उन्हें पढ़ाने के लिए चले जाना चाहिए और किताबें लिखनी चाहिए। लेकिन वे एक ऐसे शाकाहारी और ईमानदार गब्बर बने रहे, जिनके गिरोह में सांभा से लेकर कालिया तक हर कोई लूटपाट करते हुए ओवरटाइम करते रहा। ऐसी ईमानदारी किस काम की? और मनमोहन सिंह आज किस मुंह से आरोप साबित होने पर सन्यास की बात करते हैं? उनकी सरकार, उनके मंत्रिमंडल और उनके दफ्तर, इन सबके भ्रष्टाचार में शामिल होने की बातें दर्जनों मामलों में सामने आ चुकी है, और हमारा यह मानना है कि उनका इस सन्यास की बात कहने का कोई नैतिक अधिकार भी नहीं रह गया है।
केन्द्र सरकार की ऐसी गिरी हुई साख इस देश की एकता, अखंडता और इसके अमन-चैन सबको प्रभावित कर रही है। आज जगह-जगह जब बहुत से प्रदेशों में एक-दूसरे के खिलाफ तनाव फैला हुआ है, जब आधा दर्जन प्रदेशों से उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोग छोड़-छोड़कर वापिस लौट रहे हैं, तब अगर एक असरदार और ईमानदार प्रधानमंत्री देश में होता, यूपीए गठबंधन की मुखिया सोनिया गांधी के अनगिनत साथी भ्रष्टाचार में जेलों में नहीं होते, तो ऐसे नेताओं की एक आवाज पर देश में शांति भी लौट पाती, और लोग भी अपनी-अपनी पढ़ाई, अपनी-अपनी नौकरी की जगहों पर महफूज बने रहते। लेकिन आज इन लोगों का कुछ बोलने का मुंह ही नहीं बचा है। इस बारे में हर कुछ हफ्तों में हमको लिखना पड़ता है क्योंकि एक दमदार प्रधानमंत्री के वजन की जरूरत कहीं न कहीं दिखती है। इस देश के दो बड़े मुखिया, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी, दोनों राजनीति की कड़ी और कड़वी समझ से दूर के हैं और दोनों ही अपने साथियों पर निर्भर हैं, और इन साथियों में बेईमानों की गिनती कम नहीं है। राजनीति समझने वाले इनके आसपास के सबसे बड़े नेता को राष्ट्रपति भवन भेजकर कांग्रेस ने जो रूख दिखाया है, उसके बारे में बहुत से लोगों का यह मानना है कि राहुल गांधी को सरकार की लगाम पकड़ाने का रास्ता साफ किया गया है। लेकिन अब यूपीए गठबंधन के भीतर उसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी के पास ऐसा कोई राजनीतिक नेतृत्व नहीं बचा है जो सरकार, गठबंधन, पार्टी और देश सबको समझता हो और सबके बीच उसकी बात का वजन हो। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने का बाद अब तो शायद विपक्ष से बात करने के लिए भी कांग्रेस के पास किसी नेता का टोटा पड़ जाएगा। देश की ऐसी नौबत बहुत फिक्र की है।

sunil kumar @editorsunil on twitter


17 Aug 2012


* rumours on net, sms. this is collateral cost of democratization of medium. totally beyond check. u check a thousand, act, & 10,000 more...
* some politicians words 4 peace r sandwiched in such thick layer of IFs & BUTs, the intention of peace not even visible in their statements.
* hindu and muslim fanatics, both parasites thriving on each other. and they send greeting cards to each-other for long life.
*hindus troubled in pakistan, muslims troubled in india, north-easterners troubled in many parts of india, FANATICS ARE LOVIN IT...
* microphone of history is so sensitive, it records silence of people who have a voice and keeping silence when it is trouble around.
* look at capitalism! when india is burning, in trouble, in shelters, running 4 life, there is News - ‘Sensex gains 88 points in early trade’

editor sunil kumar on twitter


16 Aug 2012

* only a society with vocal ignorants and silent sensibles would tolerate ANNAs and BABAs...
* baba ramdev says- Corrupt and hoarders of black money should not be allowed in Parliament. (WHAT ABOUT KARNATAKA ASSEMBLY BABA...?!?!)
*in the middle of black money and white money, the indian color box also has huge saffron money..
*some trying 2 take back india 2 Ramlila & jantar-mantar days. & it suits 2 cave-ideology. but people r more mature now, just media isn’t.
*anyone coloured in a religion had never been trustworthy in my experience...., like ramdev
*being secular is like being virgin. either you are, or you are not.
*baba after anna, reminds me of relay race... :-)

घर पर चुप बैठे अमनपसंद और ओवरटाईम करते नफरतजीवी


17 अगस्त 2012
संपादकीय
टेलीफोन और इंटरनेट की तकनीक का इस्तेमाल करके भारत में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों के बीच एक दहशत फैलाई गई और नतीजा यह है कि दक्षिण से लेकर पश्चिम तक के महानगर छोड़कर उत्तर-पूर्व के लोग वापिस भाग रहे हैं। संसद में आज इस नौबत को लेकर यह भी बात उठी कि एसएमएस या इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग तक पर किस तरह की रोक लगाई जाए ताकि साजिशें कारगर न हो सकें।  इसके पहले पिछले कुछ दिनों से लगातार कुछ वीडियो क्लिप जोड़-तोड़कर, कुछ तस्वीरों को छेड़छाड़ करके, और कुछ असली तस्वीरों को भी, जगह-जगह फैलाकर किसी एक धर्म के लोगों, किसी एक इलाके के लोगों के खिलाफ नफरत फैलाने की हरकत चल ही रही थी। और जिस तरह कुछ बरस पहले बात की बात में गणेश प्रतिमाओं के दूध पीने की अफवाह को लोगों ने हाथोंहाथ ले लिया था, उसी तरह आज हिंदुस्तान के लोग हवा में तैर रही अफवाहों को अपने कंधों पर चढ़ाकर दूर-दूर तक बांटकर आ रहे हैं। संसद में फेसबुक और ट्विटर जैसी वेबसाईटों पर जैसी नफरत फैलते दिख रही है, और जितना खुलकर लोग अपने नाम के साथ इस नफरत को आगे बढ़ा रहे हैं, उससे यह बात जाहिर है कि ऐसे लोग चाहे फीसदी में न आते हों, चाहे इनका अनुपात न के बराबर हो, लेकिन ये तालाब के पूरे पानी को गंदा करने की ताकत रखने वाले अकेले इंसान (मछली को क्यों गाली देना?) हैं।
अब सवाल यह उठता है कि जब साम्प्रदायिक लोग, नफरतजीवी लोग अतिसक्रिय होकर ओवरटाईम करते हैं, तब जिम्मेदार और अमनपसंद लोग सिर्फ उसे पढ़ते रहते हैं तो नफरत का मुकाबला आखिर कैसे हो सकता है? टेक्नॉलाजी ने सरकार के हाथ काटकर रख दिए हैं, और सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, पूरी दुनिया में। तकनीक का मिजाज ऐसा है कि वह पहाड़ से उतरती तूफानी नदी की तरह है, जिस पर कोई बांध बनाना मुमकिन नहीं है। इसलिए आज संसद में सिर्फ एक भावना देखी है, कोई संभावना नहीं देखी है। अब जैसा कि नकली नोट बाजार से असली नोटों को खदेड़कर बाहर कर देते हैं, उसी तरह नफरत लोगों के बीच से मोहब्बत को खदेड़कर बाहर करने की ताकत कुछ अधिक रखती है। धर्म, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर दूसरों को भगाने, मारने, जलाने की हसरत रखने वाले लोग अधिक असरदार होते हैं। मोहब्बत की बजाय नफरत में एक करने की ताकत कुछ अधिक होती है। और फिर जिनके भीतर नफरत भरी हुई है, उनको ऐसी ताकतों की मदद भी मिल जाती है जो दुनिया के जाने किस कोने पर बैठे रहकर भारत की तबाही देखना चाहती हैं। यह नौबत भयानक है। और अभी तो भारत में बहुसंख्यक समुदाय को विचलित करने वाली कोई अफवाह हवा में नहीं है। अगर ऐसी कोई नौबत आएगी तो उस दिन राजनीतिक दल अपनी लार को पता नहीं किस रूमाल से पोंछ सकेंगे और देश-प्रदेश की सरकारें पता नहीं कैसे अफवाहों से उपजी आग को बुझा सकेंगी। इस पूरे खतरे का एक ही इलाज है, देश के लोगों के बीच समझबूझ को बढ़ाना और नफरत फैलाने वालों को उजागर करना। यह बात सुझाना हमारे लिए आसान है लेकिन इस पर अमल करना और इसे कामयाब करना, नाकामयाबी से थोड़ी ही अधिक गुंजाइश की बात है। देश के ऐसे तमाम लोगों को अपने आसपास के लोगों के बीच मुंह खोलना होगा जो कि देश का भला चाहते हैं, सभी इंसानों का भला चाहते हैं। चुनिंदा तबकों का बुरा चाहने वाले लोग तो बहुत हैं, उनकी राजनीतिक हसरतें भी हैं और साम्प्रदायिक हसरतें भी। इन सबको उजागर करने वालों की अपनी साख भी अच्छी होनी चाहिए। और यह साख सिर्फ धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता या सद्भावना के मोर्चे पर अच्छी साख नहीं हो सकती, इसका ईमानदारी के मोर्चे पर भी अच्छा होना जरूरी है, वरना भ्रष्ट, बेईमान और चोर की बात पर कौन भरोसा करेगा। यह पूरी बात हम इसलिए छेड़ रहे हैं कि लोगों को इस चर्चा को आगे बढ़ाना होगा, वरना हिंसक लोग तो जुटे हुए हैं ही। 

कुकर्मों से लदी सरकारें क्या काबू कर सकती हैं?


16 अगस्त 2012
संपादकीय
कर्नाटक में उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों पर हमले की अफवाह फैली तो बात की बात में दसियों हजार लोग रेलवे स्टेशन पर इक_ा हो गए और असम की तरफ जाने वाली रेलगाड़ी में पांव धरने की जगह भी नहीं बची। यह उस वक्त हो रहा है जब असम झुलसा हुआ है, जल रहा है और अपने घर से बेदखल है। यह उस वक्त हो रहा है जब मुंबई में मुसलमानों ने असम-म्यांमार की मुस्लिम मौतों के खिलाफ एक हिंसक प्रदर्शन वहां किया, यह उस वक्त हो रहा है जब असम को लेकर दिल्ली में एक राजनीति भी चल रही है और लगी आग के बीच हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं के मुद्दे भी उठाए जा रहे हैं। ऐसे में कर्नाटक छोड़कर भाग रहे उत्तर-पूर्वी लोगों को वहां की सरकार, वहां की सत्तारूढ़ भाजपा, आरएसएस से लेकर असम सरकार और केंद्र सरकार तक, हर किसी ने यह दिलासा दिया है कि इन लोगों को कर्नाटक में कोई खतरा नहीं है और वे छोड़कर न जाएं। लेकिन अपनी जान पर जिनको खतरा लगता है वे छोड़कर भाग रहे हैं। यह खतरनाक नौबत उस असम में और कैसे हालात पैदा करेगी जहां पर आज भी हालात बेकाबू हैं और सेना तैनात है। कर्नाटक की अफवाह वहां पहुंचते ही वहां हिंसा का एक नया दौर शुरू हो गया है, और यह जख्म जल्दी भरने वाले भी नहीं हैं। 
उत्तर-पूर्व के लाखों लोग कर्नाटक में पढ़ रहे हैं या बसे हुए हैं। उनके बीच ऐसी दहशत फैलने से देश के उत्तर-पूर्वी हिस्से और बाकी देश के बीच आपसी समझ की एक कमी फिर सामने आती है, और इसके लिए बाकी देश ही जिम्मेदार है जो कि सरहदी सूबों को साथ रखने में कमजोर है। यह एक भयानक नौबत है कि देश के भीतर ही एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश में सिर्फ इसलिए खतरा झेल रहे हैं कि वे उस प्रदेश के हैं। यह बात भारत के लोकतांत्रिक और विविधतावादी ताने-बाने के ठीक खिलाफ है। और ऐसी नौबत के पीछे हमें बहुत सी ताकतें जिम्मेदार लगती हैं। कर्नाटक में साम्प्रदायिकता, दंगों और हिंसा का एक इतिहास रहा है। पिछले बरसों में वहां पर श्रीराम सेना जैसे साम्प्रदायिक संगठन ने पश्चिमी या ईसाई संस्कृति का आरोप लगाते हुए जिस तरह के खुले हिंसक हमले किए, उससे भी वहां के अमनपसंद हिंदू समाज की साख चौपट हुई है। धर्म और संस्कृति के ऐसे गुंडा-ठेकेदारों के चलते कर्नाटक में युवा पीढ़ी या आधुनिक समाज के बीच भारी दहशत बनी हुई है और बरसों से जारी ऐसी हिंसा को खत्म करने के लिए कर्नाटक की भाजपा सरकार ने कुछ भी नहीं किया। बल्कि पाठकों को याद होगा कि इस सरकार के एक से अधिक मंत्रियों ने समय-समय पर सार्वजनिक रूप से बहुत ही दकियानूसी किस्म की बातें लड़कियों और महिलाओं के पहरावे को लेकर की, वहां के स्कूलों में गीता को अनिवार्य करने की बातें कीं, और कुल मिलाकर साम्प्रदायिक-समानता का माहौल खराब किया। यही वजह है कि आज जब उत्तर-पूर्व के लोगों को मारने की अफवाह वहां फैली तो असुरक्षा की दिमागी हालत के बीच जीते वहां के अल्पसंख्यक लोगों या उत्तर-पूर्वी लोगों को आनन-फानन इस पर भरोसा हो गया। इस तरह कर्नाटक की सत्तारूढ़ पार्टी, वहां की सरकार और वहां के हिंदू संगठनों में से कुछ इस खतरनाक नौबत के लिए जिम्मेदार हैं। यहां दो और बातों को याद दिलाना जरूरी है कि किस तरह श्रीराम सेना का मुखिया तहलका के स्टिंग ऑपरेशन में यह कहते वीडियो कैमरे पर कैद हुआ था कि वह मोटे भुगतान के एवज में वहां दंगा करवा सकता है। दूसरी घटना भी इसी संगठन को लेकर है जिसके लोग कर्नाटक में कुछ महीने पहले पाकिस्तान का झंडा फहराकर यह तनाव फैलाना चाहते थे कि यह झंडा मुसलमानों ने फहराया है। इस मामले में श्रीराम सेना के लोग गिरफ्तार भी हुए हैं और जांच में यह बात साबित भी हुई है। 
केंद्र सरकार इस नौबत के लिए इसलिए जिम्मेदार है क्योंकि पूरे देश के लोगों को अपनी हिफाजत का जो भरोसा एक मजबूत राष्ट्रीय नेतृत्व के भरोसे हो सकता है, वह देश से गायब है। मनमोहन सिंह से लेकर सोनिया गांधी तक, केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन में एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसकी नीयत पर, जिसकी ताकत पर और जिसकी लीडरशिप पर पूरे देश को भरोसा हो। इसलिए विश्वास की यह कमी भी इस दहशत के पीछे है। 
यह एक बहुत खतरनाक हालत इसलिए है कि ऐसी कुछ हत्याओं से, ऐसी कुछ अफवाहों से देश के किसी भी राज्य में किसी दूसरे राज्य लोगों को भगाया जा सकता है, या लोग खुद ही छोड़कर भाग सकते हैं क्योंकि उन्हें अपनी जान खतरे में दिखती है। ऐसे में कैसे यह देश एक रह पाएगा और कैसे लोगों के मन एक रह पाएंगे? ऐसे खतरनाक हालत में भी आज देश की कुछ राजनीतिक ताकतें और कुछ लिखने-पढऩे वाले लोग अपनी साम्प्रदायिक विचारधारा के मुताबिक आग को भड़काने में लगे हुए हैं। इस नौबत से निपटना पूरी तरह हम कर्नाटक और देश की सरकारों की जिम्मेदारी मानते हैं, और ये दोनों ही अपने-अपने कुकर्मों के तले इस कदर दबी हुई सरकारें हैं कि इनकी बात पर किसी को कोई भरोसा शायद ही हो। यह हालत बहुत फिक्र पैदा करती है।