भारतीय लोकतंत्र, आने वाले दिन सिर्फ अंधकार भरे हुए?

संपादकीय
9 जुलाई 2013
हिन्दुस्तान की हवा में खासा जहर घुल गया है। जो लोग खबरों में रहते हैं, उनके मुंह खुलते हैं, और अपने विरोधियों के बारे में ऐसी बातें बरसाना शुरू कर देते हैं, जिसकी कोई बुनियाद नहीं होती। और ऐसे लोगों में कांग्रेस के दिग्विजय सिंह या बेनीप्रसाद वर्मा ही अकेले हों, ऐसा नहीं है, भाजपा के लोग जो कल तक सत्रह बरस की साझेदारी गिनाते नहीं थकते थे, उनको आज नीतीश कुमार के राज में सिर्फ बुरा ही बुरा दिख रहा है। राजनीतिक खेमेबाजी इस कदर हिंसक हो गई है कि लोगों के दिल-दिमाग से इंसाफ के तर्क खत्म हो गए हैं, और हर बात में हिसाब चुकता करने की नीयत सिर चढ़कर बोलने लगी है। इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत का लोकतंत्र हो रहा है जिसमें पक्ष-विपक्ष, सभी तरह की राजनीतिक विचारधाराओं, अलग-अलग संवैधानिक संस्थाओं, सबके लिए न सिर्फ गुंजाइश रखी गई है, बल्कि इन सब पर जिम्मेदारी भी धरी गई है। भारतीय संसदीय लोकतंत्र के संवैधानिक ढांचे के ऊपर लोगों को ओछापन हावी हो गया है। 
बंगाल को अगर देखें तो महिलाओं के खिलाफ हिंसक बातों को लेकर वहां की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और उनके मंत्री जिस कदर घटिया और अलोकतांत्रिक बातें करते हैं, उसके बारे में हम दसियों बार लिख चुके हैं। ममता बैनर्जी अपने इस कार्यकाल में अदालतों से भी टकरा चुकी हैं, और अब वे राज्य के चुनाव आयोग से पंचायत के चुनावों को लेकर इस कदर टकरा रही हैं कि उनके मंत्री आमसभा में भाषण दे रहे हैं कि चुनावों के बाद आयोग को चूडिय़ां पहनकर घर बैठना पड़ेगा और वह मुंह दिखाने के लायक भी नहीं रह जाएगा। वहां पर चुनाव आयुक्त एक महिला है, और उनका भी किसी तरह का सम्मान तो दूर रहा, उनका हर तरह का अपमान करने से भी ममता और उनके मंत्री चूक नहीं रहे हैं। हम ममता के माक्र्सवादियों पर हमलों को लेकर पहले भी लिख चुके हैं, और अपने इस पहले सत्ताकाल में ही ममता ने लोकतंत्र की हर परंपरा को कुचलकर रख दिया है। आज राजनीतिक दलों के प्रवक्ता किसी भी मुद्दे पर अक्ल की बात करने के बजाय हमले करने में लगे रहते हैं। यही काम पार्टियों के नेता करते हैं, यही काम जनता के लिए हिकारत दिखाते हुए सत्ता पर बैठे अनगिनत लोग करते हैं। कुल मिलाकर सार्वजनिक जीवन में जो लोग जगह पाते हैं, उनकी बातें नई पीढ़ी के पढऩे लायक भी नहीं रह गई हैं। इनमें लोकतंत्र खत्म हो गया है, और इनका इस्तेमाल जनता, खासकर नई पीढ़ी, के किसी तरह के राजनीतिक शिक्षण के लिए नहीं किया जा सकता। सिर्फ हिंसक कटुता हावी है, और लोकतंत्र के तहत जो जरूरी इंसाफ-पसंदगी होनी चाहिए वह हवा हो चुकी है। 
जहां तक मीडिया का सवाल है, तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बारे में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि अपने मिजाज की मजबूरी के चलते हुए वह आधे मिनट से कम की भी सबसे अधिक आपत्तिजनक और सबसे अधिक हिंसक, आक्रामक बातों पर जिंदा रहता है। नतीजा यह होता है कि देश के लोगों का देखने-सुनने का बहुत सा वक्त ऐसी सनसनीखेज और गैरजरूरी बातों में चला जाता है जिससे जिंदगी के असल मुद्दों का कुछ भी लेना-देना नहीं रहता। बड़े नामी-गिरामी समाचार चैनलों के स्टूडियो डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के फ्री स्टाइल कुश्ती के उस स्टेडियम जैसे हो जाते हैं जहां पर फिक्सिंग हो चुकी है। टीवी की बहसों पर सबको पता होता है कि कौन क्या कहने वाले हैं, और जानकार-समझदार लोगों को यह भी पता होता है कि इन बहसों के बाद चिडिय़ा के अंडे जितना भी नतीजा नहीं निकलेगा, फिर भी लोग इस बुद्धू-बक्से से बंधे रह जाते हैं। 
यह लोकतंत्र न कोई सफर कर रहा है, न आगे बढ़ रहा है, न परिपक्व होते दिख रहा है। इसकी उम्र उस बुजुर्ग की उम्र जैसी बढ़ रही है, जिसका कोई योगदान समाज और दुनिया में नहीं मिल रहा है, और जो सिर्फ वेंटिलेटर जैसे उपकरणों से सांस पा रहा है। यह लोकतंत्र एक जगह पर थम गया है, और हर पांच बरस में डाइलिसिस की राह देखता है। सोचने-विचारने से पूरी तरह आजाद हो चुकी भारत की, बड़े दलों की राजनीति आने वाले दिन सिर्फ अंधकार के साबित कर रही है। 

जेब में राघवजी की तस्वीर रखनी चाहिए

08 जुलाई 2013
मध्यप्रदेश में सरकार से बर्खास्त और पार्टी से निकाले गए कल तक के बड़े ताकतवर और वरिष्ठ वित्त मंत्री राघवजी की कहानी लोगों के लिए एक बड़े सबक वाली हो सकती है। लोगों की अपनी निजी जिंदगी की सेक्स की पसंद उन पर कब किस तरह भारी पड़ सकती है, यह तो एक बात है, दूसरी बात यह है कि बरसों से जिस नौकर से देह संबंध चले आ रहे थे, वह भी इतने बरस बाद जाकर अब शिकायत करने पुलिस तक पहुंचा है, जबकि उसके पास इन बरसों में हर दिन यह सहूलियत हासिल थी कि वह नौकरी के वायदे का लालच छोड़कर अपने बदन को बचाता और मंत्री के खिलाफ कानून का दरवाजा खटखटाता। कम से कम वह मंत्री का घर छोड़कर तो जा ही सकता था। हालांकि आज उसकी शिकायत में यह भी आ रहा है कि मंत्री ने उसे यह धमकी दी थी कि सेक्स संबंधों का भांडाफोड़ करने पर उसके पूरे परिवार को मरवा दिया जाएगा। और उसकी इस बात पर शक करने की हमारे पास कोई वजह नहीं है। 
बहरहाल आज का मुद्दा यह मामला न होकर इससे लिए जा सकने वाले सबक हैं। एक तो यह कि देह संबंध कभी भी देह से अधिक भारी पड़ सकते हैं, खासकर जब कानून के खिलाफ हों, समाज की मान्यताओं के खिलाफ हों, तथाकथित नैतिकता के खिलाफ हों, और सार्वजनिक जीवन में ऊंचे ओहदे की उम्मीदों के खिलाफ हों। यही हाल राघवजी का हुआ। वरना दुनिया में ऐसे कितने ताकतवर लोग हैं जो वक्त आने पर, मौका मिलने पर, अपनी पसंद और जरूरत के देह संबंध बनाने से पीछे रहें? दुनिया का रिवाज यही है कि जो पकड़ा गया वह चोर, बाकी साहूकार। 
लेकिन इस मामले को कुछ दूसरे मामलों के साथ जोड़कर देखने की भी जरूरत है। पिछले दिनों मद्रास हाईकोर्ट ने एक फैसले में यह करार दिया है कि  दो वयस्क लोगों का साथ रहना और देह संबंध बनाना उनको शादीशुदा जोड़े जैसा दर्जा देने के लिए काफी है, उसके लिए कोई औपचारिक शादी की जरूरत नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि जब तक सुप्रीम कोर्ट से यह फैसला पलटता नहीं है, तब तक के लिए बिना शादी वाले साथ रहते, देह संबंधों वाले जोड़े भी पति-पत्नी जैसे होंगे, और शायद जायदाद के बंटवारे में भी यह फैसला एक बुनियाद बनेगा। इसलिए बिना शादी के रिश्ते भी लोगों पर उनकी उम्मीदों से परे जाकर भारी पड़ सकते हैं, और अदालत की नई-नई व्याख्या बरसों से चले आ रहे रिश्तों को महंगा साबित कर सकते हैं। 
दूसरी बात यह कि बहुत सी अदालतों ने अलग-अलग अब यह कायम कर दिया है कि देह का धंधा करने वाली किसी महिला के साथ भी उसकी मर्जी के खिलाफ देह संबंध बलात्कार है। इससे परे अब यह भी बहुत से मामलों में मान लिया गया है कि शादी का वायदा करके रिश्ता बनाना, और बाद में उस वायदे को पूरा नहीं करना भी पहली नजर में जांच पड़ताल, पुलिस कार्रवाई, और मामले-मुकदमे के लिए काफी हैं। कुछ मामलों में यह भी हुआ है कि शादी का वायदा पूरा न करके रिश्ता तोड़ देना, आत्महत्या के लिए प्रेरित करने या उकसाने जैसा मान लिया गया है, और अभी मुंबई के फिल्म उद्योग में ऐसा एक केस चल ही रहा है। 
कुल मिलाकर आज की कानूनी नौबत कुछ बरस पहले की नौबत से बिल्कुल अलग हो चुकी है। आज एक तरफ तो कानूनी जानकारी, समझ, और सक्रियता बढ़ी है, दूसरी तरफ अदालतों का रूख भारत की परंपरागत पुरूषप्रधान सोच से अलग हुआ है, परंपरागत सामाजिक रीति-रिवाज से अलग हुआ है। और अब समलैंगिकता जुर्म नहीं रह गई, बिना शादी साथ रहना जुर्म नहीं रह गया, शादी से बाहर के बच्चों का जायदाद पर हक माना गया है, और कल तक जिस महिला को रखैल नाम की गाली दी जाती थी, आज उसके हक बहुत अलग हैं।
इस बात को आज छेडऩे का मकसद यह है कि भारत के वे तमाम लोग बदले हुए हालात और बदले हुए कानूनी नजरिए, कानूनी दर्जे को एक बार ठीक से समझ लें। कल तक जो बातें एक ताकतवर मर्द के नजरिए से सही मान ली जाती थीं, वे आज सजा के लायक हो गई हैं। इनको बहुत पहले सजा के लायक हो जाना था, लेकिन देर होते-होते अब अदालत के रास्ते, अदालत की पहल से ऐसा हो पाया। एक वक्त था जब हिंदुस्तान में कानून पीछे की कुर्सी पर बैठता था और सामाजिक आंदोलन बड़े बदलाव लाते थे। आज किसी की हिम्मत नहीं है कि शाहबानो को  उसका हक दे दे, बाल विवाह पर कड़ाई से रोक लगा दे, समलैंगिकता को जुर्म के कटघरे से बाहर ला दे, इसलिए आज सरकारें भी, पार्टियां भी ऐसे फैसलों के लिए अदालतों को चुनती हैं जिनसे उनको अपने वोटरों के नाराज होने का खतरा दिखता है। 
यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि यह भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और संसद के पस्त हौसलों से अनछुआ रखा गया उनका जिम्मा अदालतों पर डाल देता है। अदालतों पर इससे एक तो वजन बढ़ता है, दूसरा जनता से जिन जजों का सीधा रिश्ता नहीं रहता, वे भी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, और निजी संबंधों के मामलों में अपने बंद कमरों में बैठे व्याख्या करते हैं, फैसले देते हैं। इससे संसद की भूमिका हाशिए पर चली जा रही है, और कानून के नए फेरबदल अदालती फैसलों की शक्ल में आ रहे हैं। लोकतंत्र के लिए यह एक खतरनाक नौबत है जब सरकार और संसद अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराएं, क्योंकि वे अपने दकियानूसी वोटरों को मुंह दिखाना चाहती हैं। जजों को चूंकि कोई चुनाव लडऩा नहीं होता इसलिए कड़वे फैसले लेने का कड़ा जिम्मा उन पर डाल दिया जा रहा है। 
लेकिन अदालत आज का मुद्दा नहीं है, इसलिए उस पर और अधिक बात नहीं। आज की बात यह है कि अब लोगों को अपनी निजी जिंदगी में किस तरह सावधान रहने की जरूरत है। जब कमीज की बटन में लगे हुए वीडियो कैमरे सब कुछ रिकॉर्ड करने को तैयार हों, तब लोगों को अपनी हरकतों को, हवस और नीयत को या तो काबू में रखना चाहिए, या फिर आज की रेल से कल की जेल तक के लिए तैयार रहना चाहिए। अब पुराने अंदाज के देह संबंध और पे्रम संबंध आसान नहीं रह गए हैं। अच्छा भला चलता हुआ महल सा कारोबार किस तरह किसी एक रिकॉर्डिंग और किसी एक शिकायत से ताश के पत्तों के महल की तरह धराशायी हो जाता है, यह देखना हो तो राघवजी का केस बेमिसाल है। बरसों से चले आ रहे देह संबंध किस तरह देह को मंत्रालय से उठाकर जेल में फेंक देते हैं, यह ख्याल सबको रखना चाहिए। हर किसी को अपना किया हुआ भुगतना नहीं पड़ता, अधिकतर लोग सजा पाने से बच जाते हैं, लेकिन कब कौन फंस सकता है यह अंदाज लगाना आसान नहीं है। कुछ लोग बिना सावधानी बाजार में सेहत के लिए खतरनाक देह सुख खरीदते चलते हैं, उनको यह भरोसा रहता है कि एड्स जैसी बीमारी एक-दो फीसदी लोगों को ही होती है, लेकिन जिन एक-दो फीसदी लोगों को यह होती है, वे भी उसी तरह के भरोसे में डूबे हुए रहते हैं जिस तरह के भरोसे में एड्स के शिकार एक वक्त रहे होंगे। 
आज कानून से लेकर चिकित्सा विज्ञान तक, और सामाजिक मोर्चो से लेकर मीडिया तक, टेक्नॉलॉजी, जागरूकता, और सक्रियता ने मिलकर माहौल बदल दिया है, उसके हिसाब से सावधानी बरतने में ही समझदारी है। खतरनाक किस्म के देह संबंध के शौकीन लोगों को जेब में राघवजी की तस्वीर रखनी चाहिए, ताकि बीच-बीच में उस पर नजर पड़ती रहे।

बोधगया पर आतंकी हमले की महज निंदा से कुछ नहीं थमेगा

07 जुलाई 2013
संपादकीय
हिंदुस्तान के सबसे बड़े धार्मिक तीर्थों में से एक, बोधगया में आज सुबह हुए धमाकों को लेकर खुफिया एजेंसियों का अंदाज है कि वे आतंकी हमला हैं, और एक अंदाज यह है कि पड़ोस के म्यांमार में मुस्लिम समुदाय पर वहां के बौद्ध समुदाय द्वारा सरकारी सुरक्षा के तहत जो व्यापक हमले किए जा रहे हैं, उसका बदला लेने के लिए बौद्धों के इस तीर्थ पर हमला किया गया है। इतने अंदाज के लिए किसी बहुत बड़े फार्मूले की जरूरत नहीं पड़ती है और साधारण समझ यह कहती है कि धार्मिक आधार पर जब कभी जानलेवा हमले होते हैं, तो उनकी प्रतिक्रिया भी होती है। गुजरात में गोधरा हत्याओं के बाद के दंगों के पीछे सरकारी बढ़ावा चाहे जितना रहा हो, गोधरा से आहत हुआ हिंदू समुदाय इतना भड़का हुआ था कि सरकारी छूट या बढ़ावा मिलते ही उसने खूब कत्लेआम किया था। पिछले कुछ महीनों में जितने बड़े पैमाने पर म्यांमार में सरकार और बौद्ध समुदाय के हाथों मुस्लिम मारे जा रहे थे, उसकी ऐसी कोई प्रतिक्रिया हो सकती थी। 
अब भारत के साथ एक दिक्कत यह है कि श्रीलंका में तमिलों के साथ जो जुल्म होता है, उसकी प्रतिक्रिया तमिलनाडू में बहुत उग्र होती है, और वह भारत के विदेश-संबंधों के लिए भी एक दिक्कत खड़ी करती है। पड़ोस के ऐसे मामले में भारतीय शांतिसेना की फौजी दखल को लेकर ही तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या हुई थी। पाकिस्तान के साथ जब-जब तनाव होता है, कश्मीर में उसकी प्रतिक्रिया होती है क्योंकि सदियों से सरहद के दोनों तरफ के कश्मीर के हिस्सों के बीच नाते-रिश्तेदारी चलती आई है, और लोग फौजी तनाव या आतंकी हमलों से, आवाजाही की रोक से  प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। इसी तरह बांग्लादेश की सरहद पर कभी बंगाल के साथ पानी का तनाव होता है, तो कभी असम में विदेशी शरणार्थियों की दिक्कत होती है। और यह सरहद इस तरह की है कि आवाजाही को पूरी तरह रोका भी नहीं जा सकता। अब नेपाल को देखें, तो हिंदुस्तान में माओवादी नक्सल-हिंसा को नेपाल से जुड़ा हुआ देखा जाता है, और कम या अधिक जितनी भी हो, उतनी मदद वहां से हिंदुस्तानी नक्सलियों को मिलती है। म्यांमार भारत और चीन के बीच इस तरह की जगह का मौजूद है भारत अपने फौजी तैयारियों में उसे अनदेखा नहीं कर सकता, और उसे नाराज नहीं कर सकता। लेकिन जब पड़ोस में धार्मिक आधार पर इतने बड़े पैमाने पर सरकारी कत्लेआम होता है, तो उसे भारत कब तक अनदेखा करे? और आज तो जब भारत के एक सबसे बड़े तीर्थ पर ऐसा हमला हुआ है, भारत के लिए यह पड़ोस का मामला न रहकर, पड़ोस को लेकर भारत की जमीन पर हुआ आतंकी हमला है।
और यह बात सिर्फ भारत के साथ नहीं है कि सरहद से लगे दूसरे देशों के घरेलू मामलों की प्रतिक्रिया भारत की जमीन पर होती हो। बहुत से मामले तो दुतरफा होते हैं जिनमें भारत की एक हिस्सेदारी होती है, लेकिन बहुत से मामले ऐसे हैं जिनमें भारत की कोई औपचारिक दखल नहीं हो सकती। ऐसे में एक बड़े पड़ोसी देश के नाते भारत को लंबे समय की अपनी ऐसी नीति, ऐसी रणनीति बनानी चाहिए, और ऐसा पड़ोसी का रिश्ता कायम रखना चाहिए कि सरहद के दूसरी तरफ भी भारत की बात का असर हो। अगर ऐसे रिश्ते भारत नहीं रख सकता है, तो फिर यह तय है कि  बोधगया जैसे हमले आगे अधिक जानलेवा और अधिक खतरनाक हो सकते हैं। मुंबई पर जब पाकिस्तान की जमीन से आकर आतंकी हमला किया गया, तब भी यह बात साफ थी कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में उतना भरोसा नहीं रह गया है कि पाकिस्तान उसकी जमीन से भारत के खिलाफ ऐसी साजिश को रोकने में दिलचस्पी रखता। देश के भीतर के लोगों से रिश्ते तो पैदाइशी होते हैं, लेकिन पड़ोसियों से रिश्ते तो अच्छे-बुरे वक्त की आंच झेलते हैं, और उनके बीच से बेहतरी की कोशिश जारी रखनी पड़ती है। 
ऐसा नहीं हो सकता था कि एक पूरी बिरादरी म्यांमार में मिटाई जाए, और उसकी कोई प्रतिक्रिया न हो। बहुत से मौकों पर आतंक उस वक्त भी पैदा होता है, जब बिना आतंक इंसाफ की कोई उम्मीद नहीं रहती, और बेइंसाफी बंद होने का नाम नहीं लेती। यह सिलसिला भारत की अपनी जमीन पर भी नहीं चलना चाहिए, और न ही पड़ोस के देशों में। यह एक ऐसा वक्त है जब भारत को बड़प्पन का, और हिंद महासागर क्षेत्र में एक बड़े देश का खोया हुआ दर्जा पाने के लिए कोशिश करनी चाहिए। आज भारत की सरकार का वजन देश के भीतर खो चुका है, और भारत का वजन पड़ोस के देशों के बीच उसी अनुपात में खत्म हो चुका है। देश के भीतर हो, या दुनिया के देशों के बीच, लीडर को भरोसेमंद और साख वाला होना चाहिए, इसके बिना चारों तरफ से दूसरे देशों से घिरा हुआ भारत ऐसे हमले झेलते ही रहेगा। सिर्फ निंदा करने से हमले कम नहीं होते, उसके लिए या तो अमरीका जैसी एक बहुत ही कड़ी और बहुत खर्चीली चौकसी रखनी पड़ती है, या फिर रिश्ते अच्छे रखने पड़ते हैं। भारत इन दोनों ही पैमानों पर लगातार कमजोर साबित हुआ है। 

ये बादल बरस नहीं रहे, जनता को निचोड़ रहे हैं

6 जुलाई 2013
संपादकीय
हिंदुस्तान में सत्ता के बेजा इस्तेमाल को लेकर आए दिन सुप्रीम कोर्ट को फैसले देने पड़ रहे हैं, और ऐसा लगता है कि सत्ता पर काबिज नेता-अफसरों, जजों और दीगर लोगों की नीयत पर रखवाली करने का काम इस देश की सबसे बड़ी अदालत अगर नहीं करेगी, तो जिसके हाथ में जितनी ताकत है, उसे निचोड़कर लोग पी जाएंगे। और इस मामले में खासकर इसलिए लिखने की जरूरत है कि यह उसी जनता के पैसों से हो रहा है जिसे आज 21वीं सदी में, आजादी की आधी-पौन सदी के बाद खाने का हक देने के लिए कानून बनाना पड़ रहा है। ऐसी जनता के पैसों पर जब अय्याशी होती है, तो उसके लिए जो सबसे सही शब्द फिट बैठता है उसे संसद और विधानसभाएं असंसदीय कहकर खारिज कर देती हैं। लेकिन गरीब जनता की खुरदुरी और खरी जुबान में उसे हरामखोरी कहते हैं। 
आज एक खबर है कि पंजाब में सत्ता हांक रही बादल पिता-पुत्र की जोड़ी अपने लिए घर पर तीस सरकारी गाडिय़ों का काफिला खड़े होने के बाद भी अब कुछ और बुलेटप्रूफ गाडिय़ां अपने लिए खरीद रहा है जिस पर एक-एक गाड़ी पर करोड़ों रूपये और खर्च हो रहे हैं। पहले से इनके पास विदेशी बुलेटप्रूफ गाडिय़ां हैं, लेकिन लार है कि टपकने से रूकती ही नहीं। और यह हाल उस पंजाब का है जिसके पास अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लिए पैसे नहीं है और सरकार ने रिजर्व बैंक से सात सौ करोड़ रूपये कर्ज लिए हैं ताकि तनख्वाह बांटी जा सके। पंजाब सरकार अपने कर्मचारियों को पिछले छह महीनों से महंगाई भत्ता नहीं दे पाई है। ऐसी खबरें अलग-अलग कई राज्यों से समय-समय पर आती हैं। उत्तरप्रदेश में मायावती ने जिस अंदाज में हजारों करोड़ रूपये खर्च करके सैकड़ों एकड़ शहरी जमीन पर अपने खुद के बुत खड़े करवा दिए, वह हिंदुस्तान में एक बेमिसाल वारदात है, जिस पर बची जिंदगी ऐसे नेता को जेल भेजना चाहिए कि जनता के पैसों का ऐसा हिंसक इस्तेमाल अपने खुद पर किया है। 
कल ही सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया है कि सरकारी बंगलों पर काबिज लोगों को हटाया जाए और जो लोग रिटायर होते हैं उनसे एक महीने के भीतर मकान खाली करवाए जाएं। दरअसल सरकारी मकानों का यह सिलसिला ही घातक है। एक बार अंगे्रजों के वक्त का सरकारी बंगला हाथ लगा, तो मंत्री और अफसर उन बंगलों पर सरकार का घोषित और अघोषित पैसा ऐसा अंधाधुंध खर्च करते हैं, कि आज अंगे्रज होते तो वे भी हीनभावना का शिकार हो गए रहते। दूसरी तरफ जो जनता के बीच से चुनकर आते हैं, और जो जनता की सेवा का दावा करते हैं, वे लोग जनता का खून चूसकर अपनी फिजूलखर्ची की शक्ल में पीते हैं, और गरीबी की रेखा के नीचे जीती आधी आबादी के लिए ये लोग मानवभक्षी की तरह रहते हैं। इस देश से अगर सारे सरकारी बंगले गिरा दिए जाएं, और बंगलों के हकदार लोगों को उनके हक के रहने तक के लिए किराया दिया जाए, तो देश का अनगिनत पैसा बच जाएगा। इससे सरकारी पैसे का अघोषित बेजा इस्तेमाल भी रूक जाएगा जो कि आज तकरीबन हर बंगले पर संभावित भाड़े से कई गुना अधिक होता है। इससे सरकारी कर्मचारियों का घरेलू नौकरों की तरह का इस्तेमाल भी कम हो जाएगा क्योंकि आज एक-एक बड़े बंगले पर दर्जनों से लेकर सौ-पचास तक सरकारी कर्मचारी घोषित और अघोषित रूप से तैनात रहते हैं, और वे कुत्ते को घुमाने से लेकर बच्चों को गोद में रखने तक के काम में जोत दिए जाते हैं।
यह पूरा सिलसिला घोर अलोकतांत्रिक है, बहुत ही भ्रष्ट है, हिंसक है, और बेशर्म है। सुप्रीम कोर्ट की अपनी सीमाएं हैं, इसलिए सरकारी सुविधाओं की हरामखोरी का सिलसिला खत्म करने के लिए उसी तबके के हाथों कोई ऐसा कानून बन सकता है जो आज इन सुविधाओं का हकदार है। पूरे देश से सरकारी बंगलों को तुरंत खत्म करना चाहिए, और सरकारी कुर्सियों पर बैठे नेता, अफसर, जज, और बाकी हकदार लोगों को सिर्फ एक किराया भत्ता देना चाहिए। सारे सरकारी बंगलों को नीलाम करके उस रकम से गरीबों के मकान बनाने चाहिए। ऐसा होगा इसलिए नहीं कि अब देश की संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोग गिने-चुने बच गए हैं जो कि करोड़पति नहीं हैं। और वामपंथियों के अलावा शायद ममता बैनर्जी जैसे गिने-चुने लोग हैं जो कि सरकारी सहूलियतों को निचोडऩे से बचते हैं। 
सिर्फ संसद और विधानसभाओं से हरामखोर शब्द को बाहर कर देना काफी नहीं है, इस नीयत को ही बाहर करना होगा, वैसा न करने पर यह सत्ता मानवभक्षी बनी रहेगी।

सरकारी नौकरी का वायदा, घरेलू नौकर का देह शोषण!

संपादकीय
5 जुलाई 2013
इस वक्त दो खबरें आ रही हैं। उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की एक स्थानीय महिला ने पार्टी के मंत्री स्तर के दर्जा प्राप्त एक नेता पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने उस महिला से जवान लड़कियां लाकर देने की मांग की। उसके पास अपनी बात के पक्ष में टेलीफोन पर हुई इस कथित बातचीत की एक रिकॉर्डिंग है जो कि उसने मीडिया के सामने पेश की। दूसरी तरफ 71 बरस के इस नेता का कहना है कि वे यह भी नहीं जानते कि 18-19 बरस की लड़कियों को चूजा कहा जाता है। दो में से कोई एक तो झूठे साबित होंगे ही, और यह मामला सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के लिए कुछ शर्मिंदगी का तो है ही। दूसरी तरफ अभी भोपाल से यह खबर आ रही है कि वहां दस बार बजट पेश कर चुके वरिष्ठ वित्तमंत्री भाजपा के राघवजी से सरकार ने इस्तीफा ले लिया है क्योंकि उनके खिलाफ उनका एक घरेलू नौकर थाने पहुंचा है कि उसे पक्की सरकारी नौकरी दिलाने का वायदा करके राघवजी और उनके दो करीबी लोग उस नौकर से सेक्स करते रहे। और अगर खबरें सच हैं, तो इसकी सीडी भी खासे अरसे से भोपाल में तैर रही थी, और आज नौकर ने इसे पुलिस को भी दिया है।
सत्ता की ताकत के साथ सेक्स के मामले नए नहीं हैं। अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी से लेकर बिल क्लिंटन तक, और भारत के अनगिनत नेताओं तक, सेक्स संबंधों के पुख्ता मामले हैं, और लोगों को नारायण दत्त तिवारी की वीडियो क्लिप याद हैं, जो कि उनके आन्ध्र का राज्यपाल रहते हुए इंटरनेट पर तैर और बिखर गई थीं। इसलिए उम्र किसी को चूजा ढूंढने से नहीं रोकती, और न ही मंत्री को घरेलू नौकर की पत्नी से संबंध रखने से रोकती है। अभी हम इन दो मामलों को लेकर और अधिक कहना नहीं चाहते क्योंकि ये अभी खबरों के स्तर पर ही हैं, और जांच के बाद के नतीजे आना बाकी हैं। और फिर यह तो वही मध्यप्रदेश है जहां पर कई बरस पहले बाजार में आई पुख्ता लगने वाली एक सेक्स सीडी से एक नेता को बचाने के लिए कहा जाता है कि प्रदेश का सबसे बड़ा एक पुलिस अफसर जाकर राष्ट्रीय फोरेंसिक लैब में ही डट गया था। आज लेकिन जिस आनन-फानन तरीके से राघवजी का इस्तीफा लिया गया, उससे जाहिर है कि मामला कुछ गंभीर है। सुबह से उनका नौकर थाने में बैठा हुआ है, और वैसे भी यह इस्तीफा पहली नजर में आरोपों को वजनदार साबित करता है। 
सार्वजनिक जीवन में, खासकर जनता के पैसों पर जीने वाले नेता अगर अपना चाल-चलन ठीक नहीं रखते हैं, तो वे लोगों की नजरों में जल्दी आते हैं। उन पर विपक्ष की नजरें भी टिकी रहती हैं, और मीडिया की भी। ऐसे में राजनीति का सार्वजनिक जीवन कांच के मछलीघर में जीने की तरह होता है, और इस जगह पर जीते हुए किसी को रफ्तार से कपड़े नहीं उतारने चाहिए। ऐसे मामले उजागर होने से अगर ओहदे और अधिकार के बेजा इस्तेमाल की बात पकड़ में आती है तो सरकार और संगठन दोनों को ही पहली नजर में ही कड़ी कार्रवाई करके ऐसे लोगों को ओहदे और ताकत दोनों से परे कर देना चाहिए। यह बात न तो सिर्फ भाजपा या सपा तक सीमित है, और न ही सिर्फ राजनीति तक। दुनिया के बहुत से दायरों में ऐसे संबंधों की बात, शोषण की बात सामने आती ही रहती हैं, और इन पर कानून का काम शुरू होने से पहले ही संगठन और समाज को, सरकार के मुखिया को, कार्रवाई करनी चाहिए।  कांग्रेस की यह मांग सही लगती है कि मध्यप्रदेश के इस मंत्री का इस्तीफा काफी नहीं है, और नौकर के आरोप देखते हुए, सीडी पर सेक्स-सुबूत देखते हुए मंत्री और बाकी लोगों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए, और आगे की कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। एक मंत्री और उसके साथी घरेलू नौकर को पक्की सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर उसका देह शोषण करते रहें, यह महज इस्तीफे का मामला नहीं हो सकता, इस पर न सिर्फ यौन शोषण, बल्कि सरकारी पद के बेजा इस्तेमाल का मामला भी चलना चाहिए। 

मुसीबतों से घिरे उत्तराखंड में मानव तस्करी का खतरा

संपादकीय
4 जुलाई 2013
उत्तराखंड में आई कुदरती त्रासदी ने वहां रहने वालों की मुसीबतें कई गुना बढ़ा दी हैं। अब वहां राहत और पुनर्वास के लिए पहुंचे सामाजिक संगठनों ने डर जताया है कि हालात का फायदा उठाकर गिरोहों द्वारा बच्चों,औरतों और बूढ़ों की तस्करी शुरू कर देने का खतरा बढ़ गया है। उत्तराखंड के स्थानीय बाशिंदों के साथ पहले से ही काम कर रही एक सामाजिक संस्था के मुताबिक देश के दूसरे पहाड़ी इलाकों की ही तरह यह राज्य भी पहले से ही औरतों, बच्चों की तस्करी का शिकार रहा है। फिर ऐसे समय में, जब सरकारी तंत्र का ज्यादा ध्यान बचाव राहत और पुनर्वास में लगा हुआ है, ऐसे गिरोहों की सरगर्मियां बढ़ जाने का खतरा स्वाभाविक तौर पर बढ़  गया है। पहाड़ी इलाकों में अक्सर मर्द ही सैलानियों के लिए बनाई गई होटलों, मंदिरों के आसपास बनी दूकानों, सेवाओं में काम करने, अपने परिवार गांवों में छोड़कर जाते हैं। तबाही में ऐसे कई लोगों के मरने की खबर है, जो अपने परिवार की रोटी कमाने वाले थे। गांवों में बच गए हंै असहाय बच्चे, औरतें, बूढ़े, जो मानव तस्करों के लिए सबसे आसान शिकार हैं। ये ऐसे लोग हंै जो गरीब परिवारों को सामान्य हालात में भी बोझ लगते हंै, और वह इन्हें तस्कर गिरोहों को बेच देते हैं जिन्हें कभी घरेलू कामगारों के तौर पर, कभी खेती में मजदूरी के लिए, तो कभी भीख मंगवाने, और कभी मानव अंगों के व्यापार के लिए इस्तेमाल किया जाता है। आफत के समय में समाज का यह तबका हर तरफ से घिर गया है।
देश में मानव तस्करी पर काम करने वाले जानते हंै कि पहाड़ी इलाकों में रोजगार के मौकों की कमी, विकास की कमी, गरीबी के कारण यहां की औरतें, बच्चे देश के दूसरे इलाकों में काम करने, यौन व्यापार में धकेलने के लिए आसानी से तस्करी कर दिए जाते हैं। अपने पिछड़ेपन, गरीबी के कारण यह वैसे ही बेआवाज होते हंै, फिर इन तमाम व्यवसायों के तौर-तरीके ऐसे हंै कि इनमें कानून एजेंसियों के लिए गुनाहगारों को पकडऩा बहुत मुश्किल होता है। तिस पर ज्यादातर मामलों में उन्हें मिलती, नेताओं, सरकारी अमले में शामिल लोगों की पनाह इसे और मुश्किल बना देती है। ऐसी सूरत में उत्तराखंड में आई मुसीबत ने बच्चों, औरतों और बूढ़ों को इस बाजार का बहुत आसान और बेबस शिकार बना दिया है।
राजनीतिक आरोपों के परे उत्तराखंड की सरकार के लिए यह एक बेहद मुश्किल परिस्थिति है, इसमें शक नहीं, लेकिन ऐसे समय में समाज के इस कमज़ोर तबके के लिए वहां के मुख्यमंत्री , विपक्ष के नेता में संवेदनशीलता बहुत जरूरी है। खबरों के मुताबिक गैर सरकारी, सामाजिक संगठनों ने अपने-अपने कार्यक्षेत्र में वहां कमान सम्हाल ही ली है। बहुत से संगठन वहां बरसों से मानव तस्करी रोकने के लिए काम कर भी रहे हैं, लेकिन सामाजिक संगठनों को राजनीतिक इच्छाशक्ति का सम्बल मिलना बहुत जरूरी है। तबाही ने राज्य को तहस नहस कर दिया है, यह सच है, लेकिन इस तबाही के कारण अब वहां जो निर्माण कार्य होंगे, जितने तरह के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ वहां के अंदरूनी इलाकों का दौरा कर, वहां के स्थानीय संगठनों और सरकारी तंत्र के साथ मिलकर काम करेंगे, अपना अनुभव और ज्ञान उनसे बांटेंगे, उसका भी अपना महत्व होगा। उत्तराखंड की सरकार, वहां के राजनीतिक दलों के नेतृत्व का यह फर्ज है कि वह इस मौके का भरपूर फायदा अपनी जनता के हक में उठाए। इस मौके को एक दूसरे पर इल्जाम लगाने, एक दूसरे से खुद को बेहतर साबित करने के लिए नहीं, बल्कि मानव तस्करी से दशकों से जूझ रहे इस पहाड़ी इलाके में कुछ ऐसा ठोस रचनात्मक काम करने के लिए इस्तेमाल करे, जिससे इस बुराई का वहां अंत आ सके।
जितने तरह के प्रतिष्ठित, अनुभवी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन वहां काम करने उतरे हंै, उनसे उत्तराखंड की जनता में जन जागृति फैलेगी, इसमें शक नहीं। जीने के साधन लुटा चुकी जनता कुदरत के प्रकोप के कारण एक-एक चीज के लिए आवाज उठाने को मजबूर हुई है, लेकिन इस जागरुकता को एक सही दिशा देने में उत्तराखंड का राजनीतिक नेतृत्व आज बहुत अहम भूमिका निभा सकता है। उसके पास देश के सामने एक मिसाल खड़ी करने का मौका है। राज्य के इतिहास में ऐसी कुदरती आफत  कभी नहीं आई, लेकिन उसने जो अद्भूत मौका समाज और राजनीति के नेताओं के सामने पेश किया है, उसका पूरा फायदा उन्हें उठाना चाहिए। आज तो टीवी चैनलों के जरिये देश यही देख रहा है कि उत्तराखंड में सरकार नाम की कोई चिडिय़ा जमीनी स्तर पर है ही नहीं। हो सकता है समाचारों में पूरी हकीकत उभर कर नहीं आ पाती हो, लेकिन हर खबर में यही बात सामने आना राज्य शासन के ढीलेपन और गैर जिम्मेदारी की पोल खोलता है इसमें भी शक नहीं।
राज्य के  मुख्यमंत्री ने मलबे से नया उत्तराखंड बनाने का वायदा किया है, तो उन्हें इसके लिए सबका सहयोग लेना चाहिए- गैर सरकारी संस्थाओं, विरोधी राजनीतिक दलों, जनता, सबका। अगर ऐसा हो सकेगा, तो सरकारी तंत्र की लगाम खुद ब खुद कस जाएगी। वैसे भी यह तो तय है कि उत्तराखंड में जो आज तक चला, वह अब नहीं हो सकेगा। जितने संगठन, जिस स्तर पर वहां जनता के संपर्क में आ रहे हंै, इससे वहां की जनता में चेतना फैलना तय है। बेहतर होगा कि उसके लिए नेता और नौकरशाह भी खुद को तैयार कर लें। 

भारत में लोकतंत्र ने जनता से यह समझ भी छीन ली है कि...

03 जुलाई 2013
संपादकीय

गुजरात में मोदी की पुलिस के हाथों मुठभेड़ हत्याओं की खबरों का सैलाब है। उस वक्त के बड़े-बड़े अफसर जेल या हिरासत में हैं, जमानत पर हैं या फरार हैं। और उस वक्त के मंत्री-मुख्यमंत्री पार्टी और प्रदेश सरकार में ऊंचे ओहदों पर हैं। मोदी की एक मंत्री की उम्रकैद को बढ़वाकर फांसी करवाया जाए या नहीं, इस पर बहस चल रही है। और यह सब कुछ देश की सबसे बड़ी अदालत की निगरानी में हो रहा है। ये वारदातें गुजरात दंगों से परे की हैं, और बहुत ही ठंडे दिल-दिमाग से साजिश के तहत किए गए कत्ल की हैं, जिनके बाद उन पर पुलिस की मासूमियत का कफन भी डाल दिया गया है।
गुजरात में भारत के लोकतंत्र के इतिहास की सबसे बुरी मिसाल पेश की है। दंगों में मुख्यमंत्री सहित सरकार की भूमिका कटघरों में तो है ही, मोदी की एक महिला-मंत्री दर्जनों कत्ल में हिस्सेदारी के लिए उम्रकैद पा चुकी है। और दंगों के वक्त मोदी, उनके मंत्री, और आला अफसरों का रूख देश के सामने है। उसके बाद दंगाई-कातिलों को अदालत तक ले जाने में मोदी सरकार का रूख फिर सामने है जब कातिलों के हमदर्द सरकारी वकील ही तैनात किए गए, और हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की अनगिनत लताड़ के बाद भी राज्य सरकार का रूख नहीं बदला। तब जाकर सुप्रीम कोर्ट को गुजरात के ऐसे हत्यारे मामले प्रदेश के बाहर की अदालतों में भेजने पड़े, और अपनी खुद की निगरानी में गुजरात की जांच और मुकदमों की सुनवाई करवानी पड़ी, जो कि आज तक जारी है।
इससे अधिक बुरी मिसाल लोकतंत्र में और क्या हो सकती है कि एक सरकार हजारों कत्लों की जिम्मेदार की तरह अदालती कटघरे में हो? और आज जब गुजरात के कत्लेआम की बात होती है तो मोदी की पार्टी चौरासी के दंगों को गिनाने लगती है। चौरासी के दंगों के पीछे कांगे्रस के कुछ नेताओं को जिम्मेदार पाया गया है और वे अदालतों में मुकदमे झेल रहे हैं। लेकिन इन दंगों के पीछे कांगे्रस की किसी सरकार की कोई हिस्सेदारी सामने नहीं आई है जैसी कि गुजरात में मोदी की अगुवाई में चल रही सरकार की रही है। हर कोई इस बात को जानते हैं कि अदालत में किसी मामले को ले जाने और उसे साबित करने के लिए बहुत किस्म के सुबूतों की जरूरत होती है। और जब कोई सरकार अपनी पुलिस और अपने वकीलों के साथ मिलकर ऐसे सुबूत खत्म करने पर आमादा हो, तो फिर वहां जांच एजेंसियों के लिए कामयाबी नामुमकिन सी हो जाती है। जब इंसाफ की बात होती है तो यह जरूरी नहीं रहता कि अदालत का इंसाफ अकेला और आखिरी इंसाफ हो। अदालत में अपनी सीमा होती है और वहां पर सब कुछ साबित नहीं हो पाता, हर सच वहां तब तक खड़े नहीं हो पाता जब तक उसके एक तरफ सुबूत और दूसरी तरफ गवाहों की बैसाखियां न हों। 
ऐसे में आने वाले चुनावी महीने हर जायज जांच और अदालती कार्रवाई को बदनीयत राजनीति साबित करने पर उतारू रहेंगे। और बात चौरासी दंगों की हो, या गुजरात के दंगों की हो, जब निचली अदालतों के इंसाफ में ही एक पीढ़ी गुजर जाने को हो, तो यह लोकतंत्र के नाम पर एक मखौल चल रहा है। यह पूरा सिलसिला उन लोगों के हौसले पस्त कर देता है जो कि कानून के तहत अमन-चैन से जीना चाहते हैं, जो लोकतंत्र को सबसे अच्छी व्यवस्था मानते हैं, और जो वोट देकर यह मानते हैं कि उन्होंने पांच बरस के इंसाफ के लिए अपना जिम्मा पूरा कर लिया है। भारत का लोकतंत्र इतनी बुरी तरह नाकामयाब है, कि उसने लोगों से यह समझ भी छीन ली है कि हर पांच बरस में वोट देना लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र तो उसके बाद के अठारह सौ से अधिक दिनों के हक का नाम होता है, न कि वोट डालने के दिन का। आज भारत की हालत बहुत ही शर्मनाक है, जनता की हालत बहुत ही खराब है। और सत्ता पर बैठे गुंडे-मवाली मस्त हैं। इन सबको लोकतंत्र का लेबल लगाकर बाजार में उसी तरह खपाया जा रहा है जिस तरह नकली सामान खपाया जाता है। आजादी के इतने बरस बाद देश को इस मिलावट और नकली धंधे से आजादी की एक जरूरत है। पता नहीं वह कैसे आएगी।

काले धन पर कैद जरूरी

02 जुलाई 2013
संपादकीय
मुंबई से आज सुबह खबर आना शुरू हुई कि मुंबई में इनकम टैक्स और राष्ट्रीय जांच एजेंसी, एनआईए ने मिलकर छापा डाला है और हजारों करोड़ नगदी-गहने जब्त किए हैं जो कि मुंबई से गुजरात भेजे जा रहे थे। दोपहर तक यह आंकड़ा सैकड़ों करोड़ पर आ गया, और यह जानकारी आई कि देशी कूरियर सर्विस, आंगडिय़ा नोटों और गहनों के, हीरों के ये बैग ले जा रहे थे। व्यापार के कुछ जानकार लोगों का यह मानना है कि अकेले मुंबई से अकेले गुजरात रोज हवाला के रास्ते हजारों करोड़ की रकम जाती है, और आती है। पूरे देश का कोई अंदाज लगाए तो शायद लाखों करोड़ रूपये रोज हवाला से इधर-उधर आते-जाते होंगे, और यह पूरी रकम काली ही होती है।
भारत में काले धन की एक समानांतर अर्थव्यवस्था इतनी तगड़ी है कि दुनिया भर में आने वाली मंदी की मार भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर कम पड़ती है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का असर घोषित सफेद धन पर ही अधिक पड़ता है। ऐसे में जब अमरीका जैसे देश की तरफ देखें जहां पर काले धन की खबर सुनाई नहीं पड़ती, रिश्वत और भ्रष्टाचार भारत की तरह का सुनाई नहीं पड़ता, हवाला लेन-देन सुनाई नहीं पड़ता, तो भारत के मुकाबले वहां की व्यवस्था में एक ही बड़ा फर्क दिखता है। और यह फर्क है अमरीकी-कानून में एक ऐसी सजा का जो कि भारत में नहीं है। यहां पर काले धन के मामले रोज पकड़ाते हैं, लेकिन इस पर जेल और कैद का इंतजाम नहीं है। दूसरी तरफ अमरीका में टैक्स चोरी पर कई-कई बरस की कैद रहती है, और पैसे वाले लोग इस वजह से भी टैक्सचोरी और काले धन से बचते हैं। इसके अलावा दूसरी वजह यह है कि भारत में टैक्स कानून को लागू करने का जिम्मा जिन विभागों पर है, वे गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं, और उनसे हर किस्म की सौदेबाजी हो जाने की उम्मीद दो नंबरियों को रहती है।
भारत में काले धन को लेकर जुर्म की एक बहुत बड़ी दुनिया पलती है, पनपती है। यह हैरानी की बात है कि आजादी की पौन सदी होने को आई है, लेकिन अब तक यहां के अर्थशास्त्री, बड़े-बड़े नेता-अफसर, और बड़े नामी-गिरामी संस्थानों से निकलने वाले मैनेजरों में से कोई भी काले धन को कम करने के रास्ते नहीं निकाल पाए। जब कई पार्टियों की सरकारें आकर चली गईं और देश में काले धन पर कार्रवाई की कोई नीयत नहीं दिखी, तो यह बात साफ हो गई कि सत्तारूढ़ राजनीतिक ताकतें, और विपक्षी पार्टियां भी, कालेधन को एक-दूसरे पर हमले का एक हथियार तो बनाकर चलना चाहती हैं, लेकिन वे इसे खत्म करना नहीं चाहतीं। क्योंकि भ्रष्टाचार के लिए लेन-देन काले धन में ही हो सकता है। इतने गरीब देश की इतनी बड़ी गरीब आबादी के हक छीनने वाला काला कारोबार अगर ऐसे लोगों को कैद का हकदार नहीं बनाता, तो फिर भारत के कानून का नमूने के रूप में भी, प्रतीक के रूप में भी कोई इस्तेमाल नहीं बचता। देश की जनता को मांग करनी चाहिए कि काले धन और टैक्सचोरी के लिए सिर्फ जुर्माना काफी नहीं होता, और ऐसा करने वाले लोगों को लंबी कैद भी होनी चाहिए, तभी जाकर लोग जेल के बजाय अपने बंगलों में रहने के लिए कुछ सुधरेंगे।

मनमोहन सिंह की जवाबदेही

01 जुलाई 2013
संपादकीय

कश्मीर में सेना की गोलियों से दो नौजवानों के मारे जाने के बाद तनाव एक बार फिर भड़का है और उग्रवादियों के साथ-साथ अब जनता का विरोध भी सेना को झेलना पड़ रहा है। राज्य की पुलिस ने सैनिकों के खिलाफ इस मामले में केस दर्ज कर लिया है। लेकिन इसके बाद भी बांदीपुर में लोगों ने आज थलसेना के एक स्कूल में आग लगा दी। इस अकेली घटना पर अधिक लिखने का कोई मौका नहीं है, लेकिन यहां से शुरू करके हम भारत की हालत पर बात बढ़ाना चाहते हैं। प्रधानमंत्री और यूपीए की मुखिया अभी चार दिन पहले ही कश्मीर होकर लौटे हैं, और वहां पर तनाव चढ़ता-उतराता रहता है। लेकिन कश्मीर से परे भी बाकी देश में हालात जगह-जगह बेकाबू लगते हैं। तेलंगाना को अगर देखें तो चुनावों से परे भी कांगे्रस की यूपीए सरकार के पास वहां के लिए कुछ भी नहीं दिखता है। उत्तराखंड में सेना की मदद से परे केंद्र और राज्य के पास बचाव और राहत का कोई ढांचा नहीं था। ऐसा ही हाल बहुत से राज्यों में कहीं खदानों को लेकर चल रहा है, तो कहीं कारखानों के खिलाफ आंदोलनों को लेकर। देश में एक मजबूत लीडरशिप की कमी लोगों को मोदी के नारों से परे भी लग रही है। 
पिछले कुछ दिनों से एक एसएमएस हवा में तैर रहा है कि आप अगर उत्तराखंड के पीडि़त लोगों के लिए सौ रूपये भेजना चाहते हैं, तो प्रधानमंत्री राहत कोष में कम से कम एक हजार रूपये भेजें, ताकि उसमें से सौ रूपये उत्तराखंड पहुंच पाएं। यह हालत असली भ्रष्टाचार में इतनी बुरी चाहे न हो, लेकिन आज देश की सरकार की ईमानदारी पर लोगों का बस इतना ही भरोसा रह गया है। हो सकता है कि सरकार के कुल खर्च में से इतना बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार में न जाता हो, लेकिन जनता के मन का शक इससे कम भी नहीं है। और लोकतंत्र में बहुत सी बातें सच और सुबूत पर नहीं चलती हैं, जनधारणा पर चलती हैं, और आज जनधारणा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के खासे खिलाफ हैं। और इस बात का यह मतलब निकालना पूरी तरह गलत होगा कि जनता मोदी की साम्प्रदायिकता के साथ है। मोदी के खिलाफ भी जो लोग हैं, वे चाहकर भी आज कांगे्रस के साथ नहीं हो सकते क्योंकि उनके मन में इस सरकार को लेकर भरोसा बचा ही नहीं है।
इस नौबत के बारे में कांगे्रस पार्टी को अपने बड़बोले प्रवक्ताओं के दावों से परे भी सोचना चाहिए क्योंकि सिर्फ विपक्ष पर हमले करने से अपने गलत कामों का बचाव नहीं हो सकता। लोकतंत्र में अपने कामों के लिए जवाबदेही सबसे ऊपर होती है, और दूसरों पर पत्थर चलाने का हक उन्हीं को मिलता है, जिनका अपना हालचाल ठीक होता है। आज जब सीएजी से लेकर अदालतों तक की ओर से यूपीए सरकार पर पत्थर चल रहे हैं, तो उस ढेर से पत्थर उठाकर साम्प्रदायिक ताकतों पर मारने से अपनी ईमानदारी या बेईमानी का हिसाब नहीं दिया जा सकता। 
हम पहले भी कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि तकनीकी रूप से तो प्रधानमंत्री आधा दर्जन बार राज्यसभा के रास्ते लालकिले जा सकते हैं, लेकिन अगर प्रधानमंत्री जनता से निर्वाचित होते, तो जनता की नब्ज पर उनका बेहतर हाथ होता, और वे जनता के प्रति जवाबदेह भी होते। कांगे्रस और यूपीए का यह हाल आज देश की सरकार की कुर्सी पर तो बहुत निराश करता ही है, यही हाल जारी रहा तो कल विपक्ष की भूमिका में भी कांगे्रस-यूपीए पांच बरस तक, अपने इन दस बरसों की जांच-पड़ताल में ही घिरे रहेगी। मनमोहन सिंह तो अपनी सरकार और पार्टी के साथ सिर्फ अदालती कटघरों से बच जाने को सब कुछ नहीं समझना चाहिए, उससे परे भी बहुत सी बातें हैं जिस पर उन्हें अपने-आपको जवाबदेही से ऊपर नहीं मानना चाहिए। 

सत्ता के कामदेव से जख्मी रामदेव

01 जुलाई 2013
कल का बाबा रामदेव का बयान सुनने लायक है। उनको बाबा कहने पर कुछ लोगों को शर्मिंदगी हो सकती है, लेकिन बाबा लोगों का जो हाल इस देश में है, उसे देखते हुए रामदेव को ही नहीं, किसी को भी बाबा कहने पर इस तमगे की कोई बेइज्जती होते हमको नहीं दिखती। इसी किस्म के हुलिए वाले बहुत से दूसरे बाबा थे जो कि केदारनाथ से करोड़ों रूपए की नगदी और शायद गहने भी भरकर वहां से भाग रहे थे, और उनके बड़े-बड़े बैग देखकर जब सेना ने उतना सामान बचाव हेलिकॉप्टर में ले जाने से उनको रोका तो उन्होंने बचने से ही इंकार कर दिया और अपने सामान के साथ बाढ़ में घिरे केदारनाथ में ही रहना तय किया। जब शक हुआ तो सेना ने जांच की और बाबाओं की टोली के पास एक करोड़ से अधिक के नोट निकले जो कि बैंक के थे।
इसलिए भगवा कपड़े, दाढ़ी, बड़े बाल, बड़ा तिलक, और रूद्राक्ष की माला जैसे सामान किसी इज्जत का हकदार किसी को नहीं बनाते। और इसी तरह एक बड़ा आश्रम, एक बड़ा दवा कारखाना, योग की दूकान भी किसी को इज्जत का हकदार नहीं बना देते, और भगवा कपड़े हों, या न हों, इज्जत अपने काम और अपनी बातों से मिलती है। कल बाबा रामदेव की बातें वीडियो कैमरों पर कैद हैं, इसलिए उन पर कोई शक नहीं है। 
उन्होंने उत्तराखंड में बाढ़ के बाद बचाव के लिए सरकार पर हमला बोला और कहा कि मरने वालों का अंतिम संस्कार वैदिक विधि से होना चाहिए और सरकार शवों को कचरे की तरह जला रही है। 
पिछले कई दिनों से देश यह भी देख रहा है कि किस तरह सेना और दूसरे सुरक्षा बलों के लोग लोगों को बचा रहे हैं, और अंतिम संस्कार के लिए लकडिय़ां और घी भी हेलिकॉप्टरों में ढो रहे हैं। ऐसी ही एक उड़ान में एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना हुई और करीब बीस लोग शहीद हुए। अनगिनत तस्वीरें बताती हैं कि तबाह उत्तराखंड में किस तरह सूखी लकडिय़ां जुटाकर अंतिम संस्कार किया जा रहा है, और शवों को सलामी दी जा रही है। 
हो सकता है कि जब एक-एक शव को परिवार के लोग पंचतत्व में विलीन करते, तो शायद काम इससे बेहतर होता, लेकिन आज ऐसे हालात में लोग अपनी जिंदगी को खतरे में डालकर जिस तरह अंतिम संस्कार कर रहे हैं, उसे कचरा जलाने की तरह का बताना एक बहुत ही हिंसक और घटिया सोच है, और रामदेव इस कला और तकनीक में महारत हासिल करते जा रहे हैं।
इसी सांस में उनके बयान का आगे का हिस्सा कहता है कि इस देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वाला युवराज इस हादसे के बाद देश में बिखरी लाशों को छोड़कर विदेश चला जाता है और वहां पर अपनी गर्लफे्रंड्स के साथ अय्याशी करने के लिए, सुरा और सुंदरी का आनंद लेने के लिए रहता है। 
अब सवाल यह उठता है कि राहुल गांधी विदेश में क्या करने गए हैं इस पर तो उस भाजपा ने भी अभी ऐसा कोई बयान नहीं दिया था कि वे वहां पर महिला मित्रों के साथ घूम रहे थे, अय्याशी कर रहे थे, सुरा और सुंदरी का आनंद ले रहे थे, लेकिन बाबा रामदेव मानो त्रिकालदर्शी हैं, उन्हें हर वक्त और हर जगह के नजारे घर बैठे दिखते हैं। 
दुनिया के इतिहास में धर्म या आध्यात्म से जुड़े हुए कई किस्म के कपड़े इसी किस्म की हिंसक बातें और हिंसक काम करते आए हैं, इसलिए रामदेव की बातों में कोई हैरानी नहीं है, और वे बाबावाद का कोई अपमान नहीं कर रहे, क्योंकि बाबावादों में कभी सम्मान की कोई बात नहीं रही। लेकिन आज राजनीति में एक सक्रिय हिस्सेदार रहते हुए रामदेव ने जो बातें कही हैं, उन बातों को अदालत में तो दूर, सार्वजनिक जीवन में भी साबित कर पाने में रामदेव, उनके लापता गुरू, और उनके ईश्वर, सब मिलकर भी कम पड़ेंगे।
इसी तरह की एक दूसरी गैरजिम्मेदार बात कल इंटरनेट पर अचानक तैरना शुरू हुई कि नरेन्द्र मोदी वहां पर दसियों हजार गुजरातियों को बचाने नहीं गए थे, बल्कि तीर्थ पर गई अपनी मां को लाने गए थे। अभी तो मोदी के दुश्मनों ने भी ऐसी कोई बात नहीं कही है, और अगर कोई अपनी सरकारी जिम्मेदारियों की अनदेखी किए बिना अगर अपनी मां को बचाने जाता भी है, किसी बचाव काम में रूकावट बने बिना मां को लेकर वापिस भी आता है, तो उसमें हैरानी की क्या बात है? लेकिन मोदी के कुछ विरोधी एक काफी लंबी-चौड़ी गुमनाम रिपोर्ट बनाकर इस बात को कल से फैलाने में लगे हैं।
वह रिपोर्ट चूंकि गुमनाम है, इसलिए उसके बारे में इससे अधिक कुछ कहने की गुंजाइश नहीं है, लेकिन बाबा रामदेव अपने चेहरे और अपनी आवाज के साथ कैमरों पर बोल रहे हैं, इसलिए उनकी बात को गंभीरता से लेना जरूरी है। अगर इस बाबा की ऐसी ही हरकतें जारी रहीं, तो हो सकता है कि वे अपनी पसंदीदा भाजपा पर ही भारी पडऩे लगें। बहुत से नेता और उनकी पार्टियां इस खुशफहमी में रहते हैं कि घटिया बातें लोगों का ध्यान खींचती हैं, हकीकत यह है कि ऐसी बातें कुछ देर के बाद लोगों के ध्यान को इस तरफ भी ले जाती हैं कि वे कितनी घटिया हैं। इसलिए नफरत बहुत लंबे सफर का ईंधन नहीं बनती।
दूसरी बात जो राहुल गांधी पर रामदेव के हमले के मुकाबले अधिक गंभीर है, और हमारे लिए तकलीफदेह है, वह है अंतिम संस्कार को लेकर कही गई एक बहुत ही झूठी, गैरजिम्मेदार और भड़काने वाली बात। आज जब उत्तराखंड में खोए हजारों या दसियों हजार लोगों के परिवारों के लोग, उनके करीबी दसियों लाख लोग बुरी तरह से विचलित हैं, तब ऐसे झूठ को फैलाना कि लाशों को कचरे की तरह जलाया जा रहा है, देश को भड़काने जैसा है, और बाबा का भगवा चोला उनको ऐसी हरकतों से रोकता नहीं है। दरअसल इस दर्जे के और इस किस्म के जितने लोग हैं, उनके किसी भी रंग के चोले उनको हिंसा भड़काने से नहीं रोकते, बल्कि नफरत फैलाकर ही वे जिंदा रहते हैं। 
रामदेवों की बातों को सुनकर चटखारे भरने वाले लोगों को याद रखना चाहिए कि ऐसे झूठ की जब अगली पीढिय़ां दूर-दूर तक फैलेंगी, तो हो सकता है कि आज मजा लेने वालों के घरवालों के बारे में भी कल कोई आसपास का भगवा चोले वाला, या बिना चोले वाला यह कहने पर उतर आएगा कि वे लोग भी कहीं जाकर सुरा-सुंदरी का मजा ले रहे हैं। उस दिन अपने घरवालों के बारे में वैसी तोहमत पर उनको कितना मजा आएगा? 
कांगे्रस पार्टी अपने भावी प्रधानमंत्री पर किए गए ऐसे भगवा हमले का जवाब देने के लिए पर्याप्त सक्षम है इसलिए उस बारे में हम बाबा को उजागर करने से अधिक कुछ करना नहीं चाहते, लेकिन देश के तकलीफजदा लोगों के जख्मों पर रामदेव जिस तरह से नमक छिड़क रहे हैं, वे किसके प्रति नमकहलाल बन रहे हैं, उसे वे जानें, लेकिन अगर ऐसे हिंसक हमलों को उजागर नहीं किया गया तो इस देश में नाले-नालियां ऐसे भगवे बयानों से पट जाएंगी, और वह गंदगी समाज की सेहत के लिए बहुत घातक होगी।
बाबा रामदेव अब राजनीति कर रहे हैं, गंदी और घटिया राजनीति कर रहे हैं, और ऐसे मौके पर देश के समझदार लोगों को मुंह खोलना चाहिए, ऐसे लोगों को भी मुंह खोलना चाहिए जिनके मन में भगवे रंग के लिए, बाबा शब्द के लिए, धर्म-आध्यात्म-योग के लिए सम्मान है। ऐसे लोगों को इस बाबा से सवाल करने चाहिए कि वे और कितना गिरेंगे? रामदेव को सत्ता के कामदेव ने बाण चलाकर कितने गहरे तक घायल किया है, इसकी भी मेडिकल जांच होनी चाहिए।