संपादकीय
9 जुलाई 2013
हिन्दुस्तान की हवा में खासा जहर घुल गया है। जो लोग खबरों में रहते हैं, उनके मुंह खुलते हैं, और अपने विरोधियों के बारे में ऐसी बातें बरसाना शुरू कर देते हैं, जिसकी कोई बुनियाद नहीं होती। और ऐसे लोगों में कांग्रेस के दिग्विजय सिंह या बेनीप्रसाद वर्मा ही अकेले हों, ऐसा नहीं है, भाजपा के लोग जो कल तक सत्रह बरस की साझेदारी गिनाते नहीं थकते थे, उनको आज नीतीश कुमार के राज में सिर्फ बुरा ही बुरा दिख रहा है। राजनीतिक खेमेबाजी इस कदर हिंसक हो गई है कि लोगों के दिल-दिमाग से इंसाफ के तर्क खत्म हो गए हैं, और हर बात में हिसाब चुकता करने की नीयत सिर चढ़कर बोलने लगी है। इसका सबसे बड़ा नुकसान भारत का लोकतंत्र हो रहा है जिसमें पक्ष-विपक्ष, सभी तरह की राजनीतिक विचारधाराओं, अलग-अलग संवैधानिक संस्थाओं, सबके लिए न सिर्फ गुंजाइश रखी गई है, बल्कि इन सब पर जिम्मेदारी भी धरी गई है। भारतीय संसदीय लोकतंत्र के संवैधानिक ढांचे के ऊपर लोगों को ओछापन हावी हो गया है।
बंगाल को अगर देखें तो महिलाओं के खिलाफ हिंसक बातों को लेकर वहां की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और उनके मंत्री जिस कदर घटिया और अलोकतांत्रिक बातें करते हैं, उसके बारे में हम दसियों बार लिख चुके हैं। ममता बैनर्जी अपने इस कार्यकाल में अदालतों से भी टकरा चुकी हैं, और अब वे राज्य के चुनाव आयोग से पंचायत के चुनावों को लेकर इस कदर टकरा रही हैं कि उनके मंत्री आमसभा में भाषण दे रहे हैं कि चुनावों के बाद आयोग को चूडिय़ां पहनकर घर बैठना पड़ेगा और वह मुंह दिखाने के लायक भी नहीं रह जाएगा। वहां पर चुनाव आयुक्त एक महिला है, और उनका भी किसी तरह का सम्मान तो दूर रहा, उनका हर तरह का अपमान करने से भी ममता और उनके मंत्री चूक नहीं रहे हैं। हम ममता के माक्र्सवादियों पर हमलों को लेकर पहले भी लिख चुके हैं, और अपने इस पहले सत्ताकाल में ही ममता ने लोकतंत्र की हर परंपरा को कुचलकर रख दिया है। आज राजनीतिक दलों के प्रवक्ता किसी भी मुद्दे पर अक्ल की बात करने के बजाय हमले करने में लगे रहते हैं। यही काम पार्टियों के नेता करते हैं, यही काम जनता के लिए हिकारत दिखाते हुए सत्ता पर बैठे अनगिनत लोग करते हैं। कुल मिलाकर सार्वजनिक जीवन में जो लोग जगह पाते हैं, उनकी बातें नई पीढ़ी के पढऩे लायक भी नहीं रह गई हैं। इनमें लोकतंत्र खत्म हो गया है, और इनका इस्तेमाल जनता, खासकर नई पीढ़ी, के किसी तरह के राजनीतिक शिक्षण के लिए नहीं किया जा सकता। सिर्फ हिंसक कटुता हावी है, और लोकतंत्र के तहत जो जरूरी इंसाफ-पसंदगी होनी चाहिए वह हवा हो चुकी है।
जहां तक मीडिया का सवाल है, तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बारे में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि अपने मिजाज की मजबूरी के चलते हुए वह आधे मिनट से कम की भी सबसे अधिक आपत्तिजनक और सबसे अधिक हिंसक, आक्रामक बातों पर जिंदा रहता है। नतीजा यह होता है कि देश के लोगों का देखने-सुनने का बहुत सा वक्त ऐसी सनसनीखेज और गैरजरूरी बातों में चला जाता है जिससे जिंदगी के असल मुद्दों का कुछ भी लेना-देना नहीं रहता। बड़े नामी-गिरामी समाचार चैनलों के स्टूडियो डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के फ्री स्टाइल कुश्ती के उस स्टेडियम जैसे हो जाते हैं जहां पर फिक्सिंग हो चुकी है। टीवी की बहसों पर सबको पता होता है कि कौन क्या कहने वाले हैं, और जानकार-समझदार लोगों को यह भी पता होता है कि इन बहसों के बाद चिडिय़ा के अंडे जितना भी नतीजा नहीं निकलेगा, फिर भी लोग इस बुद्धू-बक्से से बंधे रह जाते हैं।
यह लोकतंत्र न कोई सफर कर रहा है, न आगे बढ़ रहा है, न परिपक्व होते दिख रहा है। इसकी उम्र उस बुजुर्ग की उम्र जैसी बढ़ रही है, जिसका कोई योगदान समाज और दुनिया में नहीं मिल रहा है, और जो सिर्फ वेंटिलेटर जैसे उपकरणों से सांस पा रहा है। यह लोकतंत्र एक जगह पर थम गया है, और हर पांच बरस में डाइलिसिस की राह देखता है। सोचने-विचारने से पूरी तरह आजाद हो चुकी भारत की, बड़े दलों की राजनीति आने वाले दिन सिर्फ अंधकार के साबित कर रही है।










