विशेष संपादकीय
5 अक्टूबर, 2013
सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ के चुनाव, राज्य के अस्तित्व में आने के बाद के तीसरे विधानसभा चुनाव आज से छत्तीस दिनों के बाद हैं। इस राज्य के लिए ये चुनाव कई तरह की संभावनाओं, और कई तरह के खतरों को लेकर आ रहे हैं। एक छोटा राज्य होने के नाते जिस तरह का अस्थिरता का खतरा इस पर हो सकता था, वह नहीं हुआ। और पहले तीन बरस की बिना चुनी हुई, मध्यप्रदेश से विरासत में मिली कांगे्रस सरकार पूरी तरह स्थिर रही, और लोग इस बात पर भी हैरान रहे कि विधानसभा के भीतर जरूरत का बहुमत होने पर भी मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने विपक्ष में अस्थिरता पैदा करने के लिए, या पैदा करते हुए, क्यों दर्जन भर विधायकों की राजनीतिक खरीद-फरोख्त की थी? आज तक यह बात किसी को समझ नहीं आई कि एक राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद कांगे्रस ने थोक में वैसे दलबदल का सौ फीसदी गैरजरूरी काम क्यों किया था, वैसे काम की इजाजत क्यों दी थी, या वैसे काम को बर्दाश्त क्यों किया था? खैर वह कांगे्रस का खरीदी का अपना फैसला था, और बिकाऊ विधायकों का बिकने का अपना फैसला, और जनता ने उन पर अपना फैसला भी दे दिया था, उस सौदे के सामानों में से आज विधानसभा में इक्का-दुक्का ही रह गए हैं, और अगर जनता चाहेगी तो ऐसे बिकाऊ लोगों से आज के छत्तीस दिन बाद पूरा ही छुटकारा हो जाएगा।
अब कांगे्रस से परे पिछले दस बरस की भाजपा सरकार की बात करें तो शोहरत और ताकत की पहली सीढ़ी से शुरू करके आज मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह इस जगह पहुंच गए हैं, कि वे देश के भाजपा के सबसे असरदार आधा-एक दर्जन लोगों में से हो गए हैं, छत्तीसगढ़ में भाजपा उनके काम और नाम पर सवार होकर यह चुनाव भी पार करने का भरोसा रख रही है, और पार्टी के भीतर के बहुत ताकतवर, एक वक्त के उनसे भी बहुत अधिक ताकतवर, लोग भी उनको कोई चुनौती नहीं दे पाए। नतीजा यह हुआ कि पिछले दस बरसों में से हर दिन भाजपा छत्तीसगढ़ में न सिर्फ सत्ता पर अधिक काबिज होती चली गई, बल्कि संसदीय चुनावों में भी उसने कांगे्रस को पूरी तरह हाशिए पर कर दिया, और जनता के बीच कांगे्रस की अधिक जगह भी नहीं छोड़ी।
देश-विदेश के जो राजनीतिक विश्लेषक छत्तीसगढ़ आते हैं, और यहां पर जाति, धर्म, आर्थिक पैमाने, सबको समझकर जब आज का विधायकों और सांसदों का खाका देखते हैं, तो वे हैरान हो जाते हैं कि कांगे्रस के लिए सबसे माकूल बैठने वाले यह प्रदेश किस तरह दस बरसों से भाजपा के हवाले हो गया है। छत्तीसगढ़ के भीतर और बाहर राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा बहुमत इस ख्याल का है कि इस प्रदेश में कांगे्रस को हराने की ताकत खुद कांगे्रस के भीतर है, जिसमेें कि गुटबाजी ने एक खड़े टाईम जोन के अंदाज में पार्टी को सिर से पैर तक चीरकर रख दिया है, प्रदेश के सबसे बड़े कांगे्रस नेताओं के बीच जो खाई है, बहुत से लोगों का मानना है कि भाजपा ने मोटे तौर पर यही मलाई खाई है। लेकिन हम इससे थोड़ा सा अलग हटकर भी देखना चाहेंगे। कांगे्रस के आत्मघाती तरीके नए नहीं हैं, और यह पार्टी आजादी की लड़ाई के दौरान भी कई तरह के अंदरूनी मुकाबले के बीच ही चलती रही, और बढ़ती रही। जिस तरह के सांप-नेवले जैसे संबंध आज छत्तीसगढ़ कांगे्रस नेताओं के बीच हैं, कमोबेश वैसे ही रिश्ते एक वक्त शुक्ल बंधुओं और अर्जुन सिंह के बीच थे। इसलिए गुटबाजी अपने-आपमें कांगे्रस को खत्म करने की ताकत नहीं रखती, और छत्तीसगढ़ में भाजपा को दो चुनावों में जनता ने विधायक और सांसद इसलिए नहीं चुना कि वह कांगे्रस की गुटबाजी से थकी हुई थी। भाजपा ने अपने नाम की कमाई भी खाई, और प्रदेश की सबसे गरीब आधी से अधिक आबादी की जिंदगी से भूख को दूर करने का यह नतीजा रहा कि भाजपा और डॉ. रमन सिंह सिर्फ कांगे्रस-विरोधी वोटों पर जिंदा नहीं रहे। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने राज्य को दंगों से दूर रखा, देश के दूसरे दर्जन भर मुख्यमंत्रियों की तरह छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री किसी भ्रष्टाचार में नहीं फंसा, कटघरे तक जाने की नौबत नहीं आई। राज्य आर्थिक रूप से स्थिर रहा, लगातार आगे बढ़ते रहा, जनता की सुविधाएं बढ़ती रहीं, सबसे गरीब के फायदे के सरकारी कार्यक्रमों के लिए रमन सरकार को पूरे देश में वाहवाही मिलती रही।
लेकिन आने वाले चुनाव, आज से छत्तीस दिन बाद यह भी तय करने जा रहे हैं कि इसी सरकार का हिस्सा रहे हुए बहुत से मंत्री, और बहुत से विधायक किस तरह अपने भ्रष्टाचार के लिए जनता के बीच खासे पहचाने जाते हैं। यह वोट जनता ऐसे मूड और माहौल में देने जा रही है, जब वह देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अभूतपूर्व जागरूकता देख रही है, जब वह कुनबापरस्ती के खिलाफ एक लहर देख रही है, और जब वह नेताओं की बदतमीजी, और उनके घमंड को चूर-चूर करने के मूड में भी दिख रही है। ऐसी जनता को आज सुप्रीम कोर्ट की मेहरबानी से नोटा नाम का एक ऐसा नया हक मिल रहा है जिससे वह वोटिंग मशीन पर दिए गए सारे उम्मीदवारों को खारिज करते हुए आखिरी का वह बटन भी दबा सकती है जिस पर लिखा होगा-इनमें से कोई नहीं।
यह चुनाव हो सकता है कि 'इनमें से कोई नहीं' वाली बटन तय करे। हो सकता है कि हिंदुस्तानी लोकतंत्र की मौजूदा हालत से थके हुए लोगों को पहली बार ऐसा आसानी से इस्तेमाल किया जा सकने वाला हक मिल रहा है, और जनता इसका खूब इस्तेमाल करे। लोगों को सूचना का अधिकार आने पर इस बात का अंदाज ही नहीं था कि यह मासूम सा दिखता हक सरकारी डकैती को किस तरह उजागर करने का औजार बन जाएगा। हो सकता है कि 'नन ऑफ द अबव', नोटा नाम का यह नया बटन बुरे लोगों की पीठ पर खासा मोटा चाबुक बनकर पड़े। एक राजनीतिक अंदाज यह भी है कि सबसे भ्रष्ट, बुरे, और नापसंद उम्मीदवारों के खिलाफ नाराजगी दिखाने के लिए इस बटन का अधिक इस्तेमाल हो सकता है। अगर ऐसा होगा तो दो-दो, चार-चार सौ वोटों से आज होने वाली जीत-हार पूरी तरह डांवाडोल हो जाएगी।
आज प्रदेश में माहौल चाहे भाजपा का हिमायती क्यों न दिख रहा हो, इसके बुरे विधायकों को जनता अच्छा-खासा सबक सिखाने को कमर कसकर बैठी दिख रही है। कांगे्रस के बारे में हम कुछ कहना इसलिए नहीं चाहते कि छत्तीसगढ़ में यह पार्टी अपनी राष्ट्रीय लीडरशिप के काबू से पूरी तरह बाहर है, और आज जनता के बीच यह बात ही साफ नहीं है कि छत्तीसगढ़ कांगे्रस में किसका कितना काबू है। ऐसे में दस बरसों का रमन-राज देखे हुए लोग दस बरस के गृहयुद्ध को झेलती हुई कांगे्रस पार्टी की तरफ कैसे खींचे जा सकेंगे, यह तिलस्म कांगे्रस को ही पता होगा।
फिलहाल आज इस मुद्दे पर लिखते हुए हम दो बातें लिखना चाहते हैं। एक तो आने वाले चुनाव में जनता को हर भ्रष्ट, और हर दुष्ट को खारिज करना चाहिए, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों। दूसरी बात यह कि आजाद हिंदुस्तान में जो लोग इतनी बड़ी-बड़ी पार्टियों के भीतर भी अपने कुनबों से परे नहीं देखते, उन पूरे-पूरे कुनबों को खारिज किया जाना चाहिए। आज जनता के हाथ एसएमएस से लेकर दूसरे कई किस्म के छोटे-छोटे औजार हैं, जिनसे जागरूकता फैलाई जा सकती है। और बुरे को मारने के लिए, बुराई को खत्म करने के लिए औजारों का हथियारों की तरह इस्तेमाल भी जायज होता है, लोकतांत्रिक हथियारों की तरह। ऐसे में हम छत्तीसगढ़ के अगले छत्तीस दिनों के लिए लोगों के बीच इस जागरूकता की अपील करते हैं कि चुनावी राजनीति के ठेकेदारों, खरीददारों, और बिकने वालों के खिलाफ एक ऐसी समझ अपने आसपास फैलाने की कोशिश करें जो यहां पर गिनाए गए तीन बुनियादी मुद्दों को लेकर जागरूकता खड़ी करे। अगर छत्तीसगढ़ के मतदाता अपनी सामान्य समझबूझ से समझ आने वाले, पहचाने जा सकने वाले, भ्रष्ट, दुष्ट, और कुनबापरस्त को परास्त कर सकें, तो यह लोकतंत्र की जीत होगी। हममें से हर कोई अगर आसपास के दस-दस लोगों को कह सके, समझा सके, सहमत करा सके कि इन तीन पैमानों में से किसी पर भी खरा उतरने वाले भ्रष्ट, दुष्ट, और कुनबापरस्त को खारिज करने से ही हम अपनी आने वाली पीढिय़ों को एक बेहतर लोकतंत्र दे सकेंगे, तो इस समझ से बेहतर विरासत और कुछ नहीं होगी। अगले छत्तीस दिन हममें से हर किसी को हर दिन दस-दस लोगों को इस बात की अहमियत समझाने की जरूरत है, और उससे इस प्रदेश में चाहे जिस पार्टी की सरकार आए, एक बेहतर लोकतंत्र जरूर आएगा। ये दिन प्रदेश भर में दुर्गा के हाथों राक्षस के मारे जाने के नजारे के दिन भी हैं, ये दिन, चुनाव के पहले के दिन, बुराईयों और घमंड का प्रतीक बने हुए रावण को मारने के दिन भी हैं। इन्हीं दो बातों को जनता को याद रखना है कि राक्षस और रावण किस तरह अपनी दुष्टता का दाम हजारों बरस बाद भी चुका रहे हैं। और बुराई पर वार की यह प्रतीकात्मक परंपरा किस तरह लोकतंत्र के भी हजारों बरस पहले से चली आ रही है। इस परंपरा को आज अपनी समझ से वोट-तिहार पर भी कायम रखना है।