सर्वदलीय बैठकों का सच तुरंत जनता के सामने रखो

7 अक्टूबर 2013
संपादकीय
दो खबरें यह फिक्र पैदा करने वाली आई हैं कि क्या भारत की राजनीतिक पार्टियां बंद कमरे की बैठकों में अपनी सोच कुछ रखती हैं, और बाहर निकलकर उस सोच से सार्वजनिक नुकसान देखकर उसके खिलाफ बात करती हैं? ऐसा पहला मामला पिछले एक पखवाड़े में यह सामने आया कि संसद में बैठे मुजरिमों के साथ रियायत के लिए यूपीए सरकार ने जो सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, उसमें वामपंथियों, और शायद बीजू जनता दल, को छोड़कर बाकी सारी पार्टियां रियायत की हिमायती थीं, उनकी सहमति और असहमति इस बात पर थी कि मुजरिमों को रियायत का संविधान संशोधन संसद में विधेयक के रास्ते आए, या फिर सरकार इसे लेकर अध्यादेश लाए। मुजरिमों के खिलाफ अधिक लोग नहीं थे, और मुजरिमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की पहल के पक्ष में तो शायद कोई भी नहीं थे। इनमें से अपराधी-अध्यादेश के बारे में एक खबर यह भी है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने केन्द्रीय मंत्रियों से इस अध्यादेश पर सफाई और स्पष्टीकरण मांगते हुए सर्वदलीय बैठक की कार्रवाई का लिखित ब्यौरा भी मांगा है कि किसी पार्टी ने इस अध्यादेश के बारे में क्या-क्या कहा था। सूचना के अधिकार को राजनीतिक दलों से परे रखने के मामले में भी सारी पार्टियां एक थीं, और सुप्रीम कोर्ट को अपनी औकात में रहने की नसीहत एक-एक सांसद दे रहे थे। दूसरी खबर तेलंगाना को लेकर है। कांग्रेस के आन्ध्र के संगठन-प्रभारी दिग्विजय सिंह ने कहा है कि सरकार के पास जगनमोहन रेड्डी और चन्द्राबाबू नायडू, दोनों के तेलंगाना के समर्थन में दिए गए पत्र हैं, और आज ये नेता सार्वजनिक आंदोलन करके तेलंगाना राज्य निर्माण का विरोध कर रहे हैं।
लोगों को याद होगा कि जब अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद लोकपाल मसौदा कमेटी बनी, और उसमें अन्ना टोली के पांच गैरदलित-गैरआदिवासी-गैरअल्पसंख्यक मर्द बैठे, तो बैठक की पूरी की पूरी रिकॉर्डिंग की गई, ताकि बाद में कोई अपनी बात से पलट न सके। लोगों को यह भी मालूम है कि अदालत में गवाही में कही गई कोई भी बात, और संसद या विधानसभा की कार्रवाई के दौरान कही गई बात, शब्द-शब्द दर्ज की जाती है, और वहां तक जनता की पहुंच भी रहती है। आज देश में सार्वजनिक जीवन में राजनीतिक जहर से कड़वाहट इतनी घुल गई है, लोग इतने तरह के झूठे और फरेबी बयान देने लगे हैं कि आज ऐसी जरूरत लगती है कि कही हुई हर बात दर्ज हो जानी चाहिए। सर्वदलीय बैठकें तो किसी विवादास्पद या संवेदनशील मुद्दे पर ही बुलाई जाती है, और वहां पर अगर लोग कोई बात कहते हैं, तो जनता को उसको जानने का हक होना चाहिए। जब संसद की कार्रवाई पूरे वक्त टीवी पर दिखाई जाती है, और वहां की बातचीत की कॉपी भी हासिल की जा सकती है, तो सर्वदलीय बैठक के तुरंत बाद बैठक की कार्रवाई इसी तरह जारी होनी चाहिए।  एक तो यह देश वैसे भी लोकतांत्रिक राजनीति में भेड़ों की खाल ओढ़कर घूमते हुए भेडिय़ों को देख-देखकर थका हुआ है, संसद और विधानसभाओं में मुजरिमों को देख-देखकर जनता का मन हिकारत से भरा हुआ है। और इसके बाद अगर सर्वदलीय बैठकों में कुछ कहकर आने वाले लोग, बाहर आकर सड़कों पर आग लगवाने के लिए कुछ और कहने लगें, तो जनता भेड़-भेडि़ए का क्या फर्क कर पाएगी? 
हिन्दुस्तान में जनता को सूचना का जो अधिकार मिला हुआ है, उसके तहत सिर्फ सरकारी फाईलों की सूचना काफी नहीं है। सर्वदलीय बैठकों की सूचना भी इसी अधिकार के तहत जनता को मिलनी चाहिए, और इसके लिए मांगने की जरूरत नहीं होनी चाहिए, इसे देने की जिम्मेदारी होनी चाहिए। आज भारत में सरकार, राजनीतिक पार्टियां, और संवैधानिक संस्थाएं इस फेर में रहती हैं कि कैसे-कैसे जनता को सूचना के उसके अधिकार के लिए मनाही की जा सके। इस देश में सूचना के अधिकार कानून का नाम बदलकर सूचना की जिम्मेदारी कानून करना चाहिए, तभी जाकर ताकत की कुर्सियों पर बैठे लोग सूचना पर से अपनी कुंडली हटाएंगे। 
देश के दो नाजुक और गंभीर मुद्दों पर किस पार्टी और नेता ने क्या कहा था, और क्या लिखा था, इसका खुलासा जनता के सामने तुरंत होना चाहिए, और इसे एक स्थायी परंपरा के रूप में लागू करना चाहिए। यह लोकतंत्र में एक बुनियादी हक है, और इसके पहले कि सूचना आयोग या कोई अदालत सरकार को ऐसी कार्रवाई उजागर करने पर मजबूर करे, सरकार को खुद ही यह सिलसिला शुरू कर देना चाहिए। 

मोदी के सामने देहहीन से बच्चों की भीड़ सवालों की फसल की तरह

संपादकीय
6 अक्टूबर, 2013

गुजरात के विकास के नरेन्द्र मोदी के दावों और नारों के जवाब में यह तो होना ही था। जैसे-जैसे कोई नेता ऊंचाईयों पर जाने लगते हैं, उनका तन-बदन जनता के सामने अधिक दिखने लगता है, और उनका हाल उस मछली की तरह हो जाता है जो कि चारों तरफ से पारदर्शी कांच वाले मछलीघर में जीती है। यह तो मोदी के लिए अच्छी बात है कि घर पर जी रही बुजुर्ग मां के अलावा उनका कोई कुनबा नहीं है, उनके निजी भ्रष्टाचार का कोई किस्सा बाजार में नहीं है, वरना अब तक उनकी निजी जिंदगी उसी तरह मोम की ट्रे पर बिछी होती जिस तरह जीवविज्ञान के छात्र-छात्रा मेंढक को कीलों से ठोंककर उसका चीरफाड़ करते रहते हैं। और भारत के सीएजी ने अपनी ऑडिट में मोदी के गुजरात की जो कमियां और खामियां गिनाई हैं, उन पर जवाब तो देश के प्रधानमंत्री पद के दावेदार को देना ही होगा। इसलिए मोदी के नाम के साथ भद्दी जुबान से विशेषण जोड़कर बातें कहने वाले उनके विरोधियों और आलोचकों से जुबान उधार लिए बिना भी हम उनसे कई सवाल यहां कर सकते हैं।
दरअसल गुजरात के आर्थिक विकास और वहां पर एक अच्छे शासन-प्रशासन के मोदी के दस बरसों से चले आ रहे नारों की वजह से आज यह बात हक्का-बक्का करती है कि गुजरात में चालीस फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। और मोदी राज के पहले भी गुजरात एक आर्थिक संपन्न और विकसित राज्य था, न कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की तरह का एक बीमारू राज्य। इसलिए जब ऐसे संपन्न राज्य में सुशासन-प्रशासन के बावजूद अगर चालीस फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, तो फिर यह बात जाहिर है कि वहां का आर्थिक विकास गरीब जनता के बीच जाकर बंट नहीं पाया, और जैसी कि गुजरात में जनचर्चा और जनधारणा है, मोदी के चहेते कुछ चार-पांच अदानियों के बीच शायद उसका बंटवारा खत्म हो गया। और जब मोदी की देहरी से आर्थिक विकास के फल-फूल बांटने का काम चल रहा था, तो गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों की कतार पर धूल उड़ाते फल-फूल से भरे ट्रक लेकर कुछ उद्योगपति शायद वहां से चले गए होंगे। 
आज यह बात अधिक महत्वपूर्ण इसलिए है कि भाजपा के देश के सबसे बुजुर्ग नेता लाल कृष्ण अडवानी ने कुछ हफ्ते पहले मध्यप्रदेश में एक सार्वजनिक भाषण के दौरान मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के आर्थिक विकास के लिए यहां के भाजपा मुख्यमंत्रियों के नाम लेकर उनकी तारीफ की थी, और कहा था कि गुजरात तो पहले से ही आर्थिक-संपन्न और विकसित राज्य था, मप्र-छत्तीसगढ़ का ऐसा विकास उनके बीमारू इतिहास के बावजूद होना अधिक बड़ी बात है। लकीर जहां से शुरू होती है, उसके बाद ही उसके नाप को गिना जाता है, इसलिए गुजरात का मोदी-विकास किसी बीमारू राज्य के विकास जैसा नहीं था। 
हम अभी भारत सरकार, सीएजी, और यूनीसेफ जैसे सर्वे के आंकड़ों को इसलिए चुनौती देने का मौका नहीं समझते क्योंकि इन्हीं तमाम सर्वे के आधार पर छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और दूसरे कुछ पैमानों पर गुजरात भी वाहवाही का दावा करते आए हैं। इसलिए आज कुछ चुनिंदा पैमानों पर इन सर्वेक्षणों को गलत मानना खेल के बीच में नियम बदलने जैसा होगा। आज जब मोदी धार्मिक आधार पर देश की आबादी के बीच भेदभाव के खतरे के साथ देखे जा रहे हैं, तब अगर गुजरात में हिंदू-आदिवासी आबादी के गरीबों, और वहां के उनसे बेहतर आय-वर्ग के लोगों के बीच भी अगर विकास के बंटवारे में भेदभाव हुआ है, तो यह साम्प्रदायिक भेदभाव से कम खतरनाक नहीं है। यह भेदभाव नरेन्द्र मोदी जैसे तेज और होशियार मुख्यमंत्री के राज में अनदेखी से हो गया हो, संदेह का ऐसा लाभ उनके जैसे ताकतवर मुख्यमंत्री को नहीं दिया जा सकता। इसलिए आज देश में उनको इस बात का जवाब देना होगा कि खुशियों का बंटवारा गरीबों की देह तक पहुंचने के पहले खत्म कैसे हो जाता है? और कुपोषण के ये आंकड़े किसी नए मुख्यमंत्री का मुंह नहीं चिढ़ा रहे हैं, दस बरस से अधिक तक जो गुजरात पर अकेले राज कर रहा है, उसके सामने देहहीन से बच्चों की भीड़ सवालों की फसल की तरह खड़ी है।
देश का भावी प्रधानमंत्री अपने ताजा-ताजा इतिहास, और वर्तमान के लिए किसी रियायत का हकदार नहीं होता, इसलिए मोदी को कुपोषण का जवाब देना होगा।

दिन बचे छत्तीस

विशेष संपादकीय
5 अक्टूबर, 2013
सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ के चुनाव, राज्य के अस्तित्व में आने के बाद के तीसरे विधानसभा चुनाव आज से छत्तीस दिनों के बाद हैं। इस राज्य के लिए ये चुनाव कई तरह की संभावनाओं, और कई तरह के खतरों को लेकर आ रहे हैं। एक छोटा राज्य होने के नाते जिस तरह का अस्थिरता का खतरा इस पर हो सकता था, वह नहीं हुआ। और पहले तीन बरस की बिना चुनी हुई, मध्यप्रदेश से विरासत में मिली कांगे्रस सरकार पूरी तरह स्थिर रही, और लोग इस बात पर भी हैरान रहे कि विधानसभा के भीतर जरूरत का बहुमत होने पर भी मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने विपक्ष में अस्थिरता पैदा करने के लिए, या पैदा करते हुए, क्यों दर्जन भर विधायकों की राजनीतिक खरीद-फरोख्त की थी? आज तक यह बात किसी को समझ नहीं आई कि एक राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद कांगे्रस ने थोक में वैसे दलबदल का सौ फीसदी गैरजरूरी काम क्यों किया था, वैसे काम की इजाजत क्यों दी थी, या वैसे काम को बर्दाश्त क्यों किया था? खैर वह कांगे्रस का खरीदी का अपना फैसला था, और बिकाऊ विधायकों का बिकने का अपना फैसला, और जनता ने उन पर अपना फैसला भी दे दिया था, उस सौदे के सामानों में से आज विधानसभा में इक्का-दुक्का ही रह गए हैं, और अगर जनता चाहेगी तो ऐसे बिकाऊ लोगों से आज के छत्तीस दिन बाद पूरा ही छुटकारा हो जाएगा। 
अब कांगे्रस से परे पिछले दस बरस की भाजपा सरकार की बात करें तो शोहरत और ताकत की पहली सीढ़ी से शुरू करके आज मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह इस जगह पहुंच गए हैं, कि वे देश के भाजपा के सबसे असरदार आधा-एक दर्जन लोगों में से हो गए हैं, छत्तीसगढ़ में भाजपा उनके काम और नाम पर सवार होकर यह चुनाव भी पार करने का भरोसा रख रही है, और पार्टी के भीतर के बहुत ताकतवर, एक वक्त के उनसे भी बहुत अधिक ताकतवर, लोग भी उनको कोई चुनौती नहीं दे पाए। नतीजा यह हुआ कि पिछले दस बरसों में से हर दिन भाजपा छत्तीसगढ़ में न सिर्फ सत्ता पर अधिक काबिज होती चली गई, बल्कि संसदीय चुनावों में भी उसने कांगे्रस को पूरी तरह हाशिए पर कर दिया, और जनता के बीच कांगे्रस की अधिक जगह भी नहीं छोड़ी। 
देश-विदेश के जो राजनीतिक विश्लेषक छत्तीसगढ़ आते हैं, और यहां पर जाति, धर्म, आर्थिक पैमाने, सबको समझकर जब आज का विधायकों और सांसदों का खाका देखते हैं, तो वे हैरान हो जाते हैं कि कांगे्रस के लिए सबसे माकूल बैठने वाले यह प्रदेश किस तरह दस बरसों से भाजपा के हवाले हो गया है। छत्तीसगढ़ के भीतर और बाहर राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा बहुमत इस ख्याल का है कि इस प्रदेश में कांगे्रस को हराने की ताकत खुद कांगे्रस के भीतर है, जिसमेें कि गुटबाजी ने एक खड़े टाईम जोन के अंदाज में पार्टी को सिर से पैर तक चीरकर रख दिया है, प्रदेश के सबसे बड़े कांगे्रस नेताओं के बीच जो खाई है, बहुत से लोगों का मानना है कि भाजपा ने मोटे तौर पर यही मलाई खाई है। लेकिन हम इससे थोड़ा सा अलग हटकर भी देखना चाहेंगे। कांगे्रस के आत्मघाती तरीके नए नहीं हैं, और यह पार्टी आजादी की लड़ाई के दौरान भी कई तरह के अंदरूनी मुकाबले के बीच ही चलती रही, और बढ़ती रही। जिस तरह के सांप-नेवले जैसे संबंध आज छत्तीसगढ़ कांगे्रस नेताओं के बीच हैं, कमोबेश वैसे ही रिश्ते एक वक्त शुक्ल बंधुओं और अर्जुन सिंह के बीच थे। इसलिए गुटबाजी अपने-आपमें कांगे्रस को खत्म करने की ताकत नहीं रखती, और छत्तीसगढ़ में भाजपा को दो चुनावों में जनता ने विधायक और सांसद इसलिए नहीं चुना कि वह कांगे्रस की गुटबाजी से थकी हुई थी। भाजपा ने अपने नाम की कमाई भी खाई, और प्रदेश की सबसे गरीब आधी से अधिक आबादी की जिंदगी से भूख को दूर करने का यह नतीजा रहा कि भाजपा और डॉ. रमन सिंह सिर्फ कांगे्रस-विरोधी वोटों पर जिंदा नहीं रहे। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने राज्य को दंगों से दूर रखा, देश के दूसरे दर्जन भर मुख्यमंत्रियों की तरह छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री किसी भ्रष्टाचार में नहीं फंसा, कटघरे तक जाने की नौबत नहीं आई। राज्य आर्थिक रूप से स्थिर रहा, लगातार आगे बढ़ते रहा, जनता की सुविधाएं बढ़ती रहीं, सबसे गरीब के फायदे के सरकारी कार्यक्रमों के लिए रमन सरकार को पूरे देश में वाहवाही मिलती रही। 
लेकिन आने वाले चुनाव, आज से छत्तीस दिन बाद यह भी तय करने जा रहे हैं कि इसी सरकार का हिस्सा रहे हुए बहुत से मंत्री, और बहुत से विधायक किस तरह अपने भ्रष्टाचार के लिए जनता के बीच खासे पहचाने जाते हैं। यह वोट जनता ऐसे मूड और माहौल में देने जा रही है, जब वह देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अभूतपूर्व जागरूकता देख रही है, जब वह कुनबापरस्ती के खिलाफ एक लहर देख रही है, और जब वह नेताओं की बदतमीजी, और उनके घमंड को चूर-चूर करने के मूड में भी दिख रही है। ऐसी जनता को आज सुप्रीम कोर्ट की मेहरबानी से नोटा नाम का एक ऐसा नया हक मिल रहा है जिससे वह वोटिंग मशीन पर दिए गए सारे उम्मीदवारों को खारिज करते हुए आखिरी का वह बटन भी दबा सकती है जिस पर लिखा होगा-इनमें से कोई नहीं। 
यह चुनाव हो सकता है कि 'इनमें से कोई नहीं' वाली बटन तय करे। हो सकता है कि हिंदुस्तानी लोकतंत्र की मौजूदा हालत से थके हुए लोगों को पहली बार ऐसा आसानी से इस्तेमाल किया जा सकने वाला हक मिल रहा है, और जनता इसका खूब इस्तेमाल करे। लोगों को सूचना का अधिकार आने पर इस बात का अंदाज ही नहीं था कि यह मासूम सा दिखता हक सरकारी डकैती को किस तरह उजागर करने का औजार बन जाएगा। हो सकता है कि 'नन ऑफ द अबव', नोटा नाम का यह नया बटन बुरे लोगों की पीठ पर खासा मोटा चाबुक बनकर पड़े। एक राजनीतिक अंदाज यह भी है कि सबसे भ्रष्ट, बुरे, और नापसंद उम्मीदवारों के खिलाफ नाराजगी दिखाने के लिए इस बटन का अधिक इस्तेमाल हो सकता है। अगर ऐसा होगा तो दो-दो, चार-चार सौ वोटों से आज होने वाली जीत-हार पूरी तरह डांवाडोल हो जाएगी। 
आज प्रदेश में माहौल चाहे भाजपा का हिमायती क्यों न दिख रहा हो, इसके बुरे विधायकों को जनता अच्छा-खासा सबक सिखाने को कमर कसकर बैठी दिख रही है। कांगे्रस के बारे में हम कुछ कहना इसलिए नहीं चाहते कि छत्तीसगढ़ में यह पार्टी अपनी राष्ट्रीय लीडरशिप के काबू से पूरी तरह बाहर है, और आज जनता के बीच यह बात ही साफ नहीं है कि छत्तीसगढ़ कांगे्रस में किसका कितना काबू है। ऐसे में दस बरसों का रमन-राज देखे हुए लोग दस बरस के गृहयुद्ध को झेलती हुई कांगे्रस पार्टी की तरफ कैसे खींचे जा सकेंगे, यह तिलस्म कांगे्रस को ही पता होगा। 
फिलहाल आज इस मुद्दे पर लिखते हुए हम दो बातें लिखना चाहते हैं। एक तो आने वाले चुनाव में जनता को हर भ्रष्ट, और हर दुष्ट को खारिज करना चाहिए, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों। दूसरी बात यह कि आजाद हिंदुस्तान में जो लोग इतनी बड़ी-बड़ी पार्टियों के भीतर भी अपने कुनबों से परे नहीं देखते, उन पूरे-पूरे कुनबों को खारिज किया जाना चाहिए। आज जनता के हाथ एसएमएस से लेकर दूसरे कई किस्म के छोटे-छोटे औजार हैं, जिनसे जागरूकता फैलाई जा सकती है। और बुरे को मारने के लिए, बुराई को खत्म करने के लिए औजारों का हथियारों की तरह इस्तेमाल भी जायज होता है, लोकतांत्रिक हथियारों की तरह। ऐसे में हम छत्तीसगढ़ के अगले छत्तीस दिनों के लिए लोगों के बीच इस जागरूकता की अपील करते हैं कि चुनावी राजनीति के ठेकेदारों, खरीददारों, और बिकने वालों के खिलाफ एक ऐसी समझ अपने आसपास फैलाने की कोशिश करें जो यहां पर गिनाए गए तीन बुनियादी मुद्दों को लेकर जागरूकता खड़ी करे। अगर छत्तीसगढ़ के मतदाता अपनी सामान्य समझबूझ से समझ आने वाले, पहचाने जा सकने वाले, भ्रष्ट, दुष्ट, और कुनबापरस्त को परास्त कर सकें, तो यह लोकतंत्र की जीत होगी। हममें से हर कोई अगर आसपास के दस-दस लोगों को कह सके, समझा सके, सहमत करा सके कि इन तीन पैमानों में से किसी पर भी खरा उतरने वाले भ्रष्ट, दुष्ट, और कुनबापरस्त को खारिज करने से ही हम अपनी आने वाली पीढिय़ों को एक बेहतर लोकतंत्र दे सकेंगे, तो इस समझ से बेहतर विरासत और कुछ नहीं होगी। अगले छत्तीस दिन हममें से हर किसी को हर दिन दस-दस लोगों को इस बात की अहमियत समझाने की जरूरत है, और उससे इस प्रदेश में चाहे जिस पार्टी की सरकार आए, एक बेहतर लोकतंत्र जरूर आएगा। ये दिन प्रदेश भर में दुर्गा के हाथों राक्षस के मारे जाने के नजारे के दिन भी हैं, ये दिन, चुनाव के पहले के दिन, बुराईयों और घमंड का प्रतीक बने हुए रावण को मारने के दिन भी हैं। इन्हीं दो बातों को जनता को याद रखना है कि राक्षस और रावण किस तरह अपनी दुष्टता का दाम हजारों बरस बाद भी चुका रहे हैं। और बुराई पर वार की यह प्रतीकात्मक परंपरा किस तरह लोकतंत्र के भी हजारों बरस पहले से चली आ रही है। इस परंपरा को आज अपनी समझ से वोट-तिहार पर भी कायम रखना है।

पहले शौचालय, फिर देवालय

संपादकीय
4 अक्टूबर 2013
कल चाहे इस बात को कांग्रेस के जयराम रमेश ने कहा हो, और आज चाहे इस बात को कांग्रेस के दुश्मन नंबर एक, नरेन्द्र मोदी ने कहा हो, समझदारी की बात पर राजनीति क्यों करनी चाहिए? विश्व हिन्दू परिषद जैसे आक्रामक हिन्दू संगठनों को तो मंदिर शब्द को लेकर कही किसी भी बात पर पैनी पिन चुभ जाती है, लेकिन भाजपा जैसी पार्टी को तो गंभीरता दिखानी चाहिए। और सिर्फ भाजपा को ही नहीं, कांग्रेस को भी गंभीरता दिखानी चाहिए जो कि नरेन्द्र मोदी को बार-बार साम्प्रदायिकता छोड़कर विकास पर बहस करने की चुनौती देती है। आज देवालय से पहले शौचालय की बात कहने पर अगर मोदी को उलझाने के लिए कांग्रेस के नेता उसे सीधे अयोध्या में मंदिर-मस्जिद की जगह पर शौचालय से जोड़ देते हैं, तो यह शौचालय को पीटने की बात हो जाती है। और जब विश्व हिन्दू परिषद खुद ही अपने नरेन्द्र मोदी पर हल्ला बोल रही है, तभी कांग्रेस पार्टी मोदी पर हमला करके एक पुरानी नसीहत को लात मार रही है कि जब दुश्मन आपसी मार-कुटाई में लगे हों, तो समझदारों को दूर और चुप बैठना चाहिए। लेकिन मोदी के खिलाफ कुछ बोले बिना कांग्रेस के नेताओं का अपना वजन आज नहीं बन रहा है, इसलिए जयराम रमेश से लेकर दिग्विजय सिंह तक कई लोग अयोध्या के मंदिर का जिक्र ऐसे अंदाज में कर रहे हैं, मानो कांग्रेस कोई मंदिर-विरोधी पार्टी हो। 
राजनीति जब किसी देश की हवा में इस तरह हावी हो जाए कि सच और झूठ, सही और गलत, इन सबका अंदाजा इससे ही लगाया जाए कि उनको किसने कहा है, तो फिर मुद्दे वजन खो बैठते हैं, और लोगों के बीच लाठियां चलने लगती हैं। इनमें आखिर में जाकर पार्टी कोई भी जीते, नुकसान होता है उन पेड़ों का, जिनको काटकर उनकी लुग्दी से कागज बनाए जाते हैं, और फिर उन पर छपे अखबारों में इस ल_मारी का आंखों देखा हाल छपता है। नुकसान जनता का भी होता है जिसके काम के मुद्दे पीछे रह जाते हैं, और उनको उठाने वाले, या छोडऩे वाले लोग खबरों में अहमियत पा जाते हैं। और यह हाल सिर्फ कांग्रेस पार्टी का खड़ा किया हुआ नहीं है। दिल्ली में ऐसी कितनी ही बैठकें होती हैं, जिनसे भाजपा के मुख्यमंत्री अपने को बाहर रखते हैं। वे पार्टीबाजी के बोर्ड पर तो अपना स्कोर दिखाते हैं, लेकिन देश और अपने प्रदेश का नुकसान करते हैं। हम शुरू से संसद-विधानसभा से लेकर सभी तरह की संवैधानिक संस्थाओं में काम करने के हिमायती रहे हैं, और बहिष्कारों के खिलाफ रहे हैं। लोकतंत्र में आज संस्थाओं का कामकाज वैसे भी कमजोर हो गया है, और उन पर अधिक मेहनत की जरूरत है, ऐसे में उनके सीमित समय, और कई संस्थाओं की भूले-भटके होने वाली बैठकों को राजनीतिक विरोध के लिए छोड़ देना बहुत ही गैरजिम्मेदारी का काम है। यही वजह है कि संसद में जिन मुद्दों पर खुलकर लंबी चर्चा, बहस, और विचार-विमर्श होना चाहिए, वह चर्चा समाचार चैनलों के स्टूडियो में होती है, और संसद का बहिष्कार होता है। यही वजह है कि जनता को, और हमको भी, संसद का रियायती खाना खटकता है, और सांसदों को मिलने वाली सहूलियत खटकती है। संसद से परे भी अगर गंभीर मुद्दों पर किसी बातचीत की संभावना बनती है, तो कई पार्टियों के नेता गंभीरता की संभावना के चक्के में डंडा डालने में जुटे दिखते हैं। यह सिलसिला लोकतंत्र की परिपक्वता बनने के पहले ही उसके खत्म होने का सिलसिला है, और हिन्दुस्तान के लिए बहुत ही निराशा की बात है। 
आज देश की रेल पटरियों के किनारे, सड़कों के किनारे, और गांवों के बाहर जंगलों में जाकर पखाना करने को मजबूर महिलाओं को बलात्कार का खतरा झेलते हुए भी रोज जिंदगी इसी तरह जीनी पड़ती है। ऐसे में अगर राजधानियों में नेता शौचालयों को देवालयों से नीचे गिनना चाहते हैं, तो धर्मान्ध और कट्टर, आक्रमक और हिंसक धार्मिक नेताओं को तो यह सुहाता है, जो नेता विकास और जनकल्याण की बात करना चाहते हैं, वे किस मुंह से शौचालय की बहस को देवालय से कम महत्वपूर्ण साबित करने में जुट जाते हैं? चाहे कल तक मोदी की प्राथमिकता कुछ और रही हो, आज अगर वे मंदिर से पहले शौचालय की बात कर रहे हैं, तो यह बात ठीक है। वैसे भी अगर किसी भी धर्म को देखा जाए, तो देवालय जाने के पहले सारे श्रद्धालु शौचालय जाकर, नहा-धोकर ही उपासना के लिए पहुंचते हैं। कोई ऐसा भी देवालय किसी ने देखा है जहां शौचालय गए बिना, साफ-सुथरा हुए बिना कोई जाकर पूजा-उपासना कर सके? 

बात की बात

04 oct. 2013

हिन्दुस्तान का राष्ट्रीय चरित्र गंदगी भड़ास के साथ लिखी कुछ बातें...

संपादकीय
3 अक्टूबर 2013
पिछले कुछ दशकों में चीन जिस रफ्तार से दुनिया में एक बड़ी आर्थिक ताकत बनकर उभरा है, उसकी वजह से उस पर विकसित देशों की पैनी निगाहें भी टिकी हैं, और जो देश चीन से बाजार में मुकाबला नहीं कर पाते हैं, भारत जैसे ऐसे देश भी चीन को आलोचना की नजरों से देखते हैं। नतीजा यह होता है कि चीनियों के खानपान से लेकर उनकी बाकी आदतों तक के लतीफे बनाए जाते हैं, और चीनी सामानों के घटिया होने को सच्चे और झूठे सुबूतों के साथ फैलाया जाता है। लेकिन चीन दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से है, जो कि बाकी दुनिया में अपनी मौजूदगी, और अपनी संभावनाओं को लेकर खूब मेहनत कर रहा है, और अपनी आबादी को न सिर्फ वह अंग्रेजी जुबान में माहिर करते चल रहा है बल्कि चीन के लोगों को बाकी दुनिया में अपनी छवि सुधारने के लिए भी वह तौर-तरीके सिखाने में जुटा हुआ है। 
अभी वहां से आई खबरों में पता लगता है कि वहां की सरकार ने 64 पेज की एक ऐसी बुकलेट निकाली है जिसे वह तमीजदार सैलानियों के तौर-तरीके करार दे रही है। चीन की आर्थिक संपन्नता की वजह से वहां के लोग पूरी दुनिया में सैर-सपाटे को जा रहे हैं, लेकिन उनमें से बहुत से पहली बार विदेश पहुंचते हैं और दूसरे देशों के तौर-तरीके, वहां के रिवाज, उनको न मालूम होने की वजह से, उनकी वजह से चीन की तस्वीर बिगडऩे का खतरा चीनी सरकार को लगता है। ऐसे में वहां की सरकार अपने नागरिकों को अलग-अलग देशों के बारे में बहुत सी बातें सिखा रही है ताकि चीन की राष्ट्रीय छवि अच्छी बनी रहे। हर देश के बारे में अलग-अलग बहुत सी बातों को चीनी पर्यटकों को सिखाया जा रहा है, जिनमें नाक के बाल बढ़े हुए न रहें, लोगों की तरफ उंगलियां न दिखाएं, या किस देश में किस रंग के फूल तोहफे में न दें, या मुस्लिम देशों में सुअर के गोश्त की बात न करें, जैसी बहुत सी छोटी-छोटी चीजें हैं। 
इस खबर को पढऩे के बाद इस पर लिखने की जरूरत इसलिए हो रही है कि पूरा का पूरा हिन्दुस्तान यहां के लोगों को देश के भीतर भी तमीज सिखाने की एक धधकती हुई जरूरत से झुलस रहा है। आज हिन्दुस्तान में गंदगी का हाल यह है कि किसी सड़क या फुटपाथ पर पैदल चलते हुए जूठन, गंदगी, थूक, से बचकर चलना नामुमकिन रहता है। और ये बातें सरकारी सड़कों पर गड्ढों, कीचड़, जानवरों से परे की है, और इंसानों की फैलाई हुई है। हमारा अनुभव यह है कि दुनिया की किसी भी कंपनी को अगर सार्वजनिक शौचालयों के लिए, मूत्रालयों के लिए अगर सामान बनाकर उनकी क्षमता, टिकाऊपन परखना है, तो उनको भारत में सार्वजनिक जगहों पर लगाकर जांच करना चाहिए। भारत के लोगों में सार्वजनिक सुविधाओं को नाकामयाब साबित करने की ऐसी बेइंतहा ताकत है, कि दुनिया की बड़ी सी बड़ी टेक्नालॉजी उसका मुकाबला नहीं कर सकती।  सारी जनसुविधाओं को पूरी तरह खत्म करने के बाद हिन्दुस्तानी इस बात पर जुट जाते हैं कि जहां कोई भी कोना दिखे, वहां कैसे थूका जाए, और जहां कोई भी ओट दिखे, वहां कैसे मूता जाए। इस देश के पर्यटन केन्द्रों को अगर देखें, तो विदेशी सैलानियों की बर्दाश्त के बाहर तो उनको बनाया ही जाता है, हिन्दुस्तान के भी जो लोग मामूली साफ-सफाई पसंद करते हैं, वे भी इस देश के भीतर की गंदगी नहीं झेल पाते। 
आज ही एक अलग खबर है कि पंजाब में किसी ने एक रिपोर्ट दर्ज कराई है कि सिक्खों को लेकर जो लतीफे चलते हैं, वे उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करते हैं, और उस पर सजा दी जाए। पूरा हिन्दुस्तान जातियों के मजाक से भरा हुआ है, धर्म की नफरत से भरा हुआ है, सलीके वाले लोगों के लिए हिकारत से भरा हुआ है। इसके अलावा हिन्दुस्तान के भीतर कमजोर तबकों के लिए नफरत ही नफरत भरी हुई है और लोग दलित-आदिवासी, गरीब, विकलांग, महिला, बूढ़े, मेहनतकश, इन सबके बारे में नफरत की जुबान में बात करते हैं। 
जिंदगी की रोज की रहन-सहन से लेकर, अपनी सामाजिक सोच तक हिन्दुस्तानी लोगों का एक बहुत बड़ा हिस्सा तमीज-तहजीब, दूसरों की फिक्र, अपनी जिम्मेदारी, जैसी बातों से बिल्कुल ही आजाद है। लोगों को देखें-सुनें, तो यह तय करना खासा मुश्किल हो जाता है कि साफ-सुथरी सार्वजनिक जगह पर उनकी पीक अधिक गंदी है, या महिलाओं और बच्चों की मौजूदगी में भी उनकी फूहड़ गाली-गलौज की जुबान। हर किस्म की गंदगी फैलाते हुए हिन्दुस्तानी दुनिया के किसी भी हिस्से में जाकर हिन्दुस्तान का नाम डुबाने के लायक हैं, और यहां न तो चीनी सरकार की तरह सरकार को कोई फिक्र है, और न ही समाज के किसी तबके को अपने लोगों को सुधारने की परवाह है। 
गंदगी हिन्दुस्तान का राष्ट्रीय चरित्र है, और बाकी लोगों के हक के खिलाफ अपनी गंदी सोच, फैलाई जाती गंदगी, यहां के लोगों की राष्ट्रीय पहचान है। इस देश में जो इंसान सलीके से रहना चाहते हैं, जिम्मेदारी के साथ रहना चाहते हैं, उनके लिए भड़ास के साथ जीना ही अकेला तरीका है। जो लोग गंदी सोच और गंदी जुबान के साथ, गंदगी फैलाने में लगे रहते हैं, उन्हें कुछ भी गंदा नहीं लगता, और न ही उनके मन में कोई भड़ास रहती, न कुछ खटकता। हिन्दुस्तान की तस्वीर पूरी दुनिया में इस कदर गंदी है, कि शायद आधे सैलानी तो यहां पहुंचने के पहले ही यहां आने का इरादा छोड़ देते होंगे, और ऐसी बातों से इस देश की संभावनाएं कितनी घटती हैं, इसकी फिक्र भी न सरकार को दिखती, न समाज को। दिक्कत यह है कि पड़ोस के चीन में 64 पेज की एक बुकलेट सरकार ने चीनी सैलानियों को दी है, और देश के भीतर भी कैसे बर्ताव करना है इस पर मेहनत की है। हम चीन से सामान तो हर किस्म का आयात कर रहे हैं, वहां से सामाजिक जिम्मेदारी की ऐसी बुकलेट भी बुलाकर उसकी नकल कर ली जाए, क्योंकि यहां तो किसी को ऐसी फिक्र न है, न शायद होगी। 
आज इस पर लिखने की एक वजह और भी है कि देश के सबसे आक्रामक हिन्दुवादी नेता नरेन्द्र मोदी ने कल कहा है कि पहले शौचालय, फिर देवालय। 

आज गांधी से परे की कुछ बातों पर भी कुछ सोच लें?

संपादकीय
2 अक्टूबर 2013
मुंबई हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस को एक मामले में लताड़ लगाई है जिसमें एक आदमी को सड़क किनारे चाय ठेले पर संदिग्ध तरीके से चाय पीने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। आरोपी के खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई को निष्प्रभावी करार देते हुए हाई कोर्ट ने कहा, ''यह स्तब्ध करने वाला है। हमें यह जानकारी नहीं थी कि किसी को भी सुबह, दोपहर या रात में चाय पीने के लिए कानूनी तौर पर स्पष्टीकरण देने की जरूरत है।'' पुलिस के अनुसार, पाटिल ने इस बारे में संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया था कि वह स्टॉल पर संदिग्ध तरीके से 'चाय' क्यों पी रहा था। उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 151 के तहत संदिग्ध व्यवहार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और एक मजिस्ट्रेट ने उसे अच्छे व्यवहार का बॉण्ड भरने के लिए कहा। परेशान होकर आरोपी ने अदालत का रूख किया था।
कुछ दिन पहले के अदालत के इस आदेश पर आज गांधी जयंती के दिन हम इसलिए लिख रहे हैं कि आजादी के पैंसठ बरस बाद भी अगर सरकारी वर्दी पहनते ही लोग उसी तरह की गुंडागर्दी पर उतारू हो जाते हैं, जिस तरह की गुंडागर्दी करते हुए जिस तरह के गुंडे संसद और विधानसभाओं पर राज करते हैं, तो फिर इस देश में साधारण नागरिकों की जिंदगी अंगे्रज राज की तरह ही खतरे में है, और शायद अंगे्रजों के पहले के हिंदुस्तानी राजवंशों के राज जैसी नौबत आजाद आम हिंदुस्तानी की है जिसमें उसके चाय पीने के तरीके को भी संदिग्ध बताया जा सकता है। 
यह बात हम इसलिए भी लिख रहे हैं कि अभी-अभी केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे की एक चिट्ठी को लेकर मुस्लिम मुद्दे पर बहस छिड़ गई है। उन्होंने राज्य सरकारों को लिखा है कि चारों तरफ से ऐसी शिकायतें मिल रही हैं कि आतंक के मामलों में बेकसूर मुस्लिम नौजवानों को गिरफ्तार किया जा रहा है। उन्होंने लिखा है कि किसी बेकसूर को ऐसे गिरफ्तार न किया जाए, और अगर बेकसूर गिरफ्तार किए गए हैं तो उनकी रिहाई के साथ उनको मुआवजा दिया जाए। उनकी इस चिट्ठी को अल्पसंख्यक तुष्टिकरण कहते हुए कुछ पार्टियों ने उनकी आलोचना की है। लेकिन जब हमने बारीकी से इस चिट्ठी को पढ़ा, (और कल इसे पूरे का पूरा छापा), तो हमें लगा कि देश भर में जगह-जगह से सचमुच ही ऐसी शिकायतें आ रही हैं, और किसी भी जाति या धर्म को अपने पर अगर ऐसा खतरा दिख रहा है, या सचमुच ही उसके साथ भेदभाव हो रहा है, तो उस पर केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह राज्यों को सावधान करे, और इससे भी अधिक कार्रवाई करे।
दरअसल देश भर में पुलिस को सत्ता पर बैठी पार्टी अपनी पार्टी के सेवादल की तरह इस्तेमाल करती है। और पुलिस में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार की संभावनाएं इतनी अधिक हो गई हैं, कि भ्रष्टाचार में दिलचस्पी रखने वाले लोग कमाऊ कुर्सियों के फेर में सत्ता पर बैठे नेताओं, और अपने बड़े अफसरों के कहे हुए हजार किस्म के गैरकानूनी काम करने में लगे रहते हैं। हम अपने आसपास देखते हैं कि किस तरह पुलिस अफसर कानून को अपने हाथ में लेकर लाठी की तरह बेकसूरों की पीठ पर तोड़ते हैं, और चूंकि वे सत्ता पर बैठे लोगों की साजिशों में भागीदार रहते हैं, इसलिए उनकी गुंडागर्दी पर कोई रोक नहीं रहती। कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता जब देश के अलग-अलग किसी न किसी हिस्से से ऐसी खबर सामने न आए जिससे कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला की लिखी वह बात सही साबित न हो जिसमें उन्होंने पुलिस को वर्दीधारी गुंडों का गिरोह करार दिया था, और यहां तक कहा था कि पूरे देश में अपराधियों का कोई भी ऐसा गिरोह नहीं है जो कि भारतीय पुलिस जितना बड़ा संगठित अपराधी हो, और देश में कोई भी इज्जतदार इंसान पुलिस से शिकायतकर्ता, गवाह, या प्रतिवादी, किसी भी हैसियत से जुडऩा नहीं चाहेंगे।
जब गृह मंत्री शिंदे ने मुस्लिमों के बारे में यह बात लिखी तो बस्तर के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह सवाल उठाया कि वहां पर नक्सली होने के आरोप में   अनगिनत बेकसूर आदिवासियों को पुलिस ने बंद कर रखा है, उनको रिहा करने के बारे में गृह मंत्री राज्यों को क्यों नहीं लिखते? दूसरी तरफ आज ही यह खबर भी है कि बस्तर में नक्सलियों ने दो गांवों से दस परिवारों को निकाल दिया है क्योंकि वे नक्सलियों का साथ नहीं दे रहे थे, या उनके परिवार के लोग पुलिस में काम कर रहे थे। इस पूरी नौबत को अगर देखें तो लगता है कि नक्सलियों और पुलिस के काम करने में फर्क क्या सिर्फ इतना नहीं है कि पुलिस के खिलाफ शिकायत की जा सकती है, वे अदालत के लिए जवाबदेह हो सकते हैं, और दूसरी तरफ नक्सली किसी के लिए जवाबदेह नहीं हैं। कुल मिलाकर आदिवासी इस आजाद हिंदुस्तान में दोनों तरफ से पिस रहे हैं, और आज के दिन उनकी इस नौबत पर फिक्र करने के बजाय देश के जिम्मेदार लोग राजघाट पर फूल चढ़ाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ले रहे हैं। देश के बहुत से आदिवासी राज्यों में आदिवासियों की ऐसी नौबत चली आ रही है। देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों में अभी अधिक दिन नहीं हुए कि महिलाओं ने फिर से पूरे कपड़े उतारकर अद्र्धसैनिक बलों के मुख्यालय के सामने प्रदर्शन किया है कि बलात्कारी सैनिकों या सिपाहियों पर कार्रवाई की जाए, जो कि अब तक ऐसे राज्यों में उनको विशेष सुरक्षा देने वाले कानूनों की वजह से अब तक नहीं की गई है। 
गांधी जयंती के मौके पर खादी, और सादगी की तो बहुत सी बातें भाषणों में होंगी, लेकिन देश के सबसे कमजोर लोगों पर आज भी पुलिस की लाठी जितनी बेइंसाफी से चलती है, उसे बदले बिना सारी आजादी सिर्फ सत्ता पर बैठे लोगों की आजादी है। आज गांधी भी चर्चा में हैं, और राजनीतिक गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार, पुलिस की ज्यादती, भी चर्चा में हैं। ऐसे में इन दोनों-तीनों बातों को मिलाकर हम देख रहे हैं कि आजादी के पैंसठ बरस बाद भी अगर कोई सड़क किनारे सुड़ककर चाय पीने के जुर्म में बंद किया जा सकता है, तो राहुल गांधी इस आजादी को भी बकवास कहते हुए इसे फाड़कर कूड़ेदान में फेंक देना चाहिए। फिर गांधी को याद करते हुए हम बात को सिर्फ संवैधानिक आजादी तक सीमित रखना नहीं चाहते, क्योंकि गांधी किसी भी देश, किसी भी संविधान से ऊपर की बात करते थे। हमको लगता है कि चाहे राहुल गांधी हों, चाहे उनके कोई विरोधी, अगर बकवास बातों को फाड़कर फेंकने से ही लोगों का ध्यान उस तरफ जाता है तो इस देश की बहुत सी बातों को आज फाड़कर फेंकने की जरूरत है, और लोगों को याद होगा कि गांधी ने आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी के अपने बनाए नए संविधान के मसौदे के साथ ही यह कहा था कि कांग्रेस अपना उद्देश्य पूरा कर चुकी है...

एक अभियान छेडऩा चाहिए, कि दागी नहीं चाहिए, और कुनबा नहीं चाहिए


1 अक्टूबर 2013
संपादकीय

कांगे्रस के भागीदार लालू यादव जेल पहुंच चुके हैं, और कांगे्रस के गांधी टोपीधारी, खादीधारी बुजुर्ग नेता रशीद मसूद जेल के दरवाजे पर खड़े हैं। कांगे्रस का एक मंत्री राजस्थान में बलात्कार की रिपोर्ट की वजह से पुलिस के घेरे में है, और उसके कुछ दूसरे नेता दिल्ली के सिख विरोधी दंगों को लेकर तरह-तरह के कटघरों में हैं। और यह हाल अकेले कांगे्रस का नहीं है, मध्यप्रदेश में भाजपा के बुजुर्ग और वरिष्ठ वित्त मंत्री रहे हुए राघवजी अपने नौकर के देह शोषण को लेकर जेल में हैं और भाजपा के अमित शाह जैसे बड़े-बड़े दिग्गज नेता बड़े-बड़े अपराधों के आरोपों में जेल जाने के बाद अभी जमानत पर हैं। वामपंथियों को छोड़कर अधिकतर ऐसी पार्टियां हैं जो कि जांच, मुकदमे, और कैद के अलग-अलग ऊंचाईयों पर पहुंचे हुए अपने नेताओं को बचा रही हैं। 
आज देश में चाहे अन्ना हजारे के उठाए, या अरविंद केजरीवाल के उठाए, एक ऐसी बहस की जरूरत है जिसमें पार्टियों से यह सवाल पूछा जाए कि क्या उनके पास दागियों और मुजरिमों के अलावा ऐसे नेता नहीं हैं जिनसे वे पार्टी का काम चला सकें, जिनसे वे सरकार चला सकें? क्या शरीफों और ईमानदारों का टोटा इस कदर पड़ गया है कि पार्टियों घूम-घूमकर अपने ही मुजरिमों को देश की आखिरी अदालत तक बच जाने का मौका देते हुए उन्हीं को बाप बनाकर चलती हैं? और बाप कहने से याद आया कि राजनीतिक दलों में अब कुनबापरस्ती का हाल यह है कि लालू यादव के जेल जाने के बाद उनकी पत्नी राबड़ी देवी अब यह सार्वजनिक बयान देती हैं कि वे अपने बेटों के साथ मिलकर पार्टी को उसी तरह चलाएंगी जिस तरह सोनिया गांधी अपने बेटे के साथ मिलकर चला रही हैं। इस बात पर कांगे्रस कोई बुरा भी नहीं मान सकती, और न ही मुलायम सिंह बुरा मान सकते, न ही जयललिता, न ही करूणानिधि, न ही जगन मोहन रेड्डी, न ही कश्मीर के अब्दुल्ला, पंजाब के बादल, हरियाणा के चौटाला बुरा मान सकते हैं। 
आज जब भारत की राजनीतिक संस्कृति पर बात करने की जरूरत लग रही है, तो भ्रष्टाचार, जुर्म के साथ-साथ कुनबापरस्ती पर बात करने का दिल भी करता है। संसद और विधानसभाओं में जब एक-एक परिवार के एक से अधिक मुजरिम या अभियुक्त बैठते हैं, तो लोकतंत्र की भावना उनकी दानवी गाडिय़ों के टायरों तले दम तोड़ देती हैं। अंगे्रजों के वक्त भी कुनबापरस्ती की कोई गुंजाइश नहीं थी, और हिंदुस्तान ने मानो अंगे्रजों के पहले के राजपाट के दिनों को फिर अपने ऊपर लाद दिया है जिसमें राजाओं के सारे जुर्म माफ रहते थे, और राज परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी जुर्म और जुल्म करते हुए राज करते थे। इससे बेहतर अंगे्रजों का वक्त था जब कि सारे राजा अंगे्रजों के गुलाम हो गए थे, अपने जुर्मों के लिए कुछ हद तक जवाबदेह थे, और उनकी कुनबापरस्ती पर अंगे्रज सरकार के एजेंट की दखल भी रहती थी। 
आज हिंदुस्तान के आम लोगों के लिए ऐसी भयानक निराशा का दौर है कि जिसकी हद नहीं। सत्ता पर बैठा हर मुजरिम पहले तो कानून की आखिरी अदालत तक से हारने का वक्त खरीद लेता है, और फिर जनता की अदालत की बात करने लगता है। ठीक इसी तरह नेताओं से परे अफसरों की बात करें, तो हम अपने आसपास सैकड़ों ऐसे अफसर देख रहे हैं जो जाहिर तौर पर, घोषित रूप से भ्रष्ट और अपराधी साबित हो चुके हैं, लेकिन सरकार हांक रहे लोग ऐसे पसंदीदा भ्रष्ट अफसरों को कमाऊ कुर्सियों पर जारी रखकर देश-प्रदेश को और अधिक लुटने का इंतजाम करते हैं। 


कुल मिलाकर आज की हमारी फिक्र पूरी की पूरी सत्ता की फिक्र है, जो कि पूरी तरह से अलोकतांत्रिक, बेशर्म, भ्रष्ट, हिंसक, और संवेदनाशून्य हो चुकी है। लोकतंत्र में हर बात पर कानून असरदार नहीं हो पाता, सार्वजनिक जीवन में बहुत सी बातों को परंपराओं से भी कायम करना पड़ता है। हिंदुस्तान में आज सार्वजनिक जीवन के सारे लुटेरे और बलात्कारी कानून की आड़ लेकर पेशेवर मुजरिमों की तरह पूरी जिंदगी न सिर्फ सजा से बचते चले आ रहे हैं, बल्कि सजा मिलने पर उसे साजिश करार देने में भी उनको दो पल नहीं लगते। ऐसे माहौल में जनता की तरफ से एक बड़ा आंदोलन खड़ा होने की जरूरत है जो कि दागियों को खारिज करे, और कुनबापरस्ती को खारिज करे। हमारा मानना है कि एक ऐसी मतदाता-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए जो कि पार्टियों के निशानों से परे इन दो पैमानों पर जो आता हो, उसे खारिज करने की कसम खाए, कमर कसे, और इन दो नस्लों के लोगों को शिकस्त दे। देश के भीतर ईमानदार और जागरूक लोग, जो कि राजनीति में नहीं हैं, उनको इन दो नारों को लेकर एक अभियान छेडऩा चाहिए, कि दागी नहीं चाहिए, और कुनबा नहीं चाहिए।

Bat ke bat, बात की बात


1 October 2013