कल की खेतिहर मजदूर की हवाई फिजूलखर्चियां, किस्सा कमला बेनीवाल का

8 अगस्त 2014
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी से गुजरात में तिरछे-तिरछे चलने वाली राज्यपाल कमला बेनीवाल को बर्खास्त करने पर कांग्रेस कुछ हल्ला तो कर रही है, लेकिन वह प्रतीकात्मक अधिक है। यूपीए सरकार की मनोनीत राज्यपाल रहते हुए कमला बेनीवाल ने गुजरात में लगातार मोदी से टकराव रखा था, और उस टकराव के सही या गलत होने के बारे में हम अभी कुछ नहीं कह रहे हैं। लेकिन राज्यपाल रहते हुए जिस तरह उन्होंने अपने घर जाने के लिए तिरपन बार सरकारी विमान का इस्तेमाल किया, और उस पर आठ करोड़ से अधिक खर्च हुआ, वह बात तो उसी समय रूक जानी चाहिए थी। पता नहीं राज्य सरकार ने एक बागी राज्यपाल पर इतनी दरियादिली क्यों दिखाई थी, लेकिन ऑडिट की आपत्ति से यह सिलसिला तभी थम जाना था जब जनता के पैसों की इतनी बरबादी नहीं हुई थी। लेकिन कमला बेनीवाल को हटाने के पीछे यह वजह नहीं है, और शायद उनके खिलाफ राजस्थान में मंत्री और उपमुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जो काम किया था, उसकी जांच-रिपोर्ट आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के काम आई, और उस जांच रिपोर्ट के तथ्यों को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी अनदेेखा नहीं कर सके। 
खबरों में जो जानकारियां आई हैं, उनके मुताबिक कमला बेनीवाल ने राजस्थान में मंत्री और उपमुख्यमंत्री रहते हुए, खेतों में रोज 16-16 घंटे काम करने का हलफनामा देकर गरीब किसानों के लिए सस्ती जमीन के प्रावधान का इस्तेमाल किया था, और जमीन हासिल की थी। इसकी पूरी जानकारी आज के ही अखबार में जा रही है, इसलिए उसे यहां अधिक खुलासे से लिखने की जरूरत नहीं है। लेकिन इस बेशर्मी पर हमको हैरानी होती है कि सत्ता का उपभोग करते हुए जो महिला कांग्रेस नेता अपने को गरीब खेतिहर मजदूर बताकर रियायती जमीन पाती है, वही महिला नेता राज्यपाल बनने के बाद पड़ोस के प्रदेश में अपने घर आने-जाने के लिए सरकारी विमान पर आठ करोड़ से अधिक का खर्च करवाती है। आज लिखने का हमारा मकसद कमला बेनीवाल बिल्कुल नहीं है, लेकिन ऐसा करने वाले वे हजारों हिन्दुस्तानी नेता हैं, जो कि इस गरीब देश के कुपोषण के शिकार और भूखे लोगों के हक के पैसों से अपने लिए इस तरह के आलीशान फिजूलखर्च इंतजाम करते हैं कि जिनको देखकर सैकड़ों बरस पहले के राजा-महाराजा भी शरमा जाएं। इस देश में ऑडिट का इंतजाम है, सीएजी की रिपोर्ट सार्वजनिक होती है, लेकिन उसके बाद भी इस तरह के ऐशो आराम पर कोई रोक नहीं लगती है, यह बहुत हैरानी की बात है। ऐसी बहुत सी जानकारी इन दिनों सूचना के अधिकार के तहत निकल रही है, और जनहित याचिकाओं के रास्ते अदालत तक भी पहुंच रही हैं। भारतीय लोकतंत्र में जनता के पैसों की बर्बादी को रोकने के लिए लगातार इन दोनों लोकतांत्रिक औजारों का इस्तेमाल होना चाहिए, और उसके बाद भी अगर लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाली पार्टियां और उनके नेता अगर अपने तौर-तरीके नहीं सुधारते हैं, तो देश में एक चौथाई हिस्से में तो नक्सली छा ही चुके हैं। जहां-जहां जनता को ऐसे आरामतलब और फिजूलखर्च नेताओं से नफरत होगी, वहां-वहां उनके मन की यह बेबसी होगी कि वे हिंसक नक्सलियों के लिए हमदर्दी रखें। हिन्दुस्तान से नक्सल हिंसा को सिर्फ बंदूकों से खत्म नहीं किया जा सकेगा, सत्ता की लोकतांत्रिक सादगी की मिसाल के बिना पुलिस इस मोर्चे पर कुछ अधिक नहीं कर पाएगी। और पुलिस के अधिक इस्तेमाल का खर्च भी आखिर जनता के ही पैसों से होता है। 

कुछ मामलों में आज 16 बरस की उम्र भी बालिग सरीखी...

7 अगस्त 2014
संपादकीय
पिछले एक बरस से भारत में यह बहस चल रही है कि सेक्स-अपराधों या हिंसक-अपराधों के लिए नाबालिग होने की उम्र सीमा को घटाकर कम किया जाए या नहीं। दिल्ली में देश के सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार कांड में सबसे खूंखार अपराधी नाबालिग था, और उसी वक्त से यह बहस चल रही थी, और आज कानून में फेरबदल करके ऐसे मामलों में नाबालिग की उम्र सीमा 18 बरस से घटाकर 16 बरस करने की चर्चा है। हमने इस पूरे एक बरस में इस बारे में अपनी राय नहीं लिखी थी, क्योंकि हम सबकी बातों को सुनना चाहते थे, और फिर अपनी सोच बनाना चाहते थे। तमाम तर्कों को सुनने के बाद, और कल दिल्ली में नाबालिग लड़कों द्वारा दिनदहाड़े खुली सड़क पर की गई एक हत्या को देखते हुए अब यह लगता है कि गिरोहबंदी करके अगर नाबालिग लोग ऐसे गंभीर जुर्म करते हैं, तो उम्र सीमा को घटाकर 16 बरस करना ठीक होगा। कोई एक अकेला लड़का या लड़की विचलित होकर किसी अस्थिर दिमागी हालत में कोई अपराध अचानक कर बैठे, तो वह एक अलग बात हो सकती है। लेकिन जब गिरोहबंदी करके लोग ऐसा करें, तो उन्हें नाबालिग होने की रियायत कुछ मामलों में तो नहीं मिलनी चाहिए। खासकर इसलिए भी नहीं मिलनी चाहिए कि ऐसे कुछ लोगों को सजा मिलने के बाद उनकी उम्र और पीढ़ी के बाकी लोगों के सामने सजा की एक मिसाल रहेगी। आज रियायत की एक मिसाल लोगों को सजा की गंभीरता का अहसास नहीं करने दे रही। यह जरूर हो सकता है कि 16 और 18 बरस के बीच के मुजरिमों के लिए रहने का एक इंतजाम ऐसा किया जाए कि वे न तो 16 से कम उम्र के लोगों के साथ सुधारगृह में रखे जाएं, और न ही 18 से अधिक उम्र के वयस्क मुजरिमों के साथ। 
आज देश में निजी अपराधों की हालत बहुत ही भयानक है। बलात्कार मानो इस देश की संस्कृति बन गया है, लोग बात-बात पर कत्ल करने लगे हैं, और इन दोनों से नीचे के दर्जे के जुर्म गिनती में बहुत अधिक हैं, लेकिन गंभीरता में कम होने की वजह से वे खबरों में कम आते हैं। नतीजा यह होता है कि कम उम्र के लड़के-लड़कियों को जुर्म करने की मिसालें तो मिलती रहती हैं, लेकिन जुर्म के बाद की सजा का अहसास उनको ठीक से नहीं हो पाता। और यह बात सिर्फ नाबालिग मुजरिमों के साथ नहीं है, जो बालिग मुजरिम हैं, वे भी जुर्म के बाद की सजा के बारे में गंभीरता से नहीं सोचते हैं कि उनके बाद उनके परिवार का क्या हाल होगा। इसलिए सभी लोगों की जुर्म और सजा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि मुजरिमों की उम्र के मुताबिक मिसालें सामने रहें, और उन्हें सावधान करने के काम आएं। 
हमारी यह बात मानवाधिकारवादियों को कुछ खटक सकती है, क्योंकि वे इस उम्र सीमा को घटाने के खिलाफ हैं, लेकिन आज की पीढ़ी को कम उम्र से ही फिल्मों और टेलीविजन की वजह से, मीडिया और सामाजिक माहौल की वजह से जुर्म की अधिक जानकारी मिलती रहती है, और सेक्स या हिंसा के मामले कम उम्र में ही सामने आने लगे हैं। आज न सिर्फ जुर्म के मामले में, बल्कि दोपहिया गाडिय़ों को चलाने के मामले में भी 16 बरस की उम्र से इजाजत देने की जरूरत है। आज यह पीढ़ी समय से पहले शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व होती जा रही है, और 16 से 18 बरस के बीच के दो बरसों को कई मामलों में नाबालिग मानना अब ठीक नहीं है। 

इंटरनेट पर सरकार को चौकस और लोगों को चाल-चलन ठीक रखने की जरूरत

संपादकीय
6 अगस्त 2014
लंबे समय तक भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे गोविंदाचार्य ने मोदी सरकार की सोशल मीडिया पर मौजूदगी और उसके इस्तेमाल के खिलाफ अदालत में एक जनहित याचिका दायर की है और इसे भारतीय कानूनों के खिलाफ बताया है। उनका तर्क यह है कि सोशल मीडिया और ईमेल के सर्वर भारत के बाहर हैं और उनके इस्तेमाल से भारत सरकार की जानकारी देश के बाहर चली जाती है जो कि खुद सरकार के इस नियम के खिलाफ है कि कोई भी सरकारी जानकारी खास इजाजत के बिना देश के बाहर नहीं जानी चाहिए। गोविंदाचार्य आज भी हिंदूवादी विचारधारा के स्वदेशी आंदोलन वाले हैं, और वे लगातार सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात रखते हैं।
हम इंटरनेट के दो तरह के इस्तेमाल अलग-अलग मानते हैं, जिनमें से एक सार्वजनिक सोशल मीडिया है, जिसे सरकार अपनी बात रखने, लोगों की बात सुनने, और लोगों से बातचीत करने के लिए इस्तेमाल करती है। यह पूरा मामला खुला हुआ रहता है, और इसमें बिना किसी गोपनीयता के विचारों और सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। दूसरा मामला ईमेल जैसी इंटरनेट सुविधाओं का है, और यहां पर एक खतरा सामने आता है। भारत सरकार ने एनआईसी नाम की अपनी कम्प्यूटर एजेंसी के मार्फत केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम लोगों के लिए ईमेल की सुविधा उपलब्ध कराई है। और यह सुविधा सारे सांसदों तक है, और शायद दूसरी संवैधानिक संस्थाओं को भी यह उपलब्ध है। इसके बाद भी यह देखने में आता है कि मंत्रियों से लेकर सांसदों तक और बड़े-बड़े अफसरों तक के विदेशी सर्वरों वाले निजी ईमेल अकाउंट रहते हैं और सरकारी या गोपनीय जानकारी उसके मार्फत आती-जाती रहती हैं, और उन विदेशी सर्वरों में वह हमेशा ही खतरे में रहती है।
पिछले बरसों में लगातार इस बात के सुबूत आए हैं कि अमरीकी खुफिया एजेंसियां भारत सहित दुनिया के तकरीबन हर देश में संगठनों और लोगों की खुफिया निगरानी करती हैं। इनमें पूरी दुनिया के टेलीफोन कॉल, संदेश, और ईमेल के अलावा इंटरनेट पर आने-जाने वाली तमाम बातों की निगरानी शामिल है। ऐसे में कोई बेवकूफ ही यह मानकर चल सकता है कि अमरीकी सर्वरों में जमा भारतीय जानकारी को अमरीकी खुफिया एजेंसियां नहीं देखती होंगी। ऐसे में जब दुनिया के कारोबारी हित देशों की सुरक्षा से भी कई बार एक महत्वपूर्ण हो जाते हैं, तब सरकारों से परे कारोबार के मामले भी विदेशी सर्वरों में रहना खतरनाक होता है। 
लेकिन अपनी ही इस बात के खिलाफ हमारे सामने एक बड़ा मामला आज यह आया है कि रूस के कुछ हैकरों ने एक अरब से अधिक पासवर्ड चोरी कर लिए, और ऐसा करते हुए उन्होंने दसियों हजार वेबसाईटों से यह चोरी की। अब सवाल यह उठता है कि जो काम रूसी हैकर कर सकते हैं, वह काम चीनी और इजराइली हैकर भी कर सकते हैं, और अमरीका सहित तमाम ताकतवर सरकारों के सरकारी हैकर भी यह काम रात-दिन करते ही रहते हैं। ऐसे में भारत के मामले अमरीकी सर्वरों पर रहें, या कि भारतीय सर्वरों पर, क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है? दूसरी बात यह कि अगर भारतीय सर्वरों पर भी सरकारी या गोपनीय जानकारी वाली फाईलें रहती हैं, तो क्या वे हैकरों से सुरक्षित रहेंगी? 
आज जानकारों का यह मानना है कि भारत इंटरनेट पर अपनी असीमित जानकारी रहने के बावजूद साइबर सुरक्षा के मामले में बच्चा है। उसे अपनी गोपनीय बातों की हिफाजत की समझ भी नहीं है। ऐसे में भारत ने अपने-आपको बहुत नाजुक और खतरे के लिए खुला रखा हुआ है। और अब आखिर में इस बात का जिक्र जरूरी है कि सरकार की सोशल मीडिया पर मौजूदगी के अलावा नेताओं और अफसरों की जो निजी बातें सोशल मीडिया के निजी हिस्से में होती हैं, वे भी हैकरों से या अमरीकी जैसी खुफिया एजेंसियों से परे नहीं रहतीं। ऐसे में भारत के ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोग कई किस्म की ब्लैकमेलिंग के लायक रहते हैं, और अमरीका जैसी बदनाम खुफिया एजेंसियों के लोग अपने ही राष्ट्रपति को भी ब्लैकमेल करने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में भारत की सरकार को साइबर सुरक्षा के बारे में सोचना चाहिए, और लोगों को भी इंटरनेट पर, सोशल मीडिया और ईमेल पर अपने चाल-चलन को ठीक रखना चाहिए, क्योंकि इंटरनेट पर जाने के बाद लोग किसी गोपनीयता और निजता का दावा नहीं कर सकते। 

बलात्कार की झूठी शिकायत पर बहुत कड़ी सजा होनी चाहिए

5 अगस्त 2014
संपादकीय
भारतीय टीवी चैनलों पर मनोरंजन के लिए रियलिटी शो के नाम पर जिस तरह के गढ़े कार्यक्रम बन रहे हैं और दिखाए जा रहे हैं, वे फिक्र की बात हैं। उनमें एक से अधिक पीढिय़ों को ये कार्यक्रम प्रभावित कर रहे हैं, और बहुत से कार्यक्रमों के बारे में लगातार ये शिकायतें आती हैं कि उनमें अश्लील बातों को, हिंसक बातों को, या फूहड़ता को बढ़ावा दिया जाता है, लेकिन उन पर रोक का कोई असरदार तरीका अब तक नहीं है। भारत में मीडिया की गलतियों और उसके गलत कामों पर सोचने-विचारने के लिए प्रेस कौंसिल है, फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड है जिससे गुजरते हुए ही फिल्में पर्दे पर पहुंचती हैं। लेकिन टीवी के कार्यक्रमों के लिए उनके प्रसारण के बाद भी शिकायत के लिए कोई असरदार फोरम सरकार ने नहीं बनाया है। और एक बड़ी दिक्कत यह है कि टेलीविजन पर प्रसारण की सामग्री को सामग्री मानने के बजाय प्रसारण की तकनीक मानकर उसे टेलीकॉम नियामक आयोग के तहत रखा गया है। 
लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने की वजह कुछ और है। मुंबई में एक आईपीएस अफसर से दोस्ती के बाद वहां की एक मॉडल ने उसके खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई, और अब उस मॉडल के वकील ने ही पुलिस को सुबूत दिए हैं कि वह मॉडल खबरों में आकर एक चर्चित और विवादास्पद कार्यक्रम बिग बॉस तक पहुंचना चाहती थी, और इसलिए उसने यह झूठी रिपोर्ट लिखाई। हम अभी इस महिला की शिकायत पर नहीं जा रहे कि उसमें सच्चाई है या नहीं, वह हमारा काम नहीं है, लेकिन अगर उस मॉडल के वकील का पुलिस को दिया गया बयान, और मॉडल की कथित साजिश की वीडियो रिकॉर्डिंग अगर सही है, तो इससे यह पता लगता है कि भारत में खबरों में आने के लिए, चर्चा में बने रहने के लिए, किसी बड़े कार्यक्रम में हिस्सा पाने के लिए लोग इस हद तक जा सकते हैं। हम इस शिकायत की सच्चाई पर कुछ कहे बिना यह कहना चाहते हैं कि टीवी के कुछ कार्यक्रम लोगों को इस हद तक उकसा रहे हैं, कि उसकी चकाचौंध का हिस्सा बनने के लिए ऐसा लग रहा है कि एक मॉडल युवती ने इस तरह की साजिश रची। 
ऐसी बातें भारत के मनोरंजन उद्योग में दोनों तरफ से होती हैं। एक तरफ तो काम देने के लिए फिल्म और टीवी उद्योग के जमे हुए दिग्गज नए कलाकारों का शोषण करने के लिए लंबे समय से बदनाम हैं, और दूसरी तरफ काम पाने के लिए नए लोगों में से ही कुछ लोग इस तरह की साजिश शायद कर रहे हैं। आज ही एक खबर छत्तीसगढ़ की है जिसमें एक महिला ने अपने बेटों के किसी से झगड़े का हिसाब चुकता करने के लिए बेकसूरों के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखा दी थी, और रिपोर्ट झूठी निकलने पर उस महिला को ही दो बरस की कैद सुनाई गई है। 
यह हालत भयानक इसलिए है कि हर दिन इस देश में दसियों हजार महिलाओं को, लड़कियों और बच्चों को, सेक्स-अपराध का शिकार होना पड़ रहा है। दूसरी तरफ ऐसे इक्का-दुक्का झूठे मामले बाकी तमाम सच्ची शिकायतों की विश्वसनीयता को तबाह करते हैं। बलात्कार की एक झूठी शिकायत की वजह से किसी व्यक्ति की जिंदगी जिस हद तक और जिस कदर तबाह होती है, उसका परिवार जितना तबाह होता है, उसे देखते हुए झूठी शिकायत पर भी बलात्कार पर सजा जैसी ही कड़ी सजा का इंतजाम कानून में करना चाहिए क्योंकि वह एक बेकसूर की साख, और उसके पूरे परिवार के वर्तमान और भविष्य के साथ बलात्कार से कम कुछ नहीं होता है। 
हमने बात की शुरुआत तो टीवी की दुनिया से की है, लेकिन ऐसी झूठी शिकायतें चाहे कितनी ही कम हों, वे एक बहुत ही परले दर्जे की घटिया सोच और साजिश का सुबूत हैं, और ऐसी एक खबर भी देश की बाकी लड़कियों और महिलाओं के लिए सामाजिक दिक्कत खड़ी करने वाली साबित होती है। बेटे से मारपीट का बदला लेने के लिए अगर कोई महिला सामूहिक बलात्कार की रिपोर्ट लिखाती है, तो यह भारी शर्मनाक घटना है। और छत्तीसगढ़ की अदालत ने एक महीने के भीतर ही इस पर फैसला दिया, क्योंकि महिला के बयान से ही पता लगा कि उसने गुस्से में झूठी रिपोर्ट लिखा दी थी। ऐसे एक मामले से भी भारतीय समाज में महिला विरोधी सोच रखने वाले लोगों को यह कहने का मौका मिलता है कि महिला बलात्कार की शिकायत में हर बार सच ही बोलती हो, यह जरूरी नहीं है। यह नौबत फिक्र की बात है, और ऐसे मामलों में झूठी शिकायत पर हम अधिक कड़ी सजा की सिफारिश करते हैं। 

वादाखिलाफी को बलात्कार मानना गड़बड़ लगता है...

4 अगस्त 2014
शिवसेना ने अपने एक ताजा बयान से लोगों में नाराजगी पैदा की है क्योंकि उसका कहना है- ''छेडख़ानी और रेप का आरोप लगाकर सनसनी फैलाना अब फैशन हो गया है। एक मॉडल पुलिस में उत्तम सेवा देने वाले एक आईपीएस अफसर पर सीधे रेप का आरोप लगाती है, और वो पुलिस अधिकारी खलनायक ठहराया जाता है। महिलाएं छेडख़ानी जैसे मामलों को खतरनाक हथियार समझती हैं। इस मामले में पीडि़ता को 6 महीने बाद याद आया कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। आखिरकार 6 महीने बाद कैसे किसी लड़की को याद आ सकता है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। चरित्र का हनन, बदनामी राजनीति और सरकार में बड़ा हथियार बन गए हैं। एक-दूसरे को रास्ते से हटाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। कानून महिलाओं के साथ है लेकिन इसका ये मतलब नहीं है इसका गलत इस्तेमाल किया जाए।ÓÓ
शिवसेना के इस बयान से परे भी यह बात बहुत से लोगों के मन में आती है कि महिलाओं की खास हिफाजत के लिए भारतीय हालात में उनको जो खास कानूनी हक दिए गए हैं, उनका बेजा इस्तेमाल होता है। इनमें दहेज प्रताडऩा, कामकाज की जगह पर यौन प्रताडऩा, और सेक्स-अपराध जैसे कुछ जुर्म हैं, जिनसे महिलाओं को बचाने के लिए भारतीय कानून में उनको आदमियों के मुकाबले कुछ अधिक हक दिए गए हैं। समय-समय पर ऐसे बयानों के खिलाफ हम लिखते भी रहे हैं, जिनमें कि नेता और अफसर किसी महिला द्वारा दर्ज की गई शिकायत की जांच के पहले ही उसकी नीयत पर शक खड़ा करना शुरू कर देते हैं। मुंबई का यह मामला वैसा ही है जिसमें एक मॉडल ने एक आईपीएस अफसर के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई है।
इस मामले की जांच अभी शुरू हुई ही है, और इस पर कुछ भी कहना जायज नहीं है, लेकिन हम ऐसे तर्कों के बारे में बात कर रहे हैं जो कि बलात्कार की कुछ शिकायतों के साथ पुलिस में दर्ज किए जाते हैं। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें महिलाएं कई बरस से उनके साथ किए जा रहे बलात्कार का आरोप लगाते हुए पुलिस रिपोर्ट में यह लिखाती हैं कि शादी का झांसा देकर, शादी का वायदा करके, उससे देहसंबंध बनाए गए, और फिर बाद में उसे पता लगा कि आदमी या तो शादीशुदा था, या बाद में उसकी कहीं और शादी हो रही है, या उसकी शादी की नीयत ही नहीं है।
अब हम एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें जिसमें कि एक लड़के और एक लड़की के बीच, या एक आदमी और एक औरत के बीच दोस्ती होती है, पे्रम होता है, या बिना प्रेम के भी देहसंबंध बनते हैं, जारी रहते हैं, और फिर बाद में किसी वजह से शादी नहीं हो पाती, या दोनों में से कोई भी एक पक्ष शादी के अपने वायदे को पूरा करना मुमकिन या ठीक नहीं पाता। ऐसा कई वजहों से हो सकता है, लोगों की दोस्ती, लोगों के पे्रम, या इससे भी आगे बढ़कर लोगों के देहसंबंध बनते हैं, और टूटते हैं। किसी झांसे या धोखे की नीयत के बिना भी संबंध आते-जाते रहते हैं। दो वयस्क लोगों के बीच इनमें से किसी भी किस्म के संबंध बनना और टूटना तब तक जुर्म नहीं है, जब तक कि वह मर्जी के खिलाफ न हो। 
अब यह समझना कुछ मुश्किल पड़ता है कि किस तरह मर्जी के खिलाफ बरसों तक किसी के देहसंबंध बने रह सकते हैं। ऐसा किसी धमकी के तहत, किसी ब्लैकमेलिंग के तहत तो हो सकता है, लेकिन उसके बिना बिना विरोध, मौन सहमति से अगर यह सिलसिला जारी रहता है, तो आगे जाकर उसको जुर्म करार देना पहली नजर में सही नहीं लगता है। और दोस्ती के बाद पे्रम या बिना पे्रम, शादी का वायदा करना, देहसंबंध बनने के बिना, या बनने के बाद, उसे पूरा न करना भी किसी तरह से जुर्म नहीं लगता है। क्योंकि बिना देहसंबंध भी वायदे बनते और टूटते रहते हैं, और उनकी मजबूती की गारंटी के लिए किसी फेविकोल के मजबूत जोड़ की गुंजाइश नहीं रहती। 
अब आज इस पर लिखने का दिल इसलिए कर रहा था कि आज जिस तरह बहुत से मामलों में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज हो रही है, लोगों को महीनों तक जमानत नहीं मिल रही है, बरसों तक फैसले नहीं हो रहे हैं, और उसके बाद या तो सजा हो रही है, या फिर बिना सजा रिहाई हो रही है, उसे देखते हुए लगता है कि क्या ऐसे कानूनी माहौल के चलते हुए लोगों के आपसी संबंधों की संभावनाओं पर एक मानसिक दबाव ऐसा पड़ेगा कि संबंध ही स्वाभाविक न रह पाएं।
यह लिखने का यह मकसद नहीं है कि बलात्कार की शिकायतों में से बहुत सी झूठी रहती हैं। हमारा तो मानना इससे उल्टा यह है कि बलात्कार की सही शिकायतों में से बहुत ही कम दर्ज हो पाती हैं, और बाकी शिकायतों का दम घुट जाता है। सामाजिक अपमान, पारिवारिक दबाव, और अदालतों का डरावना माहौल मिलाकर लोगों को बलात्कार को सबक के साथ बर्दाश्त कर लेने पर ही अधिक मजबूर करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ जितने भी मामलों में शादी के वायदे के बाद बने देहसंबंधों के बाद शादी न होने की स्थिति में दर्ज कराई गई रिपोर्ट को बलात्कार मानना थोड़ा अटपटा लगता है, और उसके लिए कानून में एक बारीक फर्क करने की जरूरत है। 
किसी भी वयस्क लड़की या महिला को किसी वयस्क लड़के या आदमी के किए हुए वायदे पर भरोसा करके उसे अपनी देह दे देने की कोई मजबूरी नहीं रहती। ऐसा करते हुए उसकी एक सहमति रहती है, जो बाद के हालात बदलने पर भुला दी जाती है। ऐसे मामलों की खबरों को देख-सुनकर ऐसा लगता है कि आज लोगों के मन में संबंधों को लेकर एक दहशत खड़ी हुई होगी कि आज की सहमति कल कब, किस वजह से, पुलिस रिपोर्ट में बदल जाए? आज का हमारा पूरा लिखना सिर्फ ऐसे ही मामलों को लेकर है जिनमें पहले की सहमति बरसों बाद जाकर शिकायत बन जाती है। ऐसे मामले लोगों के मन में सच्चा पे्रम भी कुचलने के लिए काफी रहते होंगे, क्योंकि आज के पे्रम के तहत की गई बातें कल जाकर किस तरह कटघरे में खड़ी कर देंगी, जिसका अंदाज आज कोई नहीं लगा सकते। 
ऐसे कानून में बदलाव की जरूरत है जो कि शादी के वायदे के साथ बने देहसंबंधों को आगे शिकायत होने पर बलात्कार मानता हो। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें देहसंबंधों के बिना भी शादी के वायदे बनते और टूटते रहते हैं, इसी तरह इन वायदों के साथ-साथ, उनके बाद भी ऐसे संबंध बन सकते हैं, और बाद में देह से परे के कई किस्म के मुद्दों को लेकर वायदा पूरा करना पाना नामुमकिन हो सकता है, या लोगों को लग सकता है कि यह रिश्ता ठीक नहीं चलेगा। ऐसी कई नौबतों में लोग अपने वायदे से मुकरने का पूरा हक रखते हैं। एक वादाखिलाफी को बलात्कार मान लेना गड़बड़ लगता है, और इस कानून में बदलाव होना चाहिए।

एक राज्य से आए मोदी की अंतरराष्ट्रीय पहल की चर्चा

4 अगस्त 14
संपादकीय
इस वक्त भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पड़ोसी देश नेपाल के विख्यात पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा कर रहे हैं। कल उन्होंने नेपाल में एक अभूतपूर्व स्वागत पाया, और भारत में भी नेपाल के साथ इस गर्मजोशी को उत्साह से देखा जा रहा है। इसके पहले मोदी अपने शपथ ग्रहण के दिन ही सभी सार्क देशों के प्रमुखों से बात कर चुके थे जिनको उन्होंने एक नई परंपरा शुरू करके अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था। इसके बाद वे ब्राजील में ब्रिक्स देशों के प्रमुखों के साथ लंबी मुलाकातें करके लौटे, और उनके भारत आने के कुछ दिनों के भीतर ही अमरीका के विदेश मंत्री ने बड़ी गर्मजोशी के साथ भारत आकर दोनों देशों के संबंध बेहतर और मजबूत बनाने की बातें कीं। 
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते समय पूरी दुनिया के मन में यह बात थी कि उनके पास न तो देश की राजधानी में काम करने का कोई अनुभव था, न ही केन्द्र सरकार में उन्होंने एक दिन भी काम किया था। विदेशों के साथ संबंधों का उनका अनुभव एक गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कारोबार तक सीमित था, और आर्थिक मोर्चे पर उस राज्य की साख बहुराष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के बीच अच्छी थी। उससे ज्यादा विदेशी संबंधों का अनुभव उनका नहीं था। दूसरी बात यह कि गुजरात दंगों के जिन दिनों से उबरकर उन्होंने दो बार गुजरात राज्य के चुनाव जीते, उसके बाद अपनी पार्टी भाजपा को जीता, और फिर देश के आमचुनाव अपने बलबूते पर जीते, उन सबको देखते हुए लोगों के मन में मोदी की अंतरराष्ट्रीय संभावनाओं को लेकर उम्मीदों से अधिक आशंकाएं थीं, लेकिन पहले कुछ महीनों में ही मोदी ने उन आशंकाओं को तोड़ दिया है, हालांकि अभी उनके कार्यकाल का लगभग पूरा हिस्सा बाकी है, और आने वाले कई बरस उनके अंतरराष्ट्रीय फैसलों को सही या गलत साबित करेंगे। 
पिछले दो-ढाई महीनों में मोदी ने जो अंतरराष्ट्रीय नीति, और भारतीय विदेश नीति बताई है, वह तारीफ की हकदार है। पड़ोस के सारे सार्क देशों को न्यौता देना, प्रधानमंत्री बनने के पहले ही उनका एक मास्टरस्ट्रोक था, और सच तो यह है कि किसी को भी उनसे वह उम्मीद नहीं थी। दूसरी बात यह कि हर किसी को यह अच्छी तरह मालूम है कि अब तक उनके अंतरराष्ट्रीय फैसले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के किसी सक्रिय योगदान के बिना, अकेले प्रधानमंत्री के स्तर पर, उनके निजी विचार-विमर्श पर आधारित हैं। जहां तक विदेश मंत्री की बात है, तो उन्होंने इजराईल-फिलीस्तीन मुद्दे पर संसद में बहस तक नहीं होने दी, लेकिन जब एक देश के रूप में भारत को अपना रूख दिखाना था, तो कुछ दिनों के भीतर ही प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में फिलीस्तीन के पक्ष में वोट दिया, जबकि अमरीका हमेशा की तरह इजराईल के साथ रहा। मतलब यह कि अमरीकी रूख के खिलाफ भी, भारतीय विदेश मंत्री के संसदीय रूख के खिलाफ भी, भारत ने एक देश के रूप में, और मोदी ने एक प्रधानमंत्री के रूप में अंतरराष्ट्रीय मतदान में इजराईल का विरोध किया। यहां यह जिक्र करना जरूरी है कि पिछले बरसों में सुषमा स्वराज भारत-इजराईल मैत्री संघ की भारतीय मुखिया रही हैं, और इजराईल के लिए उनका लगाव जगजाहिर है। इस पूरे सिलसिले का जिक्र इसलिए जरूरी है कि मोदी की विदेश नीति सुषमा से प्रभावित नहीं है, वह एक देश की विदेश नीति के रूप में विदेश मंत्री से ऊपर तय की जा रही है। यही वजह है कि पिछले दो-ढाई महीनों में किसी भी अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भारत की विदेश मंत्री को कोई अहमियत नहीं मिली है। 
मोदी ने काम सम्हालते ही सबसे पहले भूटान जाकर अपने और चीन के बीच बसे हुए फौजी अहमियत वाली जमीन पर बसे एक पड़ोसी देश के साथ रिश्ते मजबूत किए। अब वे नेपाल पहुंचे हैं, और भारत-चीन के बीच यह दूसरा देश है। पाकिस्तान के साथ उन्होंने खासी लंबी बातचीत की है, और श्रीलंका के मोर्चे पर तनाव घटाने का काम भी किया है। एक तरफ अमरीका के साथ, दूसरी तरफ चीन के साथ, और तीसरी तरफ रूस के साथ उन्होंने बातचीत तेजी से आगे बढ़ाई है। एक प्रदेश से आने वाले गैरअंग्रेजीभाषी नेता की यह कामयाबी कम नहीं है। लेकिन मोदी की तारीफ करना हमारा मकसद नहीं है, हिन्दुस्तान की विदेश नीति पर चर्चा करना अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि कम ही लोग इस बात का अंदाज लगाते हैं कि पाकिस्तान के साथ लगी सरहद पर हिन्दुस्तान का जो खर्च होता है, वह खर्च इस देश में हर स्कूल की जरूरत पूरी कर सकता है, हर अस्पताल को दवाईयों से भर सकता है। ऐसे में अगर नरेन्द्र मोदी हिन्द महासागर क्षेत्र में तनाव को घटाने में कामयाब होते हैं, तो वह तमाम देशों की कमाई बढ़ाने से अधिक बड़ा काम होगा। 
दरअसल नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी रहते हुए जिस तरह का आक्रामक रूख पाकिस्तान के खिलाफ दिखा रहे थे, वह रूख प्रधानमंत्री बनने के बाद ओहदे और देश की जिम्मेदारियों से बिल्कुल ही बदल गया है। और हम ऐसे किसी भी यू-टर्न को सही मानते हैं, और उसका स्वागत करते हैं जो कि मुड़कर अमन-चैन की तरफ जाता है। हम लोगों को किसी वक्त उनकी कही हुई युद्धोन्माद की बातों को याद दिला-दिलाकर उनसे जंग के वायदों को पूरा करने पर भरोसा नहीं रखते। एक चुनावी भाषण अलग होता है, और एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए दिया गया भाषण अलग होता है। एक ओहदे की जिम्मेदारियां लोगों को किस हद तक बदल सकती हैं, किस हद तक बेहतर बना सकती हैं, सकारात्मक बना सकती हैं, आज मोदी इसकी एक मिसाल है। 
भारत का प्रधानमंत्री घरेलू मामलों में किसी एक पार्टी का हो सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर उसे अपनी पार्टी के नारों और मुद्दों से परे देश के व्यापक हित के बारे में सोचना ही पड़ता है। लोगों को यह याद होगा कि एक वक्त प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी को मुखिया बनाकर भेजा था। पाकिस्तान के साथ 1971 के युद्ध में फतह हासिल करके बांग्लादेश का निर्माण करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी की अभूतपूर्व और ऐतिहासिक शब्दों में तारीफ की थी। मोदी सरकार बनने के बाद उनके सबसे करीबी और सबसे ताकतवर मंत्रियों में से एक अरूण जेटली ने विदेशी संबंधों पर केन्द्रित एक खुफिया रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की अपनी मांग अपने ब्लॉग से हटा दी है। यह सब सार्वजनिक जिम्मेदारियों के तकाजे से किए गए काम हैं, और हम नरेन्द्र मोदी की इस बात के लिए तारीफ करेंगे कि उन्होंने पड़ोसियों के साथ रिश्ते गहरे बनाने का काम तेजी से शुरू किया है, और ऐसे ही उत्साह की जरूरत भी थी। मोदी को एक फायदा यह भी है कि पिछले पांच बरसों के यूपीए सरकार का काम एक बड़े शून्य की तरह रहा, और आज मोदी आसानी से उस शून्य को भर चुके हैं। आज दुनिया के हर देश को पड़ोसियों से, और बाकी देशों से भी, रिश्ते बेहतर रखने चाहिए, अपने खुद के नागरिकों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए भी यह जरूरी है। इसके साथ-साथ उन्होंने जरूरत के मौके पर, जरूरत के मुताबिक फिलीस्तीनियों के पक्ष में भारत का वोट देकर एक सही फैसला लिया है, और संसद में भारतीय विदेश मंत्री की चूक को तुरंत ही सुधार भी लिया है। आज हमारे साथ-साथ बाकी की दुनिया भी मोदी के रूख और उनकी पहल को उत्सुकता से देख रही है, और इस पर बाकी दुनिया में भी खासी गंभीर चर्चा हो रही है।  

खिलाड़ी पसीना बहाकर मैडल ला रहे, और अधिकारी गिरफ्तार

3 अगस्त 2014
संपादकीय
अभी जब हम यह संपादकीय लिखने बैठे हैं, ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों से खबर है कि वहां भारतीय टीम के दो गैरखिलाड़ी प्रमुख लोग अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार हुए हैं। ये दोनों ही मामले खेलों से परे के निजी चाल-चलन से जुड़े हुए हैं, और भारत के खिलाडिय़ों ने बड़ी मेहनत से पदक पाने की जो कोशिशें की हैं, उनके पसीने पर यह धूल डालने की हरकत है। एक मामला भारतीय ओलंपिक संघ के महासचिव का है, और दूसरा मामला कुश्ती के एक रेफरी का है। इसकी बाकी जानकारी तो खबरों में जा रही है, इसलिए हम यहां पर पूरी बात को नहीं लिख रहे हैं, लेकिन यह बहुत ही शर्मनाक बात भी है, और इससे भारत में खेलों पर राज करने वाले लोगों के हाल का पता लगता है। 
पूरे देश में जगह-जगह खेल संघ नेताओं और अफसरों के कब्जे में हैं, और अधिकतर खेल संघ ऐसे लोगों के हाथ हैं, जिन्होंने वह खेल कभी खेला ही नहीं है, जिन्हें उन खेलों की कोई समझ नहीं है। बल्कि बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो कि कभी किसी भी तरह के खिलाड़ी नहीं रहे हैं। और आज भारत में खेलों को बढ़ावा देने, खिलाडिय़ों को सहूलियतें देने, मुकाबले करवाने, प्रशिक्षण का इंतजाम करने, जैसे बहुत से मामले इन्हीं लोगों के कब्जे में रहते हैं। हमने भारत में खेलों में भयानक आर्थिक भ्रष्टाचार का मामला दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान देखा था, जिनको लेकर सुरेश कलमाडी अभी तक जेल और जमानत के बीच कहीं पर हैं। दूसरी तरफ क्रिकेट नाम का एक खेल जो कि खेल की जगह कारोबार और मनोरंजन अधिक बनकर रह गया है, उसमें भारी भ्रष्टाचार इस कदर हावी है कि वह कांग्रेस और भाजपा के नेताओं को भी अपनी जेब में रखता है, और सुप्रीम कोर्ट भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता। लेकिन भारत में खेलों की चर्चा को अगर क्रिकेट से जोड़ा जाएगा, तो बाकी खेलों की बात धरी रह जाएगी। 
हमारा यह मानना है कि किसी भी खेल से जुड़े हुए खेल संघ में पदाधिकारी बनने के लिए यह शर्त रहनी चाहिए कि वे लोग कभी न कभी उस खेल से जुड़े हुए रहे हों। आज खेल संघों से लेकर भारतीय ओलंपिक संघ तक गैरखिलाड़ी काबिज हैं, और उसी का नतीजा है कि सवा अरब के इस देश में दुनिया के छोटे-छोटे से देशों का मुकाबला भी मैडलों के मामले में नहीं हो पाता। जब खेल संघों की राजनीति, उनका बजट, उनकी सामाजिक चकाचौंध का बोलबाला रहता है, तो खिलाड़ी बिना रिजर्वेशन ट्रेन में चढ़ते हैं, दरियों पर सोते हैं, नलों पर नहाते हैं, आधा पेट खाते हैं, और जूतों तक के लिए तरसते हैं। यह हाल करीब-करीब पूरे देश का है, और अगर कुछ प्रदेश इससे परे हैं, तो वह बहुत अच्छी बात है। 
खेलों को लेकर खिलाडिय़ों के चयन में गड़बड़ी की बात होती, तो भी वह एक मतभेद का मुद्दा हो सकता था। लेकिन निजी चाल-चलन को लेकर ब्रिटेन में भारत के दो खेल अधिकारी-पदाधिकारी अगर गिरफ्तार हो रहे हैं, तो यह दुनिया के एक सबसे बड़े मुकाबले के दौर में भारत की टीम के प्रति उनकी लापरवाही का सुबूत है। ओलंपिक संघ के पदाधिकारी और एक खेल के रेफरी को अपना ध्यान खिलाडिय़ों पर और मुकाबलों पर रखना था। ऐसे में लोग वहां जाकर गिरफ्तार हो रहे हैं, तो यह खिलाडिय़ों का हौसला पस्त करने की बात भी है, और देश के लिए शर्मिंदगी की बात भी है। उनका जुर्म कितना बड़ा था, कितना नहीं, यह सब ब्रिटिश जांच के बाद सामने आएगा, आज तो इन गिरफ्तारियों से हमें भारत में खेल संघों के हाल पर चर्चा छेडऩे का एक मौका मिला है, उसकी जरूरत लग रही है, इसलिए हम यह बात कर रहे हैं।

हम नहीं सुधरेंगे

2 अगस्त 2014
संपादकीय
टीवी पर इन दिनों इश्तहार आ रहा है कि एक बगीचे में एक नौजवान खाने के सामान का खाली पैकेट फेंकते हुए आगे बढ़ता है तो वहां मौजूद कई बुजुर्ग उसे घेर लेते हैं, और उनके तेवर देखकर वह पैकेट उठाकर कूड़ेदान में डालता है। यह नौबत हिन्दुस्तान के हर दायरे में देखने मिलती है और अधिकतर लोगों को देखकर यह अफसोस होता है कि वे न धरती को अपना समझते, न शहर को, और न सार्वजनिक सुविधाओं को। इसी बीच इमारत की सीढिय़ों के कोने पान की पीक से रंगे रहते हैं, और कई जगहों पर इस गंदगी से बचने के लिए देवी-देवताओं की तस्वीरों वाले टाईल्स लगाए जाते हैं, ताकि कम से कम उन पर थूकने से लोग बचेंगे। सार्वजनिक पखानों और पेशाबघरों को लोग गंदगी जोड़े बिना छोडऩा नहीं चाहते, मानो साफ छोड़कर आने पर उनकी क्षमता कम आंकी जाएगी। 
पूरा देश गंदगी और गैरजिम्मेदारी से इस कदर लबालब है कि मानो बाढ़ के दिनों की नदी हो। लोग सड़कों पर गाडिय़ां रोककर गप्प मारते रहते हैं, और आगे-पीछे के आने-जाने वाले लोग हॉर्न बजा-बजाकर नाकामयाब कोशिश करते रहते हैं। चौराहों पर लालबत्तियों में लोग क्रॉसिंग की सीमा पार किए बिना रूकने को अपनी बेइज्जती समझते हैं, और सार्वजनिक जगहों पर जोर-जोर से गालियों में बात करने को अपना हक समझते हैं। यह तो तय है कि इनमें से अधिकतर लोगों का वास्ता दुनिया के सभ्य देशों से, और सभ्य लोगों से या तो पड़ा नहीं है, या ये लोग सभ्यता के किसी भी असर से अछूते रहते हैं। ऐसे में जो लोग दूसरों के हक और अपनी जिम्मेदारी का ख्याल रखते हुए नियम-कायदों पर चलते हैं, उनके मन में भड़ास बढ़ती चलती है, और बदतमीज लोग बेफिक्र भी रहते हैं। 
आसपास के दूसरे लोगों के सुख-चैन का ख्याल किए बिना लोग अपने घर पर कई-कई दिनों तक लाउडस्पीकर लगाकर उस पर चीखते रहते हैं, और उनको इस बात की भी कोई फिक्र नहीं रहती कि दूसरे लोगों के दिल से उनके लिए कितनी गालियां निकल रही होंगी। आसपास के  दर्जनों लोगों तक पहुंचने जितनी ऊंची आवाज में लोग मोबाइल फोन पर बात करते हैं, और दूसरों से मुलाकात के दौरान कोई अपनी नाक में उंगली डाले रखता है, तो कोई दांत या कान साफ करते रहता है। आज न सिर्फ दुनिया के दूसरे देशों में भी ऐसे लोगों के लिए संभावनाएं कम रहती हैं, बल्कि अपने देश के भीतर भी उन्हें यह पता ही नहीं लगता कि उनकी कौन सी हरकतों की वजह से दूसरे लोग उनसे परहेज करने लगते हैं। अतिमहत्वाकांक्षा शायद बुरी बात हो सकती है, लेकिन जब किसी समाज में महत्वाकांक्षा ही न हो, तो वह बात भी बहुत बुरी रहती है। लोगों के मन में इस देश में बेहतर बनने, बेहतर करने का कोई उत्साह नहीं रहता, और हर कोई अपनी जिंदगी के तौर-तरीकों को उतना घटिया बनाए रखने में खुश रहता है, जितना कि सरकारी सप्लाई में घटिया माल खपाकर सप्लायर खुश रहता है। 
अधिक नुकसानदेह और खतरनाक यह बात है कि भारत के लोगों के घटिया तौर-तरीकों में सुधार की कोई चर्चा भी नहीं होती, और अधिकतर लोग आसपास बिखराई जाती गंदगी के साथ जीना सीख लेते हैं, गंदे सलीकों को बर्दाश्त करना सीख लेते हैं, और धीरे-धीरे खुद भी उसी राह पर चलकर भड़ास से बचना भी सीख लेते हैं। जब खुद गंदगी पर उतर जाएं, तो दूसरों की गंदगी से शिकायत जाती रहती है। इस देश का आने वाले वक्त में, बाकी दुनिया में संभावनाओं से बहुत पीछे रहना तो तय है ही, इस देश में आने वाले सैलानियों का भी हौसला हिन्दुस्तानियों की ऐसी हरकतों से बढ़ता नहीं है। सभ्य देशों से आने वाले लोग यहां की गंदगी को देखकर हक्का-बक्का रहते हैं, और यह देखकर भी हैरान रहते हैं कि कदम-कदम पर मंदिरों वाला यह देश अपने धार्मिक रीति-रिवाजों में तो भारी सफाई के नियम रखता है, लेकिन ईश्वर की प्रतिमा से परे असल जिंदगी में गंदगी ही यहां की संस्कृति हो गई है। 
ऐसी सोच के खिलाफ सरकार कुछ नहीं कर सकती, लोगों को खुद पहले अपने परिवार को ठीक करना होगा, फिर पड़ोस को, और फिर मुहल्ले को। यह सिलसिला अभी शुरू होने का आसार भी इसलिए नहीं दिखता क्योंकि अभी लोग इसे बुरा मानते भी नहीं दिख रहे हैं। आज के आम हिन्दुस्तानी घूरों पर रहने के हकदार हैं, और यहां पर आने वाले सैलानी कुछ तो कुदरत की खूबसूरती को देखने आते हैं, और कुछ वे सैकड़ों बरस पहले के इतिहास में बनी खूबसूरत इमारतों को, कला को देखने आते हैं। लेकिन सैकड़ों बरस पहले की अच्छी बातें, आज की गंदगी को कब तक ढो सकेंगी?

Bat ke bat, बात की बात,

1 aug 2014

संयुक्त राष्ट्र की औकात नहीं कि अमरीकी गिरोह से सवाल करे

1 अगस्त 2014
संपादकीय
फिलीस्तीन के गाजा पर इजराईल के बेहिसाब, बेकाबू, और बददिमाग हमलों को देखें, और उस पर संयुक्त राष्ट्र संघ की सारी पहल को देखें, तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र अब दुनिया के उन तमाम मामलों में प्रसंगहीन हो गया है जिनमें अमरीका की कोई ऐसी दिलचस्पी है, जो कि संयुक्त राष्ट्र की सोच के खिलाफ है। अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र को अपनी जमीन पर जगह क्या दी, उसने मानो इसे अपनी सरकार के एक दफ्तर जैसा ही दर्जा दिया। फिलीस्तीनियों के खिलाफ इजराईली हिंसा की आधी सदी से अधिक गुजर गई है, और दशकों से संयुक्त राष्ट्र ने फिलीस्तीनियों के हक में प्रस्ताव पारित किया है, लेकिन इस सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच का यह दम नहीं है कि अमरीका की मर्जी के खिलाफ वह कुछ भी कर सके। उसका कामकाज दुनिया के इस सबसे बड़े मवाली देश से परे ही चल सकता है, और साथ-साथ अमरीकी गिरोह में शामिल देशों को छूना भी संयुक्त राष्ट्र के लिए मुमकिन नहीं है।
अभी कुछ ही बरस हुए हैं जब अमरीका ने झूठे सुबूत गढ़कर दुनिया के सामने पेश करके इराक पर हमला किया था, यह कहते हुए कि इराक में मानव संहार थोक में करने वाले रासायनिक और दूसरे किस्म के हथियार हैं, और दुनिया के हित में इराक पर हमला जरूरी है। बाद में साबित हुआ कि न तो इराक में ऐसे कोई हथियार थे, और न खुद अमरीकी सरकार के पास ऐसे कोई खुफिया सुराग थे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र रोकते रह गया, सार्वजनिक रूप से अमरीका को ऐसे हमले के लिए मना करते रहा, और अमरीका ने न सिर्फ लाखों लोगों को मारने वाला यह हमला किया, बल्कि दुनिया के देशों को धमकी देकर एक गिरोह में बांटा, यह चेतावनी देते हुए, कि देश या तो इस हमले में अमरीका के साथ हैं, या फिर वे आतंक के साथ हैं। 
ऐसी तमाम बातों को देखें, तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को बनाने का जो मकसद था, दुनिया की जिस जरूरत के पूरे होने की उम्मीद संयुक्त राष्ट्र से की जाती थी, वह सब अमरीकी दबदबे के तले दबकर रह गए। संयुक्त राष्ट्र दुनिया के बहुत से देशों में शांति सेना तैनात करने में कामयाब है, शरणार्थियों की मदद करना, बच्चों की मदद करना, इन सबमें कामयाब है, लेकिन इसलिए कामयाब है कि ऐसे अधिकतर मामलों में अमरीका के हित कहीं घायल नहीं होते। अमरीकी सरकार अगर इनमें से किसी मुद्दे पर, किसी मोर्चे पर खिलाफ हो जाए, तो संयुक्त राष्ट्र की यह औकात नहीं है कि वह वहां पर किसी जख्मी बच्चे पर मरहम भी लगा सके, किसी भूखे को खाना भी दे सकेगी। 
जिस तरह एक लतीफा चलता है कि एक आदमी कहता है कि वह अपने घर में सब कुछ अपनी मर्जी का करता है, अपनी बीवी की इजाजत से। उसी तरह आज संयुक्त राष्ट्र संघ की हालत हो गई है, वह अमरीका को छोड़कर, उसकी पसंद को छोड़, उसके गिरोह को छोड़, बाकी दुनिया के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मंच की तरह काम कर रहा है, तब तक कर रहा है, जब तक वह अमरीकी फौजी बूटों की राह में रोड़े की तरह नहीं खटकता। जिस दिन वैसी नौबत आती है, अमरीकी बूट एक ठोकर से संयुक्त राष्ट्र को राह के किनारे दूर फेंक देते हैं। यह नौबत बदलने के कोई आसार नहीं हैं, दुनिया के अलग-अलग मोर्चों पर अब अमरीका इस कदर हावी हो चुका है, कि उस पर किसी का बस नहीं है। पूरी दुनिया की जासूसी, पूरी दुनिया पर हमला, पूरी दुनिया के कारोबार पर रोक-टोक के उसके मनमर्जी के नियम-कायदे, इन सबको देखें तो अब लगता है कि पूरी दुनिया का ध्रुवीकरण एक ही ध्रुव के इर्द-गिर्द इतना बड़ा हो चुका है, कि बचे हुए देश तब तक बचे हुए हैं, जब तक कि उन पर हमला करने की अमरीका को जरूरत नहीं पड़ती। 
आज ऐसे में दुनिया को कुछ ऐसे बड़े नेताओं की जरूरत है, जो अपने देश की ताकत लेकर, नैतिकता की ताकत लेकर संयुक्त राष्ट्र सहित दूसरे मोर्चों पर अमरीकी दादागिरी के खिलाफ लोगों को एकजुट कर सकें, और इंसाफ की बात कर सकें। ऐसे आसार हमको दिखते नहीं हैं, और शायद आज से सौ-दो सौ बरस बाद पूरी दुनिया 4 जुलाई को ही अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए मजबूर की जाएगी, अमरीका के साथ-साथ। 
एक बार फिर इजराईल और फिलीस्तीन के मोर्चे पर लौटें, तो अमरीका ने दुनिया के मुस्लिम देशों पर हमले करने की अपनी साजिश के तहत बेकसूर और बेघर किए गए फिलीस्तीनियों पर अपने गिरोह के इजराईल को छोड़ रखा है, और पूरी पश्चिमी दुनिया के वे बड़े देश भी आंख-मुंह बंद किए सैकड़ों बच्चों की लाशों को अनदेखा कर रहे हैं, जो तीसरी दुनिया के मजदूर देशों में बाल मजदूरी के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी चलाते रहते हैं। इतिहास इन तमाम बातों को दर्ज तो करते चल रहा है, लेकिन आखिर में जाकर इतिहास विजेता की कहानी रहती है, क्योंकि जंग में एक तो सब कुछ जायज रहता है, दूसरा यह कि जीतने वाले से कोई सवाल नहीं होते। आज संयुक्त राष्ट्र संघ की भी यह औकात नहीं है कि अमरीकी गिरोह से सवाल कर सके।