मोदी की अपील, नक्सलियों को सोचने की जरूरत

संपादकीय
09 मई 2015
बस्तर के अपने पहले दौरे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नक्सलियों से हिंसा का रास्ता छोडऩे की अपील की। उन्होंने लोगों से कहा कि जिस तरह नक्सल बाड़ी और पंजाब में रक्त की धाराएं बहनी बंद हुई, उसी तरह बस्तर में भी जरूर हिंसा बंद होगी। उन्होंने नक्सलियों से कहा कि वे कम से कम दो-चार दिन के लिए अपने कंधे से बंदूक नीचे रखकर पीडि़त परिवार के बच्चों से मिल लें। आपकी गोलियों से पीड़ा पाने वाला आपकी जिंदगी बदल सकता है। हिंसा से कभी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि निराश होने की जरूरत नहीं है। बस्तर में भी नक्सलवाद बंद होगा। उन्होंने कहा कि यहां के नक्सलियों के मन में भी मानवता जागेगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि हिंसा का कोई भविष्य नहीं है, शांति के मार्गों का ही भविष्य है। आपकी गोलियों से पीड़ा पाने वाला ही आपकी जिंदगी बदल सकता है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ अगर नक्सलवाद से मुक्त हो जाए, तो वह हिन्दुस्तान का नंबर एक का राज्य हो सकता है। छत्तीसगढ़ हिन्दुस्तान का भविष्य भी बदल सकता है।
प्रधानमंत्री की बातें नक्सलियों से महज बंदूक से बात करने का विचार रखने वालों से बहुत हटकर है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह पहले भी नक्सलियों से बातचीत का इरादा कई बार जाहिर कर चुके हैं, और आज प्रधानमंत्री ने जिस तरह नक्सलियों से समाज और लोकतंत्र की मूलधारा में लौटने की अपील की है, उसके बाद इस मोर्चे पर कुछ और कोशिशें होनी चाहिए ताकि खूनखराबा खत्म हो। इतने बरसों में छत्तीसगढ़ में यह साबित हो चुका है कि सरकार तो खत्म नहीं की जा सकती, लेकिन लोकतंत्र के खिलाफ हिंसा खत्म हो सकती है। इसी राज्य के उत्तरी सिरे पर सरगुजा में नक्सल हिंसा पूरी तरह खत्म हो गई है। कोई वजह नहीं है कि बस्तर में यह खत्म न हो सके। सरकार की ताकत बहुत अधिक होती है, यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद पन्द्रह बरसों में राज्य और केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस और भाजपा ने किसी फौजी ताकत का इस्तेमाल नक्सल इलाकों में नहीं किया है। और ऐसा न करना एक समझदारी थी क्योंकि फौजी ताकत बहुत से बेकसूरों को मारती है। 
बस्तर में प्रधानमंत्री जिस कारखाने के शिलान्यास करने आए हैं, उसमें बहुत से लोगों की जमीनें जाएंगी। लेकिन किसानों या आदिवासियों की जमीनें गए बिना न तो भिलाई इस्पात संयंत्र बना था, न ही कोई बांध बनता है, और न ही नहरें या सड़क। इसलिए भूमि अधिग्रहण को लेकर देश में जो भी बहस चल रही है, किसानों के भले के लिए जो भी प्रावधान लागू किए जा सकते हैं, उन सबके साथ-साथ भूमि अधिग्रहण एक मजबूरी भी रहती है, और सरकारी कारखाने के लिए या सार्वजनिक कामकाज के लिए किसानों की तकलीफदेह बेदखली एक मजबूरी भी हो सकती है। क्या कोई छत्तीसगढ़ में बीएसपी के बिना आज की तस्वीर की कल्पना कर सकते हैं? इसी तरह बस्तर में जब एक बड़ा सरकारी इस्पात कारखाना बन जाएगा, तो न सिर्फ वहां के लौह अयस्क की बर्बादी बचेगी, उसे बस्तर के बाहर मिट्टी के मोल बेचना बचेगा, बल्कि वहां के लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार भी बहुत मिलेगा। किसी क्षेत्र का विकास उद्योगों के बिना एक सीमा तक तो हो सकता है, लेकिन जहां पर खनिज हैं, वहां पर विकास की सबसे अधिक संभावनाएं स्थानीय जमीन पर कारखाने लगाने से है। और जब यह कारखाना किसी निजी उद्योग का न होकर सरकार का हो, तो उसकी कमाई भी जनता के खजाने में ही जाएगी। 
लेकिन इस एक भूमिपूजन से न तो बस्तर में बात पूरी हो रही है, और न ही कारखाने के सरकारी होने से जनता के पूरे हक मिल जाते हैं। लोगों को वहां के स्थानीय आदिवासियों के हकों के लिए लडऩा जारी रखना पड़ेगा। सत्ता से आसानी से कुछ नहीं मिलता है, लेकिन फिर भी छत्तीसगढ़ में सरकार से लोगों को आसानी से ही बहुत से चीजें मिल जाती हैं। हम उम्मीद करते हैं कि बस्तर के औद्योगिक विकास से प्रदेश और देश का जो भला होगा, उसका एक जायज हक बस्तर के उन लोगों तक जाएगा जिनकी जमीनें अभी शिलान्यास हो रहे कारखानों या परियोजनाओं में जाएंगी। बस्तर के आर्थिक विकास से भी वहां नक्सल हिंसा खत्म होने की एक संभावना खड़ी होगी। 

भाजपा के एक कामयाब राज्य में भाजपा के एक कामयाब प्रधानमंत्री का आगमन

8 मई 2015
संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ आने पर उनके कार्यक्रम तो पहले से तय और औपचारिक सरकारी कार्यक्रम हैं, लेकिन इस मौके पर यह नया राज्य प्रधानमंत्री से बहुत कुछ उम्मीद भी करता है। जिस तरह बिहार या पश्चिम बंगाल केंद्र से विशेष आर्थिक पैकेज मांग रहे हैं, उस तरह की नौबत तो छत्तीसगढ़ की नहीं है, लेकिन यहां की मौजूदा संपन्नता के चलते भी इस नए राज्य के ढांचागत विकास के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। मध्यप्रदेश का हिस्सा रहते हुए छत्तीसगढ़ मेले में भटकते हुए मिले अनाथ बच्चे की तरह था, जिसके हक के लिए छत्तीसगढ़ से भोपाल जाकर मुख्यमंत्री बने लोगों ने भी कुछ नहीं किया था। यह तो कुदरत की देन है कि इस प्रदेश की जमीन के नीचे कोयला है, लोहा है, सीमेंट के लिए पत्थर है, इसलिए यहां अलग राज्य बनने के बाद भी न सिर्फ काम चलते रहा, बल्कि नए बने हुए तीनों प्रदेशों में सबसे अधिक तरक्की इसी एक प्रदेश ने की। 
अब राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दोनों के एक ही पार्टी के होने की वजह से जहां काम में आसानी हो सकती है, वहीं पर यह एक बड़ी सार्वजनिक-राजनीतिक चुनौती भी रहेगी कि किसी भी कमी या नाकामयाबी के लिए राज्य और केंद्र एक-दूसरे को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकेंगे। ऐसे में इन दोनों ही पक्षों को पूरी मेहनत करके, और हर संभावना को टटोलकर इस राज्य को उसका हक भी दिलाना होगा, और इसके विकास की संभावनाओं को टटोलना भी होगा। अभी तक यह राज्य स्कूल-कॉलेज, एक एम्स, एक एयरपोर्ट, एक कारखाना, इससे ही खुश होते आया है। लेकिन यह छत्तीसगढ़ सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है कि केंद्र सरकार के अलग-अलग विभागों के तहत जिन योजनाओं और जिन नई सोच के लिए बजट की संभावना निकल सकती है, उनके लिए कल्पनाशीलता के साथ काम करे। परंपरागत काम एक सीमा तक काम आते हैं, उनके बाद एक कल्पनाशीलता ही आगे की ऊंचाई तक ले जा सकती है।
डॉ. रमन सिंह की अगुवाई में छत्तीसगढ़ में भाजपा ने तीन विधानसभा चुनाव जीते, तीन लोकसभा चुनावों में लगभग सारी सीटें जीतीं, और पंचायत-म्युनिसिपल के चुनावों में तीन बार बड़ी कामयाबी पाई। ऐसे में आगे के चुनावों में इससे और ऊपर जाना लगभग नामुमकिन किस्म का है। गरीबों के जनकल्याण की, और उन्हें सीधा फायदा देने की जितनी योजनाएं हो सकती हैं, वे लगभग लागू की जा चुकी हैं। ऐसे में राज्य के लिए कुछ ऐसे बड़े काम करने की जरूरत है जिसके लिए केंद्र सरकार से बड़ी मंजूरी की जरूरत हो। छत्तीसगढ़ के सामने आज यह बड़ी चुनौती है कि अपने अलग-अलग इलाकों के लिए ऐसी अलग-अलग योजनाएं सोचे, और फिर उनको मंजूरी दिलाने के लिए प्रधानमंत्री से सहयोग ले।
आज नरेन्द्र मोदी बिना किसी चुनावी माहौल के, जनता के बीच आने की किसी मजबूरी के बिना, प्रधानमंत्री के एक सामान्य प्रवास के तहत आ रहे हैं, और ऐसे में उनके सामने किसी लुभावनी घोषणा करने की मजबूरी नहीं है। लेकिन उन्हें यह ध्यान देना होगा कि दशकों की जिस आर्थिक और सामाजिक विषमताओं के चलते हुए, शोषण के चलते हुए बस्तर में नक्सल हिंसा ने पैर जमाए, उन विषमताओं को केंद्र और राज्य मिलकर किस तरह दूर कर सकते हैं। ऐसा तजुर्बा अगर कामयाब रहता है तो वह देश के आधा दर्जन दूसरे नक्सल प्रभावित राज्यों में भी काम आएगा। फिलहाल नरेन्द्र मोदी एक बड़े कामयाब विजेता की तरह छत्तीसगढ़ पहुंच रहे हैं, और उनकी पार्टी भी भारी उत्साह में है। ये दोनों ही जिस ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं, वहां बने रहने के लिए बहुत सा जनकल्याण करना पड़ेगा।

अभिजीत जैसे लोगों के बहिष्कार की जरूरत

संपादकीय
07 मई 2015

सलमान खान को कैद होने के बाद मुम्बई फिल्म उद्योग के लोग उनके समर्थन में टूट पड़े हैं। लेकिन इनमें सबसे आगे रहे एक मध्यम दर्जे के गायक अभिजीत, जिन्होंने फुटपाथ पर सोने वालों को कुत्ता कहते हुए कहा- कुत्ता रोड पे सोएगा, तो कुत्ते की मौत मरेगा। रोड गरीब के बाप की नहीं है, मैं भी बेघर था लेकिन कभी सड़क पर नहीं सोया। इस बयान से असहमति रखने वाले फिल्म कलाकारों ने भी कई ऐसे निकले जिन्होंने सलमान खान के जुर्म को पूरी तरह अनदेखा करते हुए कहा कि यह सलमान जैसे कलाकार के साथ ज्यादती है, और सलमान देशद्रोही तो है नहीं, वगैरह-वगैरह। 
वैसे तो विचारों की आजादी का हक हर किसी को है, और हर किसी को यह हक है कि वे कुत्तों को गाली की तरह इस्तेमाल करें, और फिल्म उद्योग से पैसा कमा चुके अभिजीत को यह हक बनता है कि वह फुटपाथ पर सोने वाले गरीबों को कुत्ता कह सके, और उनको कुचलने को जायज ठहरा सके। पैसे वालों को कई तरह के हक रहते हैं, और फिल्म उद्योग में जिस बड़े पैमाने पर काला-सफेद पैसा कमाया जाता है, उसके मुताबिक वहां के लोग काली जुबान से गरीबों को गाली दे सकते हैं। लेकिन इस बात को हम महज फिल्म उद्योग तक क्यों सीमित रखें? बात इनसे परे भी तमाम पैसे वाले लोगों तक है जिनके मन में आमतौर पर गरीबों को लेकर हिकारत दिखती है, और वे गरीबों को बोझ मानकर चलते हैं। यह वही तबका है जो कि महानगरों और बाकी शहरों में भी अपनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों को फुटपाथ पर चढ़ाकर खड़ा करता है, और यह जाहिर है कि अगर वहां पर गरीब बेघर सोने लगेंगे, तो करोड़पतियों की गाडिय़ां कहां खड़ी होंगी? एक घटिया और गंदी सोच गरीब और कुत्ते इन दोनों पर एक साथ हमला कर रही है, और यह ताकत की हिंसा है। 
दूसरी तरफ जो लोग सलमान के जुर्म को अनदेखा करके इस सजा को गलत, नाजायज, या गैरजरूरी बता रहे हैं, वे भी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में घूमने वाले लोग हैं, और उनको भी नींद में कुचले जाने का खतरा नहीं है। जब जिंदगी महफूज हो, तो सोच बदल जाती है। ताकतवर तबके का यह हिंसक-प्रदर्शन भयानक है, और बताता है कि जिन गरीबों के पैसों से फिल्मी सितारे इस आसमान तक पहुंचते हैं, उनके लिए हिकारत को वे किस तरह अपना हक समझते हैं। लेकिन यह कोई नई बात नहीं हैं। इसी फिल्म उद्योग के एक संगीत निर्देशक और गायक अनु मलिक को गैंगस्टर बन चुके दाऊद इब्राहिम की तारीफ में उनके जन्मदिन पर नाच-नाचकर गाते हुए पूरी दुनिया ने देखा है। अनगिनत गायक और फिल्मी सितारे दाऊद जैसे कातिल के दरबार में भीड़ बनकर जाते रहे हैं। जनचर्चा यह है कि अपराध की दुनिया का बहुत सा पैसा इस उद्योग में लगता है। ऐसे में अगर इंसाफ से इस उद्योग के कुछ या अधिक लोगों को नफरत हो जाती है, तो उसमें अनहोनी कुछ नहीं है।
गरीब, और कुत्ता, इन दोनों में से एक भी शब्द अपमानजनक नहीं है। कोई गरीब है तो उसका एक मतलब यह भी है कि वह मुजरिम नहीं है। मुजरिम बन जाने पर तो फुटपाथ पर सोने की बेबसी नहीं रहती। दूसरी बात कुत्ता एक वफादार इंसान होता है, और वह अपनी नस्ल के दूसरों पर दारू पीकर गाड़ी नहीं चढ़ाता। तीसरी बात अभिजीत जैसे बेवकूफ को यह भी समझ आनी चाहिए कि अगर फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ाना किसी का हक है, तो उस पर सोना उससे बड़ा हक है। यह हिंसक-मूर्ख अपने आपको इस बकवास से एक अभूतपूर्व नफरत का शिकार बना चुका है, और हिन्दुस्तान में अगर लोगों को इंसाफ का साथ देना है, तो ऐसे लोगों की फिल्मों, और उनके कार्यक्रमों का बहिष्कार करना चाहिए। 

अभिजीत जैसे लोगों के बहिष्कार की जरूरत

संपादकीय
07 मई 2015

सलमान खान को कैद होने के बाद मुम्बई फिल्म उद्योग के लोग उनके समर्थन में टूट पड़े हैं। लेकिन इनमें सबसे आगे रहे एक मध्यम दर्जे के गायक अभिजीत, जिन्होंने फुटपाथ पर सोने वालों को कुत्ता कहते हुए कहा- कुत्ता रोड पे सोएगा, तो कुत्ते की मौत मरेगा। रोड गरीब के बाप की नहीं है, मैं भी बेघर था लेकिन कभी सड़क पर नहीं सोया। इस बयान से असहमति रखने वाले फिल्म कलाकारों ने भी कई ऐसे निकले जिन्होंने सलमान खान के जुर्म को पूरी तरह अनदेखा करते हुए कहा कि यह सलमान जैसे कलाकार के साथ ज्यादती है, और सलमान देशद्रोही तो है नहीं, वगैरह-वगैरह। 
वैसे तो विचारों की आजादी का हक हर किसी को है, और हर किसी को यह हक है कि वे कुत्तों को गाली की तरह इस्तेमाल करें, और फिल्म उद्योग से पैसा कमा चुके अभिजीत को यह हक बनता है कि वह फुटपाथ पर सोने वाले गरीबों को कुत्ता कह सके, और उनको कुचलने को जायज ठहरा सके। पैसे वालों को कई तरह के हक रहते हैं, और फिल्म उद्योग में जिस बड़े पैमाने पर काला-सफेद पैसा कमाया जाता है, उसके मुताबिक वहां के लोग काली जुबान से गरीबों को गाली दे सकते हैं। लेकिन इस बात को हम महज फिल्म उद्योग तक क्यों सीमित रखें? बात इनसे परे भी तमाम पैसे वाले लोगों तक है जिनके मन में आमतौर पर गरीबों को लेकर हिकारत दिखती है, और वे गरीबों को बोझ मानकर चलते हैं। यह वही तबका है जो कि महानगरों और बाकी शहरों में भी अपनी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों को फुटपाथ पर चढ़ाकर खड़ा करता है, और यह जाहिर है कि अगर वहां पर गरीब बेघर सोने लगेंगे, तो करोड़पतियों की गाडिय़ां कहां खड़ी होंगी? एक घटिया और गंदी सोच गरीब और कुत्ते इन दोनों पर एक साथ हमला कर रही है, और यह ताकत की हिंसा है। 
दूसरी तरफ जो लोग सलमान के जुर्म को अनदेखा करके इस सजा को गलत, नाजायज, या गैरजरूरी बता रहे हैं, वे भी बड़ी-बड़ी गाडिय़ों में घूमने वाले लोग हैं, और उनको भी नींद में कुचले जाने का खतरा नहीं है। जब जिंदगी महफूज हो, तो सोच बदल जाती है। ताकतवर तबके का यह हिंसक-प्रदर्शन भयानक है, और बताता है कि जिन गरीबों के पैसों से फिल्मी सितारे इस आसमान तक पहुंचते हैं, उनके लिए हिकारत को वे किस तरह अपना हक समझते हैं। लेकिन यह कोई नई बात नहीं हैं। इसी फिल्म उद्योग के एक संगीत निर्देशक और गायक अनु मलिक को गैंगस्टर बन चुके दाऊद इब्राहिम की तारीफ में उनके जन्मदिन पर नाच-नाचकर गाते हुए पूरी दुनिया ने देखा है। अनगिनत गायक और फिल्मी सितारे दाऊद जैसे कातिल के दरबार में भीड़ बनकर जाते रहे हैं। जनचर्चा यह है कि अपराध की दुनिया का बहुत सा पैसा इस उद्योग में लगता है। ऐसे में अगर इंसाफ से इस उद्योग के कुछ या अधिक लोगों को नफरत हो जाती है, तो उसमें अनहोनी कुछ नहीं है।
गरीब, और कुत्ता, इन दोनों में से एक भी शब्द अपमानजनक नहीं है। कोई गरीब है तो उसका एक मतलब यह भी है कि वह मुजरिम नहीं है। मुजरिम बन जाने पर तो फुटपाथ पर सोने की बेबसी नहीं रहती। दूसरी बात कुत्ता एक वफादार इंसान होता है, और वह अपनी नस्ल के दूसरों पर दारू पीकर गाड़ी नहीं चढ़ाता। तीसरी बात अभिजीत जैसे बेवकूफ को यह भी समझ आनी चाहिए कि अगर फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ाना किसी का हक है, तो उस पर सोना उससे बड़ा हक है। यह हिंसक-मूर्ख अपने आपको इस बकवास से एक अभूतपूर्व नफरत का शिकार बना चुका है, और हिन्दुस्तान में अगर लोगों को इंसाफ का साथ देना है, तो ऐसे लोगों की फिल्मों, और उनके कार्यक्रमों का बहिष्कार करना चाहिए। 

सलमान के फैसले से निकली कुछ और बातें

संपादकीय
06 मई 2015

सलमान खान को शराब पीकर, बिना ड्रायविंग लाइसेंस गाड़ी चलाने और फुटपाथ पर सोए गरीब लोगों को देर रात कुचलकर, मारकर, वहां से भाग जाने का कुसूरवार पाकर अदालत ने सजा सुनाई है। इस जुर्म के तेरह बरस बाद जाकर अभी निचली अदालत से सजा हुई है, और हो सकता है कि ऊपर की अदालतों तक पहुंचते हुए इस सजा को बरकरार रहने में कई बरस और भी लग जाएं। लेकिन एक बात जो सोचने लायक है, वह यह है कि फुटपाथ के गरीबों से लेकर बहुत मामूली कमाई वाले, या गरीब लोग गवाह के कटघरे में एक फौलादी मजबूती के साथ खड़े रहे। उन्हीं गवाहों के बयान की बुनियाद पर आज यह सजा खड़ी हुई है, जो कि सैकड़ों करोड़ के मालिक इस अरबपति, और उसके लाखों करोड़ के फिल्म उद्योग की तमाम ताकत के बावजूद टस से मस नहीं हुए। 
हम यह नहीं कहते कि गरीब गवाह आमतौर पर बिक जाते हैं, हम यह भी नहीं कह रहे कि सलमान खान या उनके वकीलों ने गवाहों को खरीदने की कोई कोशिश की। लेकिन यह बात अपनी जगह स्थापित हुई है कि इतने मशहूर फिल्मी सितारे की तमाम ताकत के तूफान के मुकाबले गरीब और बहुत गरीब फुटपाथी गवाहों के दिए जिस तरह आखिरी तक जलते रहे, वह देखने लायक बात है। सलमान ही नहीं उनकी जगह कोई भी रहे, अपनी ताकत तक हर कोई काबिल से काबिल वकील रखते हैं, और बचने की कोशिश करते हैं। भारत के अदालती सिलसिले में बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें ताकतवर और दौलतमंद गवाह भी अदालती कटघरे में जाकर याददाश्त खोने लगते हैं, और पुलिस को दिए बयान से मुकरने लगते हैं। ऐसे में छोटे-छोटे लोगों ने इस मामले में जिस मजबूती से काम किया है, वह देखने लायक है। इस मामले में कई गवाह मुकर भी गए हैं, लेकिन वैसा तो बहुत से मामलों में होता है, जो गवाह टिके रहते हैं वे चर्चा और तारीफ के लायक हैं। भारत के संपन्न तबके में यह आम धारणा रहती है कि गरीब को तो खरीदा जा सकता है, और अमीर मानो बिकाऊ हो ही नहीं सकते। यह मामला एक बार फिर इस हकीकत को खबरों में लाता है कि छोटे-छोटे गरीब लोग भी करोड़ों कमाने की एक संभावना से परे सच के साथ खड़े रहते हैं। और इससे गैरगरीब लोगों को भी अपने खुद के बारे में यह सोचना चाहिए कि क्या उन्हें बिना किसी बेबसी की अपनी जिंदगी में कुछ हौसला नहीं दिखाना चाहिए?
सलमान खान का मामला अदालत के इस दौर तक पहुंचने के बाद देश के ताकतवर लोगों को भी एक नसीहत देता है कि शराब, बददिमागी, और गाड़ी के इंजन की ताकत मिलकर सड़क पर आम लोगों को कुचल तो सकती है, लेकिन ऐसे सैकड़ों मामलों में से कोई एक मामला ऐसा भी हो सकता है जिसमें कि सजा से न बचा जा सके। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही आए दिन देखते हैं कि किस तरह संपन्न तबके की बड़ी-बड़ी गाडिय़ां पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ शराब से भी चलते हुए छोटे लोगों को कुचल रही हैं, ऐसे लोगों को भी सलमान के हाल को देखना चाहिए, और अपनी बददिमागी कम करनी चाहिए। ऐसे फैसले देश के गरीब और आम लोगों के मन में अदालतों के प्रति भरोसा एक बार फिर बचाते हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि पुलिस या जांच एजेंसी, प्रयोगशाला, सुबूत, गवाह, वकील, और जज, इनमें से कुछ न कुछ को, या हर किसी को खरीदा जा सकता है। देश के ताकतवर लोगों के खिलाफ जब ऐसे फैसले होते हैं तो भारतीय लोकतंत्र में अदालतों पर से लोगों का उठता हुआ भरोसा, उठते-उठते थोड़ी देर के लिए और बैठ जाता है।

यह राम नरेश यादव की लोकतंत्र विरोधी बेशर्मी

5 मई 2015
संपादकीय
मध्यप्रदेश के अतिचर्चित व्यापम घोटाले में एक दिग्गज आरोपी वहां के राज्यपाल राम नरेश यादव के आरोपी बेटे की तो कुछ हफ्ते पहले मौत हो गई, लेकिन गमगीन राज्यपाल जमानत और रहम के लिए अदालत में खड़े थे। आज उन्हें अदालत से इस आधार पर रियायत मिली है कि राज्यपाल के संवैधानिक पद पर बैठे हुए किसी व्यक्ति के खिलाफ ऐसे किसी जुर्म में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अब पहली खबरों में इसे एक बड़ी राहत बताया जा रहा है कि उनके खिलाफ दर्ज जुर्म अब धरा रह जाएगा। 
जिन लोगों को यह बात राहत की लगती है, उन्होंने लोकतंत्र की गौरवशाली परंपराओं को नहीं समझा है। लोकतंत्र पेशेवर चोरों की तरह कानून से लुकाछिपी का धंधा नहीं है। यह उदार परंपराओं के गौरव का नाम है। जिस राज्यपाल का बेटा व्यापम घोटाले में आरोपी रहते गुजर गया, और जो राज्यपाल खुद उसी राज्य की पुलिस की अदालती-निगरानी वाली जांच में आरोपी करार दिया गया था, वह राज्यपाल आज राजभवन के संवैधानिक दर्जे को आड़ बनाकर अपनी चमड़ी बचाते दिख रहा है। यह धंधा लोकतंत्र के गौरव का न होकर, संवैधानिक रियायत के शर्मनाक बेजा इस्तेमाल का है, और यह मिसाल दूर तक काम आएगी। यह दर्जा राम नरेश यादव को जिंदगी भर के लिए नहीं मिला है, और हो सकता है कि उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें फिर कटघरे में खड़ा कर दिया जाए। लेकिन सवाल यह है कि ऐसी शर्मिंदगी वाले आरोपों के चलते हुए एक आदमी किस बेशर्मी से राजभवन में डटा रह सकता है, यह लोकतंत्र में एक बहुत बुरी मिसाल है।
राम नरेश यादव हो, या उनकी जगह कोई और, जांच दल के ऐसे नतीजों के चलते हुए सबसे पहले उनको अपनी वह कुर्सी छोडऩी थी जो कि उनको राज्य का संवैधानिक मुखिया होने के नाते मिली है। यह मुखिया कुर्सी छोडऩे के बजाय उसके पीछे जाकर इस तरह छुप गया है, जिस तरह से कोई पेशेवर मुजरिम पुलिस को देखकर किसी पेड़ या दीवार के पीछे छुप जाता है। यह बात भी हमारी समझ से परे है कि इस राज्यपाल को केंद्र सरकार में इन आरोपों के चलते हटाया क्यों नहीं? बहुत से राज्यपाल मोदी सरकार के इस एक साल के भीतर बिना किसी जुर्म के भी हटाए गए, और कई राज्यपालों के लिए तो उत्तर-पूर्व का एक राज्य काले पानी की सजा के लिए अंगे्रजों के अंडमान की तरह इस्तेमाल किया गया, और हटाए जाने वाले राज्यपालों को वहां भेजा गया। सार्वजनिक जीवन का तकाजा यह है कि ऐसी संवैधानिक रियायत इस्तेमाल करने वाले आरोपी कुनबे के इस जिंदा सदस्य को राजभवन से बाहर करना चाहिए। कोई अगर खुद इतना बेशर्म रहे कि वह कुर्सी छोडऩे तैयार ही न हो, तो देश के संविधान ने केंद्र सरकार को ऐसी बाहुबली कानूनी-ताकत भी दी है जो कि राम नरेश यादव को उठाकर राजभवन के बाहर फुटपाथ पर बिठा सके। इस काम में देर नहीं करनी चाहिए, और संविधान का ऐसा बेजा इस्तेमाल लोकतंत्र विरोधी बेशर्मी है।

संपन्न देशों और लोगों की ओर बढ़ते विपन्न मजदूर

04 मई 2015
संपादकीय
दुनिया भर के देशों से योरप पहुंचने के लिए समंदर का रास्ता चुनकर, या हवाई जहाज के चक्कों के साथ चिपककर पहुंचने वाले लोगों की कहानियां रोज खबरों में आती हैं। इन देशों की संपन्नता दुनिया भर के गरीबों और कामगारों को खींचती है, इसके साथ-साथ इन देशों में दूसरे देशों के लोगों को शरणार्थी या प्रवासी का दर्जा देकर कुछ समय तक रखने और जीने-खाने देने का कानून भी है। जिस तरह पूरे हिन्दुस्तान के लोगों को मुम्बई की फिल्म इंडस्ट्री खींचती है, उसी तरह अफ्रीका से लेकर टर्की तक के लोगों को योरप खींचता है। 
अभी-अभी की ताजा खबर है कि इटली ने हजारों लोगों को डूबने से बचाया जो कि मोटरबोट पर सवार होकर योरप में किसी किनारे गैरकानूनी तरीके से पहुंचने के फेर में थे। हर महीने ऐसी कई बोट डूब जाती हैं, और सैकड़ों लोग मारे भी जाते हैं। कुछ महीनों पहले की तस्वीरों वाली भयानक खबर थी कि किस तरह सामान लाने ले जाने वाले लोहे के कंटेनरों में पैक होकर सैकड़ों लोग ब्रिटेन पहुंचे थे, और किस तरह उसमें से बहुत से लोग मरणासन्न हालत में थे। कुल मिलाकर बात यह है कि दुनिया में अलग-अलग हिस्सों में बंटी हुई संपन्नता और विपन्नता, संचित और वंचित, इन दोनों का फासला एक तबके के लिए आराम के लिए जरूरी है, और दूसरे तबके के लिए काम के लिए जरूरी है। आज गरीबों के बिना दुनिया के अमीर देशों का काम तो चलता ही नहीं, हिन्दुस्तान जैसे देश में उच्च-मध्यम वर्ग के लोग भी कामगारों के बिना घर नहीं चला पाते। गरीब नौकर-नौकरानी के बिना अमीर लोगों की जिंदगी दुश्वार हो जाती है। 
पूरे दुनिया के स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ या देशों के किसी दूसरे अंतरराष्ट्रीय संगठन को एक पहल ऐसी करनी चाहिए कि संपन्नता के इर्द-गिर्द विपन्न लोगों के कामकाज के लिए एक कानूनी तरीका निकल सके, और गैरकानूनी तरीके से मौत का खतरा उठाते हुए लोग न पहुंचें। दो दिन पहले की ही रायपुर रेल्वे स्टेशन की एक तस्वीर याद पड़ती है जिसमें महाराष्ट्र से आए हुए सैकड़ों तेन्दूपत्ता-मजदूर बस्तर जाने के लिए ट्रेन से उतरे हैं। हर बरस कई बार इसी रेल्वे स्टेशन पर ओडिशा से आन्ध्र मजदूरी के लिए जाते हुए सैकड़ों मजदूरों की भीड़ कई-कई दिनों तक आते-जाते दिखते रहती है। छत्तीसगढ़ के मजदूर काम करने के लिए हिमाचल से लेकर लद्दाख तक जाते हैं, और यहां के गांवों में तो लोग अपनी झोपड़ी के किवाड़ तक मिट्टी थोपकर बंद करके जाते हैं। 
अमरीका में भी मैक्सिको से लेकर क्यूबा तक के लोग गैरकानूनी तरीके से घुसने की कोशिश करते हैं, और वहां पहुंचने के बाद कानूनी दर्जा न मिलने की वजह से वे कारोबार और कारखानों में नजरों से दूर पिछवाड़े के काम करते हैं जिसमें न उनको पूरी मजदूरी मिलती और न ही मजदूरों वाला कोई हक मिलता। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन को ऐसे में एक अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए और सरहदों के आरपार आते-जाते लोगों के हक के लिए रास्ते निकालने चाहिए। जिस तरह आज मुम्बई में उत्तर भारत से आए हुए लोगों को कुछ उग्र और आक्रामक संगठनों की नाराजगी झेलनी पड़ती है, उसी तरह का हाल कुछ दूसरे संपन्न देशों में विपन्न देशों से आए हुए अकुशल मजदूरों को झेलना पड़ता है। इसलिए हम लगे हाथों अपनी एक पुरानी सलाह यहां फिर दुहरा रहे हैं कि कानूनी रूप से भी किसी दूसरे देश में जाकर काम करने के लिए किसी भी दूसरे देश के मजदूर को अपने हुनर को बेहतर बनाना होगा, अपने व्यवहार को सुधारना होगा, दूसरे देशों की संस्कृति को समझना होगा, और उनकी जुबान सीखनी होगी। जो देश संपन्न हैं, वे अधिक और बेहतर उत्कृष्टता भी चाहते हैं। अधकचरे कामकाज से वे संतुष्ट नहीं होते। इसलिए भारत जैसे देश में जो लोग भी दूसरे देश किसी भी काम के लिए जाना चाहते हैं, उन्हें अपने आपको बेहतर बनाना होगा, तभी उनके लिए बाहर काम निकल सकेगा, और कानूनी रूप से वे बाहर जा सकेंगे। 

कुदरती तबाही देखते हुए वैकल्पिक बसाहट जरूरी

3 मई 2015
संपादकीय

नेपाल के भूकंप से हुई तबाही लगातार खबरों में है, और अभी वहां झटके आना बंद हुए भी नहीं हैं। इस भूकंप के पहले भी नेपाल बदहाल अर्थव्यवस्था से गुजर रहा था, और अब वहां के बारे में कुछ सोचें, तो आस्तिक बनकर यह मान लेना ही एक रास्ता दिखता है कि अब वहां का भगवान ही मालिक है। हालांकि ईश्वर ने वहां पर अपने अधिकतर मंदिरों को उसी तरह बचा लिया है, जिस तरह सारी तबाही के बीच भी दो बरस पहले उत्तराखंड की बाढ़ में केदारनाथ ने अपने-आपको बचा लिया था। ईश्वर के ये तौर-तरीके देखकर इंसानों के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि कुदरत की मार से बचने के लिए वे अपने-आपको अधिक संभालकर रखें। 
भारत में हर बरस बाढ़ में करोड़ों लोग नुकसान झेलते हैं, और बेघर, बेदखल हो जाते हैं। कश्मीर में जैसी बाढ़ लोगों को याद नहीं पड़ती थी, वैसी बाढ़ कश्मीर में आई, और वह तबाही हफ्तों तक खबरों में रही। बिहार से लेकर असम तक बहुत से इलाके भारी बाढ़ में घिरते और डूबते हैं। दूसरी तरफ समंदर के किनारे के ओडिशा जैसे इलाके तूफान का शिकार होते हैं। न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में प्राकृतिक विपदाओं की अलग-अलग किस्में नुकसान पहुंचाती हैं, और इनमें से अधिकतर को रोका नहीं जा सकता। लेकिन सवाल यह उठता है कि धरती और कुदरत की असीमित ताकत के सामने इंसान करे तो क्या करे? 
एक बात तो यह बहुत जरूरी है कि कुदरत को एक रहमदिल या समझदार मानकर चलने के बजाय उसकी सीमाओं को समझना चाहिए। धरती और उसके आसपास के मौसम के अपने तौर-तरीके हैं। वे इंसानी जिंदगी के हिसाब से नहीं चलते। इंसानों को ही यह चाहिए कि वे कुदरत के खतरों को तौलते हुए ही उसके बीच अधिक से अधिक हिफाजत से जीने की कोशिश करें। जिन इलाकों में भूकंप का खतरा अधिक है, उन इलाकों में लोगों को बसना ही पड़े, तो उनके मकान ऐसे रहने चाहिए जैसे कि भूकंप वाले जापान ने बनाने सीख लिए हैं। और फिर बाढ़ वाली नदियों के किनारों से दूर रहना भी सीखना चाहिए, समुद्री तूफान से बचने के लिए उससे दूर बसना भी आना चाहिए। दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक अमरीका में भी हर बरस दर्जनों बार बवंडर आते हैं, और वे भारी तबाही छोड़ जाते हैं। मौसम की कोई भविष्यवाणी बर्बादी को पूरी तरह नहीं रोक पाती। किसी भी देश में बसाहट को लेकर सरकार की एक ऐसी राष्ट्रीय नीति की जरूरत है जिसमें प्रदेशों की सीमाओं से परे यह देखा जाए कि हिफाजत के साथ लोगों को कहां बसाया जा सकता है, कैसे बसाया जा सकता है। आज भारत सरकार के पास यह एक बड़ी संभावना थी कि देश की प्राकृतिक विपदाओं को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित वैकल्पिक बसाहट तय की जाती, लेकिन स्मार्ट सिटी की संभावित लिस्ट अगर देखें, तो उसमें सिर्फ शहरी पैमानों को ध्यान में रखा गया है, आधुनिक विकास और कारोबार को ध्यान में रखा गया है, देश के प्राकृतिक विपदाओं वाले इलाकों के विकल्प की कोई सोच देश की इस सबसे बड़ी शहरी योजना में नहीं है, और इससे परे भी राष्ट्रीय स्तर पर भूकंप-बाढ़ जैसे खतरों के हिसाब से कोई वैकल्पिक बसाहट योजना नहीं है। 
हर बर्बादी के बाद सरकार और समाज में लोगों को जिंदा रहने के लिए कुछ मदद कर पाते हैं, लेकिन प्रकृति के खतरों को देखते हुए बसाहटों की जगह, उनके तौर-तरीके बदलने होंगे, और बाढ़ जैसे बुनियादी तौर पर इंसानों के खड़े किए हुए खतरों को घटाने के लिए नदियों की क्षमता बढ़ाने, मिट्टी को रोकने जैसे काम करने होंगे, वरना तबाही के बाद राहत में ही पूरी जिंदगी गुजर जाएगी।

बुराई के खिलाफ खड़ी होती लड़कियों के साथ समाज और सरकार के खड़े होने की जरूरत

संपादकीय
02 मई 2015

पिछले कुछ दिनों से सामाजिक तनाव की कुछ बहुत अच्छी खबरें आ रही हैं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश सहित कुछ राज्यों में शादी के बीच ही दुल्हनों ने फेरों से या निकाह से इंकार कर दिया, क्योंकि दूल्हा और उसके  साथ के लोग नशे में थे, या गालियां बक रहे थे, या दुल्हन को दूल्हे के बारे में कुछ और बुरी बातें पता लग गई थीं। एक खबर तो इनसे भी ऊपर यह थी कि एक स्कूली छात्रा को मां-बाप ने जबर्दस्ती शादी में डालना चाहा, तो जबर्दस्ती करवाए गए फेरों के बाद भी उसने पुलिस को खबर की, और मां-बाप से भी टकराव मोल लिया। अब पुलिस ने दोनों तरफ के परिवार वालों के खिलाफ जुर्म कायम कर लिया है। 
यह एक अलग किस्म की जागरूकता सामने आ रही है, और जिस तरह से दुनिया में बुरी बातें फैलती हैं, अच्छी बातें भी फैलती हैं। इस जागरूकता से अगर बाकी लड़कियां भी प्रेरणा लेती हैं, और गलत किस्म के लोगों से हो रहे रिश्तों के खिलाफ उठकर खड़ी होती हैं, तो यह भारतीय समाज में एक अलग किस्म की क्रांति हो सकती है। पिछले बरसों में हमने देखा है कि छेडख़ानी और बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने के लिए अब अधिक लड़कियां और महिलाएं सामने आती हैं, इतनी अधिक की भारत में कुछ ऐसा माहौल लगने लगा है कि बलात्कार कई गुना बढ़ गए हैं। हो सकता है कि महज उनकी शिकायत बढ़ी हो। और आज स्कूली किताबों में जिस तरह से सामाजिक जागरूकता के पाठ जोड़े जा रहे हैं, छत्तीसगढ़ में ही पांचवीं की किताब में बच्चों को यौन-शोषण से सावधान करने का एक लंबा पाठ जोड़ा गया है, इसी प्रदेश में एक दूसरी स्कूली किताब में किन्नरों को भी बराबरी का इंसान मानने की समझ देने वाला पाठ जोड़ा गया है, उसी तरह बाल विवाह के खिलाफ भी जागरूकता फैलाई जा सकती है। 
आज ही एक दूसरी खबर बिहार के नालंदा से है, और वहां पर महिलाएं लाठियां लेकर मुंहअंधेरे निकलती हैं और बस्ती के पास खुले में शौच करने वाले लोगों को खदेड़कर भगाती हैं। इससे शौचालय बनाने को लोग बेबस होंगे। कुछ जगहों से ऐसी भी खबरें आती हैं कि सरकारी प्रचार अभियान के असर में आकर लोग अब ऐसे गांवों या घरों में अपनी बेटियों का रिश्ता नहीं करते जिन घरों में शौचालय नहीं हैं। छत्तीसगढ़ में कई जगहों पर हमने शराब दुकानों और शराब की अवैध बिक्री के खिलाफ महिलाओं के आंदोलन देखे हैं, और शराब बेचने वाली छत्तीसगढ़ सरकार अपने उसी विभाग के तहत लगातार महिलाओं को ऐसे आंदोलन के लिए बढ़ावा देने का काम भी कर रही है। 
महिलाओं को पढ़ाने के बारे में एक नारा बहुत पहले से चले आ रहा है कि एक लड़का अगर पढ़ता है तो वह अकेले शिक्षित होता है, लेकिन अगर एक लड़की पढ़ती है तो वह पूरे घर को पढ़ाती है, पूरा परिवार शिक्षित होता है। भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं के साथ हजारों बरस से चली आ रही बेइंसाफी के बावजूद आज भी अगर लड़कियां और महिलाएं जिंदा हैं, तो इसलिए हैं कि वे तन और मन दोनों से आदमियों के मुकाबले अधिक मजबूत रहती हैं। ऐसे में समाज को उनकी ताकत और उनके हौसले, दोनों को बढ़ावा देना चाहिए। पिछले दिनों में गलत किस्म के आदमी से होते रिश्ते के खिलाफ खड़ी होने वाली लड़कियों के बारे में मीडिया में भी तारीफ की खबरें छपी हैं, और समाज के लोगों ने भी उनका हौसला बढ़ाया है। यह सिलसिला आगे बढऩा चाहिए। सरकार और समाज इन दोनों को अपनी पूरी ताकत लगानी चाहिए कि समाज सुधार के लिए उठकर खड़ी होने वाली लड़की अकेली न रह जाए। इसके लिए स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में लड़कियों और महिलाओं के सामाजिक और कानूनी अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के स्कूल-शिक्षा विभाग ने अपनी पाठ्य पुस्तकों में जिस तरह के साहसी जागरूकता वाले हिस्से जोड़े हैं, उसी तरह के सुधारवादी हिस्से जिंदगी के दूसरे जरूरी पहलुओं को लेकर जोड़े जाने चाहिए। स्कूल से कॉलेज तक अगर बच्चों में हौसला भरा जाएगा, तो बड़े होकर वे एक बेहतर समाज बनाएंगे।

यह एक विकसित सभ्यता नहीं

1 मई 2015
संपादकीय

सार्वजनिक जीवन से लेकर राजनीति तक लोगों का रूख अपने और पराए के लिए किस तरह बदलता है यह देखना हो तो भारत के नेताओं को देखा जा सकता है। जिस कांगे्रस पार्टी के राज में महाराष्ट्र में दस बरसों में दस हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की, आज वहीं पर राहुल गांधी ऐसे परिवारों के बीच घूम रहे हैं। इसके पहले वे सत्तारूढ़ यूपीए के सबसे ताकतवर दो-चार नेताओं में से एक थे, लेकिन उस वक्त खुदकुशी करने वाले किसानों के परिवारों से उनकी ऐसी कोई हमदर्दी याद नहीं पड़ती है। दूसरी तरफ दो दिन पहले पंजाब में छेडख़ानी से बचने के लिए मुख्यमंत्री के कुनबे की कंपनी की मुसाफिर बस से कूदने को मजबूर हुई एक लड़की और उसकी मां की खबर पर मुख्यमंत्री बादल से लेकर उनकी भागीदारी वाली केंद्र की एनडीए सरकार तक की जुबान बदली हुई थी। मुसाफिर बसों मेें छेडख़ानी को लेकर राजनीतिक दलों का जो रूख आमतौर पर रहता है वह भी पंजाब के इस मामले में राजनीति की सहूलियत से बंटा हुआ था, बदला हुआ था। 
लोकतंत्र में जीवन के मूल्य, मानवीयता के मूल्य, इंसाफ की बात, इन सबको देखें, तो वे धर्म, जाति, पार्टी, या किसी और तंग नजरिए के  पैमानों पर खरे से खोटे, और खोटे से खरे बना दिए जाते हैं, करार दे दिए जाते हैं। यह सिलसिला लोगों का भरोसा लोकतंत्र, और खासकर राजनीति पर से उठा देता है। आखिर इंसान अपनी तथाकथित इंसानियत को अपने या अपने संगठन के फायदे के लिए किस रफ्तार से खो बैठता है, यह बात सदमा पहुंचाती है। लोग सत्ता से विपक्ष में आते ही अपनी जुबान बदल लेते हैं, उनकी हमदर्दी बढ़ या घट जाती है। ऐसा लगता है कि लोगों के बीच जो अच्छा इंसान कहा जाता है, वह इतना मतलबपरस्त रहता है कि तकलीफ में पड़े लोगों के साथ उसकी हमदर्दी भी चंद सिक्कों में बिक जाती है। 
ऐसे में मीडिया की एक जिम्मेदारी आती है कि लोगों को, संगठनों को उनके पुराने बयान दिखाकर पूछे कि सत्ता और विपक्ष के बीच भूमिका बदल जाने से पुरानी तमाम बातें क्या बदल गईं? अभी-अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेडियो पर अपने मन की बात में भारतीय टीम की हार के बाद खेल प्रशंसकों द्वारा ओछी और गंदी जुबान में कही हुई बातों का जिक्र किया, और उस पर अफसोस जाहिर किया। लेकिन दूसरी तरफ उनके सत्ता में आने के बाद से अब तक उनके साथ के मंत्री और सांसद, पार्टी के लोग, देश की धार्मिक सद्भावना, और साम्प्रदायिक एकता के खिलाफ जितनी हिंसक बातें कर रहे हैं, उनके बारे में प्रधानमंत्री ने अब तक कुछ भी नहीं कहा है। क्या खेल, और वह भी एक खेल की एक टीम, पूरे देश से अधिक अहमियत रखती है? खिलाडिय़ों के खिलाफ हिंसक या भद्दी बातें कहने वालों के बारे में तो उन्होंने कह दिया, लेकिन देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ, खानपान की एक गैरसनातनी जीवनशैली के लोगों के खिलाफ जिस तरह की बातें कही जा रही हैं, उन पर प्रधानमंत्री की चुप्पी खतरनाक है। कुल मिलाकर बात यह है कि आम लोगों से लेकर देश के मुखिया तक, तंगदिली और तंग नजरिए से नीति और सिद्धांत तय कर रहे हैं। यह एक विकसित सभ्यता नहीं है।