मन की बात कहने का हक भी नहीं है आमिर खान को?

संपादकीय
25 नवंबर 2015

आमिर खान के बयान पर देश में दो तबके उबले पड़े हैं। एक तो धर्मान्ध तबका है जो कि देश में बढ़ाई जा रही साम्प्रदायिकता पर मंत्रमुग्ध है, और भारतीय लोकतंत्र को एक धर्मराज्य में तब्दील करने पर आमादा है। दूसरा तबका उन लोगों का है जो इस बढ़ती हुई असहिष्णुता के खिलाफ हैं, और सचमुच डरे हुए भी हैं, और लड़ भी रहे हैं। लेकिन देश में सबसे हमलावर तेवरों के साथ जो लोग एक हिंदुत्व लागू करना चाहते हैं, लादना चाहते हैं, उनके पास हर असहमति के लिए एक बड़ा आसान समाधान है कि जो इस हमले से असहमत हैं, वे पाकिस्तान चले जाएं। आज देशद्रोह की परिभाषा बहुत आसान हो गई है, कि जो लोग आक्रामक राष्ट्रवाद का झंडा-डंडा लेकर चलने को तैयार नहीं हैं, जो लोग मोदी के आलोचक हैं, जो लोग गोमांस के आरोप में इंसान की हत्या के खिलाफ हैं, जो लोग भारतीय लोकतंत्र में धर्मों की गैरबराबरी के खिलाफ हैं, वे तमाम लोग देश छोड़कर चले जाएं, और उनके लिए मानो थोक में पाकिस्तान के वीजा का इंतजाम नफरतजीवियों ने कर रखा है। 
यह देश में एक साम्प्रदायिकता भड़काने की सोची-समझी साजिश है जिसके तहत साम्प्रदायिकता-विरोधी लोगों को अपने मन की बात करने से भी रोका जा सकता है। फिल्म अभिनेता आमिर खान ने महज इतना कहा था कि उनकी पत्नी किरण राव ने घर पर बातचीत में देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता पर फिक्र जाहिर करते हुए कहा था कि क्या इस देश में रहना सुरक्षित है, या बच्चों की सुरक्षा के लिए कहीं बाहर चले जाना चाहिए? इतनी सी बात को लेकर देश के लोग उन पर टूट पड़े हैं, और उनके नाम गालियों का अंबार लग गया है। अब सवाल यह है कि जो माहौल देश में पिछले एक बरस से खबरों में है, चर्चा में है, बहस का मुद्दा है, वह अगर किसी के मन में उठे, तो क्या उस पर लाठियां लेकर इस तरह टूट पड़ें? 
यह एक हकीकत है कि आज देश में साम्प्रदायिक बर्दाश्त खत्म किया जा रहा है। देश में एक धर्मान्ध आक्रामकता लागू की जा रही है। और देश में सनातनी हिन्दू सभ्यता के कुछ गिने-चुने मूल्यों को बाकी आबादी पर लादा जा रहा है, जिनसे कि हिन्दू आबादी का भी अधिकांश हिस्सा असहमत हैं। इस बढ़ती हुई बेचैनी को देश में करोड़ों लोग सोशल मीडिया पर उठा चुके हैं, और बड़े-बड़े नामी-गिरामी विचारक, साहित्यकार, कलाकार, वैज्ञानिक, और लेखक-पत्रकार इस बारे में लिख चुके हैं। देश के राष्ट्रपति एक से अधिक बार इस बारे में बोल चुके हैं, और फिक्र जाहिर कर चुके हैं। देश के भीतर इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखने वाले प्रधानमंत्री भी दूसरे देशों में जाकर भारत की सहनशीलता और संस्कृति की विविधता के बारे में बड़ी-बड़ी बातें बोलकर आ गए हैं। लेकिन देश के भीतर प्रधानमंत्री के संगी-साथी किसी भी आलोचना या किसी भी सहमति को पाकिस्तान भेजने पर आमादा हैं। 
यह बात जाहिर है कि भारत की फौजी लड़ाई, फौजी दुश्मनी, पड़ोस का सबसे बड़ा टकराव सिर्फ पाकिस्तान के साथ है। ऐसे में किसी को पाकिस्तान जाने की सलाह देने देश छोड़कर किसी दूसरे देश जाने की सलाह देना नहीं है, वह एक दुश्मन -देश जाने की सलाह देना है। और इस बात को तो प्रधानमंत्री के आसपास के लोग, उनके साथी-संगठन सौ-सौ बार बोल चुके हैं कि देश के माहौल की आलोचना करने वाले गद्दार लोग हैं, देशद्रोही हैं, और उनको पाकिस्तान चले जाना चाहिए। असम के राज्यपाल ने अभी दो दिन पहले ही जिस घोर साम्प्रदायिक जुबान में इस देश को महज हिन्दुओं का देश करार देने की कोशिश की है, वह अकेली बात उनकी राजभवन की बर्खास्तगी के लिए काफी होनी चाहिए थी, अगर देश का सुप्रीम कोर्ट इस बयान का नोटिस लेता।
इस देश में जिस धर्म के भी, जो भी लोग यहां के नागरिक हैं, वे तमाम लोग अपनी पसंद से यहां बसे हैं, और उनका हक किसी भी दूसरे नागरिक के मुकाबले कम नहीं है। इसलिए वैचारिक असहमति और आलोचना को लेकर किसी को गद्दार, किसी को देशद्रोही, किसी को देश का दुश्मन साबित करना एक शर्मनाक बात है। प्रधानमंत्री देश के बाहर जाकर दरियादिली के बयान देकर देश की हालत को नहीं सुधार सकते, इसके लिए उनको अपने ही संगी-साथियों को काबू में करना होगा, अगर वे ऐसा चाहते हैं तो। 

घटते-सिमटते मैदान, और बढ़ते स्टेडियमों वाला प्रदेश

संपादकीय
24 नवंबर 2015

छत्तीसगढ़ में देश-विदेश की टीमें आकर बड़े-बड़े मैच खेल रही हैं, और इनसे बड़ी-बड़ी खबरें निकलती हैं, यहां के लोगों को पहली बार ऐसे कैमरे देखने मिल रहे हैं, और राज्य एक-एक कर बड़े-बड़े स्टेडियमों से सजते चल रहा है। लेकिन इसके साथ जुड़ी हुई खेल की कुछ ऐसी बातें हैं जिनको अनदेखा करना इस राज्य को हमेशा के लिए दर्शक बनाकर रखेगा। राज्य में सैकड़ों करोड़ की लागत से बड़े स्टेडियम और उससे जुड़े हुए दूसरे ढांचे तो तैयार हो रहे हैं, लेकिन गांव-कस्बे और शहर के छोटे-छोटे स्कूली मैदान, कॉलोनियों के मैदान धीरे-धीरे कर सिमटते जा रहे हैं। उन पर या तो अवैध कब्जे हो रहे हैं, या सड़कों को चौड़ा करने के लिए राजधानी रायपुर में ही सारे बड़े मैदानों को घटाकर छोटा कर दिया गया है, और उसमें से कई तो अब किसी बड़े खेल के लायक बचे नहीं हैं। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती है। अगर इस प्रदेश की राजधानी कोई संकेत है, तो फिर मैदानों का बाजारू और कारोबारी इस्तेमाल इतना बढ़ गया है कि खिलाडिय़ों को खेलने के लिए वे नसीब ही नहीं हैं। एक के बाद एक प्रदर्शनी और बिक्री इन मैदानों पर लदी रहती हैं, और खिलाडिय़ों की कोई आवाज नहीं बची है। महंगे खेल और संपन्न खिलाड़ी तो क्लबों में चले जाते हैं, लेकिन असंगठित छोटे-छोटे खिलाड़ी, बिना टूर्नामेंट वाले बच्चे मैदानों को खोते जा रहे हैं। 
दूसरी तरफ इसी राज्य का यह अनुभव है कि जिन शहरों में साफ-सुथरे बाग-बगाचे बने हैं, वहां पर हजारों लोग रोज जाने लगे हैं, और अपने तन-मन का भला करने लगे हैं। अगर अच्छी सहूलियतें हों, तो लोग उनमें दिलचस्पी लेते हैं। लेकिन जिस प्रदेश में सौ-पचास साल पुराने चले आ रहे मैदानों के काट-काटकर छोटा कर दिया गया है, उस प्रदेश में खिलाड़ी बनने के बजाय दर्शक ही अधिक बनने की संभावना दिखती है। राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह खेल संगठनों से सीधे जुड़े हुए हैं, और करीब-करीब हर बड़े खेल-आयोजन में वे नजर आते हैं। लेकिन राज्य सरकार की ऐसी कोई नीति अभी तक सामने नहीं आई है जो कि मैदानों को छोटा होने से बचाए। शहरी ढांचे के विकास के लिए भी अगर किसी मैदान को किसी कोने से कम करना है, तो किसी दूसरी तरफ पहले मैदान को उतना बढ़ाया जाए, ऐसी कोई योजना न राज्य में है, और न ही म्युनिसिपल जैसी किसी संस्था के पास। शहर के बीच जो गिनी-चुनी खाली जगहें बची भी हैं, उन पर नगर निगम या विकास प्राधिकरण जैसी संस्थाएं व्यावसायिक प्रोजेक्ट बनाने में लगी हैं, बजाय ऐसी खुली जगहों को मैदान या उद्यान के काम में लाया जाए। 
दुनिया के कोई देश घटते हुए खेल मैदानों के साथ, या खेल मैदानों पर बाजारू प्रदर्शनियां लगाकर आगे नहीं बढ़ सकते। राज्य सरकार की तरफ से कई बार यह बात सामने आती है कि खेल मैदानों को गैर खेल उपयोगों के लिए नहीं दिया जाएगा, लेकिन राजधानी में सरकार के ही मंत्री-मुख्यमंत्री इन्हीं मैदानों पर प्रदर्शनियों के उद्घाटन के लिए आए दिन जाते रहते हैं। बड़े स्टेडियम और अंतरराष्ट्रीय मैच तो ठीक हैं, लेकिन क्या छत्तीसगढ़ी नौजवान पीढ़ी को महज दर्शक बनाकर रखना काफी है, या फिर स्कूल-कॉलेज के बच्चों के खेल के मैदान बचाना जरूरी है? मुख्यमंत्री को पूरे प्रदेश से सिर्फ यही रिपोर्ट बुलवाना चाहिए कि पिछले दस-बीस बरसों में खेल के मैदानों का आकार कितना रह गया है, और उनका कितना बाजारू या धार्मिक-सामाजिक-राजनीतिक इस्तेमाल होता है, और कितने दिन मैदान पर हो चुके गड्ढों के बीच बच्चे खेल पाते हैं? जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक छत्तीसगढ़ एक जिंदा टीवी स्क्रीन के सामने बैठकर बड़े-बड़े मैच देखने वाला दर्शक बना रहेगा। 

कतरा-कतरा खूबियों और खामियों से बनती धारणा...

संपादकीय
23 नवंबर 2015

लोगों का मूल्यांकन करते हुए दुनिया उनकी खूबियों और खामियों के बीच कई बार उलझ जाती है। अभी किसी ने इटली के कुछ सदी पहले के एक सबसे चर्चित कलाकार लियोनार्दो दा विंची की इस खूबी के बारे में लिखा कि वे बाजार में बिक रहे पशु-पक्षियों को इसलिए खरीद लेते थे, कि वे उनको आजाद कर सकें। लेकिन इटली के उन्हीं के जीवनकाल के दूसरे पहलू को देखें तो यह दिखता है कि वहां पर दास प्रथा कायम थी, और गुलाम खरीदे-बेचे जाते थे, और इस कलाकार की मौत के बरसों बाद पोप ने गुलाम प्रथा के खिलाफ फतवा जारी किया था। अब पशु-पक्षियों को आजाद करने की खूबी तो है, लेकिन उसी दौर में इंसानों की मंडी के खिलाफ कुछ न कहने की बात के मुकाबले यह बात दब जानी चाहिए थी। 
आज भी दुनिया भर में बहुत से लोग बेईमानी से करोड़ों कमा लेते हैं, और उसमें से कुछ लाख खर्च करके समाजसेवा का कोई ऐसा काम करते हैं जो कि सामने दिखता है। सतह पर देखकर अपना मन तय करने वाले लोग ऐसे लोगों को महान समाजसेवक मान लेते हैं, और उनके गुणगान करने लगते हैं। ऐसा ही दुनिया के बहुत से लोगों के शाकाहारी होने, या उनके शराब न पीने, या उनकी जिंदगी बहुत अनुशासित होने को लेकर मान लेते हैं, और उनके सात खून माफ कर देते हैं। दुनिया के बुरे से बुरे लोगों की कुछ खूबियों को लेकर उनकी खामियों को अनदेखा करने की चूक कर बैठते हैं। 
इसी तरह अच्छे लोगों की कुछ बुरी बातों को, उनके कुछ गलत कामों, या उनकी कुछ गलतियों को लोग उनकी अच्छी बातों से ऊपर देखना और दिखाना शुरू कर देते हैं। भारत में जवाहर लाल नेहरू के जो सबसे सक्रिय आलोचक हैं, उनके पास नेहरू की दो-तीन तस्वीरें हैं। एक में वे सिगरेट पीते दिख रहे हैं, और एक में वे एडविना माउंटबेटन के साथ हंसते हुए दिख रहे हैं। इन दो को लेकर नेहरू को बदचलन साबित करने की कोशिश आधी सदी से चली आ रही है, और अब डिजिटल जमाना आ जाने के बाद लोगों को यह लगता है कि अगर इन दो तस्वीरों को चारों तरफ बांटा नहीं गया, तो उग्र-राष्ट्रवाद में योगदान देना नहीं हो पाएगा। कुछ लोग इससे भी अधिक आगे बढ़ते हैं और किसी विदेशी महिला के साथ गांधी के डांस करने की एक फर्जी तस्वीर को यह बताते हुए फैलाते हैं कि गांधी कितने बदचलन थे। 
लेकिन ऐसी साजिशों से परे अगर महज हकीकत की बात करें, तो लोगों को किसी की खूबी या खामी को एक व्यापक संदर्भ में ही देखना चाहिए। नेहरू के मांसाहारी होने को जो लोग उनके खिलाफ इस्तेमाल करते हैं, उनको यह भी सोचना चाहिए कि उनके अपने साथी इस देश में गांधी से लेकर गुजरात तक कितना लहू बहा चुके हैं। उनको यह भी याद रखना चाहिए कि जिस गाय को बचाने के नाम पर लोग वाहवाही पाते हैं, उनमें से कितने लोग ऐसे हैं जो कि गाय को लेकर इंसानों के कत्ल पर कुछ भी नहीं बोलते। ऐसे लोगों का मूल्यांकन हर एक बयान के बाद नहीं हो सकता, लेकिन जो समझदार लोग हैं वे दूसरों की खूबियों के बिना उनकी खामियों का मूल्यांकन नहीं करते, और न ही उनकी खामियों के बिना उनकी खूबियों का। 
गरीबों का हक दबाने वाले लोग जब सड़क किनारे प्याऊ और भंडारे खोलकर गरीबों की सेवा का नाटक करते हैं, तो उन्हें समाजसेवी मान लेने के पहले उनके बारे में गहराई से कुछ सोच भी लेना चाहिए। यह बात आसान नहीं है, क्योंकि यह बात बहुत कड़वाहट फैलाने वाली है, लेकिन दुनिया के जो गंभीर और जिम्मेदार लोग हैं, वे कतरा-कतरा बातों पर किसी के बारे में अपनी धारणा नहीं बनाते। इसलिए छोटी-छोटी खूबियों और खामियों से उबरकर एक व्यापक नजरिए से लोगों के बारे में, मुद्दों के बारे में सोचना सीखना चाहिए।

आतंकियों पर हमला तो ठीक, लेकिन हमलावर एकराय नहीं

संपादकीय
22 नवंबर 2015

पेरिस पर हुए ताजा आतंकी हमलों के बाद जिस तरह संयुक्त राष्ट्र संघ ने आईएसआईएस नाम के स्वघोषित इस्लामी आतंकी संगठन को खत्म करने के लिए दुनिया को मंजूरी दी है, वह देखने लायक है। यह संगठन तो दुनिया के किसी कानून के लिए जवाबदेह नहीं है, लेकिन जो इजराइल इसी संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य है, उस इजराइल के आए दिन फिलीस्तीन पर होने वाले हमलों, और हर बरस मारे जा रहे हजारों फिलीस्तीनियों को लेकर संयुक्त राष्ट्र अपने ही खुद के प्रस्तावों को पिछले कई दशकों में लागू नहीं करवा पाया है। इसलिए लोगों के बीच ये सवाल उठने जायज है कि क्या किसी एक देश की जिंदगी, किसी दूसरे देश की जिंदगी से अधिक अहमियत रखती है? जिस तरह अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र की तमाम नसीहतों के खिलाफ जाकर इराक पर हमला किया, और वहां पर व्यापक जनसंहार के रासायनिक हथियार होने के गढ़े हुए झूठे सुबूतों के आधार पर फौजी कार्रवाई की, वहां के शासक की हत्या की, और संयुक्त राष्ट्र बैठे चुपचाप देखते रहा, उससे अब दुनिया के कारोबार में इस पंचायत पर सवाल उठ रहे हैं, और ये सवाल भी उठ रहे हैं कि अगर संयुक्त राष्ट्र नहीं तो फिर कौन? 
सीरिया पर हुए ताजा हमलों को देखें, तो मुस्लिम देशों की अपनी आपसी दुश्मनी भी सीरिया पर निकलते दिखती है, सउदी अरब जैसे सबसे संपन्न देशों की आतंकी-फंडिंग भी दिखती है, और यह बात भी उभरकर दिखती हैं कि मक्का का रखवाला देश किस तरह लाखों मुस्लिमों को मारने वाले आतंकी संगठनों का मददगार बना हुआ है। लेकिन आज एक नया सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सीरिया जैसा इलाका गांव की गरीब की लुगाई हो गया है कि जिसका हाथ जो चाहे जाकर थाम ले? उधर अमरीका या फ्रांस अपने हिसाब से सीरिया पर हमला करते हैं, इधर रूस ने सीरिया पर हमले किए, और वहां पर काम कर रहे, कुछ हिस्सों पर काबिज आतंकी संगठनों पर हमला करने के अपने-अपने फैसले लेते रहते हैं। ऐसे में क्या सीरिया दुनिया की इन बड़ी ताकतों का एक फ्री-स्टाइल अखाड़ा नहीं बन गया है? आज कहने के लिए तो ये बड़े देश, दुनिया की ये सबसे बड़ी फौजी ताकतें आतंकी संगठनों पर हमला कर रही हैं, लेकिन कब किसको आतंकी माना जाए, और उस पर कितनी ताकत का कैसा हमला किया जाए, और कब कितने बेकसूरों की साथ होने वाली मौतों को जायज माना जाए, इसे लेकर दुनिया के देश अलग-अलग सोचते हैं। क्या आतंकियों पर हमले की ऐसी अलग-अलग फौजी कार्रवाईयां कल के दिन आपस में टकराव का एक नया मुद्दा नहीं बनेंगी? और उस दिन इनमें सुलह किस तरह से होगी? आज सीरिया की सरकार अपने घरेलू आतंक के सामने बेबस है, और वह बाहर से आ रही ऐसी फौजी मदद का स्वागत कर रही है, लेकिन सीरिया का यह मैदान कब महाशक्तियों के दंगल में बदल जाएगा, इसका क्या ठिकाना है? 
और रूस तो फिर भी एक हद तक भरोसेमंद देश माना जाता है, अमरीका तो एक ऐसे गिरोह का सरगना है जो कि झूठे केस खड़े करके, पश्चिम के देशों को डरा-धमकाकर अपनी हमलावर फौज में शामिल करता है, और एक के बाद दूसरे देश पर हमला करता है, उन पर कब्जा करता है। ऐसे में रूस और अमरीका की अलग-अलग फौजी कार्रवाईयां चाहे एक ही आतंकी संगठन के खिलाफ क्यों न हों, वे आपसी सहमति और सर्वसम्मति की कार्रवाई नहीं बन सकतीं। दुनिया के कारोबार में इन दो महाशक्तियों की योजनाएं बिल्कुल अलग-अलग हैं, और परस्पर टकराव की भी हैं। कल के दिन अगर रूस इजराइल पर ऐसी ही आतंकी कार्रवाई का आरोप लगाकर हमला करे, तो अमरीका की क्या सोच होगी? इसलिए दुनिया में संयुक्त राष्ट्र की सोच जैसे एक संगठन की जरूरत है, जो कि सच में असरदार भी हो। आज तो अमरीका जैसा देश अपनी ताकत से बददिमाग होकर पर्यावरण के मुद्दों पर भी बाकी पूरी दुनिया को हिकारत से नकार देता है, और अपनी मर्जी से काम करता है। और उसकी ऐसी ही हिकारत बाकी दुनिया के जिंदा रहने के हक पर भी हैं। लेकिन हाल के बरसों में पहली बार रूस ने अपनी सरहद से परे अपनी फौजी मौजूदगी दर्ज कराई है, और लोग उत्सुकता से उसकी इस नई भूमिका, उसके इस नए रूख को देख रहे हैं, और अधिक दखल के साथ रूस अमरीकी हमलावर तेवरों पर एक नकेल भी बन सकता है। लेकिन अभी ऐसी किसी अटकल से दूर हम इस मुद्दे पर महज चर्चा कर रहे हैं, और आगे यह पता नहीं कौन सा रूख लेगा। 
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तथ्यों का जवाब विशेषणों से देने की भारतीय राजनीति

21 नवंबर 2015

संपादकीय
भाजपा के एक प्रमुख और बड़बोले नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने राहुल गांधी पर एक तगड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि ब्रिटेन की एक कंपनी में वे डायरेक्टर हैं, और इस कंपनी के कागजात में उन्होंने अपने को ब्रिटिश नागरिक बताया है, और यह भारत के चुनाव कानून के भी खिलाफ है, और भारत के विदेशी मुद्रा कानून के खिलाफ भी। उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखकर इस पर जांच मांगी। दूसरी तरफ राहुल गांधी ने कांग्रेस की एक बड़ी सभा में मंच से प्रधानमंत्री को चुनौती दी कि वे इस मामले की जांच करवाएं, और अगर वे कुसूरवार हैं, तो उन्हें जेल भेजें। लेकिन पिछले चार दिनों में सुब्रमण्यम स्वामी के आरोपों के तथ्यों के बारे में कांग्रेस ने कुछ नहीं कहा है। खुद राहुल ने भी स्वामी को मोदी का चमचा कहा, लेकिन किसी तथ्य का खंडन नहीं किया। यह पहला मौका नहीं है जब लोग तथ्यों का जवाब तथ्यों से देने के बजाय विशेषणों से दे रहे हैं। जब स्मृति ईरानी पर फर्जी डिग्री का आरोप लगा, जब रॉबर्ट वाड्रा पर जमीनों के धंधे में सरकारी ताकत के बेजा इस्तेमाल का आरोप लगा, जब राहुल-सोनिया पर नेशनल हेराल्ड कंपनी को लेकर अदालत तक मामला गया, तब जवाब तथ्यों में सामने नहीं आ रहे। दोनों ही पार्टियों के पास, बल्कि राजनीति में हर पार्टी के पास, सुप्रीम कोर्ट के बड़े दिग्गज वकील हैं, लेकिन तथ्यों और तर्कों के जवाब में विशेषण खोखले लगते हैं। 
भारतीय राजनीति में यह बड़ी विचित्र बात है कि नेता अपने पर लगने वाले आरोपों को कभी जनता की अदालत में साबित करने की बात करते हैं, और कभी कानून की अदालत में। हमारा अनुभव यह रहा है कि जब नेताओं के खिलाफ मामला कानूनी रूप से पुख्ता होता है, तो वे जनता की अदालत में जाकर चुनाव में अपने को सही साबित करने की बात करते हैं, और जब उनके खिलाफ आरोप कानूनी रूप से कमजोर रहते हैं, तो वे जनता के बीच जाकर ऐसी सार्वजनिक चुनौती देते हैं कि सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करे। यहां पर ऐसे नेताओं तक पहुंच वाली राजधानियों की मीडिया की कमजोरी भी सामने आती है कि वह बिना तीखे सवालों के, महज बयान दर्ज करके लौट आती है, कि उसका जिम्मा मानो एक नेता के बयान को दूसरे तक पहुंचाना हो। होना तो यह चाहिए कि मीडिया के लोग पुख्ता आरोपों पर पुख्ता जवाब मांगें, और जब तक वह जवाब न मिले, नेताओं को अप्रासंगिक बयानबाजी न करने दें। हालांकि इन दिनों सोशल मीडिया अपने आप में ऐसे तीखे सवाल उठाता है, लेकिन फिर भी भारत का प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कमजोर साबित होते हैं। 
लोगों को याद होगा कि बहुत से मामलों में जब विपक्ष के पास सररकार के खिलाफ कई मुद्दे होते हैं, और उनमें से किसी एक मुद्दे पर जब सरकार बुरी तरह घिर रही हो तो विपक्ष मांग करता है कि उस मुद्दे पर सरकार श्वेत पत्र जारी करे। हमारा तो मानना है कि सरकार हो या विपक्ष, हर किसी के सामने जनता की तरफ से यह मांग खड़ी होनी चाहिए कि ऐसे किसी विवाद के मामले में संबंधित लोग श्वेत पत्र जारी करें, और खुद होकर सारे तथ्य सामने रखें। आमतौर पर पार्टियां और नेता इस बात की आड़ लेते दिखते हैं कि मामला अदालत में हैं, या मामले की जांच चल रही है, इसलिए उस पर बोलना ठीक नहीं रहेगा। लेकिन हमारा मानना यह है कि तथ्य अगर ठोस तथ्य है, तो न तो वे अदालत को प्रभावित करने के दर्जे में आते, और न ही जांच को प्रभावित करने के। फिर जांच को प्रभावित करने का काम सरकार की तरफ से आया हुआ बयान तो कर सकता है, विपक्ष का बयान किसी जांच को कैसे प्रभावित कर सकता है? और जहां तक अदालत से इंसाफ आने की बात है, तो भारत की जनता यह जानती है कि यहां की न्यायपालिका कई मामलों में आधी सदी तक कोई फैसला सुनाए बिना रह सकती है। और जनता यह भी देखती है कि मुजरिम साबित होने के बाद किस तरह बहुत से नेताओं की पार्टियां सत्ता में आ जाती हैं, उनका कुनबा मंत्री बन जाता है, जमानत पर छूटे लोग पार्टियों के पदाधिकारी बन जाते हैं, कुल मिलाकर कोई भी कार्रवाई भारतीय लोकतंत्र में लोगों की बाधा नहीं बनती।
इसलिए अब सार्वजनिक रूप से ऐसा एक माहौल बनना चाहिए कि जनता की तरफ से लोगों से ठोस सवाल पूछे जाएं, और नेता, पार्टी, या सरकार जो भी हो, उन्हें कानून की अदालत या जनता की अदालत जैसी ढाल का इस्तेमाल नहीं करने देना चाहिए। 

नीतीश की राष्ट्रीय संभावनाएं बिहार की कामयाबी पर टिकीं

संपादकीय
20 नवंबर 2015

बिहार में आज से नीतीश कुमार की एक नई गठबंधन सरकार काम सम्हाल रही है, और देश भर की नजरें इस सरकार पर दो वजहों से टिकी रहेंगी, एक तो यह कि नीतीश मोदी के एक विकल्प की तरह चर्चा में हैं, और दूसरी बात यह कि लालू-कुनबे के साथ नीतीश अपनी बेहतर-प्र्रशासन की छवि को कैसे जारी रख सकेंगे। ये दोनों ही बातें इसलिए महत्व रखती हैं क्योंकि देश अब एनडीए-मोदी के एक विकल्प की तरफ देख रहा है, और यह विकल्प कांग्रेस-रहित तो नहीं रहेगा, लेकिन कांग्रेस की अगुवाई वाला भी शायद न रहे। कहने के लिए भारतीय राजनीति में लंबे समय से गैरकांग्रेस-गैरभाजपा विकल्प की बात होती है, लेकिन देश भर की तस्वीर को देखें तो ऐसा कुछ मुमकिन नहीं दिखता है। इसलिए बिहार से भाजपा-एनडीए का जो विकल्प उभरकर सामने आया है, और जिसमें नीतीश-लालू-कांग्रेस मिलकर शानदार तरीके से जीतकर आए हैं, उसकी राज्य में कामयाबी अगर नहीं होती है, तो देश में उस मॉडल को अगले आम चुनाव के पहले ही खारिज कर दिया जाएगा। 
चुनाव जीतना एक अलग बात होती है, और सरकार चलाना एक बिल्कुल अलग बात। और यह बात पिछले आम चुनाव के बाद से अब तक खुद नरेन्द्र मोदी ने सबसे अधिक साबित की है। वे एक ऐतिहासिक जीत के बाद प्रधानमंत्री बने, और फिर मानो अगले ही दिन से सरकार और पार्टी सब कुछ उनके काबू से परे हो गए, और चुनावी मोर्चे की जीत सरकारी कामकाज के मोर्चे की जीत में तब्दील नहीं हो पाई। नीतीश कुमार के सामने भी यह एक बहुत बड़ी चुनौती रहेगी कि लालू यादव के दो बेटों के मंत्री रहते हुए, और लालू की पार्टी के बराबरी की गिनती के मंत्री रहते हुए वे एक साफ-सुथरा शासन कैसे चला पाएंगे? लालू यादव का अपना इतिहास सरकार में घोर अराजकता, और परले दर्जे के भ्रष्टाचार का रहा है, वे सजायाफ्ता हैं, और अदालती अपील के चलते हुए जमानत पर जेल से बाहर हैं। वे घोर कुनबापरस्त हैं, और धर्मनिरपेक्षता के नारे से परे उनका लोकतंत्र पर कोई भरोसा नहीं है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार इनमें से अधिकतर खामियों से परे हैं, और उनके पिछले दो कार्यकाल बेहतर रहे, और इसीलिए जनता ने इस बार इस गठबंधन को चुना, क्योंकि पहले से यह साफ था कि लालू और कांग्रेस के बावजूद मुख्यमंत्री नीतीश ही रहेंगे। 
खुद लालू यादव के लिए बेहतर यही होगा कि वे अपनी अगली पीढ़ी को एक कम बेईमान राजनीति करने का एक मौका दें, अपने बेटों को ईमानदारी से राजनीति चलाने का एक मौका दें, वरना जनता के बीच इस सुगबुगाहट में अधिक वक्त नहीं लगेगा कि भ्रष्टाचार और बेईमानी इन बेटों के डीएनए में है। इसलिए अपने बेटों की भलाई के लिए, और देश में एक नए राजनीतिक विकल्प के लिए लालू यादव को भ्रष्टाचार की अपनी हवस को काबू में रखना चाहिए। चूंकि उनकी पार्टी की सीटें नीतीश की पार्टी से भी अधिक रही हैं, इसलिए उनकी बददिमागी का एक खतरा खड़ा हो सकता है, और भाजपा-एनडीए ऐसी ही किसी नौबत की तरफ हसरत लगाए देख रही हैं। 
बिहार की चुनावी राजनीति ने कांग्रेस को उसकी जगह बता दी है। और जिस ठंडे मिजाज के साथ कांग्रेस ने बिहार में इसे बर्दाश्त किया है, उसे वैसी ही बर्दाश्त बाकी देश के लिए भी विकसित करनी चाहिए। बहुत से ऐसे मौके आते हैं जब इतिहास के बड़े लोगों को वर्तमान में छोटे लोगों के मातहत काम करना पड़ता है, और उसे किसी गुस्से या निराशा के साथ नहीं, उसे एक सबक की तरह लेना चाहिए। नीतीश कुमार देश में भाजपा गठबंधन के एक मजबूत विकल्प की तरह उभरने की संभावना रखते हैं, लेकिन यह संभावना बिहार में उनकी इस पारी की कामयाबी पर ही टिकी हुई है।

भारतीय लोकतांत्रिक चुनाव मोडऩा इस कदर आसान है?

संपादकीय
19 नवंबर 2015

लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए काम करने वाले अमरीका से लौटे एक भारतवंशी नौजवान प्रशांत किशोर भारतीय चुनावी राजनीति में एक जादूगर की तरह समझे जा रहे हैं। उन्होंने मोदी की जीत में मदद की, और अभी बिहार के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के लिए काम किया। वे जमीनी स्तर पर राजनीतिक विश्लेषण करने से लेकर चुनाव संचालन तक सलाह देने का काम करते रहे, और चुनाव अभियान रास्ता दिखाते रहे। अब उनके बारे में कई राजनीतिक दलों और कई प्रदेशों की तरफ से उत्सुकता से न्यौता भेजा जा रहा है कि वे उनको रास्ता दिखाएं। प्रशांत किशोर अभी कुछ बरस पहले तक भारतीय राजनीति में कहीं नहीं थे, और वे एक संगठन सिटीजंस फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस के तहत काम करते हैं, और नीतीश कुमार की ऐसी करिश्माई जीत का खासा बड़ा श्रेय उन्हें दिया जा रहा है। 
अमरीकी चुनावी राजनीति में तरह-तरह के विशेषज्ञों और संचालकों का हमेशा से एक बड़ा महंगा दखल रहते आया है, लेकिन भारतीय राजनीति में यह एक नई बात है। यहां पर पार्टियां और नेता अपने परंपरागत तौर-तरीकों से काम करते आए हैं, और मोदी ऐसे पहले नेता रहे जिन्होंने सोशल मीडिया से लेकर बाकी तरह के डिजिटल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया, और वे एक आंधी की तरह आए और छा गए। उनसे एक पीढ़ी कम उम्र के नौजवान राहुल गांधी के आसपास किसी ने सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया का नाम भी नहीं सुना था। लेकिन बिहार जिसे कि आमतौर पर एक पिछड़ा प्रदेश माना जाता है, और नीतीश कुमार भी अपनी पार्टी के साथ-साथ किसी तरह की आधुनिक तकनीक के लिए नहीं जाने जाते, वे भी पहली बार ऐसी विशेषज्ञ सेवा लेते देखे गए, और उसका नतीजा भी सामने है। 
हम ऐसी योजना और ऐसे चुनाव संचालन की खूबी की तो तारीफ करते हैं, लेकिन एक बात फिक्र खड़ी करती है कि क्या भारतीय चुनावी लोकतंत्र कुछ योजनाओं से इस हद तक प्रभावित किया जा सकता है? तो फिर पांच बरस के कामकाज, पचास बरस की पार्टी की साख, और नेताओं की अपनी छवि का क्या मतलब रह जाता है? अगर भारत के चुनाव कुछ कम्प्यूटर और समाज विज्ञान विशेषज्ञ इस तरह मोड़ सकते हैं, तो इसका एक मतलब यह है कि भारतीय लोकतंत्र परिपक्वता से दूर है, और इस तरह की विशेषज्ञता को कोई पैसों से हासिल करके बिना चुनावी भ्रष्टाचार के भी अपनी संभावनाएं बढ़ा सकते हैं। यह नौबत खतरनाक है। अभी तक तो हम यह मानकर चल रहे थे कि चुनावों में भ्रष्टाचार से मतदाताओं को प्रभावित किया जा सकता है, किया जाता है। लेकिन अब अगर चुनाव संचालन एक विज्ञान की तरह हो गया है, और उसे कुछ लोग राजनीति के बाहर से आकर इस हद तक प्रभावित कर सकते हैं, तो यह काम कल के दिन किसी दूसरे देश की ताकतें, भारत की कारोबारी ताकतें, या कोई आतंकी ताकतें भी खर्च करके कर सकती हैं।
भारतीय लोकतंत्र में चूंकि किसी भी नेता या पार्टी के लिए न सिर्फ ऐसा अहिंसक औजार इस्तेमाल करने की आजादी, इसलिए इस पर कोई रोक तो नहीं लग सकती, लेकिन लोगों को यह सोचना होगा कि यह सिलसिला मतदाताओं की स्वाभाविक पसंद पर किस हद तक हावी हो सकता है, और उससे कैसे जूझा जा सकता है? और फिर यह नेताओं और राजनीतिक दलों के पारंपरिक तरीकों की एक नाकामयाबी भी है, जिसके बारे में उनको सोचना चाहिए। 

आस्था और लोकतंत्र के बीच का टकराव दुनिया भर में छाया

संपादकीय
18 नवंबर 2015

पेरिस पर हुए ताजा हमलों के बाद अब अमरीका से लेकर ब्रिटेन तक, और फ्रांस से लेकर भारत तक संस्कृतियों के टकराव की एक बहस अभूतपूर्व स्तर पर शुरू हुई है। अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पहली बार ऐसा तीखा बयान दिया है कि इस्लाम के नाम पर किए जा रहे आतंक पर मुस्लिम समाज की प्रतिक्रिया काफी नहीं है। और यह बात भारत के उत्तरप्रदेश के आजम खान से लेकर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह तक, और ब्रिटिश संसद में लेबर पार्टी के एक बड़े नेता तक लगातार उठ रही है। अमरीका से लेकर योरप के देशों तक शरणार्थियों पर उनकी नीतियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, और इन तमाम देशों में बसे हुए मुस्लिम एक अभूतपूर्व सामाजिक तनाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे तनाव के बीच उन लोगों की दिमागी हालत की कल्पना नहीं की जा सकती जो कि अपने घरवालों को समंदर के सफर में खोते हुए सीरिया और लीबिया से योरप पहुंच रहे हैं, और सिर छुपाने की जगह मांग रहे हैं। आज का यह तनाव पिछले कई बरसों में कभी इस दर्जे का नहीं था, और इन तमाम देशों ने वहां के स्थानीय नागरिक अपनी खुद की हिफाजत को लेकर इतने फिक्रमंद पहले कभी नहीं थे। और शायद ऐसा ही एक सांस्कृतिक टकराव खड़ा करने इस्लाम के नाम पर आतंक करने वाले आईसिस जैसे संगठनों का मकसद है, क्योंकि वे सीरिया जैसे देश में नागरिकों पर कब्जा करके अपने को हवाई हमले से भी बचाते हैं, और अपनी ताकत भी बढ़ाते हैं। 
आज दुनिया के देशों में मुस्लिम आतंकी संगठनों के हमलों की वजह से एक बहुत बड़ा टकराव खड़ा हो गया है, और लोगों को शरण देने की उदारता दिखाने वाले लोकतांत्रिक देश भी यह सोचने पर मजबूर हुए हैं कि वे क्या करें? अमरीका में राष्ट्रपति पद का चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहा एक नेता वहां की उन तमाम मस्जिदों को बंद करने की मांग उठा रहा है जहां के बारे में यह शक है कि वे इस्लाम के नाम पर कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रही हैं। पश्चिम के जो लोकतंत्र धार्मिक समानता को कड़ाई से मानते हैं, वे आज बहुत बड़ी दुविधा से गुजर रहे हैं। धर्म के नाम पर कुछ संगठन जब लगातार कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं, तो वे देश लोकतंत्र के अपने मूल्यों पर कितना कायम रहें, और कितना खतरा झेलें? वहां पर राजनीतिक दल भी अपने देश की और अपनी उदारता के बारे में एक बार फिर सोचने को मजबूर हैं, और सरकारों को यह समझ नहीं आ रहा है कि वे रातों-रात अपनी नीतियों पर फिर कैसे पुनर्विचार करें, और कैसे आते हुए शरणार्थियों को मना करें। 
दरअसल लोकतंत्र और धर्म के बीच एक बुनियादी विरोधाभास है, और आतंकी हमलों में इस विरोधाभास को एक बार फिर सामने रखा है। यह सिर्फ इस्लाम के साथ नहीं है, बल्कि दुनिया के अधिकतर धर्मों के साथ यह बात जुड़ी हुई है कि उन्हें मानने वाले लोग अपनी आस्था को अपने देशों के संविधान से ऊपर मानते हैं, और इसे लेकर देशों के भीतर भी लगातार छोटे या बड़े टकराव होते रहते हैं। भारत में भी बाबरी मस्जिद को लेकर, शाहबानो को लेकर, या कई और मुद्दों पर धर्म और कानून के बीच टकराव होते रहा है। आस्थावान लोग कानून अपने हाथ में लेते हैं, या कि जैसा कि शाहबानो के मामले में हुआ, कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए संसद में अतिबहुमत वाली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया था। दुनिया के तमाम देशों में जहां भी कोई धार्मिक राज नहीं है, जहां भी सभी धर्मों का दर्जा बराबर है, वहां लोगों को अपने धर्म को उन देशों के संविधान के नीचे ही रखना चाहिए। जब लोग अपनी आस्था को देश के कानून के मुकाबले खड़ा करके टकराव करते हैं, तो लोग उनके धर्म को दुनिया भर में एक समस्या की तरह देखते हैं। ऐसा टकराव दुनिया के विकास के साथ कदम मिलाकर नहीं चल सकता। हर धर्म को अपने आपको आस्था और उपासना तक सीमित रखना चाहिए, और आतंक से जोडऩे के बाद किसी भी धर्म के लोग अपने धर्म के बाकी अमन-पसंद लोगों की जिंदगी भी मुश्किल कर देते हैं। आज दुनिया भर में मुस्लिम समाज के जो लोग आतंक के बिल्कुल खिलाफ हैं, वे लोग भी एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक तनाव झेल रहे हैं। और यह कहना समस्या का अतिसरलीकरण होगा कि मुस्लिम समाज को ही इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंक को रोकना चाहिए, ऐसा मुमकिन नहीं है क्योंकि ऐसे आतंकी संगठन बाकी मुस्लिमों के न तो प्रतिनिधि हैं, और न ही उनके काबू में हैं। यह कहना कुछ वैसा ही होगा कि बस्तर के आदिवासियों को चाहिए कि वे नक्सलियों को रोकें। इस्लाम के नाम पर आतंक कर रहे लोगों के खिलाफ फौजी कार्रवाई के अलावा और कुछ कारगर नहीं हो सकता, लेकिन दिक्कत यह है कि ये आतंकी उन्हीं फौजों के खड़े किए हुए हैं, जो फौजें आज उन पर बम बरसा रही है, और बेकसूर मुसलमान ऐसी फौजों और ऐसे आतंकियों के बीच पिस रहे हैं।

आत्महत्या तक बढ़ जाने वाला तनाव पहले रोकने की जरूरत

संपादकीय
17 नवंबर 2015

 बिलासपुर में एक कॉलेज छात्रा ने प्रताडऩा और रैगिंग से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। उसके परिवार ने दो दिन पहले कॉलेज के प्राचार्य से हॉस्टल वार्डन के बर्ताव की शिकायत की थी। छत्तीसगढ़ में स्कूल और कॉलेज के हॉस्टलों में, और गांव-शहर के मुहल्लों में, लड़कियों के साथ कई तरह की ज्यादतियों के मामले हर हफ्ते दो हफ्ते में सामने आते ही हैं। हर पखवाड़े या महीने कोई न कोई लड़की छेडख़ानी से त्रस्त होकर आत्महत्या कर लेती है, और पुलिस बाद में गुंडों को पकड़कर कार्रवाई करती है। बहुत से ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें लड़की का परिवार लंबे समय से कुछ गुंडों-बदमाशों के खिलाफ छेडख़ानी की शिकायत करते आया है, लेकिन कार्रवाई न होने पर थक-हारकर, निराश लड़की आत्महत्या कर लेती है।
आत्महत्या तो किसी की भी जिंदगी की आखिरी कार्रवाई होती है। लेकिन ऐसे आत्मघाती फैसले से पहले लड़की हो या लड़का, बच्चे हों या बड़े हों, वे जिस अंतहीन यातना से गुजरते हुए ऐसा फैसला लेते हैं, वह यातना और उसका दौर सरकारी रिकॉर्ड में नहीं आ पाते। हम पहले भी इसी जगह पर कई बार सामाजिक परामर्श की जरूरत बताते आए हैं कि खुदकुशी कर रहे किसानों और उनके परिवारों को, नक्सल इलाकों में नक्सलियों और पुलिस की हिंसा के शिकार लोगों और उनके परिवारों को जैसे परामर्श की जरूरत है, उस पर इस राज्य में चर्चा भी नहीं होती है। दरअसल सरकारी अस्पतालों में मनोवैज्ञानिक परामर्श की क्षमता ही नहीं है, कुछ गिने-चुने अस्पतालों में शायद एक-एक परामर्शदाता हों, लेकिन वे ढाई करोड़ की आबादी में दसियों लाख जरूरतमंद लोगों में से गिने-चुने लोगों से ही बात कर पाते होंगे। 
ऐसे में सरकार को एक नए नजरिए से सोचना चाहिए। स्कूल और कॉलेज के जो शिक्षक मनोविज्ञान पढ़े हुए हैं, उन्हें परामर्श का एक कोर्स करवाना चाहिए, और उनके स्कूल-कॉलेज में उनके काम के कुछ घंटे इस मदद के लिए रखने चाहिए। लेकिन स्कूल-कॉलेज से परे भी एक बड़ी आबादी को मानसिक परामर्श की जरूरत है, और इसके लिए सरकार को स्वयंसेवी संगठनों, या सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर कुछ करना चाहिए। आज तो प्रदेश में मेडिकल-मनोचिकित्सकों की कमी भी बहुत बुरी है, और परामर्शदाताओं की भी। राज्य सरकार को अपने मेडिकल कॉलेज से लेकर विश्वविद्यालयों तक में मनोचिकित्सा और मनोविज्ञान को महत्व देने की जरूरत है, आज न इनकी सीटें हैं, और न ही परामर्शदाताओं के लिए कोई नौकरियां ही हैं। छत्तीसगढ़ में गिनी-चुनी महंगी निजी स्कूलें हैं, जहां पर कि कुछ घंटों के लिए परामर्शदाता रहते हैं। आज सामाजिक विसंगतियों के बढ़ते हुए, तरह-तरह के नए प्रेम-संबंधों के बढ़ते हुए, तरह-तरह की हिंसा सामने आ रही है। ऐसी हिंसा से निपटने के लिए समाज की कोई तैयारी नहीं है, और सामाजिक तनाव से हुए अपराधों को महज पुलिस का मामला मान लिया जाता है। 
एक दूसरी दिक्कत यह है कि राज्य में महिलाओं की सुरक्षा के लिए, या मानवाधिकार की रक्षा के लिए, दलितों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए जो संवैधानिक आयोग बने हैं, वे भी चूंकि इसी सरकार के मनोनीत लोगों से बने हैं, इसलिए वे सरकार के लिए कोई असुविधा खड़ी करने से बचते हैं। नतीजा यह होता है कि खबरें छपती रहती हैं, कार्रवाई होती नहीं हैं, और संवैधानिक संस्थाएं भी मजे से बैठी रहती हैं। यह सिलसिला भी थमना चाहिए। ऐसी घटनाएं जब विपक्ष के उठाए खबरों में कुछ अधिक आती हैं, विपक्ष सड़कों पर उतरता है, तब जाकर सरकार और आयोग कुछ करते हैं। यह रूख भी बदलने की जरूरत है। 

इस देश में तमीजदार का सारा वक्त भड़ास में...

16 नवंबर 2015
हिन्दुस्तान के बहुत बड़े इलाके में लोगों की सोच देखनी हो तो किसी भी सार्वजनिक जगह पर थोड़ा सा वक्त गुजारना काफी होता है। किसी भी साफ-सुथरी जगह को देखते ही लोगों का मन वहां पर थूकने और हो सके तो मूतने को करने लगता है। किसी स्मारक या पर्यटन केन्द्र की कोई इमारत हो, या चट्टान हो, या किसी तरह की दीवार हो, तो लोगों के हाथ अपनी किसी मोहब्बत को वहां दर्ज करवाने को बेताब होने लगते हैं, और ऐसा न हो सके तो फिर कुदरत के दिए हुए बदन के कुछ चुनिंदा हिस्सों के नाम वहां लिखकर लोग ऐसी सुखद कल्पना में डूबे रहते हैं कि उन्हें पढऩे वाले लोगों के चेहरों पर कैसे भाव दिख रहे होंगे। 
सुबह-सुबह बगीचे में घूमने जाएं, तो लोग आसपास के दूसरे लोगों की मौजूदगी को जाने या अनजाने, अपने बदन को इस तरह खुजाते दिखते हैं, कि यह हैरानी होती है कि वे घर से रवानगी के पहले इस काम को निपटाकर कुछ मिनट लेट क्यों नहीं निकलते। जिस जगह दूसरे लोग चल रहे हों, और तेज चल रहे हों, वहां पर लोग इस अंदाज में झुंड बनाकर खड़े हो जाते हैं कि मानो बारिश के दिनों में डामर की सूखी सड़क पर खड़े होने या बैठने को बेबस जानवर हों। 
फिर आम हिन्दुस्तानियों के साथ एक दिक्कत यह भी रहती है कि वे जब तक अकेले रहते हैं, तब तक तो उनमें किसी कोने में थोड़ी सी इंसानियत बची रहती है, लेकिन जैसे-जैसे उनकी टोली के लोग बढ़ते चलते हैं, दोस्त इक_ा होने लगते हैं, वैसे-वैसे उनकी हिंसा बढऩे लगती है। और अगर यह भीड़ किसी एक जाति या धर्म की हुई, किसी एक पेशे की हुई, या किसी एक संगठन की हुई, तो लोग तुरंत हजारों बरस पहले के उस दौर में जीने लगते हैं जिसमें सबसे ताकतवर के ही अस्तित्व की गुंजाइश रहा करती थी। ऐसी भीड़ तुरंत ही आसपास के लोगों के लिए भारी हिकारत के साथ आपसी मजाक, आपसी गाली-गलौज, आपसी अश्लील बातें करने में जुट जाती है, यह मानते हुए कि भीड़ की इस ताकत के मुकाबले और तो कोई कुछ कर नहीं सकते। 
अभी मेरे शहर में एक बगीचे में महापौर ने निजी दिलचस्पी लेकर कसरत की बहुत सी मशीनें लगवाई हैं। इन पर बच्चे-बड़े, आदमी-औरत, हर उम्र और किस्म के लोग बड़े उत्साह से सेहत बनाने के लिए जुटे हुए दिखते हैं। लेकिन यहीं पर एक ही जाति के लोगों की, एक ही उम्र के नौजवानों की एक ऐसी टोली भी जुटी हुई थी, जो रोज उस बगीचे में आती है, और जहां बहुत से लोग उनको पहचानते भी हैं, लेकिन कसरत की मशीनों को लेकर दूसरों के बच्चों की मौजूदगी में, दूसरी महिलाओं की मौजूदगी में यह टोली अश्लील मजाक जोर-जोर से चिल्लाकर कर रही थी, और यह तो मानकर चल रही थी कि और लोग इसे समझते होंगे, लेकिन यह मानकर भी चल रही थी कि इतनी बड़ी टोली के मुकाबले कोई और विरोध करने खड़े नहीं होंगे। 
और भीड़ बनने के बाद हिंदुस्तानियों का बर्ताव कैसे बदलता है यह देखना हो तो ट्रेन में सफर करने वाले पुलिस वालों से लेकर फौजियों तक की वारदातें हर बरस खबरों में आती हैं कि किस तरह वे लोगों को उनकी सीटों से उठाकर बाहर फेंक देते हैं, और पूरे डिब्बों पर कब्जा कर लेते हैं। अभी कुछ महीने पहले मध्यप्रदेश के इंदौर के पास महू नाम की जगह पर शहर में फौजियों ने झगड़ा किया, और बाद में फौज के कॉलेज से और लोगों को लेकर आए और थाने में भारी तोडफ़ोड़ करके चले गए। इस देश में लोग जब एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं, तो अमूमन अच्छे काम के लिए तो नहीं होते, बुरे काम के लिए तुरंत ही एक बलात्कार पल भर में सामूहिक बलात्कार में बदलने के लिए लोग जुट जाते हैं।
हिन्दुस्तानियों के रंग देखने हों, तो उन जगहों पर देखें जहां सिगरेट पीने की मनाही हो, जहां पीने के लिए साफ पानी का इंतजाम हो। आम हिन्दुस्तानी ऐसी जगहों को जब तक धुएं से, या कुल्ला करके, पानी थूककर, नाक साफ करके जब तक गंदा न कर दें, उनके राष्ट्रवाद का पेट नहीं भरता। उनको लगता है कि वे अपनी हिन्दुस्तानी पहचान बता ही नहीं पाए। यह देश जिसे अपनी संस्कृति के एक काल्पनिक इतिहास पर एक आक्रामक घमंड है, उसे सभ्य लोगों के बीच बैठने का शऊर  भी नहीं है। यहां आने वाले विदेशी पर्यटक यहां के लोगों की वजह से नहीं आते हैं, बल्कि सैकड़ों बरस पहले कुछ दूसरे हिंदुस्तानियों की बनाई हुई इमारतों को देखने आते हैं, और आज के हिंदुस्तानियों के बावजूद आते हैं। आज के यहां के लोगों की वजह से नहीं आते, बल्कि उनके बावजूद आते हैं। इस फर्क को बारीकी से समझने की जरूरत है। 
जब आम हिंदुस्तानी अपनी बदतमीजी इस तरह दिखाते चलते हैं, तो वे अगली पीढ़ी को यही सिखाते भी चलते हैं। यहां के लोगों ने पता नहीं यह पढ़ा है या नहीं, कि चीन में वहां की सरकार ने अपने लोगों सेे बाकी दुनिया में खटकने वाली आदतें छुड़वाने के लिए औपचारिक सिखाना शुरू किया है, ताकि वे जहां जाएं वहां चीन के लिए हिकारत पैदा न करें। 
जिंदगी के बहुत छोटे-छोटे से नियम-कायदों को मानने के लिए भारत के भीतर भी उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच एक बड़ा फासला दिखता है। उत्तर को तो मानो किसी को अपनी किसी हरकत पर कोई उत्तर ही नहीं देना है। देश की यह हालत बदलनी जरूरी है, महज तस्वीर बदलने से काम नहीं चलेगा, क्योंकि न सिर्फ विदेशी सैलानी, बल्कि देशी सैलानी भी देश में जिस अंदाज में लूटे जाते हैं, जिस हद तक बदतमीजी झेलते हैं, उससे लोगों का देश के भीतर भी घूमने का उत्साह जाते रहता है। 
ऐसा नहीं कि आम हिंदुस्तानियों में भले लोग नहीं हैं, लेकिन लापरवाह, नासमझ, और बुरे लोग इतने हैं, उनका खटकने वाला बर्ताव इतना है कि किसी तमीजदार का सारा वक्त एक भड़ास में गुजरता है।