गैरजरूरी भड़काने और उकसाने के खतरे

5 दिसम्बर
संपादकीय

अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिए पिछले कुछ हफ्तों में लगातार बयान सामने आ रहे हैं, और आरएसएस सहित बहुत से हिन्दू संगठनों के बयान ऐसे हैं, जिनका कोई नया मतलब नहीं निकलता, सिवाय इसके कि अदालती फैसला आने के बाद मंदिर बनेगा, या मंदिर बनना ही चाहिए, या मंदिर बनाकर रहेंगे, या सर्वसम्मति से मंदिर बनना चाहिए। कुल मिलाकर बात वहीं की वहीं है, और एक मुद्दे को महज कुरेदा जा रहा है, यह साबित करने के लिए कि राम मंदिर का मुद्दा अभी मुद्दा ही है, उसकी समाधि नहीं बनाई गई है। जितनी बातें अशोक सिंघल के गुजरने के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों ने कही है, उनमें न कुछ नया है, और न ही कुछ ठोस है। ये बयान महज अखबारी सुर्खियों के मार्फत इतिहास में यह दर्ज कराने के लिए दिए गए हैं कि किन-किन लोगों ने मंदिर का मुद्दा छोड़ नहीं दिया है। 
अब सवाल यह है कि यह देश और कितने तरह के उकसावे और भड़कावे धर्म के नाम पर बर्दाश्त करे? मंदिर के नाम पर, मस्जिद के नाम पर, हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर, आबादी के नाम पर, धर्मांतरण के नाम पर, आदिवासियों को वनवासी बुलाने की जिद्द के नाम पर, मंदिरों में, दरगाहों पर महिलाओं के दाखिले के नाम पर, दलितों के मंदिर-प्रवेश-रोक के नाम पर, कौन-कौन से गैरजरूरी मुद्दों के उठाकर देश के आगे बढऩे को पटरी से उतारा जा सकता है, इस पर बहुत से लोग और संगठन उतारू हैं। इसलिए उतारू हैं कि उनका खुद का अस्तित्व ऐसे ही मुद्दों को छेडऩे पर कायम रह सकता है। अगर ये मुद्दे बने न रहें, तो किसी को यह याद भी नहीं होगा कि ऐसे बड़बोले नेता, और उनके संगठन जिंदा भी हैं। और एक दूसरी आशंका यह भी है कि अगर ये लोग ऐसी भड़काऊ बातें नहीं करेंगे, तो धर्मांध और कट्टर लोगों से इनको चंदा मिलना भी बंद हो जाएगा। 
और यह बात महज हिंदुस्तान में नहीं है, दुनिया में जगह-जगह नफरतजीवी लोग ऐसा ही भड़काऊ काम करके चंदा पाते हैं, और भड़काऊ काम करके अपने-आपको जिंदा रखते हैं। आज अगर एक धर्म के दंगाजीवी लोग घर बैठ जाएं, तो दूसरे धर्म के हिंसक हमलावरों की दूकान ही बंद हो जाए। मंदिर बनाने को लेकर बिना किसी मतलब और महत्व वाले कुछ बयान आए, तो उसके खिलाफ बयान देते हुए कुछ ऐसे नाम खबरों में आए जो कि शायद बरसों से ताक पर बैठे हुए थे। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा की बातों को भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसी भी भारतीय की बातों के मुकाबले अधिक ध्यान से सुनते हैं। ओबामा ने अमरीका में मुस्लिमों के खिलाफ कही जा रही आक्रामक और हिंसक बातों पर फिक्र जाहिर की है। हमें उम्मीद है कि ओबामा मोदी से फोन पर होने वाली गप-शप के दौरान अपनी इस सोच को भी बांटेंगे कि किसी एक धर्म के खिलाफ अगर देश में हिंसक बातें होती हैं, तो वे देश के हित के खिलाफ जाती हैं, और उनकी प्रतिक्रिया भी होती है। और मोदी जिस अमरीका की तरफ बार-बार देखते हैं, और अपने दोस्त बराक से फोन पर बातें करते रहते हैं, उन नरेन्द्र मोदी को भी चाहिए कि वे ओबामा से पूछें और समझें कि हिंसक बातों के खिलाफ उन्होंने ऐसी फिक्र क्यों जाहिर की है?
हमारा यह मानना है कि जिस देश को आगे बढऩा है, उसे भड़कावे और उकसावे वाली तमाम बातों से अपने को बचाना होगा, क्योंकि इंसानी मिजाज ऐसा है कि एक भड़कावे के खिलाफ दूसरा भड़कावा भड़कने को तैयार बैठे रहता है, बल्कि एक पैर पर खड़े रहता है। मोदी को यह समझना चाहिए कि भारत में आज अहिष्णुता के खतरे जो लोग गिना रहे हैं, वे लोग बदनीयत नहीं हैं, बल्कि वे देश के लिए फिक्रमंद हैं।

डिजिटल छेडख़ानी शोभा नहीं देती भारत सरकार को

संपादकीय
4 दिसंबर 2015
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेन्नई-बाढ़ के हवाई सर्वे की तस्वीर को लेकर भारत सरकार का प्रचार विभाग आलोचना के घेरे में है। हेलीकॉप्टर में बैठे मोदी के साथ की खिड़की की जगह पर डूबे हुए शहर की एक तस्वीर जोड़ दी गई, और उसे इंटरनेट पर जारी कर दिया गया। वैसे तो मीडिया में ऐसी जोड़-तोड़ आए दिन होती है, और मोदी की तस्वीर में यह सरकारी फेरबदल उसी जगह की तस्वीर जोड़कर किया गया था, जिसके साथ आसानी से यह लिखा जा सकता था कि दो तस्वीरें जोड़ी गई हैं। इससे कोई विवाद खड़ा नहीं होता। लेकिन रात-दिन प्रचार की पल-पल की हड़बड़ी ऐसी गलतियां करवा देती हैं। और फिर आज की डिजिटल टेक्नालॉजी में यह काम इतना आसान हो गया है कि फोटो एडिटिंग के एक सबसे लोकप्रिय सॉफ्टवेयर, फोटोशॉप, को अब एक ब्रांड की बजाय एक विशेषण की तरह इस्तेमाल किया जाता है। 
आज ही एक दूसरी खबर यह है कि इंटरनेट पर कुछ दूसरी समाचार वेबसाइटों पर एक विवादास्पद खबर के साथ की तस्वीर किसी एक पत्रकार के फेसबुक अकाउंट से लेकर लगाई गई है, और इस महिला पत्रकार को वहां से अपनी खबर हटवाने के लिए खासी मेहनत करनी पड़ी। यह एक अलग बात है कि भारत में मौजूदा आईटी कानून बहुत ही कड़क है, और किसी के खिलाफ कुछ झूठा छप जाए, उसके मुकाबले डिजिटल तकनीक पर कुछ झूठा पोस्ट हो जाए, तो कई गुना कड़ी सजा की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन लोग अभी भी ऐसे डिजिटल-खतरों को समझ नहीं रहे हैं। हम इसी जगह पर हर कुछ महीनों में इस बारे में लिखते हैं, और ऐसी छेड़छाड़ से परे भी लोगों को इस बात के लिए आगाह करते हैं कि वे बिना जांचे-परखे दूसरे लोगों की जालसाजी को आगे बढ़ाने में मददगार न हों। 
दरअसल मोदी इस देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने डिजिटल तकनीक और संचार माध्यमों का भरपूर इस्तेमाल किया है। उनके साथ-साथ उनके समर्थक, उनके प्रशंसक, और हो सकता है कि उनके कुछ विरोधी भी, लगातार डिजिटल-धोखाधड़ी करते हुए पूरी दुनिया की जगह-जगह की कामयाबी की तस्वीरों को मोदी के गुजरात, या मोदी के कार्यकाल के साथ जोड़कर रात-दिन फैला रहे हैं। नतीजा यह हो रहा है कि ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता कि मोदी-भक्तों का कोई न कोई झूठ उजागर न हो रहा हो।  इससे उन अनजाने भक्तों का तो कोई नुकसान नहीं होता, क्योंकि वे बेचेहरा और बेनाम हैं, लेकिन इससे मोदी का, या वैसे किसी भी दूसरे नेता का बड़ा नुकसान होता है। और जब सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री की हैसियत से, या निजी हैसियत से नरेन्द्र मोदी ऐसे लोगों को ट्विटर पर फॉलो भी करते हैं, तो फिर वे उनकी हरकतों से अनजान रहने का फायदा भी नहीं पा सकते। दूसरे लोगों के गलत कामों से बदनामी पाने से बचने के लिए न सिर्फ प्रधानमंत्री को, बल्कि सार्वजनिक जीवन के और लोगों को भी मेहनत करनी पड़ेगी। सोशल मीडिया महज वाहवाही दिलाए, और बदनामी का खतरा बिल्कुल न दिलाए, ऐसा नहीं हो सकता। 
लेकिन आज की बात हमने जिस मुद्दे से शुरू की है, वह और गंभीर है। जब अनजान लोग डिजिटल-छेड़छाड़ या जालसाजी की तस्वीरें पोस्ट करें, तो वह तो कम खतरनाक मामला है। जब भारत सरकार में बैठे लोग ही ऐसा करने लगें, तो वह अधिक फिक्र की बात है। हम उम्मीद करते हैं कि सूचना प्रसारण मंत्रालय इस चूक को पहली और आखिरी चूक साबित करने की गारंटी करेगा। 

साइकिल की सोच अच्छी पर तैयारी की जरूरत

3 दिसंबर 2015
संपादकीय
रायपुर नगर निगम के महापौर प्रमोद दुबे ने आज से एक नया साइकिल अभियान शुरू किया है कि महीने में एक दिन लोग साइकिल चलाएं। इसके लिए जैसा कि समारोह होता है, हो गया, और अगले महीने कुछ लोगों को शायद यह बात याद रहे, और अधिकतर लोग शायद इसे भूल जाएं, लेकिन यह समझने की जरूरत है कि साइकिल का थोड़ा-बहुत इस्तेमाल जिंदगी के लिए कितना फायदेमंद है। गरीब तो मजबूरी में साइकिल चलाते हैं, क्योंकि उससे अधिक कुछ खरीद और चला पाना उनके बस के बाहर होता है। और संपन्न तबका या तो घर पर कसरत की साइकिल चला लेता है, या फिर महंगी साइकिल लेकर सड़क पर भी शौक से चला लेता है। लेकिन जो सबसे बड़ा मध्यमवर्गीय तबका है, उसमें साइकिल का चलन बहुत कम है। साइकिल को बढ़ावा देने की सोच अच्छी है, लेकिन उसके साथ की दिक्कतों, और उसके खतरों को समझना पड़ेगा। 
आज जितनी लापरवाही से लोग गाडिय़ां चलाते हैं, उस पर राजधानी की पुलिस का भी कोई काबू जब नहीं है, तब यह उम्मीद करना खतरनाक होगा कि लोग साइकिल चलाएंगे, और तेज रफ्तार गाडिय़ां आकर उनके लिए खतरा खड़ा नहीं करेंगी। ऐसी नौबत में लोग अगर पर्यावरण की सोचकर, या अपनी सेहत की सोचकर महीने में एक दिन या हफ्ते में कुछ घंटे साइकिल की सोचें भी, तो भी सड़कें और ट्रैफिक उसके लायक नहीं है। दुनिया के सबसे विकसित शहरों में से एक लंदन में वहां के मेयर ने साइकिलों का ऐसा विशाल ढांचा तैयार किया कि लोग हर महीने एक छोटा सा भाड़ा देकर कहीं से भी साइकिल उठा सकते हैं, और कहीं पर भी छोड़ सकते हैं। लेकिन उसके लिए वहां की सड़कों के किनारे एक साइकिल ट्रैक अलग से रहता है, और यही वजह है कि योरप में लोग खूब साइकिलें चलाते हैं। वहां के सैलानी एक देश से दूसरे देश जाते हुए भी ट्रेन में अपनी साइकिलें ले जाते हैं, और दूसरे देश पहुंचते ही उन पर घूमना शुरू कर देते हैं। अमरीका के भी बहुत से शहरों में सिटी बसों में साइकिलों के लिए अलग से जगह रहती है, और लोग उन पर साइकिल रखकर ले जाते हैं। 
हमने पहले भी एक सुझाव दिया था कि राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को हर तरह की साइकिलों पर से हर तरह का टैक्स हटा देना चाहिए। उससे गरीब को एक राहत मिलेगी, और जो लोग महंगी साइकिलें खरीदते हैं, हो सकता है वे अपनी महंगी गाडिय़ों को कुछ देर राहत दें, और उससे सड़कों पर भीड़ और प्रदूषण घटेंगे। दूसरा इंतजाम राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं को करना पड़ेगा कि सार्वजनिक जगहों पर साइकिलों को बांधकर ताला लगाने के लिए लोहे के पुराने परंपरागत ढांचे बनाकर रखे जाएं, ताकि लोग साइकिल रखने का हौसला कर सकें। इसके बिना लोग साइकिल लेकर निकल भी जाएं, तो उसके चोरी हो जाने का खतरा बने रहेगा। आज सार्वजनिक जगहों पर साइकिल रखने का इंतजाम सबसे ही कमजोर रखा जाता है क्योंकि कोई ताकतवर लोग तो साइकिल पर आते नहीं हैं। जिस तरह शहर में अलग-अलग खेलों के मैदान या स्टेडियम हैं, उसी तरह एक साइकिल ट्रैक बनाना चाहिए जिस पर खिलाड़ी और आम लोग साइकिल चलाने का अपना शौक पूरा कर सकें, और उससे धीरे-धीरे सड़कों पर भी साइकिल की उनकी आदत बने।
हम इसे एक अच्छी शुरुआत मानते हैं, और लोगों को इससे जुडऩा चाहिए। साथ ही यह बात अकेले रायपुर शहर तक सीमित रहने से नहीं बनेगी, इसमें राज्य सरकार को बाकी प्रदेश के लिए भी बुनियादी सहूलियतें जुटानी चाहिए। और सबसे पहले शुरुआत तो सरकार साइकिल टैक्स खत्म करके कर ही सकती है। 

चेन्नई या मुंबई की बाढ़ से तबाही, सीखने की जरूरत

संपादकीय
2 दिसंबर 2015

तमिलनाडू से राजधानी चेन्नई के बारिश और बाढ़ में बुरी तरह डूब जाने की खबरें आ रही हैं, और अभी वहां अगले दो-तीन दिन बारिश और जारी रहने की चेतावनी भी मौसम विभाग ने दी है। पिछले कई दिनों से तमिलनाडू में बारिश और बाढ़ से बड़ी संख्या में लोग मारे गए, और चेन्नई शहर खासकर बुरी तरह प्रभावित हुआ। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले मुंबई शहर इसी तरह डूबा था, और इमारतों के तलघर तो पूरी तरह डूब ही गए थे, ग्राउंड फ्लोर पर भी कई फीट पानी भर गया था, आज चेन्नई का हाल उससे भी बुरा दिख रहा है। अब यहां पर दो-चार बातों को मिलाकर सोचने की जरूरत है, और इन महानगरों से परे भी बाकी देश में भी इस बारे में सोचना चाहिए। 
जहां-जहां शहरीकरण हो रहा है, वहां-वहां पानी को सोखने लायक खुली जमीन तेजी से खत्म हो रही है, और कांक्रीट के ढांचे बारिश के पानी को सिर्फ इक_ा कर पाते हैं, निकाल नहीं पाते। फिर जैसा कि मुंबई के मामले में सामने आया था, वहां पर सारी भूमिगत नालियां प्लास्टिक के कचरे से पूरी तरह बंद थीं, और पानी के निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा था। देश भर में जगह-जगह शहरीकरण से जो कचरा इक_ा हो रहा है, उसकी रफ्तार बढ़ती चल रही है, दूसरी तरफ पानी के निकलने के जो पुराने नाले-नालियां हैं, वे कचरे से बंद होते चल रहे हैं। शहरीकरण में जो नए इलाके विकसित हो रहे हैं, ताकतवर और संपन्न तबका वहीं बस रहा है, और वहां पर तो पानी आने-जाने के रास्ते ठीक है, लेकिन पुराने इलाके हर शहरों में डूब रहे हैं, बारिश के पानी भी डूब रहे हैं, और ताजा कचरे में भी डूब रहे हैं। 
अब यहां पर यह भी सोचने की जरूरत है कि लोग कितना कचरा इक_ा करते हैं, उसे कैसे फेंकते हैं, और उसके निपटारे का स्थानीय म्युनिसिपल के पास क्या तरीका है? यहां पर तस्वीर बड़ी निराशाजनक है, क्योंकि बढ़ती आबादी, बढ़ती संपन्नता, और बढ़ते कचरे की रफ्तार से निपटारे की पुरानी रफ्तार का कोई मेल नहीं बैठता। दूसरी बात यह कि मौसम अब अधिक दगाबाज हो गया है। बारिश के ही नहीं, गर्मी और सर्दी के मौसम भी अपनी तेज मार के नए रिकॉर्ड कायम कर रहे हैं। मौसम का जो सर्वाधिक रिकॉर्ड रहते आया था, वह अब बदल भी रहा है, और अब जरा सी देर में बहुत तेज बारिश होकर किसी भी शहर को डुबा देती है। इस मौसम में कोई बदलाव लाना पूरी दुनिया के सामूहिक सहयोग से हो सकता है, लेकिन वह किसी शहर के बस की बात नहीं है। इसलिए यह समझने की जरूरत है कि शहरीकरण की योजनाएं मौसम की अभूतपूर्व बुरी मार का अंदाज लगाकर ही बनाई जाएं, न कि पुराने रिकॉर्ड देखकर। मौसम ने इंसानों से कोई रिश्वत नहीं खाई हुई है कि वह उस पर हमेशा मेहरबान रहे, और खासकर जब इंसान कुदरत पर कूद-कूदकर लात मारते हों, तो कुदरत की क्या बेबसी है कि वह इंसान पर मेहरबान रहे? 
शहरीकरण की तेज रफ्तार और उसका विकराल आकार स्थानीय म्युनिसिपल की सोच और उसकी कूबत दोनों से परे की बात हो चुके हैं। अब शहरी कचरे के तेज रफ्तार निपटारे के साथ-साथ, शहरों से पानी की तेज रफ्तार निकासी का इंतजाम जब तक नहीं किया जाएगा, देश के शहर कभी भी डूब जाएंगे, और अगली बारिश आने तक भी लोगों के निजी नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी। मुंबई या चेन्नई में जिन लोगों के घर कई-कई फीट पानी में डूबे हुए हैं, उनके सामानों का जो नुकसान सूखने तक हो चुका रहेगा, उससे लोग उबर नहीं पाएंगे। देश की सरकार, राज्यों की सरकारें, और शहरों की म्युनिसिपालिटी टुकड़े-टुकड़े में सोच रही हैं, और टुकड़े-टुकड़े में योजनाएं बना रही हैं। कुदरत की मार से निपटने के लिए इस तरह के काम से काम नहीं चलेगा। लोगों को यह भी याद रखना पड़ेगा कि अब महज हर बरस की बाढ़ वाले इलाकों में ही बाढ़ नहीं आती, अब तो नए-नए किसी भी इलाके में कितनी भी बाढ़ आ जाती है, और हर किसी को ऐसी नौबत के लिए तैयार रहना पड़ेगा, और इसकी बुनियादी जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर है।

झूठ को फैलाना भी आसान और झूठ को परख लेना भी

संपादकीय
1 दिसंबर 2015

लोकसभा में कल वामपंथी सांसद मोहम्मद सलीम ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर कहा था कि 8 सौ बरस बाद भारत को एक हिन्दू राजा मिला है। राजनाथ सिंह ने इसे अपने संसदीय जीवन का सबसे तकलीफदेह दिन बतलाया, और कहा कि अगर उन्होंने ऐसा बयान दिया होता, तो वे एक पल भी भारत के गृहमंत्री रहने के लायक नहीं रहते। दरअसल मोहम्मद सलीम ने आउटलुक पत्रिका के ताजा अंक में छपी एक रिपोर्ट में राजनाथ सिंह के नाम से लिखे गए इस बयान को देखकर संसद में मुद्दा उठाया था, और यह बयान दरअसल विश्व हिन्दू परिषद के गुजर चुके अध्यक्ष अशोक सिंघल ने दिया था, राजनाथ सिंह ने नहीं। पत्रिका ने इस बात के लिए गृहमंत्री से माफी मांगी है, लेकिन वामपंथी सांसद ने इस पर माफी मांगने से इंकार कर दिया है, उनका कहना है कि उनकी बात सदन की कार्रवाई में शामिल ही नहीं की गई थी, इसलिए उनके लिए माफी मांगना जरूरी नहीं है। 
वैसे तो पत्रिका के माफीनामे के बाद यह बात आई-गई हो जाती है, लेकिन हम इस मुद्दे पर चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि आज लोगों के नाम से सौ तरह की बातें प्रचार पाती हैं, जिनमें से कुछ बातें उनकी कही हुई होती हैं, और कई बातें उनकी कही हुई नहीं होतीं। आज के डिजिटल युग में यह आसान है कि किसी भी बात के सच या झूठ होने के लिए इंटरनेट पर उसे तलाश लिया जाए, और अधिकतर बातों की परख भी हो जाती है, लेकिन संसद में किसी मुद्दे को उठाने के पहले लोगों को इतनी मामूली छानबीन इसलिए कर लेनी चाहिए कि झूठ होने पर न सिर्फ किसी और की साख चौपट होती है, बल्कि अपनी खुद की साख भी खराब होती है। और संसद का महंगा वक्त भी जाया होता है। यह एक अलग बात है कि जब राजनाथ सिंह के समविचारक अशोक सिंघल ने ऐसी बात कही थी, तो राजनाथ सिंह ने शायद उसका कोई विरोध भी नहीं किया था, लेकिन उतने भर से उनकी न कही बात उनके नाम से जोडऩा पूरी तरह नाजायज है। 
आज लोग धड़ल्ले से झूठी तस्वीरें, झूठी जानकारी, झूठे बयान गढ़कर, डिजाइन करके, इंटरनेट और फोन पर चारों तरफ फैलाने में लगे रहते हैं। लोगों को कोई भी जानकारी आगे बढ़ाने के पहले उसकी सच्चाई को खुद भी परख लेना चाहिए, क्योंकि झूठ जब पकड़ाता है, तो उसे फैलाने वाले तमाम लोगों की साख भी चौपट होती है। यह बात हम संसद से परे भी इसी जगह कई बार लिख चुके हैं कि टेक्नालॉजी जितनी सहज और आसान हो गई है, बातों को फैलाना जितना सरल हो गया है, उनको परखने की जिम्मेदारी उतनी ही बड़ी हो गई है। आज जो लोग किसी विचारधारा के बड़े समर्थक हैं, या बड़े विरोधी हैं, वे सच और झूठ की परवाह किए बिना अपनी पसंद की जानकारी को फैलाते चलते हैं। इन लोगों को यह भी समझना चाहिए कि झूठ के सहारे कोई लंबी लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती, और जब कतरा-कतरा झूठ भी पकड़ में आ जाता है, तो उससे अच्छे-भले मुद्दे भी चौपट हो जाते हैं। बहुत पहले कुछ महान लोगों ने यह बात कही थी कि मकसद ही नहीं, राह भी सही होनी चाहिए। इस बात को आज के सोशल मीडिया के जमाने में खास याद रखने की जरूरत है कि जो लोग किसी मकसद से झूठ पोस्ट करते हैं, वे सबसे पहले तो अपने मकसद को ही हरा देते हैं। जिस किसी मकसद के साथ झूठे लोग जुड़ जाते हैं, लापरवाह जुड़ जाते हैं, उस मकसद को विरोधियों या दुश्मनों की जरूरत ही नहीं रहती, ऐसे झूठे साथी ही काफी रहते हैं। 
आज इंटरनेट पर मामूली तलाश से ही किसी बात की सच्चाई की परख हो सकती है। लोगों को, खासकर जिम्मेदार लोगों को ऐसी जिम्मेदार सोच को बढ़ावा देना चाहिए, और अपने इर्द-गिर्द के लोगों को यह समझाना भी चाहिए कि वे किस लापरवाही से किस झूठ को फैला रहे हैं, और एक दिन ऐसा भी हो सकता है कि वे खुद, उनका परिवार ऐसे किसी झूठे प्रचार का शिकार हो जाएं। 

मंदिर से लेकर दरगाह तक दुत्कारी जा रही हैं महिलाएं

संपादकीय
30 नवंबर 2015

अभी दक्षिण भारत का एक मंदिर खबरों में बना ही हुआ था कि वहां पर महिलाओं को माहवारी के दौरान घुसने से किस तरह रोका जा रहा है, कि इसी दौरान कल महाराष्ट्र के एक प्रमुख मंदिर शनि शिंगणापुर की खबर आई कि वहां परंपरा के खिलाफ जाकर एक महिला ने शनि प्रतिमा पर तेल चढ़ा दिया, और वहां से निकल गई। इसके बाद मंदिर के सेवादारों को निलंबित कर दिया गया है, और मूर्ति के शुद्धिकरण में भक्तजन और पुजारी जुट गए हैं। यह बात सिर्फ इन्हीं गिने-चुने मंदिरों की नहीं है, देश में जगह-जगह कई मंदिरों में ऐसा हाल है, और नए बने हुए ताजा मंदिरों में स्वामिनारायण सम्प्रदाय के मंदिर या आश्रम का हाल है जहां स्वामी के सामने महिलाओं को जाने की इजाजत भी नहीं है, और उन्हें इस तरह दूर रखा जाता है कि वहां के स्वामी की नजर भी महिलाओं पर न पड़े। लेकिन यह मामला सिर्फ हिन्दू धर्मस्थलों का हो ऐसा भी नहीं है। अभी मुंबई हाईकोर्ट में यह केस चल ही रहा है कि वहां की प्रमुख और एक विख्यात हाजी अली दरगाह पर महिलाओं को जाने नहीं मिलता। दरगाह ट्रस्ट ने हाईकोर्ट में यह तर्क दिया है कि इस्लाम में महिलाओं का कब्र के करीब जाना गुनाह माना गया है, और उन्हें दूर से ही कब्र देखने की इजाजत है। 
हम हिन्दू या मुस्लिम धर्म की बात किए बिना मोटे तौर पर धर्मों के नजरिए की बात करते हैं जो कि महिलाओं को, नीची करार दी गई जातियों, गरीबों, या कमजोर लोगों के खिलाफ रहता है। धर्म ताकतवर को सलाम करता है, और कमजोरों को दुत्कारता है। धर्म को इसी हिसाब से, और इसीलिए ही बनाया गया था, और वह आज हजारों बरस बाद भी इस मकसद को एक वफादार औजार या हथियार की तरह पूरा कर रहा है। लेकिन दिक्कत यह है कि हिन्दू समाज में जिन दलितों को दुत्कारा जाता है, जिनके मंदिर घुसने पर उन्हें मार दिया जाता है, जिन्हें गैरदलित-ऊंची कही जाने वाली जातियों के लोग छूते भी नहीं हैं, उन्हीं के हिन्दू धर्म में शामिल बने रहने के लिए बहुत से दलित मरे पड़े रहते हैं। होना तो यह चाहिए कि दलित ऐसे धर्म का धिक्कार करें, जो कि उनको लात मारता है। लेकिन सैकड़ों पीढिय़ों से धर्म की जो दहशत चली आ रही है, उससे न दलित आजाद हो पाते, न ही महिलाएं आजाद हो पातीं। हिन्दू धर्म में तो अधिकांश धार्मिक कर्मकांड का बोझ महिलाओं पर ही रहता है, और बहुत से त्यौहारों पर वे कई गुना अधिक काम करती हैं, और पति के लिए भूखे रहकर उपवास भी करती हैं। हिन्दू धर्म का कोई रीति-रिवाज यह समानता नहीं बताता कि कभी आदमी भी अपनी औरत के लिए उपवास करे।
आज समाज में उन तमाम तबकों में एक जागरूकता की जरूरत है जो कि धर्म के मारे हुए जख्मी हैं। मुस्लिम समाज में धर्म का नाम लेकर महिलाओं के साथ जो गैरबराबरी होती है, उससे भी मुस्लिम महिलाओं को बाहर निकलने की जरूरत है। इस देश में सुप्रीम कोर्ट ने एक समय शाहबानो को उसका हक दिलाने का फैसला दिया था, और राजीव गांधी की ताकतवर सरकार ने अपने संसदीय बाहुबल का बेजा इस्तेमाल करके कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। आज एक बार फिर अदालत से लेकर मुस्लिम समाज तक यह चर्चा उठ रही है कि मुस्लिम आदमी को एक से अधिक शादी की छूट, और अपनी बीवी को तीन शब्दों के तलाक से छोड़ देने की छूट का क्या किया जाए? अभी देश की कुछ अदालतों ने ये सवाल उठाए हैं कि केन्द्र सरकार को इस बारे में इसलिए सोचना चाहिए कि मुस्लिम महिला भी इस देश की नागरिक है और उसके बुनियादी अधिकारों को मुस्लिम विवाह कानून कुचलता है। 
भारत में आज माहौल गर्म है। ऐसे में हर तबके के भीतर के लोगों को ही अपने सामाजिक सुधार के लिए आगे आना पड़ेगा, और आवाज उठानी पड़ेगी। आज समाज के किसी दूसरे तबके के लोग अगर समाज सुधार सिखाना चाहेंगे, तो उसका भारी विरोध होने लगेगा, और विपरीत प्रतिक्रिया होगी। राजा राममोहन राय ही सतीप्रथा के खिलाफ सामाजिक आंदोलन चला पाए थे, कोई मुस्लिम वह काम नहीं कर सकता था। इसी तरह मुस्लिम समाज में जो सुधार जरूरी हैं, जो लोकतांत्रिक बराबरी जरूरी है, उसके लिए मुस्लिमों के बीच से ही आवाज उठनी जरूरी है। मंदिर हो या दरगाह, वहां पर बराबरी के लिए बात होनी चाहिए, और जो धर्म के ठेकेदार हैं, उनको भी बदलते हुए वक्त की हवा देखकर एक उदारता सीखनी चाहिए। हमारा तो यह मानना है कि महिलाएं हों या दलित, जिसको भी दुत्कारा जाता है, उनको धर्म से परे देखना और सोचना चाहिए, जब धर्म अपनी आबादी खोने लगेंगे, तो ही अपने आपको सुधारेंगे। 

नेताओं को ईमानदार अफसर विपक्ष में रहने तक सुहाते हैं

संपादकीय
29 नवंबर 2015
हरियाणा में एक बड़बोले मंत्री ने जिले की एक बैठक में शराब की अवैध बिक्री को लेकर सवाल-जवाब के दौरान वहां की महिला पुलिस अधीक्षक को बैठक से निकल जाने के लिए कहा। इस बदतमीजी के जवाब में अफसर ने बैठक से जाने से इंकार कर दिया तो मंत्री खुद ही अपने समर्थकों सहित वहां से निकल गए। चौबीस घंटे के भीतर इस दलित महिला आईपीएस का तबादला कर दिया गया। चूंकि यह पूरा मामला वीडियो रिकॉर्डिंग की शक्ल में इंटरनेट और टीवी पर मौजूद है, इसलिए देश भर में इसे लेकर हरियाणा की खट्टर सरकार की धिक्कार हो रही है। लेकिन हमको इसमें हैरानी की कोई बात नहीं लगती। ये मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ही हैं जिनका एक बयान महिलाओं को लेकर कुछ समय पहले आया था कि अगर महिलाओं को आजादी चाहिए, तो वे बिना कपड़ों के क्यों नहीं घूमतीं? 
हरियाणा में एक तरफ तो खाप पंचायतों की दकियानूसी सोच हमेशा ही खबरें खड़ी करती रहती है, दूसरी तरफ वहां महिलाओं की समाज में जगह इससे भी पता लगती है कि देश में लड़के-लड़कियों का अनुपात सबसे खराब हरियाणा में ही है, वहां के लोग बेटियों को जन्म के पहले ही मार डालने के आरोप झेलते हैं, और बाद में अपने बेटों के लिए दूसरे प्रदेशों से लड़कियां तरह-तरह से जुटाने की तोहमत भी उन पर लगती है। यह ऐसा प्रदेश भी है जहां की लड़कियां, जब उनको मौका मिलता है, वे दुनिया भर के खेल मुकाबलों से मैडल लेकर आती हैं। लेकिन यह प्रदेश लड़कियों को बराबरी का हक देना तो दूर रहा, उनको इंसान मानने से भी इंकार करने वाले प्रदेशों में माना जाता है, और हरियाणा की खाप पंचायतों की हत्यारी सोच के खिलाफ लगातार लिखा भी जाता है। दूसरी तरफ राजनीतिक ताकतें हैं जो कि अपने वोटों के लिए इन खाप पंचायतों के खिलाफ मुंह खोलने से भी डरती हैं, और कांग्रेस हो या भाजपा वे खाप पंचायतों को जिंदा रखना चाहती हैं, साथ रखना चाहती हैं। और तो और इंदिरा और सोनिया की पार्टी के पिछले कांग्रेसी मुख्यमंत्री खाप पंचायतों का गुणगान करते थकते नहीं थे, जब इन पंचायतों पर हत्या के फतवे जारी करने, हत्याएं करवाने जैसे आरोप लगे थे। 
अब यहां पर दो सवाल और है, एक तो दलित लड़की अपने दम पर आईपीएस बन रही है, और उसके अच्छे काम की चारों तरफ चर्चा भी है। ऐसे में एक बदतमीज मंत्री भीड़भरी बैठक में उससे बदसलूकी करता है, और लोकतंत्र में मिले अधिकारों के तहत सरकार उस अफसर को हटा भी देती है। लोगों को याद होगा कि इसी हरियाणा में जब एक दूसरे ईमानदार कहे जाने वाले खेमका नाम के आईएएस ने रॉबर्ट वाड्रा की जमीनों के मामलों में सरकारी मेहरबानी का भांडाफोड़ किया था, तो भाजपा ने देश भर में उसे चुनावी मुद्दा बनाया था। इसके बाद हरियाणा में भाजपा की सरकार बनी, और खेमका को उठाकर ऐसे हाशिए पर फेंका गया, कि आज उनका ओहदा भी किसी को याद नहीं है। अच्छे अफसरों को लेकर राजनीतिक दल तब तक ही खुश रहते हैं, जब तक कि वे अफसर उनके मातहत न हों। जब कड़क या ईमानदार अफसरों से काम लेना हो, तो राजनीतिक ताकतें उनकी जगह भ्रष्ट अफसर चाहती हैं, ताकि गलत काम कर चुके अफसरों से और गलत काम आसानी से कराए जा सकें। 
देश भर में राजनीतिक और सामाजिक ताकतों को एक काबिल और ईमानदार दलित महिला अफसर के साथ ऐसे सुलूक को लेकर एक सामाजिक जनजागरण अभियान छेडऩा चाहिए, और चाहे जो भी पार्टी ऐसा करे, उसे जगह-जगह धिक्कारना चाहिए। 

एक भाषण कड़वाहट ऐसे घटा सकता है

संपादकीय
28 नवंबर 2015

कल लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संविधान पर चर्चा के दौरान गरिमापूर्ण तरीके से आंबेडकर से लेकर नेहरू तक के योगदान का जिक्र किया और संसद में पक्ष, विपक्ष के बीच जमी हुई बर्फ को तोड़ा। शायद इसीलिए संसद के बाद शाम को सोनिया-मनमोहन चाय के उनके न्यौते पर गए, और कुछ विधेयकों पर बात हुई। सोशल मीडिया पर भी मोदी के कटु-आलोचकों और निंदकों ने उनके भाषण की तारीफ की। इस एक भाषण से देश की संंसदीय राजनीति में अनबोला खत्म सा हुआ और उम्मीद की जा सकती है कि संसद के इस जारी सत्र में कुछ काम हो सकेगा। लोग अगर याद करें तो इसके एक ही दिन पहले वित्तमंत्री अरूण जेटली ने संसद में कांग्रेस को आपातकाल को लेकर जी-भरकर कोसा और धिक्कारा था, जबकि उन्हें ही जीएसटी विधेयक पर कांग्रेस के साथ की जरूरत भी है। मोदी ने कल दरियादिली की बातें करके बात संभाली और बातचीत की संभावना फिर कायम की।
हमारा हमेशा से यही कहना रहा है कि संसद में अनबोले जैसा माहौल अलोकतांत्रिक रहता है और देश की जनता के साथ बेईमानी भी रहता है। जनता तो पांच बरस के लिए चुनकर जब भेज देती है तो वह संसद में गतिरोध के बाद भी सांसदों को वापिस तो बुला नहीं सकती। नतीजा यह होता है कि बिना काम खाने-कमाने वाले सांसदों की रियायती थाली देख-देखकर जनता उन्हें कोसती है। कल प्रधानमंत्री ने जो किया वह पहल वे पिछले सत्र में करते तो देश का इतना नुकसान नहीं होता। एक भाषण से कड़वाहट कैसेकम हो सकती है यह कल संसद में साबित हुआ है।
राजनीति के बारे में कहा जाता है कि उसमें न कोई स्थायी मित्र होते और न ही स्थायी शत्रु, और इसी सोचके साथ भारत में तालमेल की जरूरत है। पार्टियों के बीच सैद्धांतिक, नीतिगत, या मुद्दों पर असहमति तो बनी रहेगी, लेकिन बातचीतया बहस का रिश्ता टूट जाना अलोकतांत्रिक होता है। सभी पार्टियों को अपनी अकड़ और दूसरों की हेठी से अधिक देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी की फिक्र करनी चाहिए।  

गरीब आबादी की पढ़ाई और इलाज बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता

27 नवंबर 2015
संपादकीय
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन अभी-अभी एक इंटरव्यू में भारत के मौजूदा हाल को लेकर कहा है कि दुनिया का कोई भी देश अपने लोगों को बुनियादी रूप से आगे बढ़ाए बिना, उनकी प्राथमिक जरूरतों को पूरा किए बिना, उनकी पढ़ाई और इलाज का इंतजाम किए बिना आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने दुनिया के कई देशों की मिसाल देते हुए भारत को इस बारे में आगाह किया कि अगर वह एक आर्थिक ताकत बनना चाहता है तो अशिक्षित और बीमार, कमजोर आबादी के साथ वह कभी इस मंजिल पर नहीं पहुंच सकता। अमर्त्य सेन को गरीबों का हिमायती, और जनकल्याणकारी योजनाओं की वकालत करने वाला अर्थशास्त्री माना जाता है, और भारत के पूंजीवादी लोग उनकी सामाजिक सोच से गहरी असहमति रखते हैं। भारत में पिछली सरकार से लेकर इस सरकार तक ऐसे लोग कम नहीं हैं जो कि यह मानते हैं कि सामाजिक क्षेत्र में सरकार द्वारा दी गई सबसिडी से देश की आर्थिक हालत तबाह हो रही है। लेकिन अमर्त्य सेन का सोचना अलग है। सबसे गरीबों के आर्थिक और सामाजिक विकास को जरूरी बताने के साथ-साथ अमत्र्य सेन ने यह भी कहा कि जैसा कि अभी आरबीआई गवर्नर ने कहा है, देश में सहिष्णुता भी विकास के लिए जरूरी है।
हम अमर्त्य सेन की बातों से सहमत हैं, और पूंजीवाद को उनकी सोच में यह खोट दिख सकती है कि समाज कल्याण में और गरीबों को रियायत में सरकारी पैसे की बर्बादी बहुत होती है। ऐसा मानने वाले लोग भी कम नहीं हैं कि सबसिडी का अधिकांश हिस्सा चोरी में चले जाता है। लेकिन हमारा सवाल यह है कि ऐसी चोरी करने वालों में उन लोगों का तो कोई योगदान नहीं रहता जो कि इन रियायतों के असली हकदार हैं। जो गैरगरीब लोग सरकार में हैं, वे ही चोरी करते हैं, और चूंकि सरकारी चोरी को रोकने में लोग नाकाम रहते हैं, इसलिए इसे सबसिडी के खिलाफ एक तर्क बनाकर इस्तेमाल कर लिया जाता है।
हम अभी-अभी संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट का जिक्र करना चाहेेंगे जो बताती है कि कुछ दशकों के भीतर ही, 2050 तक दुनिया में कामकाजी लोगों की कमी पडऩे लगेगी। और इस रिपोर्ट के आकड़े अगर देखें, तो यह साफ है कि भारत की आबादी उसका बोझ नहीं है, वह उसकी दौलत है। अगर वह सेहतमंद रहे, और अगर वह पढ़ी-लिखी रहे, प्रशिक्षित रहे, हुनर सीखी हुई रहे, तो वह पूरी दुनिया में कमाकर देश का घर भर सकती है। 
इस रिपोर्ट के मुताबिक- एक तरफ भारत जैसे देश में सरकारी मेहनत से आबादी को काबू में रखने की भरसक कोशिश चल रही है और इसे एक आबादी-बम करार दिया जा रहा है कि भारत में लोगों के रहने-खाने को जगह नहीं बचेगी। दूसरी तरफ आने वाले बरसों को लेकर संयुक्त राष्ट्र का एक अंदाज यह है कि दुनिया एक दूसरे किस्म के आबादी-बम पर बैठी हुई है, और वह है घटती हुई आबादी का। विशेषज्ञों का एक अनुमान यह है कि 2050 में काम करने वाले लोग बहुत कम रह जाएंगे और वह दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी समस्या होगी। 
अमरीका के कारोबारी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल में छपी एक रिपोर्ट में आबादी के भविष्य के आंकड़े पेश किए गए हैं। उनके मुताबिक अगला बरस ही दुनिया के विकसित देशों के लिए ऐसा पहला बरस होने जा रहा है जब वहां की कामकाजी आबादी 1950 के मुकाबले कम रह जाएगी। और एक अंदाज है कि 2050 तक यह कामकाजी आबादी 5 फीसदी घट जाएगी। चीन और रूस जैसे बढ़ते हुए बाजारों मेें भी कामगारों की कमी होने लगेगी, और उसी दौर में इन देशों में 65 से अधिक उम्र वाली आबादी आसमान छूने लगेगी। मतलब यह कि दुनिया की सबसे संपन्न अर्थव्यवस्थाएं कामगारों को तरस जाएंगी। 
हम अमर्त्य सेन की सोच, और संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों को मिलाकर देखें तो यह साफ-साफ तस्वीर उभरती है कि भारत के लोगों को काबिल बनाकर, सेहतमंद बनाकर यह देश आगे बढ़ सकता है, और ऐसा होने पर ही आगे बढ़ सकता है। इसके बिना दुनिया की कोई भी बड़ी अर्थव्यवस्था कभी आगे नहीं बढ़ी है। इसलिए इस देश के गरीब तबके की बुनियादी जरूरतों को पूरा करके उनका जीवनस्तर एक न्यूनतम सीमा के ऊपर लाना जरूरी है, और पांच-पांच बरसों में बंटे हुए जिन वित्तमंत्रियों को यह बोझ लगता है, वे लोग देश के भविष्य को अनदेखा करने के कुसूरवार के रूप में इतिहास में दर्ज होंगे।

कुचले जा रहे संविधान के बीच समारोह गैरजरूरी, नाजायज

संपादकीय
26 नवंबर 2015

संविधान दिवस पर आज प्रधानमंत्री से लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री तक संविधान की तारीफ में, और उसके प्रमुख-निर्माता डॉ. बाबा साहब आंबेडकर के तारीफ में संसद और बाहर बड़ी-बड़ी बातें बोल रहे थे। आज के इस सालाना जलसे में ऐसी बहुत सी बातें और कही जाएंगी, जिन पर अमल न तो इन शब्दों के पहले हो रहा है, और न ही इन शब्दों के बाद। यह एक बड़ी अजीब सी हिन्दुस्तानी बात है कि महान लोगों को याद करते हुए, शहीदों को याद करते हुए, उनके बारे में महानता की वे तमाम बातें कही जाती हैं, जिनमें से किसी पर अमल करने की न नीयत होती है, न वैसा बर्ताव होता है। जब मोदी विदेशों में गांधी को याद करते हैं, तो हिन्दुस्तान में गोडसे की पूजा करने की कोशिश होती है, और उसका कोई विरोध मोदी की तरफ से नहीं होता। इसी तरह जब आज इस देश में जगह-जगह दलितों से बलात्कार हो रहा है, उनकी हत्या हो रही है, उन्हें मंदिरों में घुसने से रोका जा रहा है, और खासकर भाजपा के राज वाले मध्यप्रदेश में ऐसी घटनाएं सबसे अधिक हो रही हैं, तब इन पर कुछ भी न बोलकर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री आज संविधान के बारे में जितना कुछ भी कहें, उन बातों का कोई वजन नहीं लगता। और आज संसद में आंबेडकर का इस्तेमाल गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने असहिष्णुता पर फिक्र करने वाले आमिर खान पर हमला करने के लिए भी कर लिया, और कहा कि उपेक्षा के बावजूद आंबेडकर ने देश छोडऩे की बात कभी नहीं कही। 
आज भारत में संविधान के शब्दों और उसकी भावना को जिस तरह और जिस हद तक कुचला जा रहा है, उस पर चुप्पी रखकर, उसे एक अपवाद साबित करने की कोशिश करके संविधान का जलसा बिल्कुल ही बेमानी है। आज इस लोकतंत्र में अगर किसी दस्तावेज की भावना को उस पर चढ़कर कूद-कूदकर कुचला जा रहा है, रौंदा जा रहा है, तो वह संविधान ही है। और यह बात अगर शब्दों से परे असल जिंदगी में हो, तो संविधान की लुग्दी ही बन चुकी होती। आज का यह जलसा, आज का संविधान दिवस लोगों को उनके कुचले जा रहे संवैधानिक अधिकारों की याद अधिक दिला रहा है। ऐसे हर सालाना जलसे लोगों को नाम से परे असल हालत की याद अधिक दिलाते हैं। 
कभी गांधी, कभी भगत सिंह, कभी सरदार पटेल, और कभी विवेकानंद, ऐसे लोगों के नाम और चेहरों का इस्तेमाल करके जब लोग और संगठन एक नाजायज सम्मान पाने की कोशिश करते हैं, तो आम लोग तो उस झांसे में आ जाते हैं, लेकिन जो जागरूक लोग हैं वे ऐसी कोशिश के भीतर के विरोधाभास को तुरंत समझ लेते हैं। लोगों को ऐसे लोगों की लिखी और कही हुई बातें एक बार फिर ढूंढने की जरूरत महसूस होती है, और लोग यहां तक निकाल लेते हैं कि सावरकर ने गाय को खाने से परहेज को कैसे गलत करार दिया था। आज का संविधान दिवस इस देश में बिल्कुल ही खोखला और गैरजरूरी है। देश की नौबत इतनी खराब है, खास और आम के बीच का फर्क इतना अधिक हो गया है, कि संविधान के रास्ते से पाई हुई ताकत से लोग बाकी लोगों के संवैधानिक अधिकारों को कुचलने का काम कर रहे हैं। जिस देश में साल के बाकी तमाम दिन, और संविधान दिवस के दिन समारोह से परे के बाकी तमाम घंटे देश के सबसे कमजोर तबकों, अल्पसंख्यकों, आम लोगों के अधिकारों की हत्या के हों, वहां पर संविधान दिवस निहायत गैरजरूरी, नाजायज, और चुभने वाला समारोह है। इसे मनाने वाले लोग अगर ईमानदार हैं तो उन्हें संविधान के शब्द और उसकी भावना का सम्मान करना सीखना चाहिए।