दिल्ली-प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई से जागने की जरूरत

संपादकीय
16 दिसंबर 2015
दिल्ली के प्रदूषण से दहशत में आकर सुप्रीम कोर्ट कई तरह के अभूतपूर्व फैसले ले रहा है। उधर दिल्ली सरकार अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर कई तरह की कोशिशें कर रही है, और केन्द्र सरकार के सीधे करने का इस मौके पर कुछ दिख नहीं रहा है। देश के पर्यावरण को लेकर बनाई गई एक संवैधानिक संस्था, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, ने दिल्ली में गाडिय़ों को लेकर, खरीद-बिक्री, आवाजाही, डीजल-पेट्रोल के मुद्दों पर कई तरह के आदेश दिए हैं। और दिल्ली में प्रदूषण के स्तर से इन तमाम संस्थाओं की प्रतिक्रिया वैसी ही है कि नींद से जागकर कोई देखे कि घर में आग लगी हुई है। पिछले कई बरसों से सुप्रीम कोर्ट और केन्द्र-राज्य सरकारें दिल्ली के प्रदूषण को देखते आ रही हैं, लेकिन अब तक जो फैसले लिए गए, उनके बाद आज हड़बड़ाकर आग बुझाने जैसा काम करना पड़ रहा है। 
लेकिन खैर यह तो दिल्ली है जहां कि देश की सबसे बड़ी अदालत बसती है, जहां देश की संसद चलती है, और जहां से देश की सरकार काम करती है। लेकिन इससे परे हिन्दुस्तान के सैकड़ों ऐसे शहर हैं जो कि इसी तरह प्रदूषित हैं, और जहां कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। फिर यह प्रदूषण सिर्फ हवा का नहीं है, पानी का भी है, शोर का भी है, और कारखानों की चिमनी से निकलकर खेतों की मिट्टी पर फैला हुआ भी है। इस मोर्चे पर देश भर में सरकारों की हालत बहुत ही खराब है। भोपाल में अभी पिछले हफ्ते ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की क्षेत्रीय शाखा ने शादी-ब्याह और दूसरे मौकों पर कान फोडऩे वाले डीजे बजाने को लेकर कहा कि राज्य के मुख्य सचिव के बंगले पर जाकर रात भर डीजे बजाया जाए, तो ट्रिब्यूनल उसकी इजाजत दे देगा, इसके बाद छत्तीसगढ़ में भी शासन ने इस कोलाहल के खिलाफ आदेश निकाला, लेकिन उस आदेश को पाते ही जिले के अफसरों ने उसे कूड़ेदान में फेंक दिया, और राजधानी रायपुर रात-दिन इसका सुबूत देख रही है। 
हमारा मानना है कि राजधानियों का हाल तो सरकारी और अदालती आतंक के चलते हुए बाकी शहरों के मुकाबले कुछ बेहतर हो सकता है, लेकिन बाकी शहरों में तो न मंत्री बसते, न राजभवन होते, न अफसर रहते, और न ही जज रहते। इसलिए हर राज्य के ऐसे एक-दो शहरों को छोड़कर बाकी के कोई माई-बाप नहीं होते। नतीजा यह है कि जिसके पास कारखाना चलाने का पैसा है, उसको मानो हवा में, पानी में जहर घोलने का हक मिला हुआ है। जिसके पास लाउडस्पीकरों की फौज को भाड़े पर लेने का पैसा है, उसको आम लोगों की जिंदगी हराम करने का लायसेंस मिला हुआ है। और जिन लोगों के पास गाड़ी रखने को जगह भी नहीं है, उन तमाम लोगों को सरकारी जमीन पर गाडिय़ां खड़ी करने का हक है, और उस बूते गाडिय़ां बढ़ाते चलने का भी हक है। हम छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही रात-दिन सड़क-चौराहों पर धुआं उगलती हुई गाडिय़ां देखते हैं, ऐसी गाडिय़ां जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तो दिल्ली में तरह-तरह के प्रतिबंध लगा रहा है, लेकिन उनकी यहां जांच तक नहीं होती। सरकार के जो विभाग इसके लिए जिम्मेदार हैं, वे किसी के लिए जवाबदेह नहीं हैं। और सत्ता या ताकत के अलग-अलग भागीदार अपने-अपने घर-दफ्तर, अपने-अपने इलाकों को सभी तरह के प्रदूषणों से मुक्त रखकर मानो प्रदेश को प्रदूषण से मुक्त समझ बैठते हैं। 
दिल्ली की हालत को देखकर आज सुप्रीम कोर्ट और बाकी तमाम संवैधानिक संस्थाएं जिस तरह हड़बड़ाए हैं, उनसे हर राज्य को सबक लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ में बड़े अफसरों को सड़कों पर खड़े रहकर गाडिय़ों का धुआं देखना चाहिए, कारखानों के इलाकों में जाकर उनकी चिमनियों का हाल देखना चाहिए। दरअसल प्रदूषण से मौत इतने धीमे-धीमे होती है कि वह खबर नहीं बन पाती। जिस तरह दिल्ली में मशहूर डॉक्टर नरेश त्रेहन ने दिल्ली की गर्द जमे हुए फेंफड़े की तस्वीर जारी की है, रायपुर के औद्योगिक क्षेत्र के फेंफड़ों का हाल उससे कई गुना बदतर होगा। नमूने के लिए उस इलाके के किसी बाशिंदे के मरने पर परिवार से इजाजत लेकर पोस्टमार्टम से उसका फेंफड़ा निकालकर देखना चाहिए, और उसे एक जार में रखकर शहर के चौराहे पर रखना चाहिए। ऐसे नजारों से कम किसी और बात से भारत के शहर, भारत के प्रदेश, जागते हुए नहीं दिख रहे हैं। इसका दूसरा तरीका यह हो सकता है कि सत्ता के तमाम लोगों पर कारों की खिड़कियां खोलकर चलने की शर्त लगाई जाए, और चौराहों पर, लालबत्तियों पर रूकने की शर्त भी। कुछ दिनों के भीतर ही प्रदूषण घटाने के लिए क्रांतिकारी कार्रवाई शुरू हो जाएगी। 

केजरीवाल का भ्रष्टाचार-विरोध कहां हवा हो गया?

संपादकीय 
15 दिसंबर 2015
दिल्ली सरकार में मुख्यमंत्री सचिवालय में तैनात एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के खिलाफ कुछ दिन पहले से शिकायत चल रही थी, और भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई ने आज उस अफसर के दफ्तर पर छापा मारा। यह दफ्तर मुख्यालय सचिवालय में है, और अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि इस छापे के बहाने सीबीआई उनके दफ्तर की फाइलों को भी देख रही है। उन्होंने इस कार्रवाई के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कायर और मनोरोगी करार दिया है, और सोशल मीडिया पर केन्द्र सरकार के खिलाफ हमला बोल दिया है। सोशल मीडिया अपने आम मिजाज के तहत मोदी के पक्ष या विपक्ष में, केजरीवाल के पक्ष या विपक्ष में अपने पूर्वाग्रह के साथ सक्रिय हो गया है। लेकिन इस कार्रवाई और उस पर केजरीवाल की प्रतिक्रिया से कुछ सवाल खड़े होते हैं। 
केन्द्र और राज्य सरकार के अधिकारों के दायरों का एक बड़ा टकराव दिल्ली में केजरीवाल सरकार के पहले दिन से चले आ रहा है। बात-बात पर आए दिन दोनों ने कानूनी नोटिस चलते रहे, और आज की कार्रवाई को उस सिलसिले की एक कड़ी भी देखा जा रहा है। केजरीवाल दिल्ली में ही मौजूद सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी कार्रवाई करने में सक्षम हैं, इसलिए इस मामले की वैधानिकता को लेकर हम अभी तकनीकी बारीकियों में जाना नहीं चाहते, लेकिन यह बात जाहिर है कि केजरीवाल के साथ काम कर रहे अफसर पर छापा मारने के पहले केजरीवाल से इजाजत लेने का मतलब तो सीबीआई की कार्रवाई को नाकामयाब कर देना होता। इसलिए इसमें हमको कोई बुराई नहीं लग रही है कि सीबीआई ने केजरीवाल को खबर नहीं की, और अफसर पर सीधे कार्रवाई की। वैधानिकता से परे हम नैतिकता की बात करें, तो खुद केजरीवाल की पूरी राजनीतिक जिंदगी भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन करते हुए बनी है, और वे जब मुंह खोलते थे, किसी न किसी को भ्रष्ट साबित करते थे। अब ऐसे में अगर देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी किसी अफसर की जांच कर रही है, तो उसमें ऐसा क्या है कि केजरीवाल उसके लिए प्रधानमंत्री को गालियां देने लगें? भ्रष्टाचार के आरोप पर अगर कार्रवाई हो रही है, तो वह तो केजरीवाल की सोच के मुताबिक ही हो रही है, और उनको तो चाहिए कि कुछ दिन जंतर-मंतर पर बैठकर सरकार चला लें और सीबीआई को जांच करने दें। हम इस बात पर जरा भी भरोसा नहीं करते कि हर जांच के वक्त यह तर्क दिया जाए कि एजेंसी चलाने वाली सरकार राजनीतिक विरोध से, बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। भारत जैसी बहुदलीय व्यवस्था में, यहां के संघीय ढांचे में राजनीतिक विरोध तो कभी खत्म हो भी नहीं सकेगा, तो क्या ऐसे में कोई भी पार्टी अपनी विपक्षी पार्टियों के नेताओं या उनकी सरकारों के खिलाफ कोई कार्रवाई ही न करे? यह सिलसिला ठीक नहीं है। और केजरीवाल को यह बात याद रखना चाहिए कि सीबीआई दर्जनों मामलों में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के सामने जांच और छानबीन के घेरे में रहती है। कोई भी गलत काम करने के पहले सीबीआई को याद रखना पड़ेगा कि केजरीवाल हर अदालत तक जाने में सक्षम हैं। ऐसे में नैतिकता की राजनीति करने का दावा करने वाले केजरीवाल को जांच एजेंसी के खिलाफ, या उसकी आड़ में प्रधानमंत्री के खिलाफ हमला नहीं बोलना चाहिए।

जनसंघ-भाजपा की सारी नीति खारिज, मोदी जम्मू-कश्मीर पर भी पाक से बात करेंगे

संपादकीय
14 दिसंबर 2015
पिछले एक पखवाड़े में भारत और पाकिस्तान के बीच भारतीय पहल से जिस रफ्तार से विदेश मंत्रियों की बातचीत हुई, वह इन दो देशों के बीच रिश्तों को देखते आ रहे लोगों को हक्का-बक्का कर गई है। जिस तरह एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच 120 सेकेंड की बातचीत हुई, और उसके बाद जिस तरह एक तीसरे देश में दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने बंद और गोपनीय बैठक की, वह सब कुछ बहुत चौंकाने वाला रहा। इसके बाद आनन-फानन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जिस तरह पाकिस्तान पहुंचीं, वहां विदेश मंत्री से बात की, प्रधानमंत्री से मुलाकात की, वह भी एक अस्वाभाविक रफ्तार से हुआ काम था। लेकिन आज भारतीय संसद में सुषमा स्वराज ने जो बयान दिया है, उस बयान को बारीकी से देखने की जरूरत है, और उसके कुछ घंटे बाद तक अभी हमें भारतीय विपक्षी दलों की वह प्रतिक्रिया देखने नहीं मिल रही है, जो कि इस बयान के बाद तुरंत सामने आनी चाहिए थी। 
यहां पर यह खुलासा कर देना जरूरी है कि हम इन दोनों देशों के बीच हर हालत में बातचीत जारी रखने के हिमायती हैं, चाहे सरहद पर तनाव चलता रहे, चाहे आतंकी हमले होते रहें, इनके बीच भी बातचीत जारी रहनी चाहिए, खेल और कला, फिल्म और संगीत जारी रहने चाहिए। लेकिन सुषमा स्वराज के आज के बयान में एक बहुत ही चौंकाने वाली बात है, जिसके खिलाफ न होते हुए भी हम उस तरफ लोगों को ध्यान खींचना चाहते हैं। आज उन्होंने अपने पाकिस्तान प्रवास के बारे में संसद में बयान दिया जिसमें उन्होंने बाकी बातों के साथ-साथ यह भी कहा कि 2016 में मोदी सार्क सम्मलेन में पाकिस्तान जाएंगे। भारत और पाकिस्तान शांति, सुरक्षा, जम्मू-कश्मीर सहित सभी मुद्दों पर समग्र वार्ता करेंगे। 
यहां पर गौर करने की बात यह है कि भाजपा की अगुवाई वाली इस सरकार ने पाकिस्तान के साथ जम्मू-कश्मीर पर भी बात करना मंजूर किया है। जहां तक हमें याद पड़ता है, पिछले दस बरस के यूपीए राज में मनमोहन-सरकार ने जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान से कोई बात नहीं की थी। तमाम द्विपक्षीय बातचीत में कश्मीर के के अक्षर को बड़ा ही अवांछित माना जाता रहा है, और पाकिस्तान अपने हर बयान में कश्मीर का जिक्र करते आया है, और भारत में इसे जिक्र से परे का मानते हुए इस पर बरसों से कोई चर्चा नहीं की है, इस पर इसी बातचीत के लिए भारत बरसों से कभी सहमत भी नहीं हुआ है। अब यह भी याद रखने की जरूरत है कि जनसंघ के दिनों से भाजपा कश्मीर को चर्चा से परे का मुद्दा मानती रही है, और उसके औपचारिक नारों में यह भी रहते आया है कि दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे। अब ेऐसे नारे पर चढ़कर सत्ता, और भारत सरकार की मुखिया बनने वाली भाजपा अचानक कश्मीर पर पाकिस्तान से बातचीत की एक ऐसी बात को मानने की घोषणा कर रही है, जिससे कि भाजपा की अब तक की पाकिस्तान नीति कूड़ेदान में चली जाती है। 
कुछ लोगों का यह मानना है कि मोदी इस किस्म की दरियादिली दिखाकर कुछ बरस बाद एक नोबल शांति पुरस्कार पाने की कोशिश में हैं। कुछ लोगों का यह मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए पाकिस्तान के साथ शांति बहाली में जितनी कोशिशें की थीं, मोदी उनसे भी आगे जाना चाहते हैं, और इतिहास में नाम लिखाना चाहते हैं। हम यह भी नहीं मानते कि जनसंघ और भाजपा की जो नीति चली आ रही थी, उसे कभी बदलना अनैतिक होगा। वक्त और दुनिया की जरूरत के हिसाब से लोगों को लचीला रहना भी चाहिए, और अपनी नीतियों के मुकाबले दुनिया के व्यापक भले को अधिक महत्वपूर्ण मानना चाहिए। इसलिए अगर मोदी या उनकी पार्टी पाकिस्तान के साथ एक अभूतपूर्व लचीलापन दिखा रहे हैं, तो हम उसके खिलाफ नहीं हैं और उसके आलोचक नहीं हैं। मोदी चाहे मजबूरी में, जम्मू-कश्मीर में राज्य सरकार में भागीदारी के लिए जनसंघ के वक्त की मांगों को वैसे भी खारिज कर चुके हैं। धारा 370 खत्म करने की बात ही अब खत्म हो गई है। और जिस मुफ्ती की पीडीपी को अलगाववादी, या आतंकियों की हिमायती कहने के मोदी के वीडियो हवा में तैर रहे हैं, उसी मुफ्ती के साथ मोदी की पार्टी की सरकार आज जम्मू-कश्मीर में हैं। लेकिन आखिर में हम इस बात पर अपनी हैरानी जाहिर करना चाहते हैं कि सुषमा स्वराज ने आज संसद में जब यह कहा कि जम्मू-कश्मीर पर भी पाकिस्तान से बात होगी, तो यह बात भारत सरकार के दायरे से भी बाहर की है। पाकिस्तान के साथ कश्मीर पर तो बात हो सकती है, लेकिन जम्मू पर पाकिस्तान से क्या बात होगी? जम्मू पर तो पाकिस्तान का कोई दावा बनता भी नहीं है, जम्मू का हिस्सा विवाद से परे का भी है, और पाकिस्तान जिस जमीन पर कब्जा चाहता है, वह तो कश्मीर वाले हिस्से की जमीन है। ऐसे में भारत के एक राज्य, जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान से भला कैसे और क्यों चर्चा हो सकती है? 
दुनिया के बड़े-बड़े पर्यटन केन्द्रों पर रोलरकास्टर रहते हैं, जो कि उसमें बैठे लोगों को मशीन की रफ्तार से कभी आसमान तक ले जाते हैं, कभी सीधे जमीन की तरफ गिराकर लाते हैं, और उनको देखकर भी बहुत से लोगों को चक्कर आ जाता है। पाकिस्तान के साथ भारत की मोदी-नीति ऐसे ही एक रोलरकास्टर पर सवार दिखती है। हम मोदी को उनके चुनावी भाषणों में से निकालकर मियां नवाज को बिरयानी जैसे नारे सुनाना नहीं चाहते, क्योंकि सरकार में आने के बाद अगर वे कट्टरता छोड़ रहे हैं, तो इसे लेकर उनकी आलोचना नहीं होनी चाहिए, लेकिन पाकिस्तान के साथ रिश्तों की रफ्तार न सिर्फ अभूतपूर्व है, बल्कि कुछ मायनों में खतरनाक भी लगती है। आने वाले दिन ही बताएंगे कि मोदी सरहद पर तनाव कितना घटा सकते हैं, और अगर पाकिस्तान के साथ फौजी खर्च वाला तनाव, आतंकी खतरा भारत घटा सकता है, तो वह मोदी की छोटी कामयाबी नहीं होगी। फिलहाल मोदी सरकार आने का बाद पहली बार सुषमा स्वराज विदेश मंत्री जैसी दिख रही हैं, और यह एक मजेदार बदलाव भी है।

रमन सरकार के बारह बरस जलसा फिर कभी होगा, आत्ममंथन तो आज ही हो

विशेष संपादकीय
12 दिसंबर 2015
सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह सरकार के बारह बरस पूरे होने के मौके पर दो बातों को साथ-साथ करने की जरूरत है। एक तो एक ही पार्टी की सरकार और एक ही मुख्यमंत्री के चलते हुए राज्य के इतने विकास को लेकर, और दर्जन भर दूसरी अच्छी बातों को लेकर एक समारोह की जरूरत, लेकिन इसके  साथ-साथ इतना ही महत्वपूर्ण है इस सरकार का आत्ममंथन, जो कि शायद समारोह जितना मीठा न हो पाए। लेकिन जैसा कि सरकार ने एक सही फैसला लिया है कि सूखे चलते राज्य के किसान बदहाली में हैं, और लगातार आत्महत्याओं जैसी नौबत बनी हुई है, और उसे देखते हुए कोई जश्न-जलसा न किया जाए। लेकिन हम जिस आत्ममंथन की बात सुझाना चाहते हैं, वह तो वैसे भी बंद कमरे में होनी है, और सरकार को चाहिए कि अपने अलग-अलग स्तर पर, अलग-अलग समूहों में बैठकर यह सोचे कि इन बरसों में क्या-क्या गलत हुआ जो कि नहीं होना चाहिए था, और क्या-क्या ऐसा सही होना चाहिए था, जो कि किन्हीं वजहों से नहीं हो पाया। 
रमन सिंह सरकार के बारह बरस अगर बहुत गंभीरता से देखें, तो इसके तीन पहलू एक-दूसरे से जमकर मुकाबला करते दिखते हैं, और यह समझ नहीं पड़ता है कि इनमें से कौन सा पहलू किस पर भारी पड़ रहा है। एक पहलू है इन बरसों में राज्य जहां से जहां तक पहुंच पाया है, उसने राज्य के ढांचे का जितना विकास किया है, आर्थिक मोर्चे पर जो कामयाबी पाई है, और सामाजिक जनकल्याण के जो नए पैमाने खड़े किए हैं, वह पहलू वाहवाही के लायक है। दूसरा पहलू यह है कि इन बारह बरसों में ऐसी कौन-कौन सी गलतियां और गलत काम हुए हैं, जो कि रोके जाने लायक थे, और सरकार जिन पर काबू नहीं कर पाई। तीसरा पहलू यह है कि राज्य के विकास की ऐसी कौन सी संभावनाएं हैं जिन पर बारह बरस का लंबा वक्त मिलने के बाद भी इस सरकार ने काम नहीं किया। यह बात कुछ कड़वी जरूर है, लेकिन अभी तीन बरस का वक्त इस सरकार के पास बचा है, और इसका इस्तेमाल इन अनछुई संभावनाओं  पर काम करने में भी लगाना चाहिए। 
छत्तीसगढ़ को कुछ राज्यों के साथ तुलना करके ही देखा जा सकता है, आदर्श के किसी पैमाने पर भारतीय लोकतंत्र के किसी एक राज्य को अलग से आंकना एक बेमानी बात होगी। पन्द्रह बरस पहले जो तीन नए राज्य बने, उनमें अगर तुलना करें, तो छत्तीसगढ़ के मुकाबले बाकी दोनों राज्य कहीं नहीं टिकते। जिस अविभाजित मध्यप्रदेश से अलग होकर यह राज्य बना है, उससे भी अगर तुलना करें, तो नया राज्य होने के बावजूद छत्तीसगढ़ ने बहुत अच्छा काम किया है, और एक ऐसी कामयाबी पाई है जो कि मध्यप्रदेश का हिस्सा रहते हुए इस इलाके को कभी नहीं मिल सकती थी। फिर देश के इस आकार के, ऐसी भौगोलिक स्थिति वाले राज्यों के साथ तुलना करें, तो भी छत्तीसगढ़ खासा कामयाब रहा है। यह एक अलग बात है कि पिछले कुछ बरसों की आर्थिक मंदी के चलते हुए जिस तरह पूरा देश औद्योगिक हाहाकार देख रहा है, कुछ वैसा ही छत्तीसगढ़ में भी हो रहा है। लेकिन इस राज्य ने न सिर्फ अपने-आपको चौबीसों घंटे रौशन किया, बल्कि बाकी देश का अंधकार मिटाने के लिए भी बिजली भेजी है, और ऐसी बिजली की वजह से लाखों-करोड़ों रोजगार बढ़ते हैं।
अब हम उस दूसरे पहलू पर आएं जो कि गलत कामों और गलतियों का है। तो इन बारह बरसों में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पार्टी के भीतर से, या पार्टी के बाहर से कोई चुनौती न रहने पर भी, सरकार की बड़ी-बड़ी खामियों को बहुत हद तक बर्दाश्त करने का जो काम किया है, उससे उनको बचना चाहिए था। और राज्य सरकार के, और भाजपा के मुखिया के रूप में जब बारह बरस की कामयाबी वाला हिस्सा उनके नाम लिखा जा रहा है, तो सरकार की खामियां भी किसी और के नाम नहीं लिखी जा सकतीं। अपनी सरकार के मंत्रियों, अफसरों और नीचे के कर्मचारियों के भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए उनको जो करना था, वे नहीं कर पाए, या अपने मिजाज के मुताबिक उन्होंने कड़ाई से ऐसा कुछ नहीं किया। नतीजा यह निकला कि सरकार का बड़ा हिस्सा लोगों को भ्रष्टाचार में फंसा दिखता है, और शायद अगले तीन बरस में इसे तेजी से कम करना मुमकिन भी नहीं होगा। हमारा मानना है कि सरकार को अपने आत्ममंथन का सबसे बड़ा हिस्सा इसी पर खर्च करना चाहिए कि सरकार के अपने भीतर का इतना व्यापक और गंभीर भ्रष्टाचार कैसे काबू में किया जाए। लेकिन यहां पर हम फिर देश के दूसरे राज्यों से तुलना किए बिना अकेले छत्तीसगढ़ को बहुत बड़ा मुजरिम साबित करना नहीं चाहते। देश में वामपंथी पार्टियों की सरकारों को छोड़ दें,  तो देश के बाकी तमाम राज्यों में जिस बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े घोटाले सामने आए हैं, उनके मुकाबले छत्तीसगढ़ शायद कम बुरा ही दिखेगा। यहां भी कुछ चर्चित घोटाले हुए हैं, लेकिन यहां का भ्रष्टाचार सरकार की पूरी मशीनरी में व्यापक स्तर पर बिखरा हुआ अधिक है, किसी गठान वाले कैंसर की तरह एक जगह पर इक_ा कम हैं। लेकिन हम इसको इन बारह बरसों की सबसे बड़ी नाकामयाबी मानते हैं। अपनी सरकार के ग्यारहवें बरस में उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का नारा दिया है, और उनको इस पर कुछ हद तक तो खरा उतरने की कोशिश करनी चाहिए। प्रदेश में चिकित्सा और स्कूल शिक्षा, आदिवासियों और दलितों की योजनाओं की जो बदहाली है, और सिर्फ भ्रष्टाचार की वजह से है, वह उनसे अनदेखी तो है नहीं। आत्ममंथन का एक मुद्दा यह भी होना चाहिए कि जिस तरह हजारों करोड़ की लागत से एक नया रायपुर बनाया गया, और जिस तरह सैकड़ों करोड़ साल के खर्च से उसे चलाया जा रहा है, क्या यह विकराल ताजमहलीय आकार भूखे गरीब लोगों के राज्य के काम और फायदे का है?
अब एक पहलू जो रह जाता है, वह है अनछुई संभावनाओं का। आज भी छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था मोटेतौर पर प्रकृति की दी हुई खदानों, और जंगलों पर टिकी हुई है। यहां की खेती की अर्थव्यवस्था भी बड़ी है, लेकिन खेती से राज्य की कमाई शायद कम है, और खेती या उपज पर सरकार की तरह-तरह की सब्सिडी उस कमाई से अधिक है। इसी तरह जंगलों से होने वाली कमाई, और उन इलाकों पर होने वाले खर्च के अनुपात को देखें, तो वहां से भी सरकार को कमाई नहीं पाती। कुल मिलाकर यह राज्य खनिजों पर टिका और जिंदा है। कोयले से बिजली, लाईम स्टोन से सीमेंट, और लौह अयस्क से लोहा, इतना बनाने से ही सरकार की कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा जुटता है। लेकिन इन तीनों ही मामलों में सरकार प्राइमरी प्रोडक्ट बनाने के बाद उसमें कोई वेल्यू एडीशन नहीं कर पाई है। मोटे तौर पर यह राज्य कुदरत की दी हुई रोटी खा रहा है। यह एक ऐसी संभावना थी, जिस पर अधिक काम किया जाना था, और हो सकता है कि सरकार अपने बाकी वक्त में कुछ कर भी सके। लेकिन अगर तीसरे कार्यकाल के खत्म होने पर भी ऐसा कुछ नहीं होता, तो वह संभावनाओं का अंत कहलाएगा। उद्योगों से परे छत्तीसगढ़ के कामगारों के हुनर, उनकी पढ़ाई, उनके प्रशिक्षण में जो वेल्यू एडीशन होना चाहिए था, और उनको जिस तरह प्रदेश के बाहर एक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुकाबले के लिए तैयार करना था, उसमें भी यह राज्य अपने डेढ़ दशक में अधिक कुछ नहीं कर पाया। उच्च शिक्षा के कुछ बड़े केन्द्र छत्तीसगढ़ में शुरू जरूर हुए हैं जिनसे कि देश-विदेश में जाने-पहचाने नाम यहां के नक्शे में जुड़े हैं, लेकिन राज्य के दसियों लाख नौजवान ऐसे हैं जो कि बहुत औसत पढ़ाई पाकर औसत दर्जे के बेरोजगार से अधिक कुछ नहीं बन पा रहे। हमारा यह मानना है कि इन बारह बरसों में राज्य सरकार में कल्पनाशीलता और योजना में एक कमी रही है जिससे कि शिक्षकों और नर्सों जैसे आम काम के लिए भी राज्य के बाहर के लोगों को लाना पड़ रहा है। यह अंदाज लगाना सरकार की एक आम जिम्मेदारी थी कि किस हुनर के कितने लोगों की जरूरत होगी, और यह जाहिर है कि जब राज्य में ही ऐसी काबिलीयत के लोग नहीं मिल रहे, तो यहां से ऐसी काबिलीयत पाकर दूसरे राज्यों में उनके जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। राज्य की मानव-संसाधन संभावनाओं पर सरकार को इससे कई गुना अधिक मेहनत करनी थी, लेकिन चूंकि इससे राज्य की कमाई के आंकड़े तुरंत नहीं बदलते, इसलिए शायद इस तरफ ध्यान नहीं दिया गया। आज दुनिया में कोई भी देश अपने लोगों की कामकाज की संभावनाओं को पूरी तरह बढ़ाए बिना किसी मुकाबले में नहीं टिक सकता। छत्तीसगढ़ को अब भी यह बात समझनी चाहिए। 
अब इन तीन पहलुओं के अलावा इस राज्य की चर्चा जिस बात के लिए जरूरी है वह है राज्य का सामाजिक सद्भाव। बारह बरस से भाजपा का बिना गठबंधन वाला मजबूत राज चलने के बाद भी यह राज्य उन तमाम धार्मिक उन्मादों, और साम्प्रदायिक भड़कावे से परे रहने में कामयाब रहा है, जिसे देश भर में भाजपा के कई नेता, और उनके कई सहयोगी संगठन लगातार बढ़ा रहे हैं। हम इस बात को कम महत्वपूर्ण नहीं मानते कि पिछले तीन विधानसभा चुनाव, तीन लोकसभा चुनाव, और तस्थानीय संस्थाओं के तीन चुनाव में जीत पाते हुए भी मुख्यमंत्री रमन सिंह ने एक भी भड़काऊ या उन्मादी मुद्दे को छुआ भी नहीं, और राज्य में मोटे तौर पर साम्प्रदायिक सद्भाव बनाकर रखा है। यही वजह है कि देश भर में भाजपा के जितने भी राष्ट्रीय या प्रादेशिक नेता हैं, उनमें शायद डॉ. रमन सिंह सबसे अधिक सौम्य चेहरा दिखते हैं, और एक समय जिस तरह अटल बिहारी वाजपेयी एक आक्रामक पार्टी के उदार मुखौटे माने जाते थे, आज रमन सिंह को भाजपा के भीतर एक उदार चेहरा पाया जा रहा है। उनकी अगुवाई में प्रदेश में समाज के सबसे कमजोर तबके को जिंदा रहने और जीने में मदद की जो योजनाएं शुरू हुई हैं, वे तमाम भ्रष्टाचार के बाद भी लोगों को भुखमरी से बाहर निकाल पाई हैं, जननी और शिशु मृत्यु घटा पाई हैं। सरकार के एक मुखिया के रूप में वे देश भर के मुख्यमंत्रियों में सबसे निर्विवाद भी हैं। लेकिन हम सालगिरह को जलसे के बजाय, तारीफ के बजाय, आत्ममंथन की तरफ मोडऩा अधिक जरूरी समझते हैं, उसी से राज्य का भला होगा, और राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी, उसके नेताओं के भले के लिए भी यह जरूरी है। 

सलमान के बरी होने से देश में उठे कई सवाल

संपादकीय
11 दिसंबर 2015

फिल्म अभिनेता सलमान खान को निचली अदालत से पांच बरस की कैद के बाद बाम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें पूरी तरह से बरी कर दिया है। इसके साथ ही देश भर के मीडिया और सोशल मीडिया पर एक बहस ने जोर पकड़ लिया है, कि क्या ताकतवर को इस देश में कभी कोई सजा हो सकती है? सलमान का मामला तेरह बरस पहले मुंबई की सड़क पर नशे में गाड़ी फुटपाथ पर चढ़ाकर लोगों को कुचल मारने का था। इसके गवाह भी थे, और सुबूत भी थे। इनके आधार पर निचली अदालत ने कैद सुनाई थी, और कुछ महीनों के भीतर ही हाईकोर्ट ने फैसले को पलटते हुए सुबूतों और गवाहों को, पुलिस की कार्रवाई को नाकाफी ठहराते हुए सलमान को बरी कर दिया। देश के बड़े-बड़े वकील कल शाम से ही टीवी पर यह बहस करते दिख रहे थे कि जिस बाम्बे हाईकोर्ट में हजारों केस बरसों से लगे हुए हैं, और निचली अदालतों से सजा पाने वाले लोगों को जमानत भी नहीं मिली है, और वे जेलों में ही कैद हैं, फिर भी उनके मामलों की सुनवाई की बारी हाईकोर्ट में नहीं आ रही, और सलमान के मामले में अदालत को आनन-फानन सुनवाई और फैसले का वक्त क्यों और कैसे मिला? लेकिन यह अकेला मामला नहीं है, पिछले कुछ बरस से एक दूसरे फिल्म अभिनेता संजय दत्त का मामला ऐसा ही चले आ रहा है जब उनकी सुनवाई के लिए अदालतें मानो इंतजार करते बैठी थीं, और सजा मिलने के बाद भी बार-बार पैरोल पर संजय दत्त को घर जाकर रहने मिला। 
अभी हम अदालतों की नीयत पर कोई शक नहीं कर रहे, लेकिन लोगों का शक भारत की न्याय व्यवस्था पर इस आधार पर गहराते चल रहा है कि यहां बड़े-बड़े वकील लगाकर इंसाफ को उनसे पिटवाया जा सकता है। पैसों की बड़ी-बड़ी ताकत से जांच पर असर डाला जा सकता है, गवाह खरीदे जा सकते हैं, लोगों की याददाश्त खत्म की जा सकती है, सुबूत मिटाए जा सकते हैं, और बहुत से मामलों में सरकारी वकील या जज भी खरीदे जा सकते हैं। जब लोग ऐसी बातें बार-बार देखते हैं तो लोगों का भरोसा न सिर्फ न्यायपालिका से उठता है बल्कि भारतीय लोकतंत्र से भी उठ जाता है। फिर लोगों को लगता है कि इंसाफ दिलाने के लिए बंदूकें जरूरी हैं। 
कहने के लिए भारत में कुछ ऐसे गिने-चुने मामले लोग गिनाते हैं जिनमें अरबपति भी जेल गए हुए हैं, लेकिन ऐसे नमूने किसी भी मामले में पक्ष और विपक्ष दोनों में गिनाए जा सकते हैं। अधिकतर मामले तो ऐसे हैं जिनमें ताकतवर को कोई सजा नहीं हो सकती। सलमान के मामले में ही एक बात गौर करने लायक है, कि जिस अदालत में उनको सजा होने का खतरा था, वैसी निचली अदालत में उनका मामला बारह बरस चलते रहा। और जब सजा हो गई, तो कुछ महीनों के भीतर हाईकोर्ट से उनका फैसला आ गया जिसमें कि वे बरी हो गए। यह सिलसिला अदालतें तकनीकी आधार पर सही ठहरा सकती हैं कि वे तो उनके सामने पेश किए गए सुबूतों और गवाहों के आधार पर ही फैसला देती हैं, लेकिन जज अकेला ही न्यायपालिका नहीं होता, जांच एजेंसी से लेकर गवाह और सुबूत, दोनों तरफ के वकील, और जज ये सब मिलकर न्याय की प्रक्रिया रहते हैं, और इन सबमें गरीबों के लिए कोई सुनवाई नहीं है। 
इस फैसले से हो सकता है एक बेकसूर सलमान छूट गए हों, या एक कुसूरवार सलमान सजा से बच गए हों, लेकिन एक व्यक्ति यहां पर मुद्दा नहीं है, देश की जनता में न्यायपालिका को लेकर ऐसा भयानक अविश्वास बैठा हुआ है कि वह जांच एजेंसी से लेकर गवाह और जज तक के बीच में कोई फर्क नहीं कर पाती। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। और हमारा यह भी मानना है कि ऐसे तमाम मामलों में जिनमें बहुत पैसे वाले लोग किसी तरह से भी जिम्मेदार होते हैं, और गरीब हादसों या जुर्म के शिकार होते हैं, उनमें एक कानून बनाकर एक लंबी-चौड़ी भरपाई जरूरी करनी चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक देश के गरीबों के मन में लोकतंत्र के लिए कोई भरोसा नहीं रहेगा, और ताकतवर तबके के लिए जनता के मन में हिकारत भरी रहेगी। हमारा यह भी मानना है कि ऐसे तमाम मामलों में जिनमें ताकतवर लोग शामिल हैं, चाहे वे सलमान खान हों, चाहे गुजरात की मंत्री माया कोडवानी हों, या कि कोई और, हर ताकतवर की रिहाई के बाद ऊपर की अदालत में सरकार को अनिवार्य रूप से जाना चाहिए, इसके बिना लोगों के मन में सरकार के लिए भी नफरत पैदा होती है। सलमान के ही मामले में उनके खिलाफ गवाही देने वाले उनके साथ तैनात एक पुलिस सिपाही की जैसी बुरी मौत हुई है, उसे देखकर भी लोगों के मन में एक सामाजिक नफरत भरी हुई है। अदालत के पास हर बुराई का कोई इलाज नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र के पास तो हर बुराई का इलाज होना ही चाहिए, वरना वह लोकतंत्र खारिज कर दिए जाने लायक है। 

कोलाहल की गुंडागर्दी बंद करवानी चाहिए

संपादकीय
10 दिसंबर 2015

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के भोपाल दफ्तर में जिस तरह से मध्यप्रदेश में शादी-ब्याह और सड़कों पर बजने वाले डीजे पर कड़ाई से रोक लगाई, उसे देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और न सिर्फ इस ट्रिब्यूनल, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के भी कई आदेशों को मानने की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभानी चाहिए। आज छत्तीसगढ़ के गांव-शहरों का हाल यह है कि यहां कोई कानून मानो बच ही नहीं गया है, और जिसकी जितनी ताकत हो, वे उतना शोर कर सकते हैं, कर रहे हैं। राजधानी रायपुर का हाल यह है कि यहां पर कानून शायद डीजे और लाउडस्पीकर चलाने वाले लोग तय कर रहे हैं, और सरकार ने सिर्फ मुख्यमंत्री निवास, राजभवन, ऐसी चुनिंदा कुछ जगहों पर जिला दंडाधिकारी के आदेश से लाउडस्पीकर पर रोक लगा दी है, और बाकी प्रदेश को मरने के लिए छोड़ दिया है। हो सकता है कि बिलासपुर में जिस इलाके में हाईकोर्ट के जज रहते हैं, या हाईकोर्ट के आसपास भी ऐसा आदेश लागू किया गया हो, और चुनिंदा लोगों को सुख से जीने की सहूलियत देकर सरकार मस्त है। 
लोगों को सुख-चैन से अपने घर पर जीने, बीमार को अस्पताल में इलाज करवाने, दुकान-दफ्तर के लोगों को काम करने, और सड़क से गुजरते लोगों को तकलीफ पाए बिना रास्ता पार करने का जो बुनियादी हक है, उसकी फिक्र छत्तीसगढ़ में किसी अफसर को नहीं है। यहां पर लोग घंटों तक सड़कों पर ट्रैफिक जाम करते हुए नाचते-गाते हैं, और साथ में बड़ी-बड़ी गाडिय़ों पर दर्जनों लाउडस्पीकर चलते हैं, जो कि पूरे इलाके का जीना हराम कर देते हैं। ऐसे शोर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के बड़े कड़े कई आदेश बरसों से लागू हैं, लेकिन जहां भीड़ की गुंडागर्दी शादियों से लेकर धार्मिक और सामाजिक जुलूसों तक हावी रहती है, वहां पर आम लोगों का यह हौसला नहीं रह जाता कि बेपरवाह अफसरों तक जाकर कानून की याद दिलाएं। हमारा ख्याल है कि कुछ सक्रिय और जागरूक लोगों को ऐसे शोरगुल की वीडियो रिकॉर्डिंग करके सुप्रीम कोर्ट को भेजना भी चाहिए कि उसके हुक्म की कैसी धज्जी उड़ रही है, आम जनता के कानों की धज्जी तो उड़ ही रही है। 
यह एक बड़ी भयानक नौबत है कि भोपाल में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को यह कहने को मजबूर होना पड़ रहा है कि लोग चाहें तो जाकर इतना शोरगुल राज्य के मुख्य सचिव के बंगले पर पूरी रात करें, और ट्रिब्यूनल इसकी इजाजत देगा। यह बात जाहिर करती है कि देश की संवैधानिक संस्थाएं सरकारों के कामकाज से, उनकी लापरवाही से किस कदर निराश हैं, और छत्तीसगढ़ का हाल इस मामले में मध्यप्रदेश से जरा भी बेहतर नहीं है। हमारा ख्याल है कि इस तरह के मामले में जितने कानूनी आदेश न्यायिक संस्थाओं से जारी होते हैं, वे बाकी प्रदेशों पर भी मोटे तौर पर लागू होते हैं, और छत्तीसगढ़ को तुरंत इससे सबक लेना चाहिए। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की भोपाल शाखा के तहत आते हैं, और इस मामले में दोनों प्रदेशों पर यह आदेश बराबरी से लागू होता है।
यह बात हैरान करने वाली है कि बड़े-बड़े अफसर जो अपने लिए बड़ी-बड़ी सहूलियतें जुटा लेते हैं, वे सड़कों पर रात-दिन चलने वाली ऐसी गुंडागर्दी पर हाथ भी धरने से कतराते हैं। जो काम करना सरकार की खुद की जिम्मेदारी है, उसके बारे में यह सफाई दी जाती है कि कोई शिकायत आती है तो सरकार कार्रवाई करती है। हमारा अनुभव यह है कि कोई शिकायत आती है, तो अफसर सबसे पहले गुंडों को यह बताते हैं कि शिकायत किसने की है, और किसकी शिकायत पर उनको मजबूर होकर आना पड़ रहा है। इसी राजधानी रायपुर में एक वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर ने एक मंदिर के रात-दिन के शोरगुल के चलते अदालत तक जाकर उसके खिलाफ आदेश हासिल किया, और वहां के लाउडस्पीकर बंद करवाए। लेकिन इससे कोई सबक लेने के बजाय अफसरों ने बाकी जगहों पर कोई कार्रवाई नहीं की, अब ऐसे कितने लोग हो सकते हैं जो संगठित समुदायों के खिलाफ, भीड़ के खिलाफ, धार्मिक उन्माद के खिलाफ, अराजक बारात के खिलाफ अदालत तक जाएं? 
राज्य सरकार को हमारी सलाह है कि इसके पहले कि कोई कानूनी कार्रवाई उसके खिलाफ हो, अपने नागरिकों के प्रति उसे अपनी न्यूनतम जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और कोलाहल की गुंडागर्दी बंद करवानी चाहिए। 

सोनिया-राहुल पर कोर्ट केस पर संसद में हंगामा क्यों ?

संपादकीय
9 दिसंबर 2015

कांग्रेस पार्टी के अखबार नेशनल हेराल्ड की प्रकाशक कंपनी के शेयरों को एक नई कंपनी बनाकर उसमें डालने के मामले में भाजपा के नेता सुब्रमण्यम स्वामी सोनिया-राहुल सहित कांग्रेस पार्टी के खिलाफ अदालत गए हुए हैं, और यह पहला मौका है जब सोनिया गांधी किसी अदालती कटघरे में खड़ी होने जा रही हैं। हालांकि यह मामला कंपनी कानूनों के तहत एक जटिल मामला है, और इसके गुण-दोष पर हम कुछ कहना नहीं चाहते, लेकिन इस अदालती मामले को लेकर कांग्रेस पार्टी ने संसद के भीतर जिस तरह का बर्ताव किया है, वह भारी गैरजिम्मेदारी का है। अगर देश में सांसदों के खिलाफ चल रहे तमाम अदालती मामलों को लेकर संसद के भीतर ऐसा हंगामा होने लगे, तो साल में 365 दिन और चौबीसों घंटे चलने वाली संसद में भी समय का टोटा पड़ेगा। ऐसा करके कांग्रेस ने पता नहीं अपनी घबराहट उजागर की है, या खीझ जताई है, उसकी चाहे जो भी नीयत हो, यह काम उसके खिलाफ जा रहा है। 
सार्वजनिक जीवन में लोगों को दो तरह की अदालतों का सामना करना पड़ता है। जनता की अदालत का, और कानून की अदालत का। जहां तक ईश्वर की अदालत का सवाल है, तो उसके बारे में आस्थावान लोग बता सकते हैं कि मरने के बाद लोगों को वहां खड़ा होना पड़ता है या नहीं, और वहां पर कोई हिसाब-किताब होता है नहीं। लेकिन जब जमीन पर कानून की अदालत कोई कार्रवाई कर रही है, तो उसके खिलाफ संसद के भीतर हंगामा खड़ा करके कांग्रेस पार्टी इस अदालत की तौहीन भी कर रही है, और संसद का वक्त भी बर्बाद कर रही है। कल के दिन संसद में कही बातों को लेकर लोग उसके खिलाफ अदालत जाने लगें, या अदालत में कही बातों को लेकर चुनावी सभाओं में जाने लगें, तो लोकतंत्र का मटियामेट ही हो जाएगा। यह मामला चूंकि कांग्रेस पार्टी के सर्वोच्च स्तर से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसके नेताओं को अपने बर्ताव को काबू में भी रखना था, और कानून की लड़ाई कानूनी औजारों से लडऩी थी। 
आज कांग्रेस ने यह मामला दायर करने वाले भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी को भाजपा का वरिष्ठ नेता करार देते हुए इस अदालती मामले को भाजपा का राजनीतिक बदनीयत का अभियान करार दिया है। पल भर के लिए यह मान भी लिया जाए कि सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा की सहमति या अनुमति से यह मुकदमा चला रहे हैं, तो भी बात तो मुकदमे के गुण-दोष पर होनी चाहिए, न कि उसके पीछे की नीयत पर। और अब जब अदालत में इसकी सुनवाई तय हो चुकी है, तब अदालत के बाहर जुबानी जमा-खर्च से यही जाहिर होता है कि कांग्रेस कानूनी रूप से कहीं कमजोर है। ऐसा है या नहीं, यह तो अदालत और वकील जानें, लेकिन ऐसी आक्रामक कार्रवाई संसद के भीतर और मीडिया के बयानों में कांग्रेस का सम्मान नहीं बढ़ा रही। 
देश में अधिकतर पार्टियों के बहुत से नेताओं को बहुत सी अदालतों में जाना पड़ता है, और कांग्रेस पार्टी का यह रूख लोगों के गले नहीं उतरेगा कि उसके नेताओं के खिलाफ कोई व्यक्ति निजी हैसियत से भी मुकदमा न करें। सुब्रमण्यम स्वामी एक बहुत ही बड़बोले और लड़ाकू नेता हैं। वे लंबे समय से जयललिता, सोनिया, राहुल, इंदिरा, राजीव जैसे कई पसंदीदा निशानों पर हमले करते आए हैं। वे भाजपा में भी हमेशा नहीं रहे, पार्टी के भीतर आते-जाते रहे हैं। इसलिए उनके इस मुकदमे को भाजपा का मुकदमा समझना भाजपा के साथ ज्यादती होगी। दूसरी बात यह कि अगर मोदी सरकार का कोई विभाग या उसकी कोई जांच एजेंसी इस मामले में अलग से कार्रवाई करती, तो भी उसे हम खारिज करने के बजाय कांग्रेस और सोनिया परिवार से उसका जवाब देने की उम्मीद करते। सार्वजनिक जीवन में हर नेता को बहुत से मामलों में जवाब देने पड़ते हैं, और उनको सही जगह पर ही जवाब देना चाहिए। संसद, अदालत, मीडिया, और चुनावी सभा, ऐसे बहुत से अलग-अलग मंच लोकतंत्र में रहते हैं, और लोगों को एक जगह की बहस को दूसरी जगह नहीं ले जाना चाहिए, खासकर जब तक वे सही जगह पर पूरा जवाब न दे दें। नेशनल हेराल्ड के मामले में अदालत में कार्रवाई अभी शुरू ही हुई है, और कांग्रेस को इतनी जल्दी हड़बड़ाकर ऐसा जाहिर नहीं करना चाहिए कि उसके नेता या तो अदालतों से ऊपर हैं, या वे अदालतों में जाना नहीं चाहते हैं। सोनिया गांधी आमतौर पर विनम्रता की बात करती हैं, लेकिन कल की उनकी प्रतिक्रिया एक आक्रामक जवाबी हमला थी कि वे इंदिरा गांधी की बहू हैं, और किसी से डरती नहीं हैं। वे इंदिरा की बहू हैं, यह एक निर्विवाद तथ्य है, और जिसने कुछ गलत न किया हो, उसे अदालत से डरने की जरूरत नहीं है, यह भी एक निर्विवाद तथ्य है। इसलिए ऐसी पैनी राजनीतिक बात कहने का कोई मौका एक अदालती कार्रवाई के सिलसिले में नहीं था, और वे ऐसा कहने से बच भी सकती थीं। फिलहाल कांग्रेस को इस मामले में संसद और सड़क का वक्त बर्बाद नहीं करना चाहिए, और अदालत में उसके सामने सारे विकल्प खुले हुए हैं। 

भारत-पाक में बातचीत हर हाल में जारी रहे...

संपादकीय
8 दिसंबर 2015

भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आज पाकिस्तान रवाना हो रही हैं, और दोनों देशों के बीच सरहद पर चलते तनाव, आतंकी हरकतों की तोहमतों के बीच होने जा रही इस बातचीत को लेकर भारत में विपक्षी पार्टियां सरकार पर चढ़ बैठी हैं। उनका आरोप है कि मोदी सरकार ने जिस नौबत को लेकर पाकिस्तान के साथ बातचीत बंद की थी, सरहद पर हमलों और आतंकी हरकतों की उन नौबतों में ऐसा क्या फर्क हो गया है कि अब बातचीत फिर शुरू हो रही है। भारत के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने इस बात पर भी सरकार पर हमला किया है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने एक तीसरे देश में पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से क्यों बात की? भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से यह भी कहा जा रहा है कि पिछले दिनों पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से एक सम्मेलन में मुलाकात के दौरान उनकी क्या बात हुई, यह संसद को बताया जाए। 
दरअसल देश के भीतर सरकार और विपक्षी दलों के बीच जो खींचतान चलती है, उसके तहत अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी एक ऐसा तनाव खड़ा किया जाता है जिससे कि देश के भीतर जनता को यह लगे कि विपक्ष चौकन्ना है, सरकार कुछ गलत कर रही है, कुछ छुपा रही है, और देश की जनता को कुछ अधिक जानने का हक है। यह बात नई नहीं है, जिस समय यूपीए की सरकार थी, और एनडीए विपक्ष में था तब भी सरकार के लिए ऐसी परेशानी खड़ी की जाती थी। लोगों को याद होगा कि नवाज शरीफ के एक निजी तीर्थयात्रा पर अजमेर आने पर नरेन्द्र मोदी ने महीनों तक आमसभाओं में यह हमला किया था कि सरहद पर जो पाकिस्तान हिन्दुस्तानी सैनिकों के सिर काट रहा है, उस पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को भारत की सरकार बिरयानी खिला रही है। कमोबेश वैसे ही तेवर दिखाने का हक आज कांग्रेस को है, लेकिन ये दोनों ही नौबतें देश के हित के खिलाफ है, और अड़ोस-पड़ोस में बसी हुई दो परमाणु ताकतों के खिलाफ भी है। 
घरेलू राजनीति के स्तर को कुछ उठने की जरूरत है। भारत और पाकिस्तान एक-दूसरे से लड़ते-भिड़ते रहें, इसमें दोनों देशों की राजधानियों में बसे ताकतवर लोगों का कुछ नहीं जाता, लेकिन फौजी खर्च में दोनों देशों के गरीब लोग भूखे मर रहे हैं, दोनों देशों में करोड़ों बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, पढ़ाई और इलाज का खर्च नहीं जुट पा रहा है, और फौजों पर अंधाधुंध खर्च हो रहा है। इसलिए हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि चाहे आतंकी हमले होते हों, चाहे सरहद पर फौजी टकराव चल रहा हो, देशों के बीच बातचीत से ये नुकसान और बढ़ नहीं सकते, घट जरूर सकते हैं, हमारा मानना है कि बातचीत हर हाल में जारी रहनी चाहिए, संगीत के कार्यक्रम, फिल्में, टीवी चैनल, क्रिकेट-हॉकी, साहित्य समारोह हर हाल में चलने चाहिए। भारत और पाकिस्तान के बीच कारोबार से भी इन दोनों देशों का भला है, और वह भी जारी रहनी चाहिए। यह बात समझने की जरूरत है कि इन तमाम रिश्तों से आतंकी और फौजी टकराहट भी घट सकती है, लेकिन जब हर किस्म के रिश्तों को तोड़ दिया जाएगा, तो फिर दोनों देशों के बीच बातचीत के लिए महज आतंकी और फौजी ही बच जाएंगे। जंग के नारे सुहाने बहुत लगते हैं, लेकिन हर जंग में आम लोग मरते हैं, और खास लोग मानो शतरंज की बिसात के पीछे बैठे हुए प्यादों को आगे बढ़ाते रहते हैं। 
आज जब भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी वजह से बातचीत का सिलसिला शुरू हो रहा है, तो भारत के विपक्षी दलों को दो बरस पहले तक की विपक्षी पार्टी भाजपा के रूख की नकल करने के बजाय यह याद रखना चाहिए कि कांग्रेस के जवाहर लाल नेहरू ने धोखा खाते हुए भी पड़ोसी देशों से बातचीत जारी रखी थी, और खुद होकर किसी जंग की शुरुआत नहीं की थी। कांग्रेस को घरेलू राजनीति के चलते एक ओछापन नहीं दिखाना चाहिए, और इस बातचीत की गाड़ी के पहियों में डंडा नहीं अड़ाना चाहिए। इन दोनों देशों के तमाम लोगों को बातचीत की हिमायत करते हुए इस बारे में बोलना चाहिए और सरकारों का हौसला बढ़ाना चाहिए। सरकार पर काबिज पार्टियों से लोगों की असहमति हो सकती है, लेकिन यह याद रखना चाहिए दो देशों के बीच बातचीत राजनीतिक दल नहीं करते, सरकारों पर ही यह जिम्मेदारी रहती है, और उन्हीं का यह हक रहता है। इसलिए आज मोदी सरकार और शरीफ सरकार के बीच बातचीत को तमाम अमन-पसंद लोगों को बढ़ावा देना चाहिए। बल्कि हम तो इस बात के भी हिमायती रहेंगे कि दोनों देशों के विपक्षी दल भी आपस में बैठकर बातचीत करें, और एक व्यापक सहमति बनाकर अपनी-अपनी सरकारों के सामने एक एजेंडा रखें, जिससे कि उनकी सरकारों पर एक जनदबाव पड़ सके। 

चेन्नई से उपजे कई सवालों पर देश को आत्ममंथन की जरूरत

7 दिसंबर 2015
संपादकीय
तमिलनाडु की बाढ़ के पीछे की वजहों को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं वे बताती हैं कि नेताओं-अफसरों, और बिल्डरों ने मिलकर पिछले दशकों में राजधानी चेन्नई की जो तबाही की है, उसी का नतीजा रहा कि कुदरत की मार से शहर पर जख्म इतने अधिक आए। अदालती आदेशों के बावजूद सरकार और स्थानीय शासन ने चेन्नई शहर को बचाने की कोई कोशिश नहीं की, तालाब घटते चले गए, नाले-नालियां पटते चले गए, झील के किनारे बड़े-बड़े अवैध निर्माण हो गए, आबादी बढ़ती चली गई, और पानी की निकासी के रास्ते घटते चले गए। नतीजा यह हुआ कि तेज बारिश हुई तो देश के इस महानगर में सड़कों पर मोटरबोट चलाकर लोगों की जिंदगियां बचानी पड़ीं। 
अब जब मौतें हो रही हैं और लोग डूबे हुए हैं, तो देश के प्रधानमंत्री वहां जाकर सिवाय कुछ हजार करोड़ की मदद देने के और क्या कर सकते हैं? और वही हुआ, केंद्र सरकार ने चार हजार करोड़ रुपये तमिलनाडु को दिए, जिसका अधिकतर हिस्सा इस शहर के लिए अम्मा ब्रांड की राहत सामग्री में खर्च होगा। अब सवाल यह है कि देश के संघीय ढांचे के भीतर जब राज्य सरकार बेलगाम होकर, अपनी मनमर्जी से नियम-कानून के खिलाफ काम करेगी, और किसी आपदा के आने पर केंद्र सरकार से बड़ी-बड़ी उम्मीदें रखेगी, तो इस सिलसिले को कैसे थामा जाएगा? जब कोई राज्य हजारों करोड़ के स्मारक बनाए, और भूकंप या बाढ़ आने पर हजारों करोड़ की राहत की उम्मीद केंद्र से करे, तो ऐसे में वे राज्य बेवकूफ साबित होंगे जो कि अपने साधनों से मनमानी स्मारक नहीं बनवाते हैं। यह बात ठीक है कि भारतीय लोकतंत्र के संघीय ढांचे में राज्यों के अधिकार अधिक होने चाहिए, लेकिन क्या राज्यों की गलत कामों की मनमर्जी भी असीमित होनी चाहिए? क्या शहरी विकास और पर्यावरण के नियम तोड़कर धरती को बर्बाद करने की आजादी भी राज्यों को होनी चाहिए? क्या उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में, जहां पर कि आज लोग घास-पत्तों की रोटी बनाकर खा रहे हैं, और कुपोषण के शिकार हैं, वहां पर हजारों करोड़ के स्मारक बनने चाहिए? राज्य के समाजवादी मालिक मुलायम सिंह यादव का सौ करोड़ का जन्मदिन मनाया जाना चाहिए? आखिर राज्य की कैसी मनमानी पर केंद्र सरकार को रोक लगाने का हक होना चाहिए?
केंद्र सरकार का पैसा आसमान से आया हुआ नहीं है। इसी देश में राज्यों से पैसा केंद्र में आता है, और जरूरत के मुताबिक राज्यों को वापिस जाता है। यह एक मिलाजुला खजाना है, और राज्य अपने पैसे को मनमानी से बर्बाद करें, और फिर मानवीय जरूरत दिखाते हुए केंद्र से उम्मीद करें, तो यह संघीय ढांचे की भावना और उसकी सीमाओं के खिलाफ है। राज्य सरकारों को अपने साधनों से तो सब कुछ करने की छूट है, लेकिन राज्यों को केंद्र सरकार की मदद के पहले राज्यों की अपनी मुसीबत से उबरने की तैयारियों को भी देखने का प्रावधान भारतीय लोकतंत्र में होना चाहिए। यह सिलसिला जब लंबा चलता है, तो केंद्र सरकार या उसके मुखिया की हैसियत से प्रधानमंत्री अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं, या राजनीतिक मजबूरियों के मुताबिक अलग-अलग राज्यों को मनमर्जी से मदद वैसे ही देते हैं जैसे कि राजशाही के दिनों में राजा गले से निकालकर मोतियों की माला दे देते थे। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और केंद्र सरकार को राज्यों पर एक पर्यावरण जुर्माना लगाने का अधिकार भी होना चाहिए, क्योंकि एक राज्य का बर्बाद किया हुआ पर्यावरण उसकी सीमाओं से बाहर भी दूसरे लोगों को भी बर्बाद करता है। चेन्नई से उपजी मुसीबत और फिक्र को लेकर देश के बाकी हिस्सों को भी अपनी गलतियों पर आत्ममंथन करना चाहिए। 

रोजगार का बुरा बाजार बेहतर और काबिल बनने की बड़ी जरूरत

6 दिसंबर 2015
संपादकीय

देश की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक, टाटा स्टील, ने ब्रिटेन में अपने एक कारखाने में सात सौ से अधिक लोगों को निकालने की तैयारी कर ली है। इसी तरह दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियां बुरी तरह से छंटनी करने जा रही हैं, और बड़े-बड़े ब्रांड इस बात के लिए आए दिन खबरों में हैं। ये खबरें भी तब बनती हैं जब सैकड़ों या हजारों लोगों को एक साथ हटाया जाता है, जब थोड़े-थोड़े लोग हटते चलते हैं, या जब रिटायर होने वाले लोगों की जगह किसी और को नियुक्त नहीं किया जाता, तो कोई खबर भी नहीं बनती। कुल मिलाकर हम यह कहना चाहते हैं कि दुनिया के कामगारों और बेरोजगारों, सभी को यह समझ लेना चाहिए कि कामकाज का बाजार अब आसान नहीं रह गया है। इसकी कई वजहें हैं, और अब वे दिन लद गए, जब झंडे-डंडे लेकर मजदूर संगठन छंटनी को रोक लेते थे। आज दुनिया के अधिकतर देश ऐसी किसी छंटनी के खिलाफ नहीं हैं, जिनको रोकने से कारखाने ही बंद हो जाएं। भारत में भी दशकों तक वामपंथी सरकार के तहत चलने वाले कारखानों के बारे में जनधारणा यह है कि यूनियनबाजी के चलते यूनियनें तो बच गईं, लेकिन न कारखाने बचे, न नौकरियां बचीं।  खैर, हम अभी यूनियन और कारखाने के विवाद में जाना नहीं चाहते, क्योंकि इन दोनों के रिश्ते किसी भी देश के कानून में चाहे जैसे हों, हमारी आज की यहां की चर्चा का मकसद बेरोजगारों और कामगारों से उनके हुनर और उनकी काबिलीयत पर बात करना है।
दुनिया में रोजगार का कारोबार अभी तक तो कम्प्यूटरों का हमला झेल रहा था, अब वह रोबो के निशाने पर भी है। कारखानों में कब अधिकतर कामगारों की जगह मशीनी रोबो काम करने लगेंगे, यह अंदाज लगाना भी अब अधिक मुश्किल नहीं है। बिना किसी यूनियनबाजी के रोबो लगातार बिना रूके, बिना गलतियों के, बिना बोनस और बढ़ोतरी की मांग के काम करते रहेंगे, और कई किस्म के कारखानों में ये मालिक की भारी बचत भी करेंगे। दूसरी तरफ घर तक सामान पहुंचाने वाली बहुत सी कंपनियां द्रोन का इस्तेमाल करके डिलीवरी करना शुरू कर चुकी हैं, और आज दुपहियों पर जो लोग दौड़-दौड़कर सामान पहुंचाते हैं, उनके रोजगार विकसित देशों के महंगे बाजार में घटना शुरू हो जाएंगे।
ऐसी मिसालें अनगिनत हैं, लेकिन किसी भी कारोबार में आखिरी तक वे कामगार बचे रहेंगे जिनका काम सबसे अच्छा होगा। कोई भी कारोबार या कारखाना जब लोगों को निकालना शुरू करते हैं, तो सबसे कमजोर, या सबसे निकम्मे, सबसे गैरजरूरी को सबसे पहले निकालते हैं। आज दुनिया के बाजार में खर्च को घटाने का जो गलाकाट मुकाबला चल रहा है, उसमें किसी भी मालिक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे सामान में, तनख्वाह में, या किसी भी और खर्च में बर्बादी जारी रखें। नतीजा यह है कि लोग सबसे पहला काम गैरजरूरी लोगों से छुटकारा पाने का कर रहे हैं। कम्प्यूटरों से लेकर संचार तकनीक तक, और देश-दुनिया के आधुनिक ढांचे तक, बड़ी मशीनों से लेकर बड़ी गाडिय़ों तक, हर किस्म की चीजों से अब यह मैनेजमेंट के लिए आसान हो गया है कि कम लोगों के सहारे अधिक काम कर लिया जाए। इसलिए आज लोगों को यह ख्याल रखना चाहिए कि अगर वे अपने-आपको बेहतर नहीं बनाएंगे, अगर मेहनत और ईमानदारी से काम नहीं करेंगे, तो वे खुली सड़क पर खड़े रह जाएंगे। और छंटनी झेल रहे कारोबार किसी जरूरत से अगर नए लोगों को नौकरी पर रखते भी हैं, तो वे रोजगार के बाजार से सबसे अच्छे लोगों को छांटने की आजादी भी रखते हैं। आने वाले दिन लोगों के लिए और अधिक मुकाबले के रहेंगे, और इसके लिए जो लोग तैयार नहीं रहेंगे, वे बेरोजगार रहेंगे इसकी गारंटी है।