दिल्ली से सीखने की जरूरत, और दिल्ली को सिखाने की भी

संपादकीय
10 जनवरी 2016

दिल्ली में हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई जिसके आभार पर अदालत ने सरकार से बार-बार पूछा कि उसे सम-विषम कार नियम लागू करके एक पखवाड़े तक प्रदूषण क्यों नापना है, और यह एक हफ्ते में क्यों नहीं हो सकता? सरकार ने अदालत को अपना जवाब दिया है, लेकिन हमारा यह मानना है कि यह प्रयोग सिर्फ प्रदूषण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके बहुत से सामाजिक और आर्थिक पहलू हैं, शहरी यातायात का बहुत सा ऐसा मामला है जो कि इन पन्द्रह दिनों में सामने आ सकता है। और इस प्रयोग को खत्म करने की ऐसी हड़बड़ी भी नहीं करनी चाहिए कि लोग एक पखवाड़े के लिए कारों के इस्तेमाल पर रोकथाम को बर्दाश्त न कर सकें, और प्रतिबंधों के हिसाब से अपनी आवाजाही को दुबारा तय न कर सकें। 
एक तो दिल्ली सहित पूरे हिन्दुस्तान में राजनीतिक कड़वाहट इतनी फैल चुकी है कि भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच नफरत के सिवाय और कोई बात नहीं दिखती। केजरीवाल की राज्य सरकार के इस प्रयोग को नाकामयाब बताने के लिए दिल्ली के मेट्रो स्टेशनों की बहुत पुरानी भीड़ की तस्वीरों को ताजा बताते हुए सोशल मीडिया पर नफरत का एक अभियान छेड़ा गया, और केजरीवाल को कोसा गया। दूसरी तरफ आम जनता ने मोटे तौर पर इस भारी प्रतिबंधों वाले प्रयोग का साथ दिया, और महज बड़बोले लोग इसके खिलाफ रहे। लोगों को यह भी समझना चाहिए कि जिस दिल्ली में आज प्रदूषण इतना बढ़ चुका है कि बच्चे भयानक बड़े पैमाने पर अस्थमा के शिकार हो रहे हैं, लोगों के फेफड़ों में जहर जमा हो रहा है, लोगों के घंटों सड़कों पर ट्रैफिक में फंसे हुए खराब हो रहे हैं, वहां पर अगर शहरी आवाजाही को सुधारने के लिए कोई प्रयोग हो रहे हैं, तो उन्हें शुरू होने के पहले ही खारिज करना एक बेअक्ली के सिवाय और कुछ नहीं होगा। 
लेकिन अकेले दिल्ली के मामले को लेकर लिखना हमारा मकसद नहीं है। अभी दो दिन छत्तीसगढ़ में भी देश भर के शहरी नियोजक इक_ा हुए, और टाऊन प्लानिंग पर चर्चा हुई। इसमें भी यह बात सामने आई कि शहरों में सार्वजनिक परिवहन बढ़ाए बिना गुजारा नहीं है। छत्तीसगढ़ की राजधानी भी भारी ट्रैफिक जाम झेलती है, और देश के सैकड़ों और शहरों का भी ऐसा ही हाल है। यह सिलसिला सार्वजनिक बसों या दूसरे साधनों की कमी से और निजी गाडिय़ों को बढ़ावा देने से आगे बढ़ते चल रहा है। यह अमरीका जैसा मॉडल है जिसमें जिसके पास निजी गाड़ी नहीं है, वह मानो जिंदा ही नहीं है। भारत को बहुत तेजी से इस नौबत को बदलना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है कि आज तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में डीजल-पेट्रोल की कीमतें जमीन पर आ गिरी हैं, और देश पर बोझ घटा है। लेकिन अगर यह कीमत एक तिहाई होने के बजाय तीन गुना हो गई होती, तो क्या भारत में लोग डेढ़ सौ रूपए लीटर का पेट्रोल खरीदकर चल पाते? अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतें भारत के हाथ में नहीं हैं, और किसी भी दिन दुनिया में कोई युद्ध छिडऩे से ऐसी नौबत आ सकती है। वैसी हालत में देश के लोग निजी गाडिय़ों को चलाते हुए दीवालिया हो जाएंगे, और इसलिए भी शहरों में लोगों के लिए सार्वजनिक गाडिय़ां जरूरी हैं जिनसे निजी किफायत हो, सरकार का पेट्रोलियम आयात घटे, प्रदूषण घटे, और शहरी ट्रैफिक जाम में लोगों का बर्बाद होने वाला वक्त भी घटे। आज आग लगी हुई नहीं है, इसलिए भारत को सार्वजनिक परिवहन बढ़ाने का एक मौका वक्त के साथ मिला हुआ है। समझदारी से और तेजी से इसका इस्तेमाल करके निजी गाडिय़ों पर निर्भरता घटानी चाहिए, और शहरों को बसों या दूसरे साधनों से ऐसा सुविधा-संपन्न बनाना चाहिए कि लोग अपनी अगली पीढ़ी को अस्थमा दिए बिना जा सकें। 
और यह भी जरूरी नहीं है कि बाकी का भारत दिल्ली के इस प्रयोग को देखने के बाद ही जागे। कई मामले ऐसे होते हैं जिनमें राज्यों में हुए प्रयोग से भी देश की राजधानी सीख और नसीहत ले सकती है, और हर राज्य को युद्ध स्तर पर स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों के मुताबिक शहरी आवाजाही के मॉडल विकसित करने चाहिए। 

खतरों से परे रहने वाले हिंदुस्तानियों में ऐसे भी...

9 जनवरी 2016
संपादकीय

इंटरनेट पर एक खबर तैर रही है कि मध्यप्रदेश के एक आईएएस अधिकारी डॉ. रोमन सैनी ने इस्तीफा दे दिया है। वे 2013 बैच के अफसर हैं, और अभी उनकी ट्रेनिंग भी पूरी नहीं हुई है। लेकिन वे पिछले कुछ समय से लगातार इंटरनेट पर वीडियो के माध्यम से शिक्षण-प्रशिक्षण का एक मौलिक काम कर रहे थे, और दिल्ली में गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम भी कर रहे थे। वे एम्स में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए दाखिले के इम्तिहान में देश में सोलहवें नंबर पर थे, और कमउम्र में डॉक्टर, आईएएस बनकर वे लगभग पूरे देश के सपने की तरह के थे। अब वे पढ़ाने के लिए अगर यह सब छोड़कर नए सिरे से कुछ करने जा रहे हैं, तो यह एक बड़ी अभूतपूर्व बात है। 
भारत में ऐसी बातें थोड़ी सी अटपटी हैं, लेकिन दुनिया में बहुत से देशों में लोग इस तरह के कई काम करते हैं जो कि जिंदगी सहूलियतों की हिफाजत से परे, खतरों से खेलते हुए, चुनौतियों को झेलते हुए की जाती हैं। अब अगर ऐसा नौजवान दूसरों को पढ़ाने के मकसद से देश की सबसे महत्वपूर्ण मानी जाने वाली नौकरी छोड़ रहा है, तो यह कई लोगों के लिए सोचने की एक बात है कि बंधी-बंधाई हिफाजत से परे भी अपने मन का कुछ बड़ा काम करना कितना मायने रख सकता है। बिहार में आनंद नाम का एक नौजवान सुपर-30 नाम से गरीब बच्चों के लिए एक क्लास चलाता है, और इन बच्चों को आईआईटी दाखिले में पास कराकर दम लेता है। उसके आधे से अधिक बच्चे आईआईटी पहुंच जाते हैं, और वह एक फक्कड़ की तरह गरीबी में यह काम करके मजा लेता है। अब हाल यह है कि अमरीका के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में उसे लेक्चर देने के लिए बुलाया जाता है। 
भारत की नौजवान पीढ़ी को यह समझने की जरूरत है कि बंधी-बंधाई कुछ गिनीचुनी सड़कों पर चलना जिंदगी की बेबसी नहीं होती। खुद को जो अच्छा लगे, वैसे काम में हाथ आजमाना भी इसलिए जरूरी होता है कि लोग अपनी अधूरी हसरतों को लेकर न चल बसें। भारत में बहुत से लोगों को किसी भी तरह का खतरा उठाना नासमझी लगती है, लेकिन दुनिया में वे ही लोग आगे बढ़ते हैं जो अपनी मर्जी के काम करने का हौसला रखते हैं। आज भारत के बहुत बड़े हिस्से में बच्चों की पढ़ाई तक मां-बाप ही तय करते हैं, वे ही उनके लिए कपड़े खरीदते हैं, और कोशिश करते हैं कि उनकी शादी भी वे ही अपनी मर्जी से करें। ऐसी दबी हुई पीढ़ी अपनी अपूरित इच्छाओं के साथ भड़ास में तो जीती है, लेकिन अपनी संभावनाओं को नहीं छू पाती। इसलिए इस नौजवान आईएएस के इस्तीफे की खबर लोगों को यह सोचने का मौका देती है कि बंधी-बंधाई नौकरी, या जमा-जमाया काम ही जिंदगी का अंत नहीं होना चाहिए। लोगों को अपने पंखों पर भरोसा रखना चाहिए, और उडऩे को तैयार रहना चाहिए।

आम जनता पर बोझ बने खास लोग कुछ सुधरें...

संपादकीय
8 जनवरी 2016

दिल्ली की एक खबर पिछले हफ्ते आई थी कि वहां की पुलिस का एक बहुत बड़ा हिस्सा वीआईपी ड्यूटी में लगे रहता है। अब आज मुंबई की एक दूसरी खबर है कि बड़े-बड़े फिल्मी सितारों की सुरक्षा व्यवस्था घटाई गई है। और हम अपने राज्य में लगातार यह देखते हैं कि किसी मंत्री या जज के निकलने पर सड़कों पर पुलिस दौड़-भागकर बाकी लोगों को हटाती है, और जब बिलासपुर के हाईकोर्ट से रायपुर के हवाईअड्डे तक किसी जज का आना-जाना होता है, तो पूरे रास्ते के हर थाने को खबर होती है, और जज की कार के आगे पुलिस की गाड़ी चलती है। 
छत्तीसगढ़ जैसा जो प्रदेश इतना गरीब हो कि एक रूपए किलो चावल मिलने पर  ही लोग दो वक्त खा पाते हैं वहां पर शान-शौकत के लिए पुलिस पर इस तरह का खर्च किया जा रहा है। और मुंबई के फिल्मी सितारों की हिफाजत के लिए पुलिस तैनात है। इन दोनों ही किस्म के मामलों में देश की बर्बादी रोकने की जरूरत है। जो सरकारी या अदालती ओहदों पर बैठे हुए लोग हैं, उन्हें कोई खतरा होने पर ही उनके लिए हिफाजत का इंतजाम होना चाहिए, न कि उन ओहदों पर बैठे हुए हर किसी के साथ पुलिस तैनात कर दी जाए। दूसरी तरफ जिन पैसे वाले लोगों को पुलिस की हिफाजत की जरूरत है, उनसे एक तगड़ी वसूली की जानी चाहिए जो कि पुलिस बल के प्रशिक्षण से लेकर उनकी पेंशन तक के खर्च के हिसाब से रोजाना के रेट पर तय हो, और वह वसूली जाए। 
जो ताकतवर लोग हैं उनको खुद भी सार्वजनिक जीवन में इतना विनम्र रहना चाहिए कि वे जनता पर बोझ न बनें, चाहे वह सरकारी खर्च पर हो, या जनता की जिंदगी पर। सार्वजनिक जगहों पर ऐसे तथाकथित वीआईपी या वीवीआईपी लोगों के इंतजाम में भी बड़ी कटौती की जरूरत है। हम पहले कई मौकों पर यह बात भी लिखते आए हैं कि सार्वजनिक सफर में किसी भी ओहदे पर बैठे हुए व्यक्ति को सुरक्षा जांच से छूट नहीं मिलनी चाहिए। हमने देश के बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोगों को तरह-तरह के जुर्म में शामिल देखा है। अब ऐसे कोई लोग किसी हथियार के साथ, किसी तरह की तस्करी करते हुए सफर करें, तो उसमें जरा भी हैरानी की बात नहीं होगी। इसलिए सुरक्षा जांच से छूट तो किसी को भी नहीं मिलनी चाहिए। आज छोटी-छोटी कुर्सियों पर बैठे हुए लोग भी सरकार से बंदूकों की हिफाजत मांगते हैं, और इस चक्कर में रहते हैं कि विमानतल पर किस तरह वे बिना जांच के जा सकें। यह पूरा सिलसिला बड़ा अलोकतांत्रिक है, और खत्म होना चाहिए। 

जोगी से परे छत्तीसगढ़ कांग्रेस, और कांग्रेस से परे जोगी

संपादकीय
7 जनवरी 2016

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के इतिहास में विद्याचरण शुक्ल और श्यामाचरण शुक्ल को पार्टी से निकालने की कार्रवाई के बाद यह शायद तीसरी सबसे बड़ी कार्रवाई है जब अमित जोगी को पार्टी से निकाला गया है, और अजीत जोगी को निकालने का प्रस्ताव पारित करके पार्टी हाईकमान को फैसले के लिए भेज दिया गया है। बरसों से इस किस्म की सुगबुगाहट चली आ रही थी, और प्रदेश के लोगों को हर बार ऐसा लगता था कि अब शायद जोगी पिता-पुत्र पर पार्टी विरोधी हरकतों की वजह से कार्रवाई होगी, लेकिन लोगों का अनुभव यह था कि सोनिया गांधी के पास जोगी के खिलाफ किसी तरह की कोई सुनवाई नहीं होती, और सारी सिफारिश धरी रह जाती है। प्रदेश में कांग्रेस के एक से अधिक अध्यक्षों का अनुभव यही रहा कि दिल्ली में जोगी के खिलाफ कोई सुनवाई नहीं होती, और सोनिया के दरबार में उनकी पकड़ एक रहस्य बनी रहते आई है। अजीत जोगी सार्वजनिक रूप से हर मौके पर यह बात भी कहते आए हैं कि उनके परिवार के सारे मामले सोनिया गांधी खुद तय करती हैं, और वे अपने राजनीतिक फैसले खुद नहीं लेते।
छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति को दूर से देखने वाले लोगों का भी यह अनुभव रहा है कि अजीत जोगी और उनके बेटे का कांग्रेस संगठन के साथ शतरंज के घोड़े की तरह का ढाई घर का रिश्ता रहते आया है। चरणदास महंत हों, या धनेन्द्र साहू, या फिर भूपेश बघेल, अजीत जोगी के लिए इनमें से किसी को भी बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं था, और ऐसे दर्जनों मौके हैं जब दिल्ली से आए हुए कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में अजीत जोगी ने प्रदेश के बाकी तमाम बड़े नेताओं के खिलाफ आवाज उठाई, और अपने लोगों से उठवाई। दरअसल जोगी का बर्ताव कांग्रेस के बाकी तमाम छत्तीसगढ़ी नेताओं के लिए बड़ी हिकारत का रहते आया है, और मौके-बेमौके उन्होंने इसे जाहिर करने से कोई परहेज नहीं किया। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री रहते हुए अजीत जोगी ने सरकार और संगठन को जिस तरह से अकेले चलाया, वे उस ताकत की याद और हसरत से कभी उबर नहीं पाए, और पिछले बारह बरस वे किसी और कांग्रेस नेता को बर्दाश्त नहीं कर पाए। 
लेकिन अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के कुछ समुदायों पर खासी पकड़ रखने की वजह से भी जाने जाते हैं, और उन पर लगातार ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि चुनावों में वे बहुत से कांग्रेस उम्मीदवारों को हराने का काम करते हैं। यह कांग्रेस पार्टी का भीतरी मामला है, और जनता के हक में महज यह हैरानी है कि ऐसे आरोपों के बावजूद कभी जोगी पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? लेकिन अनगिनत बरसों से छोटी और बड़ी अदालतों में लगातार जाति के मामले, नागरिकता या चुनाव याचिका के मामले झेलते हुए अमित जोगी और अजीत जोगी एक असाधारण लड़ाई लड़ते आए हैं। हत्या के मामले में अमित जोगी के जेल में कटे बरस को लेकर भी लोगों को लगता था कि उनकी ताकत टूट जाएगी, लेकिन वैसा नहीं हुआ। मुख्यमंत्री रहते हुए जोगी ने भाजपा के दर्जन भर से अधिक विधायकों का जिस तरह दल-बदल कराया, जिस तरह उसके बाद उनका नाम चुनाव हारने के बाद भाजपा विधायकों की खरीद-फरोख्त से जुड़ा, जिस तरह वे मुख्यमंत्री रहते हुए कांग्रेस पार्टी से निलंबित हुए, और जिस तरह एक  सड़क हादसे के शिकार होकर पहियों वाली कुर्सी पर आ गए, वह एक बहुत ही असाधारण जीवट जीवन है। 
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पास पसंद बड़ी साफ दिखाई पड़ती है। या तो कांग्रेस पार्टी को जोगी के हवाले कर दिया जाए, और बाकी तमाम नेताओं को कांग्रेस से हटा दिया जाए, तो अजीत जोगी प्रदेश में सरकार बनाने की ताकत रखते हैं। और दूसरी तरफ जोगी पिता-पुत्र को पार्टी से हटा दिया जाए, तो बाकी नेता प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनाने की ताकत रखते हैं। लेकिन कोई अगर यह सोचे कि इन दोनों पक्षों का सहअस्तित्व बनाए हुए कांग्रेस पार्टी इस प्रदेश में कभी सरकार में आए, तो वह एक असंभव सी बात लगती है। राजनीति में संभव या असंभव कुछ नहीं होता, और किस तरह जमीन पर गिरने के बाद उठकर आसमान तक पहुंचा जाता है, यह अजीत जोगी ने कई बार साबित किया है। लेकिन अब देखना यह है कि कांग्रेस पार्टी की बर्दाश्त के ऊपर से पानी निकल जाने के बाद कांग्रेस हाईकमान की आंख खुलती है या नहीं? और अगर पिता-पुत्र दोनों को कांग्रेस से हटा दिया जाता है, तो वे राज्य में एक तीसरी प्रादेशिक शक्ति के रूप में उभर सकते हैं, या नहीं? कांग्रेस से परे जोगी छत्तीसगढ़ के चुनावों में एक ऐसा त्रिकोण बना सकते हैं, जो मतगणना तक सभी लोगों को बेचैन रख सकता है। फिलहाल कांग्रेस पार्टी को यह तय करना है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को जोगी परिवार को लीज पर देकर चुनाव जीतने की उम्मीद करे, या जोगी से परे बाकी कांग्रेस नेताओं को पार्टी में रखे। 

हमलावर सोच वाले अमरीका में ओबामा के आंसू बेमतलब

संपादकीय
6 जनवरी 2016

अमरीका में घर-घर में बिखरे हथियारों से हर दिन कोई न कोई बेकसूर मारे जा रहे हैं, और वहां पर हथियार बनाने वाली कंपनियां इन पर किसी तरह की रोक लगने नहीं देती। आज वहां पर गन-कंट्रोल की वकालत करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा रो पड़े। उन्होंने इस बात पर तकलीफ जताई कि हर दिन कहीं न कहीं बेकसूर बच्चे मारे जा रहे हैं। 
यह बात सही है कि हॉलीवुड की फिल्मों से लेकर दुनिया भर में अमरीकी जंग की कहानियों तक, और अमरीका के घर-घर में फैले हुए भयानक हथियारों तक से अमरीकी मिजाज हमलावर और कातिल सा हो गया है। लेकिन कोई अगर यह सोचे कि हथियार बनाने वाली कंपनियों से परे भी अमरीकी जनता खुद होकर हथियारों का मोह छोड़ पाएगी, तो इसके लिए उस देश को अपनी पूरी सोच बदलनी पड़ेगी। जिस देश में यह लंबा इतिहास हो कि दुनिया के बेकसूर देशों पर जाकर किस तरह बमबारी की जाए, किस तरह सरकारें पलटी जाएं, कैसे अपने जहाजी बेड़े दूसरे देशों में भेज दिए जाएं, उस देश में घरेलू सोच को हथियारों के आकर्षण से बचा पाना मुमकिन नहीं है। चूंकि हर आम अमरीकी वियतनाम या इराक जाकर फौजी विमानों से बम नहीं बरसा सकते, इसलिए वे हॉलीवुड के हीरो या विलेन की तरह हथियारों को थामकर अपनी हसरत पूरी करते हैं। वे निशानेबाजी के अभ्यास के लिए शूटिंग रेंज में जाते हैं, बंदूकें लेकर जंगलों में शिकार के लिए जाते हैं, और घर-घर में हथियार सजाकर रखते हैं। दुनिया का यह सबसे विकसित देश इस कदर के बावलेपन का शिकार है कि आत्मरक्षा के नाम पर वहां पर लोगों को ऐसे हथियार खरीदने की इजाजत है जो कि मिनटों में सैकड़ों की जान ले सकते हैं। यह हथियार किसी भी तरह से आत्मरक्षा के लिए बने ही नहीं हैं, तब तक जब तक कि कोई फौज ही किसी घर पर हमला न कर दे। और ऐसे हथियारों के साथ जीते और सोते हुए लोग कब तनाव के किसी पल में उन्हें लेकर विश्वविद्यालयों में घुस जाते हैं, या स्कूलों में घुस जाते हैं, और दर्जनों को मारकर आ जाते हैं। 
अमरीका दरअसल एक बहुत ही हिंसक मानसिकता का देश कई मायनों में बन गया है। जानलेवा हथियारों से परे भी पर्यावरण के मुद्दों से लेकर कारोबार के कानूनों तक अमरीका दूसरे देशों पर धाक जमाए रखता है। और वहां की सरकारों की यही सोच वहां की जनता के दिल-दिमाग में भी समा जाती है। अपने देश को दुनिया का रखवाला, दुनिया का सबसे ताकतवर, दुनिया का सबसे लोकतांत्रिक देश मानकर चलने वाले अमरीकी धरती पर अपना एक अनोखा हक मानकर चलते हैं। वे कुदरत के दिए हुए साधनों का सबसे अधिक इस्तेमाल, और बेजा इस्तेमाल, करते हैं, और बाकी दुनिया को प्रदूषण का बोझ उठाने का जिम्मा दे देते हैं। अमरीका हथियारों पर पाबंदी लगाए, यह तो उसका घरेलू मामला है, लेकिन बाकी दुनिया पर एक दादा की तरह हमले करे, यह तो संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं के सोचने का भी मुद्दा है जिन्हें कि अमरीका ने पांव-पोंछने जैसा बनाकर रखा है। 
फिलहाल अमरीकी राष्ट्रपति के आंसू अधिक मायने इसलिए नहीं रखते क्योंकि अमरीका में साल भर में घरेलू हथियारों से जितने अमरीकी मारे जाते हैं, उनसे सौ गुना अधिक बेकसूर दूसरे देशों में अमरीकी फौजें जाकर मारते आई हैं। अमरीका चूंकि मीडिया में छाए रहता है, इसलिए वहां ओबामा के आंसू दुनिया की हर टीवी स्क्रीन से टपकने लगते हैं, लेकिन अमरीका जब तक अपनी हमलावर सोच को नहीं मिटाएगा, तब तक उसके लोगों का मोह भी निजी हथियारों से कम नहीं होगा। यही एक फर्क है जो कि भारत जैसे अमन-पसंद देशों और अमरीका में हमेशा बने रहेगा। गांधी की बताई राह के चलते आम हिन्दुस्तानी लाठी तक से बचे रहते हैं। इस बारे में अमरीका को हिन्दुस्तान जैसे देशों से सीखना चाहिए। 

भारत-पाक अमन की कोशिशें कभी भी आतंकी साजिशों से परे नहीं रह पाईं हैं...

संपादकीय
5 जनवरी 2016

पंजाब में भारतीय वायुसेना के अड्डे पर आतंकी हमले से भारत में लोग बहुत विचलित हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सहयोगी दलों के लोग भी अपना बर्दाश्त खो रहे हैं, और शिवसेना ने खासे कड़े शब्दों में कहा है कि  गणतंत्र दिवस की परेड के हथियार क्या महज दिखाने के लिए हैं? दूसरी तरफ पाकिस्तान में लोगों का यह कहना है कि अभी आतंकी-हमलावरों के पाकिस्तानी होने की शिनाख्त भी नहीं हुई है, और पाकिस्तान पर तोहमत लगाना ठीक नहीं है। पाकिस्तान का एक तर्क यह भी है कि वह खुद अपनी जमीन पर आतंकी हमलों से परेशान है, और आए दिन वह खुद जिंदगियां खोते रहता है। भारतीय प्रधानमंत्री जाहिर है कि ऐसी नौबत में एक तनाव से घिरे हुए होंगे क्योंकि वे सौ कदम आगे बढ़कर खुद पाकिस्तान हो आए हैं, और अब वे पाकिस्तान की तरफ से हुए दिखने वाले हमलों को लेकर चुप रहने पर मजबूर हैं।
लेकिन सरहद के दोनों तरफ के जो समझदार लोग हैं वे हमेशा से यह कहते आए हैं कि जब कभी दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधरने की नौबत आती है, तो आतंकी या साजिश करने वाले लोग समझौता एक्सप्रेस को पटरी से उतारने में लग जाते हैं। और यह बात काफी हद तक सही भी है। पाकिस्तान के साथ भारत के मुकाबले एक दिक्कत अधिक यह भी है कि वहां की फौज शायद देश की सरकार के काबू में उस तरह नहीं रहती जिस तरह भारत में एक मजबूत लोकतंत्र के चलने की वजह से है। लेकिन जैसा कि बड़े बुजुर्ग कह गए हैं, आप अपने दोस्त तो छांट सकते हैं, पड़ोसी नहीं छांट सकते, इसलिए पड़ोसियों से बेहतर रिश्तों की कोशिश हर समझदार-जिम्मेदार को करनी चाहिए। भारत और पाकिस्तान न सिर्फ पड़ोसी हैं, बल्कि दोनों के बीच रोटी-बेटी के रिश्ते सदियों से चले आ रहे हैं, जब देश दो नहीं थे, सरहद नहीं थी, तब भी ये रिश्ते थे, और आज भी बनते हैं। फिर इन दोनों देशों के बीच संस्कृति, खेल, कला, और साहित्य का लेनादेना इतना अधिक है कि कोई सरहद इनके बीच अच्छी नहीं लगती। ऐसे में जब आतंकी इन दो देशों के रिश्ते बिगाड़कर जंग खड़ी करने की कोशिश करते हैं, तो उनकी नीयत से हर किसी को चौकन्ना रहने की जरूरत है।
भारत चूंकि एक बड़ा देश है, इसमें लोकतंत्र अधिक मजबूत है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हालत पार्टी के भीतर, सरकार के भीतर, और फौज पर, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के मुकाबले बहुत अधिक मजबूत है, इसलिए बड़प्पन दिखाने की अधिक जिम्मेदारी मोदी पर ही है। लेकिन मोदी यह बड़प्पन निभा पाएं, इसकी जवाबदेही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर भी आती है कि उनको खुलकर, खुद होकर यह खुलासा करना चाहिए कि भारत के भीतर हुए इस आतंकी हमले से उनके देश के किन लोगों का क्या लेना-देना हो सकता है, और ऐसी नौबत रोकने के लिए वे क्या कर रहे हैं? जब तक पाकिस्तान की तरफ ऐसा दिलासा नहीं आएगा, तब तक इस बात को भारत में अधिक लोग नहीं मानेंगे कि पाकिस्तानी आतंकियों को रोक पाना पाकिस्तान के लिए मुमकिन नहीं है। इन दोनों देशों के बीच सद्भावना न सिर्फ रहनी चाहिए, बल्कि दिखनी भी चाहिए। दोनों देशों के भीतर के लोग एक-दूसरे के खिलाफ जिस तरह की भड़काऊ बातें कहते आए हैं, उनके चलते भरोसा आसानी से कायम नहीं हो सकता, और इसके लिए सार्वजनिक रूप से बोलना भी जरूरी है।


बाजारों के ढांचे का इस्तेमाल चौबीसों घंटे क्यों नहीं हो?

संपादकीय
4 जनवरी 2016

केन्द्र सरकार की खबर है कि वह दुकानों, बाजार या रेस्त्रां चौबीसों घंटे खुले रखने की इजाजत देने के लिए कानून में बदलाव लाने की तैयारी में है। आज देश का यह आर्थिक ढांचा आमतौर पर आधे वक्त ही काम आता है, और बड़े शहरों में भी बाजार रात से सुबह तक बारह घंटे बंद रहते हैं। एक तरफ तो दिल्ली जैसे शहर गाडिय़ों के प्रदूषण से घबराकर बड़े कड़े प्रयोग कर रहे हैं, और दूसरी तरफ कल्पनाशीलता की कमी लोगों में है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से छत्तीसगढ़ सरकार को यह सलाह देते आ रहे हैं कि होटल, रेस्त्रां देर रात तक खुले रहने चाहिए, और बाजार भी, जिससे कि दिन में ट्रैफिक की भीड़ के बीच लोगों को बाजार निपटाने की मजबूरी न हो। आज लोगों के काम के समय अलग-अलग हैं, लोग शिफ्ट में ड्यूटी करते हैं, पढऩे वाले नौजवान देर रात तक जागते हैं, और लोगों की खरीददारी की सहूलियत अलग-अलग समय पर रहती है। 
दरअसल सरकार जब कभी कारोबार पर बहुत अधिक नियमों को लादती है, तो उसका नुकसान देश की अर्थव्यवस्था को भी झेलना पड़ता है। आज क्या वजह है कि टीवी चैनल चौबीसों घंटे काम करते हैं, लेकिन लोगों को खाने का सामान देर रात नहीं मिल पाता। और तो और बाजार सुनसान होने से दवा की दुकानें भी इक्का-दुक्का ही खुली रहती हैं। जो लोग दिन में खरीददारी नहीं कर पाते, वे रात में बाजार नहीं जा पाते। दिन में पार्किंग की जगह नहीं, और रात में शटर बंद। यह सिलसिला पहले से खत्म होना था, लेकिन सरकारों की आदत अनंतकाल से नियमों को थोपने की है। आज केन्द्र सरकार के सामने यह मुद्दा इसलिए भी खड़ा है कि लोग इंटरनेट पर ऑनलाईन खरीददारी करते चल रहे हैं, और बाजारों का भौतिक ढांचा पिछड़ते चले जा रहा है। लोग दो बजे रात भी ऑनलाईन सामान छांटकर ऑर्डर कर देते हैं, लेकिन बाजार नहीं जा पाते। यह सिलसिला जितनी जल्दी खत्म हो, उतना ही अच्छा है। 
इसके साथ एक बात और है, जब भारत पर्यटकों की उम्मीद करता है, अंतरराष्ट्रीय पूंजीनिवेश पाने की कोशिश करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय शहरों के तौर-तरीकों को भी सीखना पड़ेगा। दुनिया के विकसित और बड़े शहर दिन-रात एक ही तरह काम करते हैं, और उसका फायदा उनके लोगों को भी मिलता है, पर्यटकों को भी, और अर्थव्यवस्था को भी। दिल्ली शहर में आज बाहर से आए पर्यटक रात आठ बजे के बाद हस्तकला का कोई सामान नहीं खरीद सकते, हाथकरघे के कपड़े नहीं खरीद सकते, क्योंकि बाजार बंद करने का नियम है। ऐसे में पर्यटकों का सीमित समय न उनके काम आ पाता, और न ही भारत के दुकानदारों को देशी-विदेशी सैलानियों से हो सकने वाली संभावित कमाई हो पाती है। 
भारत की सरकारी सोच को ग्राहक और बाजार इन दोनों के लिए दोस्ताना नजरिया बनाना होगा, आज तो सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोग इस बात के लिए बेताब रहते हैं कि कैसे दूसरों पर अपना हुक्म लादा जाए। अब पूरी दुनिया की सरकारें बाजार के मुताबिक चल रही हैं, और देश से लेकर छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेशों तक भाजपा की सरकारें हैं, और यह पार्टी व्यापारियों की हमदर्द मानी जाती है। इन सबको देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार को भी यह सोचना चाहिए कि जहां केन्द्र के कानूनी फेरबदल की जरूरत नहीं है, वहां पर वह खुद किस तरह अपने शहरों की जिंदगी को लंबा कर सकती है, बाजारों को देर तक खोलकर, और ट्रैफिक जाम कम करके। 

पैर गया पर हौसला नहीं, आसमान छूते हुए पहाड़ों को जीतने की कहानी

संपादकीय
3 जनवरी 2016

भारत की एक पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा ने अभी दुनिया की पांचवीं चोटी पर फतह पाई है। वे इसके पहले अपने कृत्रिम पैर के सहारे एवरेस्ट जीत चुकी हैं, और अर्जेंटीना की करीब सात हजार मीटर ऊंची पर्वत चोटी को जीतकर वे कृत्रिम पैर वाली दुनिया की ऐसी पहली महिला भी बन गई हैं। एक ट्रेन हादसे में अरुणिमा अपना पैर खो बैठी थी, लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा था, और पर्वतारोहण का अपना शौक जारी रखा था। वह एवरेस्ट पर चढऩे वाली कृत्रिम पैर वाली पहली महिला थी। अरुणिमा सीआईएसएफ की नौकरी के लिए इम्तिहान देने जा रही थी कि चोरों ने उनका बैग छीनने के फेर में उनको ट्रेन से धक्का दे दिया था, और वे गिरकर पैर गंवा बैठी थीं। 
ऐसा हादसा और खोया हुआ पैर, अच्छे-अच्छे लोगों का हौसला पस्त कर सकता था, लेकिन अरुणिमा तो उसके बाद भी कुदरत की बनाई दुनिया की ऊंची पहाड़ी चोटियों को जीतते ही चल रही हैं। ऐसे लोगों की कहानी स्कूलों में पढ़ाई जानी चाहिए, ताकि लोग अपनी जिंदगी की छोटी-छोटी दिक्कतों को बहाने की तरह इस्तेमाल न कर सकें, और ऐसी मिसाल से हौसला पाकर आगे बढ़ सकें। पहाड़ों को जीतने वाले लोग ऐसे ही दीवाने होते हैं। कई बरस पहले एक दूसरे पर्वतारोही की कहानी सामने आई थी जिसने दोनों पैर कट जाने के बाद भी नकली पैरों से एवरेस्ट जीता था। और इतनी बर्फीली पहाडिय़ों पर स्टील के पैरों से चढ़ते हुए उसके पैरों का कुछ हिस्सा गल गया था, और लौटने पर ऑपरेशन करके कटे हुए पैरों को और काटना पड़ा था, और उस वक्त उसने कहा था कि एवरेस्ट जीतने के मुकाबले यह नुकसान कुछ भी नहीं है, उसे कोई भी अफसोस नहीं है। ऐसे भी बहुत से लोग एवरेस्ट जीत चुके हैं जो कि देख नहीं पाते, और छड़ी की मदद से, गाईड के साथ चलते हुए, खुद पहाडिय़ां चढ़कर वे एवरेस्ट जीत आते हैं। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अभी पिछले ही हफ्ते विकलांग कहे जाने वाले लोगों के बारे में कहा था कि जब उनके शरीर के कोई अंग काम नहीं करते हैं, तो दूसरे अंग सामान्य से अधिक अच्छा काम करने लगते हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया था कि विकलांग की जगह दिव्यांग शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए। अंग्रेजी विकलांग को अपमानजनक मानकर उसकी जगह, विशिष्ट क्षमता वाले लोग, शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। हिन्दी में भी अपमानजनक शब्दों को छोड़कर नए शब्द ढूंढने या गढऩे चाहिए। शब्दों के जो गूढ़ या प्रचलित अर्थ होते हैं, उनका एक सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक प्रभाव पडऩे लगता है। इसलिए शब्दों के अर्थ सिर्फ डिक्शनरी के नजरिए से नहीं देखने चाहिए, और उनको आधुनिक संदर्भों में अधिक संवेदनशील तरीके से दुबारा तौलना चाहिए कि वे सदियों से चले आ रहे सामाजिक अन्याय को तो नहीं बढ़ा रहे। जब हम विशिष्ट क्षमताओं वाले लोगों की बात करते हैं, तो अंग्रेजी के इन शब्दों का हिन्दी में कोई असरदार और स्वाभाविक लगता हुआ विकल्प नहीं सूझता है। इसलिए मोदी की यह बात गौर करने के लायक है, और हो सकता है कि वह इस्तेमाल भी होने लगे। 
हम अरुणिमा सिन्हा की ताजा कामयाबी की इस चर्चा में यह भी अनदेखा नहीं कर सकते कि वह एक महिला होते हुए भी हौसले के ऐसे काम कर रही है जिनको भारतीय सामाजिक संदर्भों में महिलाओं के लिए बहुत माकूल नहीं माना जाता। महिलाओं के बारे में सोच यही है कि उनको हिफाजत से घर पर रहना चाहिए, लेकिन जब वे दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों पर पहुंचती हैं, समंदर चीरकर रिकॉर्ड कायम करती हैं, अंतरिक्ष तक चली जाती हैं, तो उससे महिलाओं पर लगने वाली बंदिशों की दकियानूसी सामाजिक सोच को भी बदलने की गुंजाइश निकलती है। महिलाओं की कामयाबी की कहानियां, विशिष्ट शारीरिक जरूरतों या क्षमताओंं वाले लोगों की कामयाबी की कहानियां, गरीब या समाज में दबे-कुचले जाति-धर्म के लोगों की कामयाबी की कहानियां औरों को एक अच्छी राह दिखा सकती हैं। सरकार और समाज को मुफ्त में मिलने वाली ऐसी प्रेरणा को बच्चों तक पहुंचाना चाहिए, ताकि अगली पीढ़ी हौसलामंद हो सके। 

अदनान सामी के बहाने से उग्र राष्ट्रवाद पर कुछ चर्चा

संपादकीय
2 जनवरी 2016

एक पाकिस्तानी गायक अदनान सामी पिछले बहुत बरस से हिन्दुस्तान में रह रहे थे, और भारतीय नागरिकता की अर्जी दे रखी थी। नए साल के पहले दिन केन्द्र सरकार ने उन्हें नागरिकता दी और उसके बाद अदनान सामी ने भारत के प्रति देशप्रेम की बहुत सी बातें कहीं। उनको लेकर कुछ लोग सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना कर रहे हैं, कि जो अपनी ही मातृभूमि का न हुआ, वह किसी और देश का क्या होगा। 
दरअसल भारत और पाकिस्तान के बीच सरकारों और फौजों में रिश्तों की कड़वाहट इतनी अधिक है कि उनकी हमलावर बयानबाजी के चलते मीडिया और सोशल मीडिया के तेवर भी बिना किसी बात के देशभक्ति और देशद्रोह जैसे दो तबकों में बंट जाते हैं। दुनिया के कुछ दूसरे हिस्सों को देखें, तो योरप या अमरीका में लोग पूरी-पूरी जिंदगी काम करते रह जाते हैं, और उनकी नागरिकता उनके आड़े नहीं आती। योरप में तो एक यूरोपीय समुदाय बनाकर देशों के बीच आवाजाही के लिए वीजा की जरूरत भी खत्म कर दी है, और अनगिनत ऐसे मामले हैं जिनमें परिवार के अलग-अलग लोग अलग-अलग देशों के नागरिक रहते हैं, और उनका परिवार भी चलता है, और कारोबार भी चलता है। 
भारत और पाकिस्तान में जो लोग एक कट्टर राष्ट्रवाद के शिकार हैं, उनको यह समझना चाहिए कि सरहद की जरूरत कुछ मामलों में तो होती है, लेकिन हर मामले में सरहद को बीच में डालकर नफरत और तनाव को खड़ा करके चलना, सरहद के दूसरी तरफ के लोगों को दुश्मन करार देना, अपने देश के असहमत लोगों को दूसरे देश भेजने के फतवे जारी करना, धर्म के नाम पर, धर्म के आधार पर लोगों को देशद्रोही या किसी दूसरे देश का करार देना, यह सब ऐसे तंगनजरिए, और ऐसी तंगदिली की बातें हैं कि जिनसे नुकसान छोड़ और कुछ नहीं होता। जिन लोगों की दिलचस्पी सरहद पर तनाव में रहती है, धर्म को लेकर नफरत फैलाने में रहती है, फौजी सामान खरीदने में रहती है, वे लोग कभी भी अपनी जनता को राष्ट्रवाद के झांसे के बाहर निकलने नहीं देना चाहते। राष्ट्रवाद अपने देश के भले पर टिका हो, तब तो ठीक है, लेकिन जिस राष्ट्रवाद को किसी दूसरे देश से नफरत पर टिका दिया जाए, वह राष्ट्रवाद दूसरे देश का नुकसान कर सके या न कर सके, वह आत्मघाती जरूर होता है। 
अदनान सामी का मामला न तो पाकिस्तान के खिलाफ कोई मामला है, और न ही भारत के गर्व का कोई मामला है। इस मामले को सही संदर्भों में, और सही अनुपात में ही महत्व देना चाहिए। अमरीका में तो हर बरस दुनिया भर के देशों से लाखों लोग आकर नागरिकता की कतार में लगते हैं, ऐसे में अगर अमरीका अपने पर गर्व करने पर आमादा हो जाए, तो उसके पास और कोई भी काम करने के बजाय चौबीसों घंटे बस गर्व करने का काफी सामान मौजूद है। जिन देशों के पास असली गौरव की बातें कम होती हैं, वे एक नामौजूद इतिहास को लेकर झूठा गौरव खड़ा करने लगते हैं, जो किसी दूसरे के खिलाफ अपनी नफरत को भी अपना गौरव साबित करने लगते हैं, ऐसे लोगों से किसी भी समझदार देश को सावधान रहने की जरूरत है। 
भारत में ही नहीं, कम समझदार लोगों की भीड़ वाले बहुत से देशों में आम जनता को ऐसे राष्ट्रवादी उन्माद में झोंकने वाले कट्टरपंथी हमेशा रहते आए हैं, और ये बहुत बड़ा नुकसान करते हैं। समझदार लोगों को यह मानना चाहिए कि अपनी मां से मोहब्बत करने के लिए पड़ोस की औरत से, किसी और की मां से नफरत करना जरूरी नहीं होता है। फिर दूसरी बात यह है कि देशों के बीच असल जिंदगी की हकीकत मातृभूमि की सोच से परे भी रहती है। सिर्फ देशप्रेम से दुनिया के किसी भी देश के लोगों का पेट नहीं भरता, और लोगों को नारों से परे देश के विकास पर ध्यान देना चाहिए। 
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नए साल पर क्या संकल्प लें? कुछ छोटी-छोटी नसीहतें...

संपादकीय
1 जनवरी 2016

नया साल आ चुका है। जो लोग इसके आने के जश्न को नहीं भी मना पाते हैं, वे भी नए साल के लिए कई किस्म की बातें सोचना शुरू करते हैं कि इस बरस में कौन-कौन सा बुरा काम छोड़ेंगे, और कौन-कौन से अच्छे काम करना शुरू करेंगे। हमने भी कुछ दिन पहले ही इसी किस्म की कुछ सलाह पाठकों को दी थीं, लेकिन जिस तरह हम बहुत से मुद्दों पर एक से अधिक बार इस जगह पर लिखते हैं, आज फिर उस मुद्दे पर लिख रहे हैं, क्योंकि इंसान का मिजाज ही ऐसा होता है कि वे कुछ तारीखों से जोड़कर कुछ तय करने की कोशिश करते हैं, कभी जन्मदिन से, तो कभी किसी और सालगिरह से, तो कभी किसी त्यौहार से जोड़कर लोग कुछ संकल्प लेते हैं। बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि ऐसे दिनों पर लिए गए संकल्प किसी किनारे नहीं पहुंचते, और बेकार हो जाते हैं। 
लेकिन हमारा मानना है कि किसी संकल्प के पूरे होने की संभावना उसे लेने के बाद ही शुरू हो सकती है, जब तक लोग इस बात के लिए कसम खाने की सोचें भी नहीं, तब तक क्या हो सकता है। इसलिए हर किसी को ऐसे मौके पर अपने, और अपने आसपास के लोगों के बारे में सोचना-विचारना चाहिए, और कुछ अच्छे काम करने का इरादा जुटाकर उसकी कोशिश जरूर करनी चाहिए। कोशिश में नाकामयाब भी वे ही लोग हो सकते हैं, जो कि उसकी कोशिश करते हैं। जंग के बारे में कहा जाता है कि गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में...। मतलब यह कि जो कोशिश करते हैं उन्हीं का तो बाद में मूल्यांकन हो सकता है, जो इतने लापरवाह रहते हैं कि कभी कोशिश भी नहीं करते, उनको कौन आंकता है। 
हम कुछ छोटी-छोटी बातें आज यहां पर सुझाते हैं, जो कि हमारे तकरीबन हर पाठक पर लागू होती हैं, और इनमें से अपने फायदे की और अपनी मर्जी की बातों को छांटकर लोग अगले दो दिन अपने मन के भीतर, अपने परिवार में, और अपने दोस्तों में इसकी चर्चा करके खुद भी एक नया बरस तय कर सकते हैं, और आसपास के लोगों को इसके लिए सोचने पर मजबूर भी कर सकते हैं। अब जैसे सबसे पहली बात जो हमको सूझती है, वह है सिगरेट-बीड़ी, और तम्बाकू से परे रहने की। हमारे पाठकों में से शायद एक चौथाई ऐसे होंगे, जो इनमें से किसी एक आदत के शिकार होंगे। इनको यह सोचना चाहिए कि अगर मुंह या गले का कैंसर इनको हुआ, या कैंसर ने इनके फेफड़े खा लिए, तो ये लोग परिवार पर किस तरह का बोझ बन जाएंगे, और किस तरह आधे रास्ते में अपने परिवार को छोड़कर वे चल बसेंगे। इसी तरह की बात शराब पीने वालों के साथ हो सकती हैं, खासकर जो लोग अधिक पीते हैं, और गरीबी के बावजूद पीते हैं। जो लोग इसका खर्च उठा सकते हैं, और काबू के भीतर पीते हैं, उनके लिए यह शायद उतनी नुकसानदेह नहीं है, जितनी कि सिगरेट हो सकती है। लेकिन बुरी लत कब बढ़कर बेकाबू हो जाती है, यह किसने देखा है?
संपन्न तबकों के कुछ लोगों का खानपान बड़ा नुकसानदेह रहता है। जरूरत से अधिक घी-तेल, मुर्गा-मछली, या अधिक तला हुआ, अधिक नमक या अधिक शक्कर वाला खाना या तो आज ही तकलीफ दे देता है, या फिर लंबी बीमारियों की शुरुआत करता है। ऐसे परिवार यह तय कर सकते हैं कि नए साल में वे किस तरह अपने खानपान को अधिक सेहतमंद बनाएंगे, और इसकी जानकारी अधिक मुश्किल भी नहीं है, बाजार में ऐसी सस्ती किताबें मौजूद हैं जो कि खानपान की खामियों और खूबियों के वैज्ञानिक तथ्य बतलाती हैं। लोगों को एक-दूसरे को ऐसी कुछ अच्छी किताबें भी नए साल के तोहफे में देना चाहिए, और आगे का खानपान भी बेहतर बनाने का संकल्प लेना चाहिए। बहुत से लोगों को यह लगता है कि आजकल खानपान और जीवन शैली से होने वाली तमाम बीमारियों के इलाज कुछ दाम पर ही सही, मौजूद हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं है, कितना भी महंगा और अच्छा इलाज हो, वह पूरी भरपाई कभी नहीं कर सकता। इसलिए पूरे घर को इस बारे में बैठकर तय करना चाहिए, इससे बड़े लोगों का तो तुरंत ही भला होगा और छोटे बच्चों की बेहतर आदतें शुरू होंगी। 
एक और मुद्दा जो हमको बहुत जरूरी लगता है और जिसके बारे में हम लगातार लिखते और छापते हैं, वह है हेलमेट का। दुपहिया दुर्घटनाओं में होने वाली अधिकतर मौतें ऐसी रहती हैं जो कि हेलमेट लगने से टल सकती हैं, या कम से कम बहुत गंभीर चोट से लोग बच सकते हैं, और बाकी पूरी जिंदगी अपाहिज की तरह रहने की बेबसी से भी। लोगों को अपने आसपास के लोगों के बारे में भी यह तय करना चाहिए कि वे बिना हेलमेट दुपहियों पर नहीं बैठेंगे। 
एक और बात जो जरूरी है और लोग जिसे अनदेखा करते हैं, वह है एक स्वस्थ जीवन शैली की। लोग घूमने नहीं जाते, कसरत नहीं करते, योग, ध्यान या प्राणायाम नहीं करते। ये तमाम बातें लोगों को मुफ्त में मिली हुई हैं, और जिसे यह लगता है कि उनके जीवन में इनके लिए समय नहीं है, उन्हीं के जीवन में इन बातों की जरूरत उतनी अधिक है। हम तो सिर्फ इतना ही याद दिला सकते हैं कि कसरत और योग जैसे बचाव के काम में लोग जितना समय लगाएंगे, उससे कई गुना अधिक समय उनकी जिंदगी में बढ़ जाता है, और जिंदगी कम तकलीफदेह भी हो जाती है, और अधिक उत्पादक भी हो जाती है। इस बारे में हर किसी को जरूरत सोचना चाहिए, और यह भी याद रखना चाहिए कि दुनिया के अधिकतर सफल लोग अपने तन और मन के लिए बचाव के ऐसे काम करते हैं, और नुकसान उनसे दूर रहता है। ऐसा करके लोग बुढ़ापे में महंगे इलाज की जरूरत से भी बच सकते हैं। इनमें से किसी भी बात के लिए कुछ खर्च करने की जरूरत नहीं रहती। 
इसके बाद की अच्छी बातों के लिए हम लोगों को उनकी कल्पना के साथ छोड़ देते हैं, क्योंकि जब भी वे आसपास के समझदार लोगों के साथ बैठकर नए साल के संकल्पों के बारे में बात करेंगे, लोग भी उनको सलाह दे सकेेंगे।