जिनका समर्पण दिखाया जा रहा है, उन्हें आदिवासी लिखना ही ठीक है

9 मई 2016

बस्तर की खबरों को लेकर सोशल मीडिया पर एक बहस छिड़ी है कि वहां समर्पण करने वाले या फरार घोषित आदिवासियों को आदिवासी लिखा जाए, या नक्सली लिखा जाए? छत्तीसगढ़ के एक प्रमुख अखबार की खबरों की कतरनों को लगाकर कुछ लोग यह आपत्ति कर रहे हैं कि आदिवासियों का समर्पण कहना गलत है और अखबार की इस बात के लिए आलोचना हो रही है।
अब अगर अखबारनवीसी की बुनियादी तकनीक के हिसाब से देखें और आदिवासियों के प्रति न्याय के हिसाब से देखें, तो उन्हें आदिवासी लिखना बेहतर है। वे नक्सली हैं, या नहीं, इसे तो अदालत में साबित होते बरसों लग जाएंगे, लेकिन वे आदिवासी हैं, इसमें तो कोई शक है नहीं, और उनके आदिवासी होने की वजह से ही उनकी अधिक फिक्र की जाती है, और अधिक फिक्र की भी जानी चाहिए। जो लोग सोशल मीडिया पर अखबार की आलोचना कर रहे हैं, वे भी आदिवासियों के लिए जाहिर तौर पर फिक्रमंद लोग हैं, और यह फिक्र होनी भी चाहिए।
अखबारनवीसी और इंसाफ इन दोनों के हिसाब से जब भी किसी कमजोर तबके के खिलाफ जुल्म होता है, तो उसके साथ उसके तबके का जिक्र इसलिए जरूरी हो जाता है कि समाज में लोग ध्यान से देखें और समझें कि दलित, या आदिवासी, या गरीब, या महिला, बुजुर्ग, बच्चे, इनके साथ किस तरह की ज्यादती हो रही है। इसीलिए देश में अलग-अलग ऐसे कानून बनाए गए हैं जो कि इन तबकों की अधिक हिफाजत करते हैं जो कि हिंसा या जुर्म के अधिक शिकार होते हैं। आदिवासी वैसा ही एक तबका हैं, और इसलिए जब पुलिस के सामने उनके समर्पण की कोई खबर बनती है, तो उसमें आदिवासी का समर्पण लिखा जाना सही है।
दूसरी तरफ इससे आगे बढ़ें, तो अखबारनवीसी और इंसाफ दोनों की मांग यह है कि जब तक कोई अपराधी साबित न हो जाए, तब तक उसे मुजरिम लिखा नहीं जाना चाहिए। इसलिए जब तक कोई नक्सली साबित न हो जाए, तब तक उसके बारे में नक्सल आरोपों में गिरफ्तार, या नक्सल आरोपों के साथ समर्पण जैसी भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन इन दिनों मीडिया शब्दों की कटौती के फेर में इस बुनियादी इंसाफ को किनारे रखकर चलता है, और आरोपी या संदिग्ध जैसे शब्द इस्तेमाल होना धीरे-धीरे घटते जा रहा है, इसकी एक वजह यह भी है कि बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार लिखने के बजाय बलात्कारी गिरफ्तार लिखने पर वजन कुछ अधिक पड़ता है, यह अलग बात है कि यह सिरे से ही गलत भाषा है, और बेइंसाफी की भाषा है।
अखबारों की जुबान में बेइंसाफी बढ़ती चली जा रही है, और यह एक आम लापरवाही है जो कि टीवी की खबरों को देख-देखकर भी अखबारों पर हावी हो रही है। टीवी की स्क्रीन पर ब्रेकिंग न्यूज के लिए शब्द इतने गिने-चुने रहते हैं कि वहां पर सच को उसके अनुपात के साथ लिखने की जहमत कोई नहीं उठाते। इसलिए आनन-फानन किसी को भी हत्यारा लिख दिया जाता है, किसी को भी आतंकी लिख दिया जाता है, बरसों तक आतंकी करार देना जारी रहता है, और दस-दस बरस बाद ऐसे लोग अदालतों से बाइज्जत बरी होकर जेल से बाहर आते हैं, लेकिन तब तक मीडिया उनकी इज्जत की मिट्टीपलीद कर चुका रहता है।
बस्तर में जिन आदिवासियों का आत्मसमर्पण बताया जा रहा है, उनके बारे में बस्तर के आम लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, और मीडिया के एक बड़े हिस्से का यह मानना है कि ये बेकसूर आदिवासी हैं, और इनको नक्सल बताकर, इनके समर्पण की तैयारी में पहले से इनके ऊपर ईनाम की मुनादी करके इन्हें खासा बड़ा नक्सली साबित करने की पुलिसिया तैयारी की जाती है। ऐसे मामलों की हकीकत तो जांच के बाद अदालत में ही सामने आएगी, लेकिन अभी चार दिन पहले (एक अमरीकी मीडिया के लिए) रिकॉर्ड किए गए एक लंबे इंटरव्यू में सोनी सोरी ने मुझसे कहा कि उनके खिलाफ दायर किए गए छह मुकदमों में से पांच में वे बाइज्जत बरी हो चुकी हैं, और छठवां झूठा मुकदमा भी इसी तरह खारिज होना तय है। उन्होंने यह भी बताया कि  उनके पति के खिलाफ भी एक झूठा मुकदमा चलाया गया था जिससे वे बरसों जेल में रहने के बाद बरी हुए, और फिर जल्द ही मर भी गए।
छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर में बैठे हुए बड़े अफसर यह मानते हैं कि बस्तर में चल रहे ऐसे समर्पण बड़े पैमाने पर फर्जी हैं, लेकिन उनका यह मानना है कि इससे नक्सलियों का मनोबल टूट रहा है। उनका तर्क यह भी है कि ऐसे समर्पण से आदिवासियों का सिर्फ फायदा ही हो रहा है, कोई भी नुकसान नहीं हो रहा है। कुछ सबसे बड़े अधिकारी आपसी बातचीत में अपनी सोच बताते हैं कि ऐसा समर्पण करने वाले हर आदिवासी को सरकार की तरफ से दस हजार रूपए मिलते हैं, और आत्मसमर्पित नक्सली के रूप में सरकारी नौकरी के लिए भी प्राथमिकता मिलती है। इसके बाद पुलिस उन्हें परेशान करना भी बंद कर देती है, तो इससे उनका नुकसान क्या है?
एक बहुत बड़े अफसर ने कुछ हफ्ते पहले मुझसे बातचीत में यह पूछा था कि मानवाधिकार आंदोलनकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, या मीडिया के कुछ लोग ऐसे समर्पण पर आपत्ति क्यों जाहिर करते हैं? उनका कहना था कि अगर ये समर्पण झूठे भी हैं, तो भी इन पर आपत्ति तो सिर्फ सरकार को होनी चाहिए क्योंकि ऐसे लोगों को सरकारी खजाने से दस-दस हजार रूपए तुरंत दिए जाते हैं। उनका मानना था कि आदिवासी को तो फायदा ही फायदा है, भले ही वह नक्सली रहा हो, या न रहा हो।
इस तर्क को सुनकर मैं यह सोचते रह गया कि क्या शहर में रहने वाले अफसर और नेता ऐसे किसी फायदे के चेक के लिए अपने आपको नक्सली करार देकर समर्पण करना चाहेंगे? एक आदिवासी की जिंदगी की आजादी, उसकी इज्जत, इन सबको दस हजार में तौलने वाली सरकार के आखिर कितने ऐसे लोग होंगे जो कि दस लाख रूपए के लिए भी अपने को नक्सली बताकर पुलिस के सामने समर्पण करके उसकी तस्वीर अखबारों में देखकर खुश होंगे?
इसलिए ऐसे तमाम आत्मसमर्पण में मैं लोगों को नक्सली लिखे जाने के खिलाफ हूं, और उन्हें आदिवासी लिखे जाने का हिमायती हूं। इसके साथ-साथ ऐसी तमाम खबरों में यह जिक्र साफ-साफ होना चाहिए कि इन्हें नक्सल आरोपों में गिरफ्तार किया गया है, या इन पर नक्सल आरोप थे, और इन्होंने समर्पण किया है। आरोपों के जिक्र के बिना तमाम लोग मुजरिम साबित करार दिए जाते हैं, और ऐसा तो अदालत मेें जाकर भी दस फीसदी मामलों में भी नहीं हो पाता। सरकार और राजनीति में बैठे हुए बड़े-बड़े बहुत से लोग कई तरह के मुकदमे झेलते हैं, क्या उन तमाम लोगों को सीधे-सीधे मुजरिम लिखकर मीडिया बच सकता है? मुकदमे शुरू होने और उनके खत्म होने तक कोई ताकतवर लोगों को नक्सली, भ्रष्ट, अनुपातहीन सम्पत्ति का मालिक लिखकर तो देखे, उनके खिलाफ आनन-फानन मानहानि के मुकदमे दर्ज हो जाएंगे।
लेकिन बस्तर के गरीब और बेजुबान आदिवासी दो तरफ की बंदूकों के बीच जंगल में अकेले जीते हैं, और उन्हें वहां के नेताओं का भी कोई सहारा नहीं रहता जो कि उनके नाम पर जीतकर विधायक और सांसद बनते हैं, मंत्री बनते हैं, और कमाते-खाते हैं। ऐसे बेसहारा लोगों को जो बंदूक चाहे, वह मार देती है, जिसकी कटार चाहे वह उनके गले काट देती है, जो चाहे वह उन्हें पुलिस मुखबिर बताकर मौत दे देता है, और जो चाहे वह उन्हें नक्सली बताकर उनका समर्पण करवा देता है। और ऐसे बेसहारा लोगों के मामले भी लडऩे के लिए उन्हें कोई वकील न मिलें, इसलिए बस्तर से उन वकीलों को नक्सली करार देकर भगवाया जाता है जो कि अपने पेशे की सबसे इज्जतदार परंपरा के तहत गरीबों के मामले-मुकदमे मुफ्त लड़ते हैं। कल के दिन गरीबों का मुफ्त इलाज करने वालों को मारा जाएगा, उसके बाद गरीबों की खबरों को मुफ्त में छापने वाले लोगों को मारा जाएगा, और गरीबों को केवल सरकार पर आश्रित किया जाएगा।
इस साजिश को समझने की जरूरत है। सत्ता दुनिया भर में इस तरह की कई साजिशें करती हैं, और यह किसी एक पार्टी या किसी एक देश-प्रदेश की साजिश नहीं है। इसलिए आज आदिवासियों के हमदर्द जो सामाजिक कार्यकर्ता मीडिया की इस जुबान पर आपत्ति कर रहे हैं कि समर्पण करने वाले लोग आदिवासी हैं, वे एक बुनियादी चूक कर रहे हैं। वे नक्सली नहीं हैं, वे आदिवासी हैं, और उन पर जो नक्सल तोहमत दस हजार के दाम पर थोपी जा रही है, वह तो किसी जांच आयोग या अदालत में जाकर ही साबित हो सकती है। पुलिस की चतुराई यह है कि वह इनके खिलाफ कोई मुकदमे चलाने नहीं जा रही, इसलिए उनके नक्सली होने और न होने की बात उनके समर्पण और सरकारी चेक के साथ ही दफन हो जाएगी, और वे एक आंकड़ा बन जाएंगे, पुलिस की बनाई तस्वीर में भरने के लिए।
लेकिन दुनिया का इतिहास गवाह है कि बेजुबानों पर हुई ज्यादती के लिए सदियों बाद भी लोगों को माफी मांगनी पड़ती है। ऑस्ट्रेलिया की संसद में अभी कुछ बरस पहले उन आदिवासियों को न्यौता भेजकर सदन के भीतर बुलाया, और पूरी संसद में खड़े होकर वहां उनसे माफी मांगी क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के गैरआदिवासी, शहरी और संपन्न तबके ने कोई एक सदी पहले उनसे उनके बच्चे छीन लिए थे कि शहरों में वे बच्चे अधिक सभ्य और शिक्षित बनेंगे। ऑस्ट्रेलिया में इसे स्टोलन-जनरेशन (चुराई गई पीढ़ी) कहते हैं। हो सकता है कि इस सदी के चलते, और हो सकता है कि अगली सदी में हिन्दुस्तान की सरकारें इस बात के लिए विधानसभाओं और संसद में आदिवासियों से माफी मांगेंगी कि उन्होंने आदिवासियों को झूठा नक्सली करार देकर दस हजार रूपए में उन पर तोहमत थोपी थी। फिलहाल ऐसे समर्पण को नक्सली कहना सामाजिक कार्यकर्ताओं की नासमझी होगी, और उन्हें आदिवासी ही कहा जाना चाहिए।

भारतीय फौज घटना अच्छा संकेत, फौजी खर्च और घटे

संपादकीय
9 मई  2016
भारतीय सेना नॉन कॉम्बेट सेक्शन में कर्मचारियों की संख्या कम करने की तैयारी कर रही है। सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह सुहाग ने इस पर एक टीम बनाकर स्टडी करने के लिए आदेश दिए हैं। इस फैसले की वजह खर्च कम करना और सेना को सही आकार में लाना है। भारतीय सेना में फिलहाल 10.2 लाख कर्मचारी हैं। भारतीय सेना दुनिया की दुनिया सबसे बड़ी आर्मी है। 2005 से 2013 के बीच आर्मी में 14 हजार नौकरियां पहले ही कम की जा चुकी हैं।
यह एक मायने में एक अच्छी खबर हो सकती है अगर भारत के चारों तरफ अलग-अलग देशों के साथ उसके रिश्ते ऐसे सुधरें कि इन तमाम देशों को अपनी फौज घटाना ठीक लगने लगे, तो उससे हिन्द महासागर के इस पूरे इलाके में गरीबी दूर हो सकती है। इस पूरे क्षेत्र में अगर एक-दूसरे के सामने मोर्चे पर डटने वाले देश हैं, तो वे महज तीन हैं। भारत, चीन, और पाकिस्तान। इसमें से भी आपसी तालमेल जाहिर तौर पर कुछ ऐसा है कि चीन और पाकिस्तान के बीच कोई टकराव न आज है, न आने वाले दिनों में उसका कोई आसार दिखता है। इसलिए पाकिस्तान को महज भारत के खिलाफ फौजी तैयारी करनी पड़ती है। लेकिन भारत को पाकिस्तान के अलावा चीन के खिलाफ भी तैयारी रखनी है, और इसलिए भारत की फौज इतनी बड़ी भी है।
हमारा यह मानना है कि परमाणु हथियारों के इस जमाने में बहुत बड़ी थलसेना किसी काम की नहीं है, और समझदार देशों को अपने पड़ोसियों से रिश्ते ठीक रखकर फौजी खर्च घटाना भी चाहिए। पाकिस्तान तो अपनी अर्थव्यवस्था से परे अमरीका से मिलने वाली मदद से ही फौजी तैयारी बढ़ाता है, और देश की अर्थव्यवस्था चौपट पड़ी है। पाकिस्तान अपने भीतर के फौजी, साम्प्रदायिक, और आतंकी तनावों से अगर उबर सके, तो वह भारत के साथ तनाव घटा सकता है, और अपना खर्च भी खासा घटा सकता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामले इतने आसान नहीं रहते हैं जितने कि हम उनको देखना चाहते हैं। हो सकता है कि चीन भारत को उलझाए रखने के लिए पाकिस्तान को फौजी मोर्चे पर अधिक तैयारी के साथ डटाकर रखना चाहता हो। लेकिन भारत और पाकिस्तान ऐसे किसी तीसरे उकसावे या भड़कावे से दूर रहकर अपनी जनता को देखना चाहिए, न कि हथियारों के सौदागरों को फायदा पहुंचाकर दलाली और कमीशन खाने के।
इन दोनों ही देशों में आजादी से लेकर अब तक गरीबी और भुखमरी, कुपोषण और अशिक्षा का बुरा हाल है। लेकिन तनाव के चलते ये दोनों देश परमाणु ताकत बने हुए हैं, और शायद ये परमाणु ताकत रखने वाले दुनिया के सबसे गरीब देश भी हैं। ये ऐसे महंगे हथियारों के ऐसे ऊंचे जखीरों पर बैठे हुए देश हैं, जो कि केवल विकसित देशों के न्यूक्लियर क्लब के पास रहते थे। इन तमाम बातों को हम निहायत फिजूल मानते हैं, और यह सिलसिला थमना चाहिए। भारतीय सेना में अभी जो कसावट लाई जा रही है हम उसकी बारीकियों को नहीं समझते, लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच लगातार ऐसी कोशिशें जारी रहना चाहिए और खर्च के साथ-साथ तनाव भी घटते जाने से दोनों देश एक-दूसरे के विकास में अधिक काम आ सकेंगे, और दोनों के बीच कारोबार से जनता का फायदा होगा। 

बददिमाग सत्ता करती है सड़कों पर हत्या-बलात्कार

संपादकीय
8 मई  2016
बिहार में एक विधायक के बेटे ने कार ओवरटेक करना एक दूसरी कार वाले नौजवान को भारी पड़ गया। विधायक-पुत्र ने उसे गोली मारी, और फरार हो गया। नाराज जनता सड़कों पर है, विपक्ष ने मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांगा है, और सरकार कार्रवाई का भरोसा दिला रही है। अभी कुछ ही दिन पहले की बात है बिहार की सत्ता में भागीदार दूसरी पार्टी के फरार विधायक को एक बलात्कार-केस में गिरफ्तार किया गया है। वैसे बिहार इतना बड़ा राज्य है और वहां पर पहले जुर्म का इतना बोलबाला रहता था कि ऐसी गिनी-चुनी घटनाओं को प्रदेश के राजकाज का हाल मानना ठीक नहीं है, लेकिन हत्या से नीचे भी सत्ता की बददिमागी के कई अलग-अलग दर्जे होते हैं, और वैसे तमाम मामले खबरों में नहीं आ पाते क्योंकि जुर्म में नहीं गिनाते।
हम अपने आसपास छत्तीसगढ़ में भी यह देखते हैं कि न सिर्फ सत्तारूढ़ पार्टी, बल्कि विपक्षी दल भी, और उनसे जुड़े हुए कारोबारी-ठेकेदार भी जिस अंदाज में गाडिय़ों में सायरन लगाकर चलते हैं, नंबर प्लेट की जगह सच्चा या झूठा ओहदा लिखाकर चलते हैं, और जिस बददिमागी से सड़कों पर बर्ताव करते हैं, उससे लगता है कि लोकतंत्र में सभ्यता और परिपक्वता आने के बजाय बददिमागी अधिक आती जा रही है। और यह बात न तो नई है, और न ही किसी एक पार्टी तक सीमित है। कदम-कदम पर लोगों को ताकत के प्रदर्शन का शिकार होना पड़ता है, और लोग सत्ता में आते ही विनम्रता खोकर अपने ही इलाके में लोगों को कुचलते हुए चलने लगते हैं। दरअसल यह सिलसिला खत्म इसलिए नहीं हो सकता कि भारत में ऊंची अदालतों के जज भी पुलिस की पायलट गाड़ी के साथ चलते हुए सायरन और बत्तियों से सड़कों को कुचलते हुए, आम जनता को किनारे फेंकते हुए, जनता के पैसों को बर्बाद करते हुए दिखते हैं, और यह सिलसिला कार्यपालिका में बैठे मंत्री-अफसरों से लेकर विधायिका के सांसदों और विधायकों तक जारी रहता है। और तो और अब सामाजिक और धार्मिक संगठनों के लोग भी इसी अंदाज में अपनी बददिमागी की तख्तियां लगाए और सायरन बजाते दिखते हैं।
लोकतंत्र में जनता के आम अधिकार सबसे ऊपर होने चाहिए, लेकिन भारत में लोगों के बुनियादी नागरिक अधिकार उसी वक्त सांस लेने की इजाजत पाते हैं जब ताकतवर तबकों के लोगों की जरूरतें पूरी हो जाती हैं। हमारा यह मानना है कि नागरिक अधिकारों के हिमायती कुछ लोगों को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगाकर यह पूछना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को गाडिय़ों पर बत्तियों की जरूरत क्या है, या अपने गाडिय़ों के साथ सायरन बजाती पुलिस की गाडिय़ों की जरूरत क्या है? क्या वे लोग आग बुझाने के अंदाज में कहीं जाकर फैसला सुनाने वाले हैं? या उनका वक्त किसी खोमचे वाले के वक्त से अधिक कीमती कैसे है? और सड़कों की बददिमागी तो सत्ता की ताकत से परे अब पैसों की ताकत पर इस तरह आ गई है कि आए दिन किसी न किसी प्रदेश से खबर आती है कि ताकतवर लोगों ने कैसे दूसरे लोगों को कुचलकर मार डाला, रईसों के नाबालिग बच्चों ने कितनों को कुचला, और किस तरह मारपीट कर या गोली मारकर हत्या की गई। इसकी एक वजह यह भी है कि जो मामले जुर्म के दर्जे में आते हैं, उनमें भी सजा की गुंजाइश न के बराबर रहती है, और कभी सजा हो भी गई तो वह इतनी दूर होती है कि सलमान खान जमानत पर रहते हुए भी ओलंपिक का ब्रांड एम्बेसडर बन सकता है, या इस तरह की दूसरी इज्जत पा सकता है, या प्रधानमंत्री से उनके घर-दफ्तर जाकर मिलकर सरकार से अपनी फोटो जारी करवा सकता है। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए और एक सभ्य लोकतंत्र की तरह जनता के आम अधिकार सबसे ऊपर माने जाने चाहिए। किसी देश का विकास सड़कों और पुलों से नहीं होता, उस देश में कमजोर तबके और आम लोगों के अधिकारों के सम्मान से होता है। 

देश भर में सारे चुनाव एक साथ होने से गैरजरूरी टकराव घटेगा

संपादकीय
7 मई  2016
कुछ समय पहले केन्द्र सरकार के स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से यह राय सामने आई कि देश में एक बार फिर सारे चुनाव एक साथ करवाना शुरू होना चाहिए, ताकि लोकसभा, विधानसभाओं, और स्थानीय संस्थाओं के कोई न कोई चुनाव पूरे वक्त चलते ही न रहें। नतीजा यह होता है कि सरकारों में बैठे हुए केन्द्र और राज्य के नेता न सिर्फ चुनावी नफे-नुकसान वाली बयानबाजी करते हैं, बल्कि उनके सरकारी फैसले भी किसी न किसी चुनाव को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं, और नुकसान देश-प्रदेश की जनता का होता है। कई बार गैरजरूरी मुद्दे ठीक चुनाव को ध्यान में रखकर उठाए जाते हैं, और महीनों तक कोई पार्टियां, या कोई नेता, या केन्द्र या राज्य दंगल के अंदाज में एक-दूसरे से उलझे दिखते हैं।
अब सूखे और भूखे बुंदेलखंड में केन्द्र सरकार की भेजी हुई टैंकरों वाली रेलगाड़ी क्या पहुंच गई, उसे लेकर भाजपा की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार, और समाजवादी पार्टी की उत्तरप्रदेश सरकार के बीच बयानों की तलवारें खिंच गईं। भारत का संघीय ढांचा इस तरह का नहीं है कि केन्द्र और राज्य स्थाई रूप से टकराव में बने रहें, और काम चलता रहे। ऐसे टकराव का नतीजा आमतौर पर राज्य के नुकसान का होता है, क्योंकि राज्य से केन्द्र को जाने वाले टैक्स तो रूकते नहीं, केन्द्र से राज्य को आने वाले आबंटन, अनुदान, और सहायता, इन सबमें फर्क पड़ सकता है। यही वह मोर्चा होता है जिसमें केन्द्र सरकार कई बार राज्यों के साथ भेदभाव बरतती है, या बरत सकती है। इसलिए राजनीति से परे रहते हुए राज्यों को केन्द्र के साथ उलझना नहीं चाहिए। इसकी एक मिसाल हम छत्तीसगढ़ में देखते हैं जहां भाजपा की रमन सरकार ने केन्द्र में यूपीए की दो पारियों के दस बरसों में उससे एक भी टकराव मोल नहीं लिया, और नतीजा यह निकला कि राज्य के कोई भी काम केन्द्र में नहीं रूके, और ऐसी कोई तिमाही या छमाही नहीं गुजरी कि छत्तीसगढ़ को केन्द्र सरकार का कोई पुरस्कार न मिला हो। और तो और देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा जिस नक्सल हिंसा को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बताया था, उस मोर्चे पर भी छत्तीसगढ़ और केन्द्र के बीच कोई भी टकराव नहीं हुआ, कोई मतभेद नहीं हुआ, और जब इस राज्य में केन्द्र के अर्धसैनिक बड़ी संख्या में मारे गए, तब भी एक-दूसरे पर कोई तोहमतें नहीं लगाई गईं, और कई गृहमंत्री आए-गए, तालमेल ठीक बने रहा।
हमारा यह मानना है कि देश में अगर चुनाव एक साथ हो सकते हैं, तो उससे बहुत किस्म की सार्वजनिक-राजनीतिक कड़वाहट खत्म हो सकती है। कुछ महीनों के भीतर सारे चुनाव निपट जाएं, नेता और पार्टियां अपने दिल-दिमाग की सारी गंदगी को इन महीनों में देश-प्रदेश में खर्च कर लें, और उसके बाद सब नहा-धोकर देश को चलाने में लग जाएं। आज केन्द्र में कोई भी पार्टी रहे, राज्यों के आने वाले चुनावों को ध्यान में रखते हुए कई किस्म के मामले उठते हैं, कई किस्म की घोषणाएं की जाती हैं। और तो और मीडिया के चुनिंदा हिस्सों में किस तरह की खबरें गढ़ी जाएं, कब कौन से इंटरव्यू लिए जाएं, और दिखाए या छापे जाएं, ऐसे कई राजनीतिक फैसले देश पर हावी रहते हैं। इससे परे एक बड़ा मुद्दा चुनावी खर्च का भी है, और सरकारी मशीनरी से लेकर सत्ता पर काबिज नेताओं की उत्पादकता और उनके समय का भी है। सरकारों के बहुत से फैसले अफसरों और नेताओं की चुनावी व्यस्तता के चलते लेट होते हैं, और इन सबको साथ-साथ चुनाव होने से सुधारा जा सकता है। देश में लुभावनी चुनावी घोषणाओं के लिए चुनाव का दबाव रहता है और कई तरह की अनुत्पादक योजनाएं सामने रखी जाती हैं। इन सबसे बचने का एक अच्छा तरीका पांच बरस में एक बार सारे चुनाव एक साथ करवाने का हो सकता है। और इसका साल और महीना तय करने के लिए संसद, चुनाव आयोग, और राजनीतिक दल मिलकर एक लॉटरी से भी वक्त तय कर सकते हैं क्योंकि चुनाव का कोई भी वक्त कुछ न कुछ सरकारों का कार्यकाल काटकर छोटा करेगा ही। लेकिन एक साथ चुनाव देश के हित में हैं, और उस पर आम सहमति बनाने की कोशिश होनी चाहिए।

जख्मी युवती के कपड़े खुलवाते साक्षी महाराज की जगह जेल है

संपादकीय
6 मई  2016
उत्तरप्रदेश के मैनपुरी से एक भयानक वीडियो सामने आया है जिसमें भाजपा के एक सबसे साम्प्रदायिक और हिंसक सांसद साक्षी महाराज एक युवती की चोटें देखने के लिए उसकी जींस खुलवाते बैठे दिखते हैं, और आसपास बहुत सी महिलाओं के साथ-साथ बहुत से आदमी भी खड़े होकर देख रहे हैं। साक्षी महाराज नाम का यह भगवाधारी उस लड़की के कपड़े खुलने को टकटकी लगाकर देखते हुए बैठा है।
भारत में यह एक भयानक नौबत है कि धर्म का चोगा पहने हुए लोग कुछ भी करने की आजादी पा रहे हैं। हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के नेता तरह-तरह के फतवे जारी कर रहे हैं, और उनमें से बहुत से हमलों का शिकार लड़कियां और महिलाएं हैं। धर्मों के साथ-साथ जाति पंचायतें भी जुट गई हैं, और रही-सही कसर पूरी करने को बहुत से राजनीतिक दलों के नेता भी महिलाओं पर जुबानी हमलों में अपना योगदान लगातार देते हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जिस उत्तरप्रदेश में यह ताजा घटना वीडियो की वजह से सबके सामने आई है, वहां पर महिला आयोग क्या कर रहा है, मानवाधिकार आयोग क्या कर रहा है, और इन्हीं दोनों आयोगों के राष्ट्रीय स्तर के संगठन क्या कर रहे हैं? हमारे हिसाब से तो उत्तरप्रदेश के हाईकोर्ट को तुरंत ही इस वीडियो पर साक्षी महाराज समेत बाकी तमाम लोगों को भी नोटिस जारी करना था, और अदालत के कटघरे में खींचना था। अगर इस देश में न्यायपालिका संवेदनशील होती, तो सुप्रीम कोर्ट भी इस तरह के अनगिनत हमलों पर आए दिन नोटिस जारी करता, ऐसे कुछ नेताओं को जेल भेजता, और बकवास का ऐसा सिलसिला थम पाता। लेकिन आज नौबत यह है कि एक पार्टी के हिंसक-बकवासी नेताओं के मुकाबले जब दूसरी पार्टियों के इन्हीं जैसे मानसिक-डीएनएधारी लोग बकवास करते हैं, तो दोनों पार्टियों के पास एक-दूसरे की सहूलियत भरी मिसालें रहती हैं।
और ऐसे हमलों में औरत और मर्द में भी कोई फर्क नहीं है। हम पहले भी एक घटना को कई बार गिना चुके हैं कि किस तरह बंगाल की मुख्यमंत्री बनते ही ममता बैनर्जी के सामने जब कोलकाता के एक चर्चित बलात्कार का मामला आया, तो पल भर में उन्होंने उसे अपनी सरकार को बदनाम करने की राजनीतिक साजिश करार दे दिया था। यह एक और बात है कि कुछ महीनों के भीतर ही उन्हीं की मातहत पुलिस ने उनकी बकवास पर गौर किए बिना बलात्कार को पकड़कर अदालत में पेश कर दिया, और शायद उसे सजा भी हो गई है। कई राजनीतिक दलों की महिलाएं देश की लड़कियों और महिलाओं को बलात्कार से बचने के लिए ऐसी नसीहतें देते दिखती हैं जिनसे महिलाओं के हक कुचलने के अलावा और कुछ नहीं होता।
इस देश में संवैधानिक संस्थाएं उन पर लोगों को मनोनीत करने वाली पार्टियों की सरकारों के लिए असुविधा रोकने की मशीन बनकर रह गई हैं। ऐसे में अदालत को ही लगातार दखल देकर महिलाओं के खिलाफ, कमजोर तबकों के खिलाफ ऐसी जुबानी हिंसा, और ऐसे हिंसक प्रदर्शन पर कार्रवाई करनी चाहिए, क्योंकि यह सिलसिला बढ़ते ही जा रहा है। देश की न्यायपालिका के सामने यह जिम्मेदारी है कि जब कार्यपालिका और विधायिका कमजोर तबकों के हक की गारंटी से बचें, तो अदालत को दखल देना ही चाहिए। एक हिंसक और साम्प्रदायिक फसादी सांसद जब भगवा कपड़ों से लदा हुआ एक युवती के कपड़े खुलवा रहा है, और वहां खड़े बाकी मर्दों की टोली के साथ-साथ खुद भी टकटकी लगाकर उस युवती का बन देख रहा है, तो उसकी जगह जेल के अलावा और कुछ नहीं होनी चाहिए।

छत्तीसगढ़ में थोक में होतीं सड़क मौतों की कुछ वजहें

संपादकीय
5 मई  2016
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में एक तेज रफ्तार मुसाफिर बस की दुर्घटना में पन्द्रह लोगों की मौत हो चुकी है और बहुत से घायलों को लाने के लिए मुख्यमंत्री ने वायुसेना का हेलीकॉप्टर वहां भेजा है, और साथ ही सीआरपीएफ के जवान भी भेजे हैं। यह तो छत्तीसगढ़ में नक्सल मोर्चे के लिए आए हुए अधिक क्षमता के ये हेलीकॉप्टर मौजूद हैं, और बाहर से आए हजारों जवान अर्धसैनिक भी, इसलिए राज्य को कई मामलों में इनकी मदद मिल रही है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसी सड़क-मौतों को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है, और उसमें से सरकार क्या कर रही है?
सरगुजा के भीतरी इलाकों में निजी ट्रैवल कंपनियों की बसें किस रफ्तार से दौड़ती होंगी, इसका अंदाज लगाने के लिए वहां जाने की जरूरत नहीं है, रायपुर शहर से ही जब ये बसें सुबह या रात में रवाना होती हैं, तो उनका अंदाज फायर ब्रिगेड जैसा रहता है कि मानो ये मुसाफिर लेकर न जा रही हों, और आग बुझाने कहीं पहुंचना हो। यह कारोबार एक संगठित मनमानी से चलता है, और इन पर काबू करने वाले परिवहन और पुलिस विभागों की दिलचस्पी भी इस मनमानी को रोकने में नहीं दिखती। आए दिन बसों से होने वाली मौतों की खबरें तो आती हैं, लेकिन बाकी लोग किस तरह इनकी खूनी रफ्तार के सामने से किनारे हटकर अपने आपको बचाते हैं, उनकी कोई खबर नहीं बनती, उनका महज एहसास किया जा सकता है।
लंबे समय से छत्तीसगढ़ में यह सुनाई पड़ता है कि गाडिय़ों की बेलगाम रफ्तार को रोकने की कोशिश होगी, ओवरलोड रोकने की कोशिश होगी, बसों में जो लोग गैरकानूनी तरीके से सीटें या स्लीपर लगवा लेते हैं, उन्हें रोकने की कोशिश होगी या नशे में गाड़ी चलाते ड्राइवरों को रोकने की कोशिश होगी, लेकिन इनमें से होता कुछ नहीं है। आरटीओ का अमला ट्रांसपोर्ट के सभी तरह के कारोबार के साथ भागीदारी के अंदाज में रियायत करते दिखता है, और यही हाल ट्रैफिक या बाकी पुलिस का भी रहता है। ऐसे में हादसे के बाद मुख्यमंत्री या राज्यपाल की तरफ से शोक संदेश और मुआवजे की खबरों से गई हुई जिंदगियां नहीं लौटतीं, लेकिन हादसों के पहले ऐसी कोशिशें जरूर हो सकती हैं जिनसे कि ऐसी मौतों का खतरा घटे, और बेकसूर मुसाफिर न मारे जाएं।
हम भी ऐसे हर बड़े हादसे के बाद इस तरह की नसीहतों को लिखते-लिखते थक गए हैं। एक समय था जब अविभाजित मध्यप्रदेश में जिला स्तर तक यातायात सुधार समितियां रहती थीं, और उनमें अखबारों के लोग भी रहते थे, कारोबार और शहर के दूसरे प्रमुख लोग भी रहते थे। छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद से वैसी कमेटियां खत्म हो गई हैं। सरकार को चाहिए कि इनके बारे में भी सोचे कि क्या सरकार से बाहर के कुछ लोगों को सलाहकार समितियों में रखने से सरकार को योजनाएं सुधारने में कोई फायदा मिलेगा? जनता के प्रतिनिधियों की भागीदारी योजनाओं और नीतियों में रहनी चाहिए, और हम सिर्फ विधायकों और सांसदों को जनता के प्रतिनिधि नहीं मानते, जिन लोगों को राजनीति और सत्ता से सीधा कुछ लेना-देना नहीं रहता, उन लोगों को भी सरकार से जोडऩा चाहिए। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय यातायात सुधार समितियों का बहुत फायदा हमने देखा हुआ है, और राज्य सरकार वह भागीदारी फिर शुरू कर सकती है।
फिलहाल सरकारी अमले को कड़ाई से सड़क सुरक्षा के नियम लागू करने चाहिए, और जब सरकारी अनदेखी से सड़कों पर खूनी रफ्तार और ओवरलोड के ऐसे हादसे होते हैं, तो आम जनता को यह नाराजगी भी रहती है कि उसे तो हेलमेट न रहने पर सैकड़ों रूपए का जुर्माना सुनाया जाता है, लेकिन ट्रांसपोर्ट का जो संगठित कारोबार धड़ल्ले से कानून तोड़ता है, उसके साथ सरकारी अमले की गहरी दोस्ती रहती है। प्रदेश में सड़कों पर मौतें तभी घटेंगी जब ऐसी भागीदारी और ऐसी दोस्ती खत्म होगी। 

शराब का कारोबार और फौलादी सरकारी पकड़

संपादकीय
4 मई  2016
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के इलाके, राजनांदगांव जिले की एक महिला सरपंच ने लोक सुराज अभियान में अधिकारियों को यह अर्जी दी है कि उसके गांव में बंद की गई देशी शराब दुकान दुबारा शुरू की जाए, क्योंकि दुकान बंद होने से अब वहां हर होटल-चायठेले, पानठेले पर शराब बिकने लगी है, और गांव का माहौल बहुत खराब हो गया है। यह चिट्ठी अपने किस्म की कुछ अनोखी है क्योंकि प्रदेश भर में जगह-जगह महिलाएं शराब दुकान बंद करवाने के लिए आंदोलन करते दिखती हैं, और उनकी मांग पर कुछ जगहों पर दुकानें बंद भी हुई हैं।
छत्तीसगढ़ सहित देश के बहुत से प्रदेशों में शराब का कारोबार सरकार की फौलादी जकड़ का शिकार है। इस कारोबार को कानूनी दर्जा है, लेकिन इस पर नियमों और अघोषित नियमों का ऐसा शिकंजा कसा जाता है कि यह कारोबार एक जुर्म की तरह दिखने लगता है। छत्तीसगढ़ सरकार के पास भी बिहार की तरह शराब के धंधे को बंद करने का अधिकार है, लेकिन इस धंधे को चलाते हुए इसे जिस अंदाज में कुचला और निचोड़ा जाता है, वह सरकार के इंस्पेक्टर राज की एक बेमिसाल मिसाल है। सरकार अपनी नीति बनाते हुए इस धंधे के लिए नियम और शर्तों को मनमाने अंदाज में बदलती है, और अधिक कमाई का तर्क गिनाते हुए शराब पीने वाले आम लोगों के लिए भी दिक्कत खड़ी करती है। पिछले कुछ बरसों में सरकार ने कम आबादी के गांवोंं में शराब दुकानें बंद कीं, और नतीजा यह निकला कि एक कानूनी दुकान के बजाय दर्जनों गैरकानूनी कोचियों ने काम करना शुरू कर दिया, जगह-जगह, घर-घर शराब बिकने लगी, और अधिकतर लोगों का यह अनुभव रहा कि महिलाएं भी इस बिक्री में उतर आईं क्योंकि दिन भर में कई सौ रूपए की बचत होने लगी।
इसके अलावा शराब कारोबार में शराबखानों के लिए अजीब किस्म की शर्तें लादी गईं, जिनमें यह भी है कि वहां सिर्फ महंगी शराब पिलाई जा सकेगी, और जो मध्यम वर्ग के लोग हैं, उनकी पहुंच के ब्रांड वहां नहीं रह सकेंगे। इस कारोबार से जुड़ी वसूली और उगाही की बातें हमेशा ही खबरों में रहती हैं, और इस तरह इस विभाग के छोटे-छोटे अफसर ऐसे करोड़पति बन जाते हैं कि उन पर किसी का बस भी नहीं रहता। सरकार को अगर शराबबंदी करनी है तो वह राज्य की जनता के लिए फायदे की बात हो सकती है। लेकिन आज सरकारी नियंत्रण के इस कारोबार में दारू के दो नंबर के धंधे में लगे कारखानेदार और कारोबारी एक तरफ अपनी मनमानी करने को आजाद हैं, दूसरी तरफ व्यक्तिगत पसंद और नापसंद के आधार पर यह विभाग अलग-अलग कारोबारियों को बढ़ाने और कुचलने में लगे रहता है। यह पूरा सिलसिला बड़ी बुरी सार्वजनिक चर्चा का भी रहता है, और इतनी सरकारी दखल की वजह से सरकारी संरक्षण में कारोबारी भारी मनमानी भी करते हैं, और शराब ग्राहकों का नुकसान होता है।
दुनिया के सभ्य और विकसित देशों में शराब के कारोबार का ऐसा सरकारी काबू नहीं होता, और वहां पर शराब से ऐसी बर्बादी भी नहीं होती। छत्तीसगढ़ में शराब के धंधे को दुधारू गाय की तरह दुहा जाता है, और घोषित-अघोषित कमाई के लिए नियम और नियंत्रण लगातार बदले जाते हैं। सरकार को इस काम को पारदर्शी करना चाहिए, और ऐसे तमाम अलोकतांत्रिक, अघोषित, और अनुचित नियंत्रण खत्म करने चाहिए। 

संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का ऐसा बर्ताव शर्मनाक

संपादकीय
3 मई  2016
पिछले लोकसभा आम चुनाव में मुंबई में फिल्म अभिनेता गोविंदा से हार चुके भाजपा के एक पुराने और बड़े नेता राम नाईक ने अपनी ताजा किताब में दावा किया है कि गोविंदा ने उन्हें हराने के लिए दाउद की मदद ली थी। राम नाईक अभी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल हैं, और इस किताब के पहले भी अपने बहुत से सार्वजनिक बयानों में वे घोर सांप्रदायिक और कट्टर बातें कहते आए हैं। अब सवाल यह है कि राज्यपाल की कुर्सी पर बैठे हुए एक व्यक्ति को किस तरह के और कितने विवादों में उलझना चाहिए? यह बात सही है कि लोग अपनी आत्मकथा में कई तरह की बातें लिखते हैं, और उनमें से कई बातें विवाद की भी रहती हैं, लेकिन ऐसी बातों के लिए लोगों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के साथ थोड़ा सा धैर्य रखना चाहिए। अब राज्यपाल और राष्ट्रपति या सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज अगर ऐसे विवाद वाली बातें लिखने और कहने लगें, और उनके खिलाफ आहत लोग मानहानि के मुकदमे लेकर अदालतों में जाने लगें, तो क्या होगा?
सार्वजनिक जीवन में जहां सब कुछ कहने का हक हर किसी को रहता है, वहीं पर लोगों को यह समझने की जिम्मेदारी भी रहती है कि वे अपने पद की गरिमा, और उसकी जरूरतों के खिलाफ जाकर हरकतें न करें। भारत में हमेशा से अलग-अलग राजनीतिक दलों के मनोनीत किए गए ऐसे कई राज्यपाल रहे हैं, जो बहुत ही ओछी बयानबाजी करते रहे हैं। इनकी वजह से लोकतंत्र में गलत परंपराएं शुरू भी होती हैं, और लोगों के मन में राज्यपाल के पद के लिए सम्मान खत्म हो जाता है। इस देश ने ऐसे भी राज्यपाल देखे हैं, जो राजभवनों में तरह-तरह के सेक्सकांड में उलझे रहते थे, और जिनकी वीडियो क्लिप इंटरनेट पर तैरती रहती थीं, और लोगों को उन राज्यपालों की चर्चा में भी शर्म आती थी। कुछ बरस पहले ही एक ऐसा राज्यपाल भी लोगों ने भ्रष्टाचार के शिकार झारखंड में देखा जिसके बेटे राजभवन में रिश्वतखोरी की दुकान खोलकर बैठ गए थे। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि किसी राज्यपाल का कुनबा काले धंधे करते हुए राजभवन पर काबिज रहे, और राज्यपाल को पता न लगे।
हम फिर उसी बात पर लौटते हैं, जिससे आज का यह मुद्दा शुरू हुआ है। किसी भी उम्मीदवार ने चुनाव जीतने के लिए दाउद इब्राहिम की मदद ली, यह बड़ा ही भारी भरकम आरोप है, और अगर इसके कोई सुबूत हैं, तो ऐसे उम्मीदवार को जेल जाना चाहिए, और अगर ऐसे सुबूत नहीं हैं, तो ऐसे आरोप लगाने वाले को मानहानि के आपराधिक मुकदमे में जेल जाना चाहिए। यह एक अलग बात है कि राज्यपाल के पद को जिस तरह की संवैधानिक सुरक्षा मिली हुई है, उसके चलते उनका जेल जाना मुमकिन नहीं होता, जैसे कि मध्यप्रदेश के मौजूदा राज्यपाल व्यापम घोटाले में अपनी व्यापक भूमिका के आरोपों के बाद भी अदालती कटघरे के बाहर बचे हुए हैं। लेकिन संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का ऐसा बर्ताव शर्मनाक है, और धिक्कार के लायक है।

गन्ने का रस निकालने वाली मशीन में बच्चों को पेरने के खतरे

संपादकीय
2 मई  2016
राजस्थान की कोटा शहर की खबर है कि वहां प्रतियोगी दाखिला इम्तिहानों की तैयारी में रखे गए स्कूली बच्चों की आत्महत्याएं बढ़ती जा रही हैं। अभी वहां के कलेक्टर ने इन बच्चों के मां-बाप को चि_ी लिखी है कि वे बच्चों पर अपनी इच्छाएं न थोपें, उन्हें मर्जी की पढ़ाई करने दें। वैसे तो प्रशासन का इस बात से लेना-देना नहीं रहता कि कौन से बच्चे किस पढ़ाई की तैयारी करें, लेकिन पिछले बरस कोटा में ऐसे तीस बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं और उनकी लिखी चि_ियों को पढ़-पढ़कर कलेक्टर थक गए हैं। उन्होंने मां-बाप को लिखा है कि बच्चे की किसी से तुलना न करें और न ही नतीजों के बारे में उन्हें डराएं।
राजस्थान के कोटा शहर इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे कॉलेजों में दाखिले के लिए दाखिला-इम्तिहान की तैयारी किसी जिम में मसल्स तैयार करने के अंदाज में करवाता है। वहां पर प्रवेश परीक्षा तैयारी के ऐसे कारखाने खुले हुए हैं, जो कि स्कूली पढ़ाई के आखिरी कुछ बरसों को प्रवेश परीक्षा के लिए झोंक देते हैं और स्कूली पढ़ाई के नाम पर फर्जी हाजिरी की धोखाधड़ी भी करते हैं। एक-एक बच्चे पर लाखों की फीस वसूली जाती है और उन पर देश के सबसे बड़े कॉलेजों में पहुंचने की उम्मीद की जाती है। बच्चों से अपनी अतिमहत्वाकांक्षा रखने वाले मां-बाप उन्हें ऐसे कोचिंग कारखानों के हवाले कर देते हैं, और वहां उन्हें तराश कर एक निर्धारित आकार में ढालने का काम किसी कारखाने में पिघले लोहे की ढलाई की तरह शुरू हो जाता है।
ऐसे में जिन बच्चों की पसंद सोच, हसरत, और क्षमता मां-बाप की उम्मीदों से अलग होती हैं, वे ये बरस तनाव में गुजारते हैं, हीनभावना और कुंठा के शिकार हो जाते हैं मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) में डूब जाते हैं, और आत्महत्या तक पहुंच जाते हैं। जब वे आत्महत्या कर लेते हैं तो खबर बनते हैं, इम्तिहान में अव्वल आने पर इश्तहार बनते हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व कुचल जाना न खबर बनता, न इश्तहार। दुनिया के सभ्य और विकसित देशों में कहीं भी स्कूली बच्चों को गन्ने से रस निकालने की मशीन में इस तरह नहीं पेरा जाता।
हिंदुस्तान में निजीकरण और खुली बाजार व्यवस्था की हिमायती सरकारों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज में दाखिले के लिए भी ऐसा पूंजीवादी इंतजाम किया है, जिसके तहत दाखिला-इम्तिहान की सबसे अधिक तैयारी कर पाने वालों के लिए ही मौके हैं। कौन बच्चे कितने होनहार हैं, किनके कौन से रूझान हैं इन बातों का कोई मूल्यांकन नहीं है और न ही अब बच्चों के बीच बराबरी के मौकों का कोई मुद्दा रह गया है। जिस तरह जंगल में सबसे ताकतवर जानवर का राज चलता है, उसी तरह भारत में मां-बाप की ताकत की बदौलत बच्चे किसी स्कूल-कॉलेज में पहुंचते हैं। देश के सबसे बड़े सरकारी कॉलेजों के लिए भी दाखिले की तैयारी लाखों के खर्च से ही मुमकिन है।
लेकिन उदारीकरण का दानव लौटने के लिए नहीं आया है। इसलिए मां-बाप के अपनी हसरतों से परे अपने बच्चों के रूझान देखने चाहिए और बच्चों को आत्महत्या की तरफ धकेलना बंद करना चाहिए। हर बच्चे हर इम्तिहान के लायक नहीं रहते, लेकिन पढ़ाई या जिंदगी के किसी दूसरे दायरे में वे बहुत कामयाब हो सकते हैं। इस देश की शिक्षा नीति में बच्चों के लिए एक समान मौकों की गुंजाइश खत्म कर दी गई है और ऐसे में कुछ लाख बच्चों को महंगी तैयारी के बाद जो फायदा मिल सकता है उसे बच्चों पर थोपकर भी मां-बाप को खुश नहीं होना चाहिए। अमीर और गरीब, दोनों तरह के मां-बाप को याद रखना चाहिए कि उनके बच्चे जिंदगी में सबसे अधिक आगे अपनी मर्जी के दायरे में ही पहुंच सकते हैं, धकेलकर बढ़ाए गए बच्चे बीच में ही दम तोड़ सकते हैं। हिंदुस्तान के बेवकूफ मां-बाप में बच्चों को ऐसी दौड़ में झोंकने का सिलसिला खत्म होना चाहिए। दो-चार किस्म के कोर्स और कॉलेज जिंदगी का अंत नहीं हैं। गणित में फेल होने पर एक बच्चा खुदकुशी कर लेता तो दुनिया को आइंस्टीन न मिला होता। 

गरीबों को रियायती गैस से हिन्दुस्तानी महिला और बच्चों की सेहत में एक क्रांति संभव

संपादकीय
1 मई  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन देने की जो योजना आज शुरू की है, वह अगर सचमुच कामयाब होती है तो उससे हिन्दुस्तानी महिला और बच्चों की जिंदगी न सिर्फ बदल जाएगी, बल्कि बढ़ भी जाएगी। दुनिया के एक बहुत बड़े वायु-प्रदूषण वैज्ञानिक का भारत का दशकों का शोधकार्य यह बताता है कि तमाम विकासशील और अविकसित देशों में सेहत को सबसे बड़ा खतरा किसी संक्रामक रोग से, किसी जंग से, या किसी हादसे से नहीं है, बल्कि घरेलू चूल्हों से उठने वाले प्रदूषण से महिला और उसके बच्चों को सबसे बुरा और सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है। अमरीका के प्रतिष्ठित बर्कले विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कर्क स्मिथ दो-दो नोबल पुरस्कारों में भागीदार रहे हैं, और भारत में वे आधी सदी से काम करते आए हैं, उनका यह निष्कर्ष है कि परमाणु बिजलीघर की इतिहास की आज तक की सारी दुर्घटनाओं को मिला दिया जाए, तो भी एक महीने में घरेलू चूल्हे से होने वाली मौतों का आंकड़ा वे नहीं छू सकते। लकड़ी या कोयले के चूल्हे से उठने वाला धुआं महिला और उसके बच्चों को खोखला करके रख देता है। यह देखने के बाद हैरानी होती है कि किस तरह भारत में महिला यह झेलते हुए भी पुरूष के मुकाबले औसत उम्र में खासी आगे है और तीन-चार बरस अधिक जीती है। पता नहीं इस धुएं से बचने के बाद वह महिला पांच-दस बरस अधिक उम्र न पा जाए।
नरेन्द्र मोदी की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने रसोई गैस पर संपन्न तबके की रियायत को छोडऩे के लिए लोगों का हौसला बढ़ाया, और एक करोड़ लोग इस रियायत को छोड़ चुके हैं। यह संख्या भारत की आबादी के मुकाबले बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन यह सिलसिला एक सही दिशा में बढ़ रहा है, और हो सकता है कि मोदी का कार्यकाल खत्म होने तक चार-छह करोड़ लोग रियायत छोड़ चुके हों, और चार-छह करोड़ गरीब महिलाएं रसोई गैस पा चुकी हों। हमारा यह भी मानना है कि राज्य सरकारों को भी केन्द्र सरकार की इस योजना में मदद करने के लिए अपने-अपने इलाकों में रसोई गैस रियायत की बाजारू और कारखानों की चोरी को रोकना चाहिए, जो कि आज धड़ल्ले से जारी है। बाजार में लोग मशीनें लगाकर रियायती गैस को कारोबारी सिलेंडरों में भरते हैं और बड़े पैमाने पर रियायत की चोरी करते हैं। गरीबों के लिए तय की गई ऐसी रियायत की चोरी पर सजा कड़ी की जानी चाहिए, और राज्य सरकारों को अपनी जिम्मेदारी अधिक गंभीरता से निभानी चाहिए।
जो राज्य जनता की अधिक फिक्र करते हैं, उन्हें चाहिए कि प्रधानमंत्री की लाई गई इस उज्जवला योजना पर अमल के लिए अपने राज्य में तेज रफ्तार से काम करें और सबसे गरीब महिलाओं को, ग्रामीण महिलाओं को इसका फायदा पहुंचाएं। छत्तीसगढ़ में घरेलू चूल्हे को बदलने की बहुत जरूरत है और केन्द्र सरकार के पैमाने पर यहां की दसियों लाख गरीब महिलाएं आ जाएंगी। राज्य सरकार गैस-रियायत के चोरों को तेजी से पकड़े, और गरीबों को फायदा पहुंचाए।