अफसोस कि वे हुए ही क्यों?

आजकल
17 अप्रैल 2017
अभी दो दिन पहले डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की जन्मतिथि आई, तो अलग-अलग पार्टियों और अलग-अलग नेताओं ने उसे अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल किया। बौद्ध समाज के लोग अंबेडकर के अनुयायियों में सबसे अधिक हैं, और उनके लिए भी यह दिन गौरव का एक दिन रहता है, और उन पर होती ज्यादतियों के खिलाफ यह दिन प्रतिरोध की एकजुटता का भी रहता है। लेकिन इन सबसे परे जो कुछ बातें इस बरस चर्चा में आईं उनमें से एक यह कि राजस्थान में इस मौके पर अंबेडकर प्रतिमा को सार्वजनिक रूप से बाल्टी भर दूध से नहलाया गया।
दूध से किसी प्रतिमा को नहलाने का एक मतलब यह भी होता है कि उतने दूध को बर्बाद करना। और फिर यह स्विटजरलैंड तो है नहीं जहां पर कि दूध इतना अधिक होता है कि उसे चॉकलेट बनाकर, मक्खन बनाकर पूरी दुनिया में बेचना पड़े, यह तो वह देश है जिसमें दसियों करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, और जहां के बच्चों को दूध-मक्खन महज कृष्ण की कहानियों में नसीब होता है। ऐसे में दलित गरीबों के मसीहा अंबेडकर की प्रतिमा को दूध से धोना उसी हिन्दू-रिवाज का एक सिलसिला है जिसके कि खिलाफ अंबेडकर ने बगावत की, और दलितों को उस हिन्दू धर्म से बाहर निकालकर बौद्ध बनाया, और सम्मान की, समानता की एक जिंदगी दिलवाई।
लेकिन यह अकेला ऐसा मामला नहीं है जिसमें रीति-रिवाज इस तरह हावी हो जाते हों। एक पुरानी मिसाल कबीर की है जिन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के ढकोसलों के खिलाफ एक दमदार बगावत की, सारे पाखंडों को चकनाचूर करने का साहस दिखाया, और उसके बाद आज उन्हीं के नाम का मूर्तिकरण करके, उनको उपासना का केन्द्र बनाकर, उनको सजाकर-बिठाकर एक ऐसा सिलसिला खड़ा कर दिया गया है जिसके खिलाफ कबीर हमेशा रहे।
कुछ ऐसा ही हाल गांधी का किया गया, और गांधी के नाम पर पलने वाले, गांधी के नाम की खाने वाले कांग्रेसियों ने भ्रष्टाचार के नए रिकॉर्ड कायम किए, गांधी की सादगी को घूरे पर फेंक दिया, और गांधी के नामलेवा भी बने रहे। गांधी से सबसे दूर जाने वाले ऐसे कांग्रेसियों ने गांधी की प्रतिमाएं तो खूब बनवा दीं, लेकिन गांधी की इज्जत घटा दी। जिन लोगों ने गांधी के काम को नहीं जाना है, और जो लोग ऐसी ही गांधी-संतानों को देखकर गांधी के बारे में अंदाज लगाते हैं, उनकी नजर में गांधी की इज्जत जरूरत से बहुत कम रह गई है। लेकिन गांधी के साथ यह ज्यादती महज कांग्रेसियों ने नहीं की है, उन लोगों ने भी की है जो कि गांधी के हत्यारों के हमकदम रहे, हमख्याल रहे, और हमदर्द रहे। उन लोगों ने भी मौके की नजाकत को देखते हुए अपनी दीवारों पर गांधी को टांग लिया, गांधी का नाम लिया, और इससे जितना फायदा पा सकते थे, उतना फायदा पा लिया, पा रहे हैं।
कुछ ऐसा ही भगत सिंह के साथ किया गया, उसकी शहादत, उसकी बहादुरी, उसकी समझ, और उसकी इंसानियत इन सबको कुचलकर उसके ऊपर उसकी प्रतिमाएं जगह-जगह खड़ी कर दी गईं, और भगत सिंह की बातों को सोच-समझकर साजिश के तहत खत्म करने की कोशिश की गई। भगत सिंह ने अपने आपको जिंदगी भर एक नास्तिक कहा, एक नास्तिक की जिंदगी जीते रहे, और जमकर लिखा कि वे नास्तिक क्यों हैं। लेकिन आज उनकी प्रतिमा पर अंग्रेजी टोपी लगे, या कि सिक्ख पगड़ी लगे, इसे लेकर शास्त्रार्थ चलता है, बहस होती है, और उन लोगों के बीच होती है, जिनको भगत सिंह के सिद्धांतों और उनके मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। दूसरी तरफ यह भी होता है कि जिस शहर में मैं रहता हूं, वहां पर जब भगत सिंह की याद में जन्मतिथि और पुण्यतिथि पर कोई सार्वजनिक कार्यक्रम होता है तो सड़क किनारे या चौराहे पर होते हुए कार्यक्रम में भी अधिकतर लोग सिक्ख ही रहते हैं, बाकी लोगों को मानो हिन्दुस्तान की आजादी अब तक मिली नहीं है, और उन्हें भगत सिंह की शहादत से कोई फायदा हुआ नहीं है। जो राजनीतिक दल भगत सिंह के घोषित वामपंथ के ठीक खिलाफ हैं, वे राजनीतिक दल भी भगत सिंह की शोहरत को दुहने में जुट गए, और अब तो साम्प्रदायिक ताकतें भी मानो भगत सिंह की सबसे बड़ी भक्त हो गई हैं।
कुछ ऐसा ही अंबेडकर के साथ हो रहा है जिनकी याद में महाराष्ट्र के विदर्भ में हर गांव, हर मुहल्ले में अंबेडकर की प्रतिमाएं दिखती हैं, और कई जगह तो उनके मंदिर भी दिखते हैं। मंदिरों की जिस सोच के खिलाफ अंबेडकर ने हिन्दू समाज के भीतर बगावत की, उन्हीं मंदिरों के ढांचे बनाकर अंबेडकर को बिठा दिया जा रहा है, उनकी प्रतिमाओं को बनाकर मानो इस बात को काफी मान लिया जा रहा है कि अंबेडकर के संघर्ष का पूरा सम्मान हो गया। और अब रही-सही कसर पूरी करने के लिए उनकी प्रतिमाओं को दूध से धोया जा रहा है, और हो सकता है कि अधिक वक्त न लगे कि आसपास तुलसी और गंगाजल का इस्तेमाल भी होने लगे।
जिन लोगों को शिर्डी के सांई बाबा की जिंदगी की थोड़ी जानकारी, वे भी जानते हैं कि सांई बाबा हिन्दू थे या मुस्लिम थे यह भी किसी को नहीं पता था, और वे जिंदगी भर किसी पेड़ के नीचे या किसी सार्वजनिक जगह पर पड़े रहे। लेकिन आज शिर्डी में उनके साथ यह हुआ कि उनकी प्रतिमा से लेकर वहां की उपासना तक, इन सबका इस कदर हिन्दूकरण कर दिया गया है कि वहां पहुंचकर किसी दूसरे धर्म के लोगों को असुविधा लगने लगे। और न सिर्फ शिर्डी में, देश भर में भी जगह-जगह उनके मंदिर बनाए गए, जो अपने आपमें एक हिन्दू प्रतीक हैं, भीतर उनकी प्रतिमा बनाई गई, जो कि जाहिर तौर पर इस्लाम के तहत बुतपरस्ती में आती है, और भीतर आरती, माला, दिया, और इस तरह के दूसरे हिन्दू प्रतीकों से उन्हें घेर दिया गया। हिन्दू और मुस्लिम एकता का एक बड़ा प्रतीक धीरे-धीरे एक भगवाकरण का कैदी होते चले गया, और हो सकता है कि कुछ अरसे बाद मुस्लिमों को यह लगने लगे कि सांई बाबा तो हिन्दुओं के ही थे।
आज जरा देर के लिए यह सोचें कि अगर कबीर, गांधी, भगत सिंह, अंबेडकर, या कि सांई बाबा कहीं पर होंगे, और वे उनकी आज इस्तेमाल हो रही स्मृतियों के बारे में सोचेंगे, तो हक्का-बक्का रह जाएंगे कि वे कहां फंस गए हैं। इनमें से हर कोई अपने आज के भक्तों के घेरे से निकलकर भागने को उतारू दिखेंगे, और शायद यह अफसोस भी करने लगेंगे कि वे हुए ही क्यों?

आज मुस्लिम महिला का दिन आ गया दिखता है...

संपादकीय
17 अप्रैल 2017


देश में आज अचानक मुस्लिमों के तीन तलाक का मामला बहुत जोर पकड़ता दिख रहा है। उत्तरप्रदेश में, जहां कि देश की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, वहां पर भाजपा को जितनी बड़ी जीत मिली है उसे देखते हुए भाजपा बहुत उत्साह में है, और चुनाव के पहले उसने मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक की बेइंसाफी से बचाने के लिए जो चुनावी वायदा किया था, अब उसे पूरा करने में उसके ऊपर किसी वायदाखिलाफी की बात भी नहीं आ सकती, क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि इस चुनाव में भाजपा को मुस्लिम-बहुल इलाकों से भी जो अभूतपूर्व और अप्रत्याशित बहुमत मिला है, वह मुस्लिम महिलाओं का है। हम इस बात पर कोई भरोसा नहीं करते कि उत्तरप्रदेश में भाजपा की जीत ईवीएम की दिलवाई हुई है, क्योंकि अगर ऐसा मुमकिन होता तो भाजपा बाकी राज्यों में अपने मुख्यमंत्री क्यों खोती, पंजाब में अपनी ऐसी दुर्गति क्यों करवाती? इसलिए मोदी के विरोधियों को भी यह समझ लेना चाहिए कि कौन सी बातों ने भाजपा को इतना जनमत दिलाया है।
हमारा मानना है कि मुस्लिम समाज को एक वोट बैंक मानकर चलना एक घिसीपिटी सोच है जो कि सच नहीं है। और खासकर तब जब मुस्लिम महिला के हक का मामला, और मुस्लिम आदमी की धाक का मामला आमने-सामने हो। इस देश में मुस्लिम महिला को उसका पति तीन बार तलाक कहकर छोड़ सकता है, और मुस्लिम समाज के जो धार्मिक ठेकेदार हैं, वे अपने लोगों, खासकर अपने मर्दों की इस तानाशाही को घटाने को तैयार नहीं हैं, और इक्कीसवीं सदी में आकर भी वे गुफा की तरह जीना चाहते हैं। ऐसे में जब भाजपा से मुस्लिम महिलाओं को यह उम्मीद दिखी कि वह ऐसे अमानवीय तलाक से उसे आजादी दिला सकती है, तो उन्होंने भाजपा को वोट दिया। बाकी राज्यों में मुस्लिम आबादी इतनी बड़ी नहीं थी कि वहां भाजपा को इसका कोई फायदा मिलता।
आज बाकी पार्टियों को भी यह समझने की जरूरत है कि कोई पहल अगर हिन्दुत्व वाली भाजपा कर रही है, तो उसका मतलब यह नहीं कि बाकी पार्टियां उसका विरोध करने लगें। अगर कोई मुद्दा सही है, तो आज भाजपा की तरह बाकी पार्टियों को भी खुलकर सामने आना पड़ेगा, और मुस्लिम महिला का साथ देना पड़ेगा। इस बात का कोई न्यायसंगत तर्क नहीं हो सकता कि मुस्लिम मर्द अपनी पत्नियों को अमानवीय हालत में रखते रहें, और अल्पसंख्यक नाराज न हों, इसलिए बाकी पार्टियां चुप बैठी रहें। वामपंथी हों या कांग्रेसी, उन्हें यह भी समझना होगा कि अल्पसंख्यक तो मुस्लिम महिला भी है, और वह मुस्लिम आबादी का आधा हिस्सा भी है, अगर उसे अपने साथ सदियों से चले आ रहे जुल्म से छुटकारा पाने का एक रास्ता दिखेगा तो वह उस तरफ जाएगी ही जाएगी।
कांग्रेस का पुराना इतिहास बहुत ही खराब रहा है, और विदेश में पढ़े हुए, पायलट रहे हुए, एक नौजवान प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जिस तरह अपने ऐतिहासिक संसदीय-बाहुबल से एक अकेली शाहबानो का गला घोंट दिया था, और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद में संविधान संशोधन करवा दिया था, आज दिन उसका ठीक उल्टा दिख रहा है। आज अपने ऐतिहासिक बहुमत, और हैरान करने वाली लोकप्रियता के बीच नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी अगर तीन तलाक जैसी दकियानूसी बात से मुस्लिम महिला को आजाद कर सकते हैं, तो देश की महिलाएं, न सिर्फ मुस्लिम महिलाएं, बल्कि बाकी महिलाएं भी उनके साथ रहेंगी, और लोग आज इस साफगोई को पसंद कर रहे हैं कि जो कहा सो किया। आज बाकी राजनीतिक दलों को और सामाजिक संगठनों को मुस्लिम महिला का साथ देते हुए खुलकर सामने आना चाहिए। आज मुस्लिम महिला का दिन आ गया दिखता है। 

आतंक की फंडिंग और पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वालों का धर्म

संपादकीय
16 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में कल कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनके बारे में पुलिस ने कहा कि ये लोग कश्मीर के आतंकियों के लिए आने वाली पैसों के खाते सम्हालते थे, और इनके खातों में बाहर से बड़ी रकम आती थी, और ये लोग उन्हें आतंकियों तक पहुंचाने का काम करते थे। पुलिस ने यह बात गिरफ्तार लोगों के बयानों की बुनियाद पर कही है, और बैंकों के खातों की जानकारी भी निकाल ली है। पुलिस का यह भी कहना है कि छत्तीसगढ़ के ही कुछ और लोग इसी आतंक-फंडिंग के जुर्म में फरार हैं, और उनकी तलाश की जा रही है। कश्मीर में ये लोग आतंकियों तक पैसा पहुंचाने के लिए जिन लोगों तक रकम पहुंचाते थे, उनमें से दो लोगों के नाम सामने आए हैं, और हैरान करने वाली बात यह है कि ये सारे के सारे नाम हिन्दू नाम हैं, और इनके बारे में पुलिस ने बताया है कि ये लोग पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी का काम करते थे।
लोगों को याद होगा कि अभी कुछ महीने पहले ही मध्यप्रदेश की पुलिस ने वहां के एक भाजपा पदाधिकारी सहित कुछ दूसरे लोगों को गिरफ्तार किया कि वे लोग पाकिस्तान की आईएसआई के लिए जासूसी कर रहे थे। इसमें भाजपा का जो पदाधिकारी पकड़ाया था, उसकी तस्वीरें भी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं के साथ उसके फेसबुक पेज पर सजी हुई थीं। इन दोनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है, और ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि यहां की पुलिस हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए उन पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने और आतंकियों तक पैसे पहुंचाने का झूठा आरोप लगाकर उनके खिलाफ झूठे केस बनाएगी। और ये सारे नाम हैरान करने वाले भी हैं, क्योंकि अगर ये नाम मुस्लिमों के होते तो उन्हें गद्दार कहते हुए उन्हें फांसी देने, चौराहों पर पत्थरों से मारने, और पाकिस्तान भेज देने जैसी मांग उठने लगती। अब चूंकि भाजपा की पुलिस ने ही इन्हें गिरफ्तार किया है, इसलिए ऐसे हिन्दुओं के खिलाफ पाकिस्तानपरस्त होने की बात भी नहीं उठ रही है।
लोगों को यह समझना चाहिए कि धार्मिक कट्टरता और आतंक के लोग किसी मजहब से जुड़े हो सकते हैं, किसी धर्म से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन यह भी हो सकता है कि वे उस आतंक के पैसों के हाथ बिके हुए हों जो कि किसी दूसरे धर्म का है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के ये मामले इसी बात का सुबूत हैं, और इन दोनों ही राज्यों में इतने लंबे समय से भाजपा की सरकारें चली आ रही हैं कि ऐसे हिन्दुओं के खिलाफ कोई झूठे सुबूत गढऩे का वक्त भी इन बरसों में किसी को नहीं मिला होगा, न ही किसी को सूझा होगा, और न ही इन सुबूतों में कोई कमी दिख रही। इस बात पर चर्चा आज इसलिए जरूरी है कि सोशल मीडिया सहित भारतीय राजनीति में बहुत से लोग लगातार एक सवाल उठाते हैं कि जहां कहीं आतंकी हमला होता है, वहां पर उसमें कोई मुस्लिम शामिल क्यों पाया जाता है। हमारे इन दो राज्यों से परे भी देश में जगह-जगह भाजपा की सरकारों वाले राज्यों में ऐसे अनगिनत हिन्दू गिरफ्तार हुए हैं जो कि तरह-तरह के आतंक में लगे हुए थे। कर्नाटक में जब भाजपा की सरकार थी, वहां पर पाकिस्तान के झंडे फहराकर साम्प्रदायिक दंगा करवाने की कोशिश में कुछ हिन्दुओं को, और हिन्दू संगठनों के सक्रिय लोगों को भाजपा की ही पुलिस ने गिरफ्तार किया था जिन पर अभी मुकदमा चल ही रहा है। अभी-अभी राजस्थान का एक फैसला आया है जिसमें अजमेर दरगाह पर बम विस्फोट करने के जुर्म में कुछ लोगों को सजा हुई है, और ये तमाम हिन्दू लोग निकले हैं, और अदालत के बाहर की जो तस्वीरें आई हैं उनमें वे भगवा पहने हुए भी दिख रहे हैं, माथे पर तिलक लगाए हुए भी दिख रहे हैं।
इसलिए विविधताओं से भरे हुए इस देश में किसी धर्म या किसी जाति, किसी क्षेत्र या किसी भाषा के लोगों को किसी पूर्वाग्रह के साथ देखना और दिखाना ठीक नहीं है। और यह भी समझने की जरूरत है कि लगातार हिन्दू संगठनों में सक्रिय रहने वाले लोग भी मुस्लिम आतंकी संगठनों, मुस्लिम देश की आईएसआई जैसी खुफिया एजेंसी के हाथों कैसे बिक जाते हैं, और यह भी समझने की जरूरत है कि इनमें से कोई भी भूख से मरते हुए हिन्दू नहीं थे कि जिनके सामने जिंदा रहने के लिए जासूसी करना या आतंक का साथ देना जरूरी रहा हो। इसी सिलसिले में एक आखिरी बात यह कि जो लोग सोशल मीडिया पर हिंसक बातों को करने के लिए रात-दिन सक्रिय रहते हैं, वे लोग अपने धर्म के लोगों की गिरफ्तारी के बाद जुबान क्यों सिल लेते हैं?

स्मृति अवकाशों की समाप्ति की योगी की राय सही

संपादकीय
15 अप्रैल 2017


उत्तरप्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अंबेडकर जयंती के एक समारोह में कहा कि महान लोगों के जन्मदिन पर स्कूलों में होने वाली छुट्टियों को खत्म करना चाहिए क्योंकि ऐसी छुट्टियां इतनी बढ़ती जा रही हैं कि साल में कुल सवा सौ दिन पढ़ाई हो पाती है, जबकि सरकारी लक्ष्य सवा दो सौ दिनों का है। योगी की और कई बातों से असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन यह एक बात उन्होंने पते की की है जिससे स्कूलों की हालत सुधर भी सकती है। आज तो गुजर चुके महान लोगों का सम्मान करने के नाम पर कहीं चबूतरों पर उनकी प्रतिमाएं खड़ी कर दी जाती हैं, जिनमें जनता का पैसा लगता है, तो कहीं पर उनके जन्मदिन पर या पुण्यतिथि पर स्कूल-कॉलेज बंद रहते हैं, और कुछ तारीखें ऐसी भी रहती हैं जिनमें सरकारी दफ्तर भी बंद रहते हैं। यह सिलसिला खत्म करना बहुत जरूरी इसलिए है कि ऐसे दिनों पर छुट्टी से इन महान लोगों के सम्मान बढऩे का, या कि उन्हें याद करने का कोई काम नहीं होता बल्कि लोग ऐसे तमाम काम करने लगते हैं जो उजागर हो जाएं तो महान लोगों का अपमान होने लगे। फिर स्कूल और कॉलेज को धार्मिक, राजनीतिक, और जातिगत वजहों से शुरू की गई ऐसी छुट्टियों से आजाद रखना चाहिए, और ऐसी बातों को उनकी किताबों से भी बाहर रखना चाहिए। ऐसा न होने पर सत्ता में आई राजनीतिक पार्टी अपनी मर्जी से पढ़ाई के दिन घटाती जाएगी, और किताबों को ऐसे पाठों से लादती जाएगी।
दरअसल भारत में स्कूली पढ़ाई को, स्कूलों को, और स्कूली किताबों को तय करने का काम शिक्षा के जानकार लोगों के बजाय सत्तारूढ़ नेता और सत्ता चला रहे अफसर करते हैं। न तो इनके पास शिक्षा की जरूरतों की समझ होती, और न ही बाल मनोविज्ञान की कोई जानकारी होती। ऐसे में आए दिन यह भी देखने मिलता है कि कोई भी अफसर अपनी मर्जी से स्कूली बच्चों के जुलूस निकालकर उन्हें जानवरों के रेवड़ की तरह हांकने का काम करने लगते हैं, किसी भी मंत्री-मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में स्कूलों से निकालकर बच्चों को झोंक दिया जाता है। अभी कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ में प्रौढ़ साक्षरता का इम्तिहान चल रहा था, और परीक्षा दे रही महिलाओं को वहां से निकालकर किसी मंत्री के कार्यक्रम में भेज दिया गया था।
किसी भी महान व्यक्ति की स्मृति में उनके जन्मदिन या उनकी पुण्यतिथि पर स्कूल-कॉलेज में बच्चों के बीच दस-पन्द्रह मिनट का कोई भाषण हो सकता है जिससे कि उन्हें जानकारी मिल जाए। छुट्टी से न किसी की जानकारी में कोई इजाफा होता, और न ही कोई सम्मान बढ़ता। सम्मान करने के नाम पर उत्पादकता को खत्म करने का सिलसिला पूरी तरह गलत है। और हम इस बात को पढ़ाई को बढ़ाने के लिए नहीं कह रहे, स्कूलों में पढ़ाई कितनी हो, खेलकूद कितना हो, और बाकी काम कितने हों, इसे तय करना विशेषज्ञों का जिम्मा होना चाहिए। हम सिर्फ यह कह रहे हैं कि स्कूलों में जाने के दिन बढऩे चाहिए, और स्मृति-अवकाश का सिलसिला खत्म किया जाना चाहिए। इस देश में स्थानीय परंपराओं के मुताबिक त्यौहार, और स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस जैसे दो मौके काफी हैं, इनसे परे की छुट्टियां खत्म होनी चाहिए।

दुनिया के सबसे बड़े वर्दीधारी गुंडे ने गिराया सबसे बड़ा बम

संपादकीय
14 अप्रैल 2017


कल रात अफगानिस्तान-पाकिस्तान सरहद पर अफगानिस्तान की जमीन पर आईएस के अड्डे पर अमरीका ने एक बड़ा बम गिराया जिसे वह दुनिया के इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा गैरपरमाणु बम कह रहा है। करीब दस हजार किलो वजन का यह बम अमरीकी फौज ने पहली बार इस्तेमाल किया है, और युद्धोन्मादी, नफरतजीवी अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने अपनी फौज को खुली छूट दी है कि वे दुनिया में अलग-अलग जगहों पर तैनात अमरीकी फौज की कार्रवाई खुद तय करें। इस बम ने दुनिया को हैरान इसलिए किया है कि ट्रंप या अमरीका ने पिछले कई महीनों में अफगानिस्तान में आईएस की ऐसी मौजूदगी की कोई बात नहीं कही थी कि उसकी वजह से अफगान गांवों के इस इलाके में ऐसी बड़ी कार्रवाई की जाए। अभी इस बम को चौबीस घंटे भी नहीं हुए हैं, और वहां की जमीनी हालत अभी तक सामने नहीं आई है, लेकिन ट्रंप के रूख से यह समझ पड़ता है कि इतना हमलावर कोई दूसरा अमरीकी राष्ट्रपति आज तक आया नहीं होगा। अभी चार दिन ही हुए हैं जब चीनी राष्ट्रपति से बात करते हुए, केक खाते हुए ट्रंप ने सीरिया पर पांच दर्जन बड़े मिसाइल गिराए थे, और यह दावा था कि सीरिया अपने लोगों पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। दूसरी तरफ सीरिया के राष्ट्रपति असद ने खुलकर कहा है कि ऐसे किसी रासायनिक हथियार के बारे में सीरिया को मालूम भी नहीं है और शायद यह गढ़े हुए सुबूतों के आधार पर किया गया अमरीकी हमला है। लोगों को याद होगा कि अमरीका ने जब इराक पर हमला किया था, तब भी राष्ट्रपति बुश ने यह झूठा दावा किया था कि उसके पास इस बात के पुख्ता सुबूत हैं कि इराक के पास व्यापक जनसंहार के हथियार हैं, और बाद में इराक को तबाह करके भी ऐसा कोई सुबूत न अमरीका को मिला, न दुनिया के सामने आया, और अमरीकी दावा झूठा साबित हुआ।
दूसरी बात यह कि दुनिया से अगर अलकायदा या आईएस जैसे धर्मान्ध और कट्टर आतंकियों को खत्म करना है, तो उसके लिए साथ में बेकसूरों को मारने की एक सीमा होनी चाहिए। सीरिया में जिस जगह मिसाइलें गिराई गईं, वहां पर कितने लोगों की मौत हुई यह अभी सामने भी नहीं आया है, दूसरी तरफ अफगानिस्तान में जहां यह बम गिराया गया है, वहां अमरीकी फौजों की पहुंच थी, और उसके बावजूद इतनी व्यापक तबाही करने वाले बम को गिराने की कौन सी मिलिट्री मजबूरी थी, यह भी साफ नहीं है। लोगों का मानना है कि जब खुद अमरीका कह रहा है कि सात-आठ सौ लोग ही आईएस में रह गए हैं, तब उनमें से कुछ दर्जन लोगों को मारने के लिए इतनी तबाही वाले बम को गिराना एक अंतरराष्ट्रीय गैरजिम्मेदारी की बात है। किसी भी कार्रवाई के अनुपात का भी न्यायोचित होना जरूरी रहता है, और अमरीका हमेशा से पूरी दुनिया पर ऐसे मनचाहे और अनचाहे हमले करते आया है जो कि नाजायज अधिक रहे हैं, गैरजरूरी अधिक रहे हैं, बदनीयत अधिक रहे हैं।
हिन्दुस्तान के एक जासूसी उपन्यास के नाम की तरह आज अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा वर्दीधारी गुंडा हो गया है। फिर ऐसे हमलावर देश में आज ट्रंप नाम का एक ऐसा राष्ट्रपति आ गया है जो कि दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की तरफ धकेल रहा है। अफगानिस्तान आज इस हालत में भी नहीं है कि वह अमरीकी फौजी कार्रवाई का कोई विरोध करे, और अभी तो यह भी साफ नहीं है कि वह इसके खिलाफ है या नहीं। दूसरी तरफ कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि अफगानिस्तान के एक कम बसाहट के इस कथित आतंकी-ठिकाने पर अमरीकी बमबारी का एक दूसरा मकसद है कि वह उत्तरी कोरिया के तानाशाह की परमाणु युद्ध की हसरतों को एक चेतावनी देना चाहता है। उसने अपने जंगी जहाज उत्तर कोरिया के आसपास तैनात कर दिए हैं, और जिस तरह उसने अपने जहाज से सीरिया पर मिसाइलें गिराई थीं, अपनी वायुसेना से अफगानिस्तान पर बम गिराया है, हो सकता है कि यह उत्तर कोरिया को एक चेतावनी हो। फिलहाल पाकिस्तान को भी इसे एक चेतावनी मानना चाहिए क्योंकि अफगानिस्तान के बहुत से लोगों ने कहा है कि यह बम तो पाकिस्तान पर गिराना चाहिए था जहां से आईएस आतंकी अफगानिस्तान भेजे जा रहे हैं।

संसद में संस्कृति मंत्री का सीता पर बयान महत्वपूर्ण

संपादकीय
13 अप्रैल 2017


संसद में मोदी सरकार के संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने भाजपा के ही एक सदस्य के सवाल के जवाब में कहा कि बिहार की सीतामढ़ी में सीता की जन्मस्थली का कोई प्रमाण नहीं है। उन्होंने कि सीता की जन्मस्थली आस्था का विषय है जो प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर नहीं करता। इस मुद्दे पर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह सहित बहुत से सांसद चढ़ बैठे और मंत्री से माफी की मांग की।
भाजपा के सदस्य और मोदी सरकार के मंत्री का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है कि देश के कई हिस्सों में आस्था और प्रमाण का झगड़ा चल रहा है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा लगातार अयोध्या में राम जन्मभूमि का मुद्दा उठाते आई है, और अयोध्या से दूर, रामकथा की लंका में भी जाने के रास्ते पर रामसेतु का विवाद सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। राम जन्मभूमि का मुद्दा हिन्दू और मुस्लिम, दो समुदायों के बीच उस जमीन पर हक की लड़ाई है जो कि हिन्दुओं के मुताबिक राम जन्मभूमि है, और मुस्लिमों के मुताबिक बाबरी मस्जिद। लेकिन रामसेतु का मामला भारत सरकार और हिन्दू संगठनों के बीच की कानूनी लड़ाई है, जिसमें भारत से श्रीलंका के बीच के समंदर के पानी के नीचे डूबे हुए एक ढांचे को हिन्दू संगठन राम की सेना का बनाया हुआ पुल बताते हैं, और भारत सरकार ने उसे एक प्राकृतिक ढांचा बताया था। अब मोदी सरकार के आने के बाद हो सकता है सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का रूख कुछ बदला हो।
विपक्ष में रहते हुए भाजपा का रूख राम जन्मभूमि पर जो था, अब सरकार में आने के बाद वह रूख चुप बैठा हुआ है, और सीता जन्मभूमि को लेकर सरकार का जवाब यह साफ करता है कि जब प्रमाण की बात आती है, तो आस्थाओं के कोई प्रमाण नहीं होते हैं। संसद से लेकर अदालत तक केन्द्र सरकार का यह रूख जगह-जगह काम आएगा, इस्तेमाल किया जाएगा, हालांकि मंत्री ने यह साफ किया है कि आस्था प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर नहीं करती। लोकतंत्र में कई बार यह देखने में आता है कि विपक्ष में रहते हुए किसी पार्टी का जो भी रूख रहता हो, सत्ता में आने के बाद सत्ता की जिम्मेदारियां कुछ फेरबदल जरूर ला देती हैं। अब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ही देखें, उन्होंने सरकार सम्हालने के बाद से गैरजिम्मेदारी की वैसी कोई बातें नहीं कही हैं जो कि बरसों से उनकी पहचान बनी हुई थीं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देखें तो सत्ता में आने के पहले तक वे लगातार दिन में कई बार चुनावी सभाओं में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को भारत में बिरयानी खिलाने को लेकर हमला करते थे, और एक-एक हिन्दुस्तानी सैनिक की मौत पर दर्जन भर पाकिस्तानी सैनिकों के सिर काटकर लाने का दावा करते थे। लेकिन सत्ता में उन्हें सियासती हकीकत सिखाई, और वे खुद बिना बुलाए जाकर नवाज शरीफ के घर पर सालगिरह और शादी की मिठाई खाकर आ गए।
हम रूख के ऐसे बदलाव को लेकर ताना कसने के खिलाफ हैं, और हम पुराने बयानों की याद दिलाकर यह उलाहना भी देना नहीं चाहते कि उस वक्त के वायदे के मुताबिक अब हिंसा क्यों नहीं की जाती, अब हमला क्यों नहीं किया जाता। सोच में ऐसा फर्क कोई बुरी बात नहीं है, अगर यह लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते, और इंसाफ के भले के लिए हो। हमारा ख्याल है कि संसद में संस्कृति मंत्री का आस्था और प्रमाण को लेकर दिया गया बयान अदालत में भी उन लोगों के काम आएगा जिन पर आस्था के नाम पर अब तक हमले होते रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि लोकतंत्र में कभी भी आस्था प्रमाणों पर हावी नहीं हो सकती, और आस्था को उन प्रमाणों का विकल्प नहीं माना जा सकता जो कि मौजूद नहीं है। राम जन्मभूमि एक ऐसा ही विवाद है, और इसे भी ऐसी ही सोच के साथ निपटाने की जरूरत है। संस्कृति मंत्री के बयान के दो तरह के मतलब निकाले जा सकते हैं, और हम इसमें से वह मतलब निकाल रहे हैं जो कि लोकतंत्र और न्याय के पक्ष में जाता है।

भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच मौत की एक सजा का तनाव और

संपादकीय
12 अप्रैल 2017


भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर एक बड़ा तनाव खड़ा हो गया है, वहां पर गिरफ्तार किए गए भारत के एक रिटायर्ड नौसेना अफसर को भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ के लिए पाकिस्तान में जासूसी करने के आरोप में वहां की एक फौजी अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। पाकिस्तान का कहना है कि कुलभूषण नाम का यह भारतीय वहां पर जासूसी कर रहा था, और पिछले बरसों में कुलभूषण के कुछ ऐसे वीडियो भी पाकिस्तान में जारी किए थे जिसमें वह इस काम का जुर्म मानते हुए दिखाई देता है।
भारत की संसद इस मुद्दे को लेकर उबल पड़ी है, और सत्ता पक्ष और विपक्ष में इस पर एकता का हाल यह है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कांग्रेस पार्टी के अंतरराष्ट्रीय मामलों के बड़े जानकार शशि थरूर से भारत के विरोध-प्रस्ताव को तैयार करने का अनुरोध किया है। भारत के किसी व्यक्ति को पाकिस्तान में मौत की सजा हो, तो भारत के लोगों का उबलना स्वाभाविक है। लेकिन क्या यह उबलना जायज भी है, इस बारे में सोचने की जरूरत है। भारत का कहना है कि पिछले बरसों में पाकिस्तान में मौजूद उसके राजनयिकों ने एक दर्जन से अधिक बार वहां की सरकार से यह अपील की थी कि भारत के इस नागरिक से उन्हें जेल में मिलने का मौका दिया जाए, लेकिन एक बार भी उन्हें यह मौका नहीं मिला। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों के तहत शायद पाकिस्तान की यह मनाही जायज नहीं थी, और भारत अपने एक नागरिक की मदद नहीं कर सका। दूसरी तरफ अब भारत का यह कहना है कि पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किए गए कुलभूषण पर वहां मुकदमा एक फौजी अदालत में चलाया गया, और उस पर फौज का कोई आरोप नहीं था, और यह अदालती कार्रवाई जायज नहीं थी। भारत ने यह भी कहा है कि वह लीक से हटकर भी कार्रवाई करेगा ताकि अपने इस नागरिक को बचा सके। पाकिस्तान का यह कहना है कि कुलभूषण के पास अभी वहां की ऊंची अदालत में अपील करने के लिए छह महीने का समय है, और उसे इस मौके का इस्तेमाल करना चाहिए।
भारत और पाकिस्तान के बीच लोगों पर कार्रवाई इस बात पर टिकी रहती है कि दोनों सरकारों के बीच संबंध कैसे हैं? अगर संबंध अच्छे रहते हैं तो गलती से सरहद पार करके आ गए बच्चे या बड़े भी वापिस पहुंचा दिए जाते हैं, या कि एक-दूसरे की समुद्री सरहद में पकड़ाए गए मछुआरे लौटा दिए जाते हैं। लेकिन जब सरकारों में तनातनी चलती रहती है, तो न तो क्रिकेट हो पाती है, न फिल्में रिलीज हो पाती हैं, और न ही एक-दूसरे देश में जाकर फिल्मी कलाकार काम कर पाते हैं। आम नागरिकों को भी तीर्थयात्रा के लिए, या कि रिश्तेदारी में आने-जाने के लिए मौका नहीं मिलता है, क्योंकि दोनों ही देश वीजा देने के मामले में तंगदिली दिखाने लगते हैं। और अभी कुल पौन सदी पहले तक तो दोनों ही देश एक थे, और दोनों के बीच रिश्तेदारी से लेकर कारोबार तक, और खेल से लेकर कला तक, इस तरह के जटिल अंतरसंबंध बने हुए हैं कि सरकारों के बीच की सारी तनातनी के बावजूद वे कायम रहते हैं।
हमारा ख्याल है कि कुलभूषण के मामले को अलग-थलग करके देखना मुमकिन नहीं होगा, और दोनों देशों की सरकारों को तनाव कम भी करने होंगे। जब आपस में टकराव अधिक रहता है, तो उसका नतीजा सरहद के दोनों तरफ की जमीन पर भी दिखता है। पिछली चौथाई सदी में सबसे कम मतदान भारत के कश्मीर में अभी इसी हफ्ते दिखाई पड़ा है। कश्मीर में तनाव का सीधा रिश्ता भारत और पाकिस्तान के तनाव से रहता है, और सरहद के इस राज्य की हकीकत को अनदेखा नहीं करना चाहिए। आज भारत और पाकिस्तान दोनों को यह भी समझना चाहिए कि दुनिया की दो बड़ी फौजी ताकतें, अमरीका और चीन, भारत और पाकिस्तान के बीच दखल देकर, और दोनों तरफ अलग-अलग भी अपनी ताकत बढ़ाने में लगी हुई हैं, इससे इन दोनों देशों के बीच आपसी मतभेदों को आपस में निपटाने की चली आ रही लंबी और पुरानी सहमति भी खत्म होने का एक खतरा है, और दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ अंधाधुंध फौजी खर्च भी कर रहे हैं। अगर रिश्ते ठीक रहें तो यह खर्च घटेगा, और कारोबार से दोनों ही देशों की कमाई भी बढ़ेगी। यह एक मौका आया है जब दोनों देशों को तनाव घटाने की एक और कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि जनता के हित में शांति के अलावा और कुछ नहीं हो सकता।

आधी प्लेट में भरता पूरा पेट और बाजार दुगुना बेचता हुआ

संपादकीय
11 अप्रैल 2017


भारत सरकार एक कानून बनाकर देश के रेस्त्रां में खाने की प्लेट को छोटा भी करने की सोच रही है। आज आमतौर पर होटल-रेस्त्रां में दो अलग-अलग आकार की प्लेट में खाना नहीं बेचा जाता, और लोगों को मजबूरी में अधिक खाना बुलवाकर उसे जूठा छोडऩा पड़ता है। कई बार यह भी होता है कि पैसे तो खर्च हो ही चुके हैं इसलिए टेबिल पर आ गए खाने को खत्म करने की इच्छा भी रहती है, और लोग जरूरत से ज्यादा खा लेते हैं। खाना या तो प्लेट में खराब होता है, या पेट में। ये दोनों ही नौबत बहुत खराब है और अमरीका जैसे पूंजीवादी देश की बाजार व्यवस्था का यह असर है कि लोगों को न छोटी बोतल बेची जाए, और न ही खाने के सामान की छोटी पैकिंग या छोटी सर्विंग बेची जाए।
आज भी देश में मध्यम दर्जे के कई ऐसे रेस्त्रां रहते हैं जो कि आधी प्लेट के हिसाब से भी खाने के सामान सर्व करते हैं। इंडियन कॉफी हाऊस जैसे कई जिम्मेदार संस्थान हैं जो कि एक इडली, या एक वड़ा, या कि आधा प्लेट चावल भी देते हैं, और न लोगों का पैसा बर्बाद होता, और न ही उनका पेट बर्बाद होता। देश में इतनी भुखमरी है कि यहां पर खाने की बर्बादी एक जुर्म से कम नहीं है, और ऐसे में भारत अगर एक कानून बनाकर कारोबार को मजबूर करता है कि वे आधे प्लेट में भी सामान बेचें, तो यह एक बेहतर इंतजाम होगा।
अमरीका में हर चीज खूब बड़े आकार की बेची जाती है, और उसका नतीजा यह है कि अमरीकियों का खुद का आकार बहुत बड़ा हो चला है, और भयानक मोटापे के शिकार होकर वे तरह-तरह की बीमारियों से घिर भी रहे हैं। यह अमरीका में एक बहुत फिक्र की बात तो हो गई है, लेकिन वहां का बाजार चीजों को बड़ी-बड़ी पैकिंग में बेचना, बड़ी-बड़ी बोतल और गिलास में सर्व करना बंद नहीं करता है। हिंदुस्तान जैसे देश से जो लोग पहली बार अमरीका जाते हैं, वे रेस्त्रां में जरूरत से दुगुना ऑर्डर कर बैठते हैं, उन्हें यह अंदाज ही नहीं रहता कि एक-एक प्लेट में कितना कुछ आएगा।
दूसरी तरफ भारत सहित दुनिया के कई देश डायबिटीज जैसी बीमारियों को बढ़ते देख रहे हैं, और इसके पीछे खानपान एक बड़ी वजह है। भारत में लोगों को अभी से सावधान करने की जरूरत है वरना पूंजीवादी व्यवस्था के साथ-साथ बाजार यहां पर खाने में अंधाधुंध मक्खन, घी, नमक, और रसायन परोस रहा है। कोकाकोला किस्म के जो कोल्डड्रिंक भारत के बाजार में हैं, उनकी एक-एक बोतल में इतनी अधिक शक्कर होती है कि उसे अलग से दिखाया जाए तो लोगों की पीने की हिम्मत भी न हो। इसलिए पैकिंग पर यह भी लिखा जाना जरूरी है कि इन सामानों में फैट कितना है, शक्कर कितनी है, और नमक कितना है। अभी भी बहुत छोटे अक्षरों में इसे लिखा जाता है, लेकिन ग्राहक की सेहत के हित में यह होगा कि खानपान की चीजों के सेहतमंद होने के अलग-अलग दर्जे तय किए जाए जैसे कि आज शाकाहारी और मांसाहारी चीजों के हैं। इसके साथ-साथ भारत सरकार को बिना देर किए रेस्त्रांओं पर यह नियम लागू करना चाहिए कि वे हर चीज को आधी प्लेट में भी बेचें।

मीडिया की सुर्खियों में शब्द घटाने कोई अभियुक्त नहीं, सीधे मुजरिम

आजकल
10 अप्रैल 2017
अभी कुछ दिन पहले देश के एक सबसे बड़े अखबार ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पिछले बरस से लापता चल रहे छात्र, नजीब, के बारे में पहले पन्ने पर एक बड़ी सी खबर छापी कि दिल्ली पुलिस ने अपनी जांच में यह पाया है कि नजीब इंटरनेट पर आईएसआईएस में शामिल होने के तरीके ढूंढ रहा था। अब यह बात पुलिस की जांच के बारे में थी इसलिए इसमें किसी अटकलबाजी की गुंजाइश नहीं थी। अगले ही दिन दिल्ली पुलिस ने औपचारिक रूप से कैमरों के सामने इस बात का खंडन किया और कहा कि दिल्ली पुलिस को ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है।
लोगों को यह अच्छी तरह मालूम है कि दिल्ली पुलिस उस केन्द्र सरकार के तहत काम करती है जो जेएनयू से एक गहरा और चौड़ा वैचारिक मतभेद रखती है और जेएनयू के बागी तेवरों के छात्रों के लिए, उनकी साख बचाने के लिए, दिल्ली पुलिस पर कोई दबाव नहीं हो सकता था। लेकिन इस बड़े अखबार की इस खबर के चलते जेएनयू के छात्रों के आईएसआईएस से रिश्ते जोडऩे की एक बड़ी कोशिश, और पूरी तरह बेबुनियाद कोशिश हुई थी। इस कोशिश से देश के अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की साख पर भी एक आंच लाई जा रही थी जिसके कुछ लोगों के बारे में देश के कुछ दूसरे तबकों की राय रहती है कि वे गद्दार हैं। लेकिन स्वघोषित राष्ट्रवादियों के ऐसे नारों से परे जब एक बड़ा अखबार ऐसी खबर प्रमुखता के साथ छापता है, तो यह अखबारनवीसी से परे की एक बात हो जाती है। और दिल्ली शहर में सबसे बड़े अखबार को यह सहूलियत तो हमेशा ही रहती है कि वे पुलिस से अपनी ऐसी सनसनीखेज जानकारी पर बात कर ले।
लेकिन अखबारनवीसी और अब उसके और बुरे मीडिया-संस्करण, टीवी चैनलों को देखें तो लगातार यह सिलसिला बढ़ते चल रहा है, और किसी की साख को चौपट करने में पल भर भी नहीं लगता। छत्तीसगढ़ में ही हम रोजाना देखते हैं कि नक्सल आरोपों पर किसी को गिरफ्तार किया जाता है, तो उन्हें मीडिया नक्सली लिख देता है। ऐसे लोग निहत्थे रहते हैं, गरीब और आदिवासी रहते हैं, शहरों से दूर जंगलों में बसे रहते हैं, और उनके पास अपनी साख को बचाने के लिए किसी वकील की कोई सहूलियत नहीं होती। ऐसे लोगों को नक्सल-आरोपी या नक्सल संदेह से घिरे लिखने जितनी जहमत भी नहीं उठाई जाती। और यही हाल बलात्कार या हत्या के आरोप से घिरे हुए लोगों का होता है, और किसी अखबार या चैनल की सुर्खी में इस बात की जगह निकालना अब बंद हो गया है कि ये लोग आरोपी हैं, या अभियुक्त हैं, या कटघरे में खड़े हैं।
अभी कश्मीर या किसी और जगह के एक मुस्लिम नौजवान ने आतंक के आरोपों से तेरह बरस बाद बरी होने पर दिल्ली के एक बड़े अंग्रेजी अखबार में उसकी गिरफ्तारी के वक्त की खबरों की कतरनें जारी करते हुए पूछा कि तेरह बरस पहले इस अखबार ने उसे आतंकी करार दे दिया था, और बड़े-बड़े हर्फों में उसे एक बड़ी आतंकी घटना के लिए जिम्मेदारी आतंकी लिखा था। अब वह पूरी तरह से बरी हो चुका है, लेकिन ऐसी खबर की वजह से उसका और उसके परिवार का जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता।
दरअसल भारत का मीडिया किसी की पगड़ी उछालने के पहले महज यह देखता है कि उसकी ताकत कितने बड़े वकील को रखने की है। एक बार यह समझ आ जाए कि जिसके खिलाफ लिखा जा रहा है, वह मामूली वकील भी नहीं कर सकता, तो मीडिया न केवल उसके खिलाफ मनमर्जी झूठ छापते और दिखाते चलता है, बल्कि वह अदालत और जज बनकर उसे कुसूरवार भी ठहरा देता है। ऐसी मीडिया-ट्रायल के खिलाफ भी पिछले कुछ समय से लगातार बात उठ रही है कि मीडिया का दायरा कहां खत्म होता है, और जिस तरह अदालतों को नसीहत दी जाती है कि वे अपने दायरे से बाहर जाकर काम न करें, क्या अदालतों का दायरा भी तय करने की जरूरत है?
लोगों को याद होगा कि अभी कुछ अरसा पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों से यह जानना चाहा है कि किसी मामले की छानबीन के चलते हुए उसकी कितनी जानकारी मीडिया को दी जानी चाहिए, और कौन सी जानकारियां ऐसी हैं जो जांच अफसर भी उजागर न करें, मीडिया को न बताएं, जांच में घिरे लोगों की इज्जत चौपट न करें।
लेकिन जैसा कि आसपास के माहौल का असर हर किसी पर होता है, भारत के अखबारों पर पहले तो असर टीवी चैनलों का पड़ा जो कि ब्रेकिंग न्यूज के चक्कर में एक-दूसरे से कुछ मिनटों भी आगे रहने का रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं, और इस चक्कर में वे खबरों को चटपटा और सनसनीखेज बनाकर, आपाधापी में, जल्द से जल्द पेश करने के मुकाबले में रहते हैं। अखबारों ने भी धीरे-धीरे टीवी के इसी अंदाज को अपनाना शुरू कर दिया, और अब अखबार अपने वेबसाइटें भी रखते हैं, और उन पर तो और भी गैरजिम्मेदारी के साथ खबरें डाली जाती हैं।
इसके बाद आया सोशल मीडिया जो कि किसी भी तरह की जिम्मेदारी और जवाबदेही के बिना एक आजाद पंछी सरीखा है और जो जहां चाहे वहां से दाना चुग सकता है, जहां चाहे बैठ सकता है, और जहां चाहे बीट कर सकता है। ऐसे सोशल मीडिया का असर भी टीवी पर पड़ा और अखबारों पर भी पड़ा। नतीजा यह हुआ कि अब अखबार अपनी चूक को जायज और मासूम ठहराने के लिए सोशल मीडिया पर तोहमत जडऩे लगे हैं कि यह खबर तो सोशल मीडिया पर चारों तरफ थी, वॉट्सऐप पर चारों तरफ थी, और इसलिए इसे छाप दिया था। मामला इतना बिगड़ गया है कि एक टीवी चैनल ने तो वायरल सच या वायरल झूठ नाम से एक कार्यक्रम ही रोज सुबह दिखाना शुरू कर दिया है कि सोशल मीडिया पर या संदेशों पर जो बातें तैर रही हैं, उनमें सच क्या हैं, और झूठ क्या हैं?
सोशल मीडिया तो एक बेकाबू औजार है, और यही हाल मोबाइल फोन पर फैलने वाले संदेशों का है जो कि सोशल मीडिया न होते हुए भी थोक में सैकड़ों लोगों को भेजे जाने वाले संदेश रहते हैं, वीडियो रहते हैं, और तस्वीरें रहती हैं। लेकिन परंपरागत मीडिया को इस बारे में फिर से सोचना चाहिए कि क्या किसी संदेही को, किसी आरोपी को, किसी अभियुक्त को मुजरिम करार देने वाली भाषा लिखना जारी रखा जाए, या फिर उन लोगों का भी ख्याल रखा जाए जो कि महंगे वकील खड़े करके मीडिया पर मानहानि के मुकदमे नहीं कर सकते। भारत में न्यायपालिका सौ में से शायद 95 लोगों को बरी कर देती है, और गिने-चुने लोगों को ही सजा मिलती है। ऐसे में किसी का हक नहीं बनता कि वे अभियुक्तों को हत्यारा, बलात्कारी, नक्सली, आतंकी करार देते चलें।

शरणार्थियों से परे भी लोकतंत्र की बातों को समझने की जरूरत

संपादकीय
10 अप्रैल 2017


स्वीडन के प्रधानमंत्री का यह बयान सामने आया है कि वे अपने देश में आकर रह रहे (मुस्लिम) शरणार्थियों को अब तक जिस उदारता के साथ जगह देते आए हैं, ऐसा अब कभी नहीं करेंगे। राजधानी स्टॉकहोम में अभी एक शरणार्थी ने एक ट्रक को हाईजैक कर लिया, और उसे लोगों पर चढ़ा दिया। इसमें कई लोग मारे गए, और देश के भीतर सरकार के खिलाफ बड़ी नाराजगी हुई। योरप के एक-एक करके कई देशों में यह नौबत आ रही है कि जो सरकारें उदारता से शरणार्थियों को जगह दे रही थीं, वे अपने देश के अमन-पसंद लोगों या कि संकीर्णतावादी लोगों की आलोचना की शिकार हो रही हैं। दरअसल इतनी बड़ी संख्या में शरणार्थी पहुंच रहे हैं कि उनके साथ वहां से आतंकियों के कुछ एजेंट भी अगर आ रहे होंगे तो इसमें कोई हैरानी नहीं है। और फिर सीरिया या इराक में जो इस्लामी संगठन आतंक का राज कायम रखे हुए हैं, उन लोगों को भी यह बात नहीं जंचती है कि वहां के लोग निकलकर दूसरे देशों में जा बसें, इसलिए इसमें कोई हैरानी नहीं होगी अगर शरणार्थियों के साथ आ गए लोगों में कुछ आतंकी भी हों, और वे योरप के इन देशों में शरणार्थियों के खिलाफ भावना भड़काने के लिए आतंक की ऐसी वारदातें कर रहे हों।
इतनी दूर की इन घटनाओं पर लिखने की हमारी एक वजह यह भी है कि भारत में भी कई देशों के शरणार्थी समय-समय पर आकर बसे हैं, और इनमें से अधिकतर के खिलाफ किसी तरह की कोई नाराजगी नहीं रही है। आजादी के पहले का इतिहास अगर देखें तो ईरान से आए हुए पारसियों ने भी गुजरात से भारत में प्रवेश किया था, और यहां रहने की जगह पाई, कामयाबी पाई, और वे अब किसी भी दूसरे हिन्दुस्तानी से कम नहीं हैं। यहां तिब्बत से आए हुए लोग देश भर में सम्मान के साथ रह रहे हैं, और उनका कहीं भी अपमान नहीं होता है। 1971 की लड़ाई के वक्त बांग्लादेश से लाखों शरणार्थी भारत आए, और उनके साथ किसी तरह का तनाव नहीं हुआ। आज भी असम जैसे राज्य में जिन बांग्लादेशियों के साथ तनाव की खबरें आती हैं, वे शरणार्थी नहीं है, और अवैध तरीके से भारत में आकर बसे हुए लोग हैं, और उन्हें वापिस भेजने की मांग जरूर उठती है। अभी सबसे ताजा मामला म्यांमार से आए हुए मुस्लिम शरणार्थियों का है जिन्हें कि हिन्दू-बहुल जम्मू के इलाके में बसा दिया गया था, और कश्मीर का यह हिस्सा वैसे भी धार्मिक अलगाव से गुजरते आया है, ऐसे में वहां पर म्यांमार के मुस्लिमों को ठहराना समझदारी का फैसला भी नहीं था, और उनका विरोध हुआ।
एक उम्मीद जो तनाव के बीच से निकलकर आए हुए लोगों से नहीं की जा सकती है, वह यह कि जिस देश में जाकर उन्हें रहने को जगह मिल रही है, उस देश के रीति-रिवाज का इतना सम्मान करें कि वे वहां घुलमिल जाएं। जहां-जहां वैसा होता है, वहां-वहां पर बाहर से आए हुए लोगों को दिक्कत नहीं होती है, वरना दूसरे देशों की क्या बात है, भारत के भीतर ही ओडिशा से मारवाडिय़ों को मारकर भगाया गया था। यही बात समाज में नसीहत की तरह ली जानी चाहिए कि जहां रहना है वहां पर स्थानीय परंपराओं, स्थानीय संस्कृति, स्थानीय कानून का सम्मान करना चाहिए। मुस्लिम देशों से योरप पहुंच रहे शरणार्थियों के साथ एक दिक्कत यह भी है कि उनके पहुंचने के पहले भी जो मुस्लिम आबादी इन देशों में है, उनके पहनावे को लेकर, उनकी शादियों के नियम-कानून को लेकर एक सामाजिक तनाव चले ही आ रहा था। एक के बाद एक देश की संसद पहरावे को लेकर मुस्लिम महिला को आजादी देने की कोशिश कर रही है, और कुछ लोग इसे आजादी मान रहे हैं, तो कुछ लोग पहरावे की आजादी को खत्म करना भी मान रहे हैं। ऐसे दोनों नजरियों से परे यह बात साफ है कि संस्कृतियों का टकराव, लोकतंत्र और धार्मिक आस्थाओं का टकराव, स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी, और बाहर से आए हुए लोगों के कामकाज का टकराव, और स्थानीय सरकार के बजट का बाहरी लोगों पर खर्च होने का मुद्दा, इन सबसे दुनिया के बाकी देशों के लोगों को भी सीखने की जरूरत है, क्योंकि जैसे-जैसे दुनिया के देशों में नए टकराव खड़े होंगे, वैसे-वैसे इन मुद्दों पर एक समझदारी दिखाने की जरूरत आती ही रहेगी। जो देश आज लोकतांत्रिक उदारता दिखा रहे हैं, वे आतंकी हमलों को झेलते हुए ऐसी उदारता छोडऩे पर मजबूर भी हो सकते हैं, हो रहे हैं, इसलिए हर संबंधित तबके को उदारता और अमन के महत्व को समझने की जरूरत है।