बस्तर में खड़ा एक बड़ा सवाल, पुलिस-प्रशासन, अब कैसे हों?

संपादकीय
26 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के ताजा हमले के बाद राज्य सरकार में कई तरह के विचार-विमर्श चल रहे हैं, और जनता के बीच जो लोग जानकार हैं, वे भी यह सोच रहे हैं कि इस नक्सल हिंसा का खात्मा कैसे हो। अभी राज्य और केन्द्र सरकार दोनों ही इसी पखवाड़े दिल्ली में बैठकर इस पर विचार करने जा रहे हैं, और केन्द्रीय गृहमंत्री की इस बैठक में बाकी नक्सल प्रभावित राज्य भी शामिल होंगे। जो लोग लोकतंत्र के संघीय ढांचे के भीतर राज्य में जिला या संभाग स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था को जानते हैं, उसकी सीमाओं और संभावनाओं को समझते हैं वे बस्तर जैसे इलाके की मौजूदा व्यवस्था में किसी नई सोच को सामने रख सकते हैं।
बस्तर में एक तो पुलिस की व्यवस्था की बात है जिसमें राज्य और केन्द्र सरकार के सुरक्षा बल मिलकर काम कर रहे हैं, और एक किस्म से नक्सल मोर्चे को केन्द्रीय सुरक्षा बल ही मोटेतौर पर सम्हाल रहे हैं। वह एक अलग रणनीतिक योजना और मोर्चा है, और उस पर अधिक चर्चा यहां पर मुमकिन नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ राज्य के प्रशासनिक ढांचे और जमीनी स्तर की सरकारी व्यवस्था को देखें तो बस्तर में सुधार की असीमित संभावनाएं दिखती हैं, और अगर इस दिशा में काम किया गया होता तो हो सकता है कि नक्सलियों को सरल आदिवासियों के इस इलाके में पांव जमाने का मौका भी नहीं मिला होता, और वे शायद यहां आते भी नहीं। और यह बदहाली अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से दशकों से चली आ रही है, और राज्य बनने के बाद भी पिछले डेढ़ दशक में इसमें कोई सुधार नहीं हुआ है।
जब कभी ऐसी कोई बड़ी घटना होती है तो आमतौर पर एक बड़े फेरबदल की चर्चा होने लगती है, और एक नई व्यवस्था की बात भी उठती है। लेकिन सवाल यह है कि चली आ रही मौजूदा व्यवस्था की बुनियादी खामियों के पीछे की वजहों को देखे बिना, उस नाकामयाबी को दूर किए बिना, महज इसलिए कोई नई व्यवस्था लागू की जाए कि उसकी आड़ में पुरानी नाकामयाबी छुप जाए, तो इसका कोई लंबा असर या लंबा फायदा नहीं मिल सकता। बस्तर में हो सकता है कि सरकार का एक तबका पुलिस और प्रशासन दोनों स्तर पर और अधिक अधिकार रखने वाले और बड़े अफसरों की तैनाती की बात सोचें, लेकिन जहां पर गिरावट और खामी जमीनी स्तर पर है, सरकार के सबसे निचले स्तर पर भी जहां काम गड़बड़ा गया है, वहां पर कलेक्टर और कमिश्नर जैसे बड़े अफसरों के ऊपर और किसी अफसर को बिठा देने से जमीनी हालात बेहतर होते नहीं दिखते। अब सरकार के भीतर प्रशासन की बेहतर समझ रखने वाले लोग हो सकता है कि कोई एक ऐसा मॉडल सोच लें जो कि निचले स्तर पर भी प्रशासनिक सुधार ला सके, लेकिन प्रशासनिक सुधार के लिए प्रशासन के ढांचे को ऊपर-ऊपर और अधिक भारी करना पता नहीं एक समझदार विकल्प होगा या नहीं?
यह बात जरूर है कि छत्तीसगढ़ में सरकार को पुलिस के हथियारबंद मोर्चे से परे भी प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर बनाने के बारे में सोचना होगा, और बस्तर के अलावा भी ऐसी सोच बाकी जगहों पर काम आ सकती है। राज्य सरकार ने पिछले बरसों में बस्तर और सरगुजा के लिए दो अलग विकास प्राधिकरण बनाकर उनकी बैठकें इन्हीं इलाकों में करके इन्हें मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की मौजूदगी में सर्वोच्च प्राथमिकता देकर वहां से जुड़े हुए फैसलों पर तेजी से अमल करवाया है, लेकिन अब यह जाहिर है कि वह कोशिश काफी नहीं हुई, और जनता से आने वाली बात तो यह बताती है कि नीति, कार्यक्रम, और योजना बनाने का जमीनी भ्रष्टाचार से कोई लेना-देना नहीं रहता है। छत्तीसगढ़ में सरकार का कामकाज जिस बुरी तरह भ्रष्टाचार का शिकार है, उसके सुबूत खुद सरकार की एजेंसियों के छापे में दिखता है।
बस्तर में पुलिस ने पिछले बरसों में जो जुल्म और ज्यादतियां की थीं, उनका नुकसान सरकार अभी तक झेल रही है, और यह आगे भी जारी रहेगा। इसी तरह जो प्रशासनिक खामियां सरकार के निचले स्तर पर हैं, उनको सुधारने के लिए पता नहीं बस्तर में और अधिक बड़े अफसर की जरूरत है, या मौजूदा ओहदों पर ही बेहतर और संवेदनशील अफसरों की जरूरत है जो कि अपने नीचे के अमले को सुधार सकें, और आदिवासियों का विश्वास जीत सकें। बस्तर पहले ऐसे अफसर देख भी चुका है।

बस्तर में खड़ा एक बड़ा सवाल, पुलिस-प्रशासन, अब कैसे हों?

संपादकीय
26 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के बस्तर में नक्सलियों के ताजा हमले के बाद राज्य सरकार में कई तरह के विचार-विमर्श चल रहे हैं, और जनता के बीच जो लोग जानकार हैं, वे भी यह सोच रहे हैं कि इस नक्सल हिंसा का खात्मा कैसे हो। अभी राज्य और केन्द्र सरकार दोनों ही इसी पखवाड़े दिल्ली में बैठकर इस पर विचार करने जा रहे हैं, और केन्द्रीय गृहमंत्री की इस बैठक में बाकी नक्सल प्रभावित राज्य भी शामिल होंगे। जो लोग लोकतंत्र के संघीय ढांचे के भीतर राज्य में जिला या संभाग स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था को जानते हैं, उसकी सीमाओं और संभावनाओं को समझते हैं वे बस्तर जैसे इलाके की मौजूदा व्यवस्था में किसी नई सोच को सामने रख सकते हैं।
बस्तर में एक तो पुलिस की व्यवस्था की बात है जिसमें राज्य और केन्द्र सरकार के सुरक्षा बल मिलकर काम कर रहे हैं, और एक किस्म से नक्सल मोर्चे को केन्द्रीय सुरक्षा बल ही मोटेतौर पर सम्हाल रहे हैं। वह एक अलग रणनीतिक योजना और मोर्चा है, और उस पर अधिक चर्चा यहां पर मुमकिन नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ राज्य के प्रशासनिक ढांचे और जमीनी स्तर की सरकारी व्यवस्था को देखें तो बस्तर में सुधार की असीमित संभावनाएं दिखती हैं, और अगर इस दिशा में काम किया गया होता तो हो सकता है कि नक्सलियों को सरल आदिवासियों के इस इलाके में पांव जमाने का मौका भी नहीं मिला होता, और वे शायद यहां आते भी नहीं। और यह बदहाली अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से दशकों से चली आ रही है, और राज्य बनने के बाद भी पिछले डेढ़ दशक में इसमें कोई सुधार नहीं हुआ है।
जब कभी ऐसी कोई बड़ी घटना होती है तो आमतौर पर एक बड़े फेरबदल की चर्चा होने लगती है, और एक नई व्यवस्था की बात भी उठती है। लेकिन सवाल यह है कि चली आ रही मौजूदा व्यवस्था की बुनियादी खामियों के पीछे की वजहों को देखे बिना, उस नाकामयाबी को दूर किए बिना, महज इसलिए कोई नई व्यवस्था लागू की जाए कि उसकी आड़ में पुरानी नाकामयाबी छुप जाए, तो इसका कोई लंबा असर या लंबा फायदा नहीं मिल सकता। बस्तर में हो सकता है कि सरकार का एक तबका पुलिस और प्रशासन दोनों स्तर पर और अधिक अधिकार रखने वाले और बड़े अफसरों की तैनाती की बात सोचें, लेकिन जहां पर गिरावट और खामी जमीनी स्तर पर है, सरकार के सबसे निचले स्तर पर भी जहां काम गड़बड़ा गया है, वहां पर कलेक्टर और कमिश्नर जैसे बड़े अफसरों के ऊपर और किसी अफसर को बिठा देने से जमीनी हालात बेहतर होते नहीं दिखते। अब सरकार के भीतर प्रशासन की बेहतर समझ रखने वाले लोग हो सकता है कि कोई एक ऐसा मॉडल सोच लें जो कि निचले स्तर पर भी प्रशासनिक सुधार ला सके, लेकिन प्रशासनिक सुधार के लिए प्रशासन के ढांचे को ऊपर-ऊपर और अधिक भारी करना पता नहीं एक समझदार विकल्प होगा या नहीं?
यह बात जरूर है कि छत्तीसगढ़ में सरकार को पुलिस के हथियारबंद मोर्चे से परे भी प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर बनाने के बारे में सोचना होगा, और बस्तर के अलावा भी ऐसी सोच बाकी जगहों पर काम आ सकती है। राज्य सरकार ने पिछले बरसों में बस्तर और सरगुजा के लिए दो अलग विकास प्राधिकरण बनाकर उनकी बैठकें इन्हीं इलाकों में करके इन्हें मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की मौजूदगी में सर्वोच्च प्राथमिकता देकर वहां से जुड़े हुए फैसलों पर तेजी से अमल करवाया है, लेकिन अब यह जाहिर है कि वह कोशिश काफी नहीं हुई, और जनता से आने वाली बात तो यह बताती है कि नीति, कार्यक्रम, और योजना बनाने का जमीनी भ्रष्टाचार से कोई लेना-देना नहीं रहता है। छत्तीसगढ़ में सरकार का कामकाज जिस बुरी तरह भ्रष्टाचार का शिकार है, उसके सुबूत खुद सरकार की एजेंसियों के छापे में दिखता है।
बस्तर में पुलिस ने पिछले बरसों में जो जुल्म और ज्यादतियां की थीं, उनका नुकसान सरकार अभी तक झेल रही है, और यह आगे भी जारी रहेगा। इसी तरह जो प्रशासनिक खामियां सरकार के निचले स्तर पर हैं, उनको सुधारने के लिए पता नहीं बस्तर में और अधिक बड़े अफसर की जरूरत है, या मौजूदा ओहदों पर ही बेहतर और संवेदनशील अफसरों की जरूरत है जो कि अपने नीचे के अमले को सुधार सकें, और आदिवासियों का विश्वास जीत सकें। बस्तर पहले ऐसे अफसर देख भी चुका है।

बस्तर के ताजा नक्सल-हमले से नौबत बदली नहीं है, वही है

संपादकीय
25 अप्रैल 2017


बस्तर के सुकमा में कल फिर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया और सीआरपीएफ के दो दर्जन से अधिक जवान शहीद हो गए। उनके नामों की लिस्ट देखें तो वे कई प्रदेशों से आए हुए थे, और नामों पर एक नजर डालने से ही पता लगता है कि आदिवासी बस्तर में लोकतंत्र का जिम्मा पूरा करने के लिए फतवे उठाकर आए हुए इन शहीदों में हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, सभी शामिल थे। दूसरी तरफ केन्द्र और राज्य सरकार के पास बस्तर के पिछले हमले में हुई दर्जन भर शहादत के बाद कहने को नया कुछ नहीं है, क्योंकि बस्तर की इस खतरनाक और जटिल जमीनी हकीकत पर रणनीति को बहुत आसानी से और जल्दी-जल्दी बदला भी नहीं जा सकता। छत्तीसगढ़ को अविभाजित मध्यप्रदेश के वक्त से विरासत में मिली हुई नक्सल-समस्या से जूझना आसान नहीं पड़ रहा, लेकिन केन्द्र सरकार की मदद से नक्सल मोर्चे पर प्रदेश सरकार लगातार बेहतर काम कर पा रही है। यह बात आज शहादत के आंकड़ों के बीच सुनने में अटपटी लग सकती है, लेकिन सच यही है कि नक्सल कब्जे के इलाके धीरे-धीरे करके सरकार अपने कब्जे में ले रही है, और उन इलाकों में लगातार जो विकास हो रहा है, उसे पूरा करने के लिए रोज नए खतरे उठाने भी पड़ रहे हैं।
दरअसल देश के भीतर हो, या कि सरहद पर, मौत के आंकड़े जब जत्थे में आते हैं, तो वे हालात पर सोचने की ताकत को कमजोर कर देते हैं। अगर आंकड़े एक साथ बड़े होते हैं, तो वे सरकार को नाकामयाब साबित कर देते हैं, और वही आंकड़े अगर किस्तों में धीरे-धीरे आते हैं, तो सरकार की नाकामयाबी उस तरह सिर चढ़कर नहीं बोलती। छत्तीसगढ़ में जो लोग नक्सल मोर्चे पर दोनों तरफ की मौतों, और आदिवासियों की मौतों के आंकड़ों से परे देख पा रहे हैं, उनको यह समझ आ रहा है कि इलाके नक्सली-कब्जे से छुड़ाने के दौरान, और वहां पर सड़कें बनाने, बिजली ले जाने, जैसे कई विकास कार्यों में तैनात जवानों पर हमला नक्सलियों के लिए आसान हो जाता है। अगर राज्य की पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षा बल अपने सुरक्षित मोर्चों और छावनियों में बैठे रहते, तो इतनी मौतें नहीं होतीं। इसलिए आज ऐसे हमलों के साथ-साथ यह समझने और देखने की भी जरूरत है कि सरकार के काम को, विकास की योजनाओं को जब आगे ले जाया जा रहा है, तो उस दौरान भी ऐसे हमले हो रहे हैं, शायद बढ़ रहे हैं।
लेकिन आज बस्तर में जो हालात हैं उन्हें देखते हुए यह अनदेखा करना ठीक नहीं होगा कि आदिवासियों के एक तबके की हमदर्दी नक्सलियों के साथ इसलिए हो सकती है क्योंकि सरकार से, शहरी समाज और कारोबार से उन्हें शोषण और भ्रष्टाचार के बिना कुछ नहीं मिलता। यह बात जगजाहिर है कि बस्तर के अफसर-कर्मचारी, नेता और सत्ता के ओहदों पर बैठे हुए लोगों में से एक बड़ा हिस्सा खुले भ्रष्टाचार में शामिल रहता है, और इसलिए न सरकार की साख बन पाती है, न ही लोकतंत्र की। दूसरी तरफ जब पुलिस पर ज्यादती और हत्या-बलात्कार जैसे आरोप लगते हैं, तो यह मानना ठीक नहीं होगा कि वे सारे के सारे आरोप झूठे हैं। देश की सबसे बड़ी अदालतों से लेकर मानवाधिकार आयोगों तक ने ऐसे आरोपों को सही माना है, और यह बात बिल्कुल साफ है कि जिस परिवार के बेकसूर लोगों की हत्या हो, जिनकी बेकसूर बेटियों के साथ बलात्कार हो, उनकी कोई हमदर्दी सरकार के साथ नहीं हो सकती, और जमीनी आबादी के मन में नफरत पैदा करते हुए वर्दियां अपने सिर पर से खतरा कम भी नहीं कर सकतीं। सरकार को नक्सली मोर्चे पर खतरों को गिनाते हुए कभी भी यह कहने का हक नहीं मिल सकता कि विपरीत परिस्थितियों में लगातार काम करने की वजह से सुरक्षा बल हो सकता है कि कुछ ज्यादतियां करते हों। ऐसी ज्यादती से न सिर्फ उन गिने-चुने आदिवासी परिवारों पर जुल्म होता है, बल्कि पूरे इलाके के मन में सुरक्षा बलों के खिलाफ नफरत खड़ी हो जाती है, और उनमें से कुछ लोग नक्सलियों को खबर देकर सरकारी वर्दियों के लिए खतरा खड़ा कर सकते हैं।
सरकार के लिए नक्सल मोर्चा किसी जीत की नौबत नहीं है, यह हार और हार की नौबत है, जब तक कि इस समस्या को निपटा न लिया जाए। एक तरफ नक्सली हमलों से जिंदगियां जाती हैं, दूसरी तरफ सरकारी सुरक्षा बलों की ज्यादतियों से सरकार पर तोहमत आती है। यह नौबत बदलने के लिए सरकार को बंदूक की लड़ाई के साथ-साथ बातचीत का रास्ता ढूंढना ही होगा। बंदूक छोडऩे की शर्त पर बातचीत करने की शर्त ठीक नहीं होगी, बिना किसी शर्त के कुछ मध्यस्थ लोगों के साथ बातचीत करनी चाहिए, क्योंकि पूरी दुनिया का यह इतिहास है कि कोई भी हथियारबंद आंदोलन महज बंदूकों के बल पर खत्म नहीं किए जा सकते। श्रीलंका में लिट्टे को खत्म करने के लिए फौज ने जितने बेकसूरों को मारा, वैसा भारतीय लोकतंत्र में संभव नहीं है। हम फिर इस बात को दुहराना चाहते हैं कि नक्सली जिन मध्यस्थ लोगों से बातचीत करने को तैयार हों, ऐसे लोगों को ढूंढकर छत्तीसगढ़ सरकार को अपने स्तर पर, और भारत सरकार को अपने स्तर पर वार्ता शुरू करनी चाहिए, क्योंकि इसमें नक्सलियों और सुरक्षा बलों के अलावा आम आदिवासी भी बड़ी संख्या में मारे जा रहे हैं, और इन इलाकों में लोकतंत्र के फायदे नहीं पहुंच पा रहे हैं। 

एक के बाद एक कई देशों में हिन्दुस्तानी कामगार दिक्कत में

संपादकीय
24 अप्रैल 2017


ब्रिटेन से खबर आई है कि वहां दो कारखानों में छापे के दौरान 38 हिन्दुस्तानियों को हिरासत में लिया गया जो कि वीजा का वक्त खत्म होने के बाद वहां बने हुए थे। यह खबर एक हफ्ते में भारतीय कामगारों से जुड़ी तीसरी निराशाजनक खबर है। पहले भारत आकर ऑस्ट्रेलिया लौटे वहां के प्रधानमंत्री ने वापिस घर पहुंचते ही हिन्दुस्तानियों पर कड़े वीजा प्रतिबंध की घोषणा की, उसके बाद अमरीका में ट्रंप प्रशासन ने भारतीय कामगारों के वीजा नियमों को और कड़ा किया। और अब ब्रिटेन की यह खबर। ये तीनों देश भारतीय कामगारों के लिए बड़ी जगह हैं, और अगर वहां उनका काम कम होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था को भी एक नुकसान पहुंचेगा, और वहां पर जमे जमाए काम वाले इन लोगों की हालत भी डांवाडोल होगी।
भारत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के काम सम्हालने के बाद से लगातार विदेशी मोर्चे पर एक अभूतपूर्व सक्रियता दिखाई, और बहुत सी खबरें पाईं। लेकिन जिन देशों के साथ भारत को फायदा होते दिखा, उनमें कई देश तो ऐसे थे जिनको भारत से बहुत बड़ा कारोबारी फायदा हो रहा था, और उनसे भारत को महत्व मिलना स्वाभाविक ही था। दूसरी तरफ अमरीका के साथ भारत के जो अच्छे संबंध ओबामा के रहते दिख रहे थे, उनका कोई फायदा अभी दिख नहीं रहा है। नए राष्ट्रपति ट्रंप के आने के बाद भी हिन्दुस्तानियों के वहां काम करने को लेकर नई दिक्कतें बढ़ रही हैं, और भारत की सरकार इसमें कुछ भी करने की हालत में नहीं दिख रही है। अमरीका की मौजूदा सरकार का जो रूख है वह भारत के सीधे-सीधे खिलाफ न होने पर भी इतना तो है ही कि वह भारत को किसी प्राथमिकता में नहीं रख रहा है। उसके निशाने पर वैसे तो आधा दर्जन मुस्लिम देश हैं, लेकिन ट्रंप की चुनावी घोषणाओं में ही यह शामिल था कि किस तरह विदेशी लोगों से रोजगार वापिस लेकर अमरीकी लोगों को काम मुहैया कराया जाएगा। फिलहाल ट्रंप के आने के बाद से अब तक भारत सरकार का अमरीका के साथ किसी असरदार बातचीत का कोई संकेत नहीं है। अमरीका में भारतवंशीय लोगों पर नस्लवादी हमले हुए, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री ने, या विदेश मंत्री ने इस पर एक ट्वीट करने की भी पहल नहीं की। इससे जाहिर है कि भारत का फिलहाल कोई असर अमरीकी सरकार पर नहीं है, प्राथमिकता की बात तो दूर रही।
ऐसी नौबत में एक बात साफ दिखती है कि भारत को आगे-पीछे यह जरूर सोचना पड़ेगा कि वह दूसरे देशों में मजदूरी के काम के बजाय अपने खुद के देश में ऐसे लोगों को रोजगार या कारोबार के लिए कैसे बढ़ाए? वैसे तो स्टार्टअप से लेकर मेक इन इंडिया तक कई तरह के नारे पिछले एक बरस में केन्द्र सरकार ने उछाले हैं, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था में इन नारों का असर नहीं दिख रहा है। केन्द्र सरकार को यह भी सोचना चाहिए कि इस देश के माहौल में आदिम युग जैसी जो अलोकतांत्रिक हिंसा बढ़ती जा रही है, क्या उसकी वजह से पूंजीनिवेश से लेकर दूसरे देशों से लोगों का भारत आना तक घट रहा है? यह एक आसान नौबत नहीं है क्योंकि दुनिया की अर्थव्यवस्था जिस तरह मंदी से गुजर रही है, और आज तो हिन्दुस्तान का काम सस्ते तेल की वजह से खिंच रहा है, आगे चलकर हिन्दुस्तानियों के रोजगार संपन्न पश्चिमी देशों में घटते जाएंगे तो क्या होगा? 

बेकाबू रफ्तार से अनिवार्य किए जा रहे आधार कार्ड के खतरे

संपादकीय
23 अप्रैल 2017


सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर केन्द्र सरकार से नाराजगी जाहिर की है कि उसकी मनाही के बावजूद सरकार तरह-तरह के कामों के लिए आधार कार्ड का इस्तेमाल अनिवार्य कैसे करती चल रही है? अदालत ने पूछा है कि जब यह कह दिया गया था कि किसी भी बात के लिए आधार को अनिवार्य न किया जाए, तब बैंक खातों से लेकर सिमकार्ड तक, और रेल रिजर्वेशन से लेकर कई दूसरे जरूरी कामों तक आधार कार्ड को जरूरी कैसे बनाया जा रहा है? दूसरी तरफ आज ही एक खबर है कि झारखंड में सरकार की एक वेबसाइट की एक गलती से दस लाख से ज्यादा लोगों के आधार कार्ड नंबर उनकी पहचान के साथ लीक हो गए हैं, और अब उनकी जानकारी उनके लिए कई तरह के खतरे खड़ी कर सकती है। लोगों को याद होगा कि हर कुछ दिनों में देश में कहीं न कहीं से यह खबर आती है कि बैंक खातों का नंबर, या कि आधार कार्ड का नंबर लेकर किस तरह से ठगी और जालसाजी चल रही है, और सरकार के पास इसके रोकथाम का कोई औजार दिखता नहीं है।
हम पहले भी कई बार इस बात को लिख चुके हैं कि भारत जिस रफ्तार से घर-घर तक, और हर नागरिक तक की पहचान डिजिटल तरीके से करते चल रहा है, और हर छोटे-बड़े काम के लिए आधार कार्ड को अनिवार्य बनाया जा रहा है, यह तैयारी चल रही है कि किस तरह लोग आधार कार्ड नंबर और अपने अंगूठे के निशान के साथ भुगतान कर सकेंगे। ऐसे में एक दूसरी खबर यह भी है कि छत्तीसगढ़ की राशन दुकानों में बड़ी संख्या में लोगों को आधार कार्ड को लेकर एक परेशानी झेलनी पड़ रही है। उनके राशन कार्ड में सदस्यों की संख्या अलग है, और आधार कार्ड में अलग है, तो उन्हें राशन कम लोगों के लिए ही मिल रहा है। हो सकता है कि लोगों की अपनी दी गई जानकारी भी गलत हो, लेकिन यह भी हो सकता है कि सरकार की दर्ज की गई जानकारी में गलती हो, और अब अचानक सात लोगों के परिवार को चार लोगों का राशन मिल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड की अनिवार्य के खिलाफ दायर की गई एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए इसे अनिवार्य बनाने पर रोक लगा दी है। लेकिन देश में सरकारें और प्रशासन अपनी मर्जी से जगह-जगह अदालती आदेश के खिलाफ जाकर आधार कार्ड की अनिवार्यता लागू कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी उन लोगों को भी गैस एजेंसियों से रसोई गैस बिना आधार कार्ड नहीं मिल रही जो कि सरकारी रियायत को छोड़ चुके हैं, और खुले बाजार से बिना किसी रियायत वाली रसोई गैस ले रहे हैं।
भारत में सरकारें न तो साइबर और डिजिटल सुरक्षा के लिए तैयार हैं, और न ही दुनिया की कोई भी ताकत हैकरों और साइबर-मुजरिमों के मुकाबले में पूरी तरह से सुरक्षा जुटा पाती हैं। ऐसे में भारत के हर नागरिक की जिंदगी की छोटी-छोटी बातों को तो आधार कार्ड दर्ज करते चल रहा है, हर सफर, हर खरीदी, हर बैंक भुगतान, हर सरकारी काम आधार कार्ड के रास्ते अपने डिजिटल पदचिन्ह छोड़ते चल रहे हैं। ऐसे में लोगों की निजी जिंदगी, और उनकी हर तरह की गोपनीयता बुरी तरह खतरे में है। सरकार ने अब तमाम सरकारी अनुदान, या कि मजदूरी, इन सबको अनिवार्य रूप से बैंक से भी जोड़ दिया है, और आधार कार्ड से भी। यह सिलसिला खतरनाक है, और यह देश एक बुलबुले पर बैठा हुआ है जिसे कि कोई भी साइबर-आतंकी ताकत पल भर में फोड़ सकती है, और उस हालत में देश की सारी व्यवस्था पल भर में चौपट हो सकती है। आज हर काम के लिए आधार कार्ड जरूरी किया जा रहा है, और कल आधार कार्ड का ढांचा ही अगर साइबर-हमले में तबाह कर दिया जाएगा, तो देश की जिंदगी मानो थम जाएगी।
एक नारे की तरह डिजिटल-विकास अच्छा तो लगता है, लेकिन कम्प्यूटरों पर जो लोग ऐसी योजनाओं को, और ऐसी व्यवस्था को बहुत आकर्षक दिखाते हैं, उन्हीं में से एक की गलती से एक प्रोग्राम ऐसा बन गया कि दस लाख से अधिक लोगों के नाम-पते, आधार नंबर, और बैंक खाते सब उजागर हो गए हैं। सरकारों को एक राजनीतिक फायदे के लिए नारेनुमा कोई भी योजना ऐसी, और ऐसे रफ्तार से लागू नहीं करनी चाहिए जो कि उनके काबू के बाहर हो।

रविशंकर प्रसाद की कही बातें और मुस्लिमों के जख्म हरे...

संपादकीय
22 अप्रैल 2017


देश में मुस्लिमों को लेकर भारतीय जनता पार्टी नेताओं और उनके सहयोगी संगठनों के लोगों की कही बातों से पैदा होने वाली गलतफहमियां खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। एक तरफ जब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने राज्य में कश्मीरी छात्रों पर बार-बार होने वाले हमलों को लेकर कड़ी कार्रवाई की बात कह रही हैं, और कश्मीरी बच्चों को अपना बच्चा कह रही हैं, तब दूसरी तरफ केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद खुद होकर मुस्लिमों के बारे में एक ऐसी बात कह रहे हैं जिससे खुद उनकी कही हुई बात के खिलाफ माहौल बन रहा है। राजस्थान की बात का लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी यह कहा है कि कश्मीर के लोग देश के परिवार के लोग हैं, और उन्हें पूरी सुरक्षा दी जाएगी, लेकिन ऐसे माहौल में रविशंकर प्रसाद की कही हुई एक बात से मुस्लिमों का फिर भड़कना, और उनके जख्म फिर हरे हो जाना तय है। कांग्रेस के एक बड़े मुस्लिम नेता सलमान खुर्शीद, और मुस्लिम राजनीति करने वाले ओवैसी ने रविशंकर प्रसाद के बयान पर कड़ा हमला किया है।
कल रविशंकर प्रसाद ने एक कार्यक्रम में मंच से यह कह दिया कि मुसलमान भारतीय जनता पार्टी के लिए वोट नहीं करते हैं, लेकिन भाजपा की सरकारें उन्हें पर्याप्त इज्जत देती हैं। उन्होंने कहा कि देश में भाजपा के 13 मुख्यमंत्री हैं, और देश पर भी भाजपा का राज है, लेकिन क्या कभी किसी नौकरीपेशा या व्यापार करने वाले सज्जन मुसलमान को प्रताडि़त किया गया है? रविशंकर प्रसाद सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े नामी वकील हैं, और उनसे यह उम्मीद की जाती है कि उनकी कही बातें कम से कम तर्कसंगत और न्यायसंगत तो होनी ही चाहिए। लेकिन यहां पर वे चूक कर गए, और देश में आज घायल चल रही एक बिरादरी के बारे में उन्होंने गैरजिम्मेदारी की बात कही क्योंकि कोई वोट किसी को दे या न दे, निर्वाचित सरकार की यह संवैधानिक जिम्मेदारी होती है कि वह सबके साथ बराबरी का बर्ताव करे, और ऐसा करना किसी बड़प्पन की बात नहीं है, यह संवैधानिक जिम्मेदारी की बात है, और इसे गिनाना एक ओछेपन की बात है। फिर जब कभी ऐसी बात गिनाई जाती है तो कहने वाले की नीयत पर एक शक भी होता है कि क्या जुबानी जमाखर्च के लिए ऐसी सफाई दी जा रही है?
आज हम देख रहे हैं कि कश्मीर में एक स्थानीय मुस्लिम नौजवान को थलसेना के सैनिकों ने किस तरह गाड़ी पर सामने बांधकर बहुत से गांवों से गुजारा ताकि वहां सेना पर होने वाले आम पथराव से गाडिय़ों के काफिले को बचाया जा सके। आज देश में समझ न रखने वाले कई लोग सेना की इस बात को यह कहकर सही ठहरा रहे हैं कि जब कश्मीर के बहुत से नौजवान रात-दिन सैनिकों पर पथराव करते हैं, तो उसके जवाब में सैनिकों का ऐसा करना क्या गलत है? इसमें बुनियादी तौर पर गलत यह है कि कश्मीरी पत्थरबाजों ने संविधान की शपथ नहीं ली है, और न ही वे सरकारी नियमों से बंधे हुए हैं, इसलिए उनका जुर्म करना एक आम मुजरिम की तरह है, और उसके लिए वे सजा के हकदार भी हैं। दूसरी तरफ जब सेना देश के कानून के खिलाफ, मानवाधिकार के खिलाफ, इंसानियत के खिलाफ कोई कार्रवाई करती है, तो उससे पूरे लोकतंत्र की साख पर आंच आती है, सरकार की फजीहत होती है, और देश भर में जनता का भरोसा सेना पर से उठता है कि वह भी जुल्म और ज्यादती करने वाली एक फौज है। इसलिए जब आज देश में कहीं गाय के नाम पर किसी गौपालक मुस्लिम को सड़कों पर पीटकर मारा जा रहा है, कहीं मुस्लिम समाज के अपने धार्मिक नियमों के तहत प्रचलित तलाक की एक बुरी प्रथा को खत्म करने की कोशिश की जा रही है, तो ऐसे नाजुक माहौल में सरकार को, सत्ता से जुड़े हुए लोगों को बहुत जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए, क्योंकि देश में अगर धार्मिक आधार पर लोगों को ऐसा लगने लगे कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है, तो यह बहुत खतरनाक बात है।

आजादी का अधिकार बिना जिम्मेदारी नहीं

संपादकीय
21 अप्रैल 2017


उत्तरप्रदेश की वाराणसी की खबर है कि जिला प्रशासन ने आदेश निकाला है कि वाट्सएप के ग्रुप में जो बातें उसके सदस्य पोस्ट करते हैं, उसके लिए ग्रुप के एडमिन जिम्मेदार होंगे। अभी यह एक अफसर का आदेश है और आगे चलकर इसे अदालतों में चुनौती भी मिलेगी, लेकिन तब तक उन लोगों को इस बारे में सोचना चाहिए जो कि आज मुफ्त के इस संचार-औजार का इस्तेमाल कर रहे हैं, जमकर कर रहे हैं।
लोगों को अपने समूह में मनचाही बातें करने, लिखने, और भेजने की आजादी तो है, लेकिन कोई भी आजादी कुछ जिम्मेदारियों के साथ ही आती है। बीती रात दिल्ली में एक स्कूली छात्र ने कार से सड़क किनारे सोए लोगों को कुचल डाला, एक की मौत हो गई, कई जख्मी हो गए। अब उसके परिवार के खिलाफ भी जुर्म दर्ज हो रहा है जिसके नाम कार थी? बिना ड्राइविंग लाइसेंस यह लड़का गाड़ी चला रहा था। एक गाड़ी कुछ शर्तों के साथ मिलती है, सड़क पर उसे चलाने के कुछ नियम रहते हैं, और कुछ बुनियादी जिम्मेदारियां भी रहती हैं। कार एक मशीनी औजार है जिसके इस्तेमाल का हक जिम्मेदारी की शर्तों के बिना नहीं मिलता। यह ठीक वैसा ही है कि पिस्तौल का लाइसेंस इस शर्त के साथ आता है कि कोई दूसरा उसे इस्तेमाल न करे, उसका बेजा इस्तेमाल न हो।
वाट्सएप जैसी संचार-सुविधा से आज पल भर में दुनिया भर में कोई वीडियो, कोई तस्वीर, या कोई लेखन फैलाया जा सकता है, और उसका विस्तार फिर बेकाबू हो जाता है। इसलिए ऐसे समूहों में जो पोस्ट होता है उसकी जिम्मेदारी किसी को तो लेनी ही होगी। कोई अपनी लाइसेंसी बंदूक चौराहे पर छोड़कर जिम्मेदारी से बच तो नहीं सकते। इसलिए सरकारों के भारत के बहुत कड़े आईटी कानून के तहत यह गारंटी करनी चाहिए कि ऐसे समूहों में पोस्ट होने वाली बातों के लिए उनके एडमिन को जवाबदेह और जिम्मेदार बनाया जाए। आज हिंदुस्तान में अचानक नफरत और बर्बादी पर भरोसा रखने वाले लोग रातों रात अभिव्यक्ति की एक ऐसी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहे हैं। जिनकी सोच इस देश के कानून के ठीक खिलाफ है। नए औजार और नई तकनीक किसी को लोकतंत्र और इंसानियत को तबाह करने का हक नहीं दे देते। इसलिए देश के कानून को अपनी जिम्मेदारी कड़ाई से पूरी करनी चाहिए। संचार साधनों पर एक बार किए गए पोस्ट का सुबूत जुटाना आसान रहता है, सरकारी एजेंसियां कुछ सौ लोगों को सजा दिला देंगी तो बाकी को भी सबक मिलेगा। आज सोशल मीडिया और ऐसे समूहों पर रात-दिन लोगों को हत्या और बलात्कार की धमकी दी जा रही है, और सरकारें अपना जिम्मा पूरा नहीं कर रही हैं।

जनता की नफरत की एक वजह, लालबत्ती खत्म...

संपादकीय
20 अप्रैल 2017


कल सुबह इसी वक्त जब हमने इसी जगह लिखा था कि छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को लाल बत्तियां बंद करवा देनी चाहिए क्योंकि वे सत्ता को जनता से दूर कर रही हैं, तब ऐसी कोई चर्चा भी नहीं थी कि दोपहर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरे देश में लाल बत्तियां खत्म करने जा रहे हैं। इस पहली मई, मजदूर दिवस से अंग्रेजी सामंतवाद का यह एक बोझ खत्म होने जा रहा है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम बरसों से लगातार इस बात की वकालत कर रहे थे और हाल में कुछ मुख्यमंत्रियों ने ऐसा किया भी था। प्रधानमंत्री की इस पहल को सरकार में एक सादगी, किफायत और जनसेवा के रूप में देखते हुए देश की बाकी सरकारों को भी अपने-अपने स्तर पर तय करना चाहिए कि कौन सी बातें उन्हें जनता से दूर ले जाती हैं और उन बातों को खत्म करना चाहिए। कुछ दिन पहले जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री दिल्ली पहुंचीं तो उन्हें लेने नरेन्द्र मोदी बिना सुरक्षा, बिना लालबत्ती, सादी गाड़ी में, बिना टै्रफिक रोके एयरपोर्ट गए थे, वह बात शायद इस फैसले का एक ट्रायल थी।
प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने राष्ट्रपति के संबोधन में महामहिम लिखना बंद करवाया, बाद में राज्यों के राज्यपालों को भी यह बात माननी पड़ी। राष्ट्रपति भवन से लेकर छत्तीसगढ़ के इक्कीसवीं सदी में बने राजभवन तक में कार्यक्रमों के लिए दरबार हॉल हैं। ऐसे सामंती नाम भी खत्म होने चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में दरबार शब्द महज व्यंग्य और गाली की तरह इस्तेमाल हो सकता है, किसी सम्मान के लिए नहीं। कुछ हफ्ते पहले हमने भारत की गर्मी और जनता के पैसों पर एयरकंडीशनिंग की चर्चा करते हुए लिखा था कि अंग्रेजों की छोड़ी गंदगी को भारतीय अदालतों में काले कोट और काले लबादों की शक्ल में ढोना बंद करना चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश को भी भारतीय आत्मगौरव दिखाते हुए अंग्रेजी पोशाक की ऐसी बंदिश फेंक देनी चाहिए जिसकी वजह से वकील और जज इंग्लैंड के मौसम में जीते हैं।
सत्ता के लोगों को सायरन, पायलट गाड़ी, और गाडिय़ों के काफिले भी खत्म करना चाहिए। जगह-जगह सत्ता के लिए जनता को चौराहों पर रोका जाता है और इससे सड़क पर कोई मरीजों की मौत भी हुई है, घायल भी अस्पताल नहीं पहुंच पाए। सत्ता को पता नहीं जनता की उस नफरत का अहसास होता है या नहीं जो फंसी हुई जनता के मन से निकलती है। छत्तीसगढ़ की जनता को याद है कि राजधानी के सांसद ने अपने ही शहर में बिना लालबत्ती या सायरन निकलने से मना कर दिया और सरकार पर दबाव डालने का सार्वजनिक बयान भी दिया था। अपने ही शहर में लोग सायकल से किस तरह सायरन तक पहुंचते हैं इसकी और भी बहुत सी मिसालें हैं। छत्तीसगढ़ का अकेला एयरपोर्ट राजधानी रायपुर में होने से बिलासपुर हाईकोर्ट के जज भी लालबत्ती, सायरन, और पायलट गाड़ी के साथ आते-जाते दिखते रहते हैं मानो एयरपोर्ट पहुंचते ही उन्हें फैसला सुनाने की हड़बड़ी हो। जब देश की बड़ी अदालतें ही अपने ऐसे अलोकतांत्रिक ताम-झाम का मोह नहीं छोड़ पातीं, तो उनके पास जाकर कौन गुहार लगा सकते हैं कि सरकार में सादगी लाई जाए।
सरकारों को मंत्रियों और अफसरों के घर-दफ्तरों के खर्च में भी कटौती करनी चाहिए। इसके लिए हर राज्य को एक किफायत कमेटी बनानी चाहिए जो निजी कामों के लिए कर्मचारियों, गाडिय़ों, बिजली, और बाकी खर्च की सीमा तय करे। सत्ता को जनता के रूख को पहचानना चाहिए, जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में पांचों राज्यों में मौजूदा सरकारों को पलट दिया, इससे जनता की नाराजगी साफ दिखती है और कोई पार्टी या नेता इससे नहीं बच पाए। दीवारों पर लिखी इस बड़ी-बड़ी लिखावट को अनदेखा करना ठीक नहीं।
भारत की हिंदुस्तानी जुबान में लालबत्ती शब्द अच्छा नहीं रहा। लालबत्ती इलाका या रेड लाईट एरिया सबसे बुरे माने जाने वाले धंधों का रहा। इससे छुटकारा ही ठीक है। यह एक और बात है कि प्रधानमंत्री के हाथ पूरे देश के लिए नियम बदलना है, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पहले दिन से ही लालबत्ती हटा दी थी। देर से ही सही, भारतीय सत्ता को बदनाम रेड लाईट छोडऩी चाहिए।

सरकारी अमले को मठाधीश जैसा नहीं जनसेवक बनना होगा

संपादकीय
19 अप्रैल 2017


छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भयानक गर्मी के बीच हफ्तों चलने वाले अपने सालाना दौरे में अपनी अभूतपूर्व गर्मी दिखाई है। उन्होंने सरगुजा में दो कलेक्टरों को मौके पर ही बदलने की घोषणा की, और एक जिला पंचायत अध्यक्ष को भी हटा दिया। उनके ऐसे तेवर उनके पिछले तेरह-चौदह बरस में कभी नहीं दिखे थे और इससे राज्य के बाकी सरकारी अमले में एक सिहरन दौड़ जानी चाहिए। खुद मुख्यमंत्री के लिए यह मौका अभी नहीं तो कभी नहीं किस्म का है क्योंकि दो बरस बाद के चुनावों में जीत या हार कुछ हद तक कलेक्टरों की काबिलीयत पर भी टिकी रहेगी। कलेक्टर और एसपी जैसे ओहदे हमेशा ही मुख्यमंत्री की निजी पसंद से भरे जाते हैं और छोटे से राज्य में मुख्यमंत्री की सीधी नजर भी इन ओहदों पर रहती है।
राज्य सरकार के ढांचे में वैसे तो जिलों के प्रभारी सचिव भी बनाए जाते हैं जो कि राज्य के बड़े अफसर होते हैं और कलेक्टरों के साथ संपर्क में रहते हैं। हर जिले का कोई न कोई प्रभारी मंत्री होता है जो कि आमतौर पर दूसरे जिले का होता है। हर कुछ कलेक्टरों के ऊपर एक संभागीय कमिश्नर होता है जिसे खुद भी कलेक्टरी का खासा तजुर्बा होता है। इनके अलावा जिले के पक्ष-विपक्ष के विधायक होते हैं जो कि सरकारी कामों पर नजर रखते हैं। शासन, प्रशासन और राजनीतिक निगरानी की इतनी सतहों के बाद भी अगर किसी जिले में काम खराब होता है तो वह फिक्र की बात है। इसलिए भी कि हर आईएएस अफसर का सपना एक अच्छी कलेक्टरी रहता है, और उसकी स्मृतियां भी कभी अपनी जिला-पोस्टिंग से परे नहीं रह पातीं।
लोकसुराज जैसा जनसंपर्क कार्यक्रम हो या कि मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टरों तक के जनदर्शन कार्यक्रम, इन सबमें भीड़ इस बात की भी सुबूत होती है कि शासन-प्रशासन में अपनी रोजाना की जिम्मेदारी ठीक से पूरी नहीं हो रही। और इस ठीक का ठीक होना आसान नहीं होता। इसके लिए मंत्रियों और अफसरों का जनसेवा के लिए समर्पित होना भी जरूरी होता है। और यह समर्पण सरकारी नियमों से या मंत्री पद की शपथ से नहीं आ जाता? इसके लिए लोकतंत्र और जनकल्याण की एक गहरी आस्था भी जरूरी होती है जिसकी बहुत कमी आज के अधिकतर नेताओं और अफसरों में दिखती है। ऐसे में छोटे कर्मचारियों पर कोई तोहमत लगाना बेकार है।
छत्तीसगढ़ में सरकार को लीक से हटकर एक मौखिक पहल करने की जरूरत है। जिला कलेक्टरों का यह नाम तब तो ठीक था जब वे अंग्रेजी राज में टैक्स कलेक्ट करते थे, आज तो वे जितना कलेक्ट करते हैं, उससे अधिक खर्च करते हैं इसलिए यह नाम जाना चाहिए। कलेक्टरों को जिलाधीश भी कहा जाता है जो कि मठाधीश जैसा लगने वाला नाम है और यह नाम भी जाना चाहिए। अधिकारी शब्द की जगह सेवक शब्द आना चाहिए, जैसे कि जिला जनसेवक। जब तक कलेक्टरों का नाम जिला जनसेवक नहीं होगा तब तक सेवा की सोच नहीं आ पाएगी। इसके अलावा सरकार को मंत्रियों और अफसरों की गाडिय़ों से लाल-नीली बत्तियां भी हटानी चाहिए, सायरन और बत्तियां बददिमागी बढ़ाते हैं और मंत्री-अफसर जनता से कट जाते हैं। सरकार को फाइलों पर लगने वाले पदनाम लाल फीतों को भी बदलना चाहिए। लाल रंग ट्रैफिक को रोकने वाला होता है और लाल फीताशाही की सोच ऐसी ही रहती है। इसे बदलकर हरा रंग करना चाहिए ताकि फाइलें आगे बढ़ सकें। अफसरों और मंत्रियों का बुरा बर्ताव भी सख्ती से बंद करवाना चाहिए और आए दिन मीडिया में आने वाली खबरों पर पार्टी संगठन को भी ध्यान देना चाहिए।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह एक हैरतअंगेज ताकत के साथ काम करते हैं। उनकी मेहनत में कुछ और मौलिक सुधारों से अधिक असर आ सकता है। देश में जगह-जगह अलग-अलग मुख्यमंत्री सादगी और सुधार की बातें करते रहे हैं। आने वाला वक्त जनता की कड़ी कसौटी का है, छत्तीसगढ़ के सरकारी अमले को भी मठाधीश के बजाय जनसेवक बनना चाहिए। 

किसी भी धर्म को शोर और हल्ले की आजादी क्यों हो?

संपादकीय
18 अप्रैल 2017


फिल्म और टीवी कलाकार सोनू निगम ने एक नए विवाद को शुरू कर दिया है, उन्होंने कहा कि सुबह-सुबह मस्जिद के अजान की आवाज लाउडस्पीकर पर आकर उनकी नींद खराब करती है। यह बात वैसे तो बहुत मासूम है लेकिन आज हिन्दुस्तान की हवा में इतनी सनसनी फैली हुई है कि लोग हर बात के पक्ष और विपक्ष में लाठी लेकर टूट पड़ते हैं। इनकी इस बात पर कई लोगों ने खूब हमला किया, कई तटस्थ लोगों ने याद दिलाया कि रात-रात भर दूसरे धर्मों के भजन और रतजगे का शोर भी झेलना पड़ता है। ऐसे माहौल के बीच में लोगों को ठीक उसी तरह हाथ साफ करने का मौका मिलता है जिस तरह सड़क पर किसी की पिटाई होती रहे तो आते-जाते तमाम राहगीर दो-दो हाथ लगाते चलते हैं।
सोनू निगम ने न तो कोई गलत बात कही क्योंकि सदियों पहले कबीर इसी बात को तब कह गए थे जब लाउडस्पीकर बना भी नहीं था, और उन्होंने कहा था कि मस्जिद की मीनार पर चढ़कर मुल्ला इस तरह बांग देता है कि मानो खुदा बहरा हो गया हो। यह बात कहने का हौसला उन्हीं का था, और आज हिन्दुस्तान में यह बात कहना आसान नहीं है। और तब से लेकर अब तक धीरे-धीरे लाउडस्पीकर बढ़ते चले गए, और मस्जिदों से परे भी मंदिर, गुरुद्वारे, और धार्मिक जलसों पर घर-घर से धार्मिक संगीत निकलकर मीलों तक फैलने लगा। अब जैसे-जैसे आबादी घनी होती चली गई यह शोर परेशान करने लगा और भारत के सुप्रीम कोर्ट ने भी धार्मिक या किसी भी तरह के शोरगुल के खिलाफ बड़े कड़े हुक्म दिए हुए हैं। यह एक अलग बात है कि बहुत से मामलों में सुप्रीम कोर्ट का हाल परिवार के उस बुजुर्ग सयाने की तरह का होकर रह गया है जो कि बोलता बहुत अच्छी बातें है, लेकिन परिवार में उसकी बात सुनता-मानता कोई नहीं है।
हमारा ख्याल है कि किसी एक धर्म की चर्चा किए बिना, पूरे देश से सभी धर्मस्थलों से लाउडस्पीकर को हटा देना चाहिए, और दूसरी बात यह भी है कि ऐसे लाउडस्पीकर पर सरकार एक नियम बनाकर लाइसेंस भी लागू कर सकती है कि उसका इस्तेमाल करने के पहले अगर इजाजत न ली गई, तो कितना बड़ा जुर्माना हो सकता है, और कितनी कड़ी कैद हो सकती है। फिर यह जुर्माना और कैद न सिर्फ लाउडस्पीकर किराए पर चलाने वाले लोगों के लिए हो, बल्कि उन लोगों के लिए भी हो जो कि धर्मस्थलों के प्रभारी हैं, या जिनके घरों पर इनको लगाया जाता है। यह एक खतरनाक नौबत है कि दूसरों का जीना हराम करते हुए धर्म के नाम पर, या कि किसी और नाम पर इस तरह का कोलाहल किया जाता है कि बीमार तो बीमार, पढऩे वाले बच्चे तक थककर आत्महत्या की कगार पहुंच जाते हैं। भारत में जितना शोर है, उतना शायद ही किसी और देश में देखने मिलता होगा, और धर्म से आगे बढ़कर अब यह शादियों में, निजी कार्यक्रमों में भी इस हद तक देखने मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल अपने ही आदेशों को लेकर शर्म से डूब मरें कि उनकी कोई सुनवाई इस देश की सरकारों में नहीं रह गई है।