छत्तीसगढ़ की नई विधानसभा नई संभावनाओं का एक मौका
संपादकीय
4 जनवरी 2019

छत्तीसगढ़ विधानसभा का सत्र आज से शुरू हो गया है। उधर पिछली विधानसभा में कई सत्र बर्बाद भी हुए थे। इस बार विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत सभी पार्टियों की सर्वसम्मति से अध्यक्ष बने हैं, और सभी पार्टियों ने यह उम्मीद जाहिर की है कि वे निष्पक्ष और गरिमामय तरीके से सदन चलाएंगे। दूसरी तरफ दिल्ली में अभी संसद अब इस आखिरी सत्र में चलना शुरू हुई है तो लोगों को देश भर के मुद्दे उसमें दिखाई पड़ रहे हैं, सुनाई पड़ रहे हैं। पिछले कई सत्र बहिष्कार और बहिर्गमन, शोरगुल में खत्म हुए थे। लोकतंत्र में देश और प्रदेश में जो सबसे बड़ी पंचायतें होती हैं, वे सत्ता के लिए दिक्कत का सामान रहती हैं, और विपक्ष के हाथ वे एक किस्म से ताकत रहती हैं, क्योंकि वहां पर विपक्ष हर तरह के सवाल कर सकता है, और सरकार उनका जवाब देने को मजबूर होती है। इसलिए देश और प्रदेश की सरकारें सदन को लेकर कुछ तनाव में भी रहती हैं, और इसीलिए लगातार सदन के दिन घटते चले जा रहे हैं। साल भर में संसद और विधानसभाएं कम दिन ही चलती हैं, और इसमें से भी जब कभी कोई बहिष्कार होता है, तो जनता के हक के, उसके फायदे के, मायने रखने वाले सवाल हाशिए पर चले जाते हैं, और गिना-चुना संसदीय वक्त खत्म हो जाता है।
इसलिए हम हमेशा से यह अपील करते आए हैं कि सत्र का एक-एक पल विपक्ष को इस्तेमाल करना चाहिए और सरकार से सवाल पूछ-पूछकर जनता के सामने सच्चाई को लाना चाहिए, सरकार की जहां चूक हो, गलतियां हों या गलत काम हों, उनको लेकर उसे कटघरे में खड़ा करना चाहिए। लेकिन प्रतीकात्मक तरीके से सदन को बार-बार छोड़कर जाना, शोरगुल करना, या फिर बहिर्गमन करके बाहर निकल जाना ठीक बात नहीं है। भारत के संसदीय लोकतंत्र में सरकार से जनता अब सूचना के अधिकार के तहत सिर्फ फाईलों की जानकारी ले सकती है, लेकिन सरकार से वह सीधे कोई सवाल नहीं कर सकती। उसके सवाल सांसदों और विधायकों के मार्फत ही सरकार को घेर सकते हैं, और मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में जगह-जगह यह देखा हुआ है कि तेज और जागरूक विधायक सत्तारूढ़ पार्टी के रहने पर भी सरकार को घेरने में पीछे नहीं रहते, और छत्तीसगढ़ में ऐसे विधायक उत्कृष्ट विधायक का सम्मान भी पाते रहते हैं। यहां पर यह भी सोचने की जरूरत है कि अगर अपनी ही पार्टी की सरकार को कोई सत्तारूढ़ विधायक आईना दिखाते हैं, गलतियों को गिनाते हैं, तो उससे यह एक गुंजाइश खड़ी होती है कि बचे कार्यकाल में उसकी पार्टी की सरकार उन गलतियों को सुधार ले। इसलिए आलोचक हमेशा विरोधी या दुश्मन ही नहीं होता। इसलिए एक तरफ हम जहां विपक्ष से यह गुजारिश करते हैं कि जनहित के खड़े हुए सैकड़ों मुद्दों को सदन में उठाने में पल-पल का इस्तेमाल करे, वहीं पर हम सरकार से भी यह चाहते हैं कि सदन में उठाए गए मुद्दों के आनन-फानन जवाब बनाने के अलावा, एक ईमानदार नीयत से उन मुद्दों पर सुधार भी उसे करना चाहिए।
इसलिए जनता को भी अपने विधायकों पर यह दबाव डालना चाहिए कि वे सदन में हंगामे के बजाय, या सच का सामना करने से बचने के बजाय, संसदीय व्यवस्था की भावना के मुताबिक ईमानदारी से काम करें। और यही वह मौका रहता है जब समाज के जागरूक तबके सार्वजनिक मंचों पर, मीडिया के मार्फत ऐसे सवालों को उठाएं, जिन्हें कि दोनों पक्षों के विधायक उठा भी सकते हैं, और नहीं भी उठा सकते हैं। जब सवाल सार्वजनिक जगहों पर खड़े हो जाते हैं, तो उनको अनदेखा करना पक्ष-विपक्ष या सरकार किसी के लिए भी मुमकिन नहीं रह जाता। इसलिए संसद या विधानसभा के सत्र देश-प्रदेश के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण संसदीय इस्तेमाल के रहते हैं, और इस लोकतांत्रिक अधिकार की संभावनाओं को किसी को कम नहीं करना चाहिए। हमारी शुभकामनाएं और उम्मीदें हैं कि छत्तीसगढ़ विधानसभा इस राज्य के भले के लिए सत्र का पल-पल इस्तेमाल करेगी। (Daily Chhattisgarh)
बरसों के प्रेम और देह-संबंधों के बाद अचानक बलात्कार का आरोप नाजायज!
संपादकीय
3 जनवरी 2019

सुप्रीम कोर्ट ने कल एक फैसले में यह साफ किया है कि साथ रहने वाले जोड़ों, लिव इन पार्टनर, के बीच होने वाले शारीरिक संबंध बलात्कार नहीं है। अदालत में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि बलात्कार और सहमति से बनाए संबंध के बीच साफ अंतर है। अगर पुरूष के लिए परिस्थितियां नियंत्रण से बाहर हैं, और वह अपनी लिव इन पार्टनर से शादी नहीं कर पाया, तो दोनों के बीच हुए शारीरिक संबंध को बलात्कार नहीं कहा जा सकता। हालांकि अदालत ने यह भी कहा है कि अदालतों को ऐसे मामलों में सावधानी से जांच करनी चाहिए कि क्या शादी का इरादा था, या फिर दुर्भावनापूर्ण इरादे से झूठा वायदा किया गया था।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम पिछले बरसों में लगातार इस बात पर लिखते आ रहे थे कि प्रेम संबंधों के चलते, या साथ रहने वाले ऐसे जोड़ों के बीच अगर बाद में जाकर किसी वजह से शादी का इरादा बदल भी जाता है, तो पहले हुए देह संबंधों को बलात्कार मानना गलत होगा। जो जोड़े औपचारिक रूप से शादी करके एक साथ रहते हैं, उनके बीच भी कभी-कभी साथ रहने का इरादा बदल जाता है, और उनके बीच तलाक होता है। इसी तरह लिव इन रिलेशनशिप या प्रेम संबंधों में भी समय के साथ कुछ ऐसी खटास आ सकती है कि जोड़े में से कोई एक शादी के इरादे से हट जाए। ऐसे में पहले हुए देह संबंधों पर बलात्कार की तोहमत लगाना जायज नहीं है। जब हमने ऐसी बात लिखी थी, तो बहुत से लोगों ने इसे महिला विरोधी भी करार दिया था। लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इस तर्क को सही ठहराता है कि ऐसे संबंधों को आगे चलकर किसी भी वजह से बलात्कार ठहराना जायज नहीं है। आज देश भर में लाखों पुरूष ऐसी ही शिकायतों के आधार पर गिरफ्तार हैं, और उन पर बलात्कार के मुकदमे चल रहे हैं।
29 जून 2014 को इसी जगह इस कॉलम में हमने लिखा था- एक टीवी सीरियल जोधा-अकबर में एक साजिश के तहत एक धूर्त महिला एक भले बुजुर्ग पर बलात्कार की कोशिश का आरोप लगाती है, और तकरीबन सभी लोग उस पर भरोसा भी करते हैं, जबकि आरोप पूरी तरह झूठा रहता है। उसी दौरान यह खबर आई है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल खड़ा किया है कि असफल पे्रम संबंधों के तुरंत बाद अगर उन्हें लेकर बलात्कार की कोई रिपोर्ट लिखाई जाती है, तो उनको कितना भरोसेमंद माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया कि क्या दो बालिगों के बीच सहमति से चल रहा प्रेम संबंध टूटने के बाद दुष्कर्म का मामला बनता है? इसी तरह का मामला पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट में आया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि दुष्कर्म के केस को महिलाएं हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। पुरुष को बदनाम करने के अलावा उसे शादी के लिए मजबूर करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कोई आदेश नहीं दिया था पर हाल में इस तरह से तेजी से बढ़े मामलों पर चिंता जरूर जताई थी। अदालत ने कहा था कि प्रेम संबंधों के टूटने के बाद पुरुष पर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगा देती हैं। दिल्ली की एक खबर है कि वहां अब पुलिस बलात्कार की ऐसी रिपोर्ट तो लिख लेगी जो कि साथ रहने के बाद कोई एक महिला अपने कल तक के साथी के खिलाफ लिखाने आएगी, लेकिन ऐसी शिकायतों पर साथी आदमी की गिरफ्तारी तुरंत नहीं की जाएगी, और पुलिस के बड़े अफसर से इजाजत लेकर ही ऐसी गिरफ्तारी होगी। अब तक वहां रिपोर्ट होते ही आरोपी को गिरफ्तार कर लिया जाता है।
इसी संपादकीय में उस वक्त हमने लिखा था- इन दोनों-तीनों बातों की चर्चा करने से महिलाओं के हक के लिए लडऩे वाले कई लोग हम पर नाराज होंगे कि हम भी आदमियों की ज्यादती, जुल्म और जुर्म की शिकार औरतों की बात पर शक खड़ा कर रहे हैं, और ऐसे शक को बढ़ावा दे रहे हैं। हमारी ऐसी कोई नीयत नहीं है, लेकिन कानून के तहत महिला की शिकायत को, उसके बयान को काफी वजन मिला हुआ है, और अगर महिलाओं के हक के मामले में कोई कमी है, तो वह कानून पर अमल की कमी है, न कि कानून में कड़ाई की। ऐसे में इंसाफ का तकाजा यही है कि लोगों को सुनवाई का, जांच में अपनी बात को कहने का एक हक मिलना चाहिए, और पहली शिकायत की बुनियाद पर गिरफ्तारी के पहले यह भी सोचने की जरूरत है कि बरसों लंबे प्रेम-संबंधों और साथ रहने की समझ-बूझ पर अगर ऐसा कानूनी खतरा टंगा रहेगा, तो उससे इंसानी रिश्तों पर पडऩे वाला बुरा असर क्या अधिक नुकसानदेह नहीं होगा?
इस मुद्दे पर उस वक्त हमने लिखा था- हम यहां पर महिलाओं की शिकायत पर अब तक आम बनी हुई पुलिस कार्रवाई के सिर्फ एक छोटे पहलू पर बात करना चाहते हैं। जब शिकायत किसी आदमी के साथ लंबे पे्रम-संबंधों, लंबे लिव-इन रिलेशनशिप के बाद सामने आती हो, तो उसे इतने लंबे रिश्तों की पृष्ठभूमि में भी देखना चाहिए। आज न सिर्फ पश्चिमी देशों में, बल्कि दुनिया के अधिकतर देशों में वयस्क जोड़ों के बीच पे्रम-संबंधों के दौरान आपसी सहमति से सेक्स एक आम बात है। ऐसे में अगर महीनों या बरसों के बाद रिश्ते खराब होते हैं, शादी का वायदा पूरा नहीं हो पाता है, नौकरी दिलाने का वायदा पूरा नहीं हो पाता है, तो कल तक का सहमति का सेक्स आज का बलात्कार एकदम से ही मान लेना हो सकता है कि इंसाफ के खिलाफ जाए। बलात्कार के मामलों में महिलाओं के बयान को आदमी के बयान से अधिक वजन देना तो ठीक है, लेकिन इंसाफ के तराजू में कम से कम दो पलड़े होना भी जरूरी है, और आदमी की सफाई के वजन को चाहे कम भी आंका जाए, लेकिन उसे सुनना, और हालातों को देखना, यह भी जरूरी है।
2014 में इस पर हमने लिखा था- हमारी बात कुछ लोगों को मर्दानगी वाले जुल्म और जुर्म का साथ देने वाली लग सकती है, लेकिन हम उस इंसाफ को बचाने के लिए इस गुंजाइश पर चर्चा कर रहे हैं, जिस इंसाफ की नीयत औरत को कुछ अधिक हद तक रियायत देने की है। उस नीयत की हिमायत करते हुए भी हम बयान से परे के बाकी हालात को भी एक नजर देखने की सलाह देने की हिमाकत कर रहे हैं। ऐसा न होने पर जितने भी मामलों में झूठी रिपोर्ट होती है, अदालत में झूठी साबित होती है, उतनी ही हद तक सचमुच जुर्म की शिकार महिलाओं की विश्वसनीयता भी घटेगी। इसलिए इंसाफ का तकाजा आदमी और औरत की बातों को सिर्फ बयान से कुछ अधिक दूर तक देखने का है। कानून अंधा कानून बनकर किसी को राह नहीं दिखा सकता। इसलिए बरस-दर-बरस चले आ रहे पे्रम और देह-संबंधों के बाद अचानक बलात्कार की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट के माथे पर जो बल पड़े हैं, उन्हें देखते हुए इस बारे में चर्चा होनी चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले को हमारे तर्कों के साथ एक सहमति की तरह देखा जा सकता है। (Daily Chhattisgarh)
बेइंसाफी की जिद पर अड़े रहेंगे, वे खारिज हो जाएंगे
संपादकीय
2 जनवरी 2019

केरल के सबरीमाला मंदिर में उन महिलाओं के दाखिले पर रोक सैकड़ों बरस से चली आ रही है जो मां बनने की उम्र वाली हों। बच्चियों और बुजुर्गों को वहां जाने की छूट थी। इस प्रतिबंध को गलत मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महीने पहले इसे खारिज किया, लेकिन राज्य सरकार अपने सुरक्षा इंतजाम के साथ भी इस आदेश को लागू नहीं कर पा रही है क्योंकि कट्टर धर्मालु लोग मंदिर को चारों ओर से घेरकर ऐसा प्रदर्शन कर रहे हैं कि युवा और अधेड़ महिलाएं वहां तक पहुंच भी नहीं पा रही हैं। ऐसे में कल दो महिलाओं में दर्शन किए, तो इसके खिलाफ मंदिर ने शुद्धिकरण किया, और फिर आगे दर्शन शुरू हुए।
बहुत से लोगों को यह लगता है कि जिस ईश्वर को अपने भक्तों से ऐसा परहेज हो, उसके दरवाजे जाया ही क्यों जाए? कुछ और लोगों को यह लगता है कि महिलाओं को खुद होकर ऐसे मंदिर का घोषित बहिष्कार करना चाहिए। कल प्रधानमंत्री ने एक लंबे इंटरव्यू में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अलग अपनी राय रखी कि यह परंपरा का मामला है। अब देश में परंपराएं तो तीन तलाक की भी थीं, या हैं, जिन्हें हटाया जा रहा है। इसी देश में बाल विवाह की भी लंबी परंपरा थी, सतीप्रथा की भी लंबी परंपरा थी, उन्हें भी हटाया गया था। दरअसल किसी भी वक्त कोई भी सुधार जब चर्चा में भी आता है, तो उसे खारिज करने के लिए परंपरा, या धार्मिक भावना, या रीति-रिवाज जैसे कुतर्क दिए जाते हैं, और ऐसा अधिकतर धर्मों में होता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और वह चाहे जिस किसी धर्म में हो। आज इक्कीसवीं सदी में अगर महिलाओं को बराबरी का हक न मिले, तो फिर वैसी मुस्लिम परंपरा में भी सुधार की जरूरत है, और हिन्दू परंपरा में भी।
लेकिन आज की इस बहस से परे अगर देखें तो यह बात साफ है कि धर्म का कुल जमा मिजाज बेइंसाफी का होता है, और वह महिलाओं के खिलाफ रहता ही है। धर्म के जितने बड़े ओहदे होते हैं, शंकराचार्य से लेकर किसी इमाम तक, और पोप से लेकर किसी और धर्म के पादरी-पुजारी तक, महिला की कोई गुंजाइश नहीं निकाली जाती, और वे दूसरे या तीसरे दर्जे की नागरिक होकर सेवा-चाकरी में लगा दी जाती हैं। यही वजह है कि आज दुनिया के सभ्यता के मामले में विकसित अधिकतर देशों में लोग धार्मिक आस्था छोड़कर नास्तिक हुए जा रहे हैं, और उनकी जिंदगी में धर्म का महत्व घटते-घटते अब खत्म हो रहा है। दूसरी तरफ जो देश लोकतंत्र और इंसानियत से एकदम दूर हैं, उन देशों में धर्म बहुत फलफूल रहा है, कट्टरता बढ़ रही है, धर्मांधता बढ़ रही है, और इसके पैरोकार लोग इसे संविधान और लोकतंत्र से ऊपर मानते हैं, और उसके लिए जिद पर अड़े रहते हैं।
हम अभी आस्था और अनास्था की बहस में पडऩे के बजाय जायज हक की बात करना अधिक जरूरी समझते हैं। जब देश की सबसे बड़ी अदालत एक मंदिर में महिलाओं के दाखिले पर हुक्म दे चुकी है, तो उसके बाद कई पार्टियों के नेताओं से लेकर प्रधानमंत्री तक का रूख निराशाजनक है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए,और अधिक से अधिक लोगों को खुलकर सामने आना चाहिए। कल ही केरल में लाखों महिलाओं ने सड़क किनारे दीवार बनकर मंदिर-दाखिले पर रोकटोक का विरोध किया है, और इतना बड़ा महिला-प्रदर्शन शायद देश में पहली बार हुआ है। इसे हवा का बदलता हुआ रूख मानना चाहिए, और भगवान हो या इंसान, जो बेइंसाफी की जिद पर अड़े रहेंगे, वे खारिज कर दिए जाएंगे, खारिज हो जाएंगे। (Daily Chhattisgarh)
महिला को ये देश सिर पर भी बिठाते हैं, और पांव तले कुचलते भी खूब हैं...
संपादकीय
1 जनवरी 2019

बांग्लादेश के चुनावों में एक बार फिर वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना अपनी पार्टी को तकरीबन पूरे ही देश में फतह दिलाकर फिर प्रधानमंत्री बनने जा रही हैं। वे बांग्लादेश के पहले प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान की बेटी हैं और उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुए अपने देश के इतिहास की सबसे लंबे समय तक रहने वाली प्रधानमंत्री हो गई हैं। लेकिन इस खबर से एक दूसरी बात जो सूझती है वह यह कि भारत में भी इंदिरा गांधी का लंबा राज रहा, और उनके बाद उनकी बहू सोनिया गांधी इस पार्टी की निर्विवाद और लंबे समय तक अध्यक्ष रहने वाली महिला रहीं। अब भारत के नीचे श्रीलंका को देखें, तो वहां भी महिला प्रधानमंत्री रह चुकी हैं, पड़ोस के पाकिस्तान में भी बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री रही चुकी हैं, और अभी ताजा-ताजा चुनावों के बाद म्यांमार में आंग-सांग-सू-की प्रधानमंत्री के बराबर के दर्जे वाली स्टेट-काउंसलर बनी हैं। उधर नेपाल में बिद्यादेवी भंडारी राष्ट्रपति बनी हैं, और वे इसके पहले भी वहां की रक्षामंत्री थीं। अगल-बगल के इतने देशों में महिलाओं का इस तरह राज देखने लायक है, और दुनिया में शायद ही देशों का कोई ऐसा पड़ोसी-समूह होगा जिनमें महिलाएं राज भी करती रहीं, और आम महिलाओं की बदहाली भी चलती रही।
इन देशों में महिलाएं अपने परिवारों की राजनीतिक विरासत पाकर भी आगे बढ़ीं, और तमाम किस्म के विरोध को झेलते हुए, संघर्ष करते हुए भी उन्होंने कामयाबी पाई। दो बातें इन देशों के बारे में उभरकर दिखती हैं कि इनमें कुनबापरस्ती के पनपने की खूब गुंजाइश है, और लोग बार-बार इन कुनबों को आगे बढ़ाते हैं। और दूसरी बात यह कि इन तमाम पितृसत्तात्मक समाजों में भी नेताओं की विरासत को बेटियों ने या बहुओं ने आगे बढ़ाया, और समाज ने उसे मंजूर भी कर लिया। लेकिन एक अजीब बात यह है कि इन्हीं समाजों में, इन्हीं देशों में आम महिलाओं का हाल सुधर नहीं पाया, और तमाम जगहों पर उनकी बदहाली है। अब इन राजनीतिक और सामाजिक तथ्यों को देखकर यह सोचने-समझने की जरूरत है कि हिंद महासागर क्षेत्र के इन तमाम देशों में ऐसा क्या है कि महिला को लोग सिर पर भी बिठाते हैं, और पैरों तलों भी कुचलते हैं। इस मुद्दे पर खुलासे से सोचने की जरूरत है।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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