समझदार लोग यह सिलसिला खत्म करने की कोशिश करें
संपादकीय
26 दिसंबर 2019

अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि देने पहुंचे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह वहां पड़ रही भारी ठंड के बीच खुले में बैठने के लिए सिर पर शॉल लपेटे हुए थे। इस पर सोशल मीडिया में कई तरह के मजाक चलने लगे। लोगों ने पिछले कई बरस में भाजपा के नेताओं द्वारा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के ट्रेडमार्क हो चुके मफलर पर कसे गए तंज निकालकर उन्हें याद दिलाया कि अब अमित शाह और राजनाथ सिंह को भी मफलर और शॉल से सिर-कान लपेटने पड़ रहे हैं। पिछले बरसों में केजरीवाल की खांसी को लेकर भी इतना मजाक बनाया जाता था कि मानो वह उनका कोई कुसूर हो। इसी तरह की बात कुछ समय पहले सीढिय़ों पर लडख़ड़ाकर गिरे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर चली थी, बहुत से मजाक बने थे, और बहुत से कार्टून भी। जब इनकी आलोचना हुई कि ऐसे निजी हादसे का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए, तो लोगों ने याद दिलाया कि सोनिया गांधी को एक बार चक्कर आने पर नरेन्द्र मोदी ने क्या कहा था, और सोनिया की बीमारी को लेकर देश भर में उनके राजनीतिक विरोधी सोशल मीडिया पर कैसी ओछी बातें लिखते ही रहते हैं।
दरअसल किसी की निजी तकलीफ बहुत से लोगों के मन में खुशी की एक लहर दौड़ा देती है। सड़क पर कोई केले के छिलके पर फिसलकर गिर जाए तो जो लोग उठाने के लिए आगे बढ़ते भी हैं, वे भी पहले हँसते हैं, फिर हाथ बढ़ाते हैं। दूसरों की तकलीफ का मजा लेना इंसानों के भीतर एक आम बात है, और इस कमजोरी से उबरने के लिए लोगों को मेहनत करनी होती है। लोगों को याद होगा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने जब एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पहली बार अंगे्रजी में भाषण दिया, तो उनकी अंगे्रजी के उच्चारण कमजोर या गलत होने की बात करते हुए उनका बहुत मजाक उड़ाया गया था। उस वक्त हमने इसी जगह उनके हौसले की तारीफ की थी कि अपनी खुद की भाषा से परे एक और भाषा का इस्तेमाल करना बड़ी बात है, और ऐसी कोशिश करने वालों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। ऐसा ही मौसम की मार से बचने के लिए अमित शाह और राजनाथ सिंह का मजाक नहीं बनाया जाना चाहिए।
लेकिन भारतीय राजनीति लगातार बढ़ते हुए ओछेपन की शिकार है। विरोधी विचारधारा के लोगों के लिए घटिया शब्दों का इस्तेमाल करना, उन्हें मूर्ख या दुष्ट साबित करना बढ़ते ही चल रहा है। एक लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद के चलते हुए भी व्यक्ति के रूप में एक-दूसरे को बर्दाश्त करना आना चाहिए, लेकिन वह खत्म हो चला है। लोगों को शायद यह भी याद हो कि किस तरह मुख्यमंत्री रहते हुए राबड़ी देवी ने उस वक्त के बिहार के एक राज्यपाल को लंगड़ा कहा था। हिंदुस्तान में लोग अपने को हजारों बरस की एक संस्कृति का वारिस मानते और बताते हुए एक झूठे दंभ में डूबे रहते हैं, लेकिन यहां कि कहावत-मुहावरे देखें, यहां कि भाषा देखें तो हिंदुस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा सभ्यता से भी दूर है। बहुत से हिंदुस्तानी एक निहायत ही असभ्य और अमानवीय, हिंसक और बेइंसाफ जुबान का इस्तेमाल करते हैं। सोशल मीडिया पर जो लोग पेशेवर हैं, और हमला करने के लिए भुगतान पाते हैं, या जो नफरत से भरे हुए हैं, और जुबानी हिंसा से खुशी पाते हैं, उन लोगों ने हिंदुस्तानी संस्कृति को गटर तक पहुंचा दिया है। हिंदुस्तान का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सबसे हिंसक, सबसे अश्लील, और सबसे अधिक आपत्तिजनक शब्दों की रिकॉर्डिंग को बार-बार बजाकर अपने दर्शक बढ़ाने की कोशिश में लगे दिखता है। समझदार लोगों को इस अलोकतांत्रिक सिलसिले को खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
जन्मदिन पर अटलजी को याद करने की कई वजहें
संपादकीय
25 दिसंबर 2019

भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने पूरे जीवन एक हिंदू नेता भी बने रहे, और हर बरस उनका जन्मदिन ईसाईयों के सबसे बड़े त्यौहार, यीशु मसीह के जन्मदिन, क्रिसमस पर आते रहा, मनाया जाते रहा। आज भी उनके जन्मदिन पर देश भर में उन्हें याद किया गया, और खासकर उनके कार्यकाल, उनकी कार्यशैली, और उनकी बातों को याद किया गया। वाजपेयी किसी भी कोने से भाजपा के किसी भी दूसरे नेता के मुकाबले कम हिंदू नहीं थे, और वे जनसंघ के दिनों से पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता भी थे जिन्हें जनसंघ का पोस्टरब्यॉय कहा जाता था। जब तक एनडीए के बहुमत के साथ वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री नहीं बने, तब तक जनसंघ और भाजपा का स्थाई नारा रहता था- अबकी बारी, अटल बिहारी।
जनसंघ और भाजपा के सबसे बड़े नेता रहने की वजह से वाजपेयी देश की बाकी अधिकतर पार्टियों की आलोचना का शिकार भी होते रहे, और उनके बारे में यह चर्चा भी रही कि उनका नर्म-हिंदुत्व एक सोची-समझी रणनीति के तहत है, और उनकी असली सोच वही है जो कि बाबरी मस्जिद के गिरने के वक्त एक भाषण के वीडियो में सामने आई थी। ऐसी तमाम आलोचनाओं और चर्चाओं के बीच एक बात उनके सारे संसदीय जीवन में बनी रही कि विचारधारा के टकराव से परे, उनकी व्यक्तिगत कड़वाहट और टकराहट लोगों को याद नहीं पड़ती। लोगों को उनका वह भाषण याद पड़ता है जो कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के गुजरने पर संसद में दिया था, और जिसे एक महान श्रद्धांजलि कहा जाता है। उनकी दरियादिली, उनके बड़प्पन, और नेहरू के प्रति उनके सम्मान से चाहे उनके चाहने वाले कुछ लोग खफा ही क्यों न हुए हों, उन्होंने नेहरू के प्रति सम्मान में कोई कटौती नहीं की। और एक वक्त ऐसा भी आया जब वाजपेयी को कई दशक बाद जाकर गंभीर इलाज की जरूरत पड़ी, तो उस वक्त के कांगे्रस प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें भारतीय संसदीय प्रतिनिधि मंडल का मुखिया बनाकर संयुक्त राष्ट्र संघ भेजा, ताकि वहां भारत का एक मजबूत प्रतिनिधित्व भी हो सके, और वाजपेयी का इलाज भी हो सके। यह बात अटलजी ने राजीव गांधी की बेवक्त की मौत के बाद एक से अधिक बार सार्वजनिक रूप से कही। उन्होंने लखनऊ के सांसद रहते हुए उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन के दौरान कांगे्रस के मोतीलाल वोरा के राजभवन के अपने संस्मरण भी कई बार सुनाए कि वे अपने चुनाव क्षेत्र के काम लेकर वोराजी के पास जाते थे, तो उनकी खातिर होने के साथ-साथ तुरंत ही उनका काम भी होता था, और कुछ मौकों पर वोराजी उन्हें लेकर भी मौकों पर जाते थे।
आज जब देश में राजनेताओं के बीच कड़वाहट इतनी अधिक हो गई है कि परस्पर विरोधी पार्टियों के लोगों का साथ उठना-बैठना भी बंद हो गया है, और संसद की छत तले बैठने की जब मजबूरी रहती है, तब भी बहुत से विरोधी लोग एक-दूसरे की तरफ देखे बिना, एक-दूसरे की हस्ती को नकारते हुए, या हिकारत के साथ जवाब दे देते हैं, या आरोप लगा लेते हैं। ऐसे माहौल में लोगों को अटलजी की याद और अधिक आती है कि राजनीतिक मतभेद को दुश्मनी के दर्जे तक ले जाए बिना भी किस तरह अपनी पार्टी की विचारधारा पर काम किया जा सकता है। उनके मिजाज और तौर-तरीकों की वही बात उनके धुरविरोधी वामपंथियों को भी उनके साथ उठने-बैठने में असहज नहीं करती थी। आज उनकी पार्टी सत्ता में है, और दूसरे कार्यकाल का पहला बरस चल रहा है। आज भाजपा को एनडीए के मुखिया की हैसियत से भी यह सोचने की जरूरत है कि इतने छप्परफाड़ वोट और बहुमत पाने के बाद भी वह विपक्षी पार्टियों की दोस्ती और सद्भावना क्यों नहीं पा रही है? लोकतंत्र महज गिनती नहीं होता है, लोकतंत्र का मतलब परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच भी सद्भावना का संबंध होता है। अटल बिहारी वाजपेयी के साथ काम की हुई कई पार्टियों, और कई नेताओं का उनके बारे में तजुर्बा बीच-बीच में छपते रहता है, और सद्भावना का वह एक महत्व लोकतंत्र में कभी कम नहीं आंका जा सकता, और उसी लिए अटलजी को भी कभी कम नहीं आंका जा सकेगा।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
जनता का काम म्युनिसिपलों का वोट देने से खत्म नहीं...
संपादकीय
24 दिसंबर 2019

छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल चुनावों के नतीजे अभी आ ही रहे हैं, और उनका रूख इतना मिलाजुला है कि कांगे्रस और भाजपा में से कौन कितने आगे है, यह अंदाज लगाना मुश्किल है। पिछले पन्द्रह बरस भाजपा प्रदेश में सरकार चला रही थी, और कांगे्रस पार्टी राजधानी रायपुर सहित बहुत से शहरों-कस्बों में म्युनिसिपलों पर काबिज थी। इसलिए अगर स्थानीय शहरी संस्थाओं के इस चुनाव में सत्ता के खिलाफ नाराजगी की बात की जाए, तो वह दोनों ही पार्टियों के खिलाफ रही होगी, और राज्य में इस मतदान के ठीक पहले प्रदेश की भूपेश बघेल सरकार का एक साल भी पूरा हुआ था, इसलिए उस सत्ता से भी अगर किसी की कोई नाराजगी रही होगी, तो वह भी इस चुनाव में निकली होगी। ये चुनाव महज वार्ड स्तर के हुए हैं, और निगम-पालिका के मुखिया का सीधा चुनाव नहीं हुआ है और पार्षद ही उन्हें चुनेंगे। लेकिन एक बात जो खुलकर दिख रही है वह यह कि वार्ड के चुनाव में भी तकरीबन सभी जगह इन्हीं दोनों पार्टियों का बोलबाला रहा है, और निर्दलीय उम्मीदवार बहुत ही कम संख्या में जीते हैं। ऐसा भी नहीं हो सकता कि कोई निर्दलीय उम्मीदवार अच्छे न रहे हों, लेकिन यह जाहिर है कि इन दोनों पार्टियों के अपने समर्पित और समर्थक वोट मायने रखते हैं, और उन्हीं से जीत-हार हुई है। आज शाम तक सभी निगम, पालिका, और नगर पंचायतों की तस्वीर साफ हो जाएगी, और उसके बाद शायद कुछ ही जगहों पर जोड़-तोड़ की जरूरत पड़े, अधिकतर जगहों पर पार्टियां स्पष्ट बहुमत के साथ महापौर और अध्यक्ष चुन पाएंगी।
स्थानीय संस्थाओं में अगर कुछ और छोटी पार्टियों के भी अधिक लोग जीते होते, निर्दलीय अधिक संख्या में जीते होते, तो वह म्युनिसिपल के भीतर जनहित के बेहतर फैसले लेने के लिए एक अच्छी बात होती। जब किसी एक पार्टी का बड़ा बहुमत स्थानीय संस्था में हो जाता है, तो उसके फैसलों में मनमानी अधिक होने लगती है। स्थानीय संस्थाओं की लीडरशिप, और उनकी भूमिका प्रदेश सरकार और उसके मुखिया की जिम्मेदारियों से अलग होती हैं, और ऐसे में म्युनिसिपलों में एक बेहतर संतुलन बना रहना अच्छी बात होती। छत्तीसगढ़ में पिछले दो दशक में म्युनिसिपलों में सबसे बड़ी दिलचस्पी करोड़ों से लेकर सैकड़ों करोड़ तक के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट बनाने में दिखाई है जिनमें भारी भ्रष्टाचार की गुंजाइश थी, और वैसे आरोप भी लगते थे। दूसरी तरफ शहरों को बेहतर बनाने के लिए बड़े खर्च के बिना भी जो काम हो सकते थे, उनमें दिलचस्पी बहुत कम रही क्योंकि लोगों की कमाई उसमें नहीं रहती। अब जब स्थानीय संस्थाएं दुबारा काम शुरू करने वाली हैं, दोनों ही पार्टियों के अपने स्थानीय निर्वाचित नेताओं की सोच को बेहतर बनाने की भी जरूरत है ताकि जमीन के हर टुकड़े को दुहने की कोशिश न हो, शहरों को कांक्रीट का जंगल न बनाया जाए, बची-खुची खुली जगह को खुला रखने की दरियादिली भी सीखी जाए। यह बात हमारा कहना आसान है, राजनीति और सत्ता में ऐसा करना बड़ा मुश्किल है। लेकिन इस मौके पर हम शहरी विकास, इंजीनियरिंग, और आर्किटेक्चर के जानकार लोगों से भी अपील करते हैं कि म्युनिसिपलों की नई सत्ता के पहले दिन से ही इन संस्थाओं की घोषणाओं और योजनाओं को तकनीकी आधार पर जनकल्याण की कसौटी पर कसें, और सार्वजनिक बहस छेड़ें। जो तकनीकी विशेषज्ञ हैं, वे ही अगर चुप रह जाएंगे तो उनका ज्ञान समाज के किसी काम का नहीं रह जाएगा। स्थानीय संस्थाओं को हम और अधिक अधिकार देने के हिमायती हैं, लेकिन उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों को अधिक हद तक सरकारी और सार्वजनिक रूप से तय करने के भी हिमायती हैं। जिम्मेदारियों के बिना, जवाबदेही के बिना महज अधिकार बढ़ाने का काम नहीं हो सकता, और सबसे बड़ी बात यह कि जनता का काम वोट डालने के बाद पांच बरस खत्म नहीं हो जाते। जनता को अपने पार्षदों और अपने महापौर-अध्यक्षों से लगातार सवाल पूछने होंगे, तभी स्थानीय विकास हो सकेगा। फिलहाल स्थानीय संस्थाओं के अगले पांच बरस के लिए सभी को शुभकामनाएं।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
झारखंड में मोदी-शाह के राष्ट्रीय मुद्दे बेअसर रहे?
संपादकीय
23 दिसंबर 2019

झारखंड के आंकड़े अभी आ ही रहे हैं, लेकिन अब तक रुझान बता रहे हैं कि वहां सत्ता भाजपा के हाथ से जाती दिख रही है, और झारखंड मुक्ति मोर्चा का कांग्रेस के साथ गठबंधन सत्ता पर आना तय दिख रहा है। अगर अगले कुछ घंटों में आंकड़ों में पूरा ही उलटफेर न हो जाए तो भाजपा के एक और राज्य कम हो जाएगा। महाराष्ट्र में गैरभाजपा सरकार बनने के साथ देश के नक्शे पर भगवा रंग जितना सिमट गया था, उसमें से कुछ और हिस्सा अगले कुछ घंटों में कम हो सकता है। यह राज्य पिछले करीब दो दशक के अपने अस्तित्व में डेढ़ दशक से अधिक भाजपा के कब्जे में रहा, ठीक छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की तरह। और अब यह राज्य छत्तीसगढ़ की राह चलते दिख रहा है। अब तक सत्तारूढ़ रही भाजपा की सीटों में बड़ी गिरावट आई है, और जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन को उससे भी बड़ा फायदा हुआ है।
झारखंड के चुनावी नतीजों को लेकर अभी टीवी चैनलों पर जो बहस चल रही है, उसमें वैसे भी इतने जटिल पहलू सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय मुद्दों की भरमार, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जैसे राष्ट्रीय स्तर के चेहरों का इस चुनाव पर छा जाना, जैसी बातें सामने आ रही हैं, और इस चुनाव के आखिरी दो दौर के मतदान पर संसद में पारित नागरिक संशोधन का असर भी बताया जा रहा है जिसके चलते हिंदू-मुस्लिम धु्रवीकरण इस राज्य में भी हुआ। हमारा हमेशा से यह मानना रहता है कि चुनावी विश्लेषक भी अपनी हाल की भविष्यवाणियों के समर्थन में तर्क ढूंढ लेते हैं, और नतीजों का उसी के मुताबिक विश्लेषण करते हैं। किसी एक सीट पर जीत या हार के भी इतने जटिल कारण होते हैं कि पूरे प्रदेश के नतीजों का विश्लेषण खासा मुश्किल होता है, और खासकर जब राष्ट्रीय मुद्दे भी उन पर हावी हों। लेकिन कुछ बातें झारखंड के इन नतीजों में खुलकर दिखती हैं।
नागरिकता संशोधन विधेयक के अलावा राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का मुद्दा भी उत्तर-पूर्वी राज्यों में बहुत जमकर हावी है, और वहां के आदिवासी समुदाय भी इससे बहुत विचलित हैं। दूसरी तरफ पड़ोस के छत्तीसगढ़ राज्य में कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार से राज्य के आदिवासी समुदाय की संतुष्टि इसमें दिखती है कि विधानसभा चुनावों में तकरीबन पूरा आदिवासी बस्तर, और पूरे का पूरा आदिवासी सरगुजा कांग्रेस के साथ गया, और बाद में बस्तर में हुए विधानसभा उपचुनाव में दोनों सीटें कांग्रेस ने जीतीं। छत्तीसगढ़ में किसान कर्जमाफी से लेकर धान के बढ़े हुए दाम तक ने, और आदिवासियों की जमीन वापिसी, वनोपज के बढ़े हुए दामों ने देश भर में कांग्रेस को एक अलग साख दिलाई है, और हमारा यह मानना है कि लगे हुए राज्य झारखंड के आदिवासियों के बीच इसकी चर्चा जरूर हुई होगी। भूपेश बघेल ने तीन-चार चुनावी दौरों में दस-बारह जगहों पर आमसभा में भाषण भी दिए, और उन्होंने छत्तीसगढ़ में किए गए वायदों को पूरा करने का जिक्र भी किया, और झारखंड में भी ऐसा करने का ऐलान भी किया। झारखंड ने कांग्रेस पार्टी, और वहां गए कांगे्रस के एक सबसे बड़े प्रचारक भूपेश बघेल की साख और राजनीतिक वजन में इजाफा भी किया है। यहां पर यह चर्चा भी जरूरी है कि छत्तीसगढ़ सरकार में एक सबसे वरिष्ठ मंत्री और सरगुजा से आने वाले टी.एस. सिंहदेव को कांग्रेस ने झारखंड में प्रत्याशी चयन का प्रभारी बनाया था।
लेकिन झारखंड में भाजपा की हार को महज राज्य की भाजपा सरकार के कामकाज से जोड़कर देखना ठीक नहीं है क्योंकि मोदी-शाह ने पूरा चुनाव प्रचार राष्ट्रीय मुद्दों पर लड़ा था, और ऐसा लगता है कि जनता उस पर भरोसा नहीं कर पाई। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि अगर आखिरी के दो दौर के मतदान में नागरिकता संशोधन की वजह से धार्मिक धु्रवीकरण नहीं हुआ होता तो इन जगहों पर भाजपा को सीटें और भी कम मिली होतीं। ऐसे में यह भाजपा के लिए दिल्ली की हार जैसी बात दिखती है।
महाराष्ट्र के बाद झारखंड में भाजपा सत्ता से बाहर, और कांग्रेस सत्ता के भीतर दिख रही है। इससे देश की राजनीतिक तस्वीर खासी बदल रही है, और राजनीतिक समीकरण भी। कांग्रेस पर गठबंधन सरकार में रहते हुए उसे कामयाब बनाने की बहुत बड़ी ऐतिहासिक जिम्मेदारी रहेगी क्योंकि दोनों जगहों पर उसे दूसरी पार्टी के मुख्यमंत्रियों के मातहत काम करना होगा, या महाराष्ट्र में करना पड़ रहा है। लेकिन गठबंधन को कामयाब बनाने की कामयाबी ही अगले आम चुनाव में कांग्रेस का कुछ भला कर सकती है। झारखंड के बारीक विश्लेषण अगले कुछ दिनों तक सामने आते रहेंगे, आज यहां लिखी बात उसका एक छोटा सा पहलू ही है।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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