अंग्रेजों का छोड़ा पखाना ढोना अब तो बंद करे हिन्दुस्तान...!
संपादकीय
04 जनवरी 2020

झारखंड के नए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने घोषणा की है कि वे सत्ता पर बैठे लोगों को गार्ड ऑफ ऑनर की परंपरा को खत्म करेंगे। उन्होंने अभी-अभी मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें दिए गए गार्ड ऑफ ऑनर के मौके पर यह बात कही। वे एक मंदिर में गए थे, और वहां पुलिस काफी देर से उन्हें सलामी देने के लिए खड़ी कर दी गई थी। उन्होंने मंदिर से निकलते ही चप्पल पहनीं, और वैसे ही गार्ड ऑफ ऑनर लिया। उन्होंने कहा कि जूते-चप्पल का रिवाज अंग्रेजों द्वारा बनाया गया एक पाखंडी रिवाज था जिसे वे नहीं मानते। उन्होंने कहा कि पुलिस को वीआईपी-रूढि़वादिता में समय बर्बाद करने की जगह जनता की सेवा में लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों द्वारा मुख्यमंत्री के दौरे पर दी जाने वाली ऐसी सलामी को वे जल्द से जल्द खत्म करेंगे।
आदिवासी बिरादरी से आए हुए हेमंत सोरेन की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने सामंती परंपरा तोडऩे का साहस किया है जिस पर जनता का मेहनत का पैसा बर्बाद होता है, और किसी बड़े सत्तारूढ़ नेता, या किसी बड़े अफसर को सलामी देने के लिए सलामी-गारद को दिन-दिन भर तैनात कर दिया जाता है। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम लगातार ऐसे सामंती रिवाजों के खिलाफ लिखते हैं। छत्तीसगढ़ में राजभवन में सभागृह बना, तो राष्ट्रपति भवन के अंदाज में उसका एक सामंती नाम दरबार हॉल रख दिया गया। जनता के पैसों से जो राजभवन बना है, जिस राज्य में 40 फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, वहां पर दरबार हॉल, दरबार, महलनुमा सरकारी-म्युनिसिपल दफ्तर, राज्यपाल के कार्यक्रमों के लिए बस भरकर पहले से पहुंचने वाला पुलिस बैंड, यह सब परले दर्जे का दिखावा है, जिसे जल्द से जल्द खत्म करना चाहिए। राज्यपाल के हर कार्यक्रम के पहले और बाद पुलिस बैंड राष्ट्रगान बजाता है, और वहां मौजूद लोग खड़े रहते हैं। अब सवाल यह उठता है कि एक राज्यपाल के लिए पूरे वक्त का ऐसा समर्पित पुलिस बैंड क्यों होना चाहिए, जिस पर गरीब जनता के लाखों रूपए महीने तनख्वाह और बाकी खर्च पर डुबाए जाते हों? एक-एक पुलिस कर्मचारी का सरकार पर बोझ 25-50 हजार रूपए महीने का होता है, और ऐसे आधा-एक दर्जन कर्मचारी बैंड बजाते गवर्नर के साथ क्यों घूमें? कायदे की बात तो यह है कि जिस तरह प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रपति बनने के बाद अपने लिए महामहिम शब्द का इस्तेमाल खत्म करवाया था, और जिसे देखकर बाद में कई, या सभी, राज्यपालों ने भी अपने लिए वैसा ही किया था, उस तरह का काम देश के सभी मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों को करना चाहिए, सलामी-गारद खत्म होनी चाहिए, और पुलिस बैंड का ऐसा राजकीय इस्तेमाल भी खत्म होना चाहिए। किसी भी सभागृह में कोई भी एक व्यक्ति माईक पर राष्ट्रगान गा सकते हैं जिसे बाकी लोग दुहराएं, राष्ट्रगान के लिए भी अगर लाखों रूपए महीने का खर्च किया जाता है, तो यह गर्व की नहीं, शर्म की बात है।
इसी तरह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कल जंगल-अफसरों की एक बैठक में कहा है कि अफसरों को जनसेवक की तरह काम करना चाहिए। राज्य सरकार को चाहिए कि वे जिलों में सत्ता के सबसे बड़े प्रतीक, कलेक्टर के पदनाम को बदलकर जिला जनसेवक करे। आज कलेक्टर, जिलाधीश, जिलाधिकारी जैसे नामों से ऐसा लगता है कि वे जनता से लगान कलेक्ट करने का ही काम करते हैं, जबकि उनका जिम्मा टैक्स वसूली से अधिक जनकल्याण पर खर्च का हो चुका है, लेकिन अंग्रेजों के वक्त का दिया हुआ कलेक्टर पदनाम अब तक जारी है, जिसे अलग-अलग प्रदेशों में जिलाधीश जैसे नाम से भी बुलाते हैं जो कि किसी मठाधीश जैसा लगता है। सामंती शब्दावली महज कागज पर नहीं रहती, वह सत्ता की कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों की मानसिकता पर भी हावी हो जाती है, आज देश में जिला कलेक्टरों की बड़ी जिम्मेदारी जनसेवा की हो गई है, जनकल्याण और विकास की हो गई है। इसलिए कलेक्टर और जिलाधीश जैसे शब्द खत्म करने चाहिए। इसके साथ-साथ सरकार को अपनी भाषा से वीआईपी शब्द भी खत्म करना चाहिए जो कि मोटेतौर पर सत्तारूढ़ बड़े लोगों के अहंकार के हिंसक और अश्लील प्रदर्शन का ही शब्द हो गया है। भाषा की राजनीति और भाषा का समाजशास्त्र बदलने का काम आमतौर पर सत्ता पर काबिज लोग नहीं कर पाते क्योंकि वे उसका मजा लेने के आदी हो जाते हैं। आज राष्ट्रपति भवन से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इतने किस्म की पोशाकें, इतने किस्म के रिवाज और आडंबर दिखते हैं जिन पर जनता का पैसा खर्च होता है। अंग्रेज चले गए और ऐसी महंगी गंदगी छोड़ गए हैं जिन्हें ढोने में आज के काले देसी अंग्रेजों को मजा आता है। सुप्रीम कोर्ट में जजों और वकीलों की पोशाक देखें, तो जादूगरों जैसे काले लबादे पहनना एक बंदिश है, और ऐसी बंदिश की वजह से वहां के एयरकंडिशनरों को अतिरिक्त काम करना पड़ता है ताकि लोग लबादों के भीतर भी गर्मी महसूस न करें। हिन्दुस्तानी मानसिकता को अंग्रेजों का छोड़ा गया पखाना अपने सिर पर ढोना बंद करना चाहिए। हर राज्य को चाहिए कि वह अपने भीतर के ऐसे सामंती पाखंड की शिनाख्त करे, और ऐसा सिलसिला तुरंत खत्म करे। ऐसा ही काम राष्ट्रपति से लेकर अदालतों तक को करना चाहिए। हेमंत सोरेन ने एक अच्छा इरादा जाहिर किया है, और अंग्रेजों के छोड़े रिवाजों के पखानों से आजादी पाना ही सही लोकतंत्र होगा।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
इस बहाने फै़ज़ की बाकी नज़्म भी पढऩा हो रहा है उन लोगों का जिन्होंने यह पहले नहीं पढ़ी थी
संपादकीय
03 जनवरी 2020

आईआईटी कानपुर, देश में वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा के लिए नेहरू के वक्त, उनकी सोच पर शुरू किया गया सिलसिला, आज बुतपरस्ती पर पहुंच गया है। भारत के विश्वविख्यात इंजीनियरिंग संस्थान, आईआईटी, से निकले हुए लोग आज अमरीकी कारोबारी दुनिया में आसमान छूती जगहों पर पहुंचे हैं, और वह संस्थान आज धार्मिक पाखंड का शिकार हो रहा है। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के इतिहास के एक सबसे बड़े, और सबसे क्रांतिकारी शायर, फै़ज़ अहमद फै़ज़ ने पाकिस्तान की फौजी हुकूमत और पाकिस्तान के धार्मिक कट्टरपंथियों, दोनों के खिलाफ जमकर लिखा, और बरसों वहां की जेल में भी रहे। उनकी लिखी हुई क्रांतिकारी रचनाओं से हिन्दी-उर्दू दुनिया के अनगिनत मजदूर और क्रांतिकारी आंदोलनों के नारे बने, और वे इस उपमहाद्वीप में क्रांति और संघर्ष के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक रहे। हिन्दुस्तान में आज उनकी एक सबसे बड़ी रचना में अल्लाह शब्द के जिक्र से जिन लोगों को यह हिन्दू-विरोधी लग रही है, उन्हें पाकिस्तान में फौजी हुकूमत के दौरान, हम देखेंगे, नाम से मशहूर इस कविता को मंच पर गाना याद नहीं है। यह नज़्म जिया-उल-हक की दमनकारी फौजी हुकूमत के खिलाफ संगीत में ढाली गई थी, और उसे जनता के विरोध की आवाज की तरह एक भरे लाहौर स्टेडियम में गाया गया था। फैक़ा की कलम, और वहां की मशहूर गायिका इकबाल बानो ने 50 हजार लोगों की मौजूदगी में एक काली साड़ी में उन्होंने यह तानाशाही-विरोधी गाना गाया। यह याद रखने की बात है कि ऐसी कड़ी फौजी हुकूमत के इस हुक्म को भी उन्होंने तोड़ा था कि महिलाएं साड़ी नहीं पहनेंगी, क्योंकि फौजी तानाशाह ने उसे शायद हिन्दुस्तानी पोशाक माना था, और उसका हुक्म था कि लोग काले कपड़े नहीं पहनेंगे क्योंकि उसे विरोध का प्रतीक मान लिया गया था। ऐसे में गिरफ्तारी और कैद से बेफिक्र, सिर पर कफन बांधे हुए, 1986 के वक्त में आधा लाख लोगों के इंकलाब जिंदाबाद के नारों के बीच फौजी तख्त पलटने के नारों वाली इस नज़्म को इकबाल बानो ने गाकर इतिहास बना दिया था, और अब तक वह हिन्दी-उर्दू दुनिया में राजनीतिक चेतना का एक सबसे बड़ा प्रतीक बनी हुई है।
अब कानपुर की आईआईटी में एक कमेटी बनाई गई है जो यह देखेगी कि फैक़ा की लिखी हुई इस क्रांतिकारी नज़्म में अल्लाह का जिक्र हिन्दूविरोधी है या नहीं। हिन्दुस्तान को ये दिन भी देखने थे जब इंजीनियरिंग और तकनीक, विज्ञान और शोध के एक सबसे बड़े केन्द्र को अज्ञान और धर्मान्ध-पाखंड, साम्प्रदायिकता और नफरत में इस तरह उलझा दिया जाएगा। यह बात सही है कि विज्ञान और तकनीक राजनीतिक चेतना से परे काम करते हैं, और जापान पर गिराए गए परमाणु बम को विकसित करने वाले वैज्ञानिक और इंजीनियर लाखों मौतों को देखने के पहले तक अपनी वैज्ञानिक उपलब्धि पर फिदा भी थे। इसलिए अगर हिन्दुस्तान की एक बड़ी आईआईटी से निकले हुए कामयाब इंजीनियर, वैज्ञानिक अगर इस धर्मान्धता का कोई विरोध नहीं करते हैं, तो भी हैरानी नहीं होगी, लेकिन हिन्दुस्तान में हमारे सरीखे जिन लोगों ने अपने बचपन से गली-मोहल्लों में सभी धर्मों का एक-दूसरे से सद्भाव देखा है, और हममें से जो लोग आज सुबह चाय की जगह नफरत पीकर दिन शुरू नहीं करते हैं, उन लोगों को हिन्दुस्तान की इस नौबत से तकलीफभरी हैरानी जरूर हो रही होगी।
जिन लोगों को एक क्रांतिकारी गाने में हिन्दूविरोध ढूंढने के लिए उसे बोतल में ले जाकर पैथालॉजी लैब में जांच करवानी पड़ रही है, उनको ऐसा नहीं कि मालूम और याद नहीं है कि हिन्दुस्तान की अधिकतर स्कूलों में बच्चे बचपन से ही सरस्वती की प्रतिमा की पूजा करते आए हैं, फिर वे चाहे किसी भी धर्म के हों। तकरीबन सभी आम स्कूलों में सरस्वती की तस्वीरें दिखती हैं, और मुस्लिमों से भरे हुए बंगाल में तो स्कूलों में सरस्वती की प्रतिमाएं भी रहती हैं। एकमुश्त 33 बरस के कम्युनिस्ट राज में भी ये प्रतिमाएं नहीं हटीं, स्कूलों से सालाना सरस्वती पूजा नहीं हटी, और कभी यह बात मुद्दा नहीं बनी कि मुस्लिम बच्चों के लिए बुतपरस्ती तो इस्लाम के मुताबिक गलत है, इसलिए प्रतिमा की पूजा से उन्हें दूर रहने दिया जाए। इस देश में धर्मनिरपेक्षता के बाद भी किसी भी सरकारी शिलान्यास या भूमिपूजन में हिन्दू विधि-विधान से पंडित की करवाई गई पूजा का आम नजारा सरकारी तस्वीरों में ही दिखते आया है। इसका कभी किसी ने विरोध नहीं किया, और गैरहिन्दू मंत्री या अफसर भी ऐसी पूजा करते दिखे, कभी किसी ने इससे परहेज नहीं किया कि उनका धर्म इसकी इजाजत नहीं देता। हर बैंक में, और नगदी रखने वाले हर सरकारी दफ्तर में दीवाली पर लक्ष्मी पूजा होती आई है, आज भी होती है, और किसी ने यह नहीं कहा कि दूसरे धर्मों के लोग लक्ष्मी की पूजा क्यों करें, या उनका धर्म देवी-देवता की पूजा का नहीं है।
हिन्दुस्तान में हाल के नफरती बरसों को छोड़ दें, तो क्या किसी गली-मोहल्ले में गणेश और दुर्गा की, काली और सरस्वती की ऐसी पूजा भी होती थी जिसमें उस मोहल्ले के मुस्लिम शामिल नहीं होते थे? चंदा नहीं देते थे, कार्यक्रम में नहीं आते थे? वे तो आज भी शामिल होते हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह ईसाई, या सिक्ख शामिल होते हैं, यह एक अलग बात है कि पिछले दस-पन्द्रह बरस में हिन्दुत्व के हिंसक इस्तेमाल वाले प्रदेशों में साम्प्रदायिक संगठन यह मांग करने लगे कि नवरात्रि के गरबा में गैरहिन्दुओं को दाखिल न होने दिया जाए, और हर किसी के पहचान पत्र देखकर ही उन्हें वहां आने दिया जाए। एक पूरी तरह से सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा को एक पाखंडी-धार्मिक सीमा के भीतर बांधने की यह कोशिश अब भी कुछ प्रदेशों में चल रही है, और आईआईटी कानपुर में जो हुआ है, वह उसी सोच और कोशिश की अगली कड़ी है। इस देश के झंडे के कपड़े में से तानों को बानों से अलग करके लहराने की एक कोशिश हो रही है, और ऐसा तिरंगा झंडा हवा में कैसे टिकेगा यह समझना अधिक मुश्किल नहीं है। फै़ज़ की नज़्म में तानाशाही के खिलाफ प्रतीक के रूप में अल्लाह के एक जिक्र को लेकर जिन लोगों ने आज बवाल खड़ा किया है, उन्हें शायद इस बात की समझ भी नहीं है कि इस बवाल की वजह से आज वे लोग भी इस नज़्म के बाकी हिस्से को बारीकी से पढ़ और सुन रहे हैं जो कि तानाशाही का ऐसा विरोध शायद पहली बार पढ़ रहे होंगे। किसी ने एक वक्त सही कहा था कि बेवकूफ दोस्त से समझदार दुश्मन बेहतर होता है।
5:00 PM
बाजार और सरकार का यह मिलाजुला औजार बनेगा या निजता खात्मे का हथियार ?
संपादकीय
02 जनवरी 2020

पिछले कुछ समय से हिन्दुस्तान में मुकेश अंबानी की कंपनी जियो ने इतने सस्ते में फोन पर डेटा सर्विस शुरू की, कि लोगों ने उसका अंधाधुंध इस्तेमाल शुरू किया। कुछ सौ रूपयों में अनलिमिटेड टेलीफोन कॉल और तकरीबन अनलिमिटेड इंटरनेट-इस्तेमाल से लोगों की जिंदगी बदली, और आज ही एक अखबारी खबर बताती है कि किस तरह सस्ते इंटरनेट की वजह से हिन्दुस्तानियों ने फोन पर अधिक से अधिक पोर्नोग्राफी देखना शुरू किया है। लेकिन पोर्नोग्राफी अधिक फिक्र की बात नहीं है, बड़ी फिक्र की एक बात भारत सरकार और संसद की तरफ से आ रही है जिसमें सरकार यह कोशिश कर रही है कि वह इंटरनेट कंपनियों से लोगों के इस्तेमाल के गैर-निजी और बेनाम डेटा खरीदे। कहने के लिए सरकार की ओर से एक बेनाम जानकार ने यह भी कहा है कि सरकार ऐसे डेटा का बेजा इस्तेमाल नहीं करेगी, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों की यह फिक्र है कि संसद में प्रस्तावित ऐसा कानून लोगों की निजता को खत्म करेगा। अभी देश में एक पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (पीडीपी) विधेयक पर लोकसभा में चर्चा होनी है और जानकारों का यह मानना है कि यह लोगों की बौद्धिक संपत्ति के अधिकार के भी खिलाफ है और निजता के अधिकार के भी।
अब सरकार और बाजार की मिलीजुली ताकत को देखें, तो बाजार अपने आपमें ऐसा अंधाधुंध ताकतवर है कि वह अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने के लिए रूस के पैसों से अमरीका में फेसबुक जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया का बेजा इस्तेमाल करके जनमत को प्रभावित करने का आरोप झेल ही रहा है। इसमें तो अमरीकी सरकार भी शामिल नहीं थी, और निजता-गोपनीयता के सबसे कड़े कानूनों वाले देशों में से एक, अमरीका, की सरकार भी इस चुनावी छेड़छाड़ को रोक नहीं पाई थी। इस पूरे मामले की जांच अलग-अलग स्तरों पर दफन करने की कोशिश चल ही रही है, दूसरी तरफ दुनिया के एक-एक करके बहुत से देशों में फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर जुर्माना लगते जा रहा है कि वह लोगों की निजी जानकारी के कारोबारी इस्तेमाल के लिए उनका डेटा किसी न किसी शक्ल में बेचता है।
सरकार और बाजार की मिलीजुली साजिश की एक कल्पना करें। पहले बाजार ने लोगों को मिट्टी के मोल या तकरीबन मुफ्त डेटा सर्विस मुहैया कराई, लोग उस पर सब कुछ करने लगे, पसंद के पोर्नो या किसी और किस्म के वीडियो देखने लगे, लोगों से चैट करने लगे, तस्वीरें और वीडियो लेनदेन करने लगे, और जागरूक लोगों का एक तबका उस पर किसी आंदोलन की चर्चा भी करने लगा, तैयारी भी करने लगा। महज कुछ सौ रूपए महीने में लोगों को एक-दूसरे से जुडऩे का, दुनिया को खंगालने का एक ऐसा औजार मिला कि लोग उस पर अपना सब कुछ उजागर करने लगे। अब सरकार पीछे के दरवाजे से अगर इस पर दर्ज जानकारी किसी भी शक्ल में निकालने के फेर में है, तो यह समझना चाहिए कि घाटे से लदी हुई बताई जा रहीं टेलीकॉम कंपनियां सरकार को गैरनिजी कहे जाने वाले या गुमनाम डेटा को बेचने का बुरा क्यों मानेंगी? जिस अखबार, द इकॉनॉमिक टाईम्स, में छपी खबर को लेकर हम आज यहां यह बात लिख रहे हैं, उस अखबार की खबर में टेलीकॉम कंपनियां ग्राहकों की निजता की फिक्र करते बताई जा रही हैं, और सरकार का कोई बेचेहरा व्यक्ति कंपनियों से वह डेटा लेने का हिमायती दिख रहा है। यह पश्चिम के विकसित, सभ्य, और जिम्मेदार लोकतंत्रों से ठीक उल्टी नौबत दिख रही है जहां पर संसद और सरकार तो फेसबुक जैसे सोशल मीडिया की पेशी कर रहे हैं, जहां की अदालतें ऐसी कंपनियों पर बंदिशें लाद रही हैं, और जुर्माना लगा रही हैं। भारत में सरकार निजता में घुसपैठ के फेर में दिख रही है, और कंपनियां, कम से कम इस खबर में, सरकार के मुकाबले निजता के लिए अधिक फिक्रमंद दिख रही हैं। बाजार का ऐसा कोई सरोकार हमें स्थाई नहीं दिखता, क्योंकि कोई भी कंपनी अपना दीवाला निकलने देने के पहले सरकार के कहे, नए कानून के तहत, कुछ भी बेचने के लिए तैयार हो जाएंगी। सरोकार और नैतिकता, सामाजिक जवाबदेही और निजता का सम्मान, यह सब कुछ सरकार के जिम्मे की बात रहती है, बाजार के जिम्मे की नहीं। एक बार केन्द्र सरकार अगर संसद से ऐसा कोई कानून बनवा लेती है, तो बाजार को क्या दिक्कत रहेगी?
यह भी याद रखने की जरूरत है कि पिछले दिनों जब इजराईल की एक कंपनी के बनाए हुए जासूसी-सॉफ्टवेयर, पेगासस, पर हंगामा हुआ, और कंपनी ने कहा कि उसने भारत की भी सरकारी एजेंसी को यह सॉफ्टवेयर बेचा था, तो विपक्ष ने संसद में सरकार को घेरा था। इसके पहले कंपनी ने यह साफ किया था कि वह सिर्फ सरकारी एजेंसियों को यह सॉफ्टवेयर बेचती है, और वॉट्सऐप ने हिन्दुस्तान को बहुत से प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और वकीलों, विपक्ष के नेताओं को व्यक्तिगत संदेश भेजकर यह बताया था कि उनके फोन पर वॉट्सऐप के जरिये पेगासस के सॉफ्टवेयर से घुसपैठ की जा चुकी है। इस खबर के बाद संसद में विपक्ष ने जब सरकार से इस बारे में पूछा, तो केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सवाल का कोई जवाब देने के बजाय भारत में संचार-निगरानी के कानूनी प्रावधान को गिनाया, और कहा कि सरकार उसके तहत ही कार्रवाई करती है। इस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल को लेकर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बात साफ है कि जवाब न देना भी एक जवाब होता है, और अगर सरकार ने इसका इस्तेमाल नहीं किया होता, तो वह साफ-साफ खुलकर दावा करती कि उसने ऐसा नहीं किया है।
सरकारों द्वारा जासूसी कोई नई बात नहीं है, और चाहे किसी पार्टी की सरकार रहे, देश में रहे या प्रदेश में रहे, किसी को भी संचार-जासूसी के कानूनी हक का इस्तेमाल बुरा नहीं लगता है। ऐसे में अगर सरकार आज गैरनिजी कहकर किसी डेटा की जानकारी कंपनियों से हासिल करने की सोच रही है, तो वह एक बहुत ही खतरनाक नौबत रहेगी। संसद के भीतर राजनीतिक दलों की दिक्कत यह है कि वे खेमेबंदी में लगकर संसद को महज बाहुबल का अखाड़ा बना देते हैं, जटिल विधेयकों के बारीक पहलुओं पर बहस की नौबत नहीं आती, और सरकारें उन्हें पास करवा लेती हैं। आज देश में डेटा निजता के जानकारों को अभी से सार्वजनिक बहस छेडऩी चाहिए और संसद के बाहर ही इसके हर पहलू पर खुलकर, जमकर चर्चा होनी चाहिए ताकि संसद में कम से कम कुछ विपक्ष लोग तो इसके खतरे भी गिना सकें। अपनी सीमित जानकारी और समझ से हम अभी गैरनिजी डेटा और गुमनाम डेटा की सीमाओं को नहीं जान पा रहे हैं, और उसके खतरों का भी अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं, लेकिन यह बात साफ है कि चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो, ऐसे अधिकार उसके हाथ में नहीं होने चाहिए। आज जब राजनीति और सरकार में सत्तारूढ़ मुख्यमंत्री भी बदला लेने की जुबान में बात कर रहे हैं, तो ऐसे कानून से लैस सरकारें किसी इलाके से, किसी आंदोलन से, या किसी संगठन या व्यक्ति से बदला लेने के लिए इस औजार कहे जा रहे हथियार का कैसा-कैसा इस्तेमाल नहीं करेंगी? इस नौबत को एक काल्पनिक फिल्मी कहानी की तरह देखें, तो हिन्दुस्तान की तकरीबन तमाम आबादी को पहले तो लगभग मुफ्त डेटा का ऐसा नशेड़ी बनाया गया कि वह इंटरनेट पर तौलिये को अलग रखकर बैठी है, और अब सरकार उस निजी कमरे में झांकने का हक खरीदने का कानून किसी चतुर जुबान में लिख रही है। क्या यह जीवनशैली में बाजार के रास्ते लाया गया सोचा-समझा बदलाव है जिसके बाद अब लोग अपने आपको खुद ही जासूसी के लिए बिना कपड़ों पेश कर चुके हैं? एक ऐसे दिन की कल्पना की जा सकती है जब सरकार किसी को बुलाकर बताए कि वे कौन-कौन से पोर्नो देख रहे थे, और क्या वे चाहेंगे कि इसकी जानकारी उनके जीवनसाथी को, या उनके बच्चों को, उनके मां-बाप को दी जाए? क्या यह जानकारी किसी गुमनाम रास्ते से सोशल मीडिया पर पोस्ट की जाए? क्या अनैतिक और अवैध कहे जाने वाले संबंधों का भांडाफोड़ किया जाए? क्या उनकी राजनीतिक सोच और उससे उपजे आंदोलनों की वजह से उन्हें निशाना बनाया जाए? लोगों को याद रखना चाहिए कि परमाणु शक्ति को भी एक शक्ति के रूप में बनाया गया था, हिरोशिमा-नागासाकी पर गिराए गए बम की शक्ल में नहीं। तमाम हथियार एक वक्त बचाव के औजार की तरह ही बनाए जाते हैं, हथियारों की तरह नहीं।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
नए बरस में खुद से वायदों की लिस्ट में कुछ जगह है?
संपादकीय
01 जनवरी 2020

दुनिया भर में लोगों ने बीते हफ्ते नए बरस के लिए अपने आपसे तरह-तरह के वायदे किए होंगे, और उन्हें आज से मानने का पक्का इरादा किया होगा। कुछ ने सिगरेट-शराब जैसे ऐब छोडऩे की कसम खाई होगी तो कुछ ने वजन घटाने की या रोज कसरत करने की। नए साल के मौके पर खाई गई कसमों की जिंदगी सबसे सस्ते और घटिया चीनी सामान से भी छोटी होती है। लेकिन चीन को कोसने के बजाय हिन्दुस्तान के लोगों को इस मौके का इस्तेमाल एक बेहतर हिन्दुस्तान बनाने के लिए करना चाहिए। वैसे तो नया साल, 2020, शुरू हुए इस वक्त दस घंटे हो रहे हैं, और बहुत से लोगों ने इन घंटों में झूठ, नफरत, और हिंसा फैलाने का अपना रोज का शगल जारी रखा होगा, लेकिन फिर भी पहला दिन आधा गुजरने के बाद भी बाकी बरस को सुधारने का एक मौका तो रहता ही है। जिस तरह ठंड में सुबह देर से खुली नींद की वजह से लोग बाकी का दिन खारिज नहीं कर देते हैं, और जब जागे तभी सबेरा की बात याद रखते हुए वहीं से दिन की शुरुआत करते हैं, उसी तरह हिन्दुस्तान के लोगों को अपने लिए नहीं, अपने आसपास के दूसरे धर्म या दूसरी जाति के लोगों के लिए नहीं, अपने से असहमत राजनीति वालों के लिए नहीं, अपनी ही आने वाली पीढ़ी की भलाई के लिए एक बेहतर हिन्दुस्तान बनाने के बारे में सोचना चाहिए।
आज हिन्दुस्तान में जिस किस्म का 2019 काटकर नए बरस में कदम रखा है, वह बीती रात की तमाम आतिशबाजी और नाच-गाने के बावजूद कोई बहुत खुशी का मौका नहीं था। 2019 जब शुरू हुआ था तो देश में इतनी नफरत, इतनी हिंसा, और उसकी इतनी बड़ी नुमाइश नहीं थी। लेकिन साल गुजरते न गुजरते हिन्दुस्तान की तस्वीर एक किस्म से बदल गई, और लोगों को नफरत, हिंसा, बदला, और बलात्कार नई सामान्य बातें लगने लगीं। नियोनॉर्मल या कहें कि नवसामान्य, की परिभाषा और उसके पैमाने बदल गए। महिलाओं के खिलाफ जुल्म और जुर्म इस बेतहाशा बढ़े कि उन खबरों पर लोगों को डर लगना, या उनसे नाराजगी होना खत्म सा हो गया। अब बलात्कार के बाद हत्या, या उसके वीडियो के बाद आत्महत्या भयानक से चलते-चलते आम तक पहुंच चुकी खबरें हैं, और हिन्दुस्तानी सोच में इन बातों के लिए बढ़ा हुआ बर्दाश्त एक बढ़ी हुई फिक्र का बड़ा सामान भी है। ऐसी हिंसा और ऐसे जुर्म पर देश के लोगों की प्रतिक्रिया धर्म और जाति के आधार पर होने लगी है, बलात्कारी-कातिल के धर्म और उसकी जाति के आधार पर, और उसके शिकार की जाति या उसके धर्म के आधार पर भी। यह पूरा सिलसिला बहुत ही भयानक है। यह इंसान के इंसानियत को खो देने का एक सिलसिला है, जो एक बरस के भीतर ही खासा फासला तय कर चुका है, और इस बरस उसकी रफ्तार कम हो ऐसा कोई आसार अभी दिख नहीं रहा है।
आज यहां लिखने का मकसद यह है कि लोगों को यह सोचना चाहिए कि वे नफरत, हिंसा, और झूठ को चारों तरफ फैलाते हुए क्या कर रहे हैं? कुदरत को देखें, खेतों को और जंगलों को देखें, तो वहां से एक वैज्ञानिक सीख मिलती है कि जैसा बोएंगे, वैसा काटेंगे। लोग एक वक्त अपनी आने वाली पीढ़ी का ख्याल करके कुछ पेड़ सागौन के लगाते थे ताकि कुछ पीढिय़ों बाद भी घर और फर्नीचर बनाने के काम आते रहें, कुछ पेड़ आम-अमरूद जैसे फलों के लगाते थे कि कई पीढिय़ां उनका फायदा पाती रहें। और अपनी खुद की जिंदगी के चलते हर बरस के खाने के लिए सालाना फसलें तो लगाते ही थे। नतीजा यह था कि जैसा बोते थे, वैसा खाते थे। लेकिन आज हिन्दुस्तान में दिल-दिमाग पर नफरत इस कदर हावी हो गई है कि लोग नफरत बोने लगे हैं, हिंसा बोने लगे हैं, बिना यह सोचे कि उनके पुरखों ने तो सागौन और आम बोया था, खेतों में सालाना फसल बोई थी जिसके बीज के बीज से अब तक फसलें चल रही हैं। लोगों को आज अपने उन्माद में यह भी समझ नहीं आ रहा है कि वे न सिर्फ अपनी आने वाली पीढिय़ों को इंसानियत का एक रेगिस्तान विरासत में देकर जाने वाले हैं, बल्कि उन्हें यह भी समझ नहीं आ रहा कि उनके जीते जी भी वे खुद भी ऐसे ही रेगिस्तान को भुगतने जा रहे हैं, और इसका बेकाबू नुकसान झेलने जा रहे हैं। हिन्दुस्तान के आम लोगों की सोच से वैज्ञानिक समझ और इंसाफ को इस कदर खत्म कर दिया गया है कि वे ऐसे नुकसान को या तो समझ नहीं पा रहे हैं, या समझते हुए भी बेपरवाह हैं। इसलिए लोगों ने नए साल के लिए अपने लिए जो-जो वायदे तय किए होंगे, हम उनमें बस एक छोटी सी बात जोडऩा चाहते हैं कि लोग यह सोचें कि झूठ, नफरत, और हिंसा को फैलाना अगर वे जारी रखेंगे, तो आज वैसे भी जहरीली हो चुकी हवा उतनी जहरीली हो जाएगी जितनी जहरीली धुंध दिल्ली में साल में कई महीने दिखने लगी है। ऐसा झूठ, ऐसी नफरत, और ऐसी हिंसा, ये तमाम बातें लोगों की साख भी चौपट कर रही हैं, और लोग और किसी बात की फिक्र करें या नहीं, कम से कम अपनी आज की साख की फिक्र तो कर लें, और अपने खुद के, और अपने बच्चों के कल की फिक्र कर लें।
(Daily Chhattisgarh)
5:00 PM
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