तांत्रिक हत्याएं क्यों नहीं होंगी, इस अंधविश्वासी हिंदुस्तान में?

संपादकीय
5 अप्रैल 2020


छत्तीसगढ़ के सरगुजा इलाके से सुबह-सुबह ही दिल दहलाने वाली खबर आई, एक आदमी ने आधी रात अपनी माँ और तीन बुजुर्ग पड़ोसियों का कत्ल कर दिया, कई बैल और मुर्गे काट डाले। यह सब एक तांत्रिक पूजा के बाद किया बताया जा रहा है। देश में जगह-जगह तांत्रिक पूजा, और बलि के नाम पर कत्ल की कई वारदातें सामने आती हैं, छत्तीसगढ़ में हर महीने ही ऐसा कुछ-ना-कुछ होते ही रहता है। इससे परे महिलाओं को टोनही कहकर मारना भी छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में बहुत बार होता है। इक्कीसवीं सदी चल रही है, इस देश में कहीं जाति के नाम पर, कहीं धर्म के नाम पर, कहीं सगोत्र विवाह करने पर, तो कहीं दूसरी जाति में विवाह करने पर कत्ल किए जाते हैं, और लोग उन्हें इज्जत के लिए किए गए कत्ल भी कहते हैं, ऑनर -किलिंग!

देश में पढ़ाई-लिखाई, राजनीतिक-चेतना, और शहरीकरण के साथ लोगों की सोच में जो वैज्ञानिकता आनी थी, वह आनी तो दूर रही, रही-सही भी बुरी तरह घटती दिख रही है। अब लोग और अधिक कट्टर, धर्मांध, नफरतजीवी होते दिख रहे हैं। वैज्ञानिकता के साथ एक दिक्कत है, जब वह जाती है, तो पूरी तरह से जाती है, और अन्धविश्वास बारात लेकर आता है, डेरा जमा लेता है, घरजमाई होकर बैठ जाता है। आप लोगों से गणेश को दूध पिलवा दें, उनके भीतर की वैज्ञानिकता चल बसती है,  फिर उनसे आगे चलकर दूसरे पाखंड करवाना आसान हो जाता है। हिंदुस्तान में हम देखते हैं कि कुछ ताकतें लगातार बीच-बीच में परखती रहती हैं कि लोगों में सोचने-समझने की ताकत बची हुई तो नहीं है? ऐसा हो तो फिर कोई और पाखंड खड़ा कर दिया जाता है। जैसे कोरोना पॉजिटिव मरीज की बार-बार जाँच करके देख लिया जाता है कि कोरोना चल बसा है या नहीं, उसी तरह हिंदुस्तान में राजनीतिक ताकतें, धर्मांध ताकतें बार-बार देख लेतीं हैं कोई वैज्ञानिकता बच तो नहीं गई है। इसके लिए अन्ना हजारे, श्री-श्रीरविशंकर, बाबा रामदेव, सदगुरु, बलात्कारी आसाराम जैसे कई लिटमस पेपर इस्तेमाल किए जाते हैं। आसाराम जब लोगों को ऐसा पाते हैं कि वे अपनी नाबालिग लड़की को भी ऐसे बाबा के पास छोड़ सकते हैं, तो फिर यह समाज की एक अच्छी परख  हो जाती है कि यह समाज, यह देश अब और अधिक दूर तक बेवकूफ बनाने के लायक फिट है। फिर राम-रहीम नाम का एक और लिटमस पेपर और लोगों से बलात्कार करके, मर्दों को बधिया बनाकर और परख लेता है। ये सारे लोग फिर निर्मल बाबा की तरफ भी देखते रहते हैं कि लोग वहां मोटा भुगतान करके बेवकूफ बनने का सर्टिफिकेट खरीद रहे हैं या नहीं। 

नेहरू ने इस देश में बड़ी कोशिश करके जो वैज्ञानिक सोच विकसित की थी, उसे तबाह करना तो उनकी बेटी ने ही मचान पर टंगे देवरहा बाबा के पाँव तले अपना सर धरकर शुरू कर दिया था, और बाद में बहुत सी पार्टियों ने, बहुत से नेताओं ने यही काम किया. और तो और दिग्विजय सिंह जैसे धर्मान्धता-विरोधी नेता भी आसारामों जैसों के चरणों में बिछते रहे, गलत मिसालें कायम करते रहे। अभी-अभी दिल्ली में मुस्लिमों के एक संगठन ने जिस तरह कोरोना-चेतावनी को अनदेखा करके, खतरे को अनसुना करके पूरे देश पर कोरोना-खतरे को दुगुना कर दिया है, वह वैज्ञानिक सोच पर अन्धविश्वास, धर्मान्धता की जीत रही। 

जब देश की सोच से तर्क निकाल दिए जाएँ, सवाल निकाल दिए जाएँ, तो फिर उस खाली जगह पर अन्धविश्वास, धर्मान्धता तेजी से घुसकर काबिज हो जाते हैं। ऐसे में पहले से जिनकी आस्था अंधविश्वासों पर हो, वे तो अपनी इस सोच को और पुख्ता बना बैठते हैं। इसी सरगुजा में पिछली भाजपा सरकार के गृहमंत्री जिस तरह से एक कम्बल-बाबा के कम्बल में किए जाने वाले इलाज को स्थापित करते रहे, उससे बाकी पाखंडियों को और बाजार मिला। बीती रात सरगुजा में जो इतने क़त्ल हुए, वे उसी किस्म के बाजार की उपज हैं, वे रातों-रात नहीं हुए हैं, वे लंबी मेहनत की फसल की उपज हैं। फिलहाल आज रात दिए जलते देखने की तैयारी करें।
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 4 अप्रैल 2020

रौशनी की यह नुमाइश किस खतरे की कीमत पर हो रही?

संपादकीय
04 अप्रैल 2020


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कल 5 अप्रैल की रात के लिए तय किया गया रौशनी का जलसा एक खतरा लेकर आया है। देश के बिजली सेक्टर के जानकारों का कहना है कि एकमुश्त अगर देश के लोग घरेलू बत्तियां बंद कर देंगे, तो करीब दस फीसदी खपत एकदम से गिर जाएगी, और फिर 9 मिनट बाद यह खपत एकदम से बढ़ भी जाएगी। इस उतार-चढ़ाव से देश की पॉवर ग्रिड पर इतने बड़े झटके लगेंगे कि देश अँधेरे में डूब सकता है। कल मोदी की घोषणा के बाद देश के बिजली मंत्री पॉवर सेक्टर के अफसरों के साथ बैठे, जिन्होंने फिक्र के बावजूद भरोसा दिलाया है कि वे इस उतर-चढ़ाव को झेल लेंगे, लेकिन कुछ का कहना है कि जनता से यह अपील जरूरी है कि वह सिर्फ रौशनी बंद करे, पंखे, या एसी चलते रहने दें, ताकि खपत एकदम से ना गिरे। कल दिल्ली में हुई इस बैठक से जाहिर है कि मोदी की मुनादी के पहले इस बारे में केंद्र सरकार के भीतर भी तकनीकी विशेषज्ञों से चर्चा नहीं हुई थी। खैर, यही तरीका नोटबंदी का था, यही तरीका देश में लॉकडाउन का था। इसलिए देश को अगले और चार बरस इसी किस्म से मुनादियों के सदमे और उनके नुकसान के लिए तैयार रहना चाहिए। 

फिलहाल फिक्र की बात यह है कि अगर पॉवर ग्रिड को नुकसान हुआ तो क्या होगा? क्या आज देश ऐसे प्रतीकात्मक प्रदर्शनों को खतरों की कीमत पर भी करने की हालत में है? क्या आज देश की, और खुद प्रधानमंत्री की भी यह प्राथमिकता होनी चाहिए कि ऐसे खतरनाक, और निहायत गैरजरूरी, शगल में उलझें? देश भर में बिजली की बुनियादी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है, क्या ऐसे खतरनाक प्रदर्शन के पहले राज्यों से चर्चा की गई? देश के 130 करोड़ लोगों को एक साथ दिखाने के लिए यह नुमाइश की जा रही है, और देश के 30 राज्यों को भी साथ नहीं रखा जा रहा? यह सिलसिला खतरे के वक्त और खतरनाक हो जाता है, हो गया है। 

आज हिंदुस्तान की प्राथमिकता आत्मप्रचार से परे की ही होनी चाहिए। चाहे सरकारें हों, चाहे राजनीतिक दल हों। आज जब भूखों के लिए तैयार फूड पैकेट पर किसी नेता की तस्वीर छपती है, उन्हें बांटते हुए नेताओं की तस्वीरें छपतीं हैं, तो लगता है कि क्या प्रचार के बिना, मुसीबत की घडिय़ाँ भी इनसे कटे नहीं कटतीं? लखनऊ के एक शायर का लिखा कल ही हमारे पढऩे में आया है कि, 

'राशन थमा दिया उसे 
सेल्फी के साथ-साथ,
जो मर रहा था भूख से, 
गैरत से मर गया।।'

आज का वक्त अपने को भूलकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने का है। आज हिंदुस्तान में करोड़ों डॉक्टर, नर्स, पुलिस, सफाई कर्मचारी, बिजली कर्मचारी, जेल और निराश्रित गृह कर्मचारी खतरे झेलकर भी अपना काम कर रहे हैं। उनके चेहरे ढंके हुए हैं। उनके घरवाले फिक्र में हैं। किसी भी तरह की नुमाइश उनका कोई फायदा करने वाली नहीं है। आज देश के करोड़ों मजदूर सड़कों में, दूसरे प्रदेशों में शरणार्थी बने हुए हैं, उनके दिलों पर शहरी घरों की रौशनियों को देखकर क्या गुजरेगी? क्या इन रौशनियों में उनके भूखे पेटों के लिए भी कुछ रहेगा? उनका कोई भी भला शोहरत के किसी शिगूफे से होने वाला नहीं है। इसलिए देश को खतरे में डालकर कोई निहायत गैरजरूरी हरकत ना ही की जाए तो ही बेहतर है।

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

कड़ाई बंद, और दारू शुरू, से राज्य बहुत खतरे में पड़ेगा

संपादकीय
4 अप्रैल 2020


अब ऐसा लग रहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार एक-दो दिनों में शराब की बिक्री शुरू करके ही मानेगी। कहा जा रहा है कि राजधानी रायपुर में तीन आदतन शराबी शराब ना मिलने पर स्प्रिट पीकर मर गए। पुलिस में कुछ का कहना है कि मौत की वजह कुछ और है। जो भी हो, सरकार इसे वजह बताते हुए दारू बेचना शुरू करने वाली दिखती है। यह बात ठीक है कि आर्थिक बोझ तले दबी हुई सरकार को कमाई चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि यह दारू खरीदेंगे कौन? गरीबों के पास पैसे आएंगे कहाँ से? घर का अनाज चुराकर या छीनकर, बेचकर? घरवाली के गहने बेचकर? अपनी दुपहिया बेचकर? जिसके पास आज रोजगार नहीं रह गया है, जिसके पास आज कोई कमाई नहीं रह गई है, जिसके घर के लोगों के पास इलाज को पैसे नहीं रह गए हैं, उनको दारू बेचने के लिए दुकानें शुरू की जा रही हैं?

यह सिलसिला एक बहुत बड़े सामाजिक खतरे का है। आज पूरी दुनिया से रिपोर्ट्स आ रही हैं कि लॉकडाउन की वजह से हर कहीं घरेलू हिंसा बढ़ रही है, सभ्य और विकसित देशों में भी घरेलू हिंसा आसमान पर पहुँची हुई है, ऐसे में खाली-ठलहा बैठे हुए आदमी शराब के लिए क्या नहीं करेंगे? और फिर पीने के बाद क्या नहीं करेंगे? और फिर नशा टूटने पर दुबारा दारू-दूकान जाने के लिए क्या नहीं करेंगे? इसी छत्तीसगढ़ में हर दिन पारिवारिक हिंसा में एक से अधिक कत्ल और आत्महत्या का सिलसिला बना हुआ था, अब फिर प्रदेश को उस तरफ झोंक देना ठीक नहीं है। 

दारू न मिलने से कुछ और पीकर मर जाने की खबर सही भी हो तो भी यह समझने की जरूरत है कि दारू पीकर रोज मर जाने वालों की मौतें तो पुलिस में दर्ज भी नहीं होतीं, और वे हर दिन तीन से अधिक ही होंगी। एक आखिरी और सबसे जरूरी बात। आज जब बिना पिए लोग भी सामाजिक या शारीरिक दूरी नहीं रख पा रहे हैं, तो पीने वाले नशे में एक-दूजे से एक मीटर की दूरी पर रहने की सावधानी रखेंगे? वे बाहर भी लापरवाह रहेंगे, और उसी हालत में संक्रमण लेकर घर भी लौटेंगे। शराबियों के घर के और लोग भी इससे संक्रमण के खतरे में आएंगे। 

सरकार शराब की बिक्री शुरू नहीं कर रही, वह लोगों को नशे में धकेलने का खतरनाक काम ऐसे नाजुक वक्त पर कर रही है, जब हर किसी को चौकन्नापन कई गुना बढ़ाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ में चूँकि अब तक कोरोना-मौतें नहीं हुई हैं, इसलिए सरकार और जनता दोनों का चौकन्नापन घटते जा रहा है। कल राजधानी रायपुर की सड़कों का हाल यह था कि सड़कों पर ट्रैफिक लाइट शुरू करने पड़ रहे थे। ट्रैफिक चालान हो रहे थे। यह कैसा लॉकडाउन है? इससे बेहतर हाल तो बिलासपुर जैसे शहर का है जहाँ पुलिस ने फ्लैगमार्च करके लोगों को घर के भीतर ही रखा, सत्तारूढ़ पार्टी में विधायक के खिलाफ जुर्म दर्ज किया। राजधानी रायपुर का हाल कल ऐसा लग रहा था कि मानो कोरोना की जंग जीती जा चुकी है, और लोग दीयों का थाल सजा रहे हैं। यह ढील दुनिया के कुछ और देशों में भी सामने आई है, लेकिन ढील का क्या नतीजा होता है, यह हिंदुस्तान में विदेशों से लौटने वालों को देखकर समझना चाहिए, और तब्लीगी जमात से फैली तबाही देखकर समझना चाहिए। छत्तीसगढ़ का कड़ाई को ढीला करना, और दारू शुरू करना बहुत भारी पड़  सकता है।
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 3 अप्रैल 2020

उनके लिए नौ मिनट पूनम का चाँद देखना

संपादकीय
3 अप्रैल 2020


फिर आकाशवाणी हुई है कि 5 तारीख को रात 9 बजे लोग अपने दरवाजों पर आकर, अपनी बालकनी से, 9 मिनट तक दिया मोमबत्ती, टॉर्च, मोबाइल फोन, किसी भी से रौशनी करें। 130 करोड़ हिंदुस्तानियों के एक साथ ऐसा करने से देश की एकता सामने आएगी और देश अँधेरे से लड़ सकेगा। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आसमान से ऐसा कहते हैं, तो देश में करोड़ों लोग उन्हें जरूर ही मानेंगे, और ऐसी रौशनी करेंगे। अब इस मुद्दे पर लिखते हुए एक दिक्कत आ रही है कि बात सीधी-सपाट लिखी जाए, या व्यंग्य में लिखी जाए, या प्रतीकों में लिखी जाए, जिनमें कि मोदी इन दिनों समाधान दे रहे हैं ?

चलिए, सीधे शब्दों में ही सही। मोदी ने कुछ दिन पहले थाली-ताली, शंख-घंटी बजवाये थे। दिन भर जनता कर्फ्यू का सन्नाटा था, और शाम में सड़कों पर खूब जश्न मनाया गया था। इसलिए इस बार मोदीजी ने इस बार घर की देहरी से बाहर जाने मना कर दिया। अब सवाल यह है कि आज सुबह 9 बजे देश के लोग प्रधानमंत्री से क्या सुनना-जानना चाहते थे? देश में जगह-जगह से डॉक्टर लिख रहे हैं कि उन्हें मास्क नहीं मिल रहे, दस्ताने नहीं मिल रहे, सोने का वक्त नहीं मिल रहा, और अभी दो दिन से तो कुछ धर्मांध मुस्लिम, अस्पतालों में उन पर थूक भी रहे हैं। इंदौर में तो मुस्लिम मोहल्ले में पहुंचे स्वस्थ्य कर्मचारियों, डॉक्टरों पर जमकर पथराव हुआ। पूरे देश का मीडिया इन ख़बरों से भरा पड़ा है कि किस तरह देश भर से मजदूर अपने गावों के सैकड़ों-हज़ार किलोमीटर के पैदल सफर पर निकल पड़े हैं, किस तरह रास्तों पर मर रहे हैं। उन्हें न दवा हासिल है, न जांच, ना इलाज, और तो और उनके पास खाने और सर छुपाने को भी नहीं है। न रोजगार है, न गांव है, न परिवार साथ में है। ऐसे करोड़ों लोग अपने ही देश में अजनबी हैं और शरणार्थी हैं। जिस प्रदेश में फंसे हैं, वहां कोई इंतजाम हो गया तो ठीक है वरना कोरोना के पहले भी मौत तो है ही। लोगों के मन में लॉकडाउन के बाद जि़ंदा रहने के लिए फिक्र है, क्योंकि देश के करोड़पतियों और अरबपतियों के मन में भी आने वाले महीनों के लिए फिक्र है, बेघर, बेबस, बेरोजगार के मन में तो दहशत है ही। दहशत के इस अँधेरे को कौन सा दिया मिटाएगा?

नरेंद्र मोदी की तरकीबें बहुत आसान हैं, नोटबंदी के एटीएम पर खड़े हैं, भूख लगी है, तो कभी तिरंगा, कभी राष्ट्रवाद, कभी भारतमाता, कभी कारगिल की शहादत, कभी 130 करोड़ लोगों की सामूहिक ताकत का झुनझुना लोगों को थमा देते हैं, और उनके भक्त थाली पीटकर अपनी सामाजिक जवाबदेही पूरी मान लेते हैं, मान लेते हैं कि कोरोना को भागने के लिए उन्होंने काफी कर लिया। नरेंद्र मोदी खुद बहुत चतुर हैं, इसलिए हम यह तो नहीं मानते कि वे खुद भी इस खुशफहमी में पड़ जाते होंगे कि उन्होंने कोरोना से लडऩे के लिए, 130 करोड़ लोगों की जरूरत के लिए, सब कुछ कर दिया है। हम उनको बहुत समझदार मानते हैं, और इसलिए मानते हैं कि वे खुद अपनी ऐसी बात में फंसने वाले नहीं हैं, वे ऐसी धारणा के शिकार नहीं हो सकते। उनको जन्नत की हकीकत अच्छी तरह मालूम है।

आज देश के 130 करोड़ लोगों को किस एकता की जरूरत है? लोग तो एक ही हैं, एकता की जरूरत है तो खुद प्रधानमंत्री को है कि ऐसी मुसीबत के वक़्त वे राज्यों को साथ लेकर चलने की एकता दिखाएँ। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अभी कुछ इंटरव्यू में कहा है कि प्रधानमंत्री लॉकडाउन के पहले मुख्यमंत्रियों से सलाह-मशविरा कर लेते तो उस पर बेहतर अमल हो पता। दिक्कत के बीच इस बात को लोग आलोचना भी मान सकते हैं, लेकिन अगर मुसीबत के वक्त भी हम आईना देखने से इंकार कर देंगे, तो आज तो देवताओं ने भी ताली-घंटी, शंख-आरती, सुनना बंद कर दिया है, इंसानों को भी आत्मप्रशंसा सुनना बंद कर देना चाहिए। आज का वक्त तो कड़वी हकीकत को देखने और मानने का है। बाकी वक्त तो निर्मल बाबा भी आसान समाधान बता देते हैं कि फलां दिन, फलां बजे, फलां रंग के कुत्ते को रोटी देने से कृपा बरसेगी। देश के 130 करोड़ लोग तो वैसे भी एक हैं, अपने घरों में हैं, कहीं कोई दंगा नहीं हो रहा है। जब देश के 130 करोड़ लोग एक मुसीबत को झेल रहे हैं, तो वे वैसे भी एक साथ हैं। ऐसे में बंद मंदिरों के देश में घरों की देहरी पर एक नए किस्म की रौशनी से क्या हासिल होगा? किसे हासिल होगा? फिर मोदीमुग्ध देश यह खबरें भी पढऩे से इंकार कर रहा है कि मोदी की थाली-चम्मच, घंटी की आईडिया उनसे बहुत दिन पहले इटली और स्पेन में इस्तेमाल हो चुकी थी, और अब रौशन-खय़ाल भी एक पखवाड़े से अधिक पुराना है, इटली का ही है, जिसके लोगों ने कोरोना-ग़मगीन माहौल को हराने के लिए यह तरकीब आजमाई थी। पूरी दुनिया में प्रचारित ऐसे प्रयोगों को मोदी क्यों दुहरा रहे हैं? 

प्रतीकों की बातें धर्म, आध्यात्म, और बाजीगरी दिखने वालों को तो माकूल लगती हैं, लेकिन इस सबसे बड़ी मुसीबत के बीच हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री ठोस बात करते ही सुहाता। मोदीजी की खासियत यही है कि वे सीधे मुद्दे की बात नहीं करते, सीधे समाधान की बात भी नहीं करते, वे दरअसल सीधे आँखों में आँखें डालकर भी बात नहीं करते, वे सब कुछ पूर्वनियोजित, प्रायोजित, और सुनियोजित करते हैं। उनके पास अनायास सवालों की गुंजाईश नहीं है, सायास सवालों की ही जगह है जिनके जवाब भी सवाल पूछते टीवी पत्रकार पन्नों पर लेकर बैठते हैं, कैमरों पर दिखते भी हैं। ऐसे में देश के इस मुकाम पर भी प्रधानमंत्री करोड़ों बेघर, बेबस, शरणार्थियों के लिए अगर घरबार वालों के दरवाजों पर रौशनी में कोई रास्ता देखते हैं, तो यह अपने शब्दों पर मुग्ध नेता की पहचान है।

जो हफ्ते भर से पैदल सफर के बीच कहीं पड़े हैं, तो अस्पतालों में लोगों को बचाते हुए जिनकी खुद की जिंदगी खतरे में है, जो बिन तैयारी, बिन योजना के लॉकडाउन की वजह से राज्यों में करोड़ों मजदूरों की दिक्कत झेल रहे हैं, उन लोगों को मोदी से कुछ तो ठोस बात करने की उम्मीद थी। लेकिन भूखे देश को गोल रोटी की जरूरत पर मोदी ने नौ मिनट तक पूनम का चाँद देखने कह दिया है। 

(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

दीवारों पर लिक्खा है, 2 अप्रैल

दीवारों पर लिक्खा है, 1 अप्रैल

पासपोर्ट और राशन कार्ड के बीच सरकारी तौर-तरीकों से खिंच गई है एक गहरी खाई

संपादकीय
2 अप्रैल 2020


सच की लड़ाई बड़ी मुश्किल होती है। उसे झूठ से लडऩा होता है, जो कि बड़ा आकर्षक होता है, सनसनीखेज भी होता है, और लोगों के दिमाग पर जोर भी नहीं डालता। आज हिंदुस्तान में जब लोग चारों तरफ देश भर में बुरी तरह फंस गए बेबस, बेघर मजदूरों को देख रहे हैं, जो कि मजदूरी पाए बिना भी कारखाने, कंस्ट्रक्शन की जगहें, कारोबारी की जगहें छोड़कर रातों-रात सैकड़ों या हजार से भी अधिक किलोमीटर से पैदल सफर पर रवाना होने को मजबूर हुए, तो जाहिर है कि इस नौबत के लिए सरकार की आलोचना तो होगी ही। फिर यह तो वही सरकार है न जिसने दुनिया भर में बिखरे हिन्दुस्तानियों को विशेष विमान भेज-भेजकर वापिस बुलवाया, उन्हें मुफ्त में लेकर आयी। और यह तब हुआ जब जाहिर तौर पर कोरोना दूसरे देशों से हिंदुस्तान आने वाले लोगों के साथ आने की पुख्ता मेडिकल खबर थी। हिन्दुस्तानियों को लौटने का हक़ सौ-फीसदी था, लेकिन जगह-जगह भूख या कमजोरी से मर चुके दर्जनों पैदल मजदूरों के तबके में यह रंज तो जायज है कि पासपोर्ट वाले लोग बीमारी लेकर आये और राशन कार्ड वालों पर लाद दी। प्रदेश से लौटकर आये, दावतों में हिस्सा लिया, सरकारी चेतावनी के खिलाफ घूमे-फिरे, और बीमारी है कि गरीबों को बेरोजगार, बेघर, बेबस कर देने वाला लोकडाउन लड़वाकर मानी है। उसके बाद फिर आज तो ये गरीब बेघर राशन कार्ड वाले भी नहीं रह गए हैं, कार्ड अगर है भी तो किसी प्रदेश का, काम किसी और प्रदेश में कर रहे थे, और आज बीच रस्ते किसी और प्रदेश में फंस गए हैं। ऐसे बिन राशन कार्ड वालों को पासपोर्ट वाले लोग खटक रहे हैं तो उसमें कोई बेइंसाफी तो है नहीं। पासपोर्ट वालों की इमारतों में एयर इंडिया के पायलटों, विमान कर्मचारियों, डॉक्टरों, नर्सों को निकलने का काम भी चल रहा है, इसलिए आज इस देश में सरकार के कामों से पासपोर्ट और राशन कार्ड के बीच एक खाई तो खिंच ही गई है। 
ऐसे में जब लोग संचितों के मुकाबले वंचितों के हक़ की बात कर रहे हैं, तो उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। जऱा सी एक चूक किसी को किसी धर्म का विरोधी साबित कर सकती है, जऱा सी चूक सरकार विरोधी साबित कर सकती है। मीडिया के पेशेवर लोगों को और भी सावधान रहना चाहिए क्योंकि वे एक हड़बड़ी के मोर्चे पर हैं, खुद आँखों देखी कम हो गयी है, और दूसरों के मोहताज अधिक हो गए हैं, सूचना के लिए, खबरों के लिए। ऐसे में गरीब के हक की बात करते हुए कोई चूक हो जाये तो वह पहाड़ सी बढ़ाकर सरकार-विरोधी करार दी जा सकती है। 
देश में कोरोना मौतों का आंकड़ा पैदल-मजदूरों के आंकड़ों से बहुत अधिक नहीं बचा है, बस यही है कि सूनी रेल पटरियों पर चलते हुए मजदूर के मरकर गिर जाने की खबर, बड़े अस्पतालों में कोरोना-मौतों के मुकाबले बहुत देर से आती है। लेकिन इस देश को समझना चाहिए कि मुसीबत के इस दौर को लेकर लोगों की जो इंसानियत सामने आ रही है, और जो हैवानियत सामने आ रही है, वह अच्छी तरह दर्ज हो रही है। इस दौर में सच और झूठ के बीच की लड़ाई भी इतिहास में दर्ज हो रही है। सच को पूरी ईमानदारी के साथ सच पर टिके रहना चाहिए, क्योंकि झूठ के तो बहुत से यार होते हैं, सच तकऱीबन अकेला होता है। फिर यह भी है कि सच की इज्जत का जनाजा निकालने के लिए बहुत सी ताकतें लगी ही रहती हैं। 
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM

ऐसे मूढ़ मजहबी लोगों को रियायत किस बात की दें ?

संपादकीय
1 अप्रैल 2020


दो दिनों से दिल्ली में मुस्लिमों के एक संप्रदाय के केंद्र में दुनिया भर से जुटे हजारों लोगों की वजह से पूरे हिंदुस्तान में कोरोनाग्रस्त लोग जिस तरह बिखर गए हैं, उसे लेकर कई किस्म की बहसें छिड़ गई हैं। बहुत से लोग यह लिख रहे हैं कि कोरोना को मुस्लिम रंग दिया जा रहा है, और मुस्लिमों पर कोरोना फैलाने की तोहमत डाली जा रही है। ऐसा लिखने वाले बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो कि रोजाना मोदी को राहुल गाँधी का 12 फरवरी का ट्वीट याद दिला रहे हैं जिसमें राहुल ने प्रधानमंत्री को कोरोना के खतरे से आगाह किया था और तैयारी करने कहा था। राहुल को जो खतरा 12 फरवरी को दिख रहा था, वह दिल्ली में और बहुतों को दिख रहा था, और उस खतरे के बीच 1 से 12 मार्च के बीच दिल्ली के इस मुस्लिम संस्थान में हजारों लोगों का जमावड़ा करना कहाँ की समझदारी थी? कौन सा मजहब कहता है कि अपने लोगों की, बाकी दुनिया की जिंदगी खतरे में डालकर ऐसी मजहबी बैठक करो, मजहब पर चर्चा करो? अगर धर्मगुरु बनने वाले लोग इतने ही मूढ़ दिमाग के हैं, तो वे अपने धर्म के लोगों को कैसा बना रहे होंगे ?
फिर यह कौन सी बात होती है कि जब हिन्दू या दूसरे धर्म के लोग धर्म के नाम पर गुंडागर्दी करें तो उस बारे में तो लिखो, लेकिन मुस्लिमों के बारे में ना लिखो! मुस्लिमों को इस किस्म की रियायत दिलाने वाले उन्हीं का सबसे बड़ा नुकसान कर रहे हैं। अगर उनके बीच कोरोना फैलता है, फैल चुका है, मौतें हो रही हैं, तो पहला नुकसान किसका हो रहा है ? मुस्लिमों का, उनके परिवारों का, उनकी बिरादरी का। बाद में अगल-बगल के दूसरे धर्मों के लोग भी मारे जायेंगे। आज कोरोना के दुनिया भर में फैले खतरे, चारों तरफ गिरती लाशों के बीच अगर किसी को हजारों लोगों की भीड़ जुटाकर धर्म-चर्चा जरूरी लग रही है, तो यह भीड़ गोबर-गोमूत्र खिलाने-पिलाने वाले लोगों से बेहतर कैसे हो गई? कोई अगर अल्पसंख्यक होने के नाते रियायत का हक़दार है, तो वह रियायत अक्ल की होनी चाहिए, पाखंड की नहीं। फरवरी महीने के आखिर तक 3 हजार कोरोना-मौतें हो चुकी थीं, दुनिया भर से खबरें आ रहीं थीं, और हिन्दुस्तान में भी खतरा सर पर था। फिर भी इतना बड़ा धार्मिक-बहस का जमघट एक पखवाड़े तक लगाना, और फिर उसके भी हफ्ते भर बाद के लॉकडाउन तक हजारों की भीड़ का टिके रहना कौन सी धार्मिक समझदारी थी? फिर तोहमत सरकार पर कि लोकडाउन की वजह से लोग लौट नहीं पाए?
नहीं दोस्तों, किसी भी धर्म या मजहब के जाहिलों को ऐसी कोई रियायत नहीं दी जा सकती कि वे पूरी दुनिया पर खतरा फैलाएं, और अपने को मानने वाले मूढ़ लोगों को भी मार डालें। कई बरस पहले अमरीका में एक स्वघोषित गुरू ने अपने बनाये संप्रदाय में लोगों की सामूहिक आत्महत्या करवाने की कोशिश की थी और शायद वहां फौज को जाकर वह खेल खत्म करना पड़ा था। हिंदुस्तान में भी हरियाणा, पंजाब में हमने ऐसे सम्प्रदायों का हाल देखा है। दिल्ली में इस जमात के डेरे में क्या फर्क है?
कुछ लोग यह भी लिख रहे हैं कि आज दिल्ली में ही दसियों लाख मजदूर बेघर हैं, और वे भी कोरोना के शिकार हो सकते हंै, देश भर में कोरोना लेकर जा सकते हैं, इन लोगों का तर्क है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खड़ी की हुई इस मुसीबत को पहले देखें, जो कि ज्यादा बड़ा खतरा है। इससे बड़ा मूर्खता का कोई रिश्ता नहीं जोड़ा जा सकता। नरेंद्र मोदी ने एक भयंकर गलती कर दी, तो क्या अब उसके मुकाबले मुस्लिमों की इस जमात को भी उसके टक्कर का गलत काम करने देना सांप्रदायिक बराबरी होगी? अरे, आज तो हर तरफ से बचाव की जरूरत है। मोदी से तो इतिहास निपट लेगा, उसके जवाब में मुस्लिमों को मारने का सामान तो मत फैलाओ। बहुत से लोगों को बीते कल और आज का हमारा लिखा मुस्लिम-विरोधी लग सकता है। लेकिन ऐसे या कैसे भी मुस्लिम धर्मांधों को बचाने की हमारी कोई हसरत नहीं है, बल्कि उनके झांसे में जो कमअक्ल मुस्लिम मारे जा रहे हैं, उन्हें खबरदार करने की नीयत जरूर है कि ऐसी कोरोना मौत किसी भी किस्म से अल्लाह की खिदमत नहीं है, उसकी इबादत नहीं है। जब चारों तरफ आग लगी हो तो सामूहिक गटरमाला जपते उसके बीच बैठे रहना धर्म भी नहीं है। किसी लोकतंत्र में अल्पसंख्यक होने से किसी धर्म को ख़तरा फैलाने का हक नहीं दिया जा सकता। जिन्होंने कानून तोड़ा है, उन सबको जेल भेजना चाहिए, वे इबादत तो वहां से भी कर ही सकते हैं। एक बैरक में रखें तो वहां धर्म-चर्चा भी करते रहेंगे। बाकी सवाल देश के करोड़ों मजदूरों को मुसीबत में झोंक देने का है, तो उसके खिलाफ तो हम रोज लिख ही रहे हैं।
(Daily Chhattisgarh) 

5:00 PM