मीडिया-मालिक के किस गैरमीडिया कामकाज पर उसे हिफाजत हासिल हो?
मुम्बई में आज सुबह से हडक़म्प मचा हुआ है क्योंकि रिपब्लिक टीवी के मालिक अर्नब गोस्वामी को पुलिस ने आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की एक शिकायत पर गिरफ्तार किया है। अर्नब गोस्वामी का मामला इसलिए कुछ अधिक तूल पकड़ रहा है कि वे देश में सत्तारूढ़ भाजपा के भक्त हैं, रात-दिन सोनिया गांधी और कांग्रेस से नफरत पर जिंदा रहते हैं, वे पड़ोस के पाकिस्तान से जंग की भरसक कोशिश करते हैं, हिन्दुस्तान के भीतर साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के लिए रात-रात जागते हैं, और खुद को नापसंद लोगों के बारे में आमतौर पर ऐसी जुबान में अपने टीवी पर रात-दिन चीखते हैं जिस जुबान को लोग सडक़छाप कहकर बदनाम करते हैं। हमने तो सडक़ पर किसी आम इंसान को कभी इतनी नफरत फैलाते नहीं देखा है। अर्नब की गिरफ्तारी इस वजह से भी अधिक तूल पकड़ रही है कि पिछले महीनों में उनका महाराष्ट्र की शिवसेना की अगुवाई वाली राज्य सरकार से बहुत बुरा टकराव चल रहा है, मुम्बई पुलिस के साथ उनका कुकुरहाव चल रहा है। ऐसे में उनकी गिरफ्तारी के कुछ मिनटों के भीतर यह जायज ही था कि केन्द्र सरकार के बड़े-बड़े कई मंत्री उन्हें बचाने के लिए ट्विटर पर टूट पड़े।
अब सवाल यह है कि आपातकाल में मीडिया पर हुए हमले से इसकी तुलना करना जो शुरू हो गया है, क्या वह तुलना सचमुच जायज है? आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का यह मामला एक इंटीरियर डेकोरेटर के भुगतान का है। उसकी आत्महत्या की चिट्ठी में लिखा मिला था कि अर्नब गोस्वामी ने उसके कई करोड़ रूपए का भुगतान नहीं किया, और उसी तकलीफ में वह आत्महत्या कर रहा है। खुदकुशी करने वाले की मां ने भी आत्महत्या कर ली थी। इंटीरियर डेकोरेटर की पत्नी ने पुलिस में 2018 में रिपोर्ट दर्ज कराई थी और मृतक की चिट्ठी भी लगाई थी जिसमें अर्नब और दो दूसरे लोगों द्वारा 5.04 करोड़ रूपए का बकाया भुगतान न करने की बात लिखी थी, और आर्थिक तंगी की वजह से आत्महत्या करने की।
अब सवाल यह उठता है कि क्या अर्नब गोस्वामी के हक आत्महत्या करने को मजबूर हुए मां-बेटे के, या उनके बाद रह गए लोगों के हक से अधिक हो सकते हैं? क्या एक टीवी चैनल के मालिक और उसकी जोर-जोर से चीखकर बोलने की ताकत के मुकाबले दो मुर्दों की जुबान, और उनके पीछे जिंदा बाकी परिवार की जुबान बंद कर देना जायज होगा? क्या देनदारी के विवाद के बाद हुई आत्महत्या पर इसलिए कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए कि देनदार एक टीवी चैनल का मालिक है, जो अपने को जर्नलिस्ट भी बताता है? आज हिन्दुस्तान में श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन खत्म हो चुका है जो कि आजादी के बाद से अपने मरने तक इस देश में पत्रकारिता के नीति-सिद्धांत और पैमाने तय करता था। अब उसकी जगह जगह-जगह प्रेस क्लब बने हैं, या एडिटर्स गिल्ड जैसे दूसरे संगठन। एडिटर्स गिल्ड ने भी आज एक बयान जारी करके इस गिरफ्तारी का विरोध किया है।
हम अभी इस मामले में अपनी कोई राय इस पहलू पर देना नहीं चाहते कि देनदारी का झगड़ा जायज था या नाजायज। लेकिन इतना तो है कि दो आत्महत्याओं के बाद मिली ऐसी चिट्ठी के बाद कोई कानूनी कार्रवाई तो होनी थी, और किसी को कानूनी कार्रवाई से इस वजह से तो छूट मिल नहीं सकती कि वह अपने को पत्रकार बता रहा है, या टीवी चैनल का मालिक है, या उसका सरकार के साथ कोई झगड़ा चल रहा है। देश में अगर अखबार या बाकी मीडिया के लोग ईमानदारी से अपना काम करते हैं, तो राज्य या केन्द्र की सरकारों के साथ उनका कोई न कोई झगड़ा तो हो ही सकता है। लेकिन क्या ऐसे में उनके खिलाफ दूसरी किसी भी शिकायत पर कोई कार्रवाई करना नाजायज होगा?
यह बात महज महाराष्ट्र की नहीं है, देश के बहुत से प्रदेशों में पत्रकारों पर तरह-तरह की कार्रवाई चल रही है। छत्तीसगढ़ में भी बहुत से पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज हुई है। ऐसे मामलों में यह समझने की जरूरत है कि किसी पत्रकार पर कार्रवाई पत्रकारिता की वजह से हुई है, या पत्रकारिता से परे की किसी वजह से हुई है? इस देश में श्रमजीवी पत्रकारों में शुमार के लिए यह जरूरी होता था कि उसकी आय का कोई और जरिया न हो। केन्द्र और बहुत से राज्यों में ऐसे कई नियम हैं जो कि अखबारों के मैनेजमेंट देखने वाले लोगों को मान्यता प्राप्त पत्रकार बनने से रोकते हैं। जाहिर है कि अखबार और बाकी मीडिया के कारोबार में लगे लोगों में भी उनके पत्रकार होने, और गैरपत्रकार मीडिया कर्मचारी होने पर फर्क किया जाता है। ऐसे में मीडिया के मालिक, या मैनेजमेंट में दखल रखने वाले और साथ-साथ समाचार-विचार का काम भी देखने वाले लोग पत्रकारिता से परे के अपने सौदों के लिए कितनी सुरक्षा के हकदार माने जा सकते हैं? आज देश भर में बहुत सी जगहों पर ईमानदार और मेहनतकश, पेशेवर पत्रकारों के खिलाफ भी ज्यादती हो रही है, लेकिन बहुत सी जगहों पर पत्रकारों या दूसरे मीडियाकर्मियों के गैरपत्रकारीय कामकाज की वजह से उन पर जुर्म दर्ज हो रहे हैं, और उनके वैसे कामकाज को अगर मीडिया अपने ऊपर ढोने का शौक पालेगा, तो मीडिया की रही-सही जरा सी बाकी इज्जत भी मिट्टी में मिल जाएगी। अर्नब गोस्वामी के केस की सच्चाई जो होगी उसमें उनको अपना पक्ष रखने में सुप्रीम कोर्ट तक बड़े-बड़े वकील हासिल हैं, और ऐसे जज भी जो कि आधी रात उनका केस सुनने तैयार हो जाते हैं। इसलिए कानूनी बचाव उनके सामने कोई समस्या नहीं है। उनकी देनदारी के किसी झगड़े की कोई समस्या है, तो उससे एडिटर्स गिल्ड अपने आपको किस तरह जोड़ रहा है, उसे वह जाने।
जिस तरह किसानों की आत्महत्या के मामले में बहुत सी सरकारें हाथ झाड़ लेती हैं कि वह गैरकिसानी वजहों से की गई आत्महत्याएं हैं। अब किसी किसान का पड़ोस की किसी दूसरी शादीशुदा महिला से प्रेम या देहसंबंध रहा हो, और उसका विवाद होने के बाद वह आत्महत्या कर ले, तो इसे किसानी-कर्ज की आत्महत्या से अलग गिनना ठीक होगा। इसी तरह मीडिया के कर्मचारी या मालिक के गैरमीडिया कामकाज पर हुई कार्रवाई को कानूनी नजरिए से ही देखना ठीक होगा, वरना मीडिया से जुड़े संगठन अपने से जुड़े एक इंसान के हिमायती होकर उसके कथित शिकार मृतक के साथ ज्यादती ही करेंगे।
अभी तक इस मामले में जो जानकारी सामने आई है, वह किसी समाचार या टेलीकास्ट को लेकर की गई कानूनी कार्रवाई नहीं बता रही, और यही बता रही है कि यह आत्महत्या के मामले से जुड़ी हुई गिरफ्तारी है। मीडिया के संगठनों को, और मीडियाकर्मियों को यह तय करना होगा कि वे अपने पेशे और कारोबार के मालिकों और कर्मियों के कितने और कैसे-कैसे गैरमीडिया कामकाज के साथ खड़े रहेंगे। और जब इस मामले पर बात चल ही रही है, तो यह भी बात हो जानी चाहिए कि एडिटर्स गिल्ड इस देश में मीडिया के नाम पर फैलाई जा रही नफरत और गंदगी के बारे में क्या सोचता है? क्या जिन लोगों को बचाने के लिए वह आज आगे आया है, क्या महज उन्हें बचाना ही एक पेशेवर संगठन के रूप में उसकी जिम्मेदारी है, या मीडिया के नाम पर जो हिंसा, बेइंसाफी, नफरत और गंदगी फैलाई जा रही है, उस पर भी उसे मुंह खोलना चाहिए? देश का कोई भी हिस्सा हो, अखबारनवीस या दूसरे किस्म के मीडियाकर्मी, उनके कामकाज की जिम्मेदारी और जवाबदेही एक सीमा तक ही उनके हिमायती पेशेवर संगठनों को लेनी चाहिए, उनकी दीगर गतिविधियों पर उन्हें बचाते हुए ऐसे पेशेवर संगठन अपनी साख खो बैठने का खतरा उठाएंगे, उठा रहे हैं।
ईंट सरीखे आंकड़ों से सरकारें गढ़ रही हैं अपनी पसंद की इमारतें
पिछले एक-दो महीने में दुनिया के तमाम देशों से, अंतरराष्ट्रीय संगठनों से, भारत के भी देश-प्रदेश से आर्थिक आंकड़े सामने आए हैं। उनसे एक सुनहरी सी तस्वीर सामने आ रही है। छत्तीसगढ़ में आज के एक आंकड़े से पता लगता है कि जमीन की रजिस्ट्री में पिछले बरस के अक्टूबर महीने के मुकाबले इस महीने कितना अधिक टैक्स मिला है। भारत सरकार के बहुत तरह के आंकड़े बतलाते हैं कि पिछले कुछ महीनों के मुकाबले जीएसटी कलेक्शन कितना बढ़ा है, या औद्योगिक उत्पादन कितना बढ़ा है। बहुत सी खबरों में तो लापरवाही से इस बात को भी छोड़ दिया जाता है कि यह तुलना कब से हो रही है, पिछले बरस के इन्हीं महीनों से हो रही है, या अभी पिछले कुछ महीनों से हो रही है। केन्द्र और राज्य सरकारें अपने-अपने हिसाब से इन आंकड़ों को पेश कर रही हैं, और अपनी मनचाही तस्वीर दिखा रही हैं।
आंकड़ों का विश्लेषण आसान नहीं होता है। उनके साथ कोई विशेषण नहीं होते हैं, उनकी अपनी कोई समझ नहीं होती है। वे ईंट की तरह होते हैं जिनसे मंदिर भी बन सकता है, मजार भी, और शौचालय भी। लोग, और आम लोग नहीं, मीडिया के लोग या अर्थशास्त्री, सरकारें और दूसरे आर्थिक संगठन आंकड़ों का विश्लेषण करके जब एक तस्वीर पेश करते हैं, तो उससे कुछ सही नतीजा मालूम होने की उम्मीद होती है, लेकिन वैसा कई बार हो नहीं पाता है।
अब आज छत्तीसगढ़ में ऑटोमोबाइल की जमकर बिक्री के आंकड़ों से सरकार भी खुश है कि उसे टैक्स मिल रहा है। इन आंकड़ों को कई तरह से समझने की जरूरत है। पहली बात तो यह समझनी चाहिए कि पिछले कई महीनों से बंद चल रहे बाजार के बाद अब अगर त्यौहार के वक्त पर, नवरात्रि से लेकर दशहरे और दीवाली तक दुपहिया और चौपहिया अधिक बिक रहे हैं, तो यह पिछले महीनों की बकाया खरीदी भी है। इस खरीदी को पिछले बरस के त्यौहारी सीजन या इन महीनों की खरीदी से तुलना करना ठीक नहीं होगा क्योंकि पिछले बरस तो त्यौहारी सीजन के पहले के महीनों में भी बिक्री हुई थी जो कि इस बरस नहीं हो पाई थी, और लोगों की बकाया खरीदी अब हो रही है। इसलिए आज अगर बिक्री को लेकर लोग यह सोच रहे हैं कि अर्थव्यवस्था सुधर गई है, तो इस महीने के आंकड़े ऐसी गलत तस्वीर दिखा रहे हैं। लॉकडाऊन और कोरोना के चलते, आर्थिक मंदी और बेरोजगारी के चलते, ठप्प कारोबार की वजह से यह मुमकिन ही नहीं है कि लोगों की खरीदी इतने जल्दी पटरी पर आ सके, उनके पास खरीदी की ताकत लौट सके। इसे पिछले महीनों के बकाया के साथ जोडक़र ही सही नतीजा निकाला जा सकता है।
आंकड़ों की ईंटों से मनचाही इमारत बनाई जा सकती है। हिन्दुस्तान में आज हकीकत यह है कि खोई हुई नौकरियां लौट नहीं रही हैं, क्योंकि गया हुआ कारोबार ही नहीं लौट रहा है। और यह हाल सिर्फ हिन्दुस्तान का हो ऐसा भी नहीं है, दुनिया के सबसे संपन्न और विकसित देशों में भी आर्थिक संकट छाया हुआ है, और लोगों के जिंदा रहने में मुश्किल आ रही है। महाराष्ट्र के एक बड़े अखबार समूह ने बहुत से लोगों को नौकरी से निकाल दिया, और ऐसा करने वाला यह अकेला मीडिया हाऊस नहीं है, चारों तरफ ऐसा ही हुआ है। कुछ रहमदिल मालिकों ने कर्मचारियों को निकाला नहीं, तो उनकी तनख्वाह आधी तक कर दी है, उनके काम के घंटे बढ़ा दिए हैं। महाराष्ट्र के जिस अखबार की यहां चर्चा की जा रही है, उसकी छंटनी के बारे में दिल्ली की एक समाचार वेबसाईट ने खबर पोस्ट की तो उसे अखबार ने 65 करोड़ रूपए का मानहानि का नोटिस भेजा है। अब यह एक नोटिस तो ठीक है, लेकिन देश भर में बड़ी अदालतों से लेकर छोटी अदालतों तक के जूनियर वकीलों ने अदालत और सरकार के सामने अपील की है कि उनके भूखों मरने की नौबत आ गई है, इसलिए उनकी आर्थिक मदद की जाए। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई भी हुई है, लेकिन सवाल यह है कि वकीलों के किसी संगठन के पास जमा रकम से इनकी मदद चाहे हो जाए, लेकिन देश में तो कोई दूसरे पेशेवर संगठन ऐसे नहीं हैं जो अपने सदस्यों की मदद करने की हालत में हों। आज जब कोर्ट-कचहरी नहीं चल रहे हैं, आम दिनों के मुकाबले एक चौथाई मामले वीडियो सुनवाई से हो रहे हैं, तो लोगों की कमाई तो गिर ही गई है। और तो और रावण बनाने वाले तक भूखों मर रहे हैं कि दर्जन भर की जगह अब एक-दो रावण ही बने हैं, यही हाल गणेश और दुर्गा की प्रतिमाओं का रहा, और यही हाल तकरीबन तमाम कारोबार का है।
ऐसे में हिन्दुस्तान के लोगों को बिक्री के या निर्यात के, या औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों को देखकर किसी सरकारी झांसे में नहीं आना चाहिए क्योंकि यह हकीकत नहीं है, और आम लोगों के साथ दिक्कत यह है कि वे खबरों के भीतर की बारीक जानकारी तक भी पहुंचना नहीं चाहते, और अब वे टीवी स्क्रीन पर नीचे चलती हुई पट्टी को ही पूरा सच मानने की हड़बड़ी में रहते हैं। ऐसे में बहुत से लोगों को यह धोखा हो सकता है कि हालात सुधर रहे हैं, जबकि सच यह है कि अभी न कोरोना का खतरा टला है, न लॉकडाऊन के घाटे से लोग उबर पाए हैं, और ऐसे कोई संकेत नहीं है कि लोग मार्च के पहले की अपनी हालत तक भी पहुंच पाएंगे। सच तो यह है कि मार्च में जब लॉकडाऊन शुरू हुआ तब तक भी हिन्दुस्तानी आर्थिक मंदी ऊंचाई पर थी, और लोगों को उसके असर का पूरा अहसास हो नहीं पाया था। इन महीनों में अंधाधुंध तबाही हुई है, और ऐसी कोई वजह नहीं है कि रोजगार लौटे बिना, कारोबार लौटे बिना, नौकरियां लौटे बिना बाजार में जमकर खरीदी होने लगे। आज की बिक्री पिछले महीनों की बकाया बिक्री भी है, त्यौहारी बिक्री भी है, इस बात को भूलना अपने आपको धोखा देना होगा। सरकार, और हो सकता है बाजार भी, अंकों की बाजीगरी करके लोगों को एक खुशफहमी में बनाए रखना अपनी खुद की हस्ती बचाए रखने के लिए जरूरी समझ रहे हों।
मंदिर में जाकर नमाज पढऩा निहायत गैरजिम्मेदारी का...
मथुरा के एक मंदिर में दो मुस्लिम नौजवानों ने भीतर जाकर वहां के आंगन में नमाज पढ़ी, और उनकी तस्वीरों को एक मुस्लिम-मामले के वकील ने फेसबुक पर पोस्ट किया। कुछ हिन्दुओं और मंदिर में इसके खिलाफ पुलिस रिपोर्ट की और अब इस पर जुर्म दर्ज किया गया है। यह पूरा सिलसिला मासूमियत से परे का लग रहा है। नमाज पढऩे वाले मुस्लिम तो फुटपाथ पर, रेलवे प्लेटफॉर्म पर नमाज पढ़ लेते हैं, किसी बाग-बगीचे में पढ़ लेते हैं, लेकिन किसी धर्मनगरी के मंदिर में जाकर इस तरह नमाज पढ़ें, यह बात कुछ अटपटी है। खासकर आज के तनाव में जहां उत्तरप्रदेश में ही कई मंदिर-मस्जिद विवाद अदालत में चल रहे हैं, और बाबरी मस्जिद पर अदालत के फैसले के बाद एक अलग किस्म का तनाव भरा सन्नाटा भी चल रहा है।
आज हिन्दुस्तान में अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच रिश्ते वैसे तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन अधिकतर धर्मों में कुछ ऐसे बवाली नेता भी हैं जो ऐसी किसी भी बात को लेकर बखेड़ा खड़ा करने की ताक में रहते हैं। उत्तरप्रदेश में पिछले दो-चार दिनों से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह धमकी भी चल रही है कि ‘लव जेहाद’ के मामले में न थमे तो ऐसा करने वाले लोगों का राम नाम सत्य कर दिया जाएगा। कई लोग इसे एक संवैधानिक शपथ लेकर ओहदे पर आए व्यक्ति की गैरकानूनी धमकी भी बतला रहे हैं क्योंकि भारत की जुबान में राम नाम सत्य के मायने एकदम साफ हैं। ऐसे प्रदेश में इस तरह का बवाल न तो मुस्लिमों के साम्प्रदायिक सद्भाव की तरह देखा जाएगा, और न उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखाना हिन्दू संगठनों की ज्यादती कहलाएगी।
जिन्हें साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए काम करना होता है, उनके तेवर अलग होते हैं। हिन्दुस्तान में सैकड़ों बरस से ऐसे सैकड़ों मुस्लिम संत और कवि हुए हैं जिन्होंने राम और कृष्ण की आराधना में जाने कितना लिखा है। दर्जनों ऐसे मशहूर कव्वाल हैं जो कृष्ण की कहानियां गाते हैं। हिन्दुस्तान में खुदा की इबादत गाने वाले हिन्दुओं का कोई नाम शायद याद भी नहीं आएगा, लेकिन हिन्दू देवी-देवताओं को गाने वाले, उन पर लिखने वाले मुस्लिम शायर, कवियों, संतों, और कव्वालों की कोई कमी नहीं है। लेकिन वे लोग हवा में तैरते हुए तनाव के बीच इस तरह की कोई नाटकीय हरकत नहीं करते हैं।
आज जब फ्रांस की एक कार्टून पत्रिका से शुरू हुआ धार्मिक तनाव पूरी दुनिया में मुस्लिमों को प्रभावित कर रहा है, उत्तेजित कर रहा है, जिस वक्त हिन्दुस्तान का एक मशहूर शायर खुलेआम यह कह रहा है कि फ्रांस में वह होता तो वह वही करता जो वहां पर एक मुस्लिम ने कार्टून का विरोध करते हुए एक का सिर धड़ से अलग कर दिया था। यह वक्त एक अजीब से तनाव का है, यह वक्त हिन्दुस्तान के एक हमलावर तबके के बीच मुस्लिमों को पाकिस्तान के साथ जोडक़र देखता है, आज यहां के तनाव में बात-बात में लोगों को पाकिस्तान भेजने की बात की जाती है, मानो पाकिस्तान का वीजा देना वहां के उच्चायोग का काम न होकर इस देश के धर्मान्ध और साम्प्रदायिक संगठनों के हाथ आ गया है। यह वक्त बहुत सम्हलकर चलने का है, और यहां एक-एक शब्द लोगों के देशप्रेम और उनकी गद्दारी तय करने के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं। ऐसे सामाजिक और राजनीतिक माहौल में किसी को भी गैरजिम्मेदारी का कोई काम नहीं करना चाहिए।
फ्रांस में एक इस्लामी आतंकी ने जितने खूंखार तरीके से कार्टून का विरोध करते हुए एक बेकसूर का गला काट डाला, और उसके बाद फिर हमले हुए, उन पर भारत सरकार ने बहुत ही रफ्तार से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हुए फ्रांस की सरकार के साथ खड़े रहने की घोषणा की है। भारत सरकार की यह घोषणा लोगों को चौंकाने वाली रही क्योंकि देश के भीतर ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का साथ देने का ऐसा कोई रूख इन बरसों में केन्द्र सरकार का दिखा नहीं है। भारत के कुछ शहरों में फ्रांस के कार्टूनों के खिलाफ प्रदर्शन भी हुए हैं, फ्रांस सरकार के खिलाफ भी प्रदर्शन हुए हैं, और शायर मुनव्वर राणा का ताजा बयान तो इन तमाम प्रदर्शनों से आगे बढक़र आतंकी की वकालत करने वाला है जो कि हिन्दुस्तान के मुस्लिमों की एक खराब तस्वीर पेश कर रहा है। यह पूरा माहौल बहुत तनाव का चल रहा है, और दूसरे देशों में कुछ गिने-चुने मुस्लिम आतंकी भी जैसी हिंसा कर रहे हैं, उनसे भी हिन्दुस्तान में मुस्लिम-विरोधी लोगों को इस धर्म और इस बिरादरी के खिलाफ कहने को तर्क मिल रहे हैं। इसलिए आज लोगों को दूसरे धर्मों के प्रति अपना कोई प्रेम है, तो उसे बड़ी सावधानी से ही इस्तेमाल करना चाहिए। आज कोई मंदिर में जाकर नमाज पढ़े, कल कोई मस्जिद में जाकर हवन करने लगे, और परसों किसी गुरूद्वारे में जाकर कोई बपतिस्मा करने लगे, तो यह साम्प्रदायिक सद्भाव कम रहेगा, यह एक नया तनाव, एक नया बखेड़ा खड़े करने की हरकत अधिक रहेगी।
हम इसे एक बड़ी गैरजिम्मेदारी की हरकत मानते हैं, और मंदिर में जाकर नमाज पढऩे के पीछे चाहे जो भी नीयत रही हो, उससे इन दोनों धर्मों के बीच सद्भाव खत्म करने की नीयत रखने वाले लोगों के हाथ एक ताजा ईंधन लग गया है।
हॉलीवुड से लेकर बॉलीवुड तक, आधी सदी का दौर भरा पड़ा है मर्दानी हिंसा से
जेम्स बांड की फिल्मों में इस किरदार को अलग-अलग वक्त पर अलग-अलग बहुत से लोगों ने निभाया, लेकिन उनमें से एक शॉन कॉनरी अधिक शोहरत पाने वाले अभिनेता थे। कल वे गुजरे तो इनकी फिल्मों का मजा लेने वाले लोगों के बीच अफसोस का दौर शुरू हो गया। लेकिन सोशल मीडिया पर कुछ महिलाओं ने उन्हें श्रद्धांजलि देने से मना कर दिया, और लिखा कि इसी आदमी ने महिलाओं के बारे में घोर अपमानजनक बातें भी कही थीं। इंटरनेट पर कुछ भी ढूंढना आसान हो जाता है, और 1965 में शॉन कॉनरी का प्लेबॉय पत्रिका को दिया गया एक इंटरव्यू पल भर में सामने आ गया जिसमें उसने कहा था- मैं नहीं समझता कि किसी महिला को पीटने में कोई खास बुराई है, हालांकि मैं ऐसा करते हुए यह सलाह दूंगा कि वैसे नहीं पीटना चाहिए जैसे किसी मर्द को पीटा जाता है। खुले हाथ का एक झापड़ उस वक्त सही होगा जब बहुत सी चेतावनियों के बावजूद कोई महिला न समझे। एक तो यह इंटरव्यू 1965 के उस वक्त का है जब महिलाओं की इज्जत करना अधिक चलन में नहीं था। फिर जेम्स बांड के किरदार का एक अनिवार्य हिस्सा खूबसूरत और ग्लैमरस महिलाओं से सेक्स रहता था, और ऐसी फिल्में कर-करके किसी का भी दिमाग थोड़ा सा खराब होना स्वाभाविक था। फिर यह इंटरव्यू अमरीका की एक मर्दाना ग्लैमरस नग्न पत्रिका प्लेबॉय को दिया गया था, और जाहिर है कि उसके सवाल और उससे बात करने वाले के जवाब मर्दाना तो रहने ही थे।
लेकिन हम जिन बातों के आधार पर यह विश्लेषण कर रहे हैं उनसे ठीक परे का एक इंटरव्यू अभी हिन्दुस्तान में भी सामने आया है। एक वीडियो इंटरव्यू में मुकेश खन्ना नाम के एक औसत दर्जे के चर्चित अभिनेता ने महिलाओं के अपमान की ढेर सारी बातें कही हैं। यह अभिनेता महाभारत में भीष्म पितामह बना था, और बच्चों के टीवी सीरियल शक्तिमान में यह एक सुपरमैन की तरह का किरदार, शक्तिमान, बनता है। अब इन दोनों ही किरदारों में किसी किस्म के सेक्स की कोई गुंजाइश तो थी नहीं, लेकिन इसने अभी वीडियो पर दर्ज इस इंटरव्यू में फिल्म उद्योग में सेक्स-शोषण के खिलाफ शुरू हुए मी-टू (मेरे साथ भी) अभियान को लेकर परले दर्जे की घटिया बातें कही हैं। उसका कहना है- औरत का काम है घर सम्हालना, प्रॉब्लम कहां से शुरू हुई है मी-टू की, जब औरत ने भी काम करना शुरू कर दिया। आज औरत मर्द के साथ कंधे से कंधा मिलाने की बात करती है। लोग महिलाओं की आजादी की बात करेंगे, लेकिन मैं आपको बता दूं औरत के बाहर काम करने से सबसे पहले घर के बच्चों का नुकसान होता है जिनको मां नहीं मिलती। जब से शुरूआत हुई (महिला के बाहर काम करने की) तब से यह भी शुरूआत हुई कि मैं भी वही करूंगी जो मर्द करता है। नहीं, मर्द मर्द है, और औरत औरत है।
अब अगर जेम्स बांड का सेक्सभरा किरदार करने से, और 1965 के वक्त में, और प्लेबॉय पत्रिका से बात करने से शॉन कॉनरी की वैसी सोच हो गई थी, तो फिर भीष्म पितामह और बच्चों का शक्तिमान बनने वाले की सोच तो ऐसी नहीं होनी चाहिए थी? लेकिन अपनी ही बात को काटते हुए हम यह भी सोच रहे हैं कि महाभारत में जिस तरह भीष्म पितामह ने बेकसूर महिला पर जुर्म को अनदेखा किया था, हो सकता है कि भीष्म पितामह का किरदार करते-करते इस बहुत ही साधारण अभिनेता की सोच उस कहानी के जमाने की हो गई हो, जिस वक्त महिलाओं के लिए हिकारत ही रहती थी।
लेकिन इस मुद्दे पर आज लिखना इसलिए तय किया था कि किसी वक्त लापरवाही में कही गई कोई बात किस तरह लोगों की याददाश्त में भी दर्ज हो जाती है, और इतिहास में भी। आधी सदी के भी पहले 1965 में न तो इंटरनेट था, और न ही सोशल मीडिया। लेकिन लोग उस वक्त के इंटरव्यू में उस अमरीकी अभिनेता की कही हुई बातों को आज भी भूले नहीं हैं, और घटिया-हिंसक बातों की वजह से आज भी उसे श्रद्धांजलि देने से इंकार कर रहे हैं। अब तो वक्त बदल गया है, लोगों के वीडियो पल भर में ट्वीट हो जाते हैं, और बाद में मुकरना नामुमकिन भी हो जाता है। आज किसी को उसकी हिंसक और गलत बातों के लिए धिक्कारना आसान हो गया है। यही मुकेश खन्ना छत्तीसगढ़ में स्कूलों के एक फर्जीवाड़े में ब्रांड एम्बेसडर था, जालसाजों से उसकी यारी थी, और उसके नाम और चेहरे, और मौजूदगी का सहारा लेकर इस प्रदेश के हजारों बच्चों के मां-बाप को धोखा दिया गया था। ऐसा आदमी आज महिलाओं के सेक्स-शोषण के मुद्दे पर अगर यह कह रहा है कि चूंकि वे काम करने बाहर निकलती हैं, इसलिए उनके साथ ऐसा होता है, तो इस आदमी को महाभारत के भीतर ही दफन कर देना चाहिए। ऐसा बयान देने वाला महाभारत काल के बाद कम से कम लोकतंत्र में तो रहने का हकदार नहीं है। यह तो अच्छा है कि इनके मन की गंदगी ऐसे इंटरव्यू में सामने आती है, और लोगों को इन्हें धिक्कारने का मौका मिलता है।





