प्रणब मुखर्जी के लिखे संस्मरणों की अहमियत

 पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की लिखी एक किताब उनके गुजर जाने के बाद अब छपकर आ रही है, और किसी भी लेखक-प्रकाशक की बाजार की रणनीति के मुताबिक इस किताब के चुनिंदा हिस्से मीडिया में जारी किए जा रहे हैं जो कि खबर बनकर लोगों तक पहुंच रहे हैं, और खबरों के पाठकों को एक संभावित ग्राहक के रूप में तैयार कर रहे हैं।

प्रणब मुखर्जी का बहुत लंबा राजनीतिक जीवन केन्द्र सरकार और भारत की राजनीति की धुरी के इर्द-गिर्द इतना महत्वपूर्ण रहा है कि उनके मुकाबले कोई दूसरा नाम याद नहीं पड़ता। किसी भी पार्टी में प्रणब मुखर्जी जितने महत्वपूर्ण किसी दूसरे नेता की याद नहीं पड़ती। यूपीए सरकार के समय तो एक वक्त ऐसा था जब प्रणब मुखर्जी 50 से अधिक अलग-अलग मंत्री-समूहों के मुखिया थे। वे प्रधानमंत्री तो नहीं थे, लेकिन प्रधानमंत्री के तुरंत बाद सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति जरूर थे। प्रणब मुखर्जी ने इंदिरा गांधी, राजीव, नरसिंहराव, सोनिया, मनमोहन और राहुल गांधी के साथ सरकार और पार्टी में लंबा काम किया था, और पिछली करीब आधी सदी के भारत के राजनीतिक इतिहास के वे एक प्रमुख किरदार थे। वे इंदिरा गांधी के समय से संसद में रहे, और उनके साथ मंत्रिमंडल में भी रहे। इसलिए उनकी लिखी बातें भारत की समकालीन राजनीति और सरकार की बड़ी अहमियत वाली बातें हैं। इनमें बहुत सी बातें ऐसी होंगी जो गुजर चुके लोगों के बारे में होंगी, लेकिन जब भी कोई इतिहास लिखा जाता है, उसके बहुत से किरदार तो गुजर ही चुके रहते हैं।

सार्वजनिक जीवन में जिन लोगों ने भी लंबा काम किया है, उनकी यह सामाजिक और सार्वजनिक जवाबदेही होती है कि अपने इर्द-गिर्द का इतिहास लिखकर जाएं। कुछ सरकारी ओहदे ऐसे होते हैं जो ऐसा कुछ लिखने पर कानूनी रोक लगाते हैं, लेकिन उनसे परे के लोगों को समाज के प्रति अपनी यह जिम्मेदारी जरूर पूरी करनी चाहिए। बंद कमरों के बीच की बहुत सी बातचीत और बहुत से फैसले ऐसी किताबों के रास्ते ही सामने आते हैं। लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले एक किताब खूब खबरों में आई थी जब मौलाना अबुल कलाम आजाद की आत्मकथा का एक सीलबंद हिस्सा अदालती दखल के बाद खोला गया था। मौलाना ने ही 30 पेज का यह हिस्सा प्रकाशक को नहीं दिया था, और  सीलबंद करके रखा था कि इन्हें उनकी मौत के 30 बरस बाद खोला जाए। इन पन्नों पर आजादी और विभाजन के दौर का वह हिस्सा था जिसमें वे पटेल और नेहरू सरीखे अपने साथियों के लिए भी आलोचक थे। अबुल कलाम आजाद इन सीलबंद पन्नों को इस शर्त के साथ छोड़ गए थे कि उन्हें मौत के 30 बरस बाद प्रकाशित किया जाए। मौलाना की लिखी बातें सामने आने पर कई लोग उनसे असहमत रहे, और यह माना गया कि उन्होंने 1950 के दशक की लीडरशिप को बदनाम करने का काम किया है।

अभी-अभी कुछ हफ्ते पहले भूतपूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के संस्मरणों की एक किताब आई है जिसमें राहुल गांधी के बारे में कुछ आलोचनात्मक बातें हैं। उन्हीं से भडक़कर कांग्रेस के कुछ नेताओं ने उस किताब पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी कर डाली। लेकिन दो दिनों के भीतर प्रकाशक के जारी किए हुए एक दूसरे हिस्से में ओबामा नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते दिख रहे हैं।

हमारा यह मानना है कि महत्वपूर्ण सार्वजनिक जगहों पर रहने वाले लोगों को अपने संस्मरण लिखकर जाना चाहिए ताकि लोग इतिहास के उस दौर को उनके नजरिये से, उनकी कही बातों के रास्ते देख और समझ सकें। उनका लिखा हुआ सच है या झूठ है, इसे तय करने का काम उस दौर के दूसरे लोग अपने लिखे हुए में कर सकते हैं, लेकिन बहुत सी बातें ऐसे लेखन से ही सामने आती हैं। आपातकाल से लेकर वी.पी. सिंह  की सुनामी तक, और फिर नरसिंह राव के ताकतवर मंत्री से लेकर भाजपा जाने तक का अपना राजनीतिक इतिहास विद्याचरण शुक्ल छोडक़र जाना चाहते थे, लेकिन उनके लिखने की बस तैयारी ही तैयारी चलती रही, वे लिखना शुरू भी नहीं कर पाए, और बस्तर के नक्सल-हमले में दूसरे बहुत से कांग्रेस नेताओं के साथ शहीद हो गए। उनके पास के दस्तावेज, उनकी बातें अब कभी सामने नहीं आ पाएंगे। संस्मरण और आत्मकथा लिखना, समकालीन इतिहास लिखना एक हौसले की बात भी होती है क्योंकि उसमें कई लोगों को नाराज करने वाला सच भी रहता है, और झूठ लिखने पर उसके उजागर होने का खतरा भी रहता है। ऐसी किताबों से प्रकाशकों का कारोबार तो चलता ही है, लेकिन यह घटनाओं के पात्र का लिखा इतिहास रहता है जो कि पेशेवर इतिहासकारों से अलग रहता है, और इसीलिए एक अलग महत्व का भी रहता है। प्रणब मुखर्जी की लिखी बातों के टुकड़े अलग-अलग लोगों को खुश और नाराज कर सकते हैं, लेकिन उनका लिखा हुआ आज के राजनीतिक संस्मरण लेखन में एक सबसे महत्वपूर्ण लेखन है, और इससे पिछली आधी सदी की भारतीय राजनीति, और सरकार को बेहतर समझने में आसानी होगी। बाकी नेताओं और दूसरे प्रमुख लोगों को भी लिखने का हौसला जुटाना चाहिए। 

(Daily Chhattisgarh)

कोरोना-टीकों को लेकर भारी हड़बड़ी, बड़ा विवाद

 भारत में कोरोना-वैक्सीन को लेकर उसकी ट्रायल शुरू होने के पहले से जो हड़बड़ी चली आ रही थी, वह अब तक जारी है। लोगों को अगर यह सिलसिला याद हो, तो जुलाई के पहले हफ्ते में शुरू होने वाले मानव -परीक्षण को लेकर देश की सबसे बड़ी चिकित्सा-विज्ञान संस्था, आईसीएमआर ने एक चिठ्ठी लिखी थी जिसमें वैज्ञानिक संस्थाओं से कहा गया था कि वे परीक्षण तेजी से करें ताकि स्वतंत्रता दिवस पर इसे राष्ट्र को समर्पित किया जा सके। एक वैज्ञानिक संस्था के ऐसे अवैज्ञानिक पत्र को लेकर उसकी जमकर खिंचाई भी हुई थी। अब पिछले चार दिनों से भारत में बनी दो कोरोना-वैक्सीन को लेकर कुछ नए विवाद उठ खड़े हुए हैं। इन्हें बनाने वाली हिन्दुस्तानी कंपनियों के मालिक आपस में भिड़ गए हैं, और एक ने दूसरे की वैक्सीन के बारे में कहा है कि वह सिर्फ पानी की तरह सुरक्षित है। इन दोनों हिन्दुस्तानियों की बहस का जो असर हो रहा है वह इसकी विश्वसनीयता खत्म होने में जो रही-सही कसर थी, वह भी पूरी हो गई।

एक तरफ केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने इन दोनों वैक्सीन को लगाने का जो बयान दिया, उसमें हर हिन्दुस्तानी को इसे मुफ्त लगाने की बात कही, और अगले ही दिन उस बयान में जमीन आसमान का फर्क करते हुए यह कहा कि तीन करोड़ स्वास्थ्य कर्मचारियों और फ्रंटलाईन वर्करों को ही यह मुफ्त में लगाई जाएगी। अब देश की बाकी आबादी एक बार फिर अंधेरी सुरंग में छोड़ दी गई है जिसके किसी सिरे पर रौशनी नहीं है। मानो इतना काफी नहीं था, इसके तुरंत बाद एक सरकारी विशेषज्ञ ने यह कहा कि दो हिन्दुस्तानी वैक्सीन में से एक वैक्सीन ही लगाई जाएगी, और उसका असर न होने पर दूसरी वैक्सीन को मानव परीक्षण की तरह लगाया जाएगा। अब सवाल यह है कि वैक्सीन का मानव परीक्षण ही अगर होना है, तो उसे आम लोगों को लगाई जा रही वैक्सीन कैसे कहा जा रहा है? एक तरफ दोनों हिन्दुस्तानी वैक्सीन निर्माता एक-दूसरे की वैक्सीन को पानी बता रहे हैं, दूसरे आरोप लगा रहे हैं, और दूसरी तरफ विशेषज्ञ हिन्दुस्तानी वैक्सीन को लेकर सरकार के पूरे रूख पर अपनी हैरानी जाहिर कर रहे हैं।

वैक्सीन को लेकर दुनियाभर में चिकित्सा विशेषज्ञों के एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन (कोलिशन फॉर इपिडेमिक प्रीपेयर्डनेस इनोवेशंस, सेपी) की उपाध्यक्ष डॉ. गगनदीप कांग ने भारत में दो कोरोना-वैक्सीन को मिली मंजूरी पर भारी हैरानी जाहिर करते हुए कहा है कि वे पूरी तरह से भ्रमित हैं। उन्होंने कहा- मैंने आज तक ऐसी कोई मंजूरी नहीं देखी है। वैक्सीन के इस्तेमाल शुरू करने के साथ-साथ कोई क्लिनिकल ट्रायल नहीं होती है। कंपनियां सरकारी नियंत्रकों को अर्जी देने के साथ-साथ दुनिया की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाओं में भी अपने ट्रायल के नतीजे प्रकाशित करती हैं ताकि लोग सवाल कर सकें। भारत में भी आईसीएमआर अपनी खुद की पत्रिका में उन्हें छाप सकता था, लेकिन मेरी जानकारी यह है कि इनसे जुड़ी जो जानकारी दाखिल की गई है, उसमें कई कमियां हैं। और सच तो यह है कि जिस वैक्सीन की दो खुराकें एक फासले पर लगाई जानी हैं, उनका तो परीक्षण ही पूरा नहीं हो सकता।

एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार को दिए एक लंबे इंटरव्यू में इस विशेषज्ञ ने कहा कि यह हड़बड़ी इसलिए खतरनाक है कि इतनी हड़बड़ी मेें जांच की जरूरतें पूरी किए बिना वैक्सीन को लोगों पर इस्तेमाल करके एक खतरा खड़ा किया जा रहा है कि जो लोग वैक्सीन-विरोधी हैं, साईंस-विरोधी हैं उनके हाथ एक हथियार दे दिया जा रहा है जिसका वे इस्तेमाल करेंगे। उन्होंने भारत सरकार और यहां के वैज्ञानिक संगठनों की हड़बड़ी को लेकर एक वैज्ञानिक-आलोचना का इंटरव्यू दिया है।

एक तो वैसे भी यह वैक्सीन 70 फीसदी के करीब कारगर बताई जा रही है। फिर भारत सरकार का अपना किया हुआ दावा यह कहता है कि वह जून 2021 तक 25 करोड़ लोगों के टीकाकरण की कोशिश करेगी। इसका मतलब है देश की एक बड़ी आबादी को यह टीका मिलने में लंबा समय है। टीकाकरण की घोषणा के बाद कल यह बात भी सामने आई है कि बच्चों और गर्भवती महिलाओं को इनमें से एक टीका नहीं लगाया जाएगा। मतलब यह कि बहुत सीमित रफ्तार से इसका सीमित इस्तेमाल होने जा रहा है, और उसका तीन चौथाई से कम लोगों पर असर हो सकता है। फिर मानो ये तमाम सीमाएं काफी न हों, यहां के दो वैक्सीन निर्माता कारोबारी एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी में उतरे हुए हैं, और एक-दूसरे की वैक्सीन पर वे तमाम सवाल खड़े कर रहे हैं जो कि देश के दवा नियंत्रक को करने थे, दूसरी वैज्ञानिक संस्थाओं को करने थे, या वैज्ञानिक-जर्नलों में छपने के बाद दूसरे वैज्ञानिकों को करने थे।

आखिर में हम याद दिलाना चाहते हैं कि ये वैक्सीन तो बहुत ही हड़बड़ी में बनी हैं, 1950 के दशक में एक जर्मन दवा कंपनी ने गर्भवती महिलाओं में सुबह की मितली रोकने के लिए थेलिडॉमाइड नाम की एक दवा बनाई थी जिसका जादुई असर दिखता था। अमरीका जैसे देश में इसका अंधाधुंध इस्तेमाल शुरू हो गया था। लेकिन जब इन गर्भवती महिलाओं के बच्चे पैदा होने शुरू हुए, तो उनमें से बहुत बिना हाथ-पांव के थे जो कि इस दवा का ही असर था। वह तो किसी महामारी से परे की एक कारोबारी और बाजारू दवा थी, जो प्राणरक्षक नहीं थी, और जो असुविधा घटाने वाली ही थी। लेकिन आज तो सरकारें टीकों को मंजूरी दे रही हैं, उन्हें लेकर राजनीतिक घोषणाएं कर रही हैं, और आधी-अधूरी वैज्ञानिक जांच और जानकारी के आधार पर यह कर रही हैं। यह एक खतरनाक नौबत है। दुनिया को किसी टीके को लेकर ऐसी हड़बड़ी नहीं करना चाहिए। आज तो हिन्दुस्तान में बिना इस टीके के ही कोरोना का फैलाव घट गया है, मौतें एकदम कम हो गई हैं, और सरकार ऐसे किसी दबाव में नहीं है कि गिरती हुई लाशों के बीच उसे आनन-फानन में यह करना ही है, टीके तुरंत लगाना ही है। खुद भारत के विशेषज्ञ चिकित्सा-वैज्ञानिक जितने गंभीर शक इन टीकों के कई पहलुओं पर कर रहे हैं, वे एक खतरे की तरफ इशारा करते हैं। टीकाकरण को एक लोकप्रिय, लुभावना, राजनीतिक मुद्दा बनाना ठीक नहीं है। इस बारे में बहुत सावधानी से वैज्ञानिक फैसला लिया जाना चाहिए जिससे नेता अपनी राजनीति को अलग रखें।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 4 जनवरी 2021


 

देसी सॉफ्टपोर्नो की सुनामी में सराबोर हो गया हिन्दुस्तान...

 लॉकडाऊन के दौर में हिन्दुस्तान में डिजिटल माध्यम का भरपूर इस्तेमाल भी हुआ, और उसका भरपूर विस्तार भी हुआ। लोगों ने इंटरनेट कंपनियों से बड़े डेटा पैक खरीदे, और घर बैठे ऑनलाईन काम भी अधिक किया, ऑनलाईन मनोरंजन भी अधिक किया। अब देश भर से ऐसी खबरें आ रही हैं कि इंटरनेट पर हार्डकोर कहे जाने वाले पोर्नो पर सरकारी रोक लगने के बाद देश के भीतर बहुत से शहरों में ऐसा सॉफ्ट पोर्नो बन रहा है जिसे देखने में हिन्दुस्तानियों की बड़ी दिलचस्पी दिख रही है। ऐसी सेक्सी वीडियो ओटीटी प्लेटफॉर्म पर देखने के लिए थोक में पैकेज मिल रहे हैं, या हर महीने के, या साल भर के पैकेज भी। इस कारोबार पर अभी छपी एक लंबी रिपोर्ट के मुताबिक उत्तरप्रदेश का मेरठ शहर सॉफ्ट पोर्नो वीडियो बनाने का एक बड़ा केन्द्र बनकर उभरा है। बिना किसी कहानी के जो हार्डपोर्नो रहते हैं उनकी वेबसाईटों पर तो भारत सरकार आसानी से रोक लगाते आई है। लेकिन सॉफ्टपोर्नो तो थोड़ी-बहुत कहानी के साथ लपेटकर परोसे गए बहुत सारे सेक्स का पैकेज रहता है जिसे लेकर आसानी से सरकारी फैसला नहीं हो सकता। इन्हें बनाने वाले इसे असल जिंदगी की कहानियों से जुड़ा हुआ मनोरंजन बताते हैं, और खुद के पोर्नो होने से इंकार करते हैं। दूसरी तरफ जिस रफ्तार से इसके दर्शक बढ़ रहे हैं, यह एक फिक्र का सामान बनता जा रहा है कि क्या जनता के बीच कानूनी रूप से मौजूद मनोरंजन इस तरफ इतना मुड़ रहा है!

भारत में आम लोगों के लिए कानूनी बाजार में उपलब्ध मनोरंजन वैसे भी घटिया माना जाता है। ऐसे में जब उससे और सौ गुना घटिया मनोरंजन बाजार पर कब्जा करते दिख रहा है, तो लगता है कि देश में कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह कारोबार कहां जाकर खत्म होगा? ऐसा मानने वाले लोग भी बहुत हैं कि पोर्नो देख-देखकर सेक्स-अपराध करने वाले लोग कम नहीं हैं, तो फिर देश में बने हुए इस देशी सॉफ्टपोर्नो का असल जिंदगी पर क्या असर होगा? और क्या इसे बनाने वाले लोगों के इस दावे में सचमुच ही कुछ दम है कि ये असल जिंदगी की कहानियां हैं, और असल जिंदगी में ऐसा होता है?

यह सिलसिला कुछ बेचैन करता है। कानूनी प्रतिबंध तो अधिक अश्लील और अधिक हार्डपोर्नो पर लगाना अधिक आसान है, जिन लोगों ने पिछले कुछ महीनों में सॉफ्टपोर्नो के कारोबार को हिन्दुस्तान में सैकड़ों करोड़ रूपए का बना दिया है, और जो रात-दिन छलांगें लगाकर बढ़ रहा है, वे लोग अपने पर लगे किसी सरकारी प्रतिबंध को बिना अदालती चुनौती के बर्दाश्त तो करने वाले है नहीं। अब यह समझना कुछ मुश्किल है कि हर हाथ में स्मार्टफोन वाला जो तबका ऑनलाईन भुगतान कर सकता है, वह सौ रूपए महीने में ऐसे हजारों वीडियो देखने से कैसे रोका जा सकेगा?

अभी-अभी कुछ दिनों में फेसबुक पर भी ऐसे वीडियो छाने लगे हैं जो कि किसी भुगतान के बिना दो-चार वीडियो परोसकर उसके बाद किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म को भुगतान करने के लिए उकसाते हैं ताकि महीने भर या साल भर उसे देखा जा सके। जो लोग इंटरनेट पर हिन्दुस्तान का सॉफ्टपोर्नो ढूंढ भी नहीं रहे हैं, उन्हें भी फेसबुक पर दूसरे वीडियो के बीच ऐसे वीडियो दिख रहे हैं।

इस कारोबार का एक और खतरनाक पहलू यह है कि उत्तरप्रदेश के मेरठ के अलावा देश के दर्जन भर और ऐसे छोटे शहर हैं जहां लोग ऐसे अभिनेताओं को ढूंढ लेते हैं जो आगे चलकर किसी टीवी सीरियल या फिल्म में काम करना चाहते हैं, और फिर कुछ लाख रूपए लगाकर ऐसी छोटी वीडियो फिल्म बना लेते हैं। ऐसे सॉफ्टपोर्नो को एकदम से अश्लील करार देकर उस पर कानूनी रोक भी मुश्किल है, दूसरी तरफ जो महत्वाकांक्षी अभिनेता-अभिनेत्री ऐसे वीडियो में उलझ जाते हैं, उन्हें बचाना भी मुश्किल है।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 3 जनवरी 2021


 

इस दौर से मिले तजुर्बे से कारोबार और रोजगार सीखें कि अगले दौर में...

 देश भर के सिनेमाघरों में फिल्में पहुंचाने वाले डिस्ट्रीब्यूटरों ने सलमान खान से एक खुली अपील की है कि वे अपनी नई फिल्म राधे को इंटरनेट पर, ओटीटी पर जारी करने के बजाय उसे सिनेमाघरों में रिलीज करें ताकि अब तक मंद या बंद पड़े सिनेमाघरों में जिंदगी लौट सके। देश भर के सिनेमाघर ठप्प होने से दसियों लाख लोग बेरोजगार हुए हैं, और उन्हें किसी एक रौशनी की तलाश है। सलमान खान एक कामयाब अभिनेता और निर्माता हैं, और उनकी फिल्में हिन्दू और मुस्लिम, सभी समुदायों के दर्शकों के बीच बड़ी लोकप्रिय रहती हैं। उनकी फिल्में बड़े बजट की भी रहती हैं जिनसे डिस्ट्रीब्यूटरों को अच्छा कारोबार होने की उम्मीद है। सिनेमाघर बंद होने से न सिर्फ हिन्दुस्तान में बल्कि बाकी दुनिया में भी इंटरनेट पर फिल्मों का कारोबार लगातार बढ़ा है, और लोग घरों में स्मार्ट-टीवी पर, कम्प्यूटर या स्मार्टफोन पर ओटीटी-प्लेटफॉर्म पर फिल्में देखने लगे हैं। इस नए कारोबार ने लॉकडाऊन के दौरान छलांगें लगाकर नए ग्राहक बनाए हैं, और उम्मीद से अधिक कमाई की है। लेकिन सिनेमाघरों के साथ जुड़े हुए दसियों लाख रोजगार हिन्दुस्तान में ऐसे हैं जिनकी कोई जगह इंटरनेट पर आने वाली फिल्मों में नहीं है।

यह तो एक चर्चित कारोबार है इसलिए यह खबरों में भी आया और इसी बहाने हम भी इस पर लिख रहे हैं, लेकिन आज पूरी दुनिया में कोरोना-लॉकडाऊन ने कारोबार के तौर-तरीके बदलकर रख दिए हैं। एक आम और औसत हिन्दुस्तानी शहर की हर संपन्न बस्ती में लोग सुबह उठते बाद में हैं, उनकी कॉलोनियों में फेरी लगाकर फल-सब्जी बेचने वाले, दूसरे कई किस्म के सामान बेचने वाले लोग आवाज लगाने लगते हैं। यह सब लॉकडाऊन के पहले नहीं था, लेकिन लॉकडाऊन ने इतने रोजगार खाए, इतने कारोबार बंद करवाए कि लोगों को दूसरे काम-धंधे तलाशने पड़े। लॉकडाऊन अब खत्म हो गया है, लेकिन कारोबार पटरी पर नहीं लौटा है। स्कूल-कॉलेज बंद चल रहे हैं, और उनमें न फीस आ रही है, न तनख्वाह दे पाना मुमकिन हो रहा है। इमारतों का किराया लग रहा है, न्यूनतम बिजली बिल लग रहा है, बसों या दूसरे ढांचे का बैंक का कर्ज खड़ा है, और अभी तक कोई रास्ता नहीं निकला है। पूरे हिन्दुस्तान में लाखों होटल बंद हो गए हैं, रेस्त्रां अब तक जिंदा रहने लायक कमाई नहीं कर रहे हैं, मनोरंजन के कार्यक्रम करने वाले बेरोजगार घर बैठे हैं, और शादी-ब्याह के जलसे, उनकी पार्टियों का इंतजाम करने वाले लगभग बेरोजगार हैं।

यह तो ठीक है कि कोरोना की दहशत अगले साल-छह महीने में इतनी घट सकती है कि लोग फिर से पुराने ग्राहक बन जाएं, लेकिन जैसा कि कल ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक विशेषज्ञ डॉक्टर ने कहा है कि अगला कोई वायरस कोरोना से अधिक खतरनाक भी आ सकता है। ऐसा अगर होगा तो वह एक बार फिर लॉकडाऊन जैसी नौबत लाएगा। आज दुनिया के तमाम काम-धंधों को, कारीगरों से लेकर मजदूर तक लोगों को ऐसे विकल्प ढूंढकर और सोचकर रखने हैं जो कि अगली किसी महामारी के वक्त, या किसी और किस्म की आर्थिक मंदी के दौर में उनको जिंदा रख सकें। आज जब दीवारों पर पेंट करने वाले लोग सब्जी बेचने पर मजबूर हैं, कहीं बैंड पार्टी के लोग झाड़ू बेचते घूम रहे हैं, स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाने वाले शिक्षक सडक़ किनारे चाय ठेला लगा रहे हैं, तो दुनिया को एक वैकल्पिक जिंदगी के बारे में सोचकर रखना होगा, और उसके लिए तैयार भी होना होगा।

दुनिया की पिछली महामारी सौ बरस पहले आई थी, और उसके दस बरस बाद दुनिया की सबसे बड़ी मंदी भी आई थी जो कि दस बरस चली थी। अमरीका जैसा सबसे बड़ा कारोबारी देश उस दौरान जितने किस्म के आर्थिक और सामाजिक पतन का शिकार हुआ, वह इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है। आज दुनिया में जो लोग जिंदा हैं, उनमें से गिने-चुने लोगों ने ही महामारी और मंदी का वह एक के बाद एक चला दौर देखा था। वे अब मौत के इतने करीब हैं कि उस वक्त का तजुर्बा आज किसी के लिए सबक भी नहीं है। इसलिए आज की दुनिया को एक संक्रामक रोग और एक आर्थिक मंदी-बंदी से जूझना पहली बार सीखने मिल रहा है। लोगों को ऐसे और, अगले दौर के लिए तैयार रहना चाहिए, अपने आपको बेहतर तैयार करना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि वह बंदी-मंदी अभी के मुकाबले अधिक कड़ी और बड़ी हो। इस बार भी बड़े कारोबारियों से लेकर छोटे मजदूरों तक तमाम लोगों ने लॉकडाऊन की मार झेली है, इससे सबक लेकर सबको यह सोचना चाहिए कि अगले किसी बुरे दौर में लोगों की कौन सी जरूरतें बुनियादी बनी रहेंगी, और कौन सी जरूरतों को लोग छोडऩे के लिए मजबूर होंगे। इसका कुछ तजुर्बा तो इस बार भी हुआ है, और लोगों को यह सोचना चाहिए कि अगली नौबत आने पर वे, उनका कारोबार, या उनका रोजगार किस तरह जिंदा रहेंगे। 

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 2 जनवरी 2021


 

हर किसी को मुफ्त टीका बड़ी राहत की घोषणा...

 केन्द्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्री ने यह बड़ी घोषणा की है कि हर भारतीय को कोरोना वैक्सीन पूरी तरह मुफ्त लगाई जाएगी, इसके लिए किसी तरह का शुल्क नहीं लिया जाएगा। आज देश में जगह-जगह वैक्सीन लगाने का अभ्यास किया जा रहा है। इस मौके पर ही डॉ. हर्षवर्धन ने यह जानकारी दी है। जाहिर है कि सवा अरब से अधिक आबादी के इस देश में कोरोना मोर्चे पर खतरा झेल रहे करीब तीन करोड़ लोगों से शुरुआत होगी, और फिर उम्र या सेहत के हिसाब से बाकी लोगों को पहले या बाद यह टीका लगाया जाएगा। कुछ महीने पहले बिहार विधानसभा चुनाव के समय भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में बिहार के हर किसी को मुफ्त वैक्सीन लगाने का वायदा किया गया था, और उस समय से यह विवाद और असमंजस चल रहे थे कि क्या अलग-अलग राज्यों में लोगों के साथ अलग-अलग बर्ताव होगा? केन्द्र सरकार ने यह बात साफ करने में खासा वक्त तो लिया है, लेकिन हर किसी को मुफ्त वैक्सीन जैसी छोटी सी और साफ बात अब कर दी गई है।

कोरोना वैक्सीन को लेकर बाकी दुनिया की तरह हिन्दुस्तान के लोगों में भी जरूरत से कुछ अधिक आत्मविश्वास दिख रहा है। जबकि अलग-अलग वैक्सीन की कामयाबी के आंकड़े अलग-अलग हैं, और कुछ वैक्सीन 70 फीसदी कामयाबी वाली भी हैं। यह बात भी सामने आई है कि अधिकतर वैक्सीन के एक से अधिक डोज कुछ हफ्तों के फासले पर लगाने के बाद कुछ और हफ्ते गुजरने पर ही लोग सुरक्षित हो सकते हैं। यह पूरा सिलसिला बड़ा जटिल है, और भारत के अलग-अलग प्रदेशों में राज्य सरकारें अपने ढांचे का पूरा इस्तेमाल करने के बाद भी यह खतरा उठाएंगी कि पहला डोज लगवाने वाले लोग दूसरे डोज के लिए समय पर न पहुंचें, और पहला टीका बेकार चले जाए। यह खतरा भी रहेगा कि राजनीतिक या आर्थिक ताकत वाले लोग अपने और अपने परिवार के लिए दूसरे लोगों की बारी छीनकर टीका जुटाएं, या स्वास्थ्य कर्मचारियों को रिश्वत देकर उसका इंतजाम करें। यह भी हो सकता है कि अपराधियों के गिरोह टीके लूट लें, और फिर उसकी कालाबाजारी करें। यह बात तो है ही कि नकली टीकों को असली बताते हुए उन्हें बेचने की जालसाजी की जाए, ऐसे मामले शुरू भी हो चुके हैं। लोगों ने अब तक टीकाकरण के नाम पर देश का सबसे बड़ा अभियान पोलियो ड्रॉप्स का देखा है जिसकी कोई कमी नहीं थी, जिसे सिर्फ कम उम्र बच्चों को पिलाना था, और स्वास्थ्य कर्मचारियों ने घर-घर जाकर बच्चों को दो बूंद जिंदगी की पिलाई थीं। यह पहला मौका है जब अलग-अलग तबकों की प्राथमिकता के आधार पर उन्हें छांटकर उनका रजिस्ट्रेशन करके, उनकी पहचान का रिकॉर्ड बनाकर उन्हें हफ्तों के फासले पर दो डोज इंजेक्शन से लगाए जाएं। इस हिसाब से कोरोना का टीकाकरण देश के अब तक के किसी भी दूसरे टीकाकरण-अनुभव से बहुत अधिक जटिल है। फिर कोरोना से मौतों की दहशत को भी एक बरस होने आ रहा है, और लोग इस टीके को पाने के लिए अधिक हड़बड़ी में भी हैं।

स्वास्थ्य कर्मचारियों और कोरोना के मोर्चे पर डटे हुए दूसरे कर्मचारियों की करीब तीन करोड़ की आबादी तो पढ़ी-लिखी है। लेकिन इनके बाद जब ग्रामीण, अशिक्षित, बुजुर्ग आबादी की बारी आएगी, तो एक खतरा यह भी रहेगा कि इनके हिस्से के टीके रिश्वत लेकर किसी और को लगा दिए जाएं, और इन्हें कोरोना-टीके के बजाय कोई और मामूली पानी जैसा इंजेक्शन लगा दिया जाए। ऐसी धोखाधड़ी से बचने के लिए अगर जरूरी हो तो राज्य सरकारों को इसकी पूरी रिकॉर्डिंग भी करवानी चाहिए, और किसी भी तरह के धोखे की आशंका खत्म करनी चाहिए।

आज हिन्दुस्तान एक ऐसे झांसे का शिकार हो गया है कि कोरोना अब हार चुका है, और यह देश जीत चुका है। जबकि देश की पूरी आबादी के टीकाकरण को एक-दो बरस भी लग सकते हैं। तब तक तो कोरोना का खतरा बने ही रहेगा। जरूरत से अधिक आत्मविश्वास घातक साबित हो सकता है। पिछले दिनों हमने इसी जगह लिखा भी था कि सरकार के कुछ नारों से एक ऐसी खुशफहमी पैदा हुई है कि कोरोना का टीका नहीं बन रहा है, उसकी दवा बन रही है। मामूली वैज्ञानिक समझ के मुताबिक भी इन दोनों में बड़ा फर्क है। टीका आगे बीमारी के खतरे को घटाता है, या खत्म करता है। दूसरी तरफ दवाई बीमार हो जाने के बाद इलाज करती है। ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। फिर अमिताभ बच्चन के मुंह से या दूसरे नेताओं के मुंह से लोग रात-दिन सुन रहे हैं कि जब तक दवाई नहीं, तब तक ढिलाई नहीं। इससे एक ऐसी सोच बन रही है कि दवा आ जाने के बाद ढिलाई करने में कोई बुराई नहीं रहेगी। जबकि लोगों को कोरोना के टीके के बाद भी किसी भी तरह के संक्रमण के लिए सावधान रहने की नसीहत देना बेहतर होगा। आज दुनिया के कई देशों में कोरोना का दूसरा या तीसरा दौर चल रहा है, वह लौट-लौटकर आ रहा है, और जैसा कि ब्रिटेन में पाया गया है, कोरोना अपने आपको बदलकर भी आया है। कई दूसरे वायरस कई-कई बार अपनी शक्लें बदलते हैं। इसलिए लोग दहशत में चाहे न रहें, सावधानी में ढिलाई खतरनाक होगी। लोगों को साफ-साफ यह समझाने की जरूरत है कि कोरोना का टीका उन्हें कुछ हद तक सुरक्षित रखेगा, लेकिन लोगों को सावधानी को अपनी आदत बना लेना चाहिए।

फिलहाल यह देश काफी हद तक कामयाब टीका लगाने के करीब है, यह दुनिया का एक सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान भी होगा और लोगों को इसे कामयाब करने के लिए इसकी तमाम शर्तों को बहुत गंभीरता से मानना चाहिए।

(Daily Chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है,1 जनवरी 2021


 

ईयू और ब्रिटेन से सीख सकती है बाकी दुनिया

 नए साल का पहला दिन यूरोपीय यूनियन के लिए बहुत अलग किस्म का है क्योंकि ब्रिटेन आज उससे अलग है। यूनाईटेड किंगडम, यूके, नाम से प्रचलित ब्रिटेन 1973 में यूरोपीय समुदाय में शामिल हुआ था, और आधी सदी के जरा से पहले वह उससे अलग हो गया। दुनिया में देशों के कई किस्म के संगठन हैं, मुस्लिम देशों का अलग संगठन हैं, दक्षिण एशिया के देशों का अलग संगठन हैं, पेट्रोलियम उत्पादक देशों का अलग संगठन हैं, अमरीका की अगुवाई में सैनिक संधि वाला देशों का एक संगठन हैं, लेकिन यूरोपीय यूनियन, ईयू, सबसे ही अलग और सबसे वजनदार संगठन है। इस मायने में कि इसके सदस्य देशों के बीच आवाजाही के लिए कोई वीजा नहीं लगता था, एक-दूसरे में टैक्स-मुक्त कारोबार हो सकता था, और भी कई किस्म की ऐसी बातें ईयू में थीं कि वह एक संगठन से अधिक, प्रदेशों का एक देश सरीखा लगता था। अब अपने एक सबसे बड़े और ताकतवर सदस्य को खोकर ईयू के लिए  भी एक नई दिक्कत की शुरुआत है, और ब्रिटेन के लिए भी। यूनाईटेड किंगडम के भीतर ब्रिटेन के साथी-देशों में भी ईयू से अलग होने पर असहमति है, और जिस ब्रिटेन ने बहुमत से अलग होने का जनमतसंग्रह किया था, वह ब्रिटेन भी इससे हिला हुआ है। 

यूरोपीय यूनियन का मानना है कि अलग होने के इस फैसले, ब्रेग्जिट से ईयू और ब्रिटेन दोनों कमजोर होंगे। पूरे योरप में कम से कम दो पीढिय़ां ऐसी निकल चुकी हैं जिन्होंने ब्रिटेन और ईयू को एक ही देखा था, और इस एकता के तमाम फायदे पाए थे। अब इतने बड़े और संस्थापक देशों में से एक, ब्रिटेन के बाहर होने से ईयू भी कमजोर होगा जो कि पश्चिमी दुनिया में अमरीकी एकाधिकार के मुकाबले एक अलग किस्म की ताकत बनकर खड़ा हुआ था। 

ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ब्रेग्जिट के मुद्दे पर ही जीतकर सत्ता पर आए थे, और उन्होंने कहा है कि अब ब्रिटेन के हाथों में आजादी आई है। बाकी यूरोपीय यूनियन भी यह मानता है कि ब्रिटेन से किसी न किसी किस्म के संबंध ईयू के बने रहेंगे, लेकिन ब्रिटेन और बाकी ईयू के बीच कामकाज कैसे चलेगा, नए व्यापार-नियम कैसे काम करेंगे, यह सब अभी असमंजस में डूबा रहस्य ही है। इस बारे में लिखने की जरूरत आज इसलिए हो रही है कि दुनिया के और दूसरे देशों में जहां ऐसे लचीले संबंधों वाले संगठन बनाने की बात होती है, उन्हें भी इससे सबक लेना चाहिए कि हर देश के लोगों की अलग-अलग महत्वाकांक्षाएं होती हैं, और जब किसी बड़े संगठन का हिस्सा बनकर अपनी संभावनाओं को दूसरों के साथ बांटना पड़ता है, तो अपने देश की सरकार पर, सत्तारूढ़ पार्टी पर एक बड़ा दबाव पड़ता है। हिन्द महासागर के भारत वाले इलाके में पड़ोसी देशों के साथ अधिक गहरे कारोबारी, और आवाजाही संबंधों की बात बहुत से आशावादी लोग हमेशा ही करते हैं। लोगों को लगता है, और सही लगता है, कि भारत और पाकिस्तान के बीच फौजी-सरहदी तनाव कम हो, तो दोनों देशों की अपनी फौजों पर बड़ी बर्बादी भी घटेगी जो कि सरहद के दोनों तरफ के गरीबों के काम आएगी। ब्रिटेन और ईयू के रिश्ते टूटने को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच अच्छे रिश्ते चाहने वालों को निराश होने की जरूरत नहीं है। अखंड भारत का फतवा देने वाले युद्धोन्मादियों से परे कोई भी ऐसी संभावनाएं नहीं देखते कि भारत और पाकिस्तान की सरहद मिट जाएगी। पाकिस्तान एक हकीकत है जो कि मिट नहीं सकती। और भारत और पाकिस्तान के बीच अपनी-अपनी घरेलू वजहों से सरहदी तनाव बनाए रखने की राजनीतिक मजबूरी भी दोनों सरकारों के सामने रहेगी, इसलिए भी भ्रष्ट हथियार खरीदी जारी रहेगी। ईयू से ब्रिटेन के अलग होने की कोई तुलना भारत और पाकिस्तान के अलग होने से नहीं की जा सकती, लेकिन जिस तरह ईयू एक संगठन बना था, वैसा कोई संगठन भारत के इर्द-गिर्द मुमकिन नहीं है। जिस तरह अलग होने के बाद भी ईयू और ब्रिटेन के बीच सभ्य समाज जैसे रिश्ते बचे रहेंगे, वही एक मिसाल भारत और पाकिस्तान के काम आ सकती है कि विभाजन के बाद भी एक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व संभव है। जो लोग अपनी तंगसमझ, अपने तंगनजरिए, और अपने बहुत सीमित-स्वार्थी एजेंडा से परे दुनिया को देखना जानते हैं, वे दुनिया की आज की घटनाओं के तजुर्बे का फायदा उठा सकते हैं। शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की सोच दुनिया के बहुत से देशों के बीच एक समझदारी स्थापित कर सकती है। सरहदें मिटना न आसान है, और न हर मामले में समझदारी ही है, लेकिन सरहद के दोनों तरफ एक-दूसरे की मौत की कामना किए बिना जीना तो मुमकिन है। (Daily Chhattisgarh)