गांवों में धान से परे भी धन हो सके, इसकी कोशिश हो
छत्तीसगढ़ में इस बरस बोरों की दिक्कत के बीच भी 92 लाख टन धान की खरीदी हुई है जो कि इस राज्य के अस्तित्व के 20 बरसों में सबसे अधिक है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इसका कुछ हिस्सा पड़ोसी राज्यों से तस्करी से लाए गए धान का भी है क्योंकि तमाम पड़ोसी राज्यों में धान का समर्थन मूल्य कम है, और छत्तीसगढ़ में सरकार बाद में किसानों को अतिरिक्त भुगतान करके देश का सबसे ऊंचा दाम देती है। पड़ोसी राज्यों से छत्तीसगढ़ में धान की तस्करी कोई नई बात नहीं है, और बीते बरसों में भाजपा के राज में भी यह सिलसिला चल रहा था, और उसी दौरान छत्तीसगढ़ को धान की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी का राष्ट्रीय सम्मान भी हासिल हुआ था।
अब जब इस राज्य के किसान संतुष्ट हैं, और उनका तकरीबन तमाम धान बिक चुका है, तब सरकार को कुछ बातों पर सोचना भी चाहिए। धान की फसल किसान के लिए सबसे आराम की फसल मानी जाती है जिसे बोने के बाद मेहनत दूसरी फसलों के मुकाबले बहुत कम लगती है। छत्तीसगढ़ में पानी कुदरत भरपूर देता है, और नहरों से भी कई इलाकों में पानी आता है, सरकार की मुफ्त, या तकरीबन मुफ्त बिजली के साथ-साथ सोलर पैनल से चलने वाले पंप भी धरती का पेट खाली करके धान की फसल को बढ़ाते हैं। लेकिन कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ के किसान अपनी फसल बेचने के लिए, किसी भी किस्म की कमाई के लिए मोटे तौर पर राज्य सरकार के मोहताज रहते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि किसान को सरकार-आश्रित बनाए रखने के बजाय कौन सा दूसरा काम किया जा सकता है, जो कि हो सकता है शुरू में कुछ अलोकप्रिय हो, लेकिन जो लंबे सफर में किसानों का अधिक मददगार हो।
छत्तीसगढ़ में जहां-जहां मिट्टी और हवा-पानी साथ दें, वहां-वहां किसानों को धान से परे भी देखने के लिए कहना चाहिए। आसान धान लोगों की कल्पना को कुचल चुका है। किसान और दूसरी फसलों की तरफ देखना भी भूल गए हैं। यह बात धरती के लिए भी ठीक नहीं है, और दूसरी फसलों के लिए भी ठीक नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी कुछ हिस्सों में चने की फसल ली जाती थी जो कि किसानों को सरकार को मोहताज भी नहीं रखती थी, और किसी समर्थन मूल्य की फिक्र भी उसे नहीं रहती थी। इस प्रदेश के बनने के भी दशकों पहले तो यहां कृषि विश्वविद्यालय है, और अब तक इसने किसानों के बीच दूसरी फसलों को लोकप्रिय करने का काम कर देना था, लेकिन प्रयोगशाला से सरकार तक होते हुए खेतों तक पहुंचने का सफर, और फिर फसल के मंडी या बाजार तक पहुंचने का सफर बहुत से रोड़ों भरे रास्ते से गुजरता है। धान से परे लोगों ने सोचना बंद कर दिया, और सरकार भी एक लोकप्रिय चुनावी नारे और कार्यक्रम से परे कोई प्रयोग करने के बारे में नहीं सोचती।
लेकिन बात महज किसी और फसल की नहीं है, बात खेती और किसानी की अर्थव्यवस्था की व्यापक तस्वीर की है, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की भी है जो कि बुनियादी रूप से किसानों पर ही टिकी हुई है। छत्तीसगढ़ में जहां-जहां लोगों ने फल-सब्जी के प्रयोग किए, मशरूम या शहद के प्रयोग किए, उन्हें धान की फसल के मुकाबले अधिक कमाई भी हुई है। यह एक अलग बात है कि ऐसे प्रयोगों में सरकार की भूमिका बड़ी सीमित रही है, और लोगों की उपज के लिए बाजार जुटाने का काम सरकार नहीं कर पाई। छत्तीसगढ़ में वन विभाग ने वनोपज के दाम शायद देश में सबसे अधिक दिए, लेकिन वनोपज इस प्रदेश से कच्चे माल की तरह ही बाहर जाती है, उसके लिए कोई प्रोसेसिंग यूनिट यहां नहीं लग पाई। यही हाल फल-सब्जी के साथ हुआ, यही हाल कुछ दूसरी फसलों का हुआ। आज छत्तीसगढ़ में जगह-जगह होने वाले कोदो-कुटकी का कोई स्थानीय संगठित बाजार नहीं है, दूसरी तरफ यह देशी-विदेशी ऑनलाईन बाजार में महंगे दामों पर बिकता है। यह एक फासला राज्य सरकार जैसी संगठित कोशिश के बिना पट नहीं सकता। किसान को सरकार-आश्रित रखने के बजाय उसे तरह-तरह की आर्थिक गतिविधियों से जोडऩा होगा ताकि वह सरकारी बजट पर भी कम बोझ रहे।
आज आखिर क्या वजह है कि गुजरात के एक सिरे पर बसे आनंद से अमूल का दूध और बाकी डेयरी प्रोडक्ट निकलकर 1100 किलोमीटर से अधिक का रास्ता तय करके छत्तीसगढ़ आते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की डेयरी संभावनाएं पूरी तरह टटोली नहीं जातीं। राज्य का दुग्ध महासंघ राजनीति और भ्रष्टाचार के लिए ही खबरों में अधिक आता है, राज्य में डेयरी और दूध का कलेक्शन और मार्केटिंग नेटवर्क बनाने में इसे कामयाबी मिली थी। अब कुछ निजी कारोबारियों ने बड़े-बड़े डेयरी उद्योग स्थापित किए हैं जो कि कामयाब भी बताए जा रहे हैं, और उनसे जुडक़र गांव-गांव में लोग दुधारू जानवर भी पाल रहे हैं।
राज्य सरकार को किसी कारोबार में पड़े बिना लोगों को तरह-तरह की प्रोसेसिंग यूनिट लगाने में मदद करनी चाहिए ताकि गांव के लोग धान और अनाज से परे भी कमाई कर सकें, जंगलों के लोग वनोपज और लघु वनोपज को कच्चे माल की शक्ल में बेचने को मजबूर न हों, और प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था धान से परे भी धनवान हो। यह बात सुझाना आसान है, लेकिन ऐसा करना धान खरीदने के मुकाबले कई गुना अधिक मेहनत का काम है। छत्तीसगढ़ सरकार को ऐसी कोशिश करनी चाहिए कि किसान धान से परे भी सोच सकें, और गांव सरकारी योजनाओं से परे भी अपने पैरों पर खड़े हो सकें। राज्य सरकार को धान से इतर अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के बारे में भी सोचना चाहिए।
आज के विश्व में किसी देश का अंदरूनी क्या?
पश्चिम की एक पॉप गायिका रिहन्ना ने भारत के किसान आंदोलन के समर्थन में एक ट्वीट क्या कर दिया, बात की बात में हिन्दुस्तानी राष्ट्रभक्त रिहन्ना की कम से कम कपड़ों वाली तमाम तस्वीरें निकाल लाए जो वे खुद ही अपने सोशल मीडिया पन्नों पर पोस्ट करती हैं। और हाल के महीनों में भारत नहीं, भारत सरकार की निजी सुरक्षा के लिए तैनात देश के सबसे घातक परमाणु हथियार ने भी इस अंतरराष्ट्रीय गायिका पर खुला हमला बोल दिया। यह हथियार एंटी मिसाइल, और एंटी एयरअटैक डिफेंस सिस्टम की तरह भारत सरकार की आलोचना पर खुद होकर पल भर में सक्रिय हो जाता है, और ट्विटर पर जवाबी परमाणु हमला शुरू कर देता है। कुछ लोग इस डिफेंस सिस्टम को कंगना रनौत नाम से भी बुलाते हैं। अभी इस डिफेंस सिस्टम की तरफ से पश्चिम की इस गायिका की चुनिंदा तस्वीरें पोस्ट करने पर लोगों ने इस देशी डिफेंस सिस्टम की भी टक्कर की तस्वीरें पोस्ट करना शुरू किया है, और ट्विटर का कम्प्यूटर बदन की भरमार वाली तस्वीरों को नंगी करार देते हुए बावला हो गया है।
खैर, सोशल मीडिया के बकवासी हमलों पर लिखने जैसा कुछ है नहीं क्योंकि एक दशक पहले पखाने के दरवाजे के भीतर गालियां कुरेदते हुए लोग डरते भी थे, अब तो सोशल मीडिया पर अपने नाम, पहचान, और तस्वीर सहित बलात्कार की धमकियां भी लिख देते हैं, उनकी हम अब क्या आलोचना करें। लेकिन आज इस मुद्दे पर लिखने की बात इसलिए आन पड़ी है कि भारत सरकार ने खुलकर मशहूर विदेशियों के लिखे का विरोध किया है, और भारत के किसान आंदोलन को भारत का आंतरिक मामला बताया है। इस गायिका के अलावा दुनिया की सबसे मशहूर पर्यावरणवादी किशोरी ग्रेटा थनबर्ग सहित कई और चर्चित लोगों ने किसानों के शांतिपूर्ण आंदोलन का समर्थन किया है, और भारत सरकार ने इन सबकी बोलती बंद कर देने के अंदाज में अपनी प्रतिक्रिया ट्वीट की है।
यह बात बड़ी दिलचस्प है कि किसी देश की कौन सी बात उसकी आंतरिक बात रहती है, और बाहर के लोगों के दखल के लायक नहीं कही जाती है। हमारी मामूली समझ तो अभी पिछले ही महीने तकरीबन इन्हीं दिनों अमरीका के संसद भवन पर हुए हमले पर भारतीय प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया को देखते आई है जिसमें अमरीकियों द्वारा, मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के उकसावे और भडक़ावे पर देश की संसद पर हमला किया गया था, और वहां गिने जा रहे वोटों को नष्ट करने की कोशिश की गई थी। मारने वाले और पांच मरने वाले सभी अमरीकी थे, संसद भी अमरीका की थी, भडक़ाने वाला अमरीकी राष्ट्रपति था, लेकिन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वहां लोगों को शांति की नसीहत दी थी। अब मोदी के ही मित्र रहे हुए डोनल्ड ट्रंप को अमरीकी जनता ने नमस्ते-ट्रंप कह दिया था, तो भडक़कर इस ट्रंप ने अपने लोगों को संसद पर हमला करने का फतवा देकर भेजा था। इस मामले में कुछ भी भारतीय नहीं था, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री ने शांति की नसीहत दी थी। अब सवाल यह है कि मोदी यह नसीहत देते हुए जितने अमरीकी थे, या अबकी बार ट्रंप सरकार का नारा देते हुए जितने अमरीकी थे, उतनी ही भारतीय रिहन्ना भी है। आज अगर उसने भारतीय किसान आंदोलन को लेकर कुछ अहिंसक बात कही है, तो यही बात तो ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और अमरीका जैसे कई देशों से सांसद पहले बोल चुके हैं, इस आंदोलन का साथ दे चुके हैं। लेकिन चूंकि इस बार की यह ट्वीट अमरीकी मनोरंजन-दुनिया की एक सबसे चर्चित और कामयाब महिला की तरफ से आई थी, यह जायज था कि भारत की मनोरंजन-दुनिया की अपने को सबसे चर्चित और सबसे कामयाब मानने वाली महिला जवाबी हमला करती। इस तरह कंगना रनौत ने भारत (देश नहीं) सरकार को नापसंद किसान आंदोलन के समर्थन के खिलाफ तमाम परमाणु मिसाइलों को लेकर हमला शुरू कर दिया।
चूंकि भारत में आज सक्रिय कंगनाएं अपनी तमाम ऊर्जा मोदी के आलोचकों पर हमले में लगाती हैं, इसलिए उनके पास यह वक्त नहीं रहता कि यह भी पढ़ सकें कि मोदी क्या लिखते हैं। मोदी ने अमरीका के हिंसक हमलावरों को शांति की नसीहत देकर एकदम जायज काम किया था, उसके लिए उनका अमरीकी होना जरूरी नहीं था। लेकिन कंगनाओं के साथ-साथ मोदी सरकार के लोग भी हिंसक अमरीकियों को मोदी की नसीहत लगता है नहीं पढ़ पाए। इसलिए आज वे दुनिया के मशहूर लोगों की मामूली अहिंसक ट्वीट पर भी भारत सरकार की तरफ से हमला कर रहे हैं कि किसान आंदोलन भारत का आंतरिक मामला है इससे बाहर के लोग दूर रहें। अब भारत सरकार के लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इसी तर्क का इस्तेमाल करते हुए अमरीका के हिंसक ट्रंपवादी मोदी से सवाल कर सकते हैं कि कैपिटल हिल के अंगने में तुम्हारा क्या काम है?
जिनके दिमाग का दीवालिया निकल चुका है, महज वे ही लोग आज दुनिया को ऐसी सरहदों में बांटने की कल्पना कर सकते हैं जिनके आरपार लोग बयान भी न दें। अगर पश्चिम के देशों का दबाव न होता और वहां हिन्दुस्तानी बाल मजदूरों के बुने कालीनों का बहिष्कार न हुआ होता, तो क्या हिन्दुस्तान में कालीन उद्योग में बाल मजदूर घटे होते? ऐसे कितने ही मामले हैं जिनमें दूसरे देश या कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन अपने दबाव से किसी देश में फेरबदल लाते हैं। बांग्लादेश में कपड़े बनाने वाले मजदूरों की बदहाली और उनकी बहुत ही कम मजदूरी के खिलाफ पश्चिम के देशों ने खुद अपने कारोबारियों का जमकर विरोध किया, और उन्हें मजबूर किया कि वे बांग्लादेश के कारखानेदारों से वहां के मजदूरों को अधिक मजदूरी दिलवाएं। यह तो आज की दुनिया में सभ्य और विकसित लोकतंत्रों की पहचान है कि वे अपने निजी स्वार्थों और अपनी तंग-सीमाओं से बाहर जाकर दूसरों के लिए कितना कुछ कर सकते हैं। और यह कोई नई बात भी नहीं है, हिन्दुस्तान जब आजाद हुआ उसके पहले से गांधी लगातार फिलीस्तीनियों के पक्ष में और इजराइल के खिलाफ लिखते थे। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का गांधी का विरोध तो उस देश की आंतरिक व्यवस्था पर सीधा हमला था, लेकिन हिन्दुस्तान उस पर गर्व करता है। गांधी न तो दक्षिण अफ्रीकी थे, न ही वहां आंदोलन का उनका कोई कानूनी हक बनता था। लेकिन वे उस पिछली सदी में भी एक जागरूक विश्व नागरिक थे, और इस नाते वह हक न होते हुए भी उनकी जिम्मेदारी थी। आज हिन्दुस्तान के जो कमअक्ल और अधिक बदनीयत वाले लोग गैरहिन्दुस्तानियों की आलोचना पर हिंसक हमले कर रहे हैं, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि ऐसा करते हुए वे गांधी की डाली हुई गौरवशाली परंपराओं को खारिज भी कर रहे हैं। जो लोग हिन्दुस्तान की सरकार की आलोचना को हिन्दुस्तानियों का देशद्रोह मानते हैं, और गैरहिन्दुस्तानियों की नाजायज दखल मानते हैं, वे गांधी के युग की दुनिया को भी नहीं समझते, आज की दुनिया तो दूर की बात है। दिक्कत यह है कि दुनिया को बचाने की फिक्र करने वालों की गिनी-चुनी ट्वीट के मुकाबले दुनिया को तबाह करने पर आमादा लोगों की ट्वीट लाखों गुना है। हिंसा की सुनामी के बीच भले लोगों के पांव जमीन पर टिके रहें, ऐसा खासा मुश्किल है। लेकिन फिर भी दुनिया का इतिहास है कि वह ऐसी ही नफरत और हिंसा के बीच से उबरकर एक बेहतर दुनिया बनी है। और इतिहास की मिसालों से परे इस दुनिया में ऐसी संभावनाएं हैं कि वह आज से बेहतर बन सकती है। आज दुनिया के किसी भी लोकतंत्र को यह भूल जाना चाहिए कि वे थ्यानमान चौक पर, हांगकांग में, सीरिया में या सिंघु बॉर्डर पर कुछ मनमानी करके बिना आलोचना, बिना प्रतिक्रिया रह सकते हैं। अंदरूनी मामला तो इतिहास के हर मामले को कहा जा सकता है, हिटलर अपने देश के भीतर दसियों लाख यहूदियों को मार रहा था, और वह भी उसका अंदरूनी मामला था। 21वीं सदी की दुनिया में इतना अंदरूनी कुछ भी नहीं रह गया है कि जिस पर सरहद के बाहर के लोग मुंह न खोलें। भारत सरकार के डिफेंस सिस्टम के दिमाग में यह बुनियादी बात बैठाने की जरूरत है।
आपातकाल के योद्धा रहे बिहार का नैतिक पतन !
एक पखवाड़े में बिहार सरकार का लोकतंत्र के खिलाफ एक दूसरा फैसला सामने आया है। कुछ दिन पहले ही राज्य सरकार ने यह आदेश जारी किया है कि अगर सोशल मीडिया पर कोई जनप्रतिनिधि या सरकारी अधिकारी पर अमर्यादित टिप्पणी करेंगे, तो उस पर पुलिस सख्ती से कार्रवाई करेगी। अब कल यह नया फैसला सामने आया है कि अगर बिहार में किसी विरोध-प्रदर्शन या सडक़ जाम में कोई शामिल होते हैं, और पुलिस उनके खिलाफ मामला पेश करती है, तो उन्हें न कोई सरकारी नौकरी मिल पाएगी, न ही कोई सरकारी ठेका मिल पाएगा। नीतीश सरकार के ये दोनों फैसले लोकतंत्र को कुचलने वाले कहे जा रहे हैं, और इनके खिलाफ लगातार राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया आ रही हैं।
बिहार भारत के लोकतंत्र में एक मजबूत स्तंभ रहा है। खुद नीतीश कुमार से लेकर लालू यादव तक बहुत से नेता आपातकाल का विरोध करते हुए छात्र राजनीति और राजनीति में आगे बढ़े, और बड़े नेता बने। आपातकाल के जॉर्ज फर्नांडीज जैसे बड़े नेता बिहार से चुनाव लडक़र संसद में बड़े नेता बने थे। ऐसे में अगर कोई राज्य लोकतंत्र को कुचलने का काम करता है, तो वह अदालत में भी नहीं टिक पाएगा, और जनता की अदालत में तो उसकी थुक्का-फजीहत शुरू हो ही चुकी है। दरअसल अपने चौथे कार्यकाल में नीतीश कुमार को शायद अब यह लग रहा है कि उनके पास खोने को कुछ नहीं है, और पाने को भी इससे अधिक कुछ नहीं है, और यह भी कब तक जारी रहता है, वह भी साफ नहीं है, इसलिए वे शायद लोकतंत्र पर आस्था खो चुके हैं। वैसे भी देश का माहौल कुल मिलाकर लोकतंत्र को एक निहायत ही अवांछित सामान मानकर चल रहा है कि वह सीढ़ी चढक़र सत्ता तक पहुंच गए, और अब उस सीढ़ी को लात मारकर गिरा देने में कोई हर्ज नहीं है।
आज जब दुनिया के तमाम सभ्य लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तमाम तरीकों का सम्मान बढ़ाते चल रहे हैं, तब हिन्दुस्तान का यह एक सबसे बड़ा राज्य अपनी सरहद में लोकतंत्र को इस तरह खत्म करने में जुटा है। जो नौजवान देश के तमाम राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों की रीढ़ की हड्डी रहते आए हैं, उनको ऐसे आंदोलनों में जाने से रोकने के लिए उनका नौकरी का हक छीनना एक ऐसी नाजायज बात है जो कि अदालत में नहीं टिक पाएगी। अगर आंदोलनों में सडक़ों पर उतरना ऐसा जुर्म है, तो फिर लालू यादव से लेकर नीतीश कुमार तक इन सबको मुख्यमंत्री बनने के लिए भी अपात्र कर देना चाहिए क्योंकि इनके ऊपर भी आंदोलनों के अपने दिनों में कई जुर्म कायम हुए होंगे। जो बात किसी को क्लर्क बनने के लिए भी अपात्र ठहराती है, वह बात सांसद और विधायक बनने की अपात्रता भी रहनी चाहिए। दरअसल नीतीश सरकार लोगों को धमकाने में लगी है। सोशल मीडिया पर लोग जनप्रतिनिधियों और अफसरों के बारे में नहीं लिखेंगे तो क्या वे जागरूक नागरिक रह जाएंगे? और अगर वे कोई गलत बात लिखते हैं तो उसके लिए सरकार के पास अलग से तरह-तरह के कानून हैं। इस पर पुलिस कार्रवाई के लिए अलग से आदेश निकालना अपने लोगों को धमकाने के अलावा कुछ नहीं है। पिछले बरसों में सुप्रीम कोर्ट बार-बार इस बात को कह चुका है कि सोशल मीडिया को लेकर सरकारों की की गई बहुत सी कार्रवाई नाजायज है और उसमें आईटी एक्ट की कुछ धाराओं को खारिज भी किया है। बिहार सरकार के ये दोनों ही मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर खारिज होंगे, इनसे सरकार का कोई भला नहीं होना है, और धमकाने का यह तरीका अदालती फैसला आने तक का ही है। देश में आज लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का अभियान चल रहा है, और नीतीश कुमार उसी लहर पर सवार चल रहे हैं। वे अपने राजनीतिक जीवन की सबसे ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं, और अब न सिर्फ राजनीति का, बल्कि उनकी नैतिकता का भी उतार चल रहा है।
किसान आंदोलन, 26 जनवरी के पहले, और बाद का फर्क
सोशल मीडिया के एक तबके की बात छोड़ दें, तो भारत का किसान आंदोलन चल भी रहा है, इसकी खबर मीडिया के कम ही हिस्से में देखने मिलती है। कुछ तो देश का प्रमुख मीडिया सोशल मीडिया के दबाव में भी काम करता है कि वहां कौन सी बातें लिखी जा रही हैं। क्योंकि दोनों के ग्राहक तो एक ही हैं। लोग फेसबुक और ट्विटर पर किसान आंदोलन की दिल दहलाने वाली खबरें पढ़ लेंगे, और अगर उन्हें बड़े समाचार चैनलों और अखबारों से निराशा मिलेगी, तो ऐसे मीडिया के ग्राहक भी टूटेंगे। इस दबाव में भी किसानों की खबरें दिखाई जा रही हैं।
लेकिन मौजूदा किसान आंदोलन दिल्ली के इर्द-गिर्द, पंजाब और हरियाणा, और अब कुछ हद तक लगे हुए उत्तरप्रदेश के किसानों पर टिका हुआ है। कहने के लिए तो मुम्बई से चलकर शिवसेना के एक सबसे ताकतवर नेता संजय राऊत भी किसानों के समर्थन के लिए दिल्ली के पास किसान आंदोलन पहुंचे, लेकिन मोटेतौर पर बाकी देश में किसानों का समर्थन प्रतीकात्मक अधिक चल रहा है, जमीन पर कम। कांग्रेस के एक प्रमुख नेता दिग्विजय सिंह बार-बार सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से कह रहे हैं कि किसानों के समर्थन में सडक़ों पर निकलें, लेकिन महाराष्ट्र में शरद पवार, पंजाब में सुखबीर बादल, और बाकी प्रदेशों में वामपंथी पार्टियां, कार्यकर्ता किसानों के साथ सामने आए हैं। अगर दिल्ली को इस तरह घेरने की ताकत इस किसान आंदोलन में न होती, तो देश के किसी दूसरे हिस्से में ऐसा आंदोलन अब तक दम तोड़ चुका होता।
यह सोचने की जरूरत है कि जो किसान और जो किसानी देश के लोगों के जिंदा रहने के लिए सबसे जरूरी बातें कही जा रही हैं, वे खुद भी इस आंदोलन में पूरे देश में सामने क्यों नहीं हैं? हिन्दुस्तान में किसानी के काम में लगे हुए करोड़ों खेतिहर मजदूर किसानी पर जिंदा तो हैं, लेकिन वे खुद किसान नहीं हैं, महज मजदूर हैं। और फिर यह मजदूरी भी इतनी अनियमित, इतनी असंगठित, और अनिश्चित है कि ये ही खेतिहर मजदूर मनरेगा जैसी ग्रामीण मजदूरी योजना पर निर्भर रहते हैं। दूसरी बात किसानी करने वाले लोगों में भी बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो कि भूस्वामी से खेत ठेके पर या किसी और अनुबंध के तहत लेकर मजदूर की तरह उस पर काम करते हैं, और कमाई साझा करते हैं। नतीजा यह है कि किसानी कानून के जितने किस्म के फायदे हैं, या नुकसान हैं, उनके ऐसे अधिया किसान सीधे प्रभावित नहीं होते हैं क्योंकि जमीन उनके नाम पर नहीं है। जमीन का मालिकाना हक किसान को ताकतवर भी बनाता है, और ऐसे आंदोलन में उसे जोडक़र भी रखता है। लेकिन आज हिन्दुस्तान के बाकी हिस्सों में किसान आंदोलन अगर मजबूत नहीं है, जमीन पर नहीं है, तो इसकी एक वजह यह है कि जमीन के मालिकाना हक वाले किसान अपने इलाकों में जरा भी संगठित नहीं हैं, और किसी लंबे आंदोलन के लायक उनकी आर्थिक स्थिति भी नहीं है। अधिकतर किसान बहुत मामूली कमाई, या बिना कमाई की खेती बस करते ही आ रहे हैं, उनके पास किसी लंबे आंदोलन की ताकत भी नहीं है। वे मजबूत किसानों के आंदोलनों के फायदों की ओर तो नजर लगाए हुए हैं, लेकिन खुद अधिक ताकत के ऐसा कोई आंदोलन न शुरू कर सकते, न उसमें शामिल हो सकते।
गणतंत्र दिवस के पहले तक दिल्ली के राजधानी क्षेत्र की सरहद पर चल रहा यह आंदोलन सिक्ख किसानों पर केन्द्रित था, और आंदोलन को चलाने के लिए जो बड़ा समर्थन मिला हुआ था, वह भी सिक्ख संगठनों की तरफ से था। दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर किसानों के नाम पर जो तोडफ़ोड़ हुई, और लाल किले पर प्रदर्शन हुआ, उसके बाद से सिक्ख किसानों को कुछ चुप देखा जा रहा है। और इसके बाद की तमाम खबरों में उत्तरप्रदेश के किसान नेता राकेश टिकैत की अगुवाई दिख रही है। यह एक बड़ा फर्क गणतंत्र दिवस के बाद से आया है, लेकिन यह आंदोलन को किसी तरफ ले जाएगा, उस पर क्या फर्क पड़ेगा, यह समझना अभी मुश्किल है।
आने वाले महीनों में देश में बंगाल सहित कुछ राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, और इसे ध्यान में रखकर कल के केन्द्रीय बजट में इन राज्यों के लिए खास इंतजाम किया गया है। लेकिन दिग्विजय सिंह के कहने के बावजूद इन राज्यों के राजनीतिक दल भी किसान आंदोलन का साथ देने के लिए सडक़ों पर उतर रहे हों ऐसा दिख नहीं रहा है। शिवसेना के संजय राऊत का आंदोलन में आकर लौटना भी छोटी बात नहीं है, यह महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन की अगुवा पार्टी का नैतिक समर्थन है जिसके अपने राज्य के भीतर भी शिवसेना-गठबंधन सरकार किसानों के साथ जुड़ती है। आज केन्द्र सरकार की रणनीति के मुताबिक जिस तरह किसानों और दिल्ली के बीच कटीले तारों के समंदर फैलाए जा रहे हैं, जिस तरह सडक़ों पर भालों सरीखी नोंक लगाई जा रही है, उससे केन्द्र सरकार और किसान आंदोलन के बीच एक बड़ा फासला बढ़ते दिख रहा है। ऐसे मौके पर बाकी राजनीतिक दलों को भी अपनी प्रतिबद्धता खुलकर सामने रखनी चाहिए कि वे कटीलें तारों के किस तरफ हैं। किसान आंदोलन और आज की नौबत एक बड़ा व्यापक मुद्दा है, हम आज इसे यहां पर छू भर रहे हैं और लोगों के सोचने के लिए इन पहलुओं को सामने रख रहे हैं। राजनीतिक दलों से परे भी समाज के दूसरे तबकों को किसानों के साथ आकर खड़ा होना होगा, वरना भूखों मरने के लिए तैयार रहना होगा।
म्यांमार में फौजी तख्तापलट, हिन्दुस्तान के लिए सिरदर्द?
भारत के पड़ोस में बसे हुए म्यांमार में आज सुबह हुई सैनिक बगावत के बाद वहां की सबसे बड़ी निर्वाचित नेता आंग सान सू की सहित बहुत से निर्वाचित नेताओं को सेना ने कैद कर लिया है और देश में एक बरस के लिए इमरजेंसी लागू करके सरकार संभाल ली है। दस बरस पहले म्यांमार के चुनावों में आंग सान सू की जीतकर आई थीं और उनकी पार्टी ने सरकार बनाई थी। वैसे तो लंबे समय तक नजरबंद रहते हुए आंग सान सू की को नोबल शांति पुरस्कार भी मिला था, लेकिन पिछले कई बरसों से उनकी अंतरराष्ट्रीय साख खत्म हो चुकी थी क्योंकि उनकी सरकार ने रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यकों का जिस बुरी तरह मानव संहार करके उन्हें देश से निकाला था, उसकी उम्मीद उनसे और उनकी सरकार से किसी ने नहीं की थी। म्यांमार पांच देशों के बीच बसा हुआ देश है। बांग्लादेश, भारत, चीन, लाओ, और थाईलैंड से उसकी सरहद जुड़ी है, और इन देशों में से रोहिंग्या मुस्लिमों को बांग्लादेश ही शरण पाने के लिए ठीक लगा था, और वे समंदर के रास्ते वहां पहुंचे। अभी बांग्लादेश म्यांमार से रोहिंग्या शरणार्थियों की वापिसी के लिए बातचीत कर ही रहा था कि म्यांमार सरकार चली गई, और वहां जो फौजी तानाशाह आज काबिज हुआ है, वह रोहिंग्या शरणार्थियों के व्यापक मानव संहार का मुजरिम माना जाता है।
करीब साढ़े 5 करोड़ आबादी का यह देश वैसे तो भारत के एक औसत राज्य जितना बड़ा ही है, लेकिन चीन से लगी हुई लंबी सरहद के चलते म्यांमार भारत की विदेश और फौजी नीतियों में बड़ी नाजुक जगह रखता है। चीन की तरह ही म्यांमार बौद्ध बहुल देश है, और वहां सत्तारूढ़ बौद्ध ताकतों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों को कुचलकर भी रखा है। म्यांमार में 85-90 फीसदी बौद्ध हैं, और उनकी मार के आगे 4 फीसदी के करीब मुस्लिमों के बचने की गुंजाइश कम ही थी। नतीजा यह हुआ कि लाखों रोहिंग्या शरणार्थी उनके गांव जला दिए जाने के बाद, व्यापक हत्या और बलात्कार के बाद देश छोडऩे को मजबूर हुए थे।
अंग्रेजों के वक्त से बर्मा कहे जाने वाले इस देश के साथ भारत के मजबूत रिश्ते रहे, लेकिन सांस्कृतिक रूप से आज का म्यांमार अपने बाकी बौद्ध बहुल देशों, चीन, लाओ, और थाईलैंड के अधिक करीब रहा। वैसे भी भारत और बांग्लादेश की सरहद से जुड़े म्यांमार में चीन की दिलचस्पी स्वाभाविक ही है, और नक्शे को देखें तो एक और वजह समझ आती है कि भारत और बांग्लादेश की करीब समुद्री सीमा भी म्यांमार से लगी हुई है, और वह चीन के लिए रणनीतिक रूप से जरूरी भी है। ऐसे में भारत के इस पड़ोसी देश का कमजोर लोकतंत्र जब घोषित रूप से फौजी तानाशाही बन रहा है, तो भारत के लिए यह एक बड़ी फिक्र की बात भी है। चीन के साथ कई मोर्चों पर भारत की तनातनी, और टकराहट जारी है। चीन और भारत के बीच एक दूसरे देश नेपाल को लेकर भी इन दोनों देशों में खींचतान है, और नेपाल से भी भारत के लिए कोई राहत की बात नहीं आ रही है, घूम-फिरकर नेपाल चीन के करीब ही दिखाई पड़ता है।
म्यांमार में 2011 में चुनाव जीतकर सत्ता में आई शांति की प्रतीक दिखती आंग सान सू की म्यांमार के पिछले चुनावों में बड़े पैमाने पर धांधली की फौजी तोहमत भी झेल रही थीं। सरकार और सेना के बीच तनातनी चल रही थी, और आंग सान सू की की पार्टी की चुनावी जीत की आंधी को फौज ने धोखाधड़ी और धांधली करार दिया था। म्यांमार के पिछले दशकों को देखें तो यह जाहिर है कि वहां लोकतंत्र बहुत मजबूत नहीं था, और फौज जरूरत से अधिक बड़ा किरदार निभाते आ रहा था। 2011 के चुनाव के पहले 15 बरस आंग सान सू की नजरबंदी में थी, लेकिन इस पूरे लोकतांत्रिक संघर्ष की उनकी साख रोहिंग्या मुस्लिमों के जनसंहार से खत्म हो गई थी।
भारत के पास आज म्यांमार को लेकर सार्वजनिक रूप से करने को कुछ नहीं है। भारत काफी पहले वह नैतिक ताकत खो चुका है जिससे वह दुनिया भर में दूसरे देशों के मामलों में भी खुलकर बोल पाता था। इसलिए आज जब दूर बैठा अमरीका म्यांमार के आज के फौजी सत्ता पलट पर भारी नाराजगी जाहिर करते हुए नेताओं की रिहाई की मांग कर रहा, और फौजी ताकतों को चेतावनी दे रहा है, तब भारत के करने का कुछ नहीं दिखता। भारत अपनी जमीन पर शरण पाए हुए रोहिंग्या मुस्लिमों को लेकर भी छुटकारा पाने की कोशिशों में लगा हुआ है, और बीते बरसों में इन मुस्लिमों का भारत में कुछ तबकों ने खुलकर विरोध भी किया था। आने वाला वक्त यह साफ करेगा कि म्यांमार की नई फौजी हुकूमत कितने वक्त तक चलती है, उसका रूख क्या रहता है, वहां पर चीन का दखल क्या रहता है, और इस फौजी हुकूमत का भारत के लिए क्या रूख रहता है। फिलहाल हम भारत के किसी भी पड़ोसी देश में लोकतंत्र के कमजोर होने को भारत के लिए एक बड़ी परेशानी मानते हैं, और उसे भारत के लिए एक खतरा मानते हैं।




