देश के बड़े जज अपना देश देखने न्यायमित्र क्यों तैनात नहीं कर लेते?

  बहुत अरसा पहले जब हिंदी फिल्में एक ढर्रे पर बनती थीं तो उनमें कोई गुंडा आकर हीरोइन का बटुआ छीनकर भागता था और हीरो आकर उस गुंडे को पीट-पीटकर वह बटुआ लाकर हीरोइन को देता था और उसका दिल जीत लेता था। फिर फिल्मों में ही इसे एक तरकीब की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा और हीरो भाड़े के ऐसे गुंडे से हीरोइन का पर्स छिनवाता था और उसे लाकर देकर अपने आपको हीरो साबित करता था। इसी किस्म से हिंदी फिल्मों का एक और जमा-जमाया ढर्रा चल रहा था कि फिल्म के आखिर में जब हीरो विलेन को मार-मारकर हीरोइन को छुड़ा चुका रहता है, और विलेन को जमीन पर पटक-पटककर जख्मी कर चुका रहता है तब पुलिस की जीप सायरन बजाते पहुंचती है और महज गिरफ्तार करने का काम करती है। हिंदुस्तान की कई संवैधानिक संस्थाओं का हाल आज कुछ इसी किस्म से चल रहा है। 

पिछले दो दिनों से मद्रास हाईकोर्ट का चुनाव आयोग के खिलाफ एक हमलावर तेवर खबरों में बना हुआ है जिसमें चुनाव प्रचार की वजह से फैले कोरोना संक्रमण को देखते हुए हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है कि उसकी गैर जिम्मेदारी तो इस दर्जे की है कि उसके खिलाफ हत्या का जुर्म दर्ज किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने इतनी कड़ी बातें कही हैं कि हिंदुस्तान की जनता खुश हो गई कि चुनाव आयोग को अच्छी जमकर लताड़ पड़ी। लेकिन अब सवाल यह है कि मद्रास हाईकोर्ट का यह रूप कब देखने में आ रहा है? उस दिन जिस दिन कि वोट डाले हुए 20 दिन हो चुके हैं? चुनाव कार्यक्रम घोषित हुए शायद दो महीने, और चुनाव प्रचार खत्म हुए भी 20 दिन से अधिक हो चुके हैं, तब जाकर अगर हाईकोर्ट को यह दिख रहा है कि पूरा चुनाव जनता की सेहत को खतरे में डालकर करवाया जा रहा है तो यह देखना आज किस काम का रह गया है? सोशल मीडिया पर लोगों ने यह भी कहा है कि क्या हत्या का जुर्म सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भी दर्ज नहीं होना चाहिए जो कि देशभर में चुनाव-प्रचार और कोरोना की मिली-जुली कदमताल देखते हुए भी चुप बैठे हुए थे? और सवाल यह है कि जब असम से लेकर बंगाल तक और केरल से लेकर तमिलनाडु तक चारों तरफ चुनाव चल रहे थे, चारों तरफ यह लिखा जा रहा था कि ऐसा भयानक चुनाव प्रचार, ऐसी भयानक रैलियां, लोगों को खतरे में डालकर छोड़ेंगे और कोरोना इन्हें देखकर बहुत खुश हो रहा है, क्या उस वक्त भी देश के सुप्रीम कोर्ट को यह नहीं दिखा कि बंधुआ मजदूर की तरह काम करते हुए चुनाव आयोग से परे, देश की सबसे बड़ी अदालत को भी कुछ करना चाहिए? और अगर सुप्रीम कोर्ट ने अपना जिम्मा पूरा नहीं किया, तो फिर आज कागजी और सतही सुनवाई करके सरकार को कोरोना के मोर्चे पर कटघरे में खड़ा करने का क्या मतलब है?

मद्रास हाईकोर्ट का फैसला हिंदी फिल्मों में बीते वक्त में आखिर में सायरन बजाते हुए पहुंची पुलिस जीप की तरह का है, जिससे अब केवल चुनाव की मतगणना की गर्दन हाईकोर्ट के हाथ में आ रही है, और चुनाव आयोग ने अदालत के आदेश के बाद आज यह रोक लगा दी है कि जीतने वाले उम्मीदवार कोई विजय जुलूस नहीं निकालेंगे। हाथी निकल चुका है अब आखिर में बची हुई उसकी दुम पर हाईकोर्ट और चुनाव आयोग दोनों अपना झंडा लगाकर कामयाबी दिखा रहे हैं। यह पूरा सिलसिला हिंदुस्तानी लोकतंत्र की नाकामयाबी का है, जिसमें कई राज्यों में चल रहे चुनावों में एक साथ दखल देने का अधिकार अकेले सुप्रीम कोर्ट का था। और जब देश के बच्चे-बच्चे को दिख रहा था कि चुनाव आयोग चुनाव कार्यक्रम तय नहीं कर रहा था, चुनावी आम सभाओं की सहूलियत तय कर रहा था, उस वक्त भी सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना के बढ़ते हुए खतरे को अनदेखा किया। जज चुपचाप अपने बंगलों में कैद होकर महफूज़ बैठ गए। उस वक्त भी हमने यह बात लिखी थी कि सुप्रीम कोर्ट के जजों के स्टाफ के कुछ कर्मचारी पॉजिटिव निकलने पर जिस रफ्तार से जजों ने अपने को अपने बंगलों में कैद कर लिया था, उन्हें देश की बाकी हालत नहीं दिखी, उन्हें देश में बाकी जगहों पर जनता को खतरे में डालते हुए राजनीतिक दल, सरकार और चुनाव आयोग नहीं दिखे? 

आज देश में हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक और चुनाव आयोग तक ऐसी अनगिनत संवैधानिक संस्थाएं हैं जो कि वक्त निकल जाने पर काम शुरू करती हैं, ठीक उसी तरह जैसे आज केंद्र सरकार वेंटिलेटर के रोक दिए गए आर्डर जिंदा कर रही है, ऑक्सीजन के प्लांट लगाने के लिए देशभर के जिलों को मंजूरी दे रही है। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र की नाकामयाबी का है। जब केंद्र और राज्यों के संबंध इस हद तक तनातनी के चल रहे हैं कि केंद्र सरकार देश के संघीय ढांचे को कुछ गिन ही नहीं रही है, जब वह राज्यों के कोई अधिकार मान ही नहीं रही है, उस वक्त भी अगर सुप्रीम कोर्ट को अपनी जिम्मेदारी का एहसास नहीं हो रहा है, तो यह उसकी नाकामयाबी है। आज पत्ता-पत्ता बूटा -बूटा हाल हमारा जाने है, जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है, जैसी हालत हिंदुस्तानी लोकतंत्र की हो चुकी है। आज बेहतर तो यह होगा कि जिस तरह सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में अपनी मदद के लिए किसी बड़े वकील को न्याय मित्र बनाकर तैनात करता है कि वह जटिल मामलों को समझकर अदालत को उसकी बारीकियां समझाएंगे, सुप्रीम कोर्ट को इस देश में एक से अधिक ऐसे न्याय मित्र तैनात करने चाहिए जो सोशल मीडिया पर देखकर, अब तक ईमानदार रह गए कुछ अखबारों को देखकर, देश की हालत सुप्रीम कोर्ट को बताएं, क्योंकि जजों को खुद होकर अखबारों के पहले पन्ने की बड़ी-बड़ी सुर्खियां भी दिख नहीं रही है। 

तमिलनाडु में 6 अप्रैल को वोट डल चुके और 26 अप्रैल को हाईकोर्ट के जजों को यह दिख रहा है कि चुनाव आयोग पर हत्या का जुर्म दर्ज किया जाना चाहिए। 6 अप्रैल के दो दिन पहले प्रचार बंद हो चुका होगा और तमाम आम सभाएं और रैलियां 4 अप्रैल के पहले खत्म हो चुकी होंगी। अब तक तो चेन्नई के मरीना बीच में से उस दिन के बने हुए पदचिन्ह भी मिट चुके होंगे, और अब जाकर मद्रास हाई कोर्ट को इतनी कड़ी टिप्पणी करना सूझ रहा है जबकि वहां के जज वहां के स्थानीय अखबारों में टीवी चैनलों पर और सोशल मीडिया पर लगातार चुनाव प्रचार का माहौल देख रहे होंगे। कुछ ऐसा ही देखना कोलकाता में वहां के हाईकोर्ट के जजों का हो रहा होगा, केरल हाईकोर्ट के जज भी देख रहे होंगे, गुवाहाटी में असम के हाई कोर्ट के जज भी देख रहे होंगे, और सुप्रीम कोर्ट के जज तो पूरे हिंदुस्तान के मालिक हैं इसलिए वे तो देख ही रहे होंगे। लेकिन देश की किसी अदालत ने समय रहते हुए इस देश के लोगों की जिंदगी की फितख नहीं की। नेताओं ने बंगाल की अपनी आमसभा में जहां तक नजर जाए वहां तक लोगों के सिर ही सिर दिखने पर खुशी जाहिर की, लेकिन किसी जज को इन सिरों पर मंडराते हुए खतरे को देखने की फुर्सत नहीं थी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के तमाम जज अदालत के अपने चेंबर से अपने बंगलों के चेंबर जाने में लगे हुए थे। ऐसा लगता है किस देश का मीडिया और सोशल मीडिया जिन नजरों से हिंदुस्तान को देखता है, वह नजर भी जजों को हासिल नहीं है। इसलिए इस बात में कोई बुराई नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के जज अपने लिए कुछ ऐसे न्याय मित्र नियुक्त करें जो कि अखबारों को पढक़र और सोशल मीडिया देखकर जजों को बताएं कि हिंदुस्तान आज किस हाल में है। ऐसा लगता है कि न्याय की देवी की जो आंखों पर पट्टी बंधी हुई प्रतिमा न्याय के प्रतीक के रूप में पूरी दुनिया में प्रचलन में है, कुछ वैसी ही पट्टी हिंदुस्तान जैसे लोकतंत्र के बड़े-बड़े जज अपनी आंखों पर बांधे रखते हैं, और इस पट्टी को उस वक्त खोलते हैं जब उनके करने का कुछ नहीं रह जाता, और अदालती इतिहास में अपनी टिप्पणियों को दर्ज करने के लिए वे बड़ी कड़ी-कड़ी बातें कहते हैं जिनका असल जिंदगी में कोई इस्तेमाल नहीं बचता। 

अखबारों को मद्रास हाई कोर्ट के जजों की कही हुई बातों से एक अच्छी सुर्खी मिल गई, और हिंदुस्तानी लोकतंत्र के बेवकूफ वोटरों को यह तसल्ली मिल गई कि चुनाव आयोग को अच्छी लताड़ पड़ी है, लेकिन इस किस्म की नूरा कुश्ती देखकर आज अगर सबसे अधिक हंसी किसी को आ रही होगी तो वह कोरोना को, जिसे कि बंगाल में लाखों लोगों की भीड़ मिली जिनमें सैकड़ों मास्क भी नहीं थे। लोकतंत्र ऐसी नूरा कुश्ती या शास्त्रीय संगीत की जुगलबंदी का नाम नहीं है, लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के एक दूसरे पर संतुलित काबू का नाम है, जो कि आज खत्म हो चुका है। इस देश में 20 हज़ार करोड़ की लागत से नए संसद भवन और उसके आसपास के इलाके को आलीशान बनाया जा रहा है। संसद भवन का संसदीय इस्तेमाल शून्य सरीखा हो गया है, उसके लिए 20 हज़ार करोड़ की नई शान शौकत! यह जिसे हक्का-बक्का नहीं करती, उन्हें वोट डालने का भी कोई हक नहीं होना चाहिए। इस देश में आज ऑक्सीजन की कमी से लोग सडक़ों पर मर रहे हैं, योगीराज के रामराज में सरकारी अस्पताल के बाहर एक महिला, ऑक्सीजन के बिना मरते अपने कोरोनाग्रस्त पति को बचाने के लिए मुंह से सांसें देने की कोशिश में विधवा हो जाती है. लेकिन हिंदुस्तान नाम के दम तोड़ते इस लोकतंत्र के मुंह से मुंह लगाकर भला कौन ऑक्सीजन दे सकते हैं ? वोटर तो पहले ही खुद ही मुर्दा हो चुके हैं।   (Daily chhattisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 26 अप्रैल 2021


 

मीडिया नाम के किरदार के सतह के नीचे के काम भी समझने की बड़ी जरूरत है

 पिछले कुछ दिनों से हिंदुस्तान की खबरों में सतह पर ही इतना कुछ तैर रहा था कि लिखने के लिए कोई मुद्दा ढूंढना मुश्किल नहीं था। लेकिन सतह से नीचे, आंखों से सीधे-सीधे न दिखने वाले भी बहुत से ऐसे मुद्दे रहते हैं जिनको देखना-समझना और उन पर लिखना जरूरी होता है। ऐसा ही एक मुद्दा हिंदुस्तान में आज मीडिया में है, और मीडिया के बारे में भी है। इसे लिखना न महज मीडिया के बारे में लिखना होगा, बल्कि लोकतंत्र के बाकी पहलू भी इससे जुड़े हुए हैं, और उन पर लिखना भी हो जाएगा।

अभी जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ मुख्यमंत्रियों के साथ एक वीडियो कॉन्फ्रेंस की, और उसके बाद टीवी की खबरों में केवल एक खबर लगातार छाई रही कि किस तरह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वीडियो कॉन्फ्रेंस का अपने सिरे से जीवंत प्रसारण कर दिया था। केंद्र सरकार से लेकर, कुछ मुख्यमंत्रियों तक ने इसकी खूब आलोचना की और दो दिन मीडिया में केजरीवाल की यह नाजायज कहीं जा रही हरकत, प्रोटोकॉल के उल्लंघन के रूप में छाई रही। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो इस बात को लेकर टूट ही पड़ा कि किस तरह केजरीवाल ने प्रधानमंत्री के साथ बैठक के प्रोटोकॉल को तोड़ा है। यह एक अलग बात है कि बैठक के चलते हुए ही केजरीवाल ने इस बात के लिए मोदी से भरपूर माफी मांग ली थी। लेकिन देश में कोरोना मोर्चे पर हालत को लेकर हुई इस बैठक के बाद तमाम खबरें केवल प्रोटोकॉल के इस उल्लंघन को लेकर बनती रहीं,  मानो देश में कोरोना के खतरे से अधिक बड़ा प्रोटोकॉल पर यह खतरा था। 

सतह के नीचे की चीजों को पढऩे या उनका अंदाज लगाने वाले लोगों ने इसे केजरीवाल की पुरानी कई हरकतों और तरकीबों से जोडक़र देखा और अंदाज लगाया कि देश की खतरनाक नौबत पर प्रधानमंत्री की जिस बैठक के बाद आमतौर पर केंद्र सरकार की नाकामी आलोचना के केंद्र में होनी चाहिए थी, वह आलोचना तो कहीं हो ही नहीं पाई क्योंकि केजरीवाल ने प्रोटोकॉल तोड़ दिया था। लोगों का यह अंदाज है कि केजरीवाल ने सोच-समझकर ऐसी हरकत की जिसे कि बाद में सोचे-समझे मीडिया ने सोच-समझकर शाम की सुर्खी बना दिया और केंद्र सरकार की नाकामी की बात तो आई-गई ही हो गई। अब यह बात सच है या नहीं है, यह तो केजरीवाल और मोदी ही बता सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में ऐसे बहुत से मौके आते हैं जब किसी एक खबर को दबाने के लिए उसी वक्त कोई दूसरी खबर ऐसी चटपटी खड़ी कर दी जाती है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो उस पर टूट ही पड़ता है। फिर आज तो देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मोटे तौर पर मोदी सरकार के साथ सिंक्रोनाइज्ड स्विमिंग करते दीखता है। 

प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ऐसे फर्क को लेकर पिछले कुछ महीनों में हमने इसी जगह एक से अधिक बार लिखा है कि किस तरह बीते कल के अखबारों को आज के मीडिया नाम के एक व्यापक शब्द के तहत लाया गया है, और धीरे-धीरे अखबार नाम का शब्द, न्यूजपेपर नाम का शब्द, गायब कर दिया गया और केवल मीडिया शब्द रह गया। आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और अखबार, और एक किस्म से डिजिटल मीडिया भी, इस मीडिया शब्द के तहत आ गए हैं और अखबारों की अपनी एक पेशेवर पहचान गायब हो गई है। आज इस देश में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हाल को देखें तो लगता है कि बीते कल का प्रिंट मीडिया, यानी अखबार एक बेहतर पत्रकारिता करते थे जिसकी विश्वसनीयता अधिक थी, जिसे लोग अधिक गंभीरता से लेते थे, और जिसे तोडऩा-मरोडऩा इतना आसान नहीं था जितना कि आज टीवी चैनलों के साथ देखने मिलता है. 

टीवी चैनल अपने प्रसारण को लेकर और प्रसारण के बाद सोशल मीडिया पर अपने लोगों की मौजूदगी से अपना जो आक्रामक तेवर दिखाते हैं, उसके भीतर एक बड़ी सधी हुई सोच दिखती है। अभी जब केंद्र सरकार एकदम से आलोचना का शिकार हो रही थी, देश और दुनिया के अखबार कोरोना के बेकाबू होने को लेकर भारत की मोदी सरकार के खिलाफ काफी कुछ लिख रहे थे, उस वक्त यह देखना दिलचस्प था कि किस तरह हिंदुस्तान के अधिकतर समाचार चैनलों ने एक ही दिन एक ही शब्द को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया कि हिंदुस्तान में व्यवस्था नाकामयाब हो गई है, सिस्टम फेल हो गया है। ये शब्द ‘सिस्टम’ और ‘व्यवस्था’ बरसों से कहीं चर्चा में नहीं थे, लेकिन एकाएक जब आलोचना का केंद्र मोदी के इर्द-गिर्द हो चुका था, तब मानो मोदी के विकल्प के रूप में व्यवस्था नाम का शब्द छांटा गया और बहुत सारे चैनलों के संपादकों और चर्चित एंकरों ने लिखना शुरू किया कि किस तरह व्यवस्था फेल हो गई, किस तरह सिस्टम फेल हो गया। नतीजा यह हुआ कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का फोकस प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द से हटकर किसी एक ऐसी अदृश्य ‘व्यवस्था’ पर फोकस हो गया जिसे किसी ने देखा सुना ही नहीं था और जो मानो भारत सरकार से परे की कोई चीज हो। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ऐसी व्यापक सुनियोजित कोशिश उसे प्रिंट मीडिया से बिल्कुल अलग-थलग कर देती है. और यहां पर हमारी पिछले कई महीनों की यह वकालत जायज साबित होती है कि अखबारों को अपने-आपको मीडिया शब्द से बाहर लाकर अखबार या न्यूज़पेपर शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए, जो कि उनकी असली पहचान है, जो कि एक इज्जतदार पहचान भी है।

अभी चार दिन पहले हिंदुस्तान के एक नामी-गिरामी पत्रकार रहे हुए और पिछली यूपीए सरकार के वक्त पद्मश्री हासिल कर चुके, और मौजूदा एनडीए सरकार के तहत राज्यसभा में जाने की कोशिश के लिए चर्चित एक पत्रकार ने जिस तरह देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को निलंबित करने की वकालत की है उस पर हम इसी जगह काफी लंबा लिख चुके हैं। लेकिन यह बात समझने की जरूरत है कि देश के किसी रद्दी अखबार के संपादक का भी ऐसा फतवा देने का हौसला नहीं हो सकता था, कागज पर छपने वाले शब्दों की एक अलग इज्जत होती है जो कि अखबारों से अलग होने के बाद महत्व खो देती है। इसलिए देश में अखबारों को अपनी पुरानी इज्जतदार और विश्वसनीय पहचान पाने के लिए अपने को मीडिया नाम की विशाल छतरी के साए से बाहर निकाल लेना चाहिए। आज जिस तरह केंद्र सरकार को आलोचना से बचने के लिए पूरे मीडिया पर सोशल मीडिया के रास्ते दबाव बनाया जा रहा है कि मीडिया सकारात्मक खबरें दिखाए। क्या कोई टीवी के पहले के अखबारों को ऐसी नसीहत दे सकते थे कि सच के बजाय सकारात्मक दिखाएँ? ऐसे वक्त सच की जगह ‘सकारात्मक’ होने की नसीहत, सच की जगह ‘सरकारात्मक’ होने की नसीहत है, और कुछ नहीं

(Daily chhattisgarh) 

दीवारों पर लिक्खा है, 21 अप्रैल 2021


 

इन सरकारों को क्यों कोसना? लोगों का खुद का जिम्मा नहीं है क्या अपने-आपको बचाना?

   लगातार इस कॉलम में सरकारों को कोसने के कई दिन निकल चुके हैं कि वे किस तरह कोरोना से जूझने में नाकामयाब रही हैं, और किस तरह सरकार के अफसरों ने पिछले पूरे एक बरस में न तो जरूरत के लायक कल्पनाशीलता दिखाई, न कोई जीवनरक्षक योजना बनाई। लेकिन आज हिंदुस्तान सहित दुनिया के कुछ और देशों में कोरोना का खतरा जिस हद तक मंडरा रहा है और खतरे के इस पैमाने पर हिंदुस्तान जिस तरह से अव्वल (लीडरशिप में नहीं, खतरे और मरने में) बना हुआ है, ऐसे में सरकारों से परे भी कुछ सोचने की जरूरत है। यह जरूरत इसलिए भी है कि लोगों को सरकारों के खिलाफ पढ़कर, लिखकर, भड़ास निकालकर ऐसा लगने लगता है कि मानव कोरोना से बचना उनकी कोई निजी जिम्मेदारी है ही नहीं। और अगर कोरोना से लडऩे को सिर्फ सरकारी जिम्मेदारी मान लिया जाएगा, तो यह करोना कभी जाने वाला नहीं है। इसलिए सरकार को कई दिनों तक लगातार कोस लेने के बाद आज हम इस मुद्दे पर चर्चा करना चाहते हैं कि लोगों को खुद भी कोरोना से बचने के लिए क्या करना चाहिए था, और चाहिए है ।

दरअसल देश में सरकारी नेताओं ने लोगों के सामने बड़ी बुरी मिसाल पेश की है कि वे खुद तो हर सार्वजनिक मौके पर बिना मास्क लगाए सामने आते हैं, और लोगों को मास्क लगाने की नसीहत देते हैं। लेकिन यह पसंद तो जनता की है कि वह नेताओं की मनमानी की बराबरी करते हुए खुद भी बिना मास्क अपना चेहरा दिखाते हुए घूमे या फिर उन डॉक्टरों की सलाह माने जो कि आज के वक्त में समाज के एक बेहतर नेता हैं, और मास्क लगाएं। नेताओं की लापरवाही और मनमानी का यह जवाब नहीं होना चाहिए कि आम जनता भी बिना मास्क लगाए घूमे, जब शहरों में चारों तरफ कोरोना का संक्रमण फैला हुआ है तब सड़क किनारे ठेलों पर खड़े खाए, तरह-तरह की दूसरी लापरवाही दिखाए, किसी तरह की सावधानी ना बरते।  नेताओं की लापरवाही का ऐसा जवाब ठीक नहीं है। यह जवाब कुछ उसी किस्म का है कि पड़ोसी अपने घर का कचरा सड़क पर डालता है इसलिए हम भी अपना कचरा उसके जवाब में सड़क पर ही डालेंगे। 

कल से छत्तीसगढ़ में एक वीडियो तैर रहा है कि किस तरह राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के, राजधानी के मेयर का भतीजा लॉकडाउन के बीच बिना मास्क स्कूटर पर घूम रहा है, और  रोकने वाले पुलिस सिपाही को सस्पेंड करवाने की धमकी दे रहा है। अब ऐसे नेताओं की बराबरी करते हुए खुद को खतरे में डालने के बजाय बेहतर यह है कि किसी शरीफ डॉक्टर की नसीहत मानकर अपने को बचाया जाये। आम लोगों के पास न तो नेताओं जितना पैसा होता, न ही उनकी तरह आनन-फानन इलाज ही आम लोगों को मिल सकता, इसलिए अपने को बचाकर चलने में ही समझदारी है। आज हिंदुस्तान में राजनीतिक नेता अच्छे रोल मॉडल नहीं रह गए हैं, इसलिए लोगों को अपनी जिंदगी बचाने के लिए अपने परिवार की जिंदगी बचाने के लिए डॉक्टरों की दी गई सलाह को मानना चाहिए जो कि आज जान जाने का खतरा झेलते हुए भी मरीजों को देख रहे हैं, इलाज कर रहे हैं, रात-दिन अस्पतालों में पड़े हुए हैं, और मर भी रहे हैं। यह एक अलग बात है कि केंद्र सरकार ने पिछले मार्च के महीने में कोरोना से मरने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों का बीमा जारी नहीं करवाया, और उन्हें पिछले बरस तक 50 लाख रुपए का जीवन बीमा हासिल था, जो कि आज नहीं है। इसलिए राजनेताओं को आदर्श मानकर चलना छोड़ देना चाहिए और लोगों को राजनीति में जवाब देने के बजाय दुनिया में डॉक्टरों के प्रति अपनी जवाबदेही रखनी चाहिए जो कि नेताओं की तमाम लापरवाही के बावजूद लोगों की जिंदगी को बचाने में लगे हुए हैं।

यह समझने की जरूरत है कि देश की राजनीति कितनी भी अच्छी या बुरी हो, सरकारें कितनी भी भ्रष्ट हों, कोरोना से लडऩे में कितनी भी लापरवाह क्यों ना हो, जो जिंदगी दांव पर लगी हैं वे आम लोगों की हैं। वे हिंदुस्तान के नागरिक बाद में हैं, सबसे पहले वे खुद का शरीर हैं, लोगों को किसी भी सरकारी नसीहत से परे, किसी भी सरकारी लापरवाही से परे अपने आपको बचाकर रखना चाहिए। किसी निकम्मी सरकार को भी हटाने के लिए अगले चुनाव तक आपका जिंदा रहना जरूरी है। अगर आप सरकार से खुश हैं तो उसे दोबारा मौका देने के लिए, और अगर सरकार से नाखुश हैं तो उसे हटाने के लिए अगले वोटिंग के दिन तक अपने-आपको जिंदा रखना आपकी जिम्मेदारी है। अभी एक महीने के इस वक्त में ही हिंदुस्तान में लोगों ने देख लिया है कि क्या तो केंद्र सरकार, और क्या तो राज्य सरकारें, लोगों की जिंदगी बचाने में इनकी क्षमता बहुत सीमित है, और उनकी जवाबदेही भी बहुत कम है। ऐसे में अपने परिवार को, अपने दफ्तर और कारोबार को, वहां काम करने वाले लोगों को महफूज रखना खुद की जिम्मेदारी है, सरकार की नहीं। सरकार को तो हराने का मौका भी हो सकता है कि कुछ वर्ष बाद आए,  लेकिन मौत तो अगले 2 दिनों में भी आ सकती है, और आज जिस तरह चारों तरफ लोग बिना दवाई के बिना अस्पताल के, बिना ऑक्सीजन के, और बिना वेंटीलेटर के मर रहे हैं, उसके बाद अंतिम संस्कार की बारी पाने के लिए मरने के बाद भी वे लड़ रहे हैं, यह सारी लड़ाई तो खुद ही लडऩी है इसमें सरकार कहीं भी आपका साथ देने वाली नहीं है। 

इसलिए लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस तरह पहाड़ या जंगल पर अकेले जीने वाले इंसान अपने दम पर जीना सीखते हैं, चकमक पत्थर को रगड़ कर आग लगाना सीखते हैं, जानवरों का शिकार करते हैं और कंदमूल ढूंढकर उसे खाकर भी जिंदा रहते हैं, जिस तरह जंगल में रहने वाले लोग बात-बात पर सरकार का चेहरा नहीं देखते और खुद अपनी ताकत पर जिंदा रहना जानते हैं, शहरी या ग्रामीण लोगों को भी इसी तरह खुद अपना बचाव करना सीखना होगा क्योंकि उन्होंने यह देख लिया कि मुसीबत के इस वक्त पर अधिकतर सरकारें जिम्मा छोड़ चुकी हैं, और लोग अपने जिंदा और अपने मुर्दा को ढूंढने के लिए अपनी खुद की ताकत पर निर्भर हो गए हैं. लोगों को यह समझ लेना चाहिए क्यों अपने आपको बीमारी से बचाना है, उससे लडऩे की तैयारी खुद कर रखनी है, अगली किसी बीमारी के पहले अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर रखनी है, साफ-सफाई की अपनी आदतें ऐसी डालनी हैं कि आने वाली कई पीढिय़ां तक सुरक्षित रहें। और इन सबसे बढ़कर यह तो है ही कि अगला मौका मिलने पर यह याद रखा जाए कि किस नेता ने, और किस पार्टी ने मुसीबत के समय आपका कितना साथ दिया था। वही एक तरीका है जिससे आप अपनी मेहनत के बाद भविष्य में सरकारी हिफाजत भी पा सकेंगे। इसलिए आज से ही अपनी और अपने परिवार की, अपने कारोबार आदतों को सेहतमंद बनाना शुरू करना चाहिए क्योंकि सरकारें भरोसे के लायक है नहीं।

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 20 अप्रैल 2021


 

राज्यों को मंझधार में छोड़ गए मोदी अपने कई पुराने फैसलों की तरह...

  भारत की नरेंद्र मोदी सरकार के फैसलों में एक अजीब सी निरंतरता है। कुछ बरस हुए जब एकाएक नोटबंदी कर दी गई और देश एटीएम की कतारों पर लग गया, लोगों के घर में खाने नहीं बचा, इलाज को पैसे नहीं बचे, और विदेश में हंसते हुए नरेंद्र मोदी के शब्दों में, लोगों के घर में बेटी की शादी थी, लेकिन उनके पास बैंक में रखे अपने पैसों तक पहुँच  नहीं थी। यह सिलसिला महीनों तक चला और बहुत से अर्थशास्त्रियों का, और समाज के लोगों का यह मानना है कि हिंदुस्तान अब तक नोटबंदी के उस फैसले से हुए नुकसान से उबर नहीं पाया है। कुछ अरसा गुजरा और जीएसटी को देश की दूसरी आजादी की तरह, आधी रात को संसद में पेश किया गया और इसके बाद का आने वाला पूरा एक बरस, और बाजार के मुताबिक तो आज तक का वक्त, लगातार तकलीफों से भरा हुआ है। लोग जीएसटी की जटिलताओं से उबर नहीं पाए हैं और खुद सरकार ने बाद के महीनों में सैकड़ों संशोधन जीएसटी में किये हैं। इतनी बार जीएसटी को बदला गया कि व्यापारी और उनके टैक्स सलाहकार, उनके सीए, इन सबका जीना हराम हो गया। फिर वह भी काफी नहीं था। जब कोरोना के बाद देश में लॉकडाउन लगाया गया तो जिस तरह आनन-फानन पूरे देश में लॉकडाउन का वह फैसला लगा तो उससे लोग हक्का-बक्का रह गए। करोड़ों मजदूर हजार-हजार किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव तक पहुंचे, रास्तों में जाने कितने भूखे-प्यासे मर गए। सरकार के पास संसद से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के लिए आंकड़े तक नहीं थे कि कितने लोग मरे, लेकिन उस यात्रा को हिंदुस्तानी भूल नहीं पाए। 

अब जब देश में कोरोना वायरस की लहर आसमान छूते हुए दिख रही है तो पूरी की पूरी मोदी सरकार, महज एक पार्टी संगठन की तरह बंगाल और दूसरे राज्यों के चुनाव में इस तरह समर्पित थी कि मानो इस वक्त का तकाजा महज चुनाव प्रचार था, महज किसी एक राज्य, या कुछ और राज्यों को जीतना था। अब जब पूरे देश में इस चुनाव प्रचार को लेकर इस चुनाव प्रचार के दौरान की सेहत की लापरवाही को लेकर आलोचना होने लगी, चारों तरफ से लोग इसके खिलाफ लिखने लगे तो प्रधानमंत्री ने कल दिन में कई घंटे लोगों से मीटिंग की, और मीटिंग का नतीजा यह निकला कि शाम होने तक टीकाकरण कार्यक्रम में एक भूकंप सरीखा बुनियादी बदलाव कर दिया गया जिसने फिर देश को हक्का-बक्का कर दिया। लोगों को याद रखना चाहिए कि नोटबंदी, जीएसटी, और लॉकडाउन के फैसलों की तरह, यह फैसला भी रहस्य से भरा हुआ है, इसके पीछे की कोई बातें सामने नहीं आई हैं कि किन तथ्यों के आधार पर, किन विश्लेषणों के आधार पर इतना बड़ा यह फैसला लिया गया है जो कि देश को एक बार फिर पिछले तीन फैसलों की तरह बुरी तरह झकझोर सकता है। एक और बात यह कि इस फैसले से देश की राज्य सरकारें ठीक उसी तरह बुरी तरह प्रभावित होने वाली हैं जिस तरह पिछले तीन फैसलों से हुई थीं, और जिनका बोझ कुल मिलाकर राज्यों के ऊपर डाल दिया गया था, कमोबेश उसी तरह की नौबत आज फिर राज्य सरकारों के सामने आ रही है, जब टीकाकरण कार्यक्रम में फेरबदल के नाम का यह अंधकार उनके सिर पर थोप दिया गया है जिसका कोई ओर-छोर नहीं दिख रहा है।

कल के मोदी सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम की जो जानकारी अब तक खबरों में सामने आई है उनके मुताबिक देश में टीका बनाने वाली अब तक की दो कंपनियों के उत्पादन का आधा हिस्सा केंद्र सरकार लेगी और उसे राज्यों को 45 बरस से ऊपर के लोगों को टीका लगाने के लिए देना जारी रखेगी। दूसरी तरफ अब 18 वर्ष से ऊपर के लोगों को टीका लगाने का फैसला केंद्र सरकार ने न केवल ले लिया है बल्कि इस उम्र के तमाम लोगों को अपनी मर्जी से यह टीका लगवाने की छूट दे दी है। इसके लिए देश की दोनों टीका कंपनियां अपना आधा उत्पादन राज्य सरकारों को, या खुले बाजार में अस्पतालों को, अपनी मर्जी के रेट पर बेच सकेंगी, और अस्पताल इन्हें एक मुनाफा लेकर लोगों को लगा  सकेंगे। इन शब्दों और शर्तों से जिन लोगों को ऐसा लग रहा है कि अब 18 बरस से ऊपर के 45 बरस तक के तमाम लोगों को टीके की सुरक्षा हासिल हो रही है, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि इस उम्र के लोग हिंदुस्तान में शायद 40-50 करोड़ से अधिक हैं। और देश में टीकों की मौजूदा उत्पादन क्षमता हर महीने 6-7 करोड़ तक सीमित है। ऐसे में जाहिर है कि जिस उम्र वर्ग के लिए टीके अब खोल दिए जा रहे हैं उनके लिए अगले 6 महीने भी देश में पर्याप्त टीके बनने वाले नहीं हैं। अब एक ऐसी चीज की कल्पना की जाए जो कि बाजार में मौजूद है, लेकिन जरूरत के लोग टीकों की उपलब्धता से 10 गुना, 20 गुना या 30 गुना अधिक हैं, तो उन टीकों को पहले कौन हासिल करेंगे? इन टीकों तक पैसों की पहुंच सबसे पहले रहेगी। और केंद्र सरकार ने राज्यों के ऊपर वैक्सीन कंपनियों से सौदा करने, रेट तय करने, और अपनी आबादी को उसे देने की पूरी ‘आजादी’ दे दी है और यह ‘आजादी’ फिर प्रधानमंत्री के एक फैसले से रातों-रात देश पर, देश की प्रदेश सरकारों पर डाल दी गई ‘आजादी’ है। यह समझने की जरूरत है कि एक पल पहले तक केंद्र सरकार ने महामारी कानून के तहत सारे प्रदेशों के सारे कोरोना-कार्यक्रम की लगाम अपने हाथ में रखी हुई थी, और एक पल में केंद्र सरकार ने 40 या 50 या 60 करोड़ लोगों का पूरा बोझ प्रदेश सरकारों पर डाल दिया है! यह सिलसिला एकदम भयानक है। राज्य सरकारों की क्षमता कितने टीके खरीदने की है, आम जनता की क्षमता अस्पतालों में टीके किस दाम पर खरीदने की है, इसका कोई अंदाज आज लोगों के पास नहीं है, लेकिन यह अंदाज जरूर है कि आज जिसके पास पैसा अधिक है उसके पास वैक्सीन खरीदने की ताकत रहेगी, और जिसके पास पैसा नहीं है उसे अगर उसकी राज्य सरकार वैक्सीन दिला सकेगी तो ही उसे मिल सकेगी। आज तक के सौ फीसदी केंद्र-नियंत्रित वैक्सीन उत्पादन और वैक्सीन वितरण कार्यक्रम को पूरी तरह से खुले बाजार का कार्यक्रम बनाकर राज्य सरकारों पर यह जिम्मा डाल दिया गया है कि वे खुद वैक्सीन कंपनियों से वैक्सीन खरीदें और तय करें कि उसे अपने लोगों को कैसे लगाना है। यह कोरोना की मौजूदा महामारी के बीच राज्यों को एक अभूतपूर्व और अकल्पनीय खतरे में और परेशानी में डालने का काम है, और यह सिलसिला मोदी सरकार के पिछले तीन ऐतिहासिक फैसलों की अगली कड़ी ही है जिसमें केंद्र ने राज्यों को न शामिल किया, न उनका साथ दिया, बल्कि अपने फैसले को पूरी तरह राज्यों पर थोप दिया। राज्य सरकारें यह भी तय नहीं कर सकतीं कि उन्हें किस आयु-वर्ग के लोगों को किस सिलसिले से टीके लगाने हैं। केंद्र ने शर्तें खुद तमाम तय कर दीं, और जिम्मा पूरा राज्यों पर डाल दिया। 

अभी दो दिन पहले ही भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुली चिट्ठी लिखकर सलाह दी थी कि कोरोना से जूझने में केंद्र सरकार को क्या-क्या करना चाहिए ,और उस चिट्ठी का एक बहुत ही सतही किस्म का राजनीतिक जवाब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की तरफ से दिया गया है जो कि बहुत बदमजा भी है। एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री ने पूरी गंभीरता से एक चिट्ठी लिखी, कुछ बिन मांगे ईमानदार सुझाव दिए, और जैसा कि दुनिया में बिन मांगे सुझावों के साथ होता है, मनमोहन सिंह जैसे सज्जन और गंभीर व्यक्ति को भी हिकारत से भरा हुआ जवाब मिला। लेकिन उससे परे, आज देश के सामने यह टीकाकरण कार्यक्रम जिस आक्रामकता के साथ बाजार के हवाले किया हुआ दिखता है, वह भयानक है। जिस देश में केंद्र सरकार एक फ्रिज, या एयरकंडीशनर, कार या मोटरसाइकिल के लिए भी देशभर के सरकारी खरीदी के रेट तय करते आई है उसके बीच यह बात बहुत ही अजीब और भयानक लगती है कि जीवनरक्षक वैक्सीन के रेट तय करने से केंद्र सरकार ने हाथ खींच लिया, उसे मुहैया कराने से हाथ खींच लिया, और यह वैक्सीन निर्माताओं के कारोबारी कार्टेल पर छोड़ दिया कि वह खुले बाजार के साथ-साथ राज्य सरकारों के साथ मोलभाव करे। कहां तो एक तरफ केंद्र सरकार देश के सरकारी खरीदी के हर सामान का रेट तय करके उसका एक वेबसाइट बनाकर राज्य सरकारों के सामने रखती है कि वे उस रेट पर खरीदी कर सकते हैं। और आज केंद्र सरकार ने इस पूरी सबसे जीवनरक्षक खरीदी से पल्ला झाडक़र उसे राज्यों पर थोप दिया है। ढाई दर्जन राज्यों को दो वैक्सीन कारोबारियों के हवाले कर दिया है कि इन्हें जिस रेट पर बेचना है बेचो, उससे केंद्र सरकार का कोई लेना देना नहीं है। यह पूरे अधिकारों का, और बिना किसी जिम्मेदारी का यह सिलसिला भारत के संघीय ढांचे का सम्मान नहीं है, बल्कि यह तो हिंदुस्तान के इतिहास के सबसे बड़े खतरे के वक्त राज्यों के प्रति अपनी जिम्मेदारी से केंद्र सरकार का मुकर जाना है।

(Daily chhatisgarh)

दीवारों पर लिक्खा है, 19 अप्रैल 2021


 

दूसरों को तौलने की जरूरत नहीं, अपने मन में अपने को ही तौल लें

  दिल्ली से थोड़ी सी दिल दहलाने वाली खबर आई है, अगर अब तक लोगों का दिल दहलना जारी है। एक रिटायर्ड पुलिस अफसर की तीन बेटियां, तीनों की शादी, उनमें से दो दिल्ली में ही बसी हुई हैं, लेकिन अपने बीमार बाप को देखने नहीं पहुंचीं क्योंकि उन्हें डर था कि बाप को कोरोना हो सकता है। बाप ने घर के बाहर पोस्टर लगा रखा था कि मर जाने पर उसकी लाश को पुलिस को दे दिया जाए। एक बेटी ने पुलिस को फोन पर बताया कि वह इस डर से अपने बाप को देखने नहीं जा रही है। ऐसे में पुलिस वहां पहुंची, और मौके पर गए सिपाहियों ने कई घंटे तक बुजुर्ग को समझाया तो वे अस्पताल जाने के लिए तैयार हुए। सिपाही उसे ले जाकर अस्पताल में भर्ती करने के बाद भी उसका ख्याल करते रहे। बस, यह खबर यहीं खत्म है। इधर हिंदुस्तान के दूसरे बहुत से शहरों से दिल को छूने वाली खबरें भी आ रही हैं कि किस तरह घर के लोग नहीं है इसलिए पड़ोस के दूसरे मजहब के लोग भी ले जाकर किसी का अंतिम संस्कार कर रहे हैं। ऐसी अनगिनत खबरों के बीच गुजरात की यह खबर भी आई है कि वहां के भाजपा नेताओं ने श्मशान में हिंदू लाशों के अंतिम संस्कार में मदद कर रहे मुस्लिम वालंटियरों का विरोध किया है। खैर इस तबके की क्या बात की जाए जो कि आज भी नफरत पर जिंदा है। बात उन लोगों की करनी है जो आज ऐसे वक्त पर अपनों से भी डरे-सहमे हैं, या दूसरों की मदद में अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं। 

महामारी का यह वक्त रिश्तों की परिभाषाओं को एक बार फिर तय करने का मौका भी है। आज जब कुछ लोग रात-दिन खतरे की फिक्र किए बिना कहीं मरीजों को अस्पताल पहुंचा रहे हैं, तो कहीं सड़कों पर बेघर लोगों को खाना खिला रहे हैं, कहीं लाशों का अंतिम संस्कार कर रहे हैं, तो कहीं किसी और तरह से मदद। ये आखिर उन अनजानों के हैं कौन? ये रिश्ता क्या कहलाता है? दूसरी तरफ आज जिनके सिर पर कोरोना नाम का यह कहर टूट पड़ा पड़ा है उनके सामने भी रिश्ते बड़ी अजीब सी शक्ल अख्तियार करके खड़े हो गए हैं। आसपास के लोग कहीं जिम्मेदारी से परे जाकर मदद कर रहे हैं, तो कहीं जिम्मेदारी को छोड़कर भाग जा रहे हैं, और लोगों की शिनाख्त हो रही है, अपनों की शिनाख्त हो रही है, और मुसीबत के वक्त नए दोस्त, नए हमदर्द भी बन रहे हैं। लेकिन यह मौका इससे परे की कुछ बातों के बारे में भी सोचने का है। बहुत पहले लोगों ने ऐसी कहानी सुनी होगी कि नाव पर लोग अपने दोस्त और परिवार के चार लोगों के साथ सवार हैं, और नाव पर कुल दो को ले जाया जा सकता है, ऐसे में अलग-अलग लोगों से पूछा जाता है कि वे कौन से दो लोगों को बचाना चाहेंगे? कुछ ऐसी ही कहानी किसी हवाई जहाज को लेकर भी चलती है और लोगों से पूछा जाता है कि पैराशूट अगर केवल दो होंगे, तो वे किन दो लोगों को बचाना चाहेंगे? और यह लोगों के रिश्तों को तय करने की बात भी रहती है कि लोग अपने मन के भीतर ही यह अंदाज लगा सके कि जब जिंदा रहने की संभावना सीमित रहेगी, तो लोग किसे बचाएंगे? अपने बूढ़े मां-बाप को बचाएंगे? अपने हमउम्र जीवनसाथी को बचाएंगे? या अपने बच्चों को बचाएंगे? पल भर के लिए मान लें कि लोग अपनी पीढ़ी के लिए स्वार्थ को छोड़ भी देते हैं, तो भी अपने से एक पीढ़ी ऊपर, और अपने से एक पीढ़ी नीचे में से किसी एक को छांटना बहुत आसान बात तो होगी नहीं! सोचने के लिए जिन्हें किसी मिसाल से मदद मिल सकती है, उन्हें हम एक असली खबर बता सकते हैं। मुंबई के विख्यात टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल ने एक सर्वे किया। वहां जिन बच्चों की जांच में उन्हें कैंसर निकालता था, और उन्हें इलाज के लिए लाने कहा जाता था, उनमें से बहुत ही कम लड़कियों को मां-बाप वापिस लाते थे, बेटों को जरूर इलाज के लिए लेकर आते थे। 

दिल्ली की जिस खबर से आज इस मुद्दे पर लिखना सूझा है, उस खबर में उस बुजुर्ग रिटायर्ड अफसर की तीन बेटियां, तीनों शादीशुदा, और उसकी देखभाल करने कोई भी मौजूद नहीं, कोई भी झाँकने भी तैयार नहीं, और लोग आमतौर पर यह मानते हैं कि बुढ़ापे में बेटे ख्याल रखें या ना रखें, बेटियां तो ख्याल रखती ही हैं। हम इस घटना से बेटियों के बारे में कोई अधिक व्यापक का छवि बनाना नहीं चाहते क्योंकि एक अकेली कहानी किसी तबके का प्रतिनिधित्व नहीं करती है। लेकिन आज सवाल यह है कि जब अस्पताल में बिस्तर हासिल नहीं है, आईसीयू में ऑक्सीजन या वेंटीलेटर हासिल नहीं है, तब अगर किसी परिवार के दो लोगों को एक ही जरूरत है, तो परिवार में फैसला लेने वाले लोग क्या फैसला लेंगे? यह सवाल कम असुविधा का नहीं है, और अधिकतर लोग यही सोचेंगे कि यह फिजूल का सवाल है, यह बात डॉक्टर पर छोड़ दी जाएगी कि वह किसके लिए वेंटिलेटर अधिक जरूरी समझते हैं, लेकिन सच में ही ऐसी नौबत आ सकती है जब सुविधा किसी एक के लिए हो, और दांव पर एक से अधिक जिंदगियां लगी हों, खर्च की ताकत सीमित हो, तब लोग क्या करेंगे यह सवाल बहुत ही कठिन है, और बहुत से लोगों के लिए कल्पना में भी यह सवाल शायद जिंदगी का सबसे कठिन सवाल होगा। हम महज इस सवाल पर लाकर इस बात को छोड़ देना चाहते हैं, क्योंकि लोगों को ऐसे किसी मौके पर तय तो अपने मन के भीतर करना होगा और जब तक ऐसा मौका आता नहीं है हम क्यों उन्हें उनकी ही नजरों के सामने, उनकी ही भावनाओं के भीतर उन्हें नीचा दिखाएं ?

आज इतने कठिन सवाल से कुछ कम कठिन सवाल भी लोगों के मन में तैर रहे हैं, जरूरी सामान लेने खतरे के बीच बाजार कौन जाए, और कौन ना जाए? बाहर सब्जी खरीदने कौन निकले, और कौन न निकले? अस्पताल की दौड़-भाग का जिम्मा अपने पर कौन ले? और खासकर जब एक से अधिक लोग ऐसे काम के लिए परिवार के भीतर हासिल हों तब यह देखने लायक बात रहती है कि परिवार के भीतर भी किस तरह का स्वार्थ और किस तरह का त्याग सामने आता है । यह कुछ उसी किस्म का रहता है कि जब परिवार में किसी को किडनी देने की बारी आती है, या किसी और किस्म के अंगदान की नौबत आती है, तब कौन खुद होकर सामने आते हैं? ऐसे बहुत से कठिन सवाल आज कई लोगों की जिंदगी में खड़े हुए हैं। दूसरों को तौलने की जरूरत नहीं, अपने मन में अपने को ही तौल लें। 

(Daily chhatisgarh)